शुक्रवार, 15 जून 2018
👉 आत्मज्ञान की उपलब्धि ही सर्वश्रेष्ठ सिद्धि
🔷 अपने आपको जानना ही आत्मज्ञान प्राप्त करना है। अपने को शरीर मानना यह अविद्या है और आत्मज्ञान प्राप्त करना ही विद्या है। पहली मृत्यु है और दूसरी अमरता। एक अंधकार है, दूसरा प्रकाश, एक जन्म-मृत्यु है दूसरा मोक्ष। एक बंधन है तो दूसरा मुक्ति। नरक और स्वर्ग भी इन्हें ही कह सकते हैं। ये दोनों एक दूसरे से अत्यन्त विपरीत परिस्थितियाँ हैं, दोनों भिन्न-भिन्न दिशाओं को ले जाती हैं, इसलिए एक को ग्रहण करने के लिए दूसरे को त्यागना अनिवार्य हो जाता है।
🔶 ज्ञान और अज्ञान की समान परिस्थितियाँ इस विश्व में विद्यमान है। जिन्हें पदार्थों से प्रेम होता है, वे प्रेयार्थी अज्ञानी कहे जाते हैं। भले ही उन्हें सांसारिक ज्ञान अधिक हो पर ब्रह्मवेत्ता पुरुष उन्हें कभी विद्वान नहीं मानते और न ही उन्हें महत्त्व दिया जा सकता है क्योंकि भोग की इच्छा करने वाले व्यक्ति अंधेरे में चलते और अंधों की तरह ठोंकरें खाते हैं।
🔷 आत्म ज्ञान प्राप्त करना वस्तुत: ईश्वर की सबसे सुन्दर सेवा और उपासना है। हमारे पूर्वज कहते हैं परमात्मा बड़ा मंगल कारक है। यहाँ कष्ट और दु:ख की कोई बात ही नहीं है, पर लोग अज्ञान वश कष्ट भोगते और परमात्मा को दोषी ठहराते हैं।
🔶 आत्म तत्त्व का ज्ञान मनुष्य के लिए सभी दृष्टिïयों से उपयुक्त है। शास्त्रकार का कथन है कि तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषम अर्थात् आत्म ज्ञान के सुख से बढक़र और कोई सुख नहीं। कठोपनिषद् अध्याय दो की दूसरी बल्ली में आत्मा की विशदता और उससे प्राप्त होने वाले महान सुख का इस प्रकार वर्णन है। ‘जो समस्त जीवों का मूल, चेतन और सब प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करता है, उस शरीरस्थ आत्मा का जो ज्ञान प्राप्त कर लेेते हैं, उन्हें ही नित्य और शाश्वत शांति उपलब्ध होती है।’
🔷 यद्यपि यह आत्मा जीव रूप से हृदय में ही अवस्थित है, तो भी वह अति सूक्ष्म है और सहज ही ज्ञान में नहीं आता। किन्तु जब कोई साहसी पुरुष अध्यात्म योग के द्वारा उसे जानने का प्रयत्न करता है, कठिनाइयों में प्रविष्ट होकर उसे ढूंढऩे का प्रयत्न करता है, तो वह आत्मा की विशेषताओं से प्रभावित भी होता है। और अंत में उसे प्राप्त कर सांसारिक दु:ख और कष्टों से छुटकारा पा जाता है।
🔶 आत्म तत्त्व निश्चय ही बहुत विशद है। बुद्धिमान व्यक्ति इस परम गोपनीय तत्त्व को प्राप्त कर अपनी मुक्ति के भागी तो बनते ही हैं, साथ ही हजारों औरों को आत्मकल्याण के मार्ग में अग्रसर करने में भी समर्थ होते हैं, किन्तु यह तत्त्व गोपनीय ही नहीं दु:साध्य भी है। मनुष्य की जिज्ञासा ही उसे अधिकारी नहीं बना देती, वरन् उस तत्त्व के अवगाहन की पात्रता भी होना आवश्यक है। अधिकारी व्यक्ति ही उसे प्राप्त कर सकते हैं, जो भय और मोह की स्थिति में डगमगा न सकें और जिनमें इतनी दृढ़ता, गंभीरता और कठिनाइयों के सहन करने की क्षमता हो कि वे साधना काल की ऊँची-नीची, टेड़ी-तिरछी परिस्थितियों में भी बढ़ते रह सकें, वस्तुत: वही उसके पात्र होते हैं। ऐसे आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों पर ही समाज के खोजी वर्चस् सम्पन्न व्यक्ति अगले दिनों और अधिक संख्या में पैदा हों, ऐसी नियति की इच्छा है। कोई कारण नहीं कि महाकाल की यह इच्छा पूरी न हो।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔶 ज्ञान और अज्ञान की समान परिस्थितियाँ इस विश्व में विद्यमान है। जिन्हें पदार्थों से प्रेम होता है, वे प्रेयार्थी अज्ञानी कहे जाते हैं। भले ही उन्हें सांसारिक ज्ञान अधिक हो पर ब्रह्मवेत्ता पुरुष उन्हें कभी विद्वान नहीं मानते और न ही उन्हें महत्त्व दिया जा सकता है क्योंकि भोग की इच्छा करने वाले व्यक्ति अंधेरे में चलते और अंधों की तरह ठोंकरें खाते हैं।
🔷 आत्म ज्ञान प्राप्त करना वस्तुत: ईश्वर की सबसे सुन्दर सेवा और उपासना है। हमारे पूर्वज कहते हैं परमात्मा बड़ा मंगल कारक है। यहाँ कष्ट और दु:ख की कोई बात ही नहीं है, पर लोग अज्ञान वश कष्ट भोगते और परमात्मा को दोषी ठहराते हैं।
🔶 आत्म तत्त्व का ज्ञान मनुष्य के लिए सभी दृष्टिïयों से उपयुक्त है। शास्त्रकार का कथन है कि तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषम अर्थात् आत्म ज्ञान के सुख से बढक़र और कोई सुख नहीं। कठोपनिषद् अध्याय दो की दूसरी बल्ली में आत्मा की विशदता और उससे प्राप्त होने वाले महान सुख का इस प्रकार वर्णन है। ‘जो समस्त जीवों का मूल, चेतन और सब प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करता है, उस शरीरस्थ आत्मा का जो ज्ञान प्राप्त कर लेेते हैं, उन्हें ही नित्य और शाश्वत शांति उपलब्ध होती है।’
🔷 यद्यपि यह आत्मा जीव रूप से हृदय में ही अवस्थित है, तो भी वह अति सूक्ष्म है और सहज ही ज्ञान में नहीं आता। किन्तु जब कोई साहसी पुरुष अध्यात्म योग के द्वारा उसे जानने का प्रयत्न करता है, कठिनाइयों में प्रविष्ट होकर उसे ढूंढऩे का प्रयत्न करता है, तो वह आत्मा की विशेषताओं से प्रभावित भी होता है। और अंत में उसे प्राप्त कर सांसारिक दु:ख और कष्टों से छुटकारा पा जाता है।
🔶 आत्म तत्त्व निश्चय ही बहुत विशद है। बुद्धिमान व्यक्ति इस परम गोपनीय तत्त्व को प्राप्त कर अपनी मुक्ति के भागी तो बनते ही हैं, साथ ही हजारों औरों को आत्मकल्याण के मार्ग में अग्रसर करने में भी समर्थ होते हैं, किन्तु यह तत्त्व गोपनीय ही नहीं दु:साध्य भी है। मनुष्य की जिज्ञासा ही उसे अधिकारी नहीं बना देती, वरन् उस तत्त्व के अवगाहन की पात्रता भी होना आवश्यक है। अधिकारी व्यक्ति ही उसे प्राप्त कर सकते हैं, जो भय और मोह की स्थिति में डगमगा न सकें और जिनमें इतनी दृढ़ता, गंभीरता और कठिनाइयों के सहन करने की क्षमता हो कि वे साधना काल की ऊँची-नीची, टेड़ी-तिरछी परिस्थितियों में भी बढ़ते रह सकें, वस्तुत: वही उसके पात्र होते हैं। ऐसे आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों पर ही समाज के खोजी वर्चस् सम्पन्न व्यक्ति अगले दिनों और अधिक संख्या में पैदा हों, ऐसी नियति की इच्छा है। कोई कारण नहीं कि महाकाल की यह इच्छा पूरी न हो।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
गुरुवार, 14 जून 2018
👉 शिखा और सूत्र
🔶 मित्रो ! पुलिस का सिपाही अपना सिम्बाल पहने रहता है, उसके कमर में एक पेटी बँधी रहती है और उसके ऊपर लगा रहता है एक पीतल का बिल्ला। उस पीतल के बिल्ले पर क्या लिखा रहता है? यू.पी.पी. लिखा रहता है। पहले अँग्रेजी में लिखा रहता था और अब हिन्दी में लिखा रहता है। उत्तर प्रदेश पुलिस- उ.प्र.पु.। मध्यप्रदेश में- म.प्र.पु. लिखा रहता है। पीतल का बिल्ला न हो किसी के पास तो समझ लीजिए कि वह सिपाही नहीं है और कमर में पेटी बँधी हुई न हो तो समझ लीजिए कि वह पुलिस का सिपाही नहीं है। सिपाही को कमर में पेटी बाँधनी चाहिए।
🔷 जब कभी किसी का फौज में कोर्टमार्शल होता है तो सबसे पहला यह काम किया जाता है कि उसकी पेटी उतार ली जाती है, उसका बिल्ला उतार लिया जाता है उसको क्रिमिनल मान लिया जाता है तथा उसको लाइन में खड़ा किया जाता है फिर उसका कोर्टमार्शल किया जाता है और यह कहा जाता है तुम हमारी इज्जत मत खराब करो। पेटी की इज्जत-राष्ट की इज्जत है। तुमने ऐसे खराब काम किए हैं, इसलिए सबसे पहले तुमको यह सजा दी जाएगी कि तुम्हारी पेटी और तुम्हारा बिल्ला हम जब्त कर लेते है। पुलिस में भी यही होता है और फौज में भी यही होता है।
🔶 हमारा बिल्ला जब्त किया या नहीं किया, हम पुलिस के सिपाही हैं कि नहीं, हम फौज के सिपाही हैं कि नहीं, हम हिन्दू धर्म के सिपाही हैं कि नहीं, हम हिन्दू धर्म के दीक्षित हैं कि नहीं, इसकी पहचान आपके शिखा और सूत्र (जनेऊ) से होती है। अगर आप हिन्दु धर्म में दीक्षित हैं तो लाइए वह निशान आपके कंधे पर 'यू.पी.पी. लिखा हुआ है कि नहीं और कमर में पेटी बँधी हुई हैं कि नहीं और अगर आपकी पेटी छीन ली किसी ने तो आपको यह कहना पड़ेगा कि पुलिस में से हमें बर्खास्त कर दिया गया-फौज में से बर्खास्त कर दिया गया और हमारा कोर्टमार्शल किया गया। अगर आप का बिल्ला छीन लिया गया, पेटी छीन ली गई हो तो फिर इसका मतलब यह होगा कि आपको हिन्दू धर्म में से बर्खास्त कर दिया गया। हिन्दू धर्म से कोई और धर्म होगा आपका।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वांङमय-68-पृष्ठ 2.118
🔷 जब कभी किसी का फौज में कोर्टमार्शल होता है तो सबसे पहला यह काम किया जाता है कि उसकी पेटी उतार ली जाती है, उसका बिल्ला उतार लिया जाता है उसको क्रिमिनल मान लिया जाता है तथा उसको लाइन में खड़ा किया जाता है फिर उसका कोर्टमार्शल किया जाता है और यह कहा जाता है तुम हमारी इज्जत मत खराब करो। पेटी की इज्जत-राष्ट की इज्जत है। तुमने ऐसे खराब काम किए हैं, इसलिए सबसे पहले तुमको यह सजा दी जाएगी कि तुम्हारी पेटी और तुम्हारा बिल्ला हम जब्त कर लेते है। पुलिस में भी यही होता है और फौज में भी यही होता है।
🔶 हमारा बिल्ला जब्त किया या नहीं किया, हम पुलिस के सिपाही हैं कि नहीं, हम फौज के सिपाही हैं कि नहीं, हम हिन्दू धर्म के सिपाही हैं कि नहीं, हम हिन्दू धर्म के दीक्षित हैं कि नहीं, इसकी पहचान आपके शिखा और सूत्र (जनेऊ) से होती है। अगर आप हिन्दु धर्म में दीक्षित हैं तो लाइए वह निशान आपके कंधे पर 'यू.पी.पी. लिखा हुआ है कि नहीं और कमर में पेटी बँधी हुई हैं कि नहीं और अगर आपकी पेटी छीन ली किसी ने तो आपको यह कहना पड़ेगा कि पुलिस में से हमें बर्खास्त कर दिया गया-फौज में से बर्खास्त कर दिया गया और हमारा कोर्टमार्शल किया गया। अगर आप का बिल्ला छीन लिया गया, पेटी छीन ली गई हो तो फिर इसका मतलब यह होगा कि आपको हिन्दू धर्म में से बर्खास्त कर दिया गया। हिन्दू धर्म से कोई और धर्म होगा आपका।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वांङमय-68-पृष्ठ 2.118
👉 उपकार किस पर करे?
🔷 जंगल में शेर शेरनी शिकार के लिये दूर तक गये अपने बच्चों को अकेला छोडकर। देर तक नही लौटे तो बच्चे भूख से छटपटाने लगे उसी समय एक बकरी आई उसे दया आई और उन बच्चों को दूध पिलाया फिर बच्चे मस्ती करने लगे तभी शेर शेरनी आये बकरी को देख लाल पीले होकर हमला करता उससे पहले बच्चों ने कहा इसने हमें दूध पिलाकर बड़ा उपकार किया है नही तो हम मर जाते।
🔶 अब शेर खुश हुआ और कृतज्ञता के भाव से बोला हम तुम्हारा उपकार कभी नही भूलेंगे जाओ आजादी के साथ जंगल मे घूमो फिरो मौज करो। अब बकरी जंगल में निर्भयता के साथ रहने लगी यहाँ तक कि शेर के पीठ पर बैठकर भी कभी कभी पेडो के पत्ते खाती थी।
🔷 यह दृश्य चील ने देखा तो हैरानी से बकरी को पूछा तब उसे पता चला कि उपकार का कितना महत्व है। चील ने यह सोचकर कि एक प्रयोग मैं भी करता हूँ चूहों के छोटे छोटे बच्चे दलदल मे फंसे थे निकलने का प्रयास करते पर कोशिश बेकार।
🔶 चील ने उनको पकड पकड कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया बच्चे भीगे थे सर्दी से कांप रहे थे तब चील ने अपने पंखों में छुपाया, बच्चों को बेहद राहत मिली काफी समय बाद चील उडकर जाने लगी तो हैरान हो उठी चूहों के बच्चों ने उसके पंख कुतर डाले थे। चील ने यह घटना बकरी को सुनाई तुमने भी उपकार किया और मैंने भी फिर यह फल अलग क्यों?
🔷 बकरी हंसी फिर गंभीरता से कहा
🔶 उपकार भी शेर जैसो पर किया जाए चूहों पर नही। चूहों (कायर) हमेशा उपकार को स्मरण नही रखेंगे वो तो भूलना बहादुरी समझते है और शेर(बहादुर )उपकार कभी नही भूलेंगे।
🔶 अब शेर खुश हुआ और कृतज्ञता के भाव से बोला हम तुम्हारा उपकार कभी नही भूलेंगे जाओ आजादी के साथ जंगल मे घूमो फिरो मौज करो। अब बकरी जंगल में निर्भयता के साथ रहने लगी यहाँ तक कि शेर के पीठ पर बैठकर भी कभी कभी पेडो के पत्ते खाती थी।
🔷 यह दृश्य चील ने देखा तो हैरानी से बकरी को पूछा तब उसे पता चला कि उपकार का कितना महत्व है। चील ने यह सोचकर कि एक प्रयोग मैं भी करता हूँ चूहों के छोटे छोटे बच्चे दलदल मे फंसे थे निकलने का प्रयास करते पर कोशिश बेकार।
🔶 चील ने उनको पकड पकड कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया बच्चे भीगे थे सर्दी से कांप रहे थे तब चील ने अपने पंखों में छुपाया, बच्चों को बेहद राहत मिली काफी समय बाद चील उडकर जाने लगी तो हैरान हो उठी चूहों के बच्चों ने उसके पंख कुतर डाले थे। चील ने यह घटना बकरी को सुनाई तुमने भी उपकार किया और मैंने भी फिर यह फल अलग क्यों?
🔷 बकरी हंसी फिर गंभीरता से कहा
🔶 उपकार भी शेर जैसो पर किया जाए चूहों पर नही। चूहों (कायर) हमेशा उपकार को स्मरण नही रखेंगे वो तो भूलना बहादुरी समझते है और शेर(बहादुर )उपकार कभी नही भूलेंगे।
बुधवार, 13 जून 2018
👉 वेष-भूषा की मनोवैज्ञानिक कसौटी (अन्तिम भाग)
🔷 आज पाश्चात्य देशों में अमेरिका में सर्वाधिक भारतीय पोशाक-साड़ी का तो विशेष रूप से तेजी से आकर्षण और प्रचलन बढ़ रहा है दूसरी ओर अपने देश के नवयुवक और नवयुवतियां विदेशी और सिनेमा टाइप वेष-भूषा अपनाती चली जा रही हैं। यह न केवल अन्धानुकरण की मूढ़ता है वरन् अपनी बौद्धिक मानसिक एवं आत्मिक कमजोरी का ही परिचायक है।
🔶 यदि इसे रोका न गया और लोगों ने पैंट, कोट, शूट, बूट, हैट, स्कर्ट, चुस्त पतलून सलवार आदि भद्दे और भोंडे परिधान न छोड़े तो और देशों की तरह भारतीयों का चारित्र्यक पतन भी निश्चित ही है। श्री हेराल्ड लिखते हैं—कि सामाजिक विशेषताओं को इस सम्बन्ध में अभी विचार करना चाहिये अन्यथा वह दिन अधिक दूर नहीं जब पानी सिर से गुजर जायेगा।
🔷 भारतीय दर्शन में आत्म कल्याण के लिये बहुत उपाय हैं सैकड़ों योग साधनायें हैं वैसे ही लोक-कल्याण के लिए भी अनेक परम्परायें मान्यतायें और आचार-विचार प्रतिस्थापित किये गये हैं उन सबका उद्देश्य जीवन को सशक्त और संस्कारवान बनाना रहा है अब जो परम्परायें विकृत हो चुकी हैं उनमें वेष-भूषा भी कम चिन्ताजनक नहीं हमें अनुभव करके ही नहीं इस मनोवैज्ञानिक खोज से भी सीखना चाहिये कि अपनी वेष-भूषा ओछापन नहीं बड़प्पन का ही प्रतीक है। हां काले अंग्रेज और काली मैम बनना हो तब तो कुछ भी पहना और ओढ़ा जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 84
🔶 यदि इसे रोका न गया और लोगों ने पैंट, कोट, शूट, बूट, हैट, स्कर्ट, चुस्त पतलून सलवार आदि भद्दे और भोंडे परिधान न छोड़े तो और देशों की तरह भारतीयों का चारित्र्यक पतन भी निश्चित ही है। श्री हेराल्ड लिखते हैं—कि सामाजिक विशेषताओं को इस सम्बन्ध में अभी विचार करना चाहिये अन्यथा वह दिन अधिक दूर नहीं जब पानी सिर से गुजर जायेगा।
🔷 भारतीय दर्शन में आत्म कल्याण के लिये बहुत उपाय हैं सैकड़ों योग साधनायें हैं वैसे ही लोक-कल्याण के लिए भी अनेक परम्परायें मान्यतायें और आचार-विचार प्रतिस्थापित किये गये हैं उन सबका उद्देश्य जीवन को सशक्त और संस्कारवान बनाना रहा है अब जो परम्परायें विकृत हो चुकी हैं उनमें वेष-भूषा भी कम चिन्ताजनक नहीं हमें अनुभव करके ही नहीं इस मनोवैज्ञानिक खोज से भी सीखना चाहिये कि अपनी वेष-भूषा ओछापन नहीं बड़प्पन का ही प्रतीक है। हां काले अंग्रेज और काली मैम बनना हो तब तो कुछ भी पहना और ओढ़ा जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 84
👉 सजा बनी सीख
🔷 एक राजा था उसके जुल्म करने की भी कोई सीमा नहीं थी। अगर उसे किसी आदमी पर गुस्सा आ जाता तो उसे बड़ी अमानवीय सज़ा दिया कर था।
🔶 एक दिन उसे अपने महामंत्री अरुणेश पर गुस्सा आ गया तो उसने मंत्री को रात भर ठन्डे पानी में खड़े रहने की सज़ा दे दी। अरुणेश बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति था। वह सोचने लगा कि क्या तरीका हो सकता है कि राजा को सबक मिल सके और खुद वो इस सज़ा से भी बच जाये।
🔷 अचानक उसके दिमाग में एक युक्ति आ गयी और जब शाम के वक़्त राजा ने अरुणेश को सज़ा देने के लिए बुलाया तो अरुणेश चेहरे पर मुस्कान लिए राजा के पास पहुंचा तो राजा ने उसे ठन्डे पानी में जाने के लिए इशारा किया लेकिन उसने देखा कि महामंत्री के चेहरे पर बिलकुल भी शिकन या भय नहीं है जबकि वो तो ख़ुशी से झूम रहा है जैसे उसके लिए ये कोई अच्छा अवसर हो।
🔶 हैरान राजा ने उस से पूछ ही लिया कि तुम इतना प्रसन्न किस वजह से जबकि मेने तुम्हे ये सज़ा दी है क्या तुम्हे डर नहीं लग रहा इस पर महामंत्री ने राजा से कहा इसमें डरने वाली कौन सी बात है मेरे लिए तो ये एक तरह से बहुत अच्छा ही है क्योंकि राज वैद्य ने मुझे बताया है कि जल्दी गुस्सा हो जाने वाले व्यक्ति समय से पहले बुढ़ापा पा लेते है और ठन्डे पानी में खड़े रहना इसका सर्वोत्तम उपाय है इसलिए मेरे लिए तो ये फायदेमंद ही होगा क्योंकि मैं भी तो बहुत अधिक गुस्सा करता हूँ।
🔷 राजा को चिंता हुई उसने सोचा बात तो इसकी भी वाजिब है क्योंकि मैं भी तो बहुत गुस्सा करता हूँ इसलिए उसने महामंत्री को जाने से रोक दिया और कहने लगा तुम नहीं जाओगे मैं आज की रात ये उपचार लूँगा क्योंकि राजा को बुढ़ापे का भय था।
🔶 थोडा समय बीता राजा को ठण्ड लगने लगी लेकिन जवानी के लालच में वो खड़ा रहा। लेकिन फिर थोड़ी देर बाद ही उसे ख्याल आया की ठन्डे पानी में खड़े रहकर भला कौन सी जवानी हासिल होती है जबकि व्यक्ति इसमें तो बीमार हो सकता है और अधिक देर तक खड़े रहने के बाद उसकी मौत भी हो सकती है। सहसा उसे अपनी भूल का अहसास हो गया कि मैं भी लोगो को ऐसी सज़ा देता हूँ तो उन्हें भी तो कितनी पीड़ा होती होगी। शायद इसी लिए अरुणेश ने मुझे शिक्षा देने के लिए ये कहा होगा।
🔷 राजा को अपनी गलती का अहसास हो गया और उसने महामंत्री को बुलाकर उससे क्षमा मांगी और भविष्य में ऐसे अजब गजब आदेश नहीं देने का वचन भी दिया।
http://awgpskj.blogspot.com/2016/08/blog-post_2.html
🔶 एक दिन उसे अपने महामंत्री अरुणेश पर गुस्सा आ गया तो उसने मंत्री को रात भर ठन्डे पानी में खड़े रहने की सज़ा दे दी। अरुणेश बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति था। वह सोचने लगा कि क्या तरीका हो सकता है कि राजा को सबक मिल सके और खुद वो इस सज़ा से भी बच जाये।
🔷 अचानक उसके दिमाग में एक युक्ति आ गयी और जब शाम के वक़्त राजा ने अरुणेश को सज़ा देने के लिए बुलाया तो अरुणेश चेहरे पर मुस्कान लिए राजा के पास पहुंचा तो राजा ने उसे ठन्डे पानी में जाने के लिए इशारा किया लेकिन उसने देखा कि महामंत्री के चेहरे पर बिलकुल भी शिकन या भय नहीं है जबकि वो तो ख़ुशी से झूम रहा है जैसे उसके लिए ये कोई अच्छा अवसर हो।
🔶 हैरान राजा ने उस से पूछ ही लिया कि तुम इतना प्रसन्न किस वजह से जबकि मेने तुम्हे ये सज़ा दी है क्या तुम्हे डर नहीं लग रहा इस पर महामंत्री ने राजा से कहा इसमें डरने वाली कौन सी बात है मेरे लिए तो ये एक तरह से बहुत अच्छा ही है क्योंकि राज वैद्य ने मुझे बताया है कि जल्दी गुस्सा हो जाने वाले व्यक्ति समय से पहले बुढ़ापा पा लेते है और ठन्डे पानी में खड़े रहना इसका सर्वोत्तम उपाय है इसलिए मेरे लिए तो ये फायदेमंद ही होगा क्योंकि मैं भी तो बहुत अधिक गुस्सा करता हूँ।
🔷 राजा को चिंता हुई उसने सोचा बात तो इसकी भी वाजिब है क्योंकि मैं भी तो बहुत गुस्सा करता हूँ इसलिए उसने महामंत्री को जाने से रोक दिया और कहने लगा तुम नहीं जाओगे मैं आज की रात ये उपचार लूँगा क्योंकि राजा को बुढ़ापे का भय था।
🔶 थोडा समय बीता राजा को ठण्ड लगने लगी लेकिन जवानी के लालच में वो खड़ा रहा। लेकिन फिर थोड़ी देर बाद ही उसे ख्याल आया की ठन्डे पानी में खड़े रहकर भला कौन सी जवानी हासिल होती है जबकि व्यक्ति इसमें तो बीमार हो सकता है और अधिक देर तक खड़े रहने के बाद उसकी मौत भी हो सकती है। सहसा उसे अपनी भूल का अहसास हो गया कि मैं भी लोगो को ऐसी सज़ा देता हूँ तो उन्हें भी तो कितनी पीड़ा होती होगी। शायद इसी लिए अरुणेश ने मुझे शिक्षा देने के लिए ये कहा होगा।
🔷 राजा को अपनी गलती का अहसास हो गया और उसने महामंत्री को बुलाकर उससे क्षमा मांगी और भविष्य में ऐसे अजब गजब आदेश नहीं देने का वचन भी दिया।
http://awgpskj.blogspot.com/2016/08/blog-post_2.html
मंगलवार, 12 जून 2018
👉 Concentration – an essential pre-requisite for spiritual unfoldment (Part 1)
🔶 The reflection cannot be seen clearly in disturbed and muddled surface of water. In the same way, so long as the mind is unstable, the inner self cannot be felt. Therefore, with the help of sadhana, one should try to steady the mind. Sadhana will purify the innerself and with increase in purity, concentration will also increase.
🔷 Therefore, patiently, one should engage the mind in sadhana and should try to make it quite gradually. Without controlling the mind, a sadhak cannot succeed in sadhana. Psychologists say that in a state of calm and quiet mind a great subtle energy field emerges from the deep recesses of the soul. It is very difficult for the ordinary people to get a feel of this energy field.
🔶 A disciplined mind helps in physical, mental and spiritual well-being. Among the various types of yogas, for example, karmayoga, bhaktiyoga, layayoga, hathayoga, ragayoga, tapayoga, etc., only japayoga is the simplest and most practical. Japa (recitation) of a mantra helps in achieving concentration.
📖 Akhand Jyoti Mar-2002
🔷 Therefore, patiently, one should engage the mind in sadhana and should try to make it quite gradually. Without controlling the mind, a sadhak cannot succeed in sadhana. Psychologists say that in a state of calm and quiet mind a great subtle energy field emerges from the deep recesses of the soul. It is very difficult for the ordinary people to get a feel of this energy field.
🔶 A disciplined mind helps in physical, mental and spiritual well-being. Among the various types of yogas, for example, karmayoga, bhaktiyoga, layayoga, hathayoga, ragayoga, tapayoga, etc., only japayoga is the simplest and most practical. Japa (recitation) of a mantra helps in achieving concentration.
📖 Akhand Jyoti Mar-2002
👉 वेष-भूषा की मनोवैज्ञानिक कसौटी (भाग 1)
🔶 एक दो नहीं संपूर्ण 6 वर्ष तक उसने पार्कों, थियेटरों, छविग्रहों और दूसरे-दूसरे सार्वजनिक स्थानों के चक्कर काटे। एक नहीं हजारों फोटोग्राफ लिये और जिस। जिस के फोटोग्राफ लिये उन-उन के व्यक्तिगत जीवन का परिचय और अध्ययन किया। सोचते होंगे होगा कोई व्यर्थ के कामों में समय गंवाने वाला फक्कड़, पर नहीं वह हैं लन्दन के एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक— श्रीनेक हेराल्ड जिन्होंने इतने वर्ष के अध्ययन से महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह निकाला कि वेष-भूषा का मनुष्य के चरित्र, स्वभाव, शील और सदाचार से गहनतम सम्बन्ध है।
🔷 पुरुषों की तरह की वेष-भूषा धारण करने वाली नवयुवतियों का मानसिक चित्रण और उनके व्यवहार की जानकारी देते हुए श्री हेराल्ड लिखते हैं—ऐसी युवतियों की चाल-ढाल, बोल-चाल, उठने-बैठने के तौर तरीकों में भी पुरुष के से लक्षण प्रकट होने लगते हैं। वे अपने आप को पुरुष सा अनुभव करती हैं जिससे उनके लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों का ह्रास होने लगता है। स्त्री जब स्त्री न रह कर पुरुष बनने लगती है तब वह न केवल पारिवारिक उत्तरदायित्व निबाहने में असमर्थ हो जाती है वरन् उसके वैयक्तिक जीवन की शुद्धता भी धूमिल पड़ने लगती है। पाश्चात्य देशों में दाम्पत्य जीवन में उग्र होता हुआ अविश्वास उसी का एक दुष्परिणाम है।”
🔶 श्री हेराल्ड ने अपना विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय आचार्यों ने वेष-भूषा के जो नियम और आचार बनायें वह केवल भौगोलिक अनुकूलता ही प्रदान नहीं करते वरन् स्त्री-पुरुषों की शारीरिक बनावट का दर्शक पर क्या प्रभाव पड़ता है उस सूक्ष्म विज्ञान को दृष्टि में रखकर भी बनाये गये हैं वेष-भूषा का मनोविज्ञान के साथ इतना बढ़िया सामंजस्य न तो विश्व के किसी देश में हुआ न किसी संस्कृति में, यह भारतीय आचार्यों की मानवीय प्रकृति के अत्यन्त सूक्ष्म अध्ययन का परिणाम था।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 83
🔷 पुरुषों की तरह की वेष-भूषा धारण करने वाली नवयुवतियों का मानसिक चित्रण और उनके व्यवहार की जानकारी देते हुए श्री हेराल्ड लिखते हैं—ऐसी युवतियों की चाल-ढाल, बोल-चाल, उठने-बैठने के तौर तरीकों में भी पुरुष के से लक्षण प्रकट होने लगते हैं। वे अपने आप को पुरुष सा अनुभव करती हैं जिससे उनके लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों का ह्रास होने लगता है। स्त्री जब स्त्री न रह कर पुरुष बनने लगती है तब वह न केवल पारिवारिक उत्तरदायित्व निबाहने में असमर्थ हो जाती है वरन् उसके वैयक्तिक जीवन की शुद्धता भी धूमिल पड़ने लगती है। पाश्चात्य देशों में दाम्पत्य जीवन में उग्र होता हुआ अविश्वास उसी का एक दुष्परिणाम है।”
🔶 श्री हेराल्ड ने अपना विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय आचार्यों ने वेष-भूषा के जो नियम और आचार बनायें वह केवल भौगोलिक अनुकूलता ही प्रदान नहीं करते वरन् स्त्री-पुरुषों की शारीरिक बनावट का दर्शक पर क्या प्रभाव पड़ता है उस सूक्ष्म विज्ञान को दृष्टि में रखकर भी बनाये गये हैं वेष-भूषा का मनोविज्ञान के साथ इतना बढ़िया सामंजस्य न तो विश्व के किसी देश में हुआ न किसी संस्कृति में, यह भारतीय आचार्यों की मानवीय प्रकृति के अत्यन्त सूक्ष्म अध्ययन का परिणाम था।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 83
👉 गुरुगीता (भाग 128)
👉 सर्वसंकटहारिणी गुरूगीता की मंत्र साधना
🔶 विष्णु शंकर सामान्य गृहस्थ थे। उनकी जीवन यात्रा सामान्य जनों की भाँति साधारण चल रही थी। घर- परिवार की मामूली उलझनों के साथ सब कुछ ठीक था। थोड़े बहुत उतार- चढ़ाव तो आते थे, पर अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिसे अघटित कहा जा सके। पर दैव का कोप कहें या दुर्विपाक, एकाएक सब कुछ उलट- पुलट गया। समय का फेर जिन्दगी में होता है, ऐसा लगने लगा। ग्रहों की क्रूर दशा साफ नजर आने लगी। खेती, घर, काम- काज, रिश्तों का संसार, सब कहीं टुटन- दरारें नजर आने लगी। हानि, षडयन्त्र और अपमान से विष्णु शंकर का जीवन घिर गया। वह क्या करें, कैसे करे, कहाँ जाय कुछ भी नहीं सूझ रहा था।
🔷 यहाँ तक कि हमेशा शांत एवम् स्वस्थ रहने वाले विष्णु शंकर चिड़चिड़े ,अन्यमनस्क, उदासीन एवं अवसादग्रस्त रहने लगे। विपरीत परिस्थितियों का प्रचण्ड वेग उन्हें असहाय बनाने लगा। ऐसी असहायता में उन्हें यदा- कदा आत्महत्या के विचार घेर लेते। अकेले बैठेकर वह फुट- फुटकर रोते रहते। कभी- कभी शिवालय जाकर भगवान शिव की लिंगमूर्ति के सामने बिलख उठते, परंतु उपाय नदारत था। अब तो असहा आर्थिक हानि के कारण भुखे- मरने की नौबत आ पहुँची थी। परन्तु कोई उपाय न था।
🔶 पर उस दिन सोते समय उन्होंने सपने में देखा कि एक श्रेव्त केश दाढ़ी एवं देदीप्यमान चेहरे वाले ऋषि उन्हें सान्त्वना देते हुए कह रहे है -धैर्य रखो पुत्र! यह पुर्वजन्म के कर्मों के कारण आया दुर्विपाक है। इस जीवन में तुमने ऐसे कोई काम नहीं किए, जिसका तुम्हें इतना कठोर दण्ड मिलता। पर कर्म तो कर्म होते है, इस जीवन के हों या पिछले जीवन के, भोगने तो पड़ते ही है, धैर्य रखो और कठिन तप में अपने को प्रवृत करो। तुम्हारे कठोर तप के प्रभाव से यह अंधेरा छिन्न- भिन्न हो जाएगा, पर तप का आधार क्या हो? अंतस में यह अनुगूँज उठी। यह अनुगूँज देर तक रहती इसके पहले ही ऋषि ने कहा- गुरुगीता भगवान शिव की वाणी है। शिवमुख से उच्चारित होने के कारण यह परम मंत्र है। इसमें असीम ऊर्जा समायी है। इसे ही अपने तप का आधार बनाओ।
🔷 उस दिव्य स्वप्र में ही उन ऋषि ने उन्हें तप की प्रकिया समझा दी। चन्द्रायण व्रत, नियमित गायत्री जप और गुरुगीता जप और गुरुगीता का पाठ अनुष्ठान, उन ऋषि ने मस्तक पर हाथ रखा। उनके दिव्य स्पर्श से विष्णुशंकर के मन का अवसाद जाता रहा। निद्रा से जगकर उन्हें चैतन्यता लग रही थी। मन हल्का था और उनमें तप का उत्साह संचारित हो रहा था। अगले दिन गुरुवार था। गुरुवार- गुरुचेतना के स्मरण का पुनीत क्षण है। ऐसा समझते हुए उन्होंने इस पावन क्षण में जो पुष्य नक्षत्र से भी जुड़ा था। ऐसे गुरुपुष्य योग में विष्णु शंकर ने अपनी तप साधना आरम्भ कर दी।
🔶 हालांकि परिस्थितियों में अभी भी अपमान, षड़यंत्र ,हानि एवं कुचक्रों के प्रबल झंझावात उठ रहे थे। पर अब मन:स्थिति भिन्न थी, उसमें तप के लिए प्रबल उत्साह था और दैवी सहायता पर प्रबल विश्वास भी। इसी विश्वास की पूँजी के साथ तप की अंतर्धारा बह चली। दिवस, मास बीतने लगे। छ: महीने तक तो परिस्थितियों में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं दिखाई दिया, परन्तु छह महीने बाद घने अँधेरे में प्रकाश की किरणें फुटने लगी। इतना हुआ कि भूखे मरने की नौबत समाप्त हुई। बाहर अपमान एवं व्यंग के अवसर कम होने लगे सघन अँधेरे में यह उजाले की वृष्टि बढ़ती गयी। गुरुगीता ने उन्हें आश्रय, आश्र्वासन एवं सुफल सभी कुछ दिया। अब वह अनुभव कर रहे थे कि गुरुगीता दुष्कर संकटों का सार्थक समाधान है, जो संकटों के पाश से पाश से मुक्त कर गुरुभक्ति ईश्वरनिष्ठा का वरदान देती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 193
🔶 विष्णु शंकर सामान्य गृहस्थ थे। उनकी जीवन यात्रा सामान्य जनों की भाँति साधारण चल रही थी। घर- परिवार की मामूली उलझनों के साथ सब कुछ ठीक था। थोड़े बहुत उतार- चढ़ाव तो आते थे, पर अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिसे अघटित कहा जा सके। पर दैव का कोप कहें या दुर्विपाक, एकाएक सब कुछ उलट- पुलट गया। समय का फेर जिन्दगी में होता है, ऐसा लगने लगा। ग्रहों की क्रूर दशा साफ नजर आने लगी। खेती, घर, काम- काज, रिश्तों का संसार, सब कहीं टुटन- दरारें नजर आने लगी। हानि, षडयन्त्र और अपमान से विष्णु शंकर का जीवन घिर गया। वह क्या करें, कैसे करे, कहाँ जाय कुछ भी नहीं सूझ रहा था।
🔷 यहाँ तक कि हमेशा शांत एवम् स्वस्थ रहने वाले विष्णु शंकर चिड़चिड़े ,अन्यमनस्क, उदासीन एवं अवसादग्रस्त रहने लगे। विपरीत परिस्थितियों का प्रचण्ड वेग उन्हें असहाय बनाने लगा। ऐसी असहायता में उन्हें यदा- कदा आत्महत्या के विचार घेर लेते। अकेले बैठेकर वह फुट- फुटकर रोते रहते। कभी- कभी शिवालय जाकर भगवान शिव की लिंगमूर्ति के सामने बिलख उठते, परंतु उपाय नदारत था। अब तो असहा आर्थिक हानि के कारण भुखे- मरने की नौबत आ पहुँची थी। परन्तु कोई उपाय न था।
🔶 पर उस दिन सोते समय उन्होंने सपने में देखा कि एक श्रेव्त केश दाढ़ी एवं देदीप्यमान चेहरे वाले ऋषि उन्हें सान्त्वना देते हुए कह रहे है -धैर्य रखो पुत्र! यह पुर्वजन्म के कर्मों के कारण आया दुर्विपाक है। इस जीवन में तुमने ऐसे कोई काम नहीं किए, जिसका तुम्हें इतना कठोर दण्ड मिलता। पर कर्म तो कर्म होते है, इस जीवन के हों या पिछले जीवन के, भोगने तो पड़ते ही है, धैर्य रखो और कठिन तप में अपने को प्रवृत करो। तुम्हारे कठोर तप के प्रभाव से यह अंधेरा छिन्न- भिन्न हो जाएगा, पर तप का आधार क्या हो? अंतस में यह अनुगूँज उठी। यह अनुगूँज देर तक रहती इसके पहले ही ऋषि ने कहा- गुरुगीता भगवान शिव की वाणी है। शिवमुख से उच्चारित होने के कारण यह परम मंत्र है। इसमें असीम ऊर्जा समायी है। इसे ही अपने तप का आधार बनाओ।
🔷 उस दिव्य स्वप्र में ही उन ऋषि ने उन्हें तप की प्रकिया समझा दी। चन्द्रायण व्रत, नियमित गायत्री जप और गुरुगीता जप और गुरुगीता का पाठ अनुष्ठान, उन ऋषि ने मस्तक पर हाथ रखा। उनके दिव्य स्पर्श से विष्णुशंकर के मन का अवसाद जाता रहा। निद्रा से जगकर उन्हें चैतन्यता लग रही थी। मन हल्का था और उनमें तप का उत्साह संचारित हो रहा था। अगले दिन गुरुवार था। गुरुवार- गुरुचेतना के स्मरण का पुनीत क्षण है। ऐसा समझते हुए उन्होंने इस पावन क्षण में जो पुष्य नक्षत्र से भी जुड़ा था। ऐसे गुरुपुष्य योग में विष्णु शंकर ने अपनी तप साधना आरम्भ कर दी।
🔶 हालांकि परिस्थितियों में अभी भी अपमान, षड़यंत्र ,हानि एवं कुचक्रों के प्रबल झंझावात उठ रहे थे। पर अब मन:स्थिति भिन्न थी, उसमें तप के लिए प्रबल उत्साह था और दैवी सहायता पर प्रबल विश्वास भी। इसी विश्वास की पूँजी के साथ तप की अंतर्धारा बह चली। दिवस, मास बीतने लगे। छ: महीने तक तो परिस्थितियों में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं दिखाई दिया, परन्तु छह महीने बाद घने अँधेरे में प्रकाश की किरणें फुटने लगी। इतना हुआ कि भूखे मरने की नौबत समाप्त हुई। बाहर अपमान एवं व्यंग के अवसर कम होने लगे सघन अँधेरे में यह उजाले की वृष्टि बढ़ती गयी। गुरुगीता ने उन्हें आश्रय, आश्र्वासन एवं सुफल सभी कुछ दिया। अब वह अनुभव कर रहे थे कि गुरुगीता दुष्कर संकटों का सार्थक समाधान है, जो संकटों के पाश से पाश से मुक्त कर गुरुभक्ति ईश्वरनिष्ठा का वरदान देती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 193
👉 आरोप
🔶 एक युगल को शादी के 11 साल बाद एक लड़का हुआ। उनका लड़का उनकी आँखों का तारा था। एक सुबह, आदमी को काम पर जाने के लिए देरी हो रही थी जाते जाते उसने कमरे में एक दवाई की बोतल खुली देखी, उसने अपनी पत्नी से उस बोतल को ढक्कन लगा कर अलमारी में रखने को कहा, लड़के की मम्मी रसोई घर में तल्लिन थी, वो ये बात पूरी तरह से भूल गयी थी।
🔷 लड़का जो तक़रीबन 2 साल का था कमरे में खेलते-खेलते वो बोतल देखी और उस बोतल की ओर गया, उसने उसमे की पूरी दवाई पी ली। उस दवाई की ज्यादा मात्रा छोटे बच्चो को जहरीली हो सकती थी। दवाई पीने के बाद वह लड़का बेहोश हो गया, उसकी मम्मी उसे जल्द से जल्द अस्पताल ले गयी जहाँ उसकी मौत हो गयी। उसकी मम्मी पूरी तरह से हैरान हो गयी थी, वह भयभीत हो गयी थी, की कैसे वो अब अपने पति का सामना करेंगी?
🔶 जब लड़के के परेशान पिता अस्पताल में आये तो उन्होंने अपने बेटे को मृत पाया और अपनी पत्नी और देखते हुए सिर्फ चार शब्द कहे। आपको क्या लगता है कौन से होंगे वो चार शब्द?
🔷 पति ने सिर्फ इतना ही कहा- “ I Love You Darling”. उसके पति का अनअपेक्षित व्यवहार आश्चर्यचकित करने वाला था, उसका लड़का मर चूका था, वो उसे कभी वापिस नहीं आ सकता था, और वो अपनी पत्नी में भी कोई कसूर नहीं ढूंढ रहा था क्योंकि वो सोच रहा था की अगर उसने खुद वह बोतल उठाके बाजू में रख दी होती तो आज उसके साथ यह सब न होता।
🔶 वो किसी पर भी आरोप नहीं लगा रहा था, क्योंकि उसकी पत्नी ने भी अपना एकलौता बेटा खो दिया था. उस समय उसे सिर्फ अपने पति से सहानुभूति और दिलासा चाहिये थी. और यही उसके पति ने उस समय उसे दिया।
🔷 मित्रों कभी-कभी हम इसी में समय व्यर्थ कर देते है की परिस्थिती के लिए कौन जिम्मेदार है या कौन आरोपी है, ये सब हमारे आपसी रिश्तों में होता है, जहाँ काम करते है वहाँ या जिन लोगो को हम जानते है उन सभी के साथ होता है, और परिस्थिती के आवेश में आकर हम अपने रिश्तों को भूल जाते है और एक दुसरे का सहारा बनने के बजाये एक दुसरे पर आरोप लगाते है।
🔶 कुछ भी हो जाये, हम उस व्यक्ति को कभी भी नहीं भूल सकते जिसे हम प्रेम करते है, इसीलिए जीवन में जो आसान है उसे प्रेम करो।
🔷 आपके पास अभी जो है उसे जमा करो, और अपनी तकलीफों को विचार कर-कर के बढ़ाने के बजाये उन्हें भूल जाओ. उन सभी चीजो का सामना करो जो आपको अभी मुश्किल लगती है या जिनसे आपको डर लगता है सामना करने के बाद आप देखोंगे के वो चीजे उतनी मुश्किल नहीं है जितना की आप पहले सोच रहे थे। हमें परिस्थिती को समझकर ही लोगो के साथ व्यवहार करना चाहिये, और कठिन परिस्थितियों में उनका हमदर्द बनना चाहिये।
🔷 लड़का जो तक़रीबन 2 साल का था कमरे में खेलते-खेलते वो बोतल देखी और उस बोतल की ओर गया, उसने उसमे की पूरी दवाई पी ली। उस दवाई की ज्यादा मात्रा छोटे बच्चो को जहरीली हो सकती थी। दवाई पीने के बाद वह लड़का बेहोश हो गया, उसकी मम्मी उसे जल्द से जल्द अस्पताल ले गयी जहाँ उसकी मौत हो गयी। उसकी मम्मी पूरी तरह से हैरान हो गयी थी, वह भयभीत हो गयी थी, की कैसे वो अब अपने पति का सामना करेंगी?
🔶 जब लड़के के परेशान पिता अस्पताल में आये तो उन्होंने अपने बेटे को मृत पाया और अपनी पत्नी और देखते हुए सिर्फ चार शब्द कहे। आपको क्या लगता है कौन से होंगे वो चार शब्द?
🔷 पति ने सिर्फ इतना ही कहा- “ I Love You Darling”. उसके पति का अनअपेक्षित व्यवहार आश्चर्यचकित करने वाला था, उसका लड़का मर चूका था, वो उसे कभी वापिस नहीं आ सकता था, और वो अपनी पत्नी में भी कोई कसूर नहीं ढूंढ रहा था क्योंकि वो सोच रहा था की अगर उसने खुद वह बोतल उठाके बाजू में रख दी होती तो आज उसके साथ यह सब न होता।
🔶 वो किसी पर भी आरोप नहीं लगा रहा था, क्योंकि उसकी पत्नी ने भी अपना एकलौता बेटा खो दिया था. उस समय उसे सिर्फ अपने पति से सहानुभूति और दिलासा चाहिये थी. और यही उसके पति ने उस समय उसे दिया।
🔷 मित्रों कभी-कभी हम इसी में समय व्यर्थ कर देते है की परिस्थिती के लिए कौन जिम्मेदार है या कौन आरोपी है, ये सब हमारे आपसी रिश्तों में होता है, जहाँ काम करते है वहाँ या जिन लोगो को हम जानते है उन सभी के साथ होता है, और परिस्थिती के आवेश में आकर हम अपने रिश्तों को भूल जाते है और एक दुसरे का सहारा बनने के बजाये एक दुसरे पर आरोप लगाते है।
🔶 कुछ भी हो जाये, हम उस व्यक्ति को कभी भी नहीं भूल सकते जिसे हम प्रेम करते है, इसीलिए जीवन में जो आसान है उसे प्रेम करो।
🔷 आपके पास अभी जो है उसे जमा करो, और अपनी तकलीफों को विचार कर-कर के बढ़ाने के बजाये उन्हें भूल जाओ. उन सभी चीजो का सामना करो जो आपको अभी मुश्किल लगती है या जिनसे आपको डर लगता है सामना करने के बाद आप देखोंगे के वो चीजे उतनी मुश्किल नहीं है जितना की आप पहले सोच रहे थे। हमें परिस्थिती को समझकर ही लोगो के साथ व्यवहार करना चाहिये, और कठिन परिस्थितियों में उनका हमदर्द बनना चाहिये।
सोमवार, 11 जून 2018
👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (अन्तिम भाग)
🔷 स्वजन के शोक के साथ मृतक-भोज की अनावश्यक, अपव्ययता के दोहरे दण्ड से बच कर वह न जाने कितना खुश होगा। हां इसमें थोड़ी सी यह बात अवश्य हो सकती है कि इस भोज के मृतक का सम्बन्धी स्वजनों एवं जातीय लोगों के आगमन से अपने तथा अपने घर को पवित्र होने की जो धारणा रखता है उसको कुछ ठेस लगेगी। इसके स्थान पर पवित्रीकरण के लिए थोड़ा कर्मकांड एवं थोड़ा दान-पुण्य स्वेच्छापूर्वक किया जा सकता है।
🔶 अब मृतक-भोज के समर्थकों एवं परिपालकों को सोचना चाहिए कि वे अपने किसी सजातीय बन्धु पर मृतक-भोज देने के लिए दबाव डाल कर कितना बड़ा अत्याचार करते हैं। किसी का घर बरबाद कर देना सामाजिकता अथवा सजातीयता इसमें है कि मृतक भोज का दण्ड देने के बजाय अपने जातीय बन्धु को अधिक से अधिक सान्त्वना दी जाये, उसे न घबराने के लिए ढांढस बंधाया जाये और यदि घर का संचालक दिवंगत हो गया है तो उसकी विधवा तथा बच्चों की यथासंभव सहायता की जाये। चाहिए तो यह कि उसकी जाति-बिरादरी के लोग और बन्धु-बांधव अपने शोक-संतप्त भाई को सान्त्वना एवं सहायता दें किन्तु लोग उससे मृतक-भोज लेकर मरे को और मार डालते हैं यदि कोई इस दण्ड का भार वहन नहीं कर पाता तो उसकी जाति बाहर करके दीन-दुनियां के अयोग्य बना देते हैं।
🔷 अपने किसी सजातीय अथवा बन्धु-बांधव की इस प्रकार उभय प्रकारेण हत्या ठीक नहीं। इससे सामाजिक एवं जातीय ह्रास होता है। बन्धु-वध जैसा पाप लगता है। अस्तु, आवश्यक है कि मृतक भोज खाने वाले इसे हर प्रकार से अनुचित समझकर इसका सर्वथा बहिष्कार करके समाज एवं जाति का उपकार करें।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 86
🔶 अब मृतक-भोज के समर्थकों एवं परिपालकों को सोचना चाहिए कि वे अपने किसी सजातीय बन्धु पर मृतक-भोज देने के लिए दबाव डाल कर कितना बड़ा अत्याचार करते हैं। किसी का घर बरबाद कर देना सामाजिकता अथवा सजातीयता इसमें है कि मृतक भोज का दण्ड देने के बजाय अपने जातीय बन्धु को अधिक से अधिक सान्त्वना दी जाये, उसे न घबराने के लिए ढांढस बंधाया जाये और यदि घर का संचालक दिवंगत हो गया है तो उसकी विधवा तथा बच्चों की यथासंभव सहायता की जाये। चाहिए तो यह कि उसकी जाति-बिरादरी के लोग और बन्धु-बांधव अपने शोक-संतप्त भाई को सान्त्वना एवं सहायता दें किन्तु लोग उससे मृतक-भोज लेकर मरे को और मार डालते हैं यदि कोई इस दण्ड का भार वहन नहीं कर पाता तो उसकी जाति बाहर करके दीन-दुनियां के अयोग्य बना देते हैं।
🔷 अपने किसी सजातीय अथवा बन्धु-बांधव की इस प्रकार उभय प्रकारेण हत्या ठीक नहीं। इससे सामाजिक एवं जातीय ह्रास होता है। बन्धु-वध जैसा पाप लगता है। अस्तु, आवश्यक है कि मृतक भोज खाने वाले इसे हर प्रकार से अनुचित समझकर इसका सर्वथा बहिष्कार करके समाज एवं जाति का उपकार करें।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 86
👉 आत्मबोध की प्राप्ति
🔷 मनुष्य को विवेक बुद्धि प्राप्त है। इसलिए वह श्रेष्ठ है, पर यदि मनुष्य इस विवेक बुद्धि को ताक में रखकर केवल पेट-प्रजनन और लोभ-लिप्सा में ही संलग्र रहे, तो बहुत कुछ मायने में पशु भी उससे अच्छे ही सिद्ध होंगे। अप्राकृतिक आहार-विहार पशुओं को पसंद नहीं, जबकि मनुष्य अपनी प्रकृति के विपरीत अभक्ष्याभक्ष्य खाने और उदर को कब्रगाह बनाने में परहेज नहीं करता। ऐसी स्थिति में मनुष्य को मात्र शरीर संरचना के बल पर ही श्रेष्ठ कहना उचित नहीं। उसमें विद्यमान असीमित शक्ति-सामथ्र्य का जब विवेकपूर्वक समाज उत्थान, राष्ट उत्थान में नियोजन किया जाता है, तो वही व्यक्ति सच्चा इंसान, मानव कहलाने का हकदार बनता है, अन्यथा नर पशु का जीवनयापन करता हुआ पूरे समाज के लिए हानिकारक ही सिद्ध होगा।
🔶 बाह्य ज्ञान के समान अंत:ज्ञान का होना भी आवश्यक माना गया है। सुख- सुविधाओं की वृद्धि के साथ-साथ उनके उपयोग, उपभोग की भी समुचित जानकारी होनी चाहिए। आत्म ज्ञान के अभाव में मनुष्य भी दर-दर की ठोंकरें खाता फिर रहा है। इस पर उसे विचार करना चाहिए कि उसके जीवन का उद्देश्य क्या है? इस विषय में सबसे ज्यादा खोज-अनुसंधान कार्य प्राचीन काल से भारत में ही हुआ है। भारतीय मनीषियों ने इसे सर्वसुलभ भी बनाया था, तभी भारत बहुमुखी विकास के मार्ग में आगे बढ़ सका था।
🔷 परमाणु सविस्तृत पदार्थ का ही एक छोटा-सा घटक है। इसी प्रकार प्रकाश ऊर्जा क्या है? दिग्-दिगन्त में विस्तृत महासूर्य का ही एक अंश है। महासागरों में उठने वाली लहरें आखिरकार उसी सागर का ही तो एक अंश है। इसी प्रकार आत्मा भी परमात्मा का ही एक अंश मात्र है। देखने में इन सभी का स्वतंत्र अस्तित्व दिखाई पड़ता है, किन्तु यह सभी अपने मूल तत्त्व के ही एक अंश मात्र होते हैं। एक ही आकाश तत्त्व घर-घर में समाया हुआ है, जबकि है वह सभी महाकाश का भाग। ऐसे ही प्राणियों की जीवात्मा भी विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त महाचेतना का ही एक अंश है।
🔶 आत्मा को उसके सीमित दायरे से निकालकर बाहर कर देने से संकीर्ण स्वार्थपरता का भाव तिरोहित होता चला जाता है। स्वयं को उस समाज का अभिन्न अंग मानकर चलने से अपना महत्त्व व सम्मान भी बना रहता है। मशीन हजारों छोटे-बड़े पुर्जों को जोडक़र बनती व चलती है। उसके एक-एक पुर्जे का पृथक् कोई महत्त्व नहीं होता। इसी प्रकार मानव भी समाज रूपी विस्तृत मशीन का एक पुर्जा ही है। समाज से बाहर पृथक् उसका कोई महत्त्व नहीं है। यह बात जिसके गले जितनी जल्दी उतर सके, समझा जाना चाहिए कि उसने अपना विस्तार कर लिया। समाज में ऐसे ही लोग सम्मानित और प्रशंसित होते हैं। पृथक्तावादी अपनापन प्राणिमात्र के लिए बहुत ही प्रिय है। इस प्रकार की आत्मीयता जिस व्यक्ति, जीव या पदार्थ पर आरोपित कर दी जाती है, वही परम प्रिय प्रतीत होने लगता है।
🔷 अपना दायरा संकीर्ण कर लेने से अपने शरीर, अपने परिवार की ही सुख-सुविधा का ध्यान रखा जाता है। यदि यही प्यार का दायरा विस्तृत कर पास-पड़ौस और पूरे समाज तक फैला दिया जाय, तो अपना आत्म विस्तार होता चला जाता है। यही दायरा धीरे-धीरे सीमित से असीम तक पहँुचाया जा सकता है। परमात्मा की समस्त शक्तियाँ व गुण आत्मा में अंश रूप में विद्यमान होते हैं। उसे विकसित करने भर की आवश्यकता है। अग्रि की एक चिनगारी में वह सभी गुण विद्यमान होते हैं, जो दावानल में होते हैंं। अणु के परमाणु उसी गति व गुण, धर्म के अनुरूप गतिशील पाए जाते हैं। इस प्रकार समूचा विश्व ब्रह्माण्ड जिसमें मानवीय चेतना भी है, उसी एक महाचेतना के साथ सूक्ष्म रूप में सूत्रबद्ध होकर गतिमान हो रहे हैं।
✍🏻 पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
🔶 बाह्य ज्ञान के समान अंत:ज्ञान का होना भी आवश्यक माना गया है। सुख- सुविधाओं की वृद्धि के साथ-साथ उनके उपयोग, उपभोग की भी समुचित जानकारी होनी चाहिए। आत्म ज्ञान के अभाव में मनुष्य भी दर-दर की ठोंकरें खाता फिर रहा है। इस पर उसे विचार करना चाहिए कि उसके जीवन का उद्देश्य क्या है? इस विषय में सबसे ज्यादा खोज-अनुसंधान कार्य प्राचीन काल से भारत में ही हुआ है। भारतीय मनीषियों ने इसे सर्वसुलभ भी बनाया था, तभी भारत बहुमुखी विकास के मार्ग में आगे बढ़ सका था।
🔷 परमाणु सविस्तृत पदार्थ का ही एक छोटा-सा घटक है। इसी प्रकार प्रकाश ऊर्जा क्या है? दिग्-दिगन्त में विस्तृत महासूर्य का ही एक अंश है। महासागरों में उठने वाली लहरें आखिरकार उसी सागर का ही तो एक अंश है। इसी प्रकार आत्मा भी परमात्मा का ही एक अंश मात्र है। देखने में इन सभी का स्वतंत्र अस्तित्व दिखाई पड़ता है, किन्तु यह सभी अपने मूल तत्त्व के ही एक अंश मात्र होते हैं। एक ही आकाश तत्त्व घर-घर में समाया हुआ है, जबकि है वह सभी महाकाश का भाग। ऐसे ही प्राणियों की जीवात्मा भी विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त महाचेतना का ही एक अंश है।
🔶 आत्मा को उसके सीमित दायरे से निकालकर बाहर कर देने से संकीर्ण स्वार्थपरता का भाव तिरोहित होता चला जाता है। स्वयं को उस समाज का अभिन्न अंग मानकर चलने से अपना महत्त्व व सम्मान भी बना रहता है। मशीन हजारों छोटे-बड़े पुर्जों को जोडक़र बनती व चलती है। उसके एक-एक पुर्जे का पृथक् कोई महत्त्व नहीं होता। इसी प्रकार मानव भी समाज रूपी विस्तृत मशीन का एक पुर्जा ही है। समाज से बाहर पृथक् उसका कोई महत्त्व नहीं है। यह बात जिसके गले जितनी जल्दी उतर सके, समझा जाना चाहिए कि उसने अपना विस्तार कर लिया। समाज में ऐसे ही लोग सम्मानित और प्रशंसित होते हैं। पृथक्तावादी अपनापन प्राणिमात्र के लिए बहुत ही प्रिय है। इस प्रकार की आत्मीयता जिस व्यक्ति, जीव या पदार्थ पर आरोपित कर दी जाती है, वही परम प्रिय प्रतीत होने लगता है।
🔷 अपना दायरा संकीर्ण कर लेने से अपने शरीर, अपने परिवार की ही सुख-सुविधा का ध्यान रखा जाता है। यदि यही प्यार का दायरा विस्तृत कर पास-पड़ौस और पूरे समाज तक फैला दिया जाय, तो अपना आत्म विस्तार होता चला जाता है। यही दायरा धीरे-धीरे सीमित से असीम तक पहँुचाया जा सकता है। परमात्मा की समस्त शक्तियाँ व गुण आत्मा में अंश रूप में विद्यमान होते हैं। उसे विकसित करने भर की आवश्यकता है। अग्रि की एक चिनगारी में वह सभी गुण विद्यमान होते हैं, जो दावानल में होते हैंं। अणु के परमाणु उसी गति व गुण, धर्म के अनुरूप गतिशील पाए जाते हैं। इस प्रकार समूचा विश्व ब्रह्माण्ड जिसमें मानवीय चेतना भी है, उसी एक महाचेतना के साथ सूक्ष्म रूप में सूत्रबद्ध होकर गतिमान हो रहे हैं।
✍🏻 पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 मेहनत की कमाई
🔷 किसी नगर में एक नारायण नाम का एक अमीर साहूकार रहता था। उसके दो संतान थी जिनमे से एक बेटा और एक बेटी थी। बेटी की शादी हुए चार साल से अधिक हो गया था और वो अपने ससुराल में बहुत खुश थी। जबकि उसका बेटा राजू वैसे तो मुर्ख नहीं था लेकिन फिर भी गलत संगति और बाप की और बचपन में दिए अधिक लाड प्यार ने उस बिगाड़ दिया था।
🔶 अपनी मेहनत की कमाई को बेटे के द्वारा यूँ उड़ाते देखकर नारायण को चिंता हुई तो उस नगर में एक गृहस्थ विद्वान थे नारायण ने उनसे सलाह मांगने की सोची। खूब बाते हुए नारायण ने उन्हें पूरी बात बताई।
🔷 दूसरे दिन नारायण ने राजू को बुलाया और बोला कि बेटा आज शाम का खाना तुम्हे तभी मिलेगा जब तुम आज कुछ कमाकर लाओगे। सुनकर राजू को रोना आ गया उसे रोता देखकर राजू के माँ की ममता पिघल गयी सो उसने उसे एक रुपया दे दिया। शाम को जब नारायण ने उसे बुलाया और उस से पुछा तो उसने एक रुपया दिखना दिया कि मैं ये कमाकर लाया हूँ इस पर राजू के पिता ने उसे उस रूपये को कुँए में फेकने के लिए कहा उसने बिना किसी हिचकिचाहट के उसे कुँए में फेक दिया क्योंकि वो उसकी मेहनत का नहीं था। अब नारायण को अपनी पत्नी पर शक हुआ तो उसने अपनी पत्नी को उसके मायके भेज दिया। दुसरे दिन भी यही परीक्षा हुई तो राजू की बहन जो मायके आई हुई थी उसने उसे रुपया दे दिया और फिर पिछली शाम की तरह उसने बिना किसी झिझक के वो भी पिता के कहने पर कुए में फेक दिया। तो फिर से नारायण को लगा कि दाल में कुछ तो काला है उसने अपनी बेटी को उसके ससुराल वापिस भेज दिया।
🔶 अब तीसरी बार राजू का इम्तिहान होना था लेकिन इस बार उसकी मदद के लिए कोई नहीं था क्योंकि माँ और बहन तो जा चुके थे और दोस्तों ने भी कुछ मदद करने से मना कर दिया। दोपहर तक सोचने के बाद उसे शाम के खाने की चिंता सता रही थी और उसे लग रहा था कि अब तो मेहनत करके ही कुछ करना पड़ेगा और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। सो वो एक जगह गया और दो घंटे बोझा ढोने के बाद उसे एक रुपया नसीब हुआ। पसीने से भीगा हुआ वो एक रुपया लेकर घर पहुंचा उसे लगा अब तो उसके पिता उस पर तरस खायेंगे लेकिन नारायण ने आते ही उसे उसकी कमाई के बारे में पुछा राजू ने अपनी जेब में से कड़ी मेहनत एक रुपया निकाला पहले की भांति राजू को उसने पिता ने उस रूपये को कुँए में फेक आने के लिए कहा तो राजू छटपटाया।
🔷 राजू ने कहा ‘आज मेरा कितना पसीना बहा है बस इस एक रूपये को पाने के लिए मैं इसे नहीं फेंक सकता।’ जैसे ही ये शब्द उसके मुह से निकले उसे अपनी गलती का खुद ही अहसास हो गया। नारायण खुश हुआ कि उसके बेटे को अब मेहनत के रूपये की कीमत पता चल गयी है।
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🔶 अपनी मेहनत की कमाई को बेटे के द्वारा यूँ उड़ाते देखकर नारायण को चिंता हुई तो उस नगर में एक गृहस्थ विद्वान थे नारायण ने उनसे सलाह मांगने की सोची। खूब बाते हुए नारायण ने उन्हें पूरी बात बताई।
🔷 दूसरे दिन नारायण ने राजू को बुलाया और बोला कि बेटा आज शाम का खाना तुम्हे तभी मिलेगा जब तुम आज कुछ कमाकर लाओगे। सुनकर राजू को रोना आ गया उसे रोता देखकर राजू के माँ की ममता पिघल गयी सो उसने उसे एक रुपया दे दिया। शाम को जब नारायण ने उसे बुलाया और उस से पुछा तो उसने एक रुपया दिखना दिया कि मैं ये कमाकर लाया हूँ इस पर राजू के पिता ने उसे उस रूपये को कुँए में फेकने के लिए कहा उसने बिना किसी हिचकिचाहट के उसे कुँए में फेक दिया क्योंकि वो उसकी मेहनत का नहीं था। अब नारायण को अपनी पत्नी पर शक हुआ तो उसने अपनी पत्नी को उसके मायके भेज दिया। दुसरे दिन भी यही परीक्षा हुई तो राजू की बहन जो मायके आई हुई थी उसने उसे रुपया दे दिया और फिर पिछली शाम की तरह उसने बिना किसी झिझक के वो भी पिता के कहने पर कुए में फेक दिया। तो फिर से नारायण को लगा कि दाल में कुछ तो काला है उसने अपनी बेटी को उसके ससुराल वापिस भेज दिया।
🔶 अब तीसरी बार राजू का इम्तिहान होना था लेकिन इस बार उसकी मदद के लिए कोई नहीं था क्योंकि माँ और बहन तो जा चुके थे और दोस्तों ने भी कुछ मदद करने से मना कर दिया। दोपहर तक सोचने के बाद उसे शाम के खाने की चिंता सता रही थी और उसे लग रहा था कि अब तो मेहनत करके ही कुछ करना पड़ेगा और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। सो वो एक जगह गया और दो घंटे बोझा ढोने के बाद उसे एक रुपया नसीब हुआ। पसीने से भीगा हुआ वो एक रुपया लेकर घर पहुंचा उसे लगा अब तो उसके पिता उस पर तरस खायेंगे लेकिन नारायण ने आते ही उसे उसकी कमाई के बारे में पुछा राजू ने अपनी जेब में से कड़ी मेहनत एक रुपया निकाला पहले की भांति राजू को उसने पिता ने उस रूपये को कुँए में फेक आने के लिए कहा तो राजू छटपटाया।
🔷 राजू ने कहा ‘आज मेरा कितना पसीना बहा है बस इस एक रूपये को पाने के लिए मैं इसे नहीं फेंक सकता।’ जैसे ही ये शब्द उसके मुह से निकले उसे अपनी गलती का खुद ही अहसास हो गया। नारायण खुश हुआ कि उसके बेटे को अब मेहनत के रूपये की कीमत पता चल गयी है।
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