मंगलवार, 31 जुलाई 2018

👉 वचन का पालन

🔶 दरभंगा में एक शंकर मिश्र नामक विद्वान् हो गये हैं। वे छोटे थे तब उनकी माँ को दूध नहीं उतरता था तो गाय रखनी पड़ी। दाई ने माता के समान प्रेम से बालक को अपना दूध पिलाया। शंकर मिश्र की माता दाई से कहा करती थी कि बच्चा जो पहली कमाई लावेगा सो तेरी होगी।

🔷 बालक बड़ा होने पर किशोर अवस्था में ही संस्कृत का उद्भत विद्वान् हो गया। राजा ने उसकी प्रशंसा सुनकर दरबार में बुलाया और उसकी काव्य रचना पर प्रसन्न होकर अत्यन्त मूल्यवान हार उपहार में दिया।

🔶 शंकर मिश्र हार लेकर माता के पास पहुँचे। माता ने उसे तुरन्त ही दाई को दे दिया। दाई ने उसका मूल्य जँचवाया तो वह लाखों रुपए का था। इतनी कीमती चीज लेकर वह क्या करती? लौटाने आई। पर शंकर मिश्र और उसकी माता अपने वचन से लौटने का तैयार न हुए। पहली कमाई के लिए जब दाई को वचन दिया जा चुका था तो फिर उसे पलटने में उनका गौरव जाता था।

🔷 बहुत दिन देने लौटाने का झंझट पड़ा रहा। अन्त में दाई ने उस धन से एक बड़ा तालाब बनवा दिया जो दरभंगा में “दाई का तालाब” नाम से अब भी मौजूद हैं।
वचन का पालन करने वाले शंकर मिश्र और बिना परिश्रम के धन को न छूने वाली दाई दोनों ही प्रशंसनीय हैं।

👉 सच्चा यज्ञ


🔶 महाराज युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ समाप्त होने पर एक अद्भुत नेवला जिसका आधा शरीर सुनहरा था यज्ञ भूमि में लोट लगाने लगा। कुछ ही समय बाद वह रुदन करके कहने लगा कि "यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ। " पाण्डवों सहित सभी उपस्थित लोगों को बड़ा आश्रर्य हुआ, पूछने पर नेवले ने बताया" कुछ समय पूर्व अमुक देश में भयंकर अकाल पड़ा।

🔷 मनुष्य भूख के मारे तड़प-तड़प कर मरने लगे। एक ब्राह्मण परिवार कई दिनों से भूखा था। एक दिन कहीं से कुछ अन्न उन्हें मिला। ब्राह्मणी ने उसकी चार रोटी बनाई। उस ब्राह्मण का यह नियम था कि भोजन से पूर्व कोई भूखा होता तो उसे भोजन कराकर तब स्वयं खाता। उस दिन भी उसने आवाज दी कि जो हमसे अधिक-भूखा-हो उसका अधिकार इस भोजन पर है, आये, वह अपना भाग ग्रहण करे। तो एक चाण्डाल भूख से तड़प रहा था, आ गया।

🔶 ब्राह्मण ने अपने हिस्से की एक रोटी सौंप दी, उससे भी तृप्त न होने पर क्रमश: पत्नी और बालक-बालिका ने भी अपने-अपने हिस्से की रोटी उसे दे दी। जब वह चाण्डाल भोजन कर चुका और उसने पानी पीकर हाथ धोये तो उससे धरती पर कुछ पानी पड गया।

🔷 मैं उधर होकर निकला तो उस गीली जमीन पर लेट गया। मेरा आधा शरीर ही सम्पर्क में आया जिससे उतना ही स्वर्णमय बन गया। मैंने सोचा था शेष आधा शरीर युधिष्ठिर के यज्ञ से स्वर्णमय बन जायेगा, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं हुआ। इसलिए यह यज्ञ मेरे ख्याल से पूर्ण नहीं हुआ। "

🔶 यज्ञ की श्रेष्ठता उस्के बाह्य स्वरूप की विशालता में नहीं अन्तर की उत्कृष्ट त्याग वृत्ति में है। यज्ञ के साथ त्याग-बलिदान की अभूतपूर्व परम्परा जुड़ी हुई है। यही संस्कृति को धन्य बनाती है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 31 July 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 16)

👉 प्रतिभा परिवर्धन के तथ्य और सिद्धांत
 

🔶 दूरदर्शी विवेकवान अपनी श्रेष्ठता को विकसित करते हैं और अपने आदर्शवादी क्रियाकलापों के आधार पर प्रामाणिक माने जाते और विश्वस्त बनते हैं। जिन्होंने उच्चस्तरीय सफलताएँ पाई, उनका अनुकरण करते और सहयोग देते असंख्यों देखे जाते हैं। इसीलिए ‘प्रतिभा महासिद्धि’ की साधना करने वाले अपने चरित्र की प्रामाणिकता को हर हालत में बनाए रहते हैं, भले ही इसके लिए अभावग्रस्त स्थिति में रहना पड़े और तात्कालिक मिल सकने वाली सफलता से वंचित रहना पड़े।
  
🔷 प्रतिभा तत्संबंधी सिद्धांतों का मनन-चिंतन करते रहने भर से हस्तगत नहीं होती, उनको स्वभाव का अंग बनाना पड़ता है। चिंतन-चरित्र और व्यवहार में उन्हें भली प्रकार समाविष्ट करना पड़ता है। यह कार्य प्रत्यक्ष क्रियान्वयन के बिना संभव नहीं होता। विचार वे ही प्रौढ़ एवं प्रखर होते हैं, जो क्रिया में उतरते रहते हैं। डायनेमो घूमता हैं तो बैटरी चार्ज होती है। विचारों और कार्यों के समन्वय से ही व्यक्तित्व का स्तर बनता है। उसी आधार पर सफलता के क्षेत्र में कुछ महत्त्वपूर्ण गौरव हस्तगत होता है। यही वह हुंडी है, जिसे किसी भी क्षेत्र में हाथों-हाथ भुनाया जा सकता है।

🔶 बड़े काम कर गुजरने वाली जन्मजात विभूतियाँ, साथ लेकर कदाचित ही कोई आते हैं। हर किसी को यह उपलब्धि अपने मनोयोग और प्रचंड प्रयास के आधार पर ही हस्तगत करनी होती है। सांसारिक दृष्टि से प्रत्यक्ष दीख पड़ने वाले बड़े कार्य भी ऐसे ही लोगों ने संपन्न किए हैं। बहुमुखी सफलताओं का श्रेय उन्हीं पर बरसा है। ऐसे ही लोग समाज को स्थिरता देते और अवांछनीय उलटे प्रचलनों को उलटकर ठीक कर दिखाते हैं। समय का कायाकल्प करके वातावरण में नवजीवन का प्राण-प्रवाह भरते ऐसे ही लोगों को देखा जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 20

👉 Soul: The Identity of Truth

🔶 If we want to know the meaning, the purpose, the nature of our life, we must know our own self, our soul. Without that we keep wandering in the infinite trap of illusion and the immensity of worldly circumstances without even having the sight of our goal.

🔷 If you want to see the light of wisdom, want to excel in the truest sense, you must first accept and ponder over the preeminence of your soul. If you want to live respectful life, learn to respect your soul. Spiritual evolution would begin and eventually lead to unification of your soul (individual self) with the Supreme Soul (God) only if you purify, enlighten your self up to virtuous levels. For that, you will have to recognize and experience the divinity hidden in your soul.

🔶 Refinement and rise from inferior to superior, evil to nobility, is possible only if you realize that your soul, your inner self is originally a reflection of the divine. Respecting your inner self, your soul-reality does not mean that you become egotist or arrogant or have some superiority complex. In fact, that would be just a contrary act, a blunder of your ignorance. So be careful and understand that the respect of your own self means honor of your soul, your eternal impersonal self.

🔷 You should attempt to see the light of divinity indwelling in it, see the presence of God in it and worship it by sublime illumination of your heart, mind and conduct. Remembering it every moment should remind you that you are breathing in the presence of God and should edify your aspirations, your thoughts, your deeds accordingly.

📖 Akhand Jyoti, June 1942

👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (भाग 1)

🔶 निर्माण आन्दोलन का प्रथम चरण आत्म-निर्माण है। उस दिशा में कदम बढ़ाने के लिए किसी भी स्थिति के व्यक्ति को कुछ भी कठिनाई अनुभव नहीं होनी चाहिए। पर्दे में जकड़ी स्त्रियाँ, जेल में बन्द कैदी, चारपाई पर पड़े रोगी और अपंग असमर्थ व्यक्ति भी आज जिस स्थिति में हैं उससे ऊँचे उठने, आगे बढ़ने में उन्हें कुछ भी कठिनाई अनुभव नहीं होनी चाहिए। मनोविकारों को ढूँढ़ निकालने और उनके विरुद्ध मोर्चा खड़ा कर देने में सांसारिक कोई विध्न बाधा अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकती। दैनिक जीवन में निरन्तर काम आने वाली आदतों को परिष्कृत बनाने का प्रयास भी ऐसा है, जिनके न बन पड़ने का कोई कारण नहीं।

🔷 आलस्य में समय न गँवाना, हर काम नियत समय पर नियमित रूप से उत्साह और मनोयोग पूर्वक करने की आदत डाली जाय तो प्रतीत होगा अपना क्रिया कलाप कितना उत्तम, कितना व्यवस्थित, कितना अधिक सम्पन्न हो रहा है। प्रातःकाल अपनी दिनचर्या का निर्धारण कर लेना और पूरी मुस्तैदी से उसे पूरा करना, आलस्य प्रमाद को आड़े हाथों लेना, व्यक्तित्व निर्माण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। जल्दी सोने जल्दी उठने की एक छोटी सी ही आदत को लें तो प्रतीत होगा कि प्रातःकाल का कितना बहुमूल्य समय मुफ्त ही हाथ लग जाता है और उसका जिस भी कार्य में उपयोग किया जाय उसमें सफलता का कैसा स्वर्ण अवसर मिलता है। क्या व्यायाम, क्या अध्ययन, क्या भजन, कुछ भी कार्य प्रातःकाल किया जाय चौगुना प्रतिफल उत्पन्न करेगा।

🔶 जो लोग देर में सोते और देर में उठते हैं वे यह नहीं जानते कि प्रातःकाल का ब्रह्म मुहूर्त इतना बहुमूल्य है जिसे हीरे मोतियों से भी नहीं तोला जा सकता, नियमित दिनचर्या का निर्धारण और उस पर हर दिन पूरी मुस्तैदी के साथ आचरण, देखने में यह बहुत छोटी बात मालूम पड़ती है पर यदि उसका परिणाम देखा जाय तो प्रतीत होगा कि हमने एक चौथाई जिन्दगी को बर्बादी से बचाकर कहने लायक उपलब्धियों में नियोजित कर लिया। अस्त-व्यस्त और अनियमित व्यक्ति यों साधारण ढील पोल के दोषी ठहराए जाते हैं, पर बारीकी से देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि वे लगभग आधी जिन्दगी जितना बहुमूल्य समय नष्ट कर देते है जिसका यदि क्रमबद्ध उपयोग हो सका होता तो प्रगति की कितनी ही कहने लायक उपलब्धियाँ सामने आती। यदि एक घण्टा रोज कोई व्यक्ति उपयोगी अध्ययन में लगाता रहे तो कुछ ही समय में वह ऐसा ज्ञानवान बन सकता है जिसकी विद्या बुद्धि पर स्पर्धा की जा सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 आत्म-परिष्कार बनाम साधना

🔶 आज जन-जीवन एक विडम्बना मात्र बनकर रह गया है, जिसे ज्यों-त्यों करके काटना पड़ता है। निर्वाह की आवश्यकता जुटाने, गुत्थियों को सुलझाने और प्रतिकूलताओं के अनुकूलन में माथा-पच्ची करते-करते मौत के दिन पूरे हो जाते हैं। अभावों और संकटों से पीछा नहीं छूटता। कई बार तो गाड़ी इतनी भारी हो जाती है कि खींचे नहीं खिंचती। फलत: प्रयत्नपूर्वक अथवा बिना प्रयत्न ही अकाल मृत्यु के मुँह में प्रवेश करना पड़ता है। नीरस और निरर्थक जीवन एक ऐसा अभिशाप है, जिसे दुर्भाग्य के रूप में स्वीकार करना पड़ता है, किन्तु लगता यही रहता है-बेकार जन्मे और निरर्थक जिये। साधारण जीवन का यही स्वरूप है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में तो अन्य प्राणियों से भी गया-बीता प्रतीत होता है।
  
🔷 असामान्य जीवन इससे आगे की बात है। सफल, समर्थ और समुन्नत स्तर के व्यक्ति सौभाग्यशाली दीखते हैं और उनकी स्थिति प्राप्त करने के लिए मन ललचाता है। भौतिक सम्पन्नता से सम्पन्न और आत्मिक विभूतियों के धनी लोगों की-न प्राचीन काल में कमी थी और न अब है। पिछड़े  और समुन्नत वर्गों के व्यापक अन्तर देखने से आश्चर्य होता है कि एक जैसी काया में रहने वाले मनुष्यों के बीच  इतना ऊँच और नीच होने का कारण क्या हो सकता है? स्रष्टïा का पक्षपात और प्रकृति का अन्तर कहने से भी काम नहीं चलता, क्योंकि दोनों को सुव्यवस्थित एवं सुनियोजित करने में कहीं  रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं है। यह व्यतिक्रम रहा होता तो ग्रह-नक्षत्र अपनी धुरी पर न घूमते, परमाणुओं के घटक उच्छृंखलता बरतते और परस्पर टकराकर उसी मूल स्थिति में लौट गए होते, जिसमें कि महत्त्वत्व अपनी अविज्ञात स्थिति में अनन्त काल से पड़ा था। फलस्वरूप न यह सृष्टिï बन पाती और न एक दिन चलती-ठहरती। यह सब कुछ परिपूर्ण व्यवस्था के अनुरूप चल रहा है।
  
🔶 फिर मनुष्यों के बीच पाये जाने वाले अन्तर का क्या कारण है? इसका सुनिश्चित उत्तर यही है कि जीवन की उथली परतों तक ही जिनका वास्ता रहा उन्हें छिलका ही हाथ लगा किन्तु जिन्होंने नीचे उतरने की चेष्टïा की उन्हें एक के बाद एक बहुमूल्य उपलब्धि भी मिलती चली गईं। गहराई में उतरने को अध्यात्म की भाषा में साधना कहते हैं। साधना किसकी? इसका उत्तर है- जीवन की। जीवन प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है, जो उसकी जितनी सदुपयोग साधना कर लेता है, वह उतना ही कृत-कृत्य हो जाता है। जीवन का मूल्य, महत्त्व और  उसकी उपलब्धि न समझना पाना ही वह अभिशाप है, जिसके कारण गई-बीती परिस्थितियों में दिन गुजारने पड़ते हैं। यदि स्थिति को बदल दिया जाय, जीवन देवता की अनन्त सामथ्र्यों तथा उसके वरदानों की असीम शृंखला को समझा जा सके, तो प्रतीत होगा कि स्रष्टïा ने बीज रूप से वैभव का भाण्डागार उसी मानवीय काय कलेवर के भीतर सॅजोया हुआ था। भूल इतनी ही होती रही कि न उसे खोजा गया और न काम में लाया गया। इस भूल का परिमार्जन ही आत्म-ज्ञान है। यह जागृति जब सक्रिय बनती है, तो आत्मोत्कर्ष के लक्षण तत्काल दृष्टिïकोण होने लगते हैं। इसी आत्म परिष्कार की प्रक्रिया का नाम साधना है।
  
🔷 साधना से सिद्धि का सिद्धान्त शाश्वत सत्य की तरह स्पष्टï है। न उसमें सन्देह की गुंजाइश है और न ही विवाद की। भौतिक जगत्ï के विभिन्न क्षेत्रों में साधनारत पुरुषार्थी अनेकानेक सफलताएँ अर्जित करते देखे जाते हैं। जीवन भी एक ऐसा क्षेत्र है, जिसे जड़-जगत्ï के किसी भी घटक एवं वर्ग से अत्याधिक महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 30 जुलाई 2018

👉 वेश की लाज

🔶 एक बहरूपिया राजा के दरबार में वेश बदल-बदल कर कई बार गया, परन्तु राजा ने उसे हर बार पहचान लिया और कहा कि जब तक तुम हमें ऐसा रूप न दिखाएँगे जो पहचानने में न आवे तब तक इनाम न मिलेगा। यह सुन वह चला गया और कुछ समय पश्चात् साधु का रूप बन, महल के पास ही धूनी रमा दी। न खाना, न पीना, भेंट की ओर देखना भी नहीं। राजा ने भी उस महात्मा की प्रशंसा सुनी तो वह भी भेंट लेकर उपस्थित हुआ। उसने भेंट के सच्चे मोती आग में झोंक दिये।

🔷 राजा उसकी त्याग वृत्ति देख भक्ति भाव से प्रशंसा करते हुए चले गये। दूसरे दिन बहरूपिया राज सभा में उपस्थित हुआ और अपने साधु बनकर राजा को धोखा देने की चर्चा करते हुए अपना इनाम माँगा। राजा ने प्रसन्न हो, इनाम दिया और पूछा-तुमने वे मोती, जो इनाम के मूल्य से भी अधिक मूल्यवान थे, आग में क्यों झोंक दिये। यदि उन्हें ही लेकर चले जाते तो बहुत लाभ में रहते? उसने उत्तर दिया-यदि मैं ऐसा करता तो इससे साधु-वेश कलंकित होता। साधुवेश को कलंकित करके धन लेने का अनैतिक कार्य कोई आस्तिक भला कैसे कर सकता हैं?”

📖 अखण्ड ज्योति से

👉 साधू की बात

🔷 एक बार एक राजा की सेवा से प्रसन्न होकर एक साधू नें उसे एक ताबीज दिया और कहा की राजन इसे अपने गले मे डाल लो और जिंदगी में कभी ऐसी परिस्थिति आये की जब तुम्हे लगे की बस अब तो सब ख़तम होने वाला है, परेशानी के भंवर मे अपने को फंसा पाओ, कोई प्रकाश की किरण नजर ना आ रही हो, हर तरफ निराशा और हताशा हो तब तुम इस ताबीज को खोल कर इसमें रखे कागज़ को पढ़ना, उससे पहले नहीं!

🔶 राजा ने वह ताबीज अपने गले मे पहन लिया! एक बार राजा अपने सैनिकों के साथ शिकार करने घने जंगल मे गया! एक शेर का पीछा करते करते राजा अपने सैनिकों से अलग हो गया और दुश्मन राजा की सीमा मे प्रवेश कर गया, घना जंगल और सांझ का समय, तभी कुछ दुश्मन सैनिकों के घोड़ों की टापों की आवाज राजा को आई और उसने भी अपने घोड़े को एड लगाई, राजा आगे आगे दुश्मन सैनिक पीछे पीछे! बहुत दूर तक भागने पर भी राजा उन सैनिकों से पीछा नहीं छुडा पाया!

🔷 भूख प्यास से बेहाल राजा को तभी घने पेड़ों के बीच मे एक गुफा सी दिखी, उसने तुरंत स्वयं और घोड़े को उस गुफा की आड़ मे छुपा लिया! और सांस रोक कर बैठ गया, दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज धीरे धीरे पास आने लगी! दुश्मनों से घिरे हुए अकेले राजा को अपना अंत नजर आने लगा, उसे लगा की बस कुछ ही क्षणों में दुश्मन उसे पकड़ कर मौत के घाट उतार देंगे! वो जिंदगी से निराश हो ही गया था, की उसका हाथ अपने ताबीज पर गया और उसे साधू की बात याद आ गई! उसने तुरंत ताबीज को खोल कर कागज को बाहर निकाला और पढ़ा! उस पर्ची पर लिखा था — ”यह भी कट जाएगा “

🔶 राजा को अचानक ही जैसे घोर अन्धकार मे एक ज्योति की किरण दिखी, डूबते को जैसे कोई सहारा मिला! उसे अचानक अपनी आत्मा मे एक अकथनीय शान्ति का अनुभव हुआ! उसे लगा की सचमुच यह भयावह समय भी कट ही जाएगा, फिर मे क्यों चिंतित होऊं! अपने प्रभु और अपने पर विश्वासरख उसने स्वयं से कहा की हाँ, यह भी कट जाएगा!

🔷 और हुआ भी यही, दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज पास आते आते दूर जाने लगी, कुछ समय बाद वहां शांति छा गई! राजा रात मे गुफा से निकला और किसी तरह अपने राज्य मे वापस आ गया!

👉 आज का सद्चिंतन 30 July 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 July 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 15)

👉 प्रतिभा परिवर्धन के तथ्य और सिद्धांत

🔷 प्रतिभाएँ एकाकी बढ़कर अपने अग्रगमन की क्षमता का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। फिर सर्वत्र उनकी मनस्विता का लोहा माना जाने लगता है। दूसरे लोग भी उनका अनुकरण करते हैं, जिनकी जिम्मेदारियाँ भारी हैं, वे ऐसे ही लोगों को तलाश करते रहते हैं। प्रामाणिकता की परख होने पर सब ओर से एक-से-बढ़कर एक भारी-भरकम जिम्मेदारियाँ उनके ऊपर आग्रहपूर्वक डाली जाने लगती हैं। वे उन्हें स्वीकार करते और जो कार्य लिया गया है, उसे सर्वांगपूर्ण ढंग से संपन्न कर दिखाते हैं।
  
🔶 रेल का इंजन एकाकी चलता है। स्वयं दौड़ता है और अपने साथ भरे डिब्बों की लंबी शृंखला को घसीटते हुए निर्धारित लक्ष्य की दिशा में पटरी पर दौड़ता चला जाता है। सर्वविदित है कि डिब्बों की तुलना में इंजन को अधिक महत्त्व मिलता है। अधिक मूल्यांकन भी होता है। यह और कुछ नहीं साहस भरी व्यवस्था का परिचय देने वाली ऊर्जा की ही परिणति है। प्रतिभाओं में यह सद्गुण उनके द्वारा स्वउपार्जित स्तर का, बड़ी मात्रा में पाया जाता है। वे औरों का मुँह ताकते हुए नहीं बैठे रहते, वरन आगे बढ़कर औरों को अपने चुंबकत्व के कारण जोड़ते और साथ चलने के लिए बाधित करते हैं। सफलताओं का यही स्रोत है।
  
🔷 यों प्रतिभा का दुरुपयोग भी हो सकता है। धन का, बल का, सौंदर्य का, कौशल का, नियोजन यदि भ्रष्ट-चिंतन और दुष्ट आचरण में किया जाए तो वैसा भी हो सकता है। आतंकवादी, अनाचारी, उच्छृंखल, उद्धत लोग प्राय: वैसा करते भी हैं। इतने पर भी यह निश्चित है कि कोई इस आधार पर न तो स्थिर प्रगति कर सकता है और न ही कोई ऐसी परंपरा पीछे छोड़ सकता है, जिसे सराहा जा सके। आज नहीं तो कल-परसों ऐसे लोग आत्मप्रताड़ना, लोकभर्त्सना से लेकर राजदंड और दैवी प्रकोप के भाजन बनते ही हैं। लानत और घृणा तो भीतर-बाहर से उन पर निरंतर बरसती ही रहती है। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 19

👉 Thirst for What?

🔷 Instead of giving content, the worldly desires – even if fulfilled, always lead to newer ones with greater thirst. It is said that a human life is just a sojourn in the endless journey of the individual self in its quest for completeness. However, if a human being gets rid of all cravings then he can attain absolute evolution in this life itself. Trisna (thirst for fulfillment of desires, ambitions) is the root cause of all thralldoms, which entraps the individual self in the cycle of life and death. How a person enslaved by cravings would ever be liberated? Salvation means freedom from all worldly desires and expectations. Those having quest for realization of
absolute knowledge, truth should best begin with a vigilant watch on their own aspirations and control them prudently.

🔶 It is said that inner content is the biggest fulfillment. No amount of wealth could match it. One may be free and independent in worldly terms, but in reality, he, like most of us is the slave of his mind. The one whose mind is captured by trisna cannot be free for any moment. Even the most affluent man of the world is like a beggar because of his trisna: because he would always expect something from the world in terms of greater success, wealthier resources and what not. So if you want to rise and make proper use of your life, you will have to restrain your desires, selfish ambitions. Don’t escape from your duties, you must be constructive and must transact your duties sincerely; only you leave out the expectations or attachments with the results. Every action has a corresponding reaction here. The Law of appropriate consequences of your karma is absolute.

🔷 So don’t be desperate for any result, don’t think that the world or the circumstance would conform to your expectations. Renounce your trisna and be a free being…

📖 Akhand Jyoti, Mar. 1942

👉 तप में प्रमाद न करें


🔷 तप से प्रजापति ने इस सृष्टि को सृजा। सूर्य तपा और संसार को तपाने में समर्थ हुआ। तप के बल से शेष पृथ्वी का वजन उठाते हैं। शक्ति और वैभव का उदय तप से ही होता है।

🔶 तपाने पर धातुओं के उपकरण ढलते हैं। सोने के आभूषण बनते हैं। बहुमूल्य रस, भस्में तपाये जाने पर ही अमृतोपम गुण दिखाती हैं।

🔷 तपस्वी बलवान् बनता है, विद्वान् और मेधावी बनता है। ओजस्, तेजस् और वर्चस् प्राप्त करने के लिए तपश्चर्या का अवलम्बन लेना पड़ता है।

🔶 विलासी, आलसी और कायर मरते हैं। प्रतिभा गवां बैठते हैं। प्रामाणिकता न रहने पर उन्हें लक्ष्मी छोड़कर चली जाती है। वे पराधीन की भाँति जीते और दीन- दुर्बल की तरह उपहासास्पद बनते हैं।

🔷 अस्तु, तपस्वी होना चाहिए। तप में प्रमाद नहीं होना चाहिए। तपस्वी को रोको मत। तपस्वी को डराओ मत।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अन्धकार को दीपक की चुनौती

🔷 अन्धकार की अपनी शक्ति है। जब उसकी अनुकूलता का रात्रिकाल आता है, तब प्रतीत होता है कि समस्त संसार को उसने अपने अञ्चल में लपेट लिया। उसका प्रभाव- पुरुषार्थ देखते ही बनता है। आँखें यथा स्थान बनी रहती हैं। वस्तुएँ भी अपनी जगह पर रखी रहती हैं, किन्तु देखने लायक विडम्बना यह है कि हाथ को हाथ नहीं सूझ पड़ता। पैरों के समीप रखी हुई वस्तुएँ ठोकर लगने का कुयोग बना देती हैं।

🔶 अन्धकार डरावना होता है। उसके कारण एकाकीपन की अनुभूति होती है और रस्सी का साँप, झाड़ी का भूत बनकर खड़ा हो जाता है। नींद को धन्यवाद है कि वह चिरस्मृति के गर्त में धकेल देती है, अन्यथा जगने पर करवटें बदलते वह अवधि पर्वत जैसी भारी पड़े।

🔷 इतनी बड़ी भयंकरता की सत्ता स्वीकार करते हुए भी दीपक की सराहना करनी पड़ती है, जो जब अपनी छोटी सी लौ प्रज्वलित करता है, तो स्थिति में कायाकल्प जैसा परिवर्तन हो जाता है। उसकी धुंधली आभा भी निकटवर्ती परिस्थिति तथा वस्तु व्यवस्था का ज्ञान करा देती है। वस्तु बोध की आधी समस्या हल हो जाती है।

🔶 दीपक छोटा ही सही अल्प मूल्य का सही, पर वह प्रकाश का अंशधर होने के नाते सुदूर फैलाव को चुनौती देता है और निराशा के वातावरण को आशा और उत्साह से भर देता है। इसी को कहते हैं नेतृत्व।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 29 जुलाई 2018

👉 छोटा और तुच्छ काम

🔶 काम वे छोटे गिने जाते है जो फूहड़पन और बेसलीके से किये जाते हैं। यदि सावधानी, सतर्कता और खूबसूरती के साथ, व्यवस्था पूर्वक कोई काम किया जाय तो वही अच्छा, बढ़ा और प्रशंसनीय बन जाता है। चरखा कातना कुछ समय पूर्व विधवाओं और बुढ़ियाओं का काम समझा जाता था, उसे करने में सधवायें और युवतियाँ सकुचाती थी। पर गाँधी जी ने जब चरखा कातना एक आदर्शवाद के रूप में उपस्थित किया और वे उसे स्वयं कातने लगे तो वही छोटा समझा जाने वाला काम प्रतिष्ठित बन गया। चरखा कातने वाले स्त्री पुरुषों को देश भक्त और आदर्शवादी माना जाने लगा।

🔷 संसार में कोई काम छोटा नहीं। हर काम का अपना महत्व है। पर उसे ही जब लापरवाही और फूहड़पन के साथ किया जाता है तो छोटा माना जाता है और उसके करने वाला भी छोटा गिना जाता है।

👉 कड़वी बहु

🔶 जानकी के बहु बेटे शहर में बस चुके थे लेकिन उसका गाँव छोड़ने का मन नहीं हुआ इसलिए अकेले ही रहती थी। वह रोजाना की तरह मंदिर जा कर आ रही थी। रास्ते मे उसका संतुलन बिगड़ा और गिर पड़ी।

🔷 गाँव के लोगों ने उठाया, पानी पिलाया और समझाया 'अब इस अवस्था में अकेले रहना उचित नहीं। किसी भी बेटे के पास चली जाओ।' जानकी ने भी परिस्थिति को स्वीकार कर बेटे बहुओं को ले जाने के लिए कहने हेतु फोन करने का मन बना लिया।

🔶 जानकी की तीन बहुएँ थी। एक बड़ी अति आज्ञाकारी मंझली मध्यम आज्ञाकारी और छोटी कड़वी। जानकी अति धार्मिक थी। कोई व्रत त्यौहार आता पहले से ही तीनों बहुओं को सावचेत कर देती। 'अति' खुशी खुशी व्रत करती। माध्यम भी मान जाती थी लेकिन कड़वी विरोध पर उतर जाती।

🔷 "आप हर त्योहार पर व्रत रखवा कर उसके आनंद को कष्ट में परिवर्तित कर देती हैं।" "तेरी तो जुबान लड़ाने की आदत है। कुछ व्रत तप कर ले। आगे तक साथ जाएँगे।"
दोनों की किसी न किसी बात पर बहस हो जाती। गुस्से में एक दिन जानकी ने कह दिया था।

🔶 "तू क्या समझती है! बुढापे में मुझे तेरी जरूरत पड़ने वाली है। तो अच्छी तरह समझ ले। सड़ जाऊँगी लेकिन तेरे पास नहीं आऊँगी।" सबसे पहले उसने अति को फोन किया "गिर गई हूँ। आजकल कई बार ऐसा हो गया है। सोचती हूँ तुम्हारे पाया ही आजाउँ।"

🔷 "नवरात्र में? अभी नहीं माँ जी। नंगे पाँव रह रही हूं आजकल। किसी का छुआ भी नहीं खाती।" मध्यम को भी फोन किया लेकिन उसने भी बहाना कर टाल दिया।

🔶 जब अति और मध्यम ही टाल चुकी तो कड़वी को फोन करने का कोई फायदा नहीं था और अहम अभी टूटा था लेकिन खत्म नहीं हुआ था। फोन पर हाथ रख आने वाले कठिन समय की कल्पना करने लगी थी। तभी फोन की घण्टी बजी। आवाज़ से ही समझ गई थी कड़वी है।

🔷 "गिर गये ना? आपने तो बताया नहीं लेकिन मैंने भी जासूस छोड़ रखे हैं। पोते को भेज रही हूँ लेने।"

🔶 "क्या तुझे मेरे शब्द याद नहीं?"

🔷 "जिंदगी भर नहीं भूलूँगी। आपने कहा था सड़ जाऊँगी तो भी तेरे पास नहीँ आऊँगी। तभी मैंने व्रत ले लिया था इस बुढ़िया अम्मा को सड़ने नहीं देना है। मेरा तप अब शुरू होगा।"

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 29 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...