बुधवार, 30 मई 2018

👉 बाधाएं हमें मजबूत बनाती हैं।

🔷 किसी गाँव में एक धर्मपरायण किसान रहा करता था। उसकी फसल अक्सर खराब हो जाया करती थी। कभी बाढ़ आ जाया करती थी तो कभी सूखे की वजह से उसकी फसल बर्बाद हो जाया करती । कभी गर्मी बेहद होती तो कभी ठण्ड इतनी होती कि वो बेचारा कभी भी अपनी फसल को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर पाया।

🔶 एक दिन किसान दुखी होकर मंदिर में जा पहुंचा और भगवान की मूर्ती के आगे खड़ा हो कर कहने लगा भगवान बेशक आप परमात्मा है लेकिन फिर भी लगता है आपको खेती बाड़ी की जरा भी जानकारी नहीं है। कृपया करके एक बार बस मेरे अनुसार मौसम को होने दीजिये फिर देखिये मैं कैसे अपने अन्न के भंडार को भरता हूँ। इस पर आकाशवाणी हुई कि ” तथास्तु वत्स जैसे तुम चाहोगे आज के बाद वेसा ही मौसम हो जाया करेगा और ये साल मैंने तुमको दिया।” किसान बड़ा ख़ुशी ख़ुशी घर आया । और उसने गेहूं की फसल बो दी।

🔷 क्या होता है कि उस बरस भगवान ने कुछ भी अपने अनुसार नहीं किया और किसान जब चाहता धूप खिल जाया करती और जब वो चाहता तो बारिश हो जाती लेकिन किसान ने कभी भी तूफान को और अंधड़ को नहीं आने दिया। बड़ी अच्छी फसल हुई। पौधे बड़े लहलहा रहे थे। समय के साथ साथ फसल भी बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी।

🔶 आखिर फसल काटने का समय आ गया किसान बड़ी ख़ुशी से खेतों की और गया और फसल को काटने के लिए जैसे ही खेत में घुसा बड़ा हैरान हुआ और उसकी ख़ुशी भी काफूर हो गयी क्योंकि उसने देखा कि गेंहू की बालियों में एक भी बीज नहीं था। उसका दिल धक् से रह गया। किसान दुखी होकर परमात्मा से कहने लगा ” हे भगवन ये क्या?”

🔷 तब आकाशवाणी हुए कि ” ये तो होना ही था वत्स तुमने जरा भी तूफ़ान, आंधी, ओलो को नहीं आने दिया जबकि यही वो मुश्किलें है जो किसी बीज को शक्ति देता है और वो तमाम मुश्किलों के बीच भी अपना संघर्ष जारी रखते हुए बढ़ता है और अपने जैसे हजारों बीजो को पैदा करता है जबकि तुमने ये मुश्किले ही नहीं आने दी तो कैसे बढ़ता ये बताओ तुम ?”  भगवान ने कहा बिना किसी चुनौतियों के बढ़ते हुए ये पौधे अंदर से खोखले रह गये। यही होना था।

🔶 यह सुनकर किसान को अपनी गलती का अहसास हुआ।

🔷 दोस्तों, जब तक हमारी ज़िंदगी में बाधाएं नहीं आती, परेशानियाँ नहीं आती हैं तब तक हमें भी अपनी ताकत का अंदाजा नहीं होता है। बाधाएं हमें मजबूत बनाती हैं जिससे हम अपनी ज़िंदगी में कुछ नया और बड़ा कार्य करें।

🔶 बस बाधाओं और मुश्किलों से कभी भी घबराना नहीं चाहिए और उनका सामना करते हुए आगे बढ़ता रहना चाहिए।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 31 May 2018

👉 Soul - An Eternal Entity

🔷 “Oh Lord! Some people say soul exists, some say this body itself is the soul; while others say that soul does not exist after death. Please tell me – what is the truth? This is my third boon you have promised to grant me”.

🔶 Like Nachiketa, any human being, who has deeply involved himself in Tapa-Sadhana, Yoga or long-term meditation and contemplation practices but has not yet realized his immortal self-identity, remains in this inquisitive state. Does the soul exist or not? It is a question of paramount importance. Those who are not able to solve this riddle go on groping in dark for a convincing answer but for those who have realized their true – self, life becomes a boon and bliss.

🔷 In this regard, the concepts of Hindu philosophy are very clear. Leaving aside a few thinkers like Maharishi Charak, who identified the sense of soul consciousness with the physical body, most of the Indian seers have considered the soul as an eternal entity independent of the body. Complex methods of yoga have been discovered with the help of which it is possible to take the soul out of the body when a person is alive and make it consciously enter the dead body of another person. The following are few instances of such phenomena.

🔶 During a scriptural debate with Bhagvati Bharati, wife of Mandan Misra, Adi Shankaracharya became answerless on a question that required knowledge of sex. The latter requested for some time to be able to give a convincing reply. Coincidentally, during the same time, the king of Mahishmatinagar died. Shankaracharya made his soul enter the king’s dead body. This process is called Parkaya Pravesh. Daily he used to take out the soul from his body, leaving his dead body lying in the jungle and his soul entering the body of king. During the night when Shankaracharya used to reenter his own body, king’s body became dead. The use of two bodies by a single soul amply proves a separate existence of the soul.

🔷 In 1939, an army commandant L.P. Farrel of the Western Command saw with his own eyes near Assam-Burma border a yogi who came out from his old body and entered the dead body of a young man who then became alive. This incident has been published in the May, 1970 issue of Akhand Jyoti (Hindi edition) on pages 29-30.

🔶 Normally, it is believed that life is based on the process of respiration. But saint Haridas took samadhi for one month in the presence of Maharaja Ranjit Singh and several British officers and established that the relation of the body is related to the soul in the same way as the machine is run by the electrical power. Without the soul the body becomes dead.

🔷 These are a few of the hundreds of recorded testimonies of soul’s immortality.

📖 From Akhand Jyoti  Feb- 2002

👉 भारतीय संस्कृति के विनाश का संकट (भाग 2)

🔷 भारतीय संस्कृति के लिए एक सबसे बड़ा खतरा है, वह है—पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार अभियान। इसकी शुरूआत तभी से हो गई थी जब से अंग्रेज यहां पर आए थे। अपने शासन काल में उन्होंने सभी प्रकार अपनी संस्कृति के प्रसार की नींव मजबूत कर ली। ईसाई मिशनरियों के द्वारा प्रचार और स्कूल कालेजों में शिक्षा के माध्यम से ईसाइयत का प्रसार भारत में शुरू किया और यह आज के स्वतन्त्र भारत में बढ़ा ही है कम नहीं हुआ है।

🔶 संस्कृति के इस प्रचार अभियान के कारण प्रतिवर्ष लाखों भारतीय ईसाई बन रहे हैं। स्वदेशी रहन-सहन, भाषा, भाव, विचारों का परित्याग करके वे अपने सांस्कृतिक गौरव को भुला रहे हैं। उधर विदेशी लोग अपनी संस्कृति के प्रसार के लिए करोड़ों रुपया पानी की तरह बहा रहे हैं। जन सेवा के लिए चलाए जाने वाले समस्त ईसाई चर्च, स्कूल, अस्पताल सेवा संस्थायें आदि मूल रूप में ईसाइयत के प्रचार संस्थान हैं। ये लोग भारतीयों की आस्थाओं को नष्ट करके, बहका-फुसलाकर, नौकरी, विवाह, शिक्षा तथा अन्य वस्तुओं का लोभ देकर उन्हें अपनी संस्कृति में रंग रहे हैं। आसाम, बम्बई, महाराष्ट्र, बिहार, उड़ीसा, केरल, मद्रास के आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरी पूरे जोर-शोर के साथ अपना काम कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में जांच, पड़ताल करने पर बड़े सनसनी पूर्ण तथ्य मिलते हैं।

🔷 ईसाई स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली बहुत सी पुस्तकों में हमारी संस्कृति के आदर्श नायक राम और कृष्ण के सम्बन्ध में घृणित विचार मिलते हैं। एक पुस्तक के अनुसार वह (श्रीकृष्ण) चोर था, उसने निरपराध धोबी का वध किया। ऐसे देवताओं की पूजा करना मूर्खता है।’’ इस तरह भगवान राम के बारे में—‘‘राम बड़ा पापी था उसने रावण का वध किया।’’ फिर इस तरह हिन्दू-संस्कृति के आधारों के प्रति आस्था नष्ट करके वे ईसा के प्रति भक्ति जगाते हैं। उसे मानव का कल्याणकारी बताकर लोगों को उसकी पूजा करने, ईसाई बनने का कूटनीतिक प्रयत्न इन ईसाई मिशनरियों द्वारा हमारे देश में कम नहीं चल रहा। इससे हमारी संस्कृति की नींव ही खोखली होती जा रही है। भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा भाग आज ईसाई बनकर अपनी प्रेरणा और जीवन पद्धति का आधार पश्चिम को मान कर चलता है। ये लोग भारत में इस तरह रहते हैं मानो ये विदेशी हों। कैसी विडम्बना है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 17

👉 गुरुगीता (भाग 122)

👉 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ कहते हैं-

🔷 ऐसा ही एक अनुभव भक्तिमती नारी गंगाबाई का है। गंगाबाई भगवान् के परम भक्त लाखाजी की बेटी थी। भक्त लाखाजी विशेष पढ़े तो नहीं थे, परन्तु गुरूगीता उन्हें कंठस्थ थी। भगवान् में उनका अगाध विश्वास था। इनकी दो सन्ताने थी- एक पुत्र, एक कन्या। पुत्र का नाम देवा और कन्या का नाम गंगाबाई था। पुत्र के विवाह के दो साल बाद उन्होंने कन्या का विवाह कर दिया। लाखाजी नियम से गुरूगीता के ११ पाठ एवं शिव सहस्त्रनाम का पाठ करते थे। उनके पुत्र एवं कन्या को भी गुरूगीता से प्रगाढ़ अनुराग हो गया था।

🔶 न मालूम प्रारब्ध के किस संयोग से कैसे दिन बदल जाते हैं? गंगाबाई के पति को सर्प ने काट लिया। सर्प के काटने से उसकी तत्क्षण मृत्यु हो गयी। पुत्री के जीवन की इस त्रासदी की खबर लाखाजी को लगी। उन्होंने यह बात अपनी पत्नी, पुत्र व पुत्रवधु को बतायी। सभी इस शोक समाचार को सुनकर व्याकुल हो गए। लाखाजी ने सभी को सम्भाला और पुत्री को सान्त्वना देने के लिए उसकी ससुराल पहुँचे। ससुराल पहुँचने पर उन्हें भारी अचरज हुआ। बात भी अचरज की थी। उन्होंने देखा कि उनकी भक्तिमती पुत्री बड़े शान्त एवं स्थिर भाव से अपने सास- श्वसुर को प्रबोध दे रही है। उसकी इन बातों से सास- ससुर शान्त चित्त हो रहे थे।

🔷 गंगाबाई की यह स्थिति देखकर लाखाजी ने पूछा -बेटी! तेरी ऐसी स्थिति देखकर मैं चकित हूँ। मैं तो यहाँ तरह- तरह के विचार करके आया था कि तुझे धीरज बंधाऊँगा। परन्तु तेरे ज्ञान ने तो मुझे चकित कर दिया है। तुझे यह ज्ञान आया कहाँ से?

🔶 गंगाबाई ने कहा- पिता जी यह सब आपकी दी हुई सीख का फल है। आप के सान्निध्य में मैंने गुरूगीता कंठस्थ कर ली थी। बचपन से ही गुरूगीता का पाठ, इसके विधिवत अनुष्ठान मेरा नियम बन गया था। इस साधना को मैंने कभी भी नहीं छोड़ा। इसी का प्रभाव है कि आपके जामाता की मृत्यु के तीन दिन पहले भगवान् ने मुझे स्वन्प में दर्शन देकर कहा- बेटी! तेरे पति की आयु पूरी हो चुकी है, यह मेरा भक्त हे। तेरे साथ उसका पूर्वजन्म का संयोग शेष था। इसी से उसने जन्म लिया था। अब इसे तीन दिन बाद साँप डसेगा। उस समय तू उसे गुरूगीता सुनाती रहना। ऐसा करने से इसका कल्याण होगा। मैं तुझे सच्चा वैराग्य और ज्ञान प्राप्त होगा।

🔷 पिताजी इतना कहकर भगवान् भोलेनाथ अन्तर्ध्यान हो गए। मैं जाग पड़ी, मानों उसी समय से मुझे ज्ञान का परम प्रकाश मिल गया। मैं सारे शोक- मोह छोड़कर पति के कल्याण में लग गयी। मैंने व्रत धारण किया और रातो जागकर पति को गुरूगीता एवं शिव सहस्त्रनाम सुनाती रही। तीसरे दिन जब पतिदेव सूर्य को अर्ध्य दे रहे थे, उसी समय अचानक एक कालसर्प ने आकर उनके पैर को डस लिया। देखते- देखते उनके प्राण पखेरू उड़ गए। मैंने देखा कर्पूरगौर भगवान् सदाशिव उनके सम्मुख विद्यमान हैं। इस दृश्य ने गुरूगीता पर मेरी आस्था बढ़ा दी। अब आप मेरी सहायता कीजिए कि भगवान् सदाशिव की भक्ति कर सकूँ। पुत्री के इस अनुभव को सुनकर पिता को रोमांच हो आया। सचमुच ही गुरूगीता से सच्चा ज्ञान सहज सम्भव है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 184

मंगलवार, 29 मई 2018

👉 चलकर आओ - मिठाई लो

🔷 कथा में युवक ने सुना भगवान सबको रोटी देते हैं। युवक को बात जँच गई। उसने काम पर जाना बन्द कर दिया। जो पूछता यही उत्तर देता- "भगवान जब रोटी देने ही वाले हैं तो मेहनत क्यों करूँ?" एक ज्ञानी उधर से निकले, मतिभ्रम में ग्रस्त लड़के की हालत समझी और प्यार से दूसरे दिन सबेरे उसे अपने पास बुलाया और कुछ उपहार देने को कहा। युवक भावुक था। सबेरे ही पहुँच गया।

🔶 ज्ञानी ने पूछा- 'कैसे आये?' उसने उत्तर दिया- 'पैरों से चलकर। ' ज्ञानी ने उसे मिठाई उपहार में दी और कहा- "तुम पैरों से चलकर मेरे पास तक आये तभी मिठाई पा सके। ईश्वर रोटी देता तो है पर देता उसी को है जो हाथ पैरों के पुरुषार्थ से उसे कमाने और पाने के लिए चलता है। जब मेरा मिष्ठान्न तुम बिना पैरों से चले प्राप्त नहीं कर सके, तो भगवान द्वारा दी जाने वाली रोटी कैसे प्राप्त कर सकोगे ?"

🔷 महापुरुष अपने समय और समाज को इस पलायनवादी वृत्ति से बचाने और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्मधारणा के विकास को ही उपासना- आराधना समझ कर सम्पन्न करते रहे हैं।

📖 प्रज्ञा पुराण से

👉 बोलने से पहले सोचें

🔶 अक्सर छोटी छोटी बातों पर गुस्सा करना मनुष्य की प्रवृति है। और गुस्से में किसी को डाँट देना, अपशब्द कहना या कुछ ऐसा कह देना जो हमें नहीं कहना चाहिए, ये भी स्वाभाविक है। लेकिन जब गुस्सा शाँत होता है तब हमें एहसास होता है कि हमने क्या सही किया और क्या गलत किया। कभी कभी हम गुस्से में हम अपने मित्रो से, अपने परिजनों से या दूसरे लोगो से  इतनी कड़वी बात कह देते हैं कि हमारे मित्र हमसे नाराज हो जाते हैं, बसे बसाये घर उजड़ जाते हैं, बेवजह हम दूसरे लोगो से दुश्मनी मोल ले लेते हैं। हमारे द्वारा कहे गए शब्दों का दूसरों पर क्या असर पड़ता है आइये इस कहानी से समझते हैं।

🔷 एक गाँव में एक किसान रहता था। उसकी अपने पड़ोसी से मित्रता थी। एक बार किसी बात के लेकर किसान का अपने मित्र से झगड़ा हो गया। उसने अपने पडोसी को भला बुरा कह दिया, जिससे उसका पड़ोसी नाराज हो गया और उनकी मित्रता टूट गयी। बाद में जब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह अपने आप पर बहुत शर्मिंदा हुआ पर अब क्या हो सकता था। शर्म के कारण वह अपने मित्र से माफ़ी भी नहीं माँग सका। परेशान होकर वह एक संत के पास गया। उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा।

🔶 संत ने किसान से कहा कि, ” तुम एक थैला भर कर पंख इकठ्ठा कर के लाओ।” किसान ने पंख इकठ्ठे किये और फिर संत के पास पहुंच गया। अब संत ने कहा कि छत पर जाकर इन पंखो को हवा में उड़ा दो।

🔷 किसान ने ऐसा ही किया, थैले से निकाल कर सारे पंख हवा में उड़ गए। अब संत ने फिर कहा कि – अब इन सारे पंखो को दोबारा इकठ्ठा करके लाओ।

🔶 किसान वापस गया पर तब तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे, और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा। और अपनी असमर्थता जताते हुए बोला कि सारे पंख हवा में उड़ गए हैं, वह अब उन्हें दोबारा थैले में इकठ्ठा नहीं कर सकता।

🔷 तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है, तुम आसानी से इन्हें अपने मुँह से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते।

🔶 दोस्तों, हमारे साथ भी ऐसा ही होता है। हम गुस्से या झुंझलाहट में कभी कभी ऐसे शब्द कह जाते हैं जिनसे सामने वाला हमसे हमेशा के लिए नाराज हो जाता है। अगर हम उससे माफ़ी माँग भी लें और वो हमें माफ़ कर भी दे तब उसके कानो में वे कड़वे शब्द हमेशा गूंजते रहते हैं और वो चाहकर भी हमारे साथ पहले जैसा व्यव्हार नहीं कर पाता।

🔷 तो दोस्तों आज ही ये बात गाँठ बाँध लीजिये कि किसी को कुछ भी कहने से पहले एक बार जरूर सोचें कि हमारे शब्द क्या हैं चाहे हम किसी से गुस्से में बोल रहे हैं या बिना गुस्से के। ये सोचे कि जो हम बोल रहे हैं हानि अगर वही हमारे लिए बोला जाये तो हमें कैसा महसूस होगा। इसलिए जो कुछ भी बोले अच्छी तरह से सोच समझकर बोलें। अन्यथा बोलें ही नहीं, चुप रहना ही बेहतर है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 30 May 2018

👉 A Light

There is Light, if we can find it,
That dissolves the night that cloaks a troubled heart.
It is the Sun that slowly rises,
And in its Light, the night is gone.
There is a Silent Place, when we can find it,
Not in some distant city or foreign town.
It’s here, not very far away,
Just within reach of our awareness, now.
There is Love, that’s waiting for us,
That fulfills, even erases, our greatest desire,
For It, and It alone, is the object of our affections,
Not some fickle lover, but a fiery Joy, that lifts us higher.
To see! To be! That is the all of what we seek.
The price is high; forsaking our personal sense of wanting;
But for this sacrifice, a new world is revealed.
In which this inner Light alone, yearns to know Itself.
When we’ve mastered all the rules that guide us.
Even these must fall away, as stages in a rocket ship,
On a journey that takes us beyond this world
To another, not far away, but here within us now.
Akhand Jyoti – Jan- 2003

📖 From Akhand Jyoti  Jan- 2003

👉 भारतीय संस्कृति के विनाश का संकट (भाग 1)

🔶 आजकल संस्कृति का अर्थ बहुत सीमित रूप में लिया जाने लगा है। भारतीय जीवन-पद्धति, कला-कौशल, ज्ञान-विज्ञान, हमारे सामाजिक जीवन, व्यापार संगठनों, उत्सव, पर्व, त्यौहार आदि जिनके सम्मिलित स्वरूप से हमारी संस्कृति का बोध होता था वहां आज संस्कृति का अर्थ खुदाई में प्राप्त प्राचीन खण्डहरों के स्मृति-चिन्ह, नृत्य-संगीत के कार्य-क्रम, या कुछ प्राचीन तथ्यों के पढ़ने लिख लेने तक ही संस्कृति की सीमा समझ ली जाती है। प्राचीन ध्वंसावशेषों की खुदाई करके संस्कृति के बारे में तथ्य निर्णय करने के प्रयत्न पर्याप्त रूप में होते जा रहे हैं। यह सब प्राचीन इतिहास और हमारे सांस्कृतिक गौरव की जानकारी के लिए आवश्यक भी है लेकिन इन्हीं तथ्यों को संस्कृति मान लेना भारी भूल है। भारतीय संस्कृति तो एक निरन्तर विकासशील जीवनपद्धति रही है, उसे इन संकीर्णताओं में नहीं बांधा जा सकता। इतिहास के रूप में उसे एक अंग अवश्य माना जा सकता है।

🔷 आजकल सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर नृत्य-संगीत के कार्यक्रम होते देखे जाते हैं। यद्यपि नृत्य-संगीत कला, आमोद-प्रमोद भी हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग हैं लेकिन इन्हें ही सांस्कृतिक आदर्श मानकर चलना संस्कृति के बारे में अज्ञान प्रकट करना ही है। हमारी संस्कृति केवल नाच-गाने तक ही सीमित नहीं है। इसमें जहां आनन्द उल्लास का जीवन बिताने की छूट है वहां जीवन के गम्भीर दर्शन से मनुष्य को महा-मानव बनने का विधान भी है। हमारे यहां का ऋषि कला का साधक भी होता था, तो जीवन और जगत के सूक्ष्मतम रहस्यों का उद्गाता—दृष्टा भी। पर्व त्यौहारों के रूप में सामूहिक आनन्द उल्लास का जीवन भी बिताया जाता था तो सामाजिक, राजनैतिक सुधारों पर ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में गंभीर विचार विमर्श भी होता था। ऐसी थी हमारी संस्कृति। उसे केवल नृत्य संगीत के कार्य-क्रमों तक ही सीमित रखना उसके महत्व को न समझना ही है।

🔶 बहुत कुछ अर्थों में संस्कृति, इतिहास की तरह पढ़ने लिखने की वस्तु मान ली गई। हमारे दैनिक जीवन में सांस्कृतिक मूल्य नष्ट होते जा रहे हैं। संस्कृति के सम्बन्ध में खोज करने वाले स्वयं सांस्कृतिक जीवन नहीं बिताते। उनका रहन-सहन आहार-विहार जीवन-क्रम सब विपरीत ही देखे जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 16

👉 गुरुगीता (भाग 121)

👉 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ कहते हैं-

गुरूपुत्रो वरं मूर्खस्तस्य सिद्ध्यन्ति नान्यथा। शुभकर्माणि सर्वाणि दीक्षाव्रततपांसि च॥ १५६॥
संसारमलनाशार्थं भवपाशनिवृत्तये। गुरूगीताम्भसि स्न्नानं तत्त्वज्ञः कुरूते सदा॥ १५७॥
स एव च गुरूः साक्षात् सदा सद्ब्रह्मवित्तमः। तस्य स्थानानि सर्वाणि पवित्राणि न संशय॥ १५८॥
सर्वशुद्धः पवित्रोऽसौ स्वभावाद्यत्र तिष्ठति ।। तत्र देवगणाः सर्वे क्षेत्रे पीठे वसन्ति हि॥ १५९॥
आसनस्थः शयानो वा गच्छंस्तिष्ठन् वदन्नपि। अश्वारूढो गजारूढः सुप्तो वा जाग्रतोऽपि वा॥ १६०॥
शुचिमांश्च सदा ज्ञानी गुरूगीता जपेन तु। तस्य दर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६१॥

🔶 गुरूपुत्र मूर्ख होने पर भी वरण के योग्य है। इससे भी कराए गये दीक्षा- तप आदि व्रत एवं अन्य शुभ कर्म सिद्ध होते हैं, वृथा नहीं होते ॥ १५६॥ गुरूगीता के महामंत्रों से स्न्नान संसार के मल को धोने वाला है, इससे भवपाशों से छुटकारा मिलता है॥ १५७॥ जो गुरूगीता के जल से स्न्नान करता है, वह सभी ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ एवं सदागुरू होता है। वह जिस किसी स्थान में निवास करता है, वह स्थान पवित्र होता है, इसमें कोई संशय नहीं है॥ १५८॥ सर्वशुद्ध एवं पवित्र गुरूदेव जहाँ भी स्वाभाविक रूप से निवास करते हैं, वहाँ सभी देवों का निवास होता है॥ १५९॥ गुरूगीता का जप करने वाला पवित्र ज्ञानी पुरूष बैठा हुआ, सोया हुआ, जाता हुआ, खड़ा हुआ, बोलता हुआ, अश्व की पीठ पर आरूढ़, हाथी पर आरूढ़, सुप्त अथवा जाग्रत् सर्वदा विशुद्ध होता है। किसी भी अवस्था में उसका दर्शन करने से पुनर्जन्म नहीं होता॥ १६०- १६१॥

🔷 भगवान् शिव की इस अमृतवाणी में गुरूगीता के अनुष्ठान का महत्त्व है। गुरूगीता का जप- पाठ साधक को सच्चा शिष्य और सच्चे शिष्य को गुरूपद पर आरूढ़ करता है। ऐसा साधक हमेशा ही गुरूकृपा, ईश्वरकृपा के सान्निध्य में रहता है। उसके अन्तःकरण में भगवद्कृपा हिलोरे लेती है। गुरूगीता का यह महत्त्व केवल सिद्धान्त ,विचार या कल्पना न होकर सारभूत अनुभव है। इसे उन्होंने पाया, जिन्होंने गुरूगीता की साधना की। जो इसकी कृपा छाँव में बैठकर तप करते रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 183

👉 असफलता सफलता से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है

🔷 सभी के जीवन में एक समय ऐसा आता है जब सभी चीज़ें आपके विरोध में हो रहीं हों। चाहें आप एक प्रोग्रामर हैं या कुछ और, आप जीवन के उस मोड़ पर खड़े होता हैं जहाँ सब कुछ ग़लत हो रहा होता है। अब चाहे ये कोई सॉफ्टवेर हो सकता है जिसे सभी ने रिजेक्ट कर दिया हो, या आपका कोई फ़ैसला हो सकता है जो बहुत ही भयानक साबित हुआ हो।

🔶 लेकिन सही मायने में, विफलता सफलता से ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है। हमारे इतिहास में जितने भी बिजनिसमेन, साइंटिस्ट और महापुरुष हुए हैं वो जीवन में सफल बनने से पहले लगातार कई बार फेल हुए हैं। जब हम बहुत सारे कम कर रहे हों तो ये ज़रूरी नहीं कि सब कुछ सही ही होगा। लेकिन अगर आप इस वजह से प्रयास करना छोड़ देंगे तो कभी सफल नहीं हो सकते।

🔷 हेनरी फ़ोर्ड, जो बिलियनेर और विश्वप्रसिद्ध फ़ोर्ड मोटर कंपनी के मलिक हैं। सफल बनने से पहले फ़ोर्ड पाँच अन्य बिज़निस मे फेल हुए थे। कोई और होता तो पाँच बार अलग अलग बिज़निस में फेल होने और कर्ज़ मे डूबने के कारण टूट जाता। लेकिन फ़ोर्ड ने ऐसा नहीं किया और आज एक बिलिनेअर कंपनी के मलिक हैं।

🔶 अगर विफलता की बात करें तो थॉमस अल्वा एडिसन का नाम सबसे पहले आता है। लाइट बल्व बनाने से पहले उसने लगभग 1000 विफल प्रयोग किए थे।

🔷 अल्बेर्ट आइनस्टाइन जो 4 साल की उम्र तक कुछ बोल नहीं पाते थे और 7 साल की उम्र तक निरक्षर थे। लोग उनको दिमागी रूप से कमजोर मानते थे लेकिन अपनी थ्ओरी और सिद्धांतों के बल पर वो दुनिया के सबसे बड़े साइंटिस्ट बने।

🔶 अब ज़रा सोचो की अगर हेनरी फ़ोर्ड पाँच बिज़नेस में फेल होने के बाद निराश होकर बैठ जाता, या एडिसन 999 असफल प्रयोग के बाद उम्मीद छोड़ देता और आईन्टाइन भी खुद को दिमागी कमजोर मान के बैठ जाता तो क्या होता? हम बहुत सारी महान प्रतिभाओं और अविष्कारों से अंजान रह जाते।

🔷 तो मित्रों, असफलता सफलता से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है…

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 May 2018



👉 आज का सद्चिंतन 29 May 2018

👉 यह अच्छी आदतें डालिए (अन्तिम भाग)

मृदुता :-
🔷 स्वभाव की मृदुलता ग्रहण करें। मृदुल स्वभाव उस व्यक्ति का है जिसे देख कर स्वतः मन में उसके प्रति आकर्षण का भाव उत्पन्न होता है। उसके मुख, स्वभाव तथा चरित्र से मानसिक आकर्षण, प्रेम, तथा आनन्द प्रस्फुटित होता है। मृदुलता के अंतर्गत वे सभी विधियाँ आती हैं जिनके द्वारा मनुष्य दूसरों को प्रसन्न रखता तथा हृदय में अपने प्रति प्रेम उत्पन्न करता है। उसका सबके प्रति प्रेममय, मित्रतापूर्ण व्यवहार होता है। उसका व्यवहार मित्रों और हितैषियों को उसकी ओर आकर्षित करता है। उसमें चिड़चिड़ापन, उत्तेजना, क्रोध, कटुता, कुढ़न इत्यादि नहीं होती।

🔶 मृदु व्यक्ति बड़ा मीठा हंसमुख स्वभाव रखता है सभ्यतापूर्ण ढंग से व्यवहार करता है और प्रेम सहानुभूति से स्निग्ध रहता है। जो व्यक्ति उसके संपर्क में आता है, उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।

🔷 मृदु व्यक्ति सदा दूसरों को प्रसन्न रखने और प्रेम करने की बात सोचता रहता है उसके मित्रों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है। वह उदार, दयावान, और प्रेममय रहता है। इन सद्गुणों के कारण मृदुल व्यक्ति सब स्थितियों और सब प्रकार के व्यक्ति यों से बड़ा अच्छा निभाव कर लेता है।

🔶 यथा शक्ति दूसरों से प्रेम कीजिए। सहानुभूतिपूर्ण ढंग से अप्रिय कामों को कीजिए। जिससे भी मिलें आपके वाक्य, शब्द और अक्षर प्रेम से सरस स्निग्ध रहें। जगत् के विदग्ध हृदयों को आपके शब्दों से ऐसा मरहम प्राप्त हो कि वे अपने संताप भूल सकें और दो घड़ी अपने महत्त्व का अनुभव कर सकें।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 21

👉 Amrit Chintan 29 May

🔷 Self confidence and sentiment are two different things. Self confidence men is always far sighted. He is always brave and confident all confident people always apply their contemplation. Hard working and activeness is always associated with that.

🔶 Among the prominent figures of this world intellectuals, learned leaders, scientists moneyed and famous are supposed to dominate in the society. Virtues and quality of life is always a God gift which must be used for self-development and welfare of the society.

🔷 Worship is a seed, which if put in proper discipline of growth, it will bear a full grown tree with all its components of  leaves branches fruits, flowers and their seeds again.

🔶 Decide aim of your life. Follow some ideality in your own life, and work whole heartedly on that to achieve your constant visit to that ideality itself is great success of life over and above other virtues of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिये (अन्तिम भाग)

🔷 हमें अपने जीवनयापन के सामान्य कार्यक्रम से ईसाइयत को ढूंढ़कर निकालना होगा और उसके स्थान पर भारतीयता की प्रतिष्ठापना करनी होगी। अंग्रेज चले गये अब अंग्रेजियत की गुलामी क्यों की जाय? हैट पैन्ट में क्या खूबसूरती है जो हमारे धोती कुर्ते में नहीं है। उसे हम स्वयं पहनें और बच्चों को पहनावें। अंग्रेजी भाषा को केवल एक विदेशी उपयोगी भाषा की दृष्टि से पढ़ें तो सही पर उसे अपनी मातृ भाषा से अधिक मान न दें। अपने दैनिक जीवन में, पत्र व्यवहार में, स्वाध्याय और अध्ययन में हिन्दी के माध्यम से हम पढ़ते और बोलते हैं उसी के भाव एवं आदर्श हमारे मस्तिष्क में स्थान जमाते हैं।

🔶 भारतीय साहित्य में ही वह क्षमता है जो भारतीय आदर्शों की ओर हमें प्रेरित करे। रामायण और गीता, वेद और धर्मशास्त्रों का, अपने पूर्वजों के पुनीत चरित्रों और कृतियों का थोड़ा बहुत अध्ययन हमारे नैतिक जीवन में आवश्यक रूप से स्थान प्राप्त करे। चोटी हममें से प्रत्येक के सिर पर होनी चाहिए। बिना जनेऊ कोई कन्धा खाली न हो। हिन्दू संस्कृति के दो प्रधान प्रतीक शिखा और सूत्र—चोटी और जनेऊ आज बुरी तरह उपेक्षित हो रहे हैं। जन साधारण की सांस्कृतिक निष्ठा को कायम रखने के लिए इन दोनों प्रतीकों की आवश्यकता एवं अनिवार्यता समझी जाय।

🔷 पतिव्रत और पत्नीव्रत के आदर्शों पर जोर दिया जाय। लड़कियां इस प्रकार का वेश विन्यास न बनावें जो दूसरों में अवांछनीय उत्तेजना उत्पन्न करे। फैशनपरस्ती और विलासिता, हमारे लिए घातक सिद्ध होगी। पर्दा बुरी बला है। हर बच्चे के षोडश संस्कार कराये जायें ताकि बालक पर तथा घर वालों पर भारतीयता के आदर्शों की छाप पड़े, संस्कार कराने वाले ऐसे पुरोहित पैदा हों जो न केवल धार्मिक कर्मकांड विधिवत् करें वरन् भारतीय आदर्शों की शिक्षा और प्रेरणा उन धर्म अवसरों पर लोगों को प्रदान करें। हमारा प्रत्येक त्यौहार एक सामूहिक सामाजिक संस्कार है, उन्हें इस प्रकार मनाया जाय कि जन साधारण अपने वर्तमान जीवन को प्राचीन आदर्शों के अनुरूप ढालने की प्रेरणा प्राप्त करे।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 9

👉 गुरुगीता (भाग 121)

👉 गुरूगीता से मिलता है ज्ञान का परम प्रकाश
🔷 गुरूगीता के महामंत्रों का अवतरण जिसके अन्तस् में हुआ, समझो वहाँ आध्यात्मिक प्रकाश की धाराएँ बरस गयीं। उसे सद्गुरू कृपा व ईश्वर कृपा का वरदान मिल गया। जिनके अन्तःकरण में आध्यात्मिक भावों का उदय होता है, उनमें यह चाहत भी जगती है कि सद्गुरू का सान्निध्य मिले ,ईश्वर की कृपा मिले। पर कैसे? इसकी विधि उन्हें नहीं मालूम होती। इस विधि के अभाव में पल्ले पड़ती है, तो सिर्फ भटकन ,उलझन और संत्रास। परन्तु जो गुरूगीता के आध्यात्मिक प्रभावों की समझ रखते हैं, वे बड़ी ही आसानी से इससे उबर जाते हैं। गुरूगीता की कृपा जिन्हें प्राप्त है, उन्हें भटकन, उलझन के कंटक नहीं चुभते। इसके अनुष्ठान से उनकी सभी आध्यात्मिक उलझने अन्तःकरण में स्वयमेव फूट पड़ते हैं।

🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में इसी महत्त्व को बताया गया है। इसमें कहा गया है कि गुरूगीता का जप- पाठ ,अनुष्ठान शक्ति, सूर्य, गणपति, विष्णु, शिव सभी के उपासकों को सिद्धि देने वाला है। यह सत्य है, सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं है। भगवान् शिव ने माता से कहा- हे सुमुखि! अब मैं तुम्हें गुरूगीता के अनुष्ठान के लिए योग्य स्थानों का वर्णन करता हूँ। इसके लिए उपयुक्त स्थान सागर, नदी का किनारा अथवा शिव या विष्णु का मंदिर है। भगवती का मंदिर ,गौशाला अथवा कोई देवमंदिर, वट, आँवला वृक्ष, मठ अथवा तुलसी वन इसके लिए शुभ माने गए हैं ।। पवित्र निर्मल स्थान में मौन भाव से इसका जप अनुष्ठान करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 182

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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