रविवार, 20 मई 2018

👉 स्वर्ग का मार्ग:-

🔶 महात्मा बुद्ध के समय की बात है। उन दिनों मृत्यु के पश्चात आत्मा को स्वर्ग में प्रवेश कराने के लिए कुछ विशेष कर्मकांड कराये जाते थे। होता ये था कि एक घड़े में कुछ छोटे-छोटे पत्थर डाल दिए जाते और पूजा-हवन इत्यादि करने के बाद उस पर किसी धातु से चोट की जाती, अगर घड़ा फूट जाता और पत्थर निकल जाते तो उसे इस बात का संकेत समझा जाता कि आत्मा अपने पाप से मुक्त हो गयी है और उसे स्वर्ग में स्थान मिल गया है।

🔷 चूँकि घड़ा मिटटी का होता था इसलिए इस प्रक्रिया में हमेशा ही घड़ा फूट जाता और आत्मा स्वर्ग को प्राप्त हो जाती और ऐसा कराने के बदले में पंडित खूब दान-दक्षिणा लेते।

🔶 अपने पिता की मृत्यु के बाद एक युवक ने सोचा क्यों न आत्मा-शुद्धि के लिए महात्मा बुद्ध की मदद ली जाए, वे अवश्य ही आत्मा को स्वर्ग दिलाने का कोई और बेहतर और निश्चित रास्ता जानते होंगे। इसी सोच के साथ वो महात्मा बुद्ध के समक्ष पहुंचा।

🔷 उसने कहा, “हे महात्मन! मेरे पिता जी नहीं रहे, कृपया आप कोई ऐसा उपाय बताएं कि यह सुनिश्चित हो सके कि उनकी आत्मा को स्वर्ग में ही स्थान मिले।”

🔶 बुद्ध बोले, “ठीक है, जैसा मैं कहता हूँ वैसा करना…तुम उन पंडितों से दो घड़े लेकर आना। एक में पत्थर और दूसरे में घी भर देना। दोनों घड़ों को नदी पर लेकर जाना और उन्हें इतना डुबोना कि बस उनका उपारी भाग ही दिखे। उसके बाद पंडितों ने जो मन्त्र तुम्हे सिखाये हैं उन्हें जोर-जोर से बोलना और अंत में धातु से बनी हथौड़ी से उनपर नीचे से चोट करना। और ये सब करने के बाद मुझे बताना कि क्या देखा?”

🔷 युवक बहुत खुश था उसे लगा कि बुद्ध द्वारा बताई गयी इस प्रक्रिया से निश्चित ही उसके पिता के सब पाप काट जायेंगे और उनकी आत्मा को स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

🔶 अगले दिन युवक ने ठीक वैसा ही किया और सब करने के बाद वह बुद्ध के समक्ष उपस्थित हुआ।

🔷 बुद्ध ने पूछा , “आओ पुत्र, बताओ तुमने क्या देखा?”

🔶 युवक बोला, “मैंने आपके कहे अनुसार पत्थर और घी से भरे घड़ों को पानी में डाल कर चोट की। जैसे ही मैंने पत्थर वाले घड़े पर प्रहार किया घड़ा टूट गया और पत्थर पानी में डूब गए। उसके बाद मैंने घी वाले घड़े पर वार किया, वह घड़ा भी तत्काल फूट गया और घी नदी के बहाव की दिशा में बहने लगा।”

🔷 बुद्ध बोले, “ठीक है! अब जाओ और उन पंडितों से कहो कि कोई ऐसी पूजा, यज्ञ, इत्यादि करें कि वे पत्थर पानी के ऊपर तैरने लगें और घी नदी की सतह पर जाकर बैठ जाए।”

🔶 युवक हैरान होते हुए बोला, “ आप कैसी बात करते हैं? पंडित चाहे कितनी भी पूजा करे लें पत्थर कभी पानी पे नहीं तैर सकता और घी कभी नदी की सतह पर जाकर नहीं बैठ सकता!”

🔷 बुद्ध बोले, “ बिलकुल सही, और ठीक ऐसा ही तुम्हारे पिताजी के साथ है। उन्होंने अपने जीवन में जो भी अच्छे कर्म किये हैं वो उन्हें स्वर्ग की तरफ उठाएंगे और जो भी बुरे कर्म किये हैं वे उन्हें नरक की और खीचेंगे। और तुम चाहे जितनी भी पूजा करा लो, कर्मकाण्ड करा लो, तुम उनके कर्मफल को रत्ती भर भी नहीं बदल सकते।”

🔶 युवक बुद्ध की बात समझ चुका था कि मृत्यु के पश्चात स्वर्ग जाने का सिर्फ एक ही मार्ग है और वो है जीवित रहते हुए अच्छे कर्म करना।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 21 May 2018


👉 सफलता की कुँजी

🔶 डरो मत। श्रद्धा करो। दुःख और आपत्ति की छाया से घिरने पर भी मत डरो। तुम अविनाशी परमात्मा के पुत्र हो। वह दिव्य अखंड ज्योति तुम्हारे अंधकार को नष्ट कर देगी। धीर बनो। तुम्हारे भीतर वह शक्ति है जो तुम्हें प्रत्येक परिस्थिति का मालिक बना देगी। उच्च विचारों का आवाहन करो। हृदय को वीर, हाथ को बलवान और इच्छा को अचल बनाओ। सत् चित् और आनंद की प्राप्ति के लिए अपनी शक्ति में श्रद्धा करो। सब में जीवन और स्फूर्ति का संचार करो। धैर्य आशा और दृढ़ निश्चय को धारण करो। जिम्मेदारियों को सिर पर लोगे, बल और साहस दिखाओगे तो निश्चय ही तुम्हें सफलता प्राप्त होगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1940 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1940/August/v1

👉 कृपा कर क्रोध मत कीजिए (भाग 2)

🔶 क्रोध का स्वभाव है कि यदि वह क्षणभर के लिए रोक दिया जाय, तो वह सब समय के लिए रुक जाता है। विलियम जेम्स का कथन है कि क्रोध आने पर दस तक गिनती कहो तो क्रोध विलीन हो जाता है। क्रोध की अवस्था में हम कभी−कभी बालक जैसा व्यवहार करने लगते हैं−पीछे ऐसे व्यवहार पर ही आत्म ग्लानि होने लगती है, अथवा उन पर हँसी आती है। ऐसा एक बार होने पर कई बार ऐसा ही हम करते रहते हैं। यही जीवन का भारी रहस्य है। बड़े−बड़े विद्वान् जब क्रुद्ध होते हैं, तब अपना सिर आप ही फोड़ने लगते हैं। अपना ही नुकसान करने से उन्हें सन्तोष होता है। इस प्रकार बराबर क्रोध प्रदर्शन करने से उनका स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है, तो कितने ही लोग समय से पूर्व ही काल−कवलित हो जाते हैं। इन सब बातों को जान कर भी क्रोध रोके नहीं रुकता। फिर रोकने का उपाय क्या है?

🔷 अभिमान की कमी और प्रेम की वृद्धि क्रोध को रोकती है। जिन्हें बातों से अभिमान की वृद्धि होती है, उन्हें त्यागना चाहिए। चापलूसी की बातें सुनने से अभिमान की वृद्धि होती है। अभिमान की वृद्धि मानसिक शक्ति के ह्रास का सूचक है। जिस प्रकार विद्युत−शक्ति के रखने के लिए इन्स्यूलेटर की जरूरत पड़ती है उसी प्रकार मानसिक शक्ति को कायम रखने के लिये इन्स्यूलेटर की जरूरत है। अतएव जिस व्यक्ति को अपनी मानसिक शक्ति कायम रखना है, उसे जान बूझकर प्रतिदिन अपने साथियों से थोड़ी देर के लिए अलग हो जाना चाहिए। उसे सब समय समाज में न रहना चाहिए।

🔶 समाज के लोगों में उनकी सेवा करने के लिए तथा अपने प्रेम−प्रदर्शन भर के लिए आना चाहिए, पीछे उसे अपने आप में चला जाना चाहिए। जो मनुष्य किसी भारी विचार में लगा रहता है वह सामाजिक कार्यों में उतना ही भाग लेता है, जितना कि अति आवश्यक है। ऐसा करने से वह अपनी मानसिक शक्ति का ह्रास नहीं होने देता। उसके ध्वंसात्मक संवेग पहल से ही निर्बल हो जाते हैं, और अगर वे किसी समय उत्तेजित भी हुए तो वह उन्हें सरलता से काबू में कर लेता है।
📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.6

👉 Awakening Divinity in Man (Part 7)

Meaning and Purpose of Worship
🔶 Why do we worship the divine?  To condition and remind our minds of our divine origin. True worship of God means only one thing –the cultivation of nobility in thoughts, motives, speech and action. If you think that by worshiping a particular God you will gain material success or fulfill a specific desire–– then it is a wrong delusion. Worshiping God with sincerity results in enhancement of virtues like generosity, compassion and warmth in your psyche.

🔷 It brings about a positive change in the attitude of the devotee towards life. If you have not performed worship in its true sense, then you are likely to be lost in a maze of lifeless mechanical rituals. You should worship in such a way that you also get the gifts of grace bestowed on true devotees present and past. Your virtues, character, actions, behavior, thoughts and sentiments must improve as a result of worship. This is what shows the activation of divinity in life. If you attain this state, great opportunities will knock at your door.

🔶 Glance through the cultural history of India –– all the great names in it are of those who served the noble cause for the good of all and not of those who earned scholastic laurels. Have you heard of Mahamana Malviyaji? He was an ordinary person who became a great personage through sincere worship of divinity as he conceived it.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भगवान कैसे दिखाई देंगे? (अन्तिम भाग)

🔶 भगवान श्रीकृष्ण का सच्चा भक्त अपने कृष्ण को समस्त संसार में देखता है जिस ओर उसकी दृष्टि जाती है, उधर ही उसे कृष्ण दिखाई देते हैं। उसे दिव्य योग के चक्षु और योग की दृष्टि प्राप्त हो गई है।

🔷 ऐसा सोचना कि तुम दुनिया से पृथक हो, भारी मूर्खता है। तुम दुनिया में हो और दुनिया तुम में है दुनिया के किसी प्राणी को कष्ट पहुँचाना तुम्हें अपने को ही कष्ट पहुँचाने के बराबर है। विश्व रंजन का हानि लाभ तुम्हारा ही हानि लाभ है। चन्द्रशेखर को प्रेम करना अपने को ही प्रेम करना है। दुई का भाव निकाल दो। दुई में मृत्यु है और एकत्व में असली जीवन है।

🔶 मित्रो! भगवान के दर्शन पाना बहुत कठिन नहीं है। उन प्रभु को प्रसन्न करना उतना अधिक कठिन नहीं है। वे सर्वव्यापी और घट-घट वासी हैं। वे तुम्हारे हृदय में निवास करते हैं। उन्हीं का सदैव चिन्तन करो। उनके साकार और सगुण रूप का ही ध्यान करो। नित्य ऐसी प्रार्थना करो-हे भगवान! मुझ पर दया करो। मेरी अन्तः दृष्टि खोल दो। मुझे दिव्य चक्षु प्रदान करो। मुझ पर ऐसी अनन्त दृष्टि कृपा कर दो कि मैं विश्व रूप दर्शन कर सकूँ। भक्त गण आपको पतित-पावन कह कर आपके गुणों का गान करते हैं। भक्तवत्सल! दीनदयाल!! मुझ पर भी दया करो। हे दयासागर! जिस प्रकार पक्षी अपने बालकों को अपने पंखों के भीतर छुपा कर रक्षा करते हैं, उसी प्रकार तुम भी मुझे अपनी चिर-शान्तिदायिनी शरण में लेकर मेरा उद्गार करो।

🔷 ऐसी प्रार्थना सच्चे हृदय से, प्रेम और निष्ठा से नित्य करने पर अवश्य ही तुम्हें भगवान के दर्शन होंगे। तब तुम सा भाग्यवान फिर कौन होगा?

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती
📖 अखण्ड-ज्योति 1946 नवम्बर पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1946/November/v1.6

👉 गुरुगीता (भाग 115)

👉 कष्टों में भी प्रसन्न रखती है- गुरूभक्ति

🔶 गुरूगीता के गायन से शिष्यों को मन चाहे वरदान मिलते हैं। लेकिन जो शिष्य है, उसके मन में केवल एक चाहत जगती है- अपने सद्गुरू से मिलन की चाहत। जिसे सांसारिक कामनाएँ ,वासनाएँ एवं लालसाएँ छूती हैं, समझो वह अभी शिष्य नहीं ।। हाँ, इतना जरूर है कि इस पाप पंक में फँसे हुए लोगों पर भी गुरू भक्त शिष्यों का दया आती है। दयावश वे इनकी मदद भी करते हैं। परन्तु सांसारिक कामनाओं के कीचड़ में वे कभी भी फँसना- उलझना नहीं चाहते हैं। यही वजह है कि कई बार ऐसे सांसारिक लोग इन सच्चे गुरूभक्तों को असफल मान लेते हैं। वे इनकी आध्यात्मिक विभूतियों को समझ ही नहीं पाते। उन्हें अनुमान ही नहीं हो पाता कि गुरूगीता का गायन करने वाले इन गुरूभक्त शिष्यों के आध्यात्मिक रहस्य क्या है और कितने हैं? यदि उनके जीवन में साधनाओं के साथ परेशानियाँ भी हैं तो इनके कारण क्या हैं?

🔷 गुरूगीता गाथा के पिछले क्रम में इस सत्य का सांकेतिक उल्लेख किया गया है। इसमें बताया गया है कि गुरूगीता की साधना सभी प्राणियों का सम्मोहन करने वाली है। इससे सभी प्राणियों को छुटकारा मिलता है। इससे सभी शत्रुओं एवं दुर्गुणों का स्तम्भन होता है, गुणों में बढ़ोत्तरी होती है। गुरूगीता की यह साधना दुरूकर्मों का नाश करके सत्कर्मों की सिद्धि देती है। इस साधना से सभी असाध्य कार्य साध्य होते हैं एवं नवग्रहों की पीड़ा दूर होती है। दुःस्वप्नों का फल नष्ट होता है, बन्ध्या स्त्री भी इस साधना से पुत्रवती बनती है। इस साधना के द्वारा स्त्रियाँ अपने सौभाग्य को चिरस्थायी बनाती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 173

शनिवार, 19 मई 2018

👉 कृपा कर क्रोध मत कीजिए (भाग 1)

🔷 क्रोध शक्ति की कमी का परिचायक है। मानसिक शक्ति की कमी हो जाने पर क्रोध का वेग विवेक से रुकता नहीं। जब क्रोध आता है तब विवेक दूर भाग जाता है जैसे कि उन्मत्त हाथी जब जंजीर तोड़ लेता है, तो महावत दूर भाग जाता है। क्रोध के द्वारा मानसिक शक्ति का ह्रास भी होता है। कारण और कार्य एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। मानसिक शक्ति की कमी से क्रोध आता है और क्रोध से मानसिक शक्ति की कमी भी होती है। साधारणतया क्रोध दूसरे पर प्रकाशित होता है। उसका लक्ष्य दूसरों की हानि करना होता है।

🔶 जब वह अपने लक्ष्य में सफल होता है, तो मानसिक शक्ति के ह्रास का शीघ्र पता नहीं चलता किन्तु जिस समय वह अपने लक्ष्य में सफल नहीं होता, वह अपने प्रति ही झीखने लगता है। इस स्थिति में मनुष्य अपने आप को कोसने लगता है। अपनी कमजोरी को बड़ी तीव्रता से अनुभूति करने लगता है। यह अनुभूति आत्म निर्देश बन जाती है जिसके कारण मनुष्य वास्तव में कमजोर और निराशावादी बन जाता है।

🔷 क्रोध का आवेश एक बार आने पर साधारण चतुराई के विचारों से वह नियन्त्रित नहीं होता। क्रोध की अवस्था में मनुष्य विक्षिप्त मन हो जाता है, उसकी चतुराई उसके काम नहीं आती। चतुराई साँसारिक दृष्टि का नाम है। क्रोध इससे अधिक प्रबल होता है। क्रोध के रोकने के लिये विशेष दृष्टि की आवश्यकता है। क्रोध उसके रोकने अथवा निराकरण के पूर्व अभ्यास से रुकता है। क्रोध का निराकरण विरक्ति और प्रेम से होता है। यदि संसार के प्रति अमोह का व्यवहार तथा उसके प्राणियों के प्रति मैत्री भावना का अभ्यास मनुष्य ने पहले किया है तो वह अभ्यास क्रोध आने की अवस्था में उसे अविवेकयुक्त काम करने से रोक देता है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 6

👉 दया की देवी

🔷 सन् 1813 में इंग्लैंड के जेलखानों की बड़ी बुरी दशा थी। एक एक कोठे में 300 तक अधनंगी औरतें बन्द कर दी जाती थीं। उनके पास न ओढ़ने बिछाने को होता था, और न पहनने को कपड़े। युवा एवं वृद्ध स्त्रियाँ तथा छोटी उम्र की बालिकाएं घास और कूड़े के ढेर पर चिथड़े में लिपट कर सो जाती थीं। उनकी सुधि लेने वाला कोई न था। अधिकारी उन्हें सिर्फ इतना भोजन देते थे, जिससे वे किसी प्रकार जीवित रह सकें।

🔶 यह दशा एलिजाबेथ फ्राय नामक एक देवी ने देखी तो उसकी आंखें भर आई। फ्राय लिखी- पढ़ी थीं, और उनके पास आनंद और ऐश्वर्य की जिन्दगी बिताने योग्य बुद्धि थी। परन्तु जीवन के मधुर फल को चुपचाप खुद ही कुतर-कुतर कर खाते रहना उन्हें पसन्द न आया। सामने फुलवारी पर दृष्टि गई तो देखा कि पुष्प अपने सुन्दर जीवन को दूसरों के सुख के लिये अर्पित करता हुआ मुस्करा रहा था। फ्राय ने अपना जीवन इन दुखियों के निमित्त दे दिया। उन्होंने बन्दी ग्रह की पीड़ित बहिनों के उद्धार का व्रत लिया।

🔷 सरकार की सहायता से उन्होंने जेल में शिक्षा का प्रचार करना आरंभ किया। बन्दी ग्रह की नारकीय यंत्रणा भोगने वाली स्त्रियों को पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई उनके परित्राण करने के लिये भी प्रयत्न करेगा। परन्तु जब पाप और अज्ञान में डूबी हुई, मूर्तियों को फ्राय ने प्रेम पूर्वक अपने गले लगाया और उन्हें शिक्षा देना आरंभ किया तो उनकी जीवन दिशाएं ही बदल गईं। कुछ ही मास के प्रयत्न ने उन नारकीय पशुओं को शान्त, निर्दोष और पवित्र बना दिया। सुधार का विस्तार हुआ। सरकार उनके कार्य को देखकर प्रभावित हुई, और उसने इस प्रकार की शिक्षा कानून द्वारा जेलखानों में जारी कर दी।

🔶 आज श्रीमती फ्राय इस संसार में नहीं हैं। परन्तु उनके पवित्र प्रेम का पौधा अतृप्त और दुःखी प्राणियों को शीतलता प्रदान करने के लिये जीवित है। उनकी योजना इस समय समस्त सभ्य संसार में काम में लाई जा रही है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 20 May 2018


👉 Awakening Divinity in Man (Part 6)

What do the deities do?
🔷 Deities keep doing one thing. What do they keep doing? They keep showering flowers. Look at the scriptures. The holy Ramayana for instance describes at fifty odd places that deities showered sacred flowers from heaven. What are these flowers? They symbolize goodwill, cooperation, guidance, respect and support. What attracts these virtues? Divinity, which is still present in the world. It alone had survived (in the past) and will alone survive (in the future); it can never be wiped out. If the demons (evils) do not die then why should God (the highest symbol of divinity) die? Like-minded people are attracted towards each other. A deity is attracted by deity-like humans and ideals are attracted by ideals; this results in the acquisition of benevolence, opportunities and co-operation from all directions. This is what has been happening, is happening and will continue to happen.

🔶 I am admiring deities. Where do they live? They are present in the integrity of the human character and the inner self. They inspire the motivation and zeal that clears all illusions and breaks and destroys the web of complications, infirmities, ignorance and worries. Divine inspiration even compels one to follow the righteous path. This is the true blessing of a deity. Anything lesser or lower than this can’t be a blessing of a divine power. The doors of eminence, success and achievements open as soon as your qualities, deeds and nature are illuminated by the spark of divinity.

🔷 Whosoever has gained immortal, glorious progress or notable success in any field in the world to date has accomplished it through his virtuous personality. A deity’s blessing is the supremacy of qualities, talents and thoughts. The life history of every great personality demonstrates it. Almost all of them were born in ordinary or underprivileged families and circumstances. But they reached greater and greater heights and accomplished brighter and brighter goals! Look at our late Prime Minister Lal Bahadur Shastry’s life for example.  He was blessed by God’s grace. How? In the form of two qualities – responsibility and wisdom. These great virtues persist in the linkage between God and the devotee and also strengthen it further. This is the only way to communicate with the Omniscient.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भगवान कैसे दिखाई देंगे? (भाग 3)

🔷 वह व्यक्ति जो सदैव सत्य बोलता हो, जो दयावान हो, उदार हो, जो क्षमाशील और शान्त हो, जो हर प्रकार के भय से निर्भय हो, जिसने क्रोध और लालच को जीत लिया हो, जो परम पवित्र और प्रेमी हो, वही वास्तव में ब्रह्म है वही सच्चा ब्राह्मण है। जिसमें उपरोक्त गुण न हों, वे तो वास्तव में शुद्र ही हैं।

🔶 जब तक तुम अपने को बिना शर्त, बिना किसी स्वार्थ और निष्काम भाव से अपने को प्रभु की शरण में अर्पण नहीं कर देते, तब तक तुम उनकी कृपा के अधिकारी कैसे हो सकते हो? भगवान तुमसे कहीं अच्छी तरह यह बात जानते हैं कि तुम्हारा हित-अहित क्या है? पूर्ण रूप से अपना समस्त अपनत्व उन्हीं भगवान के पावन पाद-पदों में समर्पण करना मन्दिरों में जाकर दर्शन करने, घंटा घड़ियाल बजा कर पूजा करने और अन्य प्रकार की भगवत्सेवाओं से कहीं बढ़-चढ़ कर है।

🔷 भगवान तुम्हारा ऊपरी दिखावा नहीं चाहते। वे तो तुम्हारा हृदय चाहते हैं। एक बार प्रेम से ऐसा कह दो-प्रभु! तेरी इच्छा पूरी करूंगा, मैं तेरा हूँ, मेरे पास जो कुछ भी है सभी तो तेरा ही है। किन्तु यह बात हृदय की अन्तरात्मा से निकले। सचाई और निष्ठा के साथ। शुद्ध प्रेम में मतवाले बन कर रुदन करो एकान्त में उनके लिए विलाप करो ऐसे ढंग से रोओ कि तुम्हारे सब वस्त्र तुम्हारी अश्रु-धारा से भीग कर सराबोर हो जाय।

🔶 अपनी आँखों को बन्द करो। दुनिया, शरीर और समस्त वासनाओं को नष्ट करो। सब और से मन को खींच लो। केवल एक प्रभु में लीन हो जाओ। तब असली अमरत्व के अमृत का पान करो।

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती
📖 अखण्ड-ज्योति 1946 नवम्बर पृष्ठ 5

👉 गुरुगीता (भाग 114)

👉 गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी

🔷 एक बड़ी ही प्यारी अनुभूति कथा है। समर्थ गुरू रामदास के शिष्य स्वामी कल्याण गोदावरी नदी से कुछ कोस दूर एक गाँव में ठहरे हुए थे। अपने सद्गुरू के नाम की अलख जगाते हुए सत्प्रवृत्तियों का प्रसार करना उनका व्रत था। जय- जय रघुवीर समर्थ, को उच्चस्वर से पुकारते हुए जब वह ग्राम वीथियों से गुजरते ,तो लोग बरबस उन्हें घेर लेते। उनके पास आश्चर्यजनक सिद्धियाँ तो नहीं थीं, पर गुरूकृपा का बल था। अपने गुरू पर उनका सम्पूर्ण विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी थी। उनकी भक्तिपूर्ण बातें लोगों में चेतना की नयी लहरें पैदा करती।

🔶 ग्रामवासी स्वामी कल्याण के वचनों से आह्लादित थे। उन्हें जीवन की नयी दिशा मिल रही थी। परन्तु रूढ़िवादी साधु और कई तांत्रिक उनकी इन बातों से प्रसन्न नहीं थे, क्योंकि कल्याण स्वामी के वचनों ने जन जीवन में इतनी जागृति पैदा कर दी थी कि इन सभी का व्यवसाय बन्द होने लगा था। कर्म के सिद्धान्त पर विश्वास करने लगा जन- जीवन सत्कार्यों में प्रवृत्त होने लगा था। चमत्कारों की ओछी बाजीगरी से उसे उकताहट होने लगी थी। जन मानस की यह स्थिति अपने को सिद्ध कहने वाले तांत्रिकों को रास नहीं आयी। उन्होंने कल्याण स्वामी के प्रति अनेकों षड्यंत्र रचने शुरू कर दिये। वे सब मिलकर किसी भी तरह जन- जीवन की नजर में उन्हें अप्रमाणिक एवं अयोग्य साबित करना चाहते थे।

🔷 जब उनके सामान्य उपक्रम असफल साबित हुए, तो उन्होंने अपनी चमत्कारी सिद्धियों का सहारा लिया। इन सिद्धियों के बल पर उन्होंने गाँव के तालाबों, कुआँ, बावड़ियों का जल सुखा दिया। इस तांत्रिक अत्याचार से सामान्य जनता पानी के लिए तरसने लगी। मनुष्य एवं पशुओं का जीवन बिना पानी के विपन्न हो गया। बिलखते बच्चे ,परेशान गृहणियों की जिन्दगी दूभर हो गयी। परेशान गाँववासी कल्याण स्वामी के यहाँ गये। पर वे करते भी क्या? उनके पास ऐसी कोई सिद्धि नहीं थी, जिससे समस्या का हल हो सके। इधर इन कु्रर तांत्रिकों ने उनका और उनके गुरू का अपमान करना प्रारम्भ कर दिया। गाँव वालों को जितना सम्भव था।

🔶 कल्याण स्वामी के लिए स्वयं के अपमान का तो कोई मोल नहीं था, पर गुरू का अपमान उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ। ग्रामीण जनों की दुर्दशा भी उनसे देखी न गयी। आखिर में उन्होंने गुरूगीता एवं गुरूमंत्र का आश्रय लेने की सोची। ग्रामवासियों के कल्याण के लिए उन्होंने कठिन उपवास करते हुए गायत्री महामंत्र से सम्पुटित करके गुरूगीता का अनुष्ठान प्रारम्भ किया। प्रगाढ़ तप में उनके दिन बीतते ।। प्रार्थना में उनकी रातें व्यतीत होतीं। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। एक रात प्रार्थना करते समय उनकी भाव चेतना समर्थ सद्गुरू के चरणों में विलीन होने लगी। उनके हृदय में बस एक ही आर्त पुकार थी, हे सद्गुरू! इन निर्दोष ग्रामीण जनों की रक्षा करो।

🔷 भक्त की पुकार गुरूदेव अनसुनी न कर सके। उनकी परावाणी कल्याण स्वामी की अंतर्चेतना में गूँज उठी, चिंता न कर, माँ गोदावरी से प्रार्थना कर, उनको मेरा संदेश देना, उन्हें कहना मेरे गुरू ने आपको ग्रामीण जनों के कल्याण के लिए आमंत्रित किया है। समर्थ गुरू का यह विचित्र सा संदेश कल्याण स्वामी को ठीक से समझ नहीं आया। फिर भी वे अपने गुरूभक्ति की धुन में माँ गोदावरी के पास गये और उन्होंने गुरू का संदेश सुनाते हुए ग्रामवासियों का जल संकट दूर करने के लिए प्रार्थना की। इतना ही नहीं गोदावरी से एक लकीर खींचते हुए गाँव में आ गये।

🔶 उनके उस कार्य का तांत्रिकों ने बड़ा मजाक उड़ाया। लेकिन सबको आश्चर्य तो तब हुआ, जब उन्होंने देखा कि पानी से खाली गाँव कुएँ, तालाब, बावड़िया फिर से पानी से भर गये हैं। माँ गोदावरी प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं बहती रही, किन्तु उनकी अंतर्धारा ने गाँव आकर सबका कष्ट दूर कर दिया। गाँव वालों ने गुरूभक्ति का यह प्रत्यक्ष चमत्कार देखा और उन सबने स्वीकार किया, किसी भी मांत्रिक- तांत्रिक सिद्धि से गुरूभक्ति की सिद्धि बड़ी है। गुरूभक्ति से बड़कर न तो कोई सिद्धि और न शक्ति।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 171

शुक्रवार, 18 मई 2018

👉 बुद्ध और उनकी प्रव्रज्या

🔶 बुद्ध को आत्मबोध हुआ। कठोर तपश्चर्या के बाद प्राप्त इस उपलब्धि से वे निर्वाण- मोक्ष की ओर भी बढ़ सकते थे। पर उनका लक्ष्य था-  अनाचार, कुरीति से भरे समाज का परिशोधन तथा विवेक रूपी अस्त्र द्वारा जन- मानस का परिष्कार। आत्मबोधजन्य ईश्वरीय सन्देश को व्यापक बनाने वे निकल पड़े और जन- जन तक पहुँचकर विचार- क्रांति कर सकने में सफल हुए।

🔷 परिव्रज्या बौद्ध धर्म का प्रधान अंग मानी जाती थी। भिक्षुक गण सतत चलते रहते थे व बुद्ध के साथ 'संघं, धर्म शरणम् गच्छामि' का नारा लगते। फलत: भारतवर्ष ही नहीं, सारे विश्व भर में उनका सन्देश पहुँचाने का लक्ष्य पूरा कर सके। सिद्धार्थ के अन्दर विश्व कल्याण की कामना रूप में जो बीज पला वह गौतम बुद्ध के रूप में विकसित, पल्लवित होकर सारी मानवता को धन्य कर गया।

📖 प्रज्ञा पुराण से

👉 नौरोज का मेला

🔶 अकबर की महानता का गुणगान तो कई इतिहासकारों ने किया है लेकिन अकबर की औछी हरकतों का वर्णन बहुत कम इतिहासकारों ने किया है........!

🔷 अकबर अपने गंदे इरादों से प्रतिवर्ष दिल्ली में नौरोज का मेला आयोजित करवाता था जिसमें पुरुषों का प्रवेश निषेध था अकबर इस मेले में महिला की वेष-भूषा में जाता था और जो महिला उसे मंत्र मुग्ध कर देती उसे दासियाँ छल कपट से अकबर के सम्मुख ले जाती थी .........!

🔶 एक दिन नौरोज के मेले में महाराणा प्रताप सिंह की भतीजी, छोटे भाई महाराज शक्तिसिंह की पुत्री, मेले की सजावट देखने के लिए आई जिनका नाम बाईसा किरण देवी था जिनका विवाह बीकानेर के पृथ्वीराज जी से हुआ। बाईसा किरण देवी की सुंदरता को देखकर अकबर अपने आप पर काबू नही रख पाया और उसने बिना सोचे समझे दासियों के माध्यम से धोखे से जनाना महल में बुला लिया.......!

🔷 जैसे ही अकबर ने बाईसा किरण देवी को स्पर्श करने की कोशिश की किरणदेवी ने कमर से कटार निकाली और अकबर को ऩीचे पटकर छाती पर पैर रखकर कटार गर्दन पर लगा दी और कहा नींच....नराधम तुझे पता नहीं मैं उन महाराणा प्रताप की भतीजी हुं........ जिनके नाम से तुझे नींद नहीं आती है...... बोल तेरी आखिरी इच्छा क्या है.............?

🔶 अकबर का खुन सुख गया कभी सोचा नहीं होगा कि सम्राट अकबर आज एक राजपूत बाईसा के चरणों में होगा .........!

🔷 अकबर बोला मुझे पहचानने में भूल हो गई मुझे माफ कर दो देवी.......!

🔶 तो किरण देवी ने कहा कि आज के बाद दिल्ली में नौरोज का मेला नहीं लगेगा और किसी भी नारी को परेशान नहीं करेगा अकबर ने हाथ जोड़कर कहा आज के बाद कभी मेला नहीं लगेगा उस दिन के बाद कभी मेला नहीं लगा.........!

🔷 इस घटना का वर्णन गिरधर आसिया द्वारा रचित सगत रासो मे 632 पृष्ठ संख्या पर दिया गया है।

🔶 बीकानेर संग्रहालय में लगी एक पेटिंग मे भी इस घटना को एक दोहे के माध्यम से बताया गया है।

किरण सिंहणी सी चढी... उर पर खींच कटार..!
भीख मांगता प्राण की....अकबर हाथ पसार...!!

🔷 अकबर की छाती पर पैर रखकर खड़ी वीर बाला किरन का चित्र आज भी जयपुर के संग्रहालय मे सुरक्षित है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 19 May 2018


👉 कष्टों का निवारण (अन्तिम भाग)

🔶 बीमारी से ग्रसित हो जाने या किसी अन्य संकट में फंस जाने पर उससे मुक्त होने के लिए भी अपना आन्तरिक बल चाहिए। सदाशा और शुभ भविष्य का दृढ़ विश्वास कठिनाई से निकाल सकते हैं। आत्म विश्वास की जितनी मदद, बीस मित्र मिलकर भी नहीं कर सकते। आत्म निर्भरता वह संजीवनी बूटी है जिसे पीकर मुर्दे जी पड़ते हैं और बुड्ढे जवान हो जाते हैं इसके मुकाबले का और कोई ‘टानिक’ विश्व भर में अविष्कृत नहीं हो सका है।

🔷 तात्पर्य यह है कि बाहर की जो कुछ भी भली बुरी परिस्थितियाँ तुम्हें घेरे हुए हैं वह तो फूल पत्तियाँ हैं इनकी जड़ आन्तरिक जीवन में है। उन्हें बदलना चाहते हो, अपने जीवन में परिवर्तन करना चाहते हो, कष्टों से छुटकारा पाना चाहते हो, आगे का जीवन सुखी बनाना चाहते हो तो केवल बाहरी दौड़ धूप करके संतुष्ट मत हो जाओ, इससे तुम्हें स्थायी शाँति नहीं मिल सकेगी। आत्यंतिक निवृत्ति तो तभी होगी जब उसके मूल स्त्रोत का उपचार किया जाएगा।

🔶 यदि तुम अपने वर्तमान जीवन से असंतुष्ट हो, उन्नति और विकास की आकाँक्षा करते हो तो अपना आन्तरिक जीवन टटोल डालो। उसमें से बुरी आदतों, नीच वासनाओं, दुष्ट वृत्तियों को निकाल डालो। इससे तुम्हारा मार्ग साफ हो जाएगा और उसकी सारी कठिनाईयाँ दूर हो जायेंगी। आत्म बल, दृढ़ता और तीव्र इच्छा शक्ति को बढ़ाओं अपने अंदर शुभ वृत्तियों और सद्गुण को आने दो इन्हीं के आधार पर उन्नति के पथ पर सरपट दौड़ते चले जाओ

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1940 जुलाई पृष्ठ 3

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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