गुरुवार, 19 जुलाई 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 6)

👉 प्राणवान् प्रतिभाओं की खोज

🔷 त्रेता में एक ओर रावण का आसुरी आतंक छाया हुआ था, दूसरी ओर रामराज्य वाले सतयुग की वापसी, अपने प्रयास-पुरुषार्थ का परिचय देने के लिए मचल रही थी। इस विचित्रता को देखकर सामान्यजन भयभीत थे। राम के साथ लड़ने के लिए उन दिनों के एक भी राजा की शासकीय सेनाएँ आगे बढ़कर नहीं आईं। फिर भी हनुमान्, अंगद के नेतृत्व में रीछ-वानरों की मंडली जान हथेली पर रख आगे आई और समुद्र-सेतु बाँधने, पर्वत उखाड़ने लंका का विध्वंस करने में समर्थ हुई। राम ने उनके सहयोग की भाव भरे शब्दों में भूरि-भूरि प्रशंसा की। इस सहायक समुदाय में गीध, गिलहरी, केवट, शबरी जैसे कम सामर्थ्यवानों का भी सदा सराहने योग्य सहयोग सम्मिलित रहा।

🔶 महाभारत के समय भी ऐसी ही विपन्नता थी। एक ओर कौरवों की विशाल संख्या वाली सुशिक्षित और समर्थ सेना थी, दूसरी ओर पाण्डवों का छोटा-सा अशक्त समुदाय। फिर भी युद्ध लड़ा गया। भगवान ने सारथी की भूमिका निबाही और अर्जुन ने गाण्डीव से तीर चलाए। जीत शक्ति की नहीं, सत्य की, नीति की, धर्म ही हुई। इन उदाहरणों में गोवर्धन उठाने वाले ग्वाल-बालों का सहयोग भी सम्मिलित है। बुद्ध की भिक्षु मंडली और गाँधी की सत्याग्रही सेना भी इसी तथ्य का स्मरण दिलाती है।

🔷 प्रतिभा ने नेतृत्व सँभाला, तो सहयोगियों की कमी नहीं रही। संसार के हर कोने से, हर समय में ऐसे चमत्कारी घटनाक्रम प्रकट होते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि सत्य की शक्ति अजेय है। उच्चस्तरीय प्रतिभाएँ उसे गंगावतरण काल के जैसे प्रयोजन में और परशुराम जैसे ध्वंस प्रयोजनों में प्रयुक्त करती रही हैं। महत्त्व घटनाक्रमों और साधनों का नहीं रहा, सदैव मूर्द्धन्य प्रतिभाओं ने ही महान समस्याओं का हल निकालने में प्रमुख भूमिका निबाही है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 7

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 July 2018

👉 आज का सद्चिंतन 19 July 2018


👉 विभूतियाँ महाकाल के चरणों में समर्पित करें

🔷 प्रचारात्मक, संगठनात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक चतुर्विधि कार्यक्रमों को लेकर युग निर्माण योजना क्रमशः अपना क्षेत्र बनाती और बढ़ाती चली जायेगी। निःसन्देह इसके पीछे ईश्वरीय इच्छा और महाकाल की विधि व्यवस्था काम कर रहीं है, हम केवल उसके उद्घोषक मात्र है। यह आन्दोलन न तो शिथिल होने वाला है, न निरस्त। हमारे तपश्चर्या के लिये चले जाने के बाद वह घटेगा नहीं - हजार लाख गुना विकसित होगा। सो हममें से किसी को शंका कुशंकाओं के कुचक्र में भटकने की अपेक्षा अपना वह दृढ़ निश्चय परिपक्व करना चाहिए कि विश्व का नव निर्माण होना ही है और उससे अपने अभियान को, अपने परिवार को अति महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भूमिका का सम्पादन करना ही है।

🔶 परिजनों को अपनी जन्म-जन्मान्तरों की उस उत्कृष्ट सुसंस्कारिता का चिंतन करना चाहिए जिसकी परख से हमने उन्हें अपनी माला में पिरोया है। युग की पुकार, जीवनोद्देश्य की सार्थकता, ईश्वर की इच्छा और इस ऐतिहासिक अवसर की स्थिति, महामानव की भूमिका को ध्यान में रखते हुए कुछ बड़े कदम उठाने की बात सोचनी चाहिए। इस महाअभियान की अनेक दिशाएँ हैं जिन्हें पैसे से, मस्तिष्क से, श्रम सीकरों से सींचा जाना चाहिए। जिसके पास जो विभूतियाँ हैं उन्हें लेकर महाकाल के चरणों में प्रस्तुत होना चाहिए।

🔷 लोभ, मोह के अज्ञान और अंधकार की तमिस्रा को चीरते हुए हमें आगे बढ़ना चाहिए और अपने पास जो हो उसका न्यूनतम भाग अपने और अपने परिवार के लिए रख कर शेष को विश्व मानव के चरणों में समर्पित करना चाहिए। नव निर्माण की लाल मशाल में हमने अपने सर्वस्व का तेल टपका कर उसे प्रकाशवान् रखा है। अब परिजनों की जिम्मेदारी है कि वे उसे जलती रखने के लिए हमारी ही तरह अपने अस्तित्व के सार तत्व को टपकाएँ। परिजनों पर यही कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व छोड़कर इस आशा के साथ हम विदा हो रहे हैं कि महानता की दिशा में कदम बढ़ाने की प्रवृत्ति अपने परिजनों में घटेगी नहीं बढ़ेगी ही।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जून 1971, पृष्ठ 62
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/June/v1.62

👉 देने वाला घाटे में नहीं रहता

🔷 प्रकृति का नियम है—जो देता है वह पाता है; जो रोकता है वह सड़ता है। छोटी पोखर का पानी घटता, सड़ता और सूखता है, किन्तु झरने में सदा स्वच्छता गतिशीलता बनी रहती है और वह अक्षय भी बना रहता है। जो देने से इनकार करेगा वह गतिशीलता के नियम का उल्लंघन करके संचय में निरत होगा, उसे थोड़ा ही मिलेगा। अजस्र अनुदान पाने की पात्रता से उसे वंचित ही रहना पड़ेगा।

🔶 धरती अपना जीवन-तत्व वनस्पति को देती है। अनादि काल से यह क्रम चल रहा है। धरती का कोष घटा नहीं, वनस्पति की सड़न से बना खाद और वर्षा का जल उसका भण्डार भरते चले आ रहे हैं। धरती को देते रहने की साध उसकी मूर्खता नहीं है—जो देती है, प्रकृति उसकी पूरी तरह भरपाई करती रहती है।

🔷 वृक्ष फल-फूल, पत्ते प्राणियों को देते हैं। जड़ें गहराई से लाकर उनकी क्षति पूर्ति करती हैं। समुद्र बादलों को देता है, उस घाटे को नदियाँ अपना जल देकर पूरा किया करती हैं। बादल बरसते हैं उन्हें समुद्र कं गाल नहीं बनने देता। हिमालय अपनी बर्फ गला कर नदियों को देता हैं— नदियाँ जमीन को खींचती हैं। हिमालय पर बर्फ जमने का क्रम प्रकृति ने जारी रखा है, ताकि नदियों को जल देते रहने की उसकी दान वीरता में कमी न आने पावे।

🔶 आज का दिया हुआ भविष्य में असंख्य गुना होकर मिलने वाला है। कब मिलेगा इसकी तिथियाँ न गिनो। विश्वास रख देने वाला खाली नहीं होता। प्रकृति उसकी भरपाई पूरी तरह कर देती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1974 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1974/July/v1

बुधवार, 18 जुलाई 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 July 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 5)

👉 प्राणवान् प्रतिभाओं की खोज

🔷 बड़े कामों को बड़े शक्ति केंद्र ही संपन्न कर सकते हैं। दलदल में फँसे हाथी को बलवान हाथी ही खींचकर पार करते हैं। पटरी से उतरे इंजन को समर्थ क्रेन ही उठाकर यथा स्थान रखती हैं। उफनते समुद्र में से नाव खे लाना, साहसी नाविकों से ही बन पड़ता है। समाज और संसार की बड़ी समस्याओं को हल करने के लिए, ऐसे ही वरिष्ठ प्रतिभावानों की आवश्यकता पड़ती है। पुल, बाँध, महल, किले जैसे निर्माणों में मूर्द्धन्य इंजीनियरों की आवश्यकता पड़ती है। पेचीदा गुत्थियों को सुलझाना किन्हीं मेधावियों से ही बन पड़ता है। प्रतिभाएँ वस्तुतः ऐसी संपदाएँ हैं, जिनसे न केवल प्रतिभाशाली स्वयं भरपूर श्रेय अर्जित करते हैं, वरन् अपने क्षेत्र समुदाय और देश की अति विकट दीखने वाली उलझनों को भी सुलझाने में सफल होते हैं। इसी कारण भावनावश ऐसे लोगों को देवदूत तक कहते हैं।
  
🔶 आड़े समय में इन उच्चस्तरीय प्रतिभाओं की ही आवश्यकता होती है। उन्हीं को खोजा, उभारा और खरादा जाता है। विश्व के इतिहास में ऐसे ही महामानवों की यशगाथा स्वर्णिम अक्षरों में लिखी मिलती है। संसार के अनेक सौभाग्यों और सुंदरताओं में अधिक मूर्द्धन्य महाप्राणों के व्यक्तित्व ही सबसे अधिक चमकते हैं। वे अपनी यशगाथा से असंख्यों का, अनंतकाल तक मार्गदर्शन करते रहते हैं। स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि के नाम से आध्यात्मिक भाषा में जिन महान उपलब्धियों का अलंकारिक रूप से वर्णन किया जाता है, उनका सारतत्त्व वस्तुतः ऐसे ही महामनीषियों को करतलगत होता है। दूसरे लोग पूजा-पाठ के सहारे कुछ मिलने की आशा करते हैं, पर मनस्वी, तेजस्वी और ओजस्वी ऐसे कर्मयोग की साधना में ही निरत रहते हैं, जो उनके व्यक्तित्व को प्रामाणिक और कर्तृत्त्व को ऊर्जा का उद्गम स्रोत सिद्ध कर सके।
  
🔷 वर्तमान समय विश्व इतिहास में अद्भुत एवं अभूतपूर्व स्तर का है। इसमें एक ओर महाविनाश का प्रलयंकर तूफान अपनी प्रचंडता का परिचय दे रहा है, तो दूसरी ओर सतयुगी नवनिर्माण की उमंगें भी उछल रही हैं। विनाश और विकास एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं, तो भी उनका एक ही समय में अपनी-अपनी दिशा में चल सकना संभव है। इन दिनों आकाश में सघन तमिस्रा का साम्राज्य है, तो दूसरी ओर ब्रह्ममुहूर्त का आभास भी प्राची में उदीयमान होता दीख पड़ता है। इन दोनों के समन्वय को देखते हुए ही अपना समय युगसंधि का समय माना गया है। ऐसे अवसरों पर किन्हीं प्रखर-प्राणवानों को ही अपनी सही भूमिका निभानी पड़ती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 6

👉 Who is Religious?

🔷 Love, compassion, generosity, kindness, devotion, zeal, honesty, truthfulness, unflinching faith in divine values, etc – are the natural virtues of the soul. Their presence in a person is the sign of his/her spirituality. These alone are the source of spiritual elevation. These are also the perennial means of inner strength. Your endeavors for cultivating these qualities in your character must continue with greater intensity till your personality is fully imbibed with them. One who achieves this, he/she alone is truly spiritual and religious; he/she alone is worthy of meeting God – being beatified by thy grace.

🔶 Devotion of God is not confined to a specific religious cult or rituals. It lies in the deepest core of the inner emotions. Those who chant God’s name need not be religious; truly religious are those who follow the divine disciplines, adopt divine values in their conduct. Guiding the path to unification of the soul with God – inculcation of divinity in the human-self, is the foundational purpose of religion. Blessed are those who grasp this noble truth of religion and devotion.

🔷 Those who have reached this state of devotion would deserve attaining the eternal light of ultimate knowledge. They can realize God in their pure hearts and experience the absolute bliss forever…

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1941

👉 स्वार्थी जीवन मृत्यु से बुरा है।

🔶 यूनान के संत सुकरात कहा कहते थे कि “यह पेड़ और आरण्य मुझे कुछ नहीं सिखा सकते, असली शिक्षा तो मुझे सड़कों पर मिलती है।” उनका तात्पर्य यह था कि दुनिया से अलग होकर एकान्त जीवन बिताने से न तो परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है और न आत्मोन्नति हो सकती है। अपनी और दूसरों की भलाई के लिए संत पुरुषों को समाज में भरे बुरे लोगों के बीच में अपना कार्य जारी रखना चाहिये।

🔷 संत सुकरात जीवन भर ऐसी ही तपस्या करते रहे। वे गलियों में, चौराहों पर, हाट बाजारों में, दुकानों और उत्सवों में बिना बुलाये पहुँच जाते और बिना पूछे भीड़ को संबोधित करके अपना व्याख्यान शुरू कर देते। उनका प्रचार तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों और अनीतिपूर्ण शासन के विरुद्ध होता, उनके अन्तःकरण में सत्य था। सत्य में बड़ी प्रभावशाली शक्ति होती है। उससे अनायास ही लोग प्रभावित होते हैं।

🔶 उस देश के नवयुवकों पर सुकरात का असाधारण असर पड़ा, जिससे प्राचीन पंथियों और अनीतिपोषक शासकों के दिल हिलने लगे, क्योंकि उनके चलते हुए व्यापार में बाधा आने की संभावना थी। सुकरात को पकड़ लिया गया, उन पर मुकदमा चला जिसमें दो इल्जाम लगाये गए। 1. प्राचीन प्रथाओं का खंडन करना, 2. नवयुवकों को बरगलाना। इन दोनों अपराधों में विचार करने के लिये न्याय सभा बैठी, सभासदों में से 220 की राय छोड़ देने की थी और 281 की राय मृत्यु दंड देने की हुई। इस प्रकार बहुमत से मृत्यु का फैसला हुआ। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि वह देश छोड़ कर बाहर चले जायँ या व्याख्यान देना, विरोध करना बन्द कर दे तो मृत्यु की आज्ञा रद्द कर दी जायेगी।

🔷 सुकरात ने मुकदमे की सफाई देते हुए कहा-”कानून मुझे दोषी ठहराता है। तो भी मैं अपने अन्तरात्मा के सामने निर्दोष हूँ। दोनों अपराध जो मेरे ऊपर लगाये गये हैं, मैं स्वीकार करता हूँ कि वे दोनों ही मैंने किये हैं और आगे भी करूंगा। एकान्त सेवन करके मुर्दे जैसा बन जाने का निन्दित कार्य कोई भी सच्चा संत नहीं कर सकता। यदि मैं घोर स्वार्थी या अकर्मण्य बन कर अपने को समाज से पृथक कर लूँ और संसार की भलाई की तीव्र भावनाएँ जो मेरे हृदय में उठ रही हैं, उन्हें कुचल डालूँ तो मैं ब्रह्म हत्यारा कहा जाऊंगा और नरक में भी मुझे स्थान न मिलेगा। मैं एकान्तवासी, अकर्मण्य और लोक सेवा से विमुख अनुदार जीवन को बिताना मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक समझूंगा। मैं लोक सेवा का कार्य बन्द नहीं कर सकता, न्याय सभा के सामने मैं मृत्यु को अपनाने के लिये निर्भयतापूर्वक खड़ा हुआ हूँ।”

🔶 संसार का उज्ज्वल रत्न, महान दार्शनिक संत सुकरात को विष का प्याला पीना पड़ा। उसने खुशी से विष को होठों से लगाया और कहा-”स्वार्थी एवं अनुपयोगी जीवन बिताने की अपेक्षा यह प्याला मेरे लिये कम दुखदायी है।” आज उस महात्मा का शरीर इस लोक में नहीं है, पर लोक सेवा वर्ग का महान् उपदेश उसकी आत्मा सर्वत्र गुँजित कर रही है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1942

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/September/v1.8

👉 बोझ को हल्का कर लो।

🔶 यदि एक टन या अधिक चारा हाथी की पीठ पर लादा जाए तो उस बोझ को वह पशु जरूर उठा लेता है पर कठिनता से और बड़ा जोर लगाकर वह उस बोझे को ढोता है। यह बोझा हाथी के लिये मुसीबत और परेशानी का सामान हो जाता है। किन्तु वही घास चारा जब हाथी खाता है और उसे पचाकर आत्मसात करके अपनी देह में ले चलता है, तब वही बोझा उसके लिये बल और शक्ति का स्त्रोत बन जाता है।

🔷 इसलिए वेदाँत आपसे कहता है कि दुनिया के सब बोझे अपने कंधों पर मत ले चलिये। यदि तुम उनको अपने सिर पर ले चलोगे तो उस बोझ से तुम्हारी गर्दन टूट जायेगी। यदि तुम उन्हें पचा लोगे, उन्हें अपना बना लोगे, उन्हें अपना ही स्वरूप अनुसरण कर लोगे, तो तुम जल्दी-जल्दी बढ़ोगे, तुम्हारी गति मंद पड़ने के बदले अग्रसर होती जायेगी।

🔶 जब आप वेदाँत को अनुभव करते हैं, तब ईश्वर को आप महान और सर्वव्यापी देखेंगे। ईश्वर ही आप खाते हैं, ईश्वर ही आप पीते हैं, ईश्वर आप में वास करता है। जब आप ईश्वर का चारों ओर अनुभव करेंगे तब आपको वह दिखाई देगा। आपका भोजन ईश्वर के रूप में बदल जायेगा। वेदाँती के नेत्र संसार की हरेक वस्तु को परमेश्वरमय देखते हैं। हरेक वस्तु उसे प्यारी होती है। क्योंकि परमेश्वर है जब यह भावनाएं मन में घर करती हैं तो संसार की वस्तुएं तथा घटनाएं अप्रिय नहीं लगतीं, भारी या बोझल प्रतीत नहीं होतीं, वरन् हाथी के चारे की तरह पचकर सब प्रकार सुखदायक हो जाती हैं।

✍🏻 स्वामी रामतीर्थ
📖 अखण्ड ज्योति दिसंबर 1943
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/December/v1.13

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 4)

👉 प्राणवान् प्रतिभाओं की खोज

🔷 तीसरा वर्ग प्रतिभाशालियों का है। वे भौतिक क्षेत्र में कार्यरत रहते हैं, तो अनेक व्यवस्थाएँ बनाते हैं। अनुशासन में रहते और अनुबंधों से बँधे रहते हैं। अपनी नाव अपने बलबूते खेते हैं और उसमें बिठाकर अन्य कितनों को ही पार करते हैं। बड़ी योजनाएँ बनाते और चलाते हैं। कारखानों के व्यवस्थापक और शासनाध्यक्ष प्राय: इन्हीं विशेषताओं से संपन्न होते हैं। जिन्होंने महत्त्वपूर्ण सफलताएँ पाईं, उपलब्धियाँ हस्तगत की, प्रतिस्पर्धाएँ जीतीं, उनमें ऐसी ही मौलिक सूझ-बूझ होती है। बोल-चाल की भाषा में उन्हें ही प्रतिभावान कहते हैं। अपने वर्ग का नेतृत्व भी वही करते हैं। गुत्थियाँ सुलझाते और सफलताओं का पथ प्रशस्त करते हैं।

🔶 मित्र और शत्रु सभी उनका लोहा मानते हैं। मरुस्थल में उद्यान खड़े करने जैसे चमत्कार भी उन्हीं से बन पड़ते हैं। भौतिक प्रगति का विशेष श्रेय यदि उन्हें ही दिया जाए तो अत्युक्ति न होगी। सूझ-बूझ के धनी, एक साथ अनेक पक्षों पर दृष्टि रख सकने की क्षमता भी तो उन्हीं में होती है। समय सबके पास सीमित है। कुछ लोग उसे ऐसे ही दैनिक ढर्रों के कार्यों में गुजार देते हैं, पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो एक ही समय में, एक ही शरीर-मस्तिष्क से, अनेकों ताने-बाने बुनते और अनेकों जाल-जंजाल सुलझाते हैं। सफलता और प्रशंसा उनके आगे-पीछे फिरती है। अपने क्षेत्र समुदाय या देश की प्रगति ऐसे सुव्यवस्थित प्रतिभावानों पर ही निर्भर रहती है।
  
🔷 सबसे ऊँची श्रेणी देव-मानवों की है, जिन्हें महापुरुष भी कहते हैं। प्रतिभा तो उनमें भरपूर होती है, पर वे उसका उपयोग आत्म परिष्कार से लेकर लोकमंगल तक के उच्चस्तरीय प्रयोजनों में ही किया करते हैं। निजी आवश्यकताओं और महत्त्वाकांक्षाओं को घटाते हैं, ताकि बचे हुए शक्ति भंडार को परमार्थ में नियोजित कर सकें। समाज के उत्थान और सामयिक समस्याओं के समाधान का श्रेय उन्हें ही जाता है। किसी देश की सच्ची संपदा वे ही समझे जाते हैं। अपने कार्यक्षेत्र को नंदनवन जैसा सुवासित करते हैं। वे जहाँ भी बादलों की तरह बरसते हैं, वहीं मखमली हरीतिमा का फर्श बिछा देते हैं। वे वसंत की तरह अवतरित होते हैं। अपने प्रभाव से वृक्ष-पादपों को सुगंधित, सुरभित पुष्पों से लाद देते हैं। वातावरण में ऐसी उमंगें भरते हैं, जिससे कोयलें कूकने, भौंरे गूँजने और मोर नाचने लगें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 5

👉 ढोंग के घातक कुसंस्कार

🔷 मैं आप लोगों को घोर नास्तिक देखना पसंद करूंगा। लेकिन कुसंस्कारों से भरे मूर्ख देखना न चाहूँगा। क्योंकि नास्तिकों में कुछ न कुछ तो जीवन होता है। उनके सुधार की तो आशा है क्योंकि वे मुर्दे नहीं होते। लेकिन अगर मस्तिष्क में कुसंस्कार घुस जाता है तो वह बिल्कुल बेकार हो जाता है, दिमाग बिल्कुल फिर जाता है।

🔶 मृत्यु के कीड़े उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। तुम्हें इनका परित्याग करना होगा। मैं निर्भीक साहसी लोगों को चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि लोगों में ताजा खून हो, स्नायुओं में तेजी हो, पेशियाँ लोहे की तरह सख्त हों। मस्तिष्क को बेकार और कमजोर बनाने वाले भावों की आवश्यकता नहीं है। इन्हें छोड़ दो। सब तरह के गुप्त भावों की ओर दृष्टि डालना छोड़ दो। धर्म में कोई गुप्त भाव नहीं। ऋद्धि-सिद्धियों की अलौकिकता के पीछे पड़ना कुसंस्कार और दुर्बलता के चिन्ह हैं। वे अवनति और मृत्यु के चिन्ह हैं। इसलिए उनसे सदा सावधान रहो।

🔷 तेजस्वी बनो और खुद अपने पैरों पर खड़े हो। मैं संन्यासी हूँ और गत चौदह वर्षों से पैदल ही चारों तरफ घूमता फिरता हूँ। मैं आपसे सच-सच कहता हूँ कि इस तरह के गुप्त चमत्कार कहीं पर भी नहीं हैं। इन सब बुरे संस्कारों के पीछे कभी न दौड़ो। तुम्हारे और तुम्हारी संपूर्ण जाति के लिए इससे तो नास्तिक होना अच्छा है किंतु इस तरह कुसंस्कार पूर्ण होना अवनति और मृत्यु का कारण है।

✍🏻 स्वामी विवेकानंद
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1943 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/November/v1.11

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 17 July 2018

सोमवार, 16 जुलाई 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 3)

👉 प्राणवान् प्रतिभाओं की खोज

🔶 मनुष्यों की आकृति-प्रकृति तो एक जैसी होती है, पर उनके स्तरों में भारी भिन्नता पाई जाती है। हीन स्तर के लोग परावलंबी होते हैं। वे आँखें बंद करके दूसरों के पीछे चलते हैं। औचित्य कहाँ है, इसकी विवेचना बुद्धि इनमें नहीं के बराबर होती है। वे साधनों के लिए, मार्गदर्शन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं, यहाँ तक कि जीवनोपयोगी साधन तक अपनी स्वतंत्र चेतना के बलबूते जुटा नहीं पाते। उनके उत्थान-पतन का निमित्त कारण दूसरे ही बने रहते हैं। यह परजीवी वर्ग ही मनुष्यों में बहुलता के साथ पाया जाता है। अनुकरण और आश्रय ही उनके स्वभाव के अंग बनकर रहते है। निजी निर्धारण कदाचित् ही कभी कर पाते हैं। यह हीन वर्ग है, संपदा रहते हुए भी इन्हें दीन ही कहा जा सकता है।
  
🔷 दूसरा वर्ग वह है जो समझदार होते हुए भी संकीर्ण स्वार्थपरता से घिरा रहता है। योग्यता और तत्परता जैसी विशेषताएँ होते हुए भी वे उन्हें मात्र लोभ, मोह, अहंकार की पूर्ति के लिए ही नियोजित किए रहते हैं। उनकी नीति अपने मतलब से मतलब रखने की होती है। आदर्श उन्हें प्रभावित नहीं करते। कृपणता और कायरता के दबाव से वे पुण्य परमार्थ की बात तो सोच ही नहीं पाते, अवसर मिलने पर अनुचित कर बैठने से भी नहीं चूकते, महत्त्व न मिलने पर वे अनर्थ कर बैठते हैं।

🔶 गूलर के भुनगे जैसे स्वकेंद्रित जिंदगी ही जी पाते हैं। बुद्धिमान और धनवान् होते हुए भी इन लोगों को निर्वाह भर में समर्थ ‘प्रजाजन’ ही कहा जाता है। वे जिस तिस प्रकार जी तो लेते हैं, पर श्रेय सम्मान जैसी किसी मानवोचित उपलब्धि के साथ उनका कोई संबंध ही नहीं जुड़ता है। उन्हें जनसंख्या का एक घटक भर माना जाता है। फिर भी वे दीन-हीनों की तरह परावलंबी या भारभूत नहीं होते। उनकी गणना व्यक्तित्व की दृष्टि से अपंग, अविकसित और असहायों में नहीं होती। कम-से-कम अपना बोझ अपने पैरों पर तो उठा लेते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 4

👉 ईश्वर प्रदत्त उपहार और प्यार अनुदान

🔶 ‘मनुष्य−जन्म’ भगवान् का सर्वोपरि उपहार है। उससे बढ़कर और कोई सम्पदा उसके पास ऐसी नहीं है, जो किसी प्राणी को दी जा सके। इस उपहार के बाद एक और अनुदान उसके पास बच रहता है, जिसे केवल वे ही प्राप्त कर सकते हैं—जिन्होंने अंधकार से मुख मोड़कर प्रकाश की ओर चलने का निश्चय कर लिया है। “इस प्रयाण के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का धैर्य और साहस के साथ स्वागत करने की—जिनमें क्षमता है, वह अनुदान उन्हीं के लिए सुरक्षित है।”

🔷 ‘मनुष्य−जन्म’ ईश्वर का विशिष्ट उपहार है और मनुष्योचित संकल्प भगवान् का महानतम अनुदान। मानव−जीवन की सार्थकता इस आदर्श−परायण संकल्प−निष्ठा के साथ जुड़ने से ही होती है। यह सही है कि मनुष्य−कलेवर संसार के समस्त प्राणियों से सुख−सुविधा की दृष्टि से सर्वोत्तम है, पर उसकी गौरव−गरिमा इस बात पर टिकी हुई है “कि मनुष्य−जन्म के साथ मनुष्य−संकल्प और मनुष्य−कर्म भी जुड़े हुए हों।”

🔶 “हमें ‘मनुष्य−जन्म’ मिला—यह ईश्वर के अनुग्रह का प्रतीक है। उसका ‘प्यार’ मिला, या नहीं—इसकी परख इस कसौटी पर की जानी चाहिए कि मानवी−दृष्टिकोण और संकल्प अपना कर उस मार्ग पर चलने का साहस मिला, या नहीं—जो जीवन−लक्ष्य की पूर्ति करता है। वस्तुतः ‘मनुष्य−जन्म’ धारण करना उसी का धन्य है, जिसने आदर्शों के लिए अपनी आयु तथा विभूतियों को समर्पित करने के लिए साहस संचय कर लिया। ऐसे मनुष्यों को ईश्वर का उपहार ही नहीं, वरन् प्यार एवं अनुदान मिला समझा जाना चाहिए।”

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1974/January/v1.3

👉 आज का सद्चिंतन 16 July 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 July 2018

रविवार, 15 जुलाई 2018

👉 तीन मूर्तियाँ

🔷 एक राजा था। एक दिन वह अपने दरबार में मंत्रियों के साथ कुछ सलाह–मश्वरा कर रहा था। तभी एक चोबदार ने आकर कहा कि.. पडोसी राज्य से एक मूर्तिकार आया है और महाराज से मिलने की आज्ञा चाहता है। राजा ने आज्ञा दे दी।

🔶 थोडी देर में मूर्तिकार दरबार में हाजिर किया गया। वह अपने साथ तीन मूर्तियाँ लाया था, जिन्हें उसने दरबार में रख दिया। उन मूर्तियों की विशेषता थी कि तीनो अत्यंत सुंदर और कलात्मक तो थीं ही, पर एक जैसी दिखती थीं और बनी भी एक ही धातु से थीं। मामूली सवाल-जवाब के बाद राजा ने उससे दरबार में प्रस्तुत होने का कारण पूछा।

🔷 जवाब में मूर्तिकार बोला.. “राजन! मै आपके दरबार में इन मूर्तियों के रूप में एक प्रश्न लेकर उपस्थित हुआ हूँ, और उत्तर चाहता हूँ। मैने आपके मंत्रियों की बुद्धिमत्ता की बहुत प्रसंशा सुनी है। अगर ये सच है तो मुझे उत्तर अवश्य मिलेगा।“

🔶 राजा ने प्रश्न पूछने की आज्ञा दे दी। तो मूर्तिकार ने कहा.. “राजन! आप और आपके मंत्रीगण मूर्तियों को गौर से देखकर ये तो जान ही गये होंगे कि ये एक सी और एक ही धातु से बनी हैं। परंतु इसके बावजूद इनका मुल्य अलग-अलग है। मै जानना चाहता हूँ कि कौन सी मूर्ति का मूल्य सबसे अधिक है, कौन सी मूर्ति सबसे सस्ती है, और क्यों?”

🔷 मूर्तिकार के सवाल से एकबारगी तो दरबार में सन्नाटा छा गया। फिर राजा के इशारे पर दरबारी उठ-उठ कर पास से मूर्तियों को देखने लगे। काफी देर तक किसी को कुछ समझ न आया। फिर एक मंत्री जो औरों से चतुर था, और काफी देर से मूर्तियों को गौर से देख रहा था, उसने एक सिपाही को पास बुलाया और कुछ तिनके लाने को कह कर भेज दिया। थोडी ही देर में सिपाही कुछ बडे और मजबूत तिनके लेकर वापस आया और तिनके मंत्री के हाथ में दे दिये। सभी हैरत से मंत्री की कार्यवाही देख रहे थे।

🔶 तिनके लेकर मंत्री पहली मूर्ति के पास गये और एक तिनके को मूर्ति के कान में दिखते एक छेद में डाल दिया। तिनका एक कान से अंदर गया और दूसरे कान से बाहर आ गया, फिर मंत्री दूसरी मूर्ति के पास गये और पिछली बार की तरह एक तिनका लिया और उसे मूर्ति के कान में दिखते छेद में डालना शुरू किया.. इस बार तिनका एक कान से घुसा तो दूसरे कान की बजाय मूर्ति के मुँह के छेद से बाहर आया, फिर मंत्री ने यही क्रिया तीसरी मूर्ति के साथ भी आजमाई इस बार तिनका कान के छेद से मूर्ति के अंदर तो चला गया पर किसी भी तरह बाहर नहीं आया। अब मंत्री ने राजा और अन्य दरबारियों पर नजर डाली तो देखा राजा समेत सब बडी उत्सुकता से उसी ओर देख रहे थे।

🔷 फिर मंत्री ने राजा को सम्बोधित कर के कहना शुरू किया और बोले... “महाराज! मैने मूर्ति का उचित मुल्य पता कर लिया है।“ राजा ने कहा... “तो फिर बताओ। जिससे सभी जान सकें।“

🔶 मंत्री ने कहा... “महाराज! पहली मूर्ति जिसके एक कान से गया तिनका दूसरे कान से निकल आया उस मूर्ति का मुल्य औसत है। दूसरी मूर्ति जिसके एक कान से गया तिनका मुँह के रास्ते बाहर आया वह सबसे सस्ती है। और जिस मूर्ति के कान से गया तिनका उसके पेट में समा गया और किसी भी तरह बाहर नहीं आया वह मूर्ति सर्वाधिक मुल्यवान बल्कि बेशकीमती है।“

🔷 राजा नें कहा… “ किंतु तुमने कैसे और किस आधार पर मूर्तियों का मुल्य तय किया है यह भी बताओ।“

🔶 मंत्री बोले... “महाराज! वास्तव में ये मूर्तियाँ तीन तरह के मानवी स्वभाव की प्रतीक है। जिसके आधार पर मानव का मुल्याँकन किया जाता है। पहली मूर्ति के कान से गया तिनका दूसरे कान से बाहर आया; ये उन लोगों की तरफ इशारा करता है जिनसे कोई बात कही जाय तो एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देते हैं, ये किसी काम के नही होते, किंतु यद्यपि ये किसी बात को गंभीरता से नहीं लेते पर इनमें इधर की बात उधर करने का अवगुण भी नहीं होता सो इनका मूल्य औसत है।

🔷 दूसरी मूर्ति जिसके कान से डाला गया तिनका मुँह के रास्ते बाहर आया; वह उन लोगों का प्रतीक है जो कोई बात पचा या छिपा नहीं सकते, चुगलखोरी, दूसरों की गुप्त बातों को इधर-उधर कहते रहने के कारण ये सर्वथा त्याज्य होते हैं, ऐसे लोगों को निकृष्ट और सबसे सस्ता कह सकते हैं। अतः दूसरी मूर्ति सबसे सस्ती है।

🔶 अब रही तीसरी मूर्ति जिसके कान में डाला गया तिनका पेट में जाकर गायब हो गया ये उन लोगों का प्रतीक है, जो दूसरों की कही बात पर ध्यान तो देते ही हैं साथ ही दूसरों के राज को राज बनाये रखते हैं। ऐसे लोग समाज में दुर्लभ और बेशकीमती होते हैं। सो तीसरी मूर्ति सबसे मुल्यवान है।“

🔷 राजा नें मूर्तिकार की ओर देखा। मूर्तिकार बोला... “महाराज! मै मंत्री महोदय के उत्तर से संतुष्ट हूँ.. और स्वीकार करता हूँ कि आपके मंत्री सचमुच बुद्धिमान हैं। उनका उत्तर सत्य और उचित है। ये मूर्तियाँ मेरी ओर से आपको भेंट हैं। इन्हें स्वीकार करें। और अब मुझे अपने राज्य जाने की आज्ञा दें।“

🔶 राजा ने मूर्तिकार को सम्मान सहित अपने राज्य जाने की आज्ञा दे दी और अपने मंत्री को भी इनाम देकर सम्मानित किया।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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