गुरुवार, 9 अगस्त 2018
👉 मोह का दुष्परिणाम
🔶 विद्याधर नाम के पंडित के तीन पुत्रों में से धर्म शर्मा सबसे छोटा था। घर में सब प्रकार से सुख पूर्वक रहने के कारण उसका मन विद्याध्ययन में नहीं लगता था और अवसर आने पर भी वह पढ़ने के लिए गुरुकुल में प्रविष्ट नहीं हुआ। इस पर उसके पिता ने उस की बहुत भर्त्सना की और आस-पास के लोग भी उसकी बुराई करने लगे। तब उसने साधु सेवा का व्रत लिया और उन्हीं की सत्संगति से उसे शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान हो गया। कहाँ तो वह मूर्ख माना जाता था और कहाँ अब बहुसंख्यक व्यक्ति उससे शिक्षा प्राप्त करने आने लगे।
🔷 एक दिन एक व्याध एक तोते के बच्चे को लेकर उसके पास आया। बच्चा उसे बड़ा सुन्दर लगा और उसने उसे खरीद लिया। तोता ऐसा चतुर था कि वह शीघ्र ही स्पष्ट रूप से मानव भाषा बोलने लगा और तरह तरह से वार्तालाप करके धर्म शर्मा को प्रसन्न रखने लगा। धीरे-धीरे धर्म शर्मा को तोते से ऐसा प्रेम हो गया कि उससे बढ़कर संसार में उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। एक दिन जब वह स्नान को गया अकस्मात् किसी प्रकार पिंजड़े के खुल जाने से एक बिलाव तोते को पकड़ ले गया और खा डाला। इस घटना से धर्मशर्मा को इतना खेद हुआ कि उस तोते के लिए शोक करते करते ही उसने प्राण त्याग दिये, और परिणाम स्वरूप दूसरे जन्म में उसका जन्म तोते की योनि में ही हुआ। अति मोह किसी का भी अच्छा नहीं होता और बुद्धिमानों को उससे बचकर ही रहना चाहिए।
📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई
🔷 एक दिन एक व्याध एक तोते के बच्चे को लेकर उसके पास आया। बच्चा उसे बड़ा सुन्दर लगा और उसने उसे खरीद लिया। तोता ऐसा चतुर था कि वह शीघ्र ही स्पष्ट रूप से मानव भाषा बोलने लगा और तरह तरह से वार्तालाप करके धर्म शर्मा को प्रसन्न रखने लगा। धीरे-धीरे धर्म शर्मा को तोते से ऐसा प्रेम हो गया कि उससे बढ़कर संसार में उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। एक दिन जब वह स्नान को गया अकस्मात् किसी प्रकार पिंजड़े के खुल जाने से एक बिलाव तोते को पकड़ ले गया और खा डाला। इस घटना से धर्मशर्मा को इतना खेद हुआ कि उस तोते के लिए शोक करते करते ही उसने प्राण त्याग दिये, और परिणाम स्वरूप दूसरे जन्म में उसका जन्म तोते की योनि में ही हुआ। अति मोह किसी का भी अच्छा नहीं होता और बुद्धिमानों को उससे बचकर ही रहना चाहिए।
📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 24)
👉 प्रतिभा संवर्धन का मूल्य भी चुकाया जाए
🔷 यह युगसंधि का प्रभात पर्व ऐसा है, जिसमें महाकाल को प्राणवान प्रतिभाओं की असाधारण आवश्यकता पड़ रही है। दैवी प्रयोजन महामानवों के माध्यम से ही क्रियान्वित होते हैं। अदृश्य शक्तियाँ तो उनमें प्रेरणा भर भरती हैं। यह व्यक्ति का स्वतंत्र निर्धारण होता है कि उन्हें अपनाए या ठुकराए। कृष्ण ने अर्जुन को कहा था कि ‘‘दुष्ट कौरव तो पहले से ही मरे पड़े हैं। मैनें उनका पहले ही तेजहरण कर लिया है। तुझे तो धर्मयुद्ध में निरत होकर मात्र श्रेय भर गले में धारण करना है।’’ वस्तुतः युग की विकृतियों का शमन होना ही है।
🔶 नवसृजन का ऐसा महायज्ञ जाज्वल्यमान होना है, जिससे आगामी लंबे समय तक सुख शांति और प्रगति का वातावरण बना रहे, एकता और समता को मान्यता मिले, ध्वंस का स्थान सृजन ग्रहण करे और चेतना तथा भौतिक शक्तियों का नियोजन मात्र सत्प्रयोजनों के निमित्त होता रहे। इसी उज्ज्वल भविष्य को ‘सतयुग की वापसी’ नाम दिया गया है। अनीति की असुरता का दमन देवताओं की सामूहिक शक्ति-संघशक्ति दुर्गा के अवतरण से संभव हुआ था। लगभग उसी पुरातन प्रक्रिया का प्रत्यावर्तन नये सिरे से, नये रूप में इन दिनों संपन्न होने जा रहा है। उस प्रवाह में सम्मिलित होने वाले सामान्य पत्तों की तरह हलके होते हुए भी सरिता की धाराओं पर सवार होकर बिना कुछ विशेष प्रयास के ही महानता के महासमुद्र में जा मिलने में सफल हो सकेंगे।
🔷 अपने काम से, किसी से कुछ पाने के लिए कहीं जाना एक बात है और किसी समर्थ सत्ता द्वारा अपने सहायक के रूप में बुलाए जाने पर वहाँ पहुँचना सर्वथा दूसरी। पहली में एक पक्ष की दीनता और दूसरे पक्ष की स्वाभाविक उपेक्षा भर रहती है पर आमंत्रित अतिथि को लेने स्टेशन पर माला लेकर पहुँचना और सम्मानपूर्वक ठहराया जाता है। उसके वार्तालाप को भी प्रमुखता दी जाती है और ऐसा आधार खड़ा किया जाता है कि आमंत्रित व्यक्ति में निमंत्रण का उद्देश्य समझने और उसमें सहभागी बनने की प्रतिक्रिया उत्पन्न हो। महाकाल द्वारा प्रज्ञा-परिजनों के भेजे गए आमंत्रण को इसी रूप में देखा-समझा जाना चाहिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 30
🔷 यह युगसंधि का प्रभात पर्व ऐसा है, जिसमें महाकाल को प्राणवान प्रतिभाओं की असाधारण आवश्यकता पड़ रही है। दैवी प्रयोजन महामानवों के माध्यम से ही क्रियान्वित होते हैं। अदृश्य शक्तियाँ तो उनमें प्रेरणा भर भरती हैं। यह व्यक्ति का स्वतंत्र निर्धारण होता है कि उन्हें अपनाए या ठुकराए। कृष्ण ने अर्जुन को कहा था कि ‘‘दुष्ट कौरव तो पहले से ही मरे पड़े हैं। मैनें उनका पहले ही तेजहरण कर लिया है। तुझे तो धर्मयुद्ध में निरत होकर मात्र श्रेय भर गले में धारण करना है।’’ वस्तुतः युग की विकृतियों का शमन होना ही है।
🔶 नवसृजन का ऐसा महायज्ञ जाज्वल्यमान होना है, जिससे आगामी लंबे समय तक सुख शांति और प्रगति का वातावरण बना रहे, एकता और समता को मान्यता मिले, ध्वंस का स्थान सृजन ग्रहण करे और चेतना तथा भौतिक शक्तियों का नियोजन मात्र सत्प्रयोजनों के निमित्त होता रहे। इसी उज्ज्वल भविष्य को ‘सतयुग की वापसी’ नाम दिया गया है। अनीति की असुरता का दमन देवताओं की सामूहिक शक्ति-संघशक्ति दुर्गा के अवतरण से संभव हुआ था। लगभग उसी पुरातन प्रक्रिया का प्रत्यावर्तन नये सिरे से, नये रूप में इन दिनों संपन्न होने जा रहा है। उस प्रवाह में सम्मिलित होने वाले सामान्य पत्तों की तरह हलके होते हुए भी सरिता की धाराओं पर सवार होकर बिना कुछ विशेष प्रयास के ही महानता के महासमुद्र में जा मिलने में सफल हो सकेंगे।
🔷 अपने काम से, किसी से कुछ पाने के लिए कहीं जाना एक बात है और किसी समर्थ सत्ता द्वारा अपने सहायक के रूप में बुलाए जाने पर वहाँ पहुँचना सर्वथा दूसरी। पहली में एक पक्ष की दीनता और दूसरे पक्ष की स्वाभाविक उपेक्षा भर रहती है पर आमंत्रित अतिथि को लेने स्टेशन पर माला लेकर पहुँचना और सम्मानपूर्वक ठहराया जाता है। उसके वार्तालाप को भी प्रमुखता दी जाती है और ऐसा आधार खड़ा किया जाता है कि आमंत्रित व्यक्ति में निमंत्रण का उद्देश्य समझने और उसमें सहभागी बनने की प्रतिक्रिया उत्पन्न हो। महाकाल द्वारा प्रज्ञा-परिजनों के भेजे गए आमंत्रण को इसी रूप में देखा-समझा जाना चाहिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 30
👉 Personality, personality, personality
🔷 This body is begotten and born of parents, there is really nothing different about the process of human birth, it is the same as in other animals. But on the other hand a personality has to be birthed with great care and resourcefulness.
🔶 Everyone, from a scientist to a philosopher has held human life in high regards; they sing praises to its greatness. The object of this praise is not a person, but a persona - the personality.
🔷 Yes, we do hear of someone inheriting a huge fortune, but its quite impossible to inherit - a great personality.
🔶 To make a personality is to relentlessly fight the battle of self-improvement with firm determination.
🔷 When a person becomes great, becomes extraordinary, outwardly he appears to be the same - but something does change, which makes him extraordinary from ordinary and that is - his personality.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Jivan Devta ki sadhana-aradhana Vangmay 2 Page 2.2
🔶 Everyone, from a scientist to a philosopher has held human life in high regards; they sing praises to its greatness. The object of this praise is not a person, but a persona - the personality.
🔷 Yes, we do hear of someone inheriting a huge fortune, but its quite impossible to inherit - a great personality.
🔶 To make a personality is to relentlessly fight the battle of self-improvement with firm determination.
🔷 When a person becomes great, becomes extraordinary, outwardly he appears to be the same - but something does change, which makes him extraordinary from ordinary and that is - his personality.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Jivan Devta ki sadhana-aradhana Vangmay 2 Page 2.2
👉 व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व
🔷 व्यक्ति की शरीर रचना तो माता-पिता के सम्भोग से अन्य प्राणियों की ही भाँति हो जाती है, किन्तु व्यक्तित्व की रचना बड़ी सावधानी और सूझ-बूझ के साथ करनी होती है।
🔶 दार्शनिकों से लेकर वैज्ञानिक तक ने मनुष्य जीवन की महत्ता के जो गीत गाए हैं उनका केन्द्र व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व ही रहा है।
🔷 यह तो हो सकता है कि किसी को धन सम्पदा विरासत में मिली हो, पर चरित्र आज तक किसी को भी विरासत में नहीं मिला।
🔶 यह निरंतर आत्म-सुधार की प्रक्रिया से लोहा लेने से ही संभव हुआ है।
🔷 कोइ सामान्य मनुष्य जब असामान्य बन जाता है, उसके बाह्य आकार, बनावट में उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं होता, जो वस्तु बदलती है वह व्यक्तित्व ही है।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन देवता की साधना-आराधना वांग्मय 2 पृष्ठ 2.2
🔶 दार्शनिकों से लेकर वैज्ञानिक तक ने मनुष्य जीवन की महत्ता के जो गीत गाए हैं उनका केन्द्र व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व ही रहा है।
🔷 यह तो हो सकता है कि किसी को धन सम्पदा विरासत में मिली हो, पर चरित्र आज तक किसी को भी विरासत में नहीं मिला।
🔶 यह निरंतर आत्म-सुधार की प्रक्रिया से लोहा लेने से ही संभव हुआ है।
🔷 कोइ सामान्य मनुष्य जब असामान्य बन जाता है, उसके बाह्य आकार, बनावट में उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं होता, जो वस्तु बदलती है वह व्यक्तित्व ही है।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन देवता की साधना-आराधना वांग्मय 2 पृष्ठ 2.2
बुधवार, 8 अगस्त 2018
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 23)
👉 प्रतिभा संवर्धन का मूल्य भी चुकाया जाए
🔶 गाँधी युग में जो सत्याग्रही उभरकर आगे आए वे स्वतंत्रता सेनानी कहलाये, यशस्वी बने। ताम्रपत्र, पेंशन और आवागमन के मुफ्त पास प्राप्त करने के लाभों से गौरवान्वित हुए। जो उनमें वरिष्ठ और विशिष्ट थे, वे देश का शासन सूत्र संचालन करने वाले मूर्द्धन्य बने। बापू के संपर्क में रहे नेहरू, पटेल जैसे अनेकों रत्न ऐसे हैं जिनके स्मारकों को नमन किया जाता है। इतिहास के पृष्ठों पर यशोगाथा पढ़कर भाव-विभोर हुआ जाता है। यह उनकी प्रचंड प्रतिभा का प्रतिफल मात्र है। यदि वे संकीर्ण स्वार्थ परायणों की तरह अपने मतलब से ही मतलब रखते, तो मात्र कुछ सुख-साधनों से मन बहला पाते, प्रकाश स्तंभ बनने के सुयोग सौभाग्य से तो उन्हें वंचित ही रहना पड़ता। जो उन दिनों कृपणता धारण किए रहे वे अग्रगामियों के साथ अपनी तुलना करने पर ‘माया मिली न राम’ वाली अपनी मूर्खता पर पश्चाताप ही करते रहते हैं, पर बीता हुआ समय पुनः लौटता कहाँ है?
🔷 बुद्ध, गाँधी, दयानंद, विवेकानंद, बिनोवा जैसों की महान उपलब्धियाँ स्मरण करके हर विचारशील का अंत:करण उमंगता है कि यदि उन्हें ऐसा ही श्रेय मिल सका होता तो कितना अच्छा होता। उस अवसर को गँवाकर वे जिस ललक-लिप्सा की पूर्ति का दिवा-स्वप्न देखते रहते हैं, उसे भी कौन साकार कर पाता है? तृष्णा मरते समय तक प्रौढ़ ही बनी रहती है। शेखचिल्लियों का समुदाय कुबेर जैसा धनाढ्य और इंद्र जैसा प्रतापी बनने के सपने देखता है, पर अब निष्कर्ष की बेला में मात्र इतना ही प्रतीत होता है कि कोल्हू के बैल की तरह पिलते और पिसते हुए समय बीतता गया। श्मशान के भूत-पलीत की तरह डरते और डराते रहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगा।
🔶 भाग्यवान वे हैं, जिन्होंने आदर्शों के साथ रिश्ता जोड़ा, महानता का मार्ग अपनाया और ऐसा कुछ कर दिखाया, जिसका अनुकरण करते हुए असंख्यों को गौरव-गरिमा का लक्ष्य प्रदान करने वाला ऊर्जा भरा प्रकाश उपलब्ध होता रहे। मूर्खता और बुद्धिमत्ता के चयन के लिए इसी चौराहे पर सही निर्णय करने का अवसर है। वैसा अवसर सुयोग भी इन्हीं दिनों है, जिसका लाभ भगीरथ और अर्जुन ने अपनी उदात्त साहसिकता के बदले खरीदा था। वरदान अनायास ही किसी को कहाँ मिलते हैं? देवता कुपात्रों और असमर्थों पर कृपा कहाँ करते हैं। पात्रता की गहराई रहने पर ही वर्षा का पानी विशाल जलाशय के रूप में लहराता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 30
🔶 गाँधी युग में जो सत्याग्रही उभरकर आगे आए वे स्वतंत्रता सेनानी कहलाये, यशस्वी बने। ताम्रपत्र, पेंशन और आवागमन के मुफ्त पास प्राप्त करने के लाभों से गौरवान्वित हुए। जो उनमें वरिष्ठ और विशिष्ट थे, वे देश का शासन सूत्र संचालन करने वाले मूर्द्धन्य बने। बापू के संपर्क में रहे नेहरू, पटेल जैसे अनेकों रत्न ऐसे हैं जिनके स्मारकों को नमन किया जाता है। इतिहास के पृष्ठों पर यशोगाथा पढ़कर भाव-विभोर हुआ जाता है। यह उनकी प्रचंड प्रतिभा का प्रतिफल मात्र है। यदि वे संकीर्ण स्वार्थ परायणों की तरह अपने मतलब से ही मतलब रखते, तो मात्र कुछ सुख-साधनों से मन बहला पाते, प्रकाश स्तंभ बनने के सुयोग सौभाग्य से तो उन्हें वंचित ही रहना पड़ता। जो उन दिनों कृपणता धारण किए रहे वे अग्रगामियों के साथ अपनी तुलना करने पर ‘माया मिली न राम’ वाली अपनी मूर्खता पर पश्चाताप ही करते रहते हैं, पर बीता हुआ समय पुनः लौटता कहाँ है?
🔷 बुद्ध, गाँधी, दयानंद, विवेकानंद, बिनोवा जैसों की महान उपलब्धियाँ स्मरण करके हर विचारशील का अंत:करण उमंगता है कि यदि उन्हें ऐसा ही श्रेय मिल सका होता तो कितना अच्छा होता। उस अवसर को गँवाकर वे जिस ललक-लिप्सा की पूर्ति का दिवा-स्वप्न देखते रहते हैं, उसे भी कौन साकार कर पाता है? तृष्णा मरते समय तक प्रौढ़ ही बनी रहती है। शेखचिल्लियों का समुदाय कुबेर जैसा धनाढ्य और इंद्र जैसा प्रतापी बनने के सपने देखता है, पर अब निष्कर्ष की बेला में मात्र इतना ही प्रतीत होता है कि कोल्हू के बैल की तरह पिलते और पिसते हुए समय बीतता गया। श्मशान के भूत-पलीत की तरह डरते और डराते रहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगा।
🔶 भाग्यवान वे हैं, जिन्होंने आदर्शों के साथ रिश्ता जोड़ा, महानता का मार्ग अपनाया और ऐसा कुछ कर दिखाया, जिसका अनुकरण करते हुए असंख्यों को गौरव-गरिमा का लक्ष्य प्रदान करने वाला ऊर्जा भरा प्रकाश उपलब्ध होता रहे। मूर्खता और बुद्धिमत्ता के चयन के लिए इसी चौराहे पर सही निर्णय करने का अवसर है। वैसा अवसर सुयोग भी इन्हीं दिनों है, जिसका लाभ भगीरथ और अर्जुन ने अपनी उदात्त साहसिकता के बदले खरीदा था। वरदान अनायास ही किसी को कहाँ मिलते हैं? देवता कुपात्रों और असमर्थों पर कृपा कहाँ करते हैं। पात्रता की गहराई रहने पर ही वर्षा का पानी विशाल जलाशय के रूप में लहराता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 30
👉 Two powers influencing human life
🔶 Religion and politics are the two main factors influencing human life at large. One offers zeal and the other awes with authority. One influences the outer worldly life of the masses while the other have an effect on the very depth of their inner being, thus giving them vision and direction. Both are immensely powerful having an extraordinary influence in their own respective field.The aforesaid comparison is not meant to prove or disprove which one of them is weak or strong, useful or useless. Both are in fact complementary to one another. Each one of them can facilitate the success of the other even though they work in their own discreet fields.
🔷 Humanity suffers when both of them happen to be at odds with one another. Harmony between religion and politics can indeed do wonder to humanity. Unfortunately, such harmony is lacking these days.
🔶 Even though both are complementary to each other, religion remains to be of greater importance as it influences the inner core of human being which then produces corresponding outside physical situations. Therefore, we should rely on dharma to educate and bring worthy changes in the hearts and minds of the masses rather than pleading help from the government administration which should be better left alone to get on with its duty of serving people in the physical field. We should utilise dharma more than ever to educate mind of the masses to rouse, guide, improve and excel their thoughts and feelings. The great luminaries who have been able to transform the world actually came from from the world of dharma
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama Vangmay 66 Page 1.1
🔷 Humanity suffers when both of them happen to be at odds with one another. Harmony between religion and politics can indeed do wonder to humanity. Unfortunately, such harmony is lacking these days.
🔶 Even though both are complementary to each other, religion remains to be of greater importance as it influences the inner core of human being which then produces corresponding outside physical situations. Therefore, we should rely on dharma to educate and bring worthy changes in the hearts and minds of the masses rather than pleading help from the government administration which should be better left alone to get on with its duty of serving people in the physical field. We should utilise dharma more than ever to educate mind of the masses to rouse, guide, improve and excel their thoughts and feelings. The great luminaries who have been able to transform the world actually came from from the world of dharma
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama Vangmay 66 Page 1.1
👉 मानव-जीवन को प्रभावित करने वाले दो आधार
🔶 धर्मतंत्र और राजतंत्र, दो ही मानव-जीवन को प्रभावित करने वाले आधार हैं। एक उमंग पैदा करता है तो दूसरा आतंक प्रस्तुत करता है। एक जन-साधारण के भौतिक जीवन को प्रभावित करता है और दूसरा अन्त:करण के मर्मस्थल को स्पर्श करके दिशा और दृष्टि का निर्धारण करता है। दोनों की शक्ति असामान्य है। दोनों का प्रभाव अपने-अपने क्षेत्र में अद्भुत है।
🔷 दोनों की तुलना यहाँ इस दृष्टि से नहीं की जा रही कि इसमें कौन कमजोर है; कौन बलवान; कौन महत्त्वपूर्ण है; कौन निरर्थक। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों का क्षेत्र बॅंटा हुआ होते हुए भी वस्तुत: एक के द्वारा दूसरे के सफल प्रयोजन होने में सहायता मिलती है।
🔶 दोनों एक दूसरे की विपरीत दिशा में चलें तो जनसाधारण को हानि ही उठानी पड़ती है। राज-सत्ता अपने हाथ में नहीं, वह दूसरों के हाथ में है। धर्म और राजनीति का समन्वय हो सका तो उसका परिणाम अति सुखद होता, पर आज की स्थिति में वह कठिन है। भले ही दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, फिर भी धर्मतंत्र का महत्व राजतंत्र से ऊपर ही है, क्योंकि अन्तरंग जीवन के अनुरूप ही भौतिक परिस्थिति में हेर-फेर होता है। अस्तु, भावनात्मक नवनिर्माण के लिए हमें राजसत्ता का सहारा टटोलने की अपेक्षा धर्मसत्ता का ही आश्रय लेना चाहिए। सरकार को अपने अन्य भौतिक उत्तरदायित्व निर्वाहों के लिए छुट्टी देनी चाहिए। हमें जन-मानस को स्पर्श करने के लिए विशेष रूप से धर्म-सत्ता का ही उपयोग करना होगा। उसके माध्यम से जनभावनाओं को जगाया, मोड़ा, सुधारा और उठाया जा सकता है। संसार को पलटकर रख देने वाले महामानव धर्मक्षेत्र के उद्यान में ही उपजे हैं।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-वांग्मय 66 पृष्ठ 1.1
🔷 दोनों की तुलना यहाँ इस दृष्टि से नहीं की जा रही कि इसमें कौन कमजोर है; कौन बलवान; कौन महत्त्वपूर्ण है; कौन निरर्थक। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों का क्षेत्र बॅंटा हुआ होते हुए भी वस्तुत: एक के द्वारा दूसरे के सफल प्रयोजन होने में सहायता मिलती है।
🔶 दोनों एक दूसरे की विपरीत दिशा में चलें तो जनसाधारण को हानि ही उठानी पड़ती है। राज-सत्ता अपने हाथ में नहीं, वह दूसरों के हाथ में है। धर्म और राजनीति का समन्वय हो सका तो उसका परिणाम अति सुखद होता, पर आज की स्थिति में वह कठिन है। भले ही दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, फिर भी धर्मतंत्र का महत्व राजतंत्र से ऊपर ही है, क्योंकि अन्तरंग जीवन के अनुरूप ही भौतिक परिस्थिति में हेर-फेर होता है। अस्तु, भावनात्मक नवनिर्माण के लिए हमें राजसत्ता का सहारा टटोलने की अपेक्षा धर्मसत्ता का ही आश्रय लेना चाहिए। सरकार को अपने अन्य भौतिक उत्तरदायित्व निर्वाहों के लिए छुट्टी देनी चाहिए। हमें जन-मानस को स्पर्श करने के लिए विशेष रूप से धर्म-सत्ता का ही उपयोग करना होगा। उसके माध्यम से जनभावनाओं को जगाया, मोड़ा, सुधारा और उठाया जा सकता है। संसार को पलटकर रख देने वाले महामानव धर्मक्षेत्र के उद्यान में ही उपजे हैं।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-वांग्मय 66 पृष्ठ 1.1
👉 बिना उसकी कृपा के हम कुछ भी नही
🔶 कोई भी छोटा-बड़ा काम करो तो तुम ये कभी मत समझना की ये मैं कर रहा हुं या उसे अपने नाम से कभी मत रखना!
🔷 एक धार्मिक स्थान पर एक सेठ जी भंडारा करते थे एक बार एक संत श्री वहाँ प्रसाद ग्रहण करने आये तो उन्होने देखा की सेठजी के मन मे अहंकार का उदय हो रहा है तो उन्होने कहा सेठजी बिना उसकी कृपा के हम कुछ भी नही कर सकते है और तो बहुत दुर की बात जौगर उसकी कृपा न हो तो खिलाना तो बहुत दुर की बात सामने परोसी हुई थाली अरे थाली क्या हाथ मे लिया ग्रास भी हाथ मे रह जाता है
🔶 सेठजी आप यही सोचना की दाने दाने पर लिखा होता है खाने वाले का नाम अरे ये तो उसकी महानता है जो कर तो वो रहा है और नाम हमें दे रहा है! सेठजी जो काम रामजी को करना है वो तो वो करेंगे आप तो ये समझना की उन्होने इस धर्म-कर्म के लिये मुझे चुना है यही मेरा परम सौभाग्य है!
🔷 सन्त श्री तो कहकर चले गये पर सेठजी को ये हज़म नही हुआ की दाने दाने पर भी भला खाने वाले का नाम लिखा होता है क्या? सेठजी को भूख लग रही थी वो भण्डार कक्ष मे गये एक थाली मे भोजन लिया और मन मे सोचने लगे की इस भोजन पर मेरा नाम लिखा है देखता हुं की मुझे कौन रोकता है सेठजी ने जैसै ही पहला ग्रास हाथ मे लिया तो दुसरे हाथ मे जो फोन था उसपे घंटी बजी फोन उठाया तो उन्हे सूचना मिली की बेटे का एक्सीडेंट हो गया और वो हॉस्पिटल मे भर्ती है सेठजी तत्काल रवाना हुये।
🔶 हॉस्पिटल मे सेठजी की पत्नी ने कहा की बेटा अब ठीक है बेटे को कुशल मंगल देखकर वही बैठे पत्नी के हाथ में चावल का एक दोना था तो सेठजी भूख से व्याकुल थे उन्होंने दोना लिया और चावल खाने लगे खाने के बाद सेठजी ने पूछा अरे तुमने खाया या नही तो पत्नी ने कहा की लेकर तो मैं अपने लिये ही लाई थी पर शायद इस प्रसाद पर रामजी ने आपका नाम लिखा था!
🔷 अब सेठजी को सन्त श्री की वो सारी बाते याद आई और फिर जीवन मे कभी उन्होने अपने नाम से कुछ भी न चलाया सब रामजी के नाम से चलाया!
🔶 मित्रों, जिन्दगी मे ये सदा याद रखना की यदि कोई अच्छा कार्य, विशेष कार्य अथवा कोई शुभ-कर्म सम्पन्न हो जाये तो ये कभी न सोचना की मैं कर रहा हुं बस यही सोचना की मेरे राम मुझसे करवा रहे है और जिसने भी ये समझने की भुल की कि मैं कर रहा हुं, मैं हुं वो रामजी से दुर हो गया यदि रामजी का सामीप्य चाहते हो तो हमेशा यही समझना कि मैं नही कर रहा हुं मैं नही हुं जो कुछ भी है वो सियाराम है और वही मुझसे करवा रहे है वो मुझे निमित्त बना रहे है और मैं सिर्फ एक निमित्त हुं इससे ज्यादा और कुछ भी नही !
"निज चरणन की भक्ति हॆ नाथ मुझे दे दो
वाणी मे भी शक्ति हॆ नाथ मुझे दे दो
तेरी सेवा मिलती रहे इतनी सी कृपा कर दो "
🔷 एक धार्मिक स्थान पर एक सेठ जी भंडारा करते थे एक बार एक संत श्री वहाँ प्रसाद ग्रहण करने आये तो उन्होने देखा की सेठजी के मन मे अहंकार का उदय हो रहा है तो उन्होने कहा सेठजी बिना उसकी कृपा के हम कुछ भी नही कर सकते है और तो बहुत दुर की बात जौगर उसकी कृपा न हो तो खिलाना तो बहुत दुर की बात सामने परोसी हुई थाली अरे थाली क्या हाथ मे लिया ग्रास भी हाथ मे रह जाता है
🔶 सेठजी आप यही सोचना की दाने दाने पर लिखा होता है खाने वाले का नाम अरे ये तो उसकी महानता है जो कर तो वो रहा है और नाम हमें दे रहा है! सेठजी जो काम रामजी को करना है वो तो वो करेंगे आप तो ये समझना की उन्होने इस धर्म-कर्म के लिये मुझे चुना है यही मेरा परम सौभाग्य है!
🔷 सन्त श्री तो कहकर चले गये पर सेठजी को ये हज़म नही हुआ की दाने दाने पर भी भला खाने वाले का नाम लिखा होता है क्या? सेठजी को भूख लग रही थी वो भण्डार कक्ष मे गये एक थाली मे भोजन लिया और मन मे सोचने लगे की इस भोजन पर मेरा नाम लिखा है देखता हुं की मुझे कौन रोकता है सेठजी ने जैसै ही पहला ग्रास हाथ मे लिया तो दुसरे हाथ मे जो फोन था उसपे घंटी बजी फोन उठाया तो उन्हे सूचना मिली की बेटे का एक्सीडेंट हो गया और वो हॉस्पिटल मे भर्ती है सेठजी तत्काल रवाना हुये।
🔶 हॉस्पिटल मे सेठजी की पत्नी ने कहा की बेटा अब ठीक है बेटे को कुशल मंगल देखकर वही बैठे पत्नी के हाथ में चावल का एक दोना था तो सेठजी भूख से व्याकुल थे उन्होंने दोना लिया और चावल खाने लगे खाने के बाद सेठजी ने पूछा अरे तुमने खाया या नही तो पत्नी ने कहा की लेकर तो मैं अपने लिये ही लाई थी पर शायद इस प्रसाद पर रामजी ने आपका नाम लिखा था!
🔷 अब सेठजी को सन्त श्री की वो सारी बाते याद आई और फिर जीवन मे कभी उन्होने अपने नाम से कुछ भी न चलाया सब रामजी के नाम से चलाया!
🔶 मित्रों, जिन्दगी मे ये सदा याद रखना की यदि कोई अच्छा कार्य, विशेष कार्य अथवा कोई शुभ-कर्म सम्पन्न हो जाये तो ये कभी न सोचना की मैं कर रहा हुं बस यही सोचना की मेरे राम मुझसे करवा रहे है और जिसने भी ये समझने की भुल की कि मैं कर रहा हुं, मैं हुं वो रामजी से दुर हो गया यदि रामजी का सामीप्य चाहते हो तो हमेशा यही समझना कि मैं नही कर रहा हुं मैं नही हुं जो कुछ भी है वो सियाराम है और वही मुझसे करवा रहे है वो मुझे निमित्त बना रहे है और मैं सिर्फ एक निमित्त हुं इससे ज्यादा और कुछ भी नही !
"निज चरणन की भक्ति हॆ नाथ मुझे दे दो
वाणी मे भी शक्ति हॆ नाथ मुझे दे दो
तेरी सेवा मिलती रहे इतनी सी कृपा कर दो "
मंगलवार, 7 अगस्त 2018
👉 अध्ययन की महिमा
🔷 देवरात का पुत्र ब्रह्रारात बाल्यावस्था से ही बड़ा मेधावी, कुशाग्र बुद्धि और कर्मशील था। उसकी माता ने उसे विद्याध्ययन के लिए अपने भाई वैशम्पायन ऋषि के पास भेज दिया था। वहाँ कुछ ही समय में उसने समस्त शिक्षा प्राप्त कर ली और गुरु की सेवा भी इतनी संलग्नता के साथ की कि वे उस पर बड़े प्रसन्न रहने लगे। एक दिन घटना वंश गुरु जी को ऋषि सभा में जाने में देर हो गई और जब वे जल्दी जल्दी जाने लगे तो भूल से एक छोटे शिशु पर पैर पड़ जाने से वह मर गया। इस पाप का प्रायश्चित करने की आज्ञा उन्होंने शिष्यों को दी।
🔶 ब्रह्रारात ने प्रार्थना की कि ये शिष्य असमर्थ है अगर आज्ञा हो तो मैं अकेला ही प्रायश्चित को पूर्ण कर दूँ। उसकी बात को अभिमान पूर्ण समझ कर वैशम्पायन बड़े क्रोध में आये और बोले कि तुझमें ऐसी ही सामर्थ्य है तो मेरी पढ़ाई यजुर्वेद विद्या को वापस कर दे। ब्रह्रारात ने उसे वमन कर दिया जिसे अन्य शिष्य तीतर बनकर चुग गये जिससे उसका नाम ‘तैत्तिरीय’ शाखा पड़ गया। तत्पश्चात ब्रह्ररात ने मानव गुरुओं से विरक्त होकर सूर्य की उपासना से स्वयं ही वेद विद्या को प्राप्त किया और उसका नाम माध्यन्दिनी शाखा रखा। उस समय से ब्रह्रारात का नाम याज्ञवल्क्य हो गया और वे अपने समय के सर्वश्रेष्ठ वेदवेदान्त और ब्रह्मविद्या के ज्ञाता माने गये। बाद में श्रेष्ठ ज्ञानी राजा जनक ने उनको अपना गुरु बनाया। उन्होंने अपने उदाहरण से दिखला दिया कि जो व्यक्ति अध्ययन और मनन में निरन्तर संलग्न रहेगा, वह सब प्रकार के ज्ञान को निश्चय ही प्राप्त कर सकता है।
📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई
🔶 ब्रह्रारात ने प्रार्थना की कि ये शिष्य असमर्थ है अगर आज्ञा हो तो मैं अकेला ही प्रायश्चित को पूर्ण कर दूँ। उसकी बात को अभिमान पूर्ण समझ कर वैशम्पायन बड़े क्रोध में आये और बोले कि तुझमें ऐसी ही सामर्थ्य है तो मेरी पढ़ाई यजुर्वेद विद्या को वापस कर दे। ब्रह्रारात ने उसे वमन कर दिया जिसे अन्य शिष्य तीतर बनकर चुग गये जिससे उसका नाम ‘तैत्तिरीय’ शाखा पड़ गया। तत्पश्चात ब्रह्ररात ने मानव गुरुओं से विरक्त होकर सूर्य की उपासना से स्वयं ही वेद विद्या को प्राप्त किया और उसका नाम माध्यन्दिनी शाखा रखा। उस समय से ब्रह्रारात का नाम याज्ञवल्क्य हो गया और वे अपने समय के सर्वश्रेष्ठ वेदवेदान्त और ब्रह्मविद्या के ज्ञाता माने गये। बाद में श्रेष्ठ ज्ञानी राजा जनक ने उनको अपना गुरु बनाया। उन्होंने अपने उदाहरण से दिखला दिया कि जो व्यक्ति अध्ययन और मनन में निरन्तर संलग्न रहेगा, वह सब प्रकार के ज्ञान को निश्चय ही प्राप्त कर सकता है।
📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई
👉 ईमानदारी ही सबसे बड़ा धन है
🔷 मुरारी लाल अपने गाँव के सबसे बड़े चोरों में से एक था। मुरारी रोजाना जेब में चाकू डालकर रात को लोगों के घर में चोरी करने जाता। पेशे से चोर था लेकिन हर इंसान चाहता है कि उसका बेटा अच्छे स्कूल में पढाई करे तो यही सोचकर बेटे का एडमिशन एक अच्छे पब्लिक स्कूल में करा दिया था।
🔶 मुरारी का बेटा पढाई में बहुत होशियार था लेकिन पैसे के अभाव में 12 वीं कक्षा के बाद नहीं पढ़ पाया। अब कई जगह नौकरी के लिए भी अप्लाई किया लेकिन कोई उसे नौकरी पर नहीं रखता था।
🔷 एक तो चोर का बेटा ऊपर से केवल 12 वीं पास तो कोई नौकरी पर नहीं रखता था। अब बेचारा बेरोजगार की तरह ही दिन रात घर पर ही पड़ा रहता। मुरारी को बेटे की चिंता हुई तो सोचा कि क्यों ना इसे भी अपना काम ही सिखाया जाये। जैसे मैंने चोरी कर करके अपना गुजारा किया वैसे ये भी कर लेगा।
🔶 यही सोचकर मुरारी एक दिन बेटे को अपने साथ लेकर गया। रात का समय था दोनों चुपके चुपके एक इमारत में पहुंचे। इमारत में कई कमरे थे सभी कमरों में रौशनी थी देखकर लग रहा था कि किसी अमीर इंसान की हवेली है।
🔷 मुरारी अपने बेटे से बोला – आज हम इस हवेली में चोरी करेंगे, मैंने यहाँ पहले भी कई बार चोरी की है और खूब माल भी मिलता है यहाँ। लेकिन बेटा लगातार हवेली के आगे लगी लाइट को ही देखे जा रहा था। मुरारी बोला – अब देर ना करो जल्दी अंदर चलो नहीं तो कोई देख लेगा। लेकिन बेटा अभी भी हवेली की रौशनी को निहार रहा था और वो करुण स्वर में बोला – पिताजी मैं चोरी नहीं कर सकता।
🔶 मुरारी – तेरा दिमाग खराब है जल्दी अंदर चल
🔷 बेटा – पिताजी, जिसके यहाँ से हमने कई बार चोरी की है देखिये आज भी उसकी हवेली में रौशनी है और हमारे घर में आज भी अंधकार है। मेहनत और ईमानदारी की कमाई से उनका घर आज भी रौशन है और हमारे घर में पहले भी अंधकार था और आज भी मैं भी ईमानदारी और मेहनत से कमाई करूँगा और उस कमाई के दीपक से मेरे घर में भी रौशनी होगी। मुझे ये जीवन में अंधकार भर देने वाला काम नहीं करना। मुरारी की आँखों से आंसू निकल रहे थे। उसके बेटे की पढाई आज सार्थक होती दिख रही थी।
🔶 मित्रों। बेईमानी और चोरी से इंसान क्षण भर तो सुखी रह सकता है लेकिन उसके जीवन में हमेशां के लिए पाप और अंधकार भर जाता है। हमेशा अपने काम को मेहनत और ईमानदारी से करें। बेईमानी की कमाई से बने पकवान भी ईमानदारी की सुखी रोटी के आगे फीके हैं। कुछ ऐसा काम करें कि आप समाज में सर उठा के चल सकें।
🔶 मुरारी का बेटा पढाई में बहुत होशियार था लेकिन पैसे के अभाव में 12 वीं कक्षा के बाद नहीं पढ़ पाया। अब कई जगह नौकरी के लिए भी अप्लाई किया लेकिन कोई उसे नौकरी पर नहीं रखता था।
🔷 एक तो चोर का बेटा ऊपर से केवल 12 वीं पास तो कोई नौकरी पर नहीं रखता था। अब बेचारा बेरोजगार की तरह ही दिन रात घर पर ही पड़ा रहता। मुरारी को बेटे की चिंता हुई तो सोचा कि क्यों ना इसे भी अपना काम ही सिखाया जाये। जैसे मैंने चोरी कर करके अपना गुजारा किया वैसे ये भी कर लेगा।
🔶 यही सोचकर मुरारी एक दिन बेटे को अपने साथ लेकर गया। रात का समय था दोनों चुपके चुपके एक इमारत में पहुंचे। इमारत में कई कमरे थे सभी कमरों में रौशनी थी देखकर लग रहा था कि किसी अमीर इंसान की हवेली है।
🔷 मुरारी अपने बेटे से बोला – आज हम इस हवेली में चोरी करेंगे, मैंने यहाँ पहले भी कई बार चोरी की है और खूब माल भी मिलता है यहाँ। लेकिन बेटा लगातार हवेली के आगे लगी लाइट को ही देखे जा रहा था। मुरारी बोला – अब देर ना करो जल्दी अंदर चलो नहीं तो कोई देख लेगा। लेकिन बेटा अभी भी हवेली की रौशनी को निहार रहा था और वो करुण स्वर में बोला – पिताजी मैं चोरी नहीं कर सकता।
🔶 मुरारी – तेरा दिमाग खराब है जल्दी अंदर चल
🔷 बेटा – पिताजी, जिसके यहाँ से हमने कई बार चोरी की है देखिये आज भी उसकी हवेली में रौशनी है और हमारे घर में आज भी अंधकार है। मेहनत और ईमानदारी की कमाई से उनका घर आज भी रौशन है और हमारे घर में पहले भी अंधकार था और आज भी मैं भी ईमानदारी और मेहनत से कमाई करूँगा और उस कमाई के दीपक से मेरे घर में भी रौशनी होगी। मुझे ये जीवन में अंधकार भर देने वाला काम नहीं करना। मुरारी की आँखों से आंसू निकल रहे थे। उसके बेटे की पढाई आज सार्थक होती दिख रही थी।
🔶 मित्रों। बेईमानी और चोरी से इंसान क्षण भर तो सुखी रह सकता है लेकिन उसके जीवन में हमेशां के लिए पाप और अंधकार भर जाता है। हमेशा अपने काम को मेहनत और ईमानदारी से करें। बेईमानी की कमाई से बने पकवान भी ईमानदारी की सुखी रोटी के आगे फीके हैं। कुछ ऐसा काम करें कि आप समाज में सर उठा के चल सकें।
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 23)
👉 युगसृजन के निमित्त प्रतिभाओं को चुनौती
🔷 तूफानों, भूकंपों, विस्फोटों, आंदोलनों का उद्गम कहीं भी क्यों न रहा हो, जब वे गति पकड़े हैं, तो व्यापक बनते चले जाते हैं। राजक्रांतियों का सिलसिला इसी प्रकार चला था और असंख्यों राजमुकुट अनायास ही धराशायी होते चले गए। सृजन की भी अपनी लहर है। कभी सतयुग में ऐसा ही प्रभावोत्पादक मानसून उठा होगा, उसने धरती पर मखमली फर्श बिछाते हुए स्वर्ग जैसा वातावरण विनिर्मित कर दिया होगा।
🔶 रात्रि की तमिस्रा सदा नहीं रहती। दिन को भी प्रकट होने का अवसर मिलता है। तब छोटे पक्षी ही नहीं, गजराज भी अपनी चिंघाड़ और वनराज अपनी दहाड़ से दिशाओं को गुंजित करते दिखाई देते हैं। ऐसा ही सुयोग इन दिनों आ रहा है, यह आशा सबको रखनी चाहिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 28
🔷 तूफानों, भूकंपों, विस्फोटों, आंदोलनों का उद्गम कहीं भी क्यों न रहा हो, जब वे गति पकड़े हैं, तो व्यापक बनते चले जाते हैं। राजक्रांतियों का सिलसिला इसी प्रकार चला था और असंख्यों राजमुकुट अनायास ही धराशायी होते चले गए। सृजन की भी अपनी लहर है। कभी सतयुग में ऐसा ही प्रभावोत्पादक मानसून उठा होगा, उसने धरती पर मखमली फर्श बिछाते हुए स्वर्ग जैसा वातावरण विनिर्मित कर दिया होगा।
🔶 रात्रि की तमिस्रा सदा नहीं रहती। दिन को भी प्रकट होने का अवसर मिलता है। तब छोटे पक्षी ही नहीं, गजराज भी अपनी चिंघाड़ और वनराज अपनी दहाड़ से दिशाओं को गुंजित करते दिखाई देते हैं। ऐसा ही सुयोग इन दिनों आ रहा है, यह आशा सबको रखनी चाहिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 28
👉 Five gifts which need to be invested to fulfil divine objectives
🔷 Talking on Vibhuti Yoga in the sacred text of Bhagwad Geeta, The Lord says that one should see His greater presence wherever they see or perceive divine excellencies. Only a few and not everyone among the masses are blessed with divine gifts and excellencies (e.g. intellect, talents, artistic skills, riches). This disparity only implies that the divine gifts or excellencies are purely special grants which have been given to enable those blessed individuals to carry on developing and embellishing His beloved creation, the world. Even if the gifted individuals were to believe that they have been blessed with those divine gifts just because of their own past good deeds, the objective would still remain the same that they should keep doing good to the world with even greater passion and reap even greater rewards, thus maintaining the momentum of their progress and expediting their journey towards fulfilling the aim of life.
🔶 One of the most important task of Yug Nirman Yojna is to impart this message to every gifted individuals. A fire brigade would be expected to take rapid actions in case of fire. They may get criticised if they show any sloppiness. The message of the urgent need of current time is being conveyed to everyone abounding in divine gifts to let them know that this is the exactly right moment to make as much use as possible of their divine gifts for doing good to community.
🔷 It goes without saying that there is no other greater noble objective than to inspire and facilitate inner development (i.e. the development of noble feelings) of the masses. There are five divine gifts namely noble feelings, knowledge, talents, wealth and art. Anyone anywhere having these divine gifts should feel within their heart that they have been truly blessed with God’s exceptional art, abilities, talents and extra grace. They should feel themselves to be really fortunate and blessed with God’s special grace to have received special gifts which the common men and women couldn’t get.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana- Darshan, swaroop, va Karyakrma- Vangmay 66 Page 1.30
🔶 One of the most important task of Yug Nirman Yojna is to impart this message to every gifted individuals. A fire brigade would be expected to take rapid actions in case of fire. They may get criticised if they show any sloppiness. The message of the urgent need of current time is being conveyed to everyone abounding in divine gifts to let them know that this is the exactly right moment to make as much use as possible of their divine gifts for doing good to community.
🔷 It goes without saying that there is no other greater noble objective than to inspire and facilitate inner development (i.e. the development of noble feelings) of the masses. There are five divine gifts namely noble feelings, knowledge, talents, wealth and art. Anyone anywhere having these divine gifts should feel within their heart that they have been truly blessed with God’s exceptional art, abilities, talents and extra grace. They should feel themselves to be really fortunate and blessed with God’s special grace to have received special gifts which the common men and women couldn’t get.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana- Darshan, swaroop, va Karyakrma- Vangmay 66 Page 1.30
👉 Learn to Share
🔷 You are really fortunate if God has endowed you with vigor, brilliance, knowledge, power, prosperity and glory. Then your life must be progressive and joyful in the worldly sense. But this success or joy would be momentary and won’t be fulfilling, if you keep your resources and belongings closed to your chest and use them only for your selfish interests. Your joy, your satisfaction would expand exponentially if you learn to distribute them and share whatever you have with many others.
🔶 Try to spend at least a fraction of your wealth, your resources for the needy. Your help will not only give them support to rise and progress, more importantly, it will bestow the spiritual benefits of being kind and altruistic. This will augment your happiness manifold. Those being helped by you will also be happy and thus the stock of joy in the world will also expand.
🔷 Distributing and sharing with a sight of altruistic wisdom and a feel of compassion provide the golden key to unalloyed joy. God has been so kind to you; you should also be kind to others. God is defined as the eternal source of infinite bliss because HIS mercy pervades everywhere for all creatures, for everything; HIS divine powers are omnipresent; every impulse of joy is an expression of HIS beatitude.
🔶 You should see the dignity of HIS divine creation in this world. God has also given you an opportunity to glorify your life by selflessly spreading HIS auspicious grace…
📖 Akhand Jyoti, April 1943
🔶 Try to spend at least a fraction of your wealth, your resources for the needy. Your help will not only give them support to rise and progress, more importantly, it will bestow the spiritual benefits of being kind and altruistic. This will augment your happiness manifold. Those being helped by you will also be happy and thus the stock of joy in the world will also expand.
🔷 Distributing and sharing with a sight of altruistic wisdom and a feel of compassion provide the golden key to unalloyed joy. God has been so kind to you; you should also be kind to others. God is defined as the eternal source of infinite bliss because HIS mercy pervades everywhere for all creatures, for everything; HIS divine powers are omnipresent; every impulse of joy is an expression of HIS beatitude.
🔶 You should see the dignity of HIS divine creation in this world. God has also given you an opportunity to glorify your life by selflessly spreading HIS auspicious grace…
📖 Akhand Jyoti, April 1943
सोमवार, 6 अगस्त 2018
👉 माता-पिता का साया
🔶 एक पिता ने अपने पुत्र की बहुत अच्छी तरह से परवरिश की! उसे अच्छी तरह से पढ़ाया, लिखाया, तथा उसकी सभी सुकामनांओ की पूर्ती की! कालान्तर में वह पुत्र एक सफल इंसान बना और एक मल्टी नैशनल कंपनी में सी.ई.ओ. बन गया! उच्च पद, अच्छा वेतन, सभी सुख सुविधांए उसे कंपनी की और से प्रदान की गई!
🔷 समय गुजरता गया उसका विवाह एक सुलक्षणा कन्या से हो गया, और उसके बच्चे भी हो गए । उसका अपना परिवार बन गया! पिता अब बूढा हो चला था! एक दिन पिता को पुत्र से मिलने की इच्छा हुई और वो पुत्र से मिलने उसके ऑफिस में गया.....!!!
🔶 वहां उसने देखा कि..... उसका पुत्र एक शानदार ऑफिस का अधिकारी बना हुआ है, उसके ऑफिस में सैंकड़ो कर्मचारी उसके अधीन कार्य कर रहे है... ! ये सब देख कर पिता का सीना गर्व से फूल गया! वह बूढ़ा पिता बेटे के चेंबर में जाकर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ा हो गया!
🔷 और प्यार से अपने पुत्र से पूछा... "इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है"? पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा "मेरे अलावा कौन हो सकता है पिताजी"!
🔶 पिता को इस जवाब की आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा पिताजी इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान आप हैैं, जिन्होंने मुझे इतना योग्य बनाया!
🔷 उनकी आँखे छलछला आई! वो चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे! उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा एक बार फिर बताओ इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान कौन है ???
🔶 पुत्र ने इस बार कहा "पिताजी आप हैैं, इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान "! पिता सुनकर आश्चर्यचकित हो गए उन्होंने कहा "अभी तो तुम अपने आप को इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान बता रहे थे अब तुम मुझे बता रहे हो " ???
🔷 पुत्र ने हंसते हुए उन्हें अपने सामने बिठाते हुए कहा "पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ हो वो पुत्र तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा ना,,,,,
🔶 बोलिए पिताजी" ! पिता की आँखे भर आई उन्होंने अपने पुत्र को कस कर के अपने गले लग लिया !
🔷 सच है जिस के कंधे पर या सिर पर माता-पिता का हाथ होता है, वो इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान होता है!
🔶 सदैव बुजुर्गों का सम्मान करें!!!! हमारी सफलता के पीछे वे ही हैं..
🔷 हमारी तरक्की उन्नति से जब सभी लोग जलते हैं तो केवल माँ बाप ही हैं जो खुश होते हैं।
🔷 समय गुजरता गया उसका विवाह एक सुलक्षणा कन्या से हो गया, और उसके बच्चे भी हो गए । उसका अपना परिवार बन गया! पिता अब बूढा हो चला था! एक दिन पिता को पुत्र से मिलने की इच्छा हुई और वो पुत्र से मिलने उसके ऑफिस में गया.....!!!
🔶 वहां उसने देखा कि..... उसका पुत्र एक शानदार ऑफिस का अधिकारी बना हुआ है, उसके ऑफिस में सैंकड़ो कर्मचारी उसके अधीन कार्य कर रहे है... ! ये सब देख कर पिता का सीना गर्व से फूल गया! वह बूढ़ा पिता बेटे के चेंबर में जाकर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ा हो गया!
🔷 और प्यार से अपने पुत्र से पूछा... "इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है"? पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा "मेरे अलावा कौन हो सकता है पिताजी"!
🔶 पिता को इस जवाब की आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा पिताजी इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान आप हैैं, जिन्होंने मुझे इतना योग्य बनाया!
🔷 उनकी आँखे छलछला आई! वो चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे! उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा एक बार फिर बताओ इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान कौन है ???
🔶 पुत्र ने इस बार कहा "पिताजी आप हैैं, इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान "! पिता सुनकर आश्चर्यचकित हो गए उन्होंने कहा "अभी तो तुम अपने आप को इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान बता रहे थे अब तुम मुझे बता रहे हो " ???
🔷 पुत्र ने हंसते हुए उन्हें अपने सामने बिठाते हुए कहा "पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ हो वो पुत्र तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा ना,,,,,
🔶 बोलिए पिताजी" ! पिता की आँखे भर आई उन्होंने अपने पुत्र को कस कर के अपने गले लग लिया !
🔷 सच है जिस के कंधे पर या सिर पर माता-पिता का हाथ होता है, वो इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान होता है!
🔶 सदैव बुजुर्गों का सम्मान करें!!!! हमारी सफलता के पीछे वे ही हैं..
🔷 हमारी तरक्की उन्नति से जब सभी लोग जलते हैं तो केवल माँ बाप ही हैं जो खुश होते हैं।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 2 Sep 2026
शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...



















