🔷 एक धनिक ने एक संन्यासी को निमन्त्रण दिया। संन्यासी आये तो धनिक ज्ञान चर्चा करना तो भूल गया, उन्हें बैठा कर अपने वैभव की बात कहने लगा-मेरे इतने मकान हैं, बम्बई में मैंने एक विशाल भवन और धर्मशाला बनवाई हैं, शीघ्र ही तुम्हारे जैसे भूखों के लिए अन्न क्षेत्र खोलने वाला हूँ, अब भी आधे सेर खिचड़ी तो हर भिखारी को मेरे घर से मिल जाती है। मेरे लड़के विलायत घूमने जा रहे है।’ संन्यासी उसकी सभी बात चुपचाप सुनते रहे। जब वह चुप हो गया तो दीवार पर टँगे एक नक्शे को देखकर बोले- यह कहाँ का नक्शा हैं?’ धनिक ने कहा-दुनिया का?’ संन्यासी बोले- इसमें हिन्दुस्तान कहाँ हैं?’ धनिक ने उँगली रख कर बताया तो उन्होंने फिर पूछा- और बम्बई?’ धनिक ने उँगली रखकर बम्बई भी बता दी। संन्यासी बोले- इसमें तेरा भवन और धर्मशाला कहाँ हैं?” धनिक बोला-संसार के नक्शे में यह सब चीजें कहाँ से आतीं?’ संन्यासी ने कहा- जब संसार के नक्शे में तुम्हारे वैभव का नाम निशान भी नहीं तो उसका अभिमान ही क्या करना? धनिक ने सिर झुका लिया और अभिमान की बातें सदा को त्याग दीं।
गुरुवार, 2 अगस्त 2018
👉 कर्म से ही भाग्य बनता है
🔶 एक चित्रकार था। जो अद्भुत चित्र बनाता था। लोग उसकी चित्रकारी की बहुत तारीफ़ किया करते थे। एक दिन श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्तों ने उनसे भगवान श्रीकृष्ण और कंस का एक चित्र बनाने की इच्छा प्रगट की चित्रकार इसके लिए तैयार हो गया। आखिर भगवान का काम था। पर, उसने एक शर्त रखी।
🔷 उसने कहा - "मुझे योग्य पात्र चाहियें। अगर वे मिल जायें तो ही मैं चित्र बना पाऊँगा। श्रीकृष्ण के चित्र के लिए एक योग्य नटखट बालक और कंस के लिए एक क्रूर भाव वाला व्यक्ति लाकर दें। तब ही मैं चित्र बनाकर दूँगा।"
🔶 श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्त एक बालक को ले आए। बालक सुन्दर था। चित्रकार ने उसे पसन्द किया और उस बालक को सामने बिठाकर बाल श्रीकृष्ण का एक सुन्दर चित्र बनाया।
🔷 अब बारी कंस की थी। पर, क्रूर भाव वाले व्यक्ति को ढूंढना थोड़ा मुस्किल था। जो व्यक्ति श्रीकृष्ण मन्दिर वालों को पसन्द आता, वो चित्रकार को पसन्द नहीं आता। उसे वो भाव नहीं मिल रहे थे, जो उसे चाहियें थे।
🔶 वक्त गुजरता गया। आखिरकार थक हारकर सालों बाद वो अब किसी जेल में चित्रकार को ले गए। जहाँ उम्रकेद काट रहे अपराधी थे। उन अपराधियों में से एक को चित्रकार ने पसन्द किया और उसे सामने बिठाकर उसने कंस का एक चित्र बनाया। श्रीकृष्ण और कंस की वो तस्वीरें आज सालों बाद पूर्ण हुईं।
🔷 श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्त उन तस्वीरों को देखकर मन्त्रमुग्ध हो गए। उस अपराधी ने भी वे तस्वीरें देखने की इच्छा व्यक्त की। उस अपराधी ने जब वो तस्वीरें देखीं तो वह फूट-फूटकर रोने लगा। यह सब देखकर सभी अचम्भित हो गए। चित्रकार ने बड़े प्रेम से उससे उसके रोने का कारण पूछा।
🔶 तब वह अपराधी बोला - "शायद आपने मुझे पहचाना नहीं ? मैं वो ही बच्चा हूँ, जिसे सालों पहले आपने बाल श्रीकृष्ण के चित्र के लिए पसन्द किया था। मेरे कुकर्मों की वजह से आज मैं कंस बन गया। इन तस्वीरों में मैं ही कृष्ण हूँ और मैं ही कंस हूँ। हमारे कर्म ही हमें अच्छा और बुरा इन्सान बनाते हैं।
🔷 उसने कहा - "मुझे योग्य पात्र चाहियें। अगर वे मिल जायें तो ही मैं चित्र बना पाऊँगा। श्रीकृष्ण के चित्र के लिए एक योग्य नटखट बालक और कंस के लिए एक क्रूर भाव वाला व्यक्ति लाकर दें। तब ही मैं चित्र बनाकर दूँगा।"
🔶 श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्त एक बालक को ले आए। बालक सुन्दर था। चित्रकार ने उसे पसन्द किया और उस बालक को सामने बिठाकर बाल श्रीकृष्ण का एक सुन्दर चित्र बनाया।
🔷 अब बारी कंस की थी। पर, क्रूर भाव वाले व्यक्ति को ढूंढना थोड़ा मुस्किल था। जो व्यक्ति श्रीकृष्ण मन्दिर वालों को पसन्द आता, वो चित्रकार को पसन्द नहीं आता। उसे वो भाव नहीं मिल रहे थे, जो उसे चाहियें थे।
🔶 वक्त गुजरता गया। आखिरकार थक हारकर सालों बाद वो अब किसी जेल में चित्रकार को ले गए। जहाँ उम्रकेद काट रहे अपराधी थे। उन अपराधियों में से एक को चित्रकार ने पसन्द किया और उसे सामने बिठाकर उसने कंस का एक चित्र बनाया। श्रीकृष्ण और कंस की वो तस्वीरें आज सालों बाद पूर्ण हुईं।
🔷 श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्त उन तस्वीरों को देखकर मन्त्रमुग्ध हो गए। उस अपराधी ने भी वे तस्वीरें देखने की इच्छा व्यक्त की। उस अपराधी ने जब वो तस्वीरें देखीं तो वह फूट-फूटकर रोने लगा। यह सब देखकर सभी अचम्भित हो गए। चित्रकार ने बड़े प्रेम से उससे उसके रोने का कारण पूछा।
🔶 तब वह अपराधी बोला - "शायद आपने मुझे पहचाना नहीं ? मैं वो ही बच्चा हूँ, जिसे सालों पहले आपने बाल श्रीकृष्ण के चित्र के लिए पसन्द किया था। मेरे कुकर्मों की वजह से आज मैं कंस बन गया। इन तस्वीरों में मैं ही कृष्ण हूँ और मैं ही कंस हूँ। हमारे कर्म ही हमें अच्छा और बुरा इन्सान बनाते हैं।
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 18)
👉 युगसृजन के निमित्त प्रतिभाओं को चुनौती
🔶 प्रस्तुत समय, जिससे हम गुजर रहे हैं-संधिकाल है। यह युगसंधि का समय, अवसर न चूकने जैसा है। आपत्तिकाल में लोग निजी व्यवसाय छोड़कर दुर्घटना से निपटने के लिए दौड़ पड़ते हैं। अग्निकांड, भूकंप, दुर्भिक्ष महामारी, दुर्घटना जैसे अवसरों पर उदार सेवाभावना की परीक्षा होती है। भावनाशील इस अवसर पर चूकते नहीं। उपेक्षा करने वाले तिरष्कृत जैसे होते और सेवा साधना में जुट पड़ने वाले सदा-सर्वदा के लिए लोगों के मन पर अपनी प्रामाणिक महानता की गहरी छाप छोड़ते हैं, जो कालांतर में उन्हें अनेक माध्यमों से महत्त्वपूर्ण वरिष्ठता प्रदान कराती है।
🔷 इतिहास साक्षी है कि आपत्तिकाल में राजपूत घरानों से एक-एक सदस्य सेना में भरती होता था। सिख धर्म जिन दिनों चला था, तब भी उस विपन्न बेला में, उस प्रभाव क्षेत्र में आए हर परिवार ने अपने परिवार में से एक को ‘सिख’ सेना का सदस्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया था। आज की वेला, तब की अपेक्षा कम विपन्न नहीं है। नवसृजन में संलग्न होने के लिए हर घर से एक प्रतिभा को आगे आना चाहिए और भारतभूमि की सतयुगी गरिमा को जीवन्त रखने का श्रेय लेना चाहिए। इक्कीसवीं सदी में सतयुग की वापसी वाली संभावनाएँ सुस्पष्ट हैं। कुछेक चिह्न पहले से ही प्रकट हो रहे हैं। ऐसे व्यक्तित्व उभर रहे हैं, जो लोक निर्वाह में कटौती करके अपनी भाव-संवेदनाएँ आकांक्षाएँ एवं गतिविधियों को सृजन प्रयोजनों में समर्पित कर सकें, जिससे उनका समर्पण, अंधकार में जलती मशाल की भूमिका निभाते हुए सबकी आँखों में चमक पैदा कर सके।
🔶 स्वर्ग-मुक्ति दिव्य-दर्शन आदि के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है और निराश भी रहना पड़ सकता है? पर सत्प्रयोजनों के लिए प्रस्तुत किया गया आदर्शवादी साहस व्यक्तित्व को ऐसा प्रामाणिक, प्रखर एवं प्रतिभावान बनाता है, जिसके उपार्जन को दैवी संपदा के रूप में आँका जा सकें, जिस पर आज की भौतिक संपदाओं, सुविधाओं को निछावर किया जा सके। धनाढ्य और विद्वान कुछ लोगों पर ही अपनी धाक जमा पाते हैं, पर महामानव स्तर की प्रतिभाएँ इतिहास को, समस्त मानव जाति को कृतकृत्य करती हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 23
🔶 प्रस्तुत समय, जिससे हम गुजर रहे हैं-संधिकाल है। यह युगसंधि का समय, अवसर न चूकने जैसा है। आपत्तिकाल में लोग निजी व्यवसाय छोड़कर दुर्घटना से निपटने के लिए दौड़ पड़ते हैं। अग्निकांड, भूकंप, दुर्भिक्ष महामारी, दुर्घटना जैसे अवसरों पर उदार सेवाभावना की परीक्षा होती है। भावनाशील इस अवसर पर चूकते नहीं। उपेक्षा करने वाले तिरष्कृत जैसे होते और सेवा साधना में जुट पड़ने वाले सदा-सर्वदा के लिए लोगों के मन पर अपनी प्रामाणिक महानता की गहरी छाप छोड़ते हैं, जो कालांतर में उन्हें अनेक माध्यमों से महत्त्वपूर्ण वरिष्ठता प्रदान कराती है।
🔷 इतिहास साक्षी है कि आपत्तिकाल में राजपूत घरानों से एक-एक सदस्य सेना में भरती होता था। सिख धर्म जिन दिनों चला था, तब भी उस विपन्न बेला में, उस प्रभाव क्षेत्र में आए हर परिवार ने अपने परिवार में से एक को ‘सिख’ सेना का सदस्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया था। आज की वेला, तब की अपेक्षा कम विपन्न नहीं है। नवसृजन में संलग्न होने के लिए हर घर से एक प्रतिभा को आगे आना चाहिए और भारतभूमि की सतयुगी गरिमा को जीवन्त रखने का श्रेय लेना चाहिए। इक्कीसवीं सदी में सतयुग की वापसी वाली संभावनाएँ सुस्पष्ट हैं। कुछेक चिह्न पहले से ही प्रकट हो रहे हैं। ऐसे व्यक्तित्व उभर रहे हैं, जो लोक निर्वाह में कटौती करके अपनी भाव-संवेदनाएँ आकांक्षाएँ एवं गतिविधियों को सृजन प्रयोजनों में समर्पित कर सकें, जिससे उनका समर्पण, अंधकार में जलती मशाल की भूमिका निभाते हुए सबकी आँखों में चमक पैदा कर सके।
🔶 स्वर्ग-मुक्ति दिव्य-दर्शन आदि के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है और निराश भी रहना पड़ सकता है? पर सत्प्रयोजनों के लिए प्रस्तुत किया गया आदर्शवादी साहस व्यक्तित्व को ऐसा प्रामाणिक, प्रखर एवं प्रतिभावान बनाता है, जिसके उपार्जन को दैवी संपदा के रूप में आँका जा सकें, जिस पर आज की भौतिक संपदाओं, सुविधाओं को निछावर किया जा सके। धनाढ्य और विद्वान कुछ लोगों पर ही अपनी धाक जमा पाते हैं, पर महामानव स्तर की प्रतिभाएँ इतिहास को, समस्त मानव जाति को कृतकृत्य करती हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 23
👉 A Perfect Deal
🔶 Man is a mortal being and all his belongings are also perishable. Only one of his ‘possessions’ that lasts for Ages after he is gone is his glory. One who earns this preeminence is indeed most successful in the ‘business’ of life even if he has sacrificed or lost on the materialistic front. His trade is like, for example, that of getting a new stout building in return of selling off an unused heap of hay. Great ones are those who refine and excel their lives up to glorious heights, worth the dignity of human life. Dormant lives of others mushroom and end like that of any other creature who survives just to till the tummy and quench the sensual thirst.
🔷 Those stuck in the peripheries of selfish possession and attachments are shortsighted, and remain careless of the future. Their lives, their activities, despite the physical dynamism and alacrity are no better than ‘movable corpse.’ A dormant life is no life… Fools gather more and more of wealth and resources so that their beloved ones would enjoy it all generations after generations… They spent all their time, talents and efforts in insane and at times unfair possession and its safety. Wouldn’t it be wiser of them if they had employed their resources prudently in the activities of progress and welfare? This would have brightened their own future as well along with supporting more and more people around and contributing in constructive reformation and development. Draining or throwing away the useful things and collecting the rubbish or hazardous ones – is a clear sign of insanity. Aren’t they mindless who invite enmity all the time, by using absurd, abusive, acrimonious tongue? Anybody, howsoever learned, skillful and smart he might be, is unwise if, instead of augmenting the virtuous qualities, he opts for vices and weaknesses.
📖 Akhand Jyoti, Oct. 1942
🔷 Those stuck in the peripheries of selfish possession and attachments are shortsighted, and remain careless of the future. Their lives, their activities, despite the physical dynamism and alacrity are no better than ‘movable corpse.’ A dormant life is no life… Fools gather more and more of wealth and resources so that their beloved ones would enjoy it all generations after generations… They spent all their time, talents and efforts in insane and at times unfair possession and its safety. Wouldn’t it be wiser of them if they had employed their resources prudently in the activities of progress and welfare? This would have brightened their own future as well along with supporting more and more people around and contributing in constructive reformation and development. Draining or throwing away the useful things and collecting the rubbish or hazardous ones – is a clear sign of insanity. Aren’t they mindless who invite enmity all the time, by using absurd, abusive, acrimonious tongue? Anybody, howsoever learned, skillful and smart he might be, is unwise if, instead of augmenting the virtuous qualities, he opts for vices and weaknesses.
📖 Akhand Jyoti, Oct. 1942
👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (भाग 3)
🔶 दूसरों का आदर करना, सद्व्यवहार का अभ्यस्त होना, सज्जनोचित शिष्टाचार बरतना, मधुर वचन बोलना यह व्यक्तित्व की गरिमा बढ़ाने वाली साधना है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसे दूसरों के साथ मिल-जुल कर रहना पड़ता है। स्नेह सौहार्द का वातावरण तभी बना रह सकता है जब दूसरों के साथ शालीनता का व्यवहार किया जाय। अहंकारी व्यक्ति दूसरों को तुच्छ समझते है और कटु वचन एवं दुर्व्यवहार पर उतारू रहते हैं। उद्धत आतंकवादी उच्छृंखल आचरण करके कोई अपने अहंकार की पूर्ति होने की बात सोच सकता है, पर वस्तुतः वह हर किसी की दृष्टि में अपना सम्मान खोता है। स्तर गिराता है और घृणास्पद बनता है। उद्धत आचरण से सम्भव है सामने वाला चुप ही रहे, परन्तु उसका स्नेह सहयोग तो चला ही जाता है। इस प्रकार क्रोधी, अशिष्ट, उच्छृंखल व्यक्ति अपना नाम बढ़ाने की बात सोचता है, पर वस्तुतः उसे निरन्तर खोता चला जाता है। कुसमय में अपने को एकाकी अनुभव करता है। स्नेह सहयोग से वंचित होकर वह भूत बेताल की अशान्त अतृप्त मनःस्थिति में जा फँसता है।
🔷 ईर्ष्या, द्वेष, झूठ, छल, प्रपंच, दुरभिसन्धि, षड्यन्त्र, शोषण, अपहरण, आक्रमणों की आसुरी मनोवृत्ति अपना कर मनुष्य अपराधी आचरण ही करता हैं उसकी गतिविधियाँ ऐसी हो जाती हैं, जिससे मनुष्य सबकी आँखों में गिरता है यहाँ तक कि अपनी आँखों में भी। धन या पद पाने की अपेक्षा लोकश्रद्धा प्राप्त करना अधिक मूल्यवान है। दुष्ट-दुराचारी बनकर कोई यदि साधन सम्पन्न बन जाय तो यही कहा जाना चाहिए कि उसने खोया बहुत पाया कम। व्यसनी, व्यभिचारी, आलसी और प्रमादी, आतंकवादी, अत्याचारी, उस सुखद उपलब्धि से वंचित ही रहते है जिसे पाने के लिए यह कुमार्ग अपनाया। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का आश्रय लेकर मनुष्य दूसरों की जितनी हानि करता है उसकी तुलना में अपनी असंख्य गुनी हानि कर लेता है।
🔶 समय को नियमितता के बन्धनों में बाँधा जाना चाहिए। चौबीसों घण्टे की निर्धारित दिनचर्या बनानी चाहिए और उस पर तत्परतापूर्वक चलते जाना चाहिए। समय ही सबसे बड़ी सम्पदा है, उसका एक क्षण भी बर्बाद नहीं होना चाहिये। शरीर की क्षमता के अनुरूप श्रम किया जाय, काम का स्तर और सिलसिला बदलते ही रहा जाय ताकि थकान नहीं चढ़ेगी। हर काम में दिलचस्पी पैदा की जाय, उसे खेल समझते हुए पूरे मनोयोग के साथ करना चाहिए। यह आदत पड़ जाय तो दुर्बल शरीर वाला व्यक्ति भी बिना थके बहुत काम करता रह सकता है। आहार-विहार विवेकपूर्ण और क्रमबद्ध होने चाहिए। समयानुसार काम बदलने से विश्राम और विनोद का उद्देश्य पूरा हो सकता है। सामने प्रस्तुत कामों को दिलचस्पी और मनोयोग के साथ करने का अभ्यास करना मनोनिग्रह का सर्वोत्तम योगाभ्यास है। उस साधना में निष्णात व्यक्ति हाथों हाथ क्रिया कुशलता के अभिवर्धन और सफलताओं के वरण का उत्साहवर्द्धक लाभ प्राप्त करता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
🔷 ईर्ष्या, द्वेष, झूठ, छल, प्रपंच, दुरभिसन्धि, षड्यन्त्र, शोषण, अपहरण, आक्रमणों की आसुरी मनोवृत्ति अपना कर मनुष्य अपराधी आचरण ही करता हैं उसकी गतिविधियाँ ऐसी हो जाती हैं, जिससे मनुष्य सबकी आँखों में गिरता है यहाँ तक कि अपनी आँखों में भी। धन या पद पाने की अपेक्षा लोकश्रद्धा प्राप्त करना अधिक मूल्यवान है। दुष्ट-दुराचारी बनकर कोई यदि साधन सम्पन्न बन जाय तो यही कहा जाना चाहिए कि उसने खोया बहुत पाया कम। व्यसनी, व्यभिचारी, आलसी और प्रमादी, आतंकवादी, अत्याचारी, उस सुखद उपलब्धि से वंचित ही रहते है जिसे पाने के लिए यह कुमार्ग अपनाया। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का आश्रय लेकर मनुष्य दूसरों की जितनी हानि करता है उसकी तुलना में अपनी असंख्य गुनी हानि कर लेता है।
🔶 समय को नियमितता के बन्धनों में बाँधा जाना चाहिए। चौबीसों घण्टे की निर्धारित दिनचर्या बनानी चाहिए और उस पर तत्परतापूर्वक चलते जाना चाहिए। समय ही सबसे बड़ी सम्पदा है, उसका एक क्षण भी बर्बाद नहीं होना चाहिये। शरीर की क्षमता के अनुरूप श्रम किया जाय, काम का स्तर और सिलसिला बदलते ही रहा जाय ताकि थकान नहीं चढ़ेगी। हर काम में दिलचस्पी पैदा की जाय, उसे खेल समझते हुए पूरे मनोयोग के साथ करना चाहिए। यह आदत पड़ जाय तो दुर्बल शरीर वाला व्यक्ति भी बिना थके बहुत काम करता रह सकता है। आहार-विहार विवेकपूर्ण और क्रमबद्ध होने चाहिए। समयानुसार काम बदलने से विश्राम और विनोद का उद्देश्य पूरा हो सकता है। सामने प्रस्तुत कामों को दिलचस्पी और मनोयोग के साथ करने का अभ्यास करना मनोनिग्रह का सर्वोत्तम योगाभ्यास है। उस साधना में निष्णात व्यक्ति हाथों हाथ क्रिया कुशलता के अभिवर्धन और सफलताओं के वरण का उत्साहवर्द्धक लाभ प्राप्त करता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
👉 वास्तविक सफलता
🔶 जीवन की वास्तविक सफलता और समृद्घि आत्मभाव में जागृत रहने में है। जब मनुष्य, अपने को आत्मा अनुभव करने लगता है तो उसकी इच्छा, आकांक्षा और अभिरूचि उन्हीं कामों की ओर मुड़ जाती है, जिनसे आध्यात्मिक सुख मिलता है। मनुष्य परोपकार, परमार्थ, सेवा, सहायता, दान, उदारता, त्याग, तप से भरे हुए पुण्य कर्म करता है। तो हृदय के भीतरी कोने में बड़ा ही सन्तोष, हलकापन, आनन्द एवं उल्लास उठता है। इसका अर्थ है कि यह पुण्य कर्म आत्मा के स्वार्थ के अनुकूल है। वह ऐसे ही कार्यों को पसन्द करता है । आत्मा की आवाज सुनने वाले और उसी की आवाज पर चलने वाले सदा पुण्य कर्मों होते हैं।
🔷 आत्मा को तात्कालीन सुख सत्कर्मों में आता है। शरीर की मृत्यु होने के उपरान्त जीव की सद्ïगति मिलने में भी हेतु सत्कर्म ही हैं। लोक और परलोक में आत्मिक सुख शान्ति सत्कर्मो के ऊपर ही निर्भर है। इसलिए आत्मा का स्वार्थ पुण्य प्रयोजन में है। शरीर का स्वार्थ इसके विपरीत है। इन्द्रियाँ और मन संसार के भोगों को अधिकाधिक मात्रा में चाहते हैं। इस कार्य प्रणाली को अपनाने से मनुष्य नाशवान शरीर की इच्छाएँ पूर्ण करने में जीवन को खर्च करता है और पापों का भार इकठ्ठा करता रहता है। इससे शरीर और मन का अभिरंजन तो होता है, पर आत्मा को इस लोक और परलोक में कष्ट उठाना पड़ता है। आत्मा के स्वार्थ के सत्कर्मों में शरीर को भी कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं।
🔶 तप, त्याग, संयम, ब्रह्मïचर्य, सेवा, दान आदि के कार्यों में शरीर को कसा जाता है। तब ये सत्कर्म सधते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि शरीर के स्वार्थ और आत्मा के स्वार्थ आपस में मेल नहीं खाते, एक के सुख में दूसरे का दु:ख होता है। दोनों के स्वार्थ आपस में एक-दूसरे के विरोधी हैं। इन दो विरोधी तत्वों में से हमें एक को चुनना होता है। जो व्यक्ति अपने आपको शरीर समझते हैं, वे आत्मा के सुख की परवाह नहीं करते और शरीर सुख के लिए भौतिक सम्पदायें, भोग सामग्रियाँ एकत्रित करने में ही सारा जीवन व्यतीत करते हैं । ऐसे लोगों का जीवन पशुवत् पाप रूप, निकृष्ट प्रकार का हो जाता है। धर्म, ईश्वर, सदाचार, परलोक, पुण्य, परमार्थ की चर्चा वे भले ही करें, पर यथार्थ में उनका पुण्य परलोक स्वार्थ साधन की ही चारदीवारी के अन्दर होता है।
🔷 यश के लिए, अपने अहंकार को तृप्त करने के लिए, दूसरों पर अपना सिक्का जमाने के लिए वे धर्म का कभी-कभी आश्रय ले लेते हैं। वैसे उनकी मन:स्थिति सदैव शरीर से सम्बन्ध रखने वाले स्वार्थ साधनों में ही निमग्न रहती है। परन्तु जब मनुष्य आत्मा के स्वार्थ को स्वीकार कर लेता है, तो उसकी अवस्था विलक्षण एवं विपरीत हो जाती है। भोग और ऐश्वर्य के प्रयत्न उसे बालकों की खिलवाड़ जैसे प्रतीत होते हैं। शरीर जो वास्तव में आत्मा का एक वस्त्र या औजार मात्र है, इतना महत्वपूर्ण उसे दृष्टिगोचर नहीं होता है कि उसी के ऐश-आराम में जीवन जैसे बहुमूल्य तत्व को बर्बाद कर दिया जाय। आत्म भाव में जगा हुआ मनुष्य अपने आपको आत्मा मानता है और आत्मकल्याण के, आत्म सुख के कार्यों में ही अभिरुचि रखता और प्रयत्नशील रहता है। उसे धर्म संचय के कार्यों में अपने समय की एक-एक घड़ी लगाने की लगन लगी रहती है। इस प्रकार शरीर भावी व्यक्ति अपना जीवन पाप की ओर, पशुत्व की ओर चलता है और आत्मभावी व्यक्ति का प्रवाह पुण्य की ओर, देवत्व की ओर प्रवाहित होता है।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔷 आत्मा को तात्कालीन सुख सत्कर्मों में आता है। शरीर की मृत्यु होने के उपरान्त जीव की सद्ïगति मिलने में भी हेतु सत्कर्म ही हैं। लोक और परलोक में आत्मिक सुख शान्ति सत्कर्मो के ऊपर ही निर्भर है। इसलिए आत्मा का स्वार्थ पुण्य प्रयोजन में है। शरीर का स्वार्थ इसके विपरीत है। इन्द्रियाँ और मन संसार के भोगों को अधिकाधिक मात्रा में चाहते हैं। इस कार्य प्रणाली को अपनाने से मनुष्य नाशवान शरीर की इच्छाएँ पूर्ण करने में जीवन को खर्च करता है और पापों का भार इकठ्ठा करता रहता है। इससे शरीर और मन का अभिरंजन तो होता है, पर आत्मा को इस लोक और परलोक में कष्ट उठाना पड़ता है। आत्मा के स्वार्थ के सत्कर्मों में शरीर को भी कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं।
🔶 तप, त्याग, संयम, ब्रह्मïचर्य, सेवा, दान आदि के कार्यों में शरीर को कसा जाता है। तब ये सत्कर्म सधते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि शरीर के स्वार्थ और आत्मा के स्वार्थ आपस में मेल नहीं खाते, एक के सुख में दूसरे का दु:ख होता है। दोनों के स्वार्थ आपस में एक-दूसरे के विरोधी हैं। इन दो विरोधी तत्वों में से हमें एक को चुनना होता है। जो व्यक्ति अपने आपको शरीर समझते हैं, वे आत्मा के सुख की परवाह नहीं करते और शरीर सुख के लिए भौतिक सम्पदायें, भोग सामग्रियाँ एकत्रित करने में ही सारा जीवन व्यतीत करते हैं । ऐसे लोगों का जीवन पशुवत् पाप रूप, निकृष्ट प्रकार का हो जाता है। धर्म, ईश्वर, सदाचार, परलोक, पुण्य, परमार्थ की चर्चा वे भले ही करें, पर यथार्थ में उनका पुण्य परलोक स्वार्थ साधन की ही चारदीवारी के अन्दर होता है।
🔷 यश के लिए, अपने अहंकार को तृप्त करने के लिए, दूसरों पर अपना सिक्का जमाने के लिए वे धर्म का कभी-कभी आश्रय ले लेते हैं। वैसे उनकी मन:स्थिति सदैव शरीर से सम्बन्ध रखने वाले स्वार्थ साधनों में ही निमग्न रहती है। परन्तु जब मनुष्य आत्मा के स्वार्थ को स्वीकार कर लेता है, तो उसकी अवस्था विलक्षण एवं विपरीत हो जाती है। भोग और ऐश्वर्य के प्रयत्न उसे बालकों की खिलवाड़ जैसे प्रतीत होते हैं। शरीर जो वास्तव में आत्मा का एक वस्त्र या औजार मात्र है, इतना महत्वपूर्ण उसे दृष्टिगोचर नहीं होता है कि उसी के ऐश-आराम में जीवन जैसे बहुमूल्य तत्व को बर्बाद कर दिया जाय। आत्म भाव में जगा हुआ मनुष्य अपने आपको आत्मा मानता है और आत्मकल्याण के, आत्म सुख के कार्यों में ही अभिरुचि रखता और प्रयत्नशील रहता है। उसे धर्म संचय के कार्यों में अपने समय की एक-एक घड़ी लगाने की लगन लगी रहती है। इस प्रकार शरीर भावी व्यक्ति अपना जीवन पाप की ओर, पशुत्व की ओर चलता है और आत्मभावी व्यक्ति का प्रवाह पुण्य की ओर, देवत्व की ओर प्रवाहित होता है।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
बुधवार, 1 अगस्त 2018
👉 पर-निंदा का परिणाम
🔷 दो संस्कृतज्ञ विद्वान् एक गृहस्थ के यहाँ अतिथि बने। गृहस्थ ने उनका बड़ा सत्कार किया। जब एक विद्वान् स्नान घर में गए, तब गृहस्थ ने दूसरे विद्वान् से स्नान करने को गये हुए विद्वान् के संबंध में पूछा। उसने उत्तर दिया कि ‘वह मूर्ख बैल हैं।’ जब वह स्नान करके आया तो दूसरा स्नान करने गया। गृहस्थ ने स्नान करके आए हुए विद्वान् से दूसरे विद्वान् के संबंध में पूछा तो वह बोला-यह क्या जानता है-पूरा गधा है।’ जब भोजन का समय हुआ तो गृहस्थ ने एक गट्ठर घास और एक डलिया भूसा उनके सामने ला रखा और बोला-लीजिये महाराज! बैल के लिए भूसा और गधे के लिए घास उपस्थित है। यह देख सुनकर दोनों ही बड़े लज्जित हुए। विद्वान् होकर भी दूसरों के प्रति ईर्ष्या द्वेष के भाव रखना बड़ी घृणित प्रवृत्ति है। ऐसा विद्वान् भी निःसन्देह पशु श्रेणी में रखे जाने योग्य है।
🔶 “जो लोग अन्य लोगों से अपने विचारों की पुष्टि और समर्थन करा चुके हैं, वे प्रायः ऐसे ही लोग हुए हैं जिन्होंने स्वयं स्वतन्त्र विचार करने का साहस किया था।”
🔷 “केवल मूर्ख और मृतक, ये दो ही अपने विचारों को कभी नहीं बदलते।”
🔶 “जो लोग अन्य लोगों से अपने विचारों की पुष्टि और समर्थन करा चुके हैं, वे प्रायः ऐसे ही लोग हुए हैं जिन्होंने स्वयं स्वतन्त्र विचार करने का साहस किया था।”
🔷 “केवल मूर्ख और मृतक, ये दो ही अपने विचारों को कभी नहीं बदलते।”
👉 आखिरी अरदास
🔷 गुरु गोविन्द सिंह जंगल में एक ऊँचे टीले पर बैठे थे। तभी जत्थेदार महासिंह ने आकर कहा - गुरुजी! पर गुरुजी तो जैसे आत्मलीन थे। उनकी दृष्टि किसी गहन विचारबिन्दु पर स्थिर हो रही थी। महासिंह के आगमन का आभास भी नहीं हो पाया उन्हें।
🔶 लेकिन महासिंह ने ससम्मान फिर से पुकारा गुरु जी! गुरुजी ने एकबारगी चौंककर कहा - आओ महासिंह! बोलो महासिंह! संकोच किसलिए? गुरुजी का स्वर शान्त होने के बावजूद उसमें छलकती वेदना मुखर थी। शायद उन्होंने महासिंह के मन का मर्म पा लिया था और उसके कारण वे दुर्निवार वेदना से आकुल हो उठे थे।
🔷 सामने खड़ा महासिंह गुरुजी के दृष्टितेज को सहन नहीं कर पाया। उसका मस्तक झुक गया। तभी गुरुजी ने धीमे स्वर में कहना शुरू किया - महासिंह ये दुःख हम लोगों ने स्वयं ही तो आमंत्रित किया है। क्या यह हमें विचलित कर देगा? खालसा, मेरा शिष्य दुःख विपदा से डिगेगा नहीं।
🔶 लेकिन गुरुजी! अब हम रह ही कितने गए हैं? एक-एक कर सभी तो चले गए छोड़कर। इसी से विचार आता है कि क्यों न शत्रु से सुलह कर लें? अच्छे दिन आने पर कभी फिर लड़ सकेंगे .....। महासिंह हिम्मत बाँधकर कहता गया।
🔷 महासिंह! यह तुम कर रहे हो। विपदा से विचलित हो रहे हो? कल दुनिया हमें क्या कहेगी। सुलह का विचार घातक है। विपत्ति की झंझा में हमें बढ़ना होगा। महासिंह! हमारा ध्येय हमारे सामने है और यह शुक्रतारे की तरह प्रकाशमान है।
🔶 लेकिन गुरुजी! हम शेष चालीस लोग अब शत्रु का कर ही क्या सकते हैं? इसलिए सुलह का विचार ही पक्का होता जाता है ................. औरों ने भी आखिरी तौर से तय करके मुझे भेजा है ................. और कहा है कि मैं आपसे अर्ज़ करूँ कि अब दुश्मन से सुलह कर ही लें, ताकि आगे हमें संगठित और सशक्त होने का मौका मिल सके।
🔷 महासिंह! इसमें फिर से संगठित होने की बात तो महज बहाना है - सच यह है कि संकटों से भागने की भावना ही इस विचार का आधार बन बैठी है। माना कि आज सिर्फ मैं हूँ और तुम चालीस भी साथ हो। इस स्थिति में तो यह विश्वास करके चलना होगा कि हमारा एक-एक खालसा सवालाख शत्रु सेना से युद्ध करेगा। पलायन का रास्ता नहीं पकड़ेगा।
🔶 गुरुजी! अब मेरे कहने का कोई असर उन सभी पर नहीं होने का। गुरुजी गम्भीर हो गए। एक क्षण मौन रहकर बोले - ठीक है महासिंह! जाओ हमारी तरफ से तुम्हें छूट है, लेकिन तुम और तुम्हारे उनतालीस साथी आज से अब स्वयं को शिष्य (सिख) नहीं कहेंगे।
🔷 महासिंह अपनी सैनिक टुकड़ी का जत्थेदार था। उसने अपने सहित चालीस खालसाओं का बेदावा लिखकर गुरुजी को दे दिया। चलते समय अभिवादन के लिए जब महासिंह ने गुरुजी की तरफ देखा तो उसकी आँखें भर आयी। उनकी गम्भीर मुद्रा बरबस अपनी तरफ महासिंह का हृदय खींचने लगी। महासिंह ने उधर बिना देखे ही अभिवादन किया, साथ ही उसके साथियों ने भी। और वे सब चलने लगे।
🔶 उस दिन मकर संक्रान्ति का पर्व था। माई मागों को जब इसकी सूचना मिली तो वे बेचैन हो उठीं। उन्हें याद आया कि आज की ही तरफ जब एक बार गुरुजी माछीपाड़ा के जंगल में जमीन पर एकाकी बैठे थे। कोई संगी-साथी वहाँ मौजूद न था। चारों बच्चे शहीद हो चुके थे। सेना छिन्न-विच्छिन्न हो गयी थी, तो गुरुजी ने किसी को उलाहना, उपालम्भ नहीं दिया था। उस दिन पूरे मन से उन्होंने अपने मित्र को पुकारा था। उस अदृष्ट मित्र को, जो घट-घट का वासी है।
🔷 उस वक्त घोर विपिन में इक्का दुक्का जंगली हिंस्र पशु भी गुरुजी के इर्द-गिर्द घूम रहे थे। गुरुजी पवन को सम्बोधित कर कह उठे थे - मित्र प्यारे नूँ हाल मुरीदा दाँ कैना........। अर्थात् हे पवन! तेरी गति सर्वत्र है। अतः मेरे उस महामित्र से, परमसखा से, प्रभु से उसके शिष्यों का सब समाचार कह देना....।
🔶 सोचते-सोचते माई माँगों अचानक किसी प्रबल शक्ति से प्रेरित हो उठ खड़ी हुई। कमर से रोज की तरह अपनी पैनी लघु खड्ग बाँधी और हाथ में दीर्घ यष्टिका लेकर बाहर चल दीं।
🔷 माई मागों तेज चाल से महासिंह के घर पहुँची। वह उस वक्त स्त्री बच्चे के बीच निश्चिन्त बैठा था - मानों अब उसे कुछ करना नहीं है। माई मागों एक क्षण उसे तीव्र आँखों से खड़ी घूरती रहीं। महासिंह उनकी इस दृष्टि से घबरा गया। पास आकर ‘मत्था टेका’ कहा और आदर अभिव्यक्ति में व्यस्त हो उठा। माई मागों फिर भी मौन रहीं।
🔶 माई का क्या हुक्म है? महासिंह पूछ रहा था।
🔷 माई मागों असीम उत्तेजना से चीत्कार कर उठीं - महासिंह! ओए जत्थेदार। तुसी .....तुसी, चूड़ियाँ पालो और कर (घर) बैठ। असी लड़ागियाँ .........। (अरे ओ जत्थेदार! तू चूड़ियाँ पहन ले और घर बैठ।) मैं लड़ने जाती हूँ। माई की मुखमुद्रा पर कुछ ऐसा तेज आ विराजा कि महासिंह हतबुद्धि अवाक् टुकुर-टुकुर खड़ा देखता रहा-फिर वह भी उत्तेजित हो उठा। उसे लगा कि कोई कह रहा है - महासिंह! जल्दी चल। गुरुजी पर मुसीबत आने वाली हैं। घर से निकल महासिंह, शस्त्र लेकर, साथी लेकर दौड़ चल उस दिशा में, जहाँ गुरुजी अकेले, बिना साथी-सहायक के घोर विपदा के बीच अडिग खड़े हैं .......।
🔶 इसी बीच महासिंह के कानों में माई मागों के शब्द पड़ें - महासिंह! तुम ने गुरुजी से दीक्षा ली। गुरुदीक्षा का यही अर्थ है - गुरु के काम के लिए मर मिटना। स्वयं को गुरु पर न्योछावर कर देना। अपने सर्वस्व को गुरु के चरणों पर बलिदान कर देना।
🔷 महासिंह की आँखों के समाने गुरुदीक्षा का दृश्य घूम रहा था। शर्मिन्दा होते हुए उसने कहा - नहीं माई! महासिंह कायर नहीं है - मैं भी चलता हूँ। और सच ही महासिंह अपनी लम्बी खड्ग, सुतीक्ष्ण भाला होकर - शिरस्त्राण तथा सैनिक परिवेश पहन कर फुर्ती से तैयार हो गया - बल्कि उसकी स्त्री ने, बहिन ने, माता ने इस तैयारी में दौड़ - दौड़ कर मदद की।
🔶 मकर संक्रान्ति की संध्या। खरदाना के ऊँचे टीले पर अकेले मोर्चेबन्दी करके गुरु गोविन्दसिंह शत्रुओं पर बाण वर्षा कर रहे थे। एक तरफ वे अकेले - दूसरी तरफ सैकड़ों मुगल सैनिक। मुगलों के तीर आ-आकर टीले की छाती में बेध रहे थे। और यह ऊँचा टीला मानों गुरुजी की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध था। किन्तु यह भी आशंका कम न थी कि थोड़ी ही देर में शत्रु सैनिक टीले को घेर लेंगे। अभी तक शत्रुओं को शायद ठीक से पता नहीं चल पाया था कि कितने सैनिक टीले पर मोर्चा बाँधे हुए हैं।
🔷 सहसा अघटन-घटना घटी इसी के अनुसार एक दूसरा ही दृश्य उपस्थित हो गया। टीले की ओर बढ़ रहे शत्रु-दल पर पीछे से किसी अन्य दल ने सवेग धावा कर दिया और गुरुजी ने आश्चर्यचकित होते हुए देखा कि दल प्राणों का भय त्यागकर विद्युत वेग से लड़ रहा है। तालाब तट पर एक-एक सैनिक अनेक शत्रुओं का संहार कर रहा है।
🔶 कौन हैं ये लोग? गुरुजी अनुमान नहीं लगा सके। कुछ तो टीले की ऊँचाई - कुछ पेड़ों का झुरमुट और दूरी भी थी। आगत दल के चेहरे स्पष्ट नहीं दिखाई दे रहे थे।
🔷 गुरुजी ने सरोवर की तरफ थोड़ा बढ़कर देखा, युद्ध खत्म हो गया था। शत्रुदल का संहार कर वह आगत अज्ञात टुकड़ी भी शहीद हो गयी, लेकिन उसके शहीद होते - होते शत्रु-दल भी भाग खड़ा हुआ।
🔶 सरोवर की जलराशि से छूता हुआ एक उच्छिन्न मस्तक पड़ा था। गुरुजी ने वह कटा हुआ सिर उठा ला। सिर रक्त और धूल से सन गया था। गुरुजी ने सरोवरजल से उसे स्वच्छ किया। वह चेहरा साफ-साफ दिखाई देने लगा। उन्हें एक साथ आश्चर्य, दुःख एवं आनन्द की अनुभूति हो आयी। यह सिर उन्हीं चालीस शिष्यों में से एक का था, जो बेदावा लिखकर दे गए थे।
🔷 गुरुगोविन्द सिंह ने एक-एक लाश का सिर जाँच कर रखकर उसके रक्तारक्त मुख को यों दुलराने, आलिंगन करने और चूमने लगे, मानों बहुत दिनों के बिछुड़े बेटों को पिता कलेजे से लगा रहा हो। आह! कितने प्यारे लग रहे थे वे सभी चेहरे, जो आज निहाल हो गए, देश की मिट्टी में मिल गए थे - हमेशा के लिए।
🔶 अरे! यह तो माई मागों है। आखिर उस बहादुर माँ की लाश भी गुरुजी जी के पहचान में आ ही गई। कई शत्रु सैनिक उसके इर्द-गिर्द कटे पड़ें थे। तो माई मागों भी लड़ने आयी थी? और अमित गौरव से, उद्दाम प्रेरणा से, प्रबल उत्साह एवं दुर्दम्य भावना से गुरुजी का रोम-रोम आप्यायित हो उठा।
🔷 गु...रु...जी.... सरोवर तट के लाशों के ढेर से एक टूटता स्वर सुनाई दिया। माई मागों का रक्त से सना मस्तक अपने हाथों से धीरे से नीचे रखकर गुरुजी उधर ही बढ़ें। अरे यह तो जत्थेदार महासिंह लगता है। अभी प्राण शेष हैं। गुरुजी ने आश्चर्य और प्यार के अतिरेक में कहा, जत्थेदार महासिंह! आखिर तुम भी आ गए। मेरे प्यारे खालसा। गुरुजी ने उद्दामा से उसको आलिंगन में ले लिया।
🔶 महासिंह उठ नहीं सकता था, वह निढाल पड़ा रहा। तीर-तलवार और भाले के अगणित बार उस पर हो चुके थे। स्वयं उसके हाथों कटी पड़ी हुई अनेकों लाशों उसके पास ढेर थीं।
🔷 गुरुजी सरोवर तट से अपना कमरबन्द भिगोकर लाए। महासिंह के मुँह पर उसका जल बूँद-बूँद टपकाते रहें। क्षण भर के लिए शायद अन्तिम बार उस महावीर का मुख्य दिव्य तेज से उद्भासित हो उठा। सोच रहा था जत्थेदार महासिंह - क्या गुरुजी ने उसको क्षमा कर दिया है? बेदावा लिखकर गुरुजी को अकेला छोड़ जाने का जघन्य अपराध इस मृत्युबेला में भी उसका हृदय कचोट रहा था।
🔶 गु..............रु...................जी! महासिंह कुछ कहना चाहता था।
🔷 महासिंह! मेरे प्यारे सपूत। बोलो। महासिंह की आँखें भरी आयीं। गुरुजी ने उसका सिर थपथपाया, आँसू पोंछे। गुरुजी! हम लोग अपना प्रायश्चित करने आए थे। प्रभु वह बेदावा फाड़ दीजिए। यही मेरी आखिरी अरदास है।
🔶 हर शिष्य के लिए स्पृहणीय बन गयी, महासिंह की अन्तिम इच्छा। गुरुजी ने अपने अंगरखे से बेदावा का कागज निकाला और फाड़कर उसके छोटे-छोटे टुकड़ों को सरोवर-जल में फेंक दिया। महासिंह को लगा कि उसकी आत्मा का घाव भर गया। गुरुजी की गोद में ही उसने अनन्त पथ की यात्रा के लिए आँखें बन्द कर लीं।
🔷 शिष्यों के इस अनूठे प्रायश्चित ने गुरुजी को भाव-विह्वल कर दिया। उन्होंने उस दिन कहा - यह स्थान ४१ बलिदानियों के रक्त से पवित्र हो चुका है। यहाँ जो आएगा, जो इस सरोवर में स्नान करेगा, वह भी मुक्तिपथ का भागी होगा। उन्होंने मुक्त-सर के नाम से उस सरोवर को सम्बोधित किया। तब से आज तक जब-जब मकर संक्रान्ति आती है, मुक्त-सर में उन ४१ शहीदों की याद में मेला लगता है।
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1998/September/v1.34
🔶 लेकिन महासिंह ने ससम्मान फिर से पुकारा गुरु जी! गुरुजी ने एकबारगी चौंककर कहा - आओ महासिंह! बोलो महासिंह! संकोच किसलिए? गुरुजी का स्वर शान्त होने के बावजूद उसमें छलकती वेदना मुखर थी। शायद उन्होंने महासिंह के मन का मर्म पा लिया था और उसके कारण वे दुर्निवार वेदना से आकुल हो उठे थे।
🔷 सामने खड़ा महासिंह गुरुजी के दृष्टितेज को सहन नहीं कर पाया। उसका मस्तक झुक गया। तभी गुरुजी ने धीमे स्वर में कहना शुरू किया - महासिंह ये दुःख हम लोगों ने स्वयं ही तो आमंत्रित किया है। क्या यह हमें विचलित कर देगा? खालसा, मेरा शिष्य दुःख विपदा से डिगेगा नहीं।
🔶 लेकिन गुरुजी! अब हम रह ही कितने गए हैं? एक-एक कर सभी तो चले गए छोड़कर। इसी से विचार आता है कि क्यों न शत्रु से सुलह कर लें? अच्छे दिन आने पर कभी फिर लड़ सकेंगे .....। महासिंह हिम्मत बाँधकर कहता गया।
🔷 महासिंह! यह तुम कर रहे हो। विपदा से विचलित हो रहे हो? कल दुनिया हमें क्या कहेगी। सुलह का विचार घातक है। विपत्ति की झंझा में हमें बढ़ना होगा। महासिंह! हमारा ध्येय हमारे सामने है और यह शुक्रतारे की तरह प्रकाशमान है।
🔶 लेकिन गुरुजी! हम शेष चालीस लोग अब शत्रु का कर ही क्या सकते हैं? इसलिए सुलह का विचार ही पक्का होता जाता है ................. औरों ने भी आखिरी तौर से तय करके मुझे भेजा है ................. और कहा है कि मैं आपसे अर्ज़ करूँ कि अब दुश्मन से सुलह कर ही लें, ताकि आगे हमें संगठित और सशक्त होने का मौका मिल सके।
🔷 महासिंह! इसमें फिर से संगठित होने की बात तो महज बहाना है - सच यह है कि संकटों से भागने की भावना ही इस विचार का आधार बन बैठी है। माना कि आज सिर्फ मैं हूँ और तुम चालीस भी साथ हो। इस स्थिति में तो यह विश्वास करके चलना होगा कि हमारा एक-एक खालसा सवालाख शत्रु सेना से युद्ध करेगा। पलायन का रास्ता नहीं पकड़ेगा।
🔶 गुरुजी! अब मेरे कहने का कोई असर उन सभी पर नहीं होने का। गुरुजी गम्भीर हो गए। एक क्षण मौन रहकर बोले - ठीक है महासिंह! जाओ हमारी तरफ से तुम्हें छूट है, लेकिन तुम और तुम्हारे उनतालीस साथी आज से अब स्वयं को शिष्य (सिख) नहीं कहेंगे।
🔷 महासिंह अपनी सैनिक टुकड़ी का जत्थेदार था। उसने अपने सहित चालीस खालसाओं का बेदावा लिखकर गुरुजी को दे दिया। चलते समय अभिवादन के लिए जब महासिंह ने गुरुजी की तरफ देखा तो उसकी आँखें भर आयी। उनकी गम्भीर मुद्रा बरबस अपनी तरफ महासिंह का हृदय खींचने लगी। महासिंह ने उधर बिना देखे ही अभिवादन किया, साथ ही उसके साथियों ने भी। और वे सब चलने लगे।
🔶 उस दिन मकर संक्रान्ति का पर्व था। माई मागों को जब इसकी सूचना मिली तो वे बेचैन हो उठीं। उन्हें याद आया कि आज की ही तरफ जब एक बार गुरुजी माछीपाड़ा के जंगल में जमीन पर एकाकी बैठे थे। कोई संगी-साथी वहाँ मौजूद न था। चारों बच्चे शहीद हो चुके थे। सेना छिन्न-विच्छिन्न हो गयी थी, तो गुरुजी ने किसी को उलाहना, उपालम्भ नहीं दिया था। उस दिन पूरे मन से उन्होंने अपने मित्र को पुकारा था। उस अदृष्ट मित्र को, जो घट-घट का वासी है।
🔷 उस वक्त घोर विपिन में इक्का दुक्का जंगली हिंस्र पशु भी गुरुजी के इर्द-गिर्द घूम रहे थे। गुरुजी पवन को सम्बोधित कर कह उठे थे - मित्र प्यारे नूँ हाल मुरीदा दाँ कैना........। अर्थात् हे पवन! तेरी गति सर्वत्र है। अतः मेरे उस महामित्र से, परमसखा से, प्रभु से उसके शिष्यों का सब समाचार कह देना....।
🔶 सोचते-सोचते माई माँगों अचानक किसी प्रबल शक्ति से प्रेरित हो उठ खड़ी हुई। कमर से रोज की तरह अपनी पैनी लघु खड्ग बाँधी और हाथ में दीर्घ यष्टिका लेकर बाहर चल दीं।
🔷 माई मागों तेज चाल से महासिंह के घर पहुँची। वह उस वक्त स्त्री बच्चे के बीच निश्चिन्त बैठा था - मानों अब उसे कुछ करना नहीं है। माई मागों एक क्षण उसे तीव्र आँखों से खड़ी घूरती रहीं। महासिंह उनकी इस दृष्टि से घबरा गया। पास आकर ‘मत्था टेका’ कहा और आदर अभिव्यक्ति में व्यस्त हो उठा। माई मागों फिर भी मौन रहीं।
🔶 माई का क्या हुक्म है? महासिंह पूछ रहा था।
🔷 माई मागों असीम उत्तेजना से चीत्कार कर उठीं - महासिंह! ओए जत्थेदार। तुसी .....तुसी, चूड़ियाँ पालो और कर (घर) बैठ। असी लड़ागियाँ .........। (अरे ओ जत्थेदार! तू चूड़ियाँ पहन ले और घर बैठ।) मैं लड़ने जाती हूँ। माई की मुखमुद्रा पर कुछ ऐसा तेज आ विराजा कि महासिंह हतबुद्धि अवाक् टुकुर-टुकुर खड़ा देखता रहा-फिर वह भी उत्तेजित हो उठा। उसे लगा कि कोई कह रहा है - महासिंह! जल्दी चल। गुरुजी पर मुसीबत आने वाली हैं। घर से निकल महासिंह, शस्त्र लेकर, साथी लेकर दौड़ चल उस दिशा में, जहाँ गुरुजी अकेले, बिना साथी-सहायक के घोर विपदा के बीच अडिग खड़े हैं .......।
🔶 इसी बीच महासिंह के कानों में माई मागों के शब्द पड़ें - महासिंह! तुम ने गुरुजी से दीक्षा ली। गुरुदीक्षा का यही अर्थ है - गुरु के काम के लिए मर मिटना। स्वयं को गुरु पर न्योछावर कर देना। अपने सर्वस्व को गुरु के चरणों पर बलिदान कर देना।
🔷 महासिंह की आँखों के समाने गुरुदीक्षा का दृश्य घूम रहा था। शर्मिन्दा होते हुए उसने कहा - नहीं माई! महासिंह कायर नहीं है - मैं भी चलता हूँ। और सच ही महासिंह अपनी लम्बी खड्ग, सुतीक्ष्ण भाला होकर - शिरस्त्राण तथा सैनिक परिवेश पहन कर फुर्ती से तैयार हो गया - बल्कि उसकी स्त्री ने, बहिन ने, माता ने इस तैयारी में दौड़ - दौड़ कर मदद की।
🔶 मकर संक्रान्ति की संध्या। खरदाना के ऊँचे टीले पर अकेले मोर्चेबन्दी करके गुरु गोविन्दसिंह शत्रुओं पर बाण वर्षा कर रहे थे। एक तरफ वे अकेले - दूसरी तरफ सैकड़ों मुगल सैनिक। मुगलों के तीर आ-आकर टीले की छाती में बेध रहे थे। और यह ऊँचा टीला मानों गुरुजी की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध था। किन्तु यह भी आशंका कम न थी कि थोड़ी ही देर में शत्रु सैनिक टीले को घेर लेंगे। अभी तक शत्रुओं को शायद ठीक से पता नहीं चल पाया था कि कितने सैनिक टीले पर मोर्चा बाँधे हुए हैं।
🔷 सहसा अघटन-घटना घटी इसी के अनुसार एक दूसरा ही दृश्य उपस्थित हो गया। टीले की ओर बढ़ रहे शत्रु-दल पर पीछे से किसी अन्य दल ने सवेग धावा कर दिया और गुरुजी ने आश्चर्यचकित होते हुए देखा कि दल प्राणों का भय त्यागकर विद्युत वेग से लड़ रहा है। तालाब तट पर एक-एक सैनिक अनेक शत्रुओं का संहार कर रहा है।
🔶 कौन हैं ये लोग? गुरुजी अनुमान नहीं लगा सके। कुछ तो टीले की ऊँचाई - कुछ पेड़ों का झुरमुट और दूरी भी थी। आगत दल के चेहरे स्पष्ट नहीं दिखाई दे रहे थे।
🔷 गुरुजी ने सरोवर की तरफ थोड़ा बढ़कर देखा, युद्ध खत्म हो गया था। शत्रुदल का संहार कर वह आगत अज्ञात टुकड़ी भी शहीद हो गयी, लेकिन उसके शहीद होते - होते शत्रु-दल भी भाग खड़ा हुआ।
🔶 सरोवर की जलराशि से छूता हुआ एक उच्छिन्न मस्तक पड़ा था। गुरुजी ने वह कटा हुआ सिर उठा ला। सिर रक्त और धूल से सन गया था। गुरुजी ने सरोवरजल से उसे स्वच्छ किया। वह चेहरा साफ-साफ दिखाई देने लगा। उन्हें एक साथ आश्चर्य, दुःख एवं आनन्द की अनुभूति हो आयी। यह सिर उन्हीं चालीस शिष्यों में से एक का था, जो बेदावा लिखकर दे गए थे।
🔷 गुरुगोविन्द सिंह ने एक-एक लाश का सिर जाँच कर रखकर उसके रक्तारक्त मुख को यों दुलराने, आलिंगन करने और चूमने लगे, मानों बहुत दिनों के बिछुड़े बेटों को पिता कलेजे से लगा रहा हो। आह! कितने प्यारे लग रहे थे वे सभी चेहरे, जो आज निहाल हो गए, देश की मिट्टी में मिल गए थे - हमेशा के लिए।
🔶 अरे! यह तो माई मागों है। आखिर उस बहादुर माँ की लाश भी गुरुजी जी के पहचान में आ ही गई। कई शत्रु सैनिक उसके इर्द-गिर्द कटे पड़ें थे। तो माई मागों भी लड़ने आयी थी? और अमित गौरव से, उद्दाम प्रेरणा से, प्रबल उत्साह एवं दुर्दम्य भावना से गुरुजी का रोम-रोम आप्यायित हो उठा।
🔷 गु...रु...जी.... सरोवर तट के लाशों के ढेर से एक टूटता स्वर सुनाई दिया। माई मागों का रक्त से सना मस्तक अपने हाथों से धीरे से नीचे रखकर गुरुजी उधर ही बढ़ें। अरे यह तो जत्थेदार महासिंह लगता है। अभी प्राण शेष हैं। गुरुजी ने आश्चर्य और प्यार के अतिरेक में कहा, जत्थेदार महासिंह! आखिर तुम भी आ गए। मेरे प्यारे खालसा। गुरुजी ने उद्दामा से उसको आलिंगन में ले लिया।
🔶 महासिंह उठ नहीं सकता था, वह निढाल पड़ा रहा। तीर-तलवार और भाले के अगणित बार उस पर हो चुके थे। स्वयं उसके हाथों कटी पड़ी हुई अनेकों लाशों उसके पास ढेर थीं।
🔷 गुरुजी सरोवर तट से अपना कमरबन्द भिगोकर लाए। महासिंह के मुँह पर उसका जल बूँद-बूँद टपकाते रहें। क्षण भर के लिए शायद अन्तिम बार उस महावीर का मुख्य दिव्य तेज से उद्भासित हो उठा। सोच रहा था जत्थेदार महासिंह - क्या गुरुजी ने उसको क्षमा कर दिया है? बेदावा लिखकर गुरुजी को अकेला छोड़ जाने का जघन्य अपराध इस मृत्युबेला में भी उसका हृदय कचोट रहा था।
🔶 गु..............रु...................जी! महासिंह कुछ कहना चाहता था।
🔷 महासिंह! मेरे प्यारे सपूत। बोलो। महासिंह की आँखें भरी आयीं। गुरुजी ने उसका सिर थपथपाया, आँसू पोंछे। गुरुजी! हम लोग अपना प्रायश्चित करने आए थे। प्रभु वह बेदावा फाड़ दीजिए। यही मेरी आखिरी अरदास है।
🔶 हर शिष्य के लिए स्पृहणीय बन गयी, महासिंह की अन्तिम इच्छा। गुरुजी ने अपने अंगरखे से बेदावा का कागज निकाला और फाड़कर उसके छोटे-छोटे टुकड़ों को सरोवर-जल में फेंक दिया। महासिंह को लगा कि उसकी आत्मा का घाव भर गया। गुरुजी की गोद में ही उसने अनन्त पथ की यात्रा के लिए आँखें बन्द कर लीं।
🔷 शिष्यों के इस अनूठे प्रायश्चित ने गुरुजी को भाव-विह्वल कर दिया। उन्होंने उस दिन कहा - यह स्थान ४१ बलिदानियों के रक्त से पवित्र हो चुका है। यहाँ जो आएगा, जो इस सरोवर में स्नान करेगा, वह भी मुक्तिपथ का भागी होगा। उन्होंने मुक्त-सर के नाम से उस सरोवर को सम्बोधित किया। तब से आज तक जब-जब मकर संक्रान्ति आती है, मुक्त-सर में उन ४१ शहीदों की याद में मेला लगता है।
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1998/September/v1.34
👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 17)
👉 प्रतिभा परिवर्धन के तथ्य और सिद्धांत
🔷 जिन व्यक्तियों ने युग परिवर्तन के सरंजाम को संभव कर दिखाया है, उनके क्रियाकलापों पर एक दृष्टि डालकर यह भली-भाँति जाना जा सकता है कि जब भी प्रतिभा का सुनियोजन सही दिशा में होता है, उस व्यक्ति का ही नहीं, वातावरण का भी कायाकल्प हो जाता है। महाप्रतापी राणा प्रताप व शिवाजी से लेकर सुभाषचंद्र बोस, मनस्वी गाँधी इन्हीं कुछ शताब्दियों में जन्मे महामानव हैं, जिन्होंने प्रतिभा के सुव्यवस्थित सुनियोजन से असंभव को संभव कर दिखाया। वस्तुतः महामानवों का जीवन अपने आप में एक प्रयोगशाला है। उनके उदाहरणों से बहुत कुछ सीखा और पाया जा सकता है।
🔶 प्रतिभा परिवर्धन का प्रशिक्षण करने वाले कोई स्कूल, कॉलेज कहीं नहीं हैं। उसके लिए निर्धारित सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने के लिए अवसर और वातावरण स्वयं तलाशना पड़ता है। उस प्रकार के अवसर और वातावरण कहीं एक जगह एकत्रित नहीं मिलते। उन्हें दाने बीनने वाले की तरह झोली में भरना पड़ता है। पर इन दिनों एक ऐसा सुयोग सामने है, जिसके साथ संबंध सूत्र जोड़ने पर हर किसी को वह सुयोग हस्तगत हो सकता है।
🔷 जिसके सहारे प्रतिभा संपादन का सौभाग्य अनायास ही प्राप्त हो सके, ऐसे सुयोग कभी-कभी ही सामने आते हैं और उन्हें कोई बिरले ही पहचानकर लाभ उठा पाते हैं। हनुमान् ने समय को पहचाना और वे थोड़े ही समय में समुद्र लाँघने, पर्वत उखाड़ने और लंका को मटियामेट करने का श्रेय प्राप्त कर सके। इसे समय की पहचान ही कहना चाहिए। यदि उस सुयोग का लाभ उठाना उनसे न बन पड़ता तो सुग्रीव के सेवक रहकर ही उन्हें दिन गुजारने पड़ते।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 21
🔷 जिन व्यक्तियों ने युग परिवर्तन के सरंजाम को संभव कर दिखाया है, उनके क्रियाकलापों पर एक दृष्टि डालकर यह भली-भाँति जाना जा सकता है कि जब भी प्रतिभा का सुनियोजन सही दिशा में होता है, उस व्यक्ति का ही नहीं, वातावरण का भी कायाकल्प हो जाता है। महाप्रतापी राणा प्रताप व शिवाजी से लेकर सुभाषचंद्र बोस, मनस्वी गाँधी इन्हीं कुछ शताब्दियों में जन्मे महामानव हैं, जिन्होंने प्रतिभा के सुव्यवस्थित सुनियोजन से असंभव को संभव कर दिखाया। वस्तुतः महामानवों का जीवन अपने आप में एक प्रयोगशाला है। उनके उदाहरणों से बहुत कुछ सीखा और पाया जा सकता है।
🔶 प्रतिभा परिवर्धन का प्रशिक्षण करने वाले कोई स्कूल, कॉलेज कहीं नहीं हैं। उसके लिए निर्धारित सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने के लिए अवसर और वातावरण स्वयं तलाशना पड़ता है। उस प्रकार के अवसर और वातावरण कहीं एक जगह एकत्रित नहीं मिलते। उन्हें दाने बीनने वाले की तरह झोली में भरना पड़ता है। पर इन दिनों एक ऐसा सुयोग सामने है, जिसके साथ संबंध सूत्र जोड़ने पर हर किसी को वह सुयोग हस्तगत हो सकता है।
🔷 जिसके सहारे प्रतिभा संपादन का सौभाग्य अनायास ही प्राप्त हो सके, ऐसे सुयोग कभी-कभी ही सामने आते हैं और उन्हें कोई बिरले ही पहचानकर लाभ उठा पाते हैं। हनुमान् ने समय को पहचाना और वे थोड़े ही समय में समुद्र लाँघने, पर्वत उखाड़ने और लंका को मटियामेट करने का श्रेय प्राप्त कर सके। इसे समय की पहचान ही कहना चाहिए। यदि उस सुयोग का लाभ उठाना उनसे न बन पड़ता तो सुग्रीव के सेवक रहकर ही उन्हें दिन गुजारने पड़ते।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 21
👉 Where is the Lasting Joy?
🔷 We are all driven by the quest for joy. Behind all our plans, actions, expectations, lies this perennial thirst for joy. But because of our natural perception of the world and life at the gross material level, our domain of search remains confined to the sentient world and related extrovert experiences. We are not even aware that there could be an inner bliss or spiritual joy.
🔶 The feeling of delight is within us. How could the external things, material experiences enhance or suppress it? They might just give a momentary excitation or satisfy our ego for sometime. The true means and sources of joy lie deep within our own selves. The Vedic philosophy logically describes this fact – it is the consciousness-element of mind, which feels the joy. So, without knowing this sublime element or deciphering its nature and conditioning it, one can’t hope for unalloyed bliss or lasting joy. Conquering the mind is indeed bigger than conquering the world. One who succeeds in it is the happiest, strongest person in this world.
🔷 Hidden there is the subtle spring of infinite bliss in the core of our inner self. What we ever experience as joy is only a sprinkle of this immense source. The pleasure, if any, we find in the outer world is also a reflection of this inner impulse. As the Vedic Sciences (of Yoga etc) preach – in order to peep into this inner treasure, we will first have to purity and control our minds (both conscious
and unconscious mind), stabilize and uproot its agility and extrovert tendencies. Such a mind can eventually have the realization of divinity, of the absolute truth, the omnipresent, eternal Brahm. Attaining this state is a grand sadhana. The gamut of universal principles of religion is taught only for this purpose. The righteous path of morality, human religion alone can reach the realms of ever lasting joy.
📖 Akhand Jyoti, Sept. 1942
🔶 The feeling of delight is within us. How could the external things, material experiences enhance or suppress it? They might just give a momentary excitation or satisfy our ego for sometime. The true means and sources of joy lie deep within our own selves. The Vedic philosophy logically describes this fact – it is the consciousness-element of mind, which feels the joy. So, without knowing this sublime element or deciphering its nature and conditioning it, one can’t hope for unalloyed bliss or lasting joy. Conquering the mind is indeed bigger than conquering the world. One who succeeds in it is the happiest, strongest person in this world.
🔷 Hidden there is the subtle spring of infinite bliss in the core of our inner self. What we ever experience as joy is only a sprinkle of this immense source. The pleasure, if any, we find in the outer world is also a reflection of this inner impulse. As the Vedic Sciences (of Yoga etc) preach – in order to peep into this inner treasure, we will first have to purity and control our minds (both conscious
and unconscious mind), stabilize and uproot its agility and extrovert tendencies. Such a mind can eventually have the realization of divinity, of the absolute truth, the omnipresent, eternal Brahm. Attaining this state is a grand sadhana. The gamut of universal principles of religion is taught only for this purpose. The righteous path of morality, human religion alone can reach the realms of ever lasting joy.
📖 Akhand Jyoti, Sept. 1942
👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (भाग 2)
🔷 स्वच्छता और व्यवस्था ऐसा गुण है जिसमें किसी की कुरुचि का सहज ही परिचय प्राप्त किया जा सकता है। गन्दगी से घृणा और स्वच्छता से प्रेम रखा जाय तो वह उत्साह सहज ही बना रहेगा जिसके आधार पर शरीर, वस्त्र, फर्नीचर, पुस्तकें, स्टेशनरी, बर्तन, फर्श, चित्र, साइकिल आदि सम्बन्धित सामान को स्वच्छ एवं सुव्यवस्थित रखा जा सके। सफाई की यह आदत हिसाब-किताब पर, लेन-देन पर भी लागू होती है। घर, दफ्तर को, बच्चों को, वस्तुओं को साफ-सुथरा रखकर न केवल आगन्तुकों को अपनी सुरुचि का परिचय देते हैं वरन् अपने स्वभाव में अनोखी विशेषता उत्पन्न करते है।
🔶 जिसे ईमानदारी का जीवन जीना हो उसे पूर्व तैयारी मितव्ययी रहने की, सादा जीवन जीने की करनी चाहिए। जो कम में गुजारा करना जानता है उसी के लिए यह सम्भव है कि कम आमदनी से सन्तोष पूर्वक निर्वाह कर ले। ईमानदारी से आय सीमित रहती है, उतनी नहीं हो सकती जितनी बेईमानी अपनाने से। ऐसी दशा में यदि श्रेष्ठ जीवन जीना हो तो अपने खर्च जहाँ तक सम्भव हो वहाँ तक घटाने चाहिए। जिसने खर्च बढ़ा रखे हैं उन्हें उनकी पूर्ति के लिए बेईमानी का रास्ता ही अपनाना पड़ेगा। फिजूलखर्ची यों निर्दोष भी मालूम पड़ सकती है। अपना कमाना अपना उड़ाना इसमें किसी को क्या ऐतराज होना चाहिए। परन्तु बात इतनी सरल नहीं है। प्रकारान्तर से फिजूलखर्ची बेईमानी अपनाने के लिए बाध्य करती है।
🔷 अनियन्त्रित खर्च करने की आदत बढ़ती ही जाती है और वह देखते-देखते उस सीमा को छूती है जहाँ न्यायोचित आमदनी कम पड़े और घटोत्तरी की पूर्ति के लिए बेईमानी पर उतारू होना पड़े। जिसने आमदनी और खर्च का तालमेल बिठाना सीखा है वही कुछ सत्कर्मों के लिए भी बचा सकता है। अन्यथा सदुद्देश्य की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य भी आर्थिक तंगी के कारण रुके पड़े रहेंगे। सादगी की जीवनचर्या सस्ती पड़ती है, कम समय लेती है। अस्तु मितव्ययी व्यक्ति के लिए ही यह सम्भव होगा कि वह आदर्शवादी जीवन जी सके और परमार्थ की दिशा में कुछ कहने लायक योगदान दे सके।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
🔶 जिसे ईमानदारी का जीवन जीना हो उसे पूर्व तैयारी मितव्ययी रहने की, सादा जीवन जीने की करनी चाहिए। जो कम में गुजारा करना जानता है उसी के लिए यह सम्भव है कि कम आमदनी से सन्तोष पूर्वक निर्वाह कर ले। ईमानदारी से आय सीमित रहती है, उतनी नहीं हो सकती जितनी बेईमानी अपनाने से। ऐसी दशा में यदि श्रेष्ठ जीवन जीना हो तो अपने खर्च जहाँ तक सम्भव हो वहाँ तक घटाने चाहिए। जिसने खर्च बढ़ा रखे हैं उन्हें उनकी पूर्ति के लिए बेईमानी का रास्ता ही अपनाना पड़ेगा। फिजूलखर्ची यों निर्दोष भी मालूम पड़ सकती है। अपना कमाना अपना उड़ाना इसमें किसी को क्या ऐतराज होना चाहिए। परन्तु बात इतनी सरल नहीं है। प्रकारान्तर से फिजूलखर्ची बेईमानी अपनाने के लिए बाध्य करती है।
🔷 अनियन्त्रित खर्च करने की आदत बढ़ती ही जाती है और वह देखते-देखते उस सीमा को छूती है जहाँ न्यायोचित आमदनी कम पड़े और घटोत्तरी की पूर्ति के लिए बेईमानी पर उतारू होना पड़े। जिसने आमदनी और खर्च का तालमेल बिठाना सीखा है वही कुछ सत्कर्मों के लिए भी बचा सकता है। अन्यथा सदुद्देश्य की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य भी आर्थिक तंगी के कारण रुके पड़े रहेंगे। सादगी की जीवनचर्या सस्ती पड़ती है, कम समय लेती है। अस्तु मितव्ययी व्यक्ति के लिए ही यह सम्भव होगा कि वह आदर्शवादी जीवन जी सके और परमार्थ की दिशा में कुछ कहने लायक योगदान दे सके।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
👉 शरीर और आत्मा
🔷 शरीर और आत्मा का गठबन्धन कुछ ऐसा ही है, जिसमें जरा अधिक ध्यान देखने पर वास्तविकता झलक जाती है । शरीर भौतिक स्थूल पदार्थों से बना हुआ है, किन्तु आत्मा सूक्ष्म है। पानी में तेल डालने पर वह ऊपर को ही आने का प्रयत्न करेगा क्योंकि तेल के परमाणु पानी की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म हैं। अग्नि की लपटें ऊपर को ही उठेंगी। पृथ्वी की आकर्षक शक्ति और वायु का दबाव उसे रोक नहीं सकता है। आत्मा शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म है, इसलिए वह इसमें बंधी हुई होते हुए भी इसमें पूरी तरह घुल मिल जाने की अपेक्षा ऊपर उठने की कोशिश करती रहती है। लोग कहते हैं कि इन्द्रियों के भोग हमें अपनी ओर खींचे रहते हैं, पर यह बात सत्य नहीं है।
🔶 सत्य के दर्शन कर सकने के योग्य सुविधा और शिक्षा प्राप्त न होने पर मन मानकर अपनी आन्तरिक प्यास को बुझाने के लिए मनुष्य विषय भोगों की कीचड़ पीता है। हम जानते हैं कि इन पंक्तियों को पढ़ते समय तुम्हारा चित्त वैसी ही उत्सुकता और प्रसन्नता का अनुभव कर रहा है, जैसी बहुत दिनों से बिछुड़ा हुआ परदेशी अपने घर कुटुम्ब के समाचार सुनने के लिए आतुर होता है। यह एक मजबूत प्रमाण है, जिससे सिद्ध होता है कि मनुष्य की आन्तरिक इच्छा आत्म-स्वरूप देखने की बनी रहती है। शरीर में रहता हुआ भी वह उसमें घुलमिल नहीं सकता, वरन् उचक-उचक कर अपनी खोई हुई किसी चीज को तलाश करता है। बस, वह स्थान जहाँ भटकता है, यही है।
🔷 उसे यह याद नहीं आता कि मैं क्या चीज ढूँढ रहा हूँ? मेरा कुछ खो गया है, इसका अनुभव करता है। खोई हुई वस्तु के अभाव में दु:ख पाता है, किन्तु माया-जाल के पर्दे से छिपी हुई चीज को नहीं जान पाता। चित्त बड़ा चंचल है, घड़ी भर भी एक जगह नहीं ठहरता। इसकी सब लोग शिकायत करते हैं, परन्तु कारण नहीं जानते कि मन इतना चंचल क्यों हो रहा है? कस्तूरी मृग कोई अद्भुत गन्ध पाता है और उसके पास पहँचने के लिए दिन-रात चारों ओर दौड़ता रहता है । क्षण भर भी उसे विश्राम नहीं मिलता। यही हाल मन का है। यदि वह समझ जाय कि कस्तूरी मेरी नाभि में रखी हुई है, तो वह कितना आनन्द प्राप्त कर सके और सारी चंचलता भूल जाय।
🔶 आत्मा के पास तक पहुँचने के साधन जो हमारे पास मौजूद हैं, वह चित्त, अन्त:करण मन, बुद्घि आदि ही हैं। आत्म दर्शन की साधना इन्हीं के द्वारा हो सकती है। शरीर में सर्वत्र आत्मा व्याप्त है। कोई विशेष स्थान इसके लिए नियुक्त नहीं है, जिस पर किसी साधन विशेष का उपयोग किया जाय। जिस प्रकार आत्मा की आराधना करने में मन, बुद्घि आदि ही समर्थ हो सकते हैं, उसी प्रकार उसके स्थान और स्वरूप का दर्शन मानस लोक में प्रवेश करने से हो सकता है। मानसिक लोक भी स्थूल लोक की तरह ही है। उसमें इसी बाहरी दुनिया की ही अधिकांश छाया है। अभी हम कलकत्ते का विचार कर रहे हैं, अभी हिमालय पहाड़ की सैर करने लगे। अभी जिनका विचार किया था, वह स्थूल कलकत्ता और हिमालय नहीं थे, वरन् मानस लोक में स्थित उनकी छाया थी, यह छाया असत्य नहीं होती। पदार्थों का सच्चा अस्तित्व हुए बिना कोई कल्पना नहीं हो सकती। इस मानस लोक को भ्रम नहीं समझना चाहिए। यही वह सूक्ष्म चेतना है, जिसकी सहायता से दुनियाँ के सारे काम चल रहे हैं। च्च आध्यात्मिक चेतनाएँ मानसलोक से आती हैं। किसी के मन में क्या भाव उपज रहे हैं, कौन हमारे प्रति क्या सोचता है, कौन सम्बन्धी कैसे दशा में है आदि बातों को मानसलोक में प्रवेश करके हम अस्सी फीसदी ठीक-ठीक जान लेते हैं।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔶 सत्य के दर्शन कर सकने के योग्य सुविधा और शिक्षा प्राप्त न होने पर मन मानकर अपनी आन्तरिक प्यास को बुझाने के लिए मनुष्य विषय भोगों की कीचड़ पीता है। हम जानते हैं कि इन पंक्तियों को पढ़ते समय तुम्हारा चित्त वैसी ही उत्सुकता और प्रसन्नता का अनुभव कर रहा है, जैसी बहुत दिनों से बिछुड़ा हुआ परदेशी अपने घर कुटुम्ब के समाचार सुनने के लिए आतुर होता है। यह एक मजबूत प्रमाण है, जिससे सिद्ध होता है कि मनुष्य की आन्तरिक इच्छा आत्म-स्वरूप देखने की बनी रहती है। शरीर में रहता हुआ भी वह उसमें घुलमिल नहीं सकता, वरन् उचक-उचक कर अपनी खोई हुई किसी चीज को तलाश करता है। बस, वह स्थान जहाँ भटकता है, यही है।
🔷 उसे यह याद नहीं आता कि मैं क्या चीज ढूँढ रहा हूँ? मेरा कुछ खो गया है, इसका अनुभव करता है। खोई हुई वस्तु के अभाव में दु:ख पाता है, किन्तु माया-जाल के पर्दे से छिपी हुई चीज को नहीं जान पाता। चित्त बड़ा चंचल है, घड़ी भर भी एक जगह नहीं ठहरता। इसकी सब लोग शिकायत करते हैं, परन्तु कारण नहीं जानते कि मन इतना चंचल क्यों हो रहा है? कस्तूरी मृग कोई अद्भुत गन्ध पाता है और उसके पास पहँचने के लिए दिन-रात चारों ओर दौड़ता रहता है । क्षण भर भी उसे विश्राम नहीं मिलता। यही हाल मन का है। यदि वह समझ जाय कि कस्तूरी मेरी नाभि में रखी हुई है, तो वह कितना आनन्द प्राप्त कर सके और सारी चंचलता भूल जाय।
🔶 आत्मा के पास तक पहुँचने के साधन जो हमारे पास मौजूद हैं, वह चित्त, अन्त:करण मन, बुद्घि आदि ही हैं। आत्म दर्शन की साधना इन्हीं के द्वारा हो सकती है। शरीर में सर्वत्र आत्मा व्याप्त है। कोई विशेष स्थान इसके लिए नियुक्त नहीं है, जिस पर किसी साधन विशेष का उपयोग किया जाय। जिस प्रकार आत्मा की आराधना करने में मन, बुद्घि आदि ही समर्थ हो सकते हैं, उसी प्रकार उसके स्थान और स्वरूप का दर्शन मानस लोक में प्रवेश करने से हो सकता है। मानसिक लोक भी स्थूल लोक की तरह ही है। उसमें इसी बाहरी दुनिया की ही अधिकांश छाया है। अभी हम कलकत्ते का विचार कर रहे हैं, अभी हिमालय पहाड़ की सैर करने लगे। अभी जिनका विचार किया था, वह स्थूल कलकत्ता और हिमालय नहीं थे, वरन् मानस लोक में स्थित उनकी छाया थी, यह छाया असत्य नहीं होती। पदार्थों का सच्चा अस्तित्व हुए बिना कोई कल्पना नहीं हो सकती। इस मानस लोक को भ्रम नहीं समझना चाहिए। यही वह सूक्ष्म चेतना है, जिसकी सहायता से दुनियाँ के सारे काम चल रहे हैं। च्च आध्यात्मिक चेतनाएँ मानसलोक से आती हैं। किसी के मन में क्या भाव उपज रहे हैं, कौन हमारे प्रति क्या सोचता है, कौन सम्बन्धी कैसे दशा में है आदि बातों को मानसलोक में प्रवेश करके हम अस्सी फीसदी ठीक-ठीक जान लेते हैं।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
मंगलवार, 31 जुलाई 2018
👉 वचन का पालन
🔶 दरभंगा में एक शंकर मिश्र नामक विद्वान् हो गये हैं। वे छोटे थे तब उनकी माँ को दूध नहीं उतरता था तो गाय रखनी पड़ी। दाई ने माता के समान प्रेम से बालक को अपना दूध पिलाया। शंकर मिश्र की माता दाई से कहा करती थी कि बच्चा जो पहली कमाई लावेगा सो तेरी होगी।
🔷 बालक बड़ा होने पर किशोर अवस्था में ही संस्कृत का उद्भत विद्वान् हो गया। राजा ने उसकी प्रशंसा सुनकर दरबार में बुलाया और उसकी काव्य रचना पर प्रसन्न होकर अत्यन्त मूल्यवान हार उपहार में दिया।
🔶 शंकर मिश्र हार लेकर माता के पास पहुँचे। माता ने उसे तुरन्त ही दाई को दे दिया। दाई ने उसका मूल्य जँचवाया तो वह लाखों रुपए का था। इतनी कीमती चीज लेकर वह क्या करती? लौटाने आई। पर शंकर मिश्र और उसकी माता अपने वचन से लौटने का तैयार न हुए। पहली कमाई के लिए जब दाई को वचन दिया जा चुका था तो फिर उसे पलटने में उनका गौरव जाता था।
🔷 बहुत दिन देने लौटाने का झंझट पड़ा रहा। अन्त में दाई ने उस धन से एक बड़ा तालाब बनवा दिया जो दरभंगा में “दाई का तालाब” नाम से अब भी मौजूद हैं।
वचन का पालन करने वाले शंकर मिश्र और बिना परिश्रम के धन को न छूने वाली दाई दोनों ही प्रशंसनीय हैं।
🔷 बालक बड़ा होने पर किशोर अवस्था में ही संस्कृत का उद्भत विद्वान् हो गया। राजा ने उसकी प्रशंसा सुनकर दरबार में बुलाया और उसकी काव्य रचना पर प्रसन्न होकर अत्यन्त मूल्यवान हार उपहार में दिया।
🔶 शंकर मिश्र हार लेकर माता के पास पहुँचे। माता ने उसे तुरन्त ही दाई को दे दिया। दाई ने उसका मूल्य जँचवाया तो वह लाखों रुपए का था। इतनी कीमती चीज लेकर वह क्या करती? लौटाने आई। पर शंकर मिश्र और उसकी माता अपने वचन से लौटने का तैयार न हुए। पहली कमाई के लिए जब दाई को वचन दिया जा चुका था तो फिर उसे पलटने में उनका गौरव जाता था।
🔷 बहुत दिन देने लौटाने का झंझट पड़ा रहा। अन्त में दाई ने उस धन से एक बड़ा तालाब बनवा दिया जो दरभंगा में “दाई का तालाब” नाम से अब भी मौजूद हैं।
वचन का पालन करने वाले शंकर मिश्र और बिना परिश्रम के धन को न छूने वाली दाई दोनों ही प्रशंसनीय हैं।
👉 सच्चा यज्ञ
🔶 महाराज युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ समाप्त होने पर एक अद्भुत नेवला जिसका आधा शरीर सुनहरा था यज्ञ भूमि में लोट लगाने लगा। कुछ ही समय बाद वह रुदन करके कहने लगा कि "यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ। " पाण्डवों सहित सभी उपस्थित लोगों को बड़ा आश्रर्य हुआ, पूछने पर नेवले ने बताया" कुछ समय पूर्व अमुक देश में भयंकर अकाल पड़ा।
🔷 मनुष्य भूख के मारे तड़प-तड़प कर मरने लगे। एक ब्राह्मण परिवार कई दिनों से भूखा था। एक दिन कहीं से कुछ अन्न उन्हें मिला। ब्राह्मणी ने उसकी चार रोटी बनाई। उस ब्राह्मण का यह नियम था कि भोजन से पूर्व कोई भूखा होता तो उसे भोजन कराकर तब स्वयं खाता। उस दिन भी उसने आवाज दी कि जो हमसे अधिक-भूखा-हो उसका अधिकार इस भोजन पर है, आये, वह अपना भाग ग्रहण करे। तो एक चाण्डाल भूख से तड़प रहा था, आ गया।
🔶 ब्राह्मण ने अपने हिस्से की एक रोटी सौंप दी, उससे भी तृप्त न होने पर क्रमश: पत्नी और बालक-बालिका ने भी अपने-अपने हिस्से की रोटी उसे दे दी। जब वह चाण्डाल भोजन कर चुका और उसने पानी पीकर हाथ धोये तो उससे धरती पर कुछ पानी पड गया।
🔷 मैं उधर होकर निकला तो उस गीली जमीन पर लेट गया। मेरा आधा शरीर ही सम्पर्क में आया जिससे उतना ही स्वर्णमय बन गया। मैंने सोचा था शेष आधा शरीर युधिष्ठिर के यज्ञ से स्वर्णमय बन जायेगा, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं हुआ। इसलिए यह यज्ञ मेरे ख्याल से पूर्ण नहीं हुआ। "
🔶 यज्ञ की श्रेष्ठता उस्के बाह्य स्वरूप की विशालता में नहीं अन्तर की उत्कृष्ट त्याग वृत्ति में है। यज्ञ के साथ त्याग-बलिदान की अभूतपूर्व परम्परा जुड़ी हुई है। यही संस्कृति को धन्य बनाती है।
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026
शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...



















