सोमवार, 27 अगस्त 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 27 Aug 2018


👉 जिस मरने से जग डरे, सो मेरे आनन्द

🔶 प्रसिद्ध क्रान्तिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को जब फाँसी की सजा सुनाई गई, तो उनके आँखे डबडबा गईं। माँ बोली, "राम, देश की आजादी के लिए तेरे जैसे बलिदानी बेटे को जन्म देने के लिए मैं स्वयं को धन्य मानती थी। पर तेरी आँखो के आँसुओं ने मुझे निराश कर दिया। मैं तो सोच रही थी कि मेरा बेटा हँसते-हँसते फाँसी के तख्ते पर चढे़गा, पर…….."।

🔷 वीर बिस्मिल ने बीच में ही टोकते हुए कहा, "माँ, भले ही दूसरे लोग 'मृत्यु' शब्द सुनते ही भय से काँप उठते हो, पर मैं उनके समान कायर नहीं हूँ। तुमने मुझे उन्हीं के जैसा कैसे मान लियी? मैंने तुम जैसी वीर माता के कोख से जन्म लिया है। ऐसा पुत्र फाँसी की पूर्वसन्ध्या पर मुझे विदा करने तुम्हें आया देख और तेरी आँखों में हर्ष और उमंग की झलक पाकर मेरी आँखों से खुशी के आँसू निकल आए। माँ मैं वचन देता हूँ कि अगले जन्म में भी तुम्हारी ही कोख से जन्म लूँगा।" इतिहास साक्षी है कि मृत्यु से अभय यह वीर सपूत फाँसी के फन्दे पर हँसते-हँसते झूल गया।

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 39)

👉 उत्कृष्टता के साथ जुड़ें, प्रतिभा के अनुदान पाएँ

🔶 प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं टपकती। उसे पुरुषार्थपूर्वक, मनोबल के सहारे अर्जित करना पड़ता है। अब तक के प्रतिभाशालियों के प्रगतिक्रम पर दृष्टिपात करने से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि अपनाए गये काम में उल्लास भरी उमंगें उमड़ती रहीं, मानसिक एकाग्रता के साथ तन्मयता जुटाई गई, पुरुषार्थ को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर अवरोधों से जूझा गया तथा प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलकर अपनी प्रखरता का परिचय दिया गया। सफलताएँ इसी आधार पर मिलती हैं। सफलता मिलने पर हौसले बुलंद होते हैं। दूने उत्साह से काम करने को जी करता है। इस प्रयास में प्रतिभा विकसित होती है और परिपक्व भी बनती है, उत्कर्ष यही है। अभ्युदय का श्रेय इसी आधार पर आँका जाता है। इक्कीसवीं सदी प्रतिभावानों की क्रीड़ास्थली होगी। उन्हीं के द्वारा वह कर दिखाया जाएगा जो असंभव नहीं तो कष्टसाध्य तो कहा ही जाता रहा है।
  
🔷 हवा का रुख पीठ पीछे हो तो गति में अनायास ही तेजी आ जाती है। वर्षा के दिनों में बोया गया बीज सहज ही अंकुरित होता है और उस अंकुर को पौधे के रूप में लहलहाते देर नहीं लगती। वसंत में मादाएँ गर्भधारण के कीर्तिमान बनाती हैं। किशोरावस्था बीतते-बीतते जोड़ा बनाने की उमंग अनायास ही उभरने लगती है। वातावरण की अनुकूलता में, उस प्रकार के प्रयास गति पकड़ते हैं और प्राय: सफल भी होते हैं।
  
🔶 दिव्यदर्शी अंत: स्फुरणा के आधार पर यह अनुभव करते हैं कि समय के परिवर्तन की ठीक यही वेला है। नवयुग के अरुणोदय में अब अधिक विलंब नहीं है। जनमानस वर्तमान अवांछनीयताओं से खीझ और ऊब उठा है। उसकी आकुलता, आतुरता के साथ वह दिशा अपना रही है, जिस पर चलने से घुटन से मुक्ति मिल सके और चैन की साँस लेने का अवसर मिल सके। साथ ही विश्व वातावरण ने भी अपना ऐसा निश्चय बनाया है कि अनौचित्य को उलटकर औचित्य को प्रतिष्ठित करने में अनावश्यक विलंब न किया जाए। उथल-पुथल के ऐसे चिह्न प्रकट हो रहे हैं जो बताते हैं कि नियति की अवधारणा-सदाशयता की ज्ञानगंगा का अवतरण, आज की आवश्यकता के अनुरूप इन्हीं दिनों बन पड़ना सुनिश्चित है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 49

👉 Scientific Basis of Gayatri Mantra Japa (Part 6)

🔶 The second step in the sadhana is to assimilate in practice what has been learnt. Observation and analysis of the lower self cluttered with impurities is of no avail unless it is coupled with simultaneous attempts at cleansing out and refinement. Japa-sadhana helps in developing the inner strength and determination towards self-cleansing and self-refinement. The advanced spiritual masters affirm that the japa of Gayatri Mantra brings about rapid removal of ingrained vices and evil tendencies. Progress in this direction further accelerates inner purification, as it deepens the sadhaka's meditation and thus reinforces the linkage of the sadhaka's higher inner self with the indwelling divinity which the mantra invokes. During this process one experiences ups and downs in the mental and emotional domains.

🔷 The baser instincts and tendencies accumulated during innumerable births of the fallen soul in different forms before the present life are not easy to be uprooted and thrown out. These kusamskaras, coupled with the ignorance-driven ego, struggle hard to obstruct the process of inner purification in the initial phases.

🔶 However, with the continuity of the japa- sadhana the devotee realizes that he is not the body but the eternal soul and therefore gains the light and courage to fight and eliminate all the hurdles in the path of self-realization. He consciously and gladly undergoes the prescribed austerities to loosen the hold of internal evils and passions. He understands that only the path of selfless service leads to true happiness, and that spiritual life is far more superior to life wasted in the pursuit of materialistic success and power.

📖 Akhand Jyoti, Mar Apr 2003

👉 First Give, Then Gain

🔶 Great personalities always appeal and motivate people in their contact to give something for noble causes. They themselves sacrifice everything they had. This is what makes them great. Thorough  pondering over this fact has taught me that there is no religious duty greater than giving or sacrificing (for others’ welfare), which we can do any time (provided we have the will and attitude). There is no better mode than renunciation (of selfish possessions and attachments) for elimination of evil tendencies and untoward accumulation in the mind.

🔷 If you want to acquire precious knowledge, attain people’s respect, achieve something great, then first learn to give what best you can for the society, for altruistic service. Donate your talents, intellect, time, labor, wealth, whatever potentials or resources you have for the betterment of the world…; you will get manifold of that in return… Gautam Buddha had renounced the royal throne; Gandhi had left the brilliant career, wealth, comforts… As the world has witnessed, what they were rewarded in return was indeed immeasurable, immortal…

🔶 It is worth recalling the beautiful verse of renowned poet Rabindranath Tagore here, which says – He spread his hands open and asked for something… I took out a tiny piece of grain from my bag and kept on His palm. At the end of the day, I found a golden piece of same size in my bag. I cried – why didn’t I empty my bag for Him, which would have transformed me, the poor man into a King of Wealth?

📖 Akhand Jyoti, March. 1940

👉 पहले दो, पीछे पाओ

🔶 यह प्रश्न विचारणीय है कि महापुरुष अपने पास आने वालों से सदैव याचना ही क्यों करता है? मनन के बाद मेरी निश्चित धारणा हो गई कि त्याग से बढ़कर प्रत्यक्ष और तुरंत फलदायी और कोई धर्म नहीं है। त्याग की कसौटी आदमी के खोटे-खरे रूप को दुनिया के सामने उपस्थित करती है। मन में जमे हुए कुसंस्कारों और विकारों के बोझ को हलका करने के लिए त्याग से बढ़कर अन्य साधन हो नहीं सकता।

🔷 आप दुनिया से कुछ प्राप्त करना चाहते हैं, विद्या, बुद्धि संपादित करना चाहते हैं, तो त्याग कीजिए। गाँठ में से कुछ खोलिए। ये चीजें बड़ी महंगी हैं। कोई नियामक लूट के माल की तरह मुफ्त नहीं मिलती। दीजिए, आपके पास पैसा, रोटी, विद्या, श्रद्धा, सदाचार, भक्ति, प्रेम, समय, शरीर जो कुछ हो, मुक्त हस्त होकर दुनिया को दीजिए, बदले में आप को बहुत मिलेगा। गौतम बुद्ध ने राजसिंहासन का त्याग किया, गाँधी ने अपनी बैरिस्टरी छोड़ी, उन्होंने जो छोड़ा था, उससे अधिक पाया।

🔶 विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर अपनी एक कविता में कहते हैं, ``उसने हाथ पसार कर मुझ से कुछ माँगा। मैंने अपनी झोली में से अन्न का एक छोटा दाना उसे दे दिया। शाम को मैंने देखा कि झोली में उतना ही छोटा एक सोने का दाना मौजूद था। मैं फूट-फूट कर रोया कि क्यों न मैंने अपना सर्वस्व दे डाला, जिससे मैं भिखारी से राजा बन जाता।’’

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1940 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1940/March/v1.9

👉 शांति और सौन्दर्य अपने ही अन्दर निहित

🔶 उनसे प्यार करो, जिन्हें लोग पतित, गर्हित और हेय समझते हैं। जिन्हें केवल निन्दा और भर्त्सना ही मिलती है। जो अपने ऊपर लदे हुए पिछड़ेपन के कारण न किसी के मित्र बन पाते हैं और न जिन्हें कोई प्यार करता है। प्यार करने योग्य वही लोग हैं, जिन्हें स्नेह- सद्भाव देकर तुम अपने को गौरवान्वित करोगे। मांगो मत, चाहो मत, देकर ही अपने को गौरवान्वित अनुभव करो।

🔷 उन्हें देखने के लिए मत दौड़ो, जिनकी त्वचा चमकीली और गठन में सुन्दरता भरी है। ऐसा तो तितलियाँ और भौंरे भी कर सकते हैं। तुम उन्हें निहारो जो दरिद्रता और रुग्णता की चक्की में पिसकर कुरूप लगने लगे हैं। अभावों के कारण जिनकी अस्थियाँ उभर रही हैं और आँखों की चमक छिन गयी है। निराश दिलों में आशा का संचार करके तुम अपने को धन्य अनुभव करोगे।

🔶 कोलाहल और क्रंदन के साथ जुड़ी हुई विपन्नताओं को देखकर न डरो और न भागो। वरन् वह करो, जिससे अशान्ति को निरस्त और शान्ति को प्रशस्त कर सको। शांति पाने के लिए न एकान्त ढूँढ़ो और न उद्यानों में भटको। वह तो तुम्हारे अन्दर है और तब प्रकट होती है जब तुम कोई ऐसा काम करते हो, जिससे अनीतियों और भ्रांतियों का  निराकरण हो सके। सत्प्रयत्नों के साथ ही शांति जुड़ी हुई है।

✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 25 अगस्त 2018

👉 सभी जीवों में शिव की सेवा करो

🔷 जो शिव की सेवा करना चाहता है, उसे पहले उनकी सन्तानों - विश्व के प्राणियों की सेवा करनी होगी। शास्त्रों में कहा है कि जो भगवान के दासों की सेवा करता है वही भगवान का सर्वश्रेष्ठ दास है। यह बात सदा ध्यान में रखनी होगी। निःस्वार्थपरता ही धर्म की कसौटी है। जिसमें जितनी अधिक निःस्वार्थपरता है, वह उतना ही अध्यात्मिक और उतना ही शिव के समीप है। चाहे वह विद्वान हो गया मूर्ख, शिव का सामीप्य दूसरों की अपेक्षा उसे ही प्राप्त है, चाहे उसे इसका ज्ञान हो या न हो। और इसके विपरीत यदि कोई स्वार्थी है, तो चाहे अपनी शक्ल चीते जैसी क्यों न बना ली हो, शिव से वह बहुत दूर है।

~ रामकृष्ण परमहंस

👉 चाबी बन जाओ

🔷 किसी गाँव में एक ताले वाले की दुकान थी,ताले वाला रोजाना अनेकों चाबियाँ बनाया करता था। ताले वाले की दुकान में एक हथौड़ा भी था, वो हथौड़ा रोज देखा करता कि ये चाभी इतने मजबूत ताले को भी कितनी आसानी से खोल देती है।

🔶 एक दिन हथौड़े ने चाभी से पूछा कि मैं तुमसे ज्यादा शक्तिशाली हूँ, मेरे अंदर लोहा भी तुमसे ज्यादा है और आकार में भी तुमसे बड़ा हूँ लेकिन फिर भी मुझे ताला तोड़ने में बहुत समय लगता है और तुम इतनी छोटी हो फिर भी इतनी आसानी से मजबूत ताला कैसे खोल देती हो।

🔷 चाभी ने मुस्कुरा के ताले से कहा कि तुम ताले पर ऊपर से प्रहार करते हो और उसे तोड़ने की कोशिश करते हो लेकिन मैं ताले के अंदर तक जाती हूँ, उसके अंतर्मन को छूती हूँ और घूमकर ताले से निवेदन करती हूँ और ताला खुल जाया करता है।

🔶 वाह! कितनी गूढ़ बात कही है चाभी ने कि मैं ताले के अंतर्मन को छूती हूँ,और वो खुल जाया करता है।

🔷 इसीलिये हम और आप कितने भी शक्तिशाली हो या कितनी भी हम और आपके पास ताकत हो, लेकिन जब तक हम और आप लोगों के दिल में नहीं उतरेंगे, उनके अंतर्मन को नहीं छुएंगे तब तक कोई आपकी इज्जत नहीं करेगा।

🔶 हथौड़े के प्रहार से ताला खुलता नहीं बल्कि टूट जाता है, ठीक वैसे ही अगर हम और आप शक्ति के बल पर कुछ काम करना चाहते हैं, तो आप सामान्यत: नाकामयाब रहेंगे क्योंकि शक्ति के द्वारा आप किसी के दिल को छू नही सकते है।

तो
"चाबी बन जाओ, सबके दिल की चाबी"

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 26 Aug 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 38)

👉 बड़े कामों के लिए वरिष्ठ प्रतिभाएँ

🔷 निजी जीवन में प्रतिभा परिष्कार का शुभारंभ आलस्य और प्रमाद से निपटने को वरीयता देेकर करना चाहिए। छोटे काम सहायकों से कराते हुए बड़े-कठिन और वजनदार कार्यों का दायित्व अपने कंधों पर ओढ़ना चाहिए। हलके काम तलाश करने और किसी प्रकार मौज-मजे में समय काटने की आदत मनुष्य को आजीवन अनगढ़ ही बनाए रहती है। जो अपने हिस्से के काम के साथ-साथ समूचे संबद्ध क्षेत्र के हर पक्ष के उतार-चढ़ावों का ध्यान रखते हैं और संबद्ध व्यक्तियों को उसमें सुधार के आवश्यक परामर्श प्रस्ताव के रूप में नम्रतापूर्वक देते रहते हैं, वस्तुत: उन्हीं को सूत्र संचालक समझा जाता है। ऐसे लोग अहंकारी और आग्रही नहीं होते। आदेश भी नहीं देते। अपने प्रस्ताव इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं, जिसमें अपने अहंकार की, विशेषज्ञ होने की गंध न आती हो और दूसरों पर आक्षेप या दोषारोपण भी न लदता हो। सत्परामर्श की ही नहीं, तिरस्कारपूर्ण आदेश की भी अवहेलना होती है, कारण कि इसमें दूसरों के स्वाभिमान को चोट जो लगती है।
  
🔶 कोल्हू का बैल भी अपने नियत काम में लगा रहता है। विशेषता उसकी है, जो संबद्ध परिकर के हर पक्ष पर ध्यान रखता है। संभावनाओं की कल्पना करता है और शतरंज की गोटियों की तरह सतर्कतापूर्वक बाजी जीतने वाली चाल चलता रहता है। व्यवस्थापक ऐसे ही लोग बन पाते हैं और वे न केवल अपने काम की, वरन् समूचे संबद्ध का  सुनियोजन कर सकने की क्षमता सिद्ध करते हुए, अगले दिनों अधिक ऊँची श्रेणी का दायित्व सौंपे जाने का श्रेय उपलब्ध करते हैं। व्यावहारिक क्षेत्र का धर्मात्मा ऐसे ही लोगों को कहना चाहिए। अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य आदि दार्शनिक-नैतिक सद्गुण तो प्रथम कक्षा में उत्तीर्ण होने के उपरांत ही सफलतापूर्वक संचित किए जा सकते हैं। आरंभ तो निजी जीवन में उत्साह भरी व्यस्तता अपनाने से होता है।

🔷 परिवार क्षेत्र में प्रतिभाशालियों द्वारा, व्यवस्था संबंधी प्रयोग करना सरल पड़ता है। परिवार के सदस्यों से निरंतर संपर्क रहता है, उनके साथ आत्मीयता भरा बंधन भी रहता है, इसलिए अनुशासन पालने के लिए उन्हें अनुरोध एवं आग्रह के आधार पर अधिक अच्छी तरह सुनियोजित किया जा सकता है। इसी अभ्यास को जब व्यवसाय या समाज क्षेत्र में प्रयुक्त किया जाता है, तो उन्हें बड़े क्षेत्र की बड़ी सफलता का श्रेय भी अधिक मिलता है और व्यक्तित्व में प्रतिभा परिवर्धन का लाभ भी अनवरत रूप से मिलता चला जाता है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 48

👉 Scientific Basis of Gayatri Mantra Japa (Part 5)

🔷 The same is true about the impact of japa too; the effects of the mantra-vibrations cannot be felt without rhythmic repetition. The "dhi" element of the Gayatri Mantra refers to prayer for the awakening of intellect. Just uttering it once or twice cannot have the desired effect. Our mind is like a barren, uneven, hard landscape, which frustrates all attempts at its calming and refinement. In order to make the seed of sadhana germinate and sprout, the field of mind needs to be cleared, ploughed and irrigated with the help of japa; one has to peep inside and identify, mercilessly uproot and throw out the debris of accumulated evil tendencies. Sowing the seeds of virtues is not possible without this cleaning of deep rooted negativities. Japa can also be likened to cleaning, sharpening and glazing. Its repeated friction and subtle pressure calms down and cleanses the mind so that it could clearly reflect glow of the spirit.

🔶 Every devotee of Gayatri should therefore perform japa everyday for a fixed number of times at a fixed place, during fixed intervals of time. The arbitrary mode of excessive watering on some days and keeping the land dry on the others does not serve the purpose of proper irrigation of field. The same is true of the training of mind by japa. Regularity, sincerity, patience and consistency should be observed in this practice, as far as possible. This should also be continued over a long duration depending upon the sadhaka's inherent tendencies and mentality- till the dawn of the rays of success in the sadhana.

📖 Akhand Jyoti, Mar Apr 2003

👉 बड़प्पन की सही कसौटी

🔷 वैभव के आधार पर बड़प्पन आँकने की प्रथा इस संसार में है। जिनके पास जितनी संपदा, शिक्षा एवं चतुरता है, उसी अनुपात से उसके बड़प्पन का मूल्य आँका जाता है। बलिष्ठता और प्रतिभा भी उसी वर्ग में आती है, जो दूसरों पर अपनी छाप छोड़ती है तथा धाक जमाती है। लोग उग्रता, आतंकवाद, दुष्टता और हानि पहुंचाने की शाक्ति को देखते हुए भी डरते हैं, मान देते हैं।

🔶 बड़प्पन के मूल्यांकन की यह सभी कसौटियाँ ओछी तथा खोटी हैं। इनके सहारे हम किसी व्यक्ति का सही मूल्यांकन नहीं कर सकते। कसौटी ही खोटी हो, तो सोने और पीतल का अन्तर कैसे जाना जाय?

🔷 व्यक्तित्व की वास्तविक ऊँचाई उसकी सुसंस्कारिता के आधार पर आँकी जानी चाहिए। देखा जाना चाहिए कि किसने अपने आप में गुण, कर्म, स्वभाव के क्षेत्र में कितनी उत्कृष्टता अपनाई है और निजी चरित्र तथा दूसरों के साथ सद्व्यवहार में किस सीमा तक अपनी विशिष्टता अपनाई है।

🔶 जो अपने को जितना संयत, सज्जन और अनुशासित बना सका, वह उतना ही महान् है। धर्म- चिह्नो या प्रचलनों से कोई धर्मात्मा नहीं बनता। जिसने आदर्शांे के प्रति अपनी निष्ठा जिस सीमा तक परिपक्व की है, वस्तुतः उसी का बड़प्पन सफल और सराहनीय है।

✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परिजनों से गुरुदेव की आशा और अपेक्षा (अन्तिम भाग)

🔷 जहाँ थोड़े भी परिवार हैं वहाँ उन्हें संगठित हो जाना चाहिए। युग निर्माण परिवार बना लेना चाहिए और यदि न्यूनतम संख्या ही है तो भी उन्हें टोली बनाकर जन संपर्क के लिये निकलना चाहिये और नये युग की विचारणा एवं प्रक्रिया से सर्व साधारण को परिचित कराने के लिये निकलना चाहिये।

🔶 शाखा संगठन के उद्देश्य, स्वरूप और कार्यक्रमों की अगले पृष्ठों पर चर्चा है। प्रयत्न हर जगह यह होना चाहिये कि सामूहिकता का विकास हो, और संगठित परिजन उन क्रिया कलापों को आगे बढ़ाने में पूरा उत्साह और सहयोग दिखायें। संघ शक्ति के बिना युग परिवर्तन जैसे महान अभियान में प्रगति नहीं हो सकती इसलिए एकाकी कुछ टुन मुन करते रहने की अपेक्षा हमें सुसंगठित ही होना चाहिए और अपने आपको सृजन सेना का सदस्य मानकर नव निर्माण की दिशा में कुछ चिन्तन और कुछ प्रयत्न निरन्तर करते रहना चाहिए।

🔷 एक से दस का कर्त्तव्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। पत्रिकायें जहाँ भी पहुँचती हैं- जिनके पास भी पहुँचती हैं वहाँ यह कर्त्तव्य समझा जाना चाहिये कि इन्हें पढ़ने या सुनने का लाभ कम से कम दस व्यक्ति तो उठा ही लिया करें। इसके लिये थोड़ी दौड़ धूप और चेष्टा हर किसी को करनी चाहिये।

🔶 यह प्राथमिक कसौटी है जिस पर कस कर किसी परिजन की अध्यात्म निष्ठा को परखा जा सकेगा और यह समझा जा सकेगा कि उस अभियान के संचालक के साथ उनका मोह ही नहीं प्रेम भी है। मोह दर्शन लाभ करने मात्र से तृप्त हो जाता है पर प्रेम तो कुछ अनुदान माँगता है जो कुछ न दे सके, उचित अनुरोध आग्रह पर भी ध्यान न दे सके उसे कुछ भले ही कहा जाय ‘प्रेमी’ तो नहीं ही कहा जायगा। गुरु देव अपने मार्ग दर्शक के प्रति अपने श्रद्धा भरे प्रेम का परिचय आजीवन देते चले आये हैं वे चाहते हैं कि उनके साथ बँधे हुए लोग भी अपनी भावनात्मक गहराई का एक ही प्रमाण परिचय प्रस्तुत करें। सघन अनुदान-सक्रिय मार्ग दर्शन और शक्ति प्रत्यावर्तन के लिये भी अधिकारी पात्रों को कब से तलाश कर रहे हैं। अब तो वह तलाश व्याकुलता में परिणत हो गई है। पर परिजनों में पात्रता का अभाव उन्हें इतना कष्टकारक होता है कि वे कभी-कभी रो पड़ते हैं।

🔷 परिजनों को आत्मिक प्रगति की दिशा में कहने लायक प्रगति करने के लिये उपरोक्त कसौटियों पर अपनी पात्रता सिद्ध करनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 माता भगवती देवी शर्मा
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1972 पृष्ठ 44


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/May/v1.44

👉 युवक के गुण

🔶 युवा होने का एक ही अर्थ है, जिसकी आत्मा विद्रोही हो, जो झुकना नहीं टूटना जानती हो। जो परिवर्तन चाहता है। जो जीवन को नई दिशाओं में नए आयामों में ले जाने को हमेशा तत्पर हो। क्रान्ति की उद्याम लालसा ही युवा होने का लक्षण है।

🔷 बूढा़ होने का क्या अर्थ है। जो जीवन को स्वीकार न करे, जो हमेशा जीवन के अन्धकारपूर्ण पक्ष की बातें करे, जो घोर निराशावदि हो, जिसे दो रातों के बीच का दिन छोटा प्रतीत होता हो। जो गुलाब की सुन्दरता और सुगन्ध की अवहेलना करे और काँटों को गिने, उनकी बुराई करे। ऐसे लोग जीवन की ओर नहीं, मृत्यु की और उन्मुख होते हैं। युवा होने का अर्थ है जीवन का सामना करना। जो जीवन के साथ दो-दो हाथ करने को तैयार हो, वही युवक है।

🔶 युवक मैं उसे कहूँगा जो खतरों से खेलने को, जूझने को तैयार हो। लीक से हटकर चलने को तैयार हो। पर ऐसे लोगों की संख्या कम है, क्योंकि खतरा मोल लेने में, लीक से हटकर चलने में, भटक जाने का, बिखर जाने की सम्भावना है। यदि नदी समुद्र में जाने से डरे, तो क्या होगा? जो भटकने से डर गया, वह पंगु हो जाता है, डरपोक हो जाता है।

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द

👉 अहंकार का त्याग

🔶 मृत्यु के बाद एक साधु और एक डाकू साथ-साथ यमराज के दरबार में पहुंचे।

🔷 यमराज ने अपने बहीखातों में देखा और दोनों से कहा-यदि तुम दोनों अपने बारे में कुछ कहना चाहते हो तो कह सकते हो। डाकू अत्यंत विनम्र शब्दों में बोला- महाराज! मैंने जीवनभर पाप कर्म किए हैं। मैं बहुत बड़ा अपराधी हूं। अत: आप जो दंड मेरे लिए तय करेंगे, मुझे स्वीकार होगा।

🔶 डाकू के चुप होते ही साधु बोला- महाराज! मैंने आजीवन तपस्या और भक्ति की है। मैं कभी असत्य के मार्ग पर नहीं चला। मैंने सदैव सत्कर्म ही किए हैं इसलिए आप कृपा कर मेरे लिए स्वर्ग के सुख-साधनों का प्रबंध करें।

🔷 यमराज ने दोनों की इच्छा सुनी और डाकू से कहा- तुम्हें दंड दिया जाता है कि तुम आज से इस साधु की सेवा करो। डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली।

🔶 यमराज की यह आज्ञा सुनकर साधु ने आपत्ति करते हुए कहा- महाराज! इस पापी के स्पर्श से मैं अपवित्र हो जाऊंगा। मेरी तपस्या तथा भक्ति का पुण्य निर्थक हो जाएगा। यह सुनकर यमराज क्रोधित होते हुए बोले- निरपराध और भोले व्यक्तियों को लूटने और हत्या करने वाला तो इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने को तैयार है और एक तुम हो कि वर्षो की तपस्या के बाद भी अहंकारग्रस्त ही रहे और यह न जान सके कि सबमें एक ही आत्मतत्व समाया हुआ है। तुम्हारी तपस्या अधूरी है। अत: आज से तुम इस डाकू की सेवा करो।

🔷 कथा का संदेश यह है कि वही तपस्या प्रतिफलित होती है, जो निरहंकार होकर की जाए। वस्तुत: अहंकार का त्याग ही तपस्या का मूलमंत्र है और यही भविष्य में ईश उपलब्धि का आधार बनता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 25 Aug 2018


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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