शुक्रवार, 11 मई 2018
👉 Maharshi Patanjali
🔷 Some people brought a young man to Maharshi Patanjali and said-“Despite the best efforts from our side, we are not able to teach this man the importance of yoga sadhana in human life. Kindly help us in this regard”. The Maharshi asked the young man to stay back in his Ashram for a few days.
🔶 Several days passed. The people who had brought that man to the Ashram came to meet him there. It was indeed a pleasant surprise for them to see him completely transformed. That man, who was addicted to intoxicating drugs and sensual pleasures a few days back, was now living a life of austerity and self control. He was engrossed in deep meditation beneath a huge tree when they reached the Ashram.
🔷 “How did this magical change occur?”-they couldn’t help asking Maharshi Patanjali. The latter humbly replied that there was nothing amazing in this. It was due to healing and soothing influence of the spiritually suffused vibrations of this Ashram, where every inmate is a devoted sadhaka; this acts as an attitudinal therapy. Those people were well aware that the environment also plays an important role in the progress of sadhana but they could not follow what the Maharshi meant by attitudinal therapy.
🔶 Maharshi further explained –“An eye-specialist cures the problems of eyesight but treatment of the mental-sight, he outlook towards the self and the world.., is the job of a rishi. Because of the deep insight awakened by long-term sadhana, a rishi can view the hidden tendencies and nature of a person and diagnose the ailments of his mental and emotional selves. Using their spiritual powers, rishi can heal such ailments and infirmities of the inner selves of a person. The treatment and righteous orientation of one’s mentality is achieved not merely by preaching and teaching but by the impact of the rishi-level sadhana.
📖 From Akhand Jyoti
🔶 Several days passed. The people who had brought that man to the Ashram came to meet him there. It was indeed a pleasant surprise for them to see him completely transformed. That man, who was addicted to intoxicating drugs and sensual pleasures a few days back, was now living a life of austerity and self control. He was engrossed in deep meditation beneath a huge tree when they reached the Ashram.
🔷 “How did this magical change occur?”-they couldn’t help asking Maharshi Patanjali. The latter humbly replied that there was nothing amazing in this. It was due to healing and soothing influence of the spiritually suffused vibrations of this Ashram, where every inmate is a devoted sadhaka; this acts as an attitudinal therapy. Those people were well aware that the environment also plays an important role in the progress of sadhana but they could not follow what the Maharshi meant by attitudinal therapy.
🔶 Maharshi further explained –“An eye-specialist cures the problems of eyesight but treatment of the mental-sight, he outlook towards the self and the world.., is the job of a rishi. Because of the deep insight awakened by long-term sadhana, a rishi can view the hidden tendencies and nature of a person and diagnose the ailments of his mental and emotional selves. Using their spiritual powers, rishi can heal such ailments and infirmities of the inner selves of a person. The treatment and righteous orientation of one’s mentality is achieved not merely by preaching and teaching but by the impact of the rishi-level sadhana.
📖 From Akhand Jyoti
👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 3)
🔷 कर्मयोग, भक्ति योग, अथवा ज्ञानयोग के साथ मिला होता है। जिस कर्मयोगी ने भक्ति योग से कर्मयोग को मिलाया है उसका निमित्त भाव होता है, वह अनुभव करता है कि ईश्वर सब कुछ कार्य कर सकता है और वह ईश्वर के हाथों में निमित्त मात्र है, इस प्रकार वह धीरे−धीरे कर्मों के बन्धन से छूट जाता है, कर्म के द्वारा उसे मोक्ष मिल जाती है। जिस कर्मयोगी ने ज्ञानयोग और कर्मयोग को मिलाया है वह अपने कर्मों से साक्षी भाव रखता है। वह अनुभव करता है कि प्रकृति सब काम करती है और वह मन और इन्द्रियों की क्रियाओं और जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी भाव रख कर कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त करता है।
🔶 कर्मयोगी निरन्तर निःस्वार्थ सेवा से अपना चित्त शुद्ध कर लेता है। वह कर्म फल की आशा न रखता हुआ कार्य करता है, वह अहंकारहीन अथवा कर्तापन के विचार रहित होकर कार्य करता है, वह हर एक रूप में ईश्वर को देखता है, वह अनुभव करता है कि सारा संसार परमात्मा के व्यक्ति त्व का विकास है और यह जगत वृन्दावन है। वह कठोर ब्रह्मचर्य−व्रत पालन करता है, वह करता हुआ मन से ‘ब्रह्मार्पणम्’ करता रहता है, अपने सारे कार्य ईश्वर के अर्पण करता है और सोने के समय कहता है—’हे प्रभु! आज मैंने जो कुछ किया है आपके लिए है, आप प्रसन्न होकर इसे स्वीकार कीजिए।
🔷 वह इस प्रकार कर्मों के फल को भस्म कर देता है और कर्मों के बन्धन में नहीं फँसता, वह कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है, निष्काम कर्मयोग से उसका चित्तशुद्धि होता है और चित्तशुद्धि होने पर आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है। देश सेवा, समाज सेवा, दरिद्र सेवा, रोगी सेवा, पितृ सेवा गुरु सेवा यह सब कर्मयोग है। सच्चा कर्मयोगी दास कर्म और सम्मान पूर्ण कर्म से भेद नहीं करता, ऐसा भेद अन्य जन ही किया करते हैं, कुछ साधक अपने साधन के प्रारम्भ में बड़े विनीत और नम्र होते हैं, परन्तु जब उन्हें कुछ यश और नाम मिल जाता है तब वे अभिमान के शिकार बन जाते हैं।
✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 7
🔶 कर्मयोगी निरन्तर निःस्वार्थ सेवा से अपना चित्त शुद्ध कर लेता है। वह कर्म फल की आशा न रखता हुआ कार्य करता है, वह अहंकारहीन अथवा कर्तापन के विचार रहित होकर कार्य करता है, वह हर एक रूप में ईश्वर को देखता है, वह अनुभव करता है कि सारा संसार परमात्मा के व्यक्ति त्व का विकास है और यह जगत वृन्दावन है। वह कठोर ब्रह्मचर्य−व्रत पालन करता है, वह करता हुआ मन से ‘ब्रह्मार्पणम्’ करता रहता है, अपने सारे कार्य ईश्वर के अर्पण करता है और सोने के समय कहता है—’हे प्रभु! आज मैंने जो कुछ किया है आपके लिए है, आप प्रसन्न होकर इसे स्वीकार कीजिए।
🔷 वह इस प्रकार कर्मों के फल को भस्म कर देता है और कर्मों के बन्धन में नहीं फँसता, वह कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है, निष्काम कर्मयोग से उसका चित्तशुद्धि होता है और चित्तशुद्धि होने पर आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है। देश सेवा, समाज सेवा, दरिद्र सेवा, रोगी सेवा, पितृ सेवा गुरु सेवा यह सब कर्मयोग है। सच्चा कर्मयोगी दास कर्म और सम्मान पूर्ण कर्म से भेद नहीं करता, ऐसा भेद अन्य जन ही किया करते हैं, कुछ साधक अपने साधन के प्रारम्भ में बड़े विनीत और नम्र होते हैं, परन्तु जब उन्हें कुछ यश और नाम मिल जाता है तब वे अभिमान के शिकार बन जाते हैं।
✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 7
👉 गुरुगीता (भाग 106)
👉 ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान रूप में गुरूगीता
🔷 गुरूगीता शिष्य की हृदयवीणा से निकले भक्ति के स्वरों की गूँज है। यह ऐसी झंकार है, जो शिष्य के भाव विह्वल हृदय से उठकर सीधे अपने सारे सद्गुरू के प्रेम विह्वल को झंकृत कर देती है। शिष्य के हृदय के इस मौन कंपन को भला उसके गुरूदेव के अलावा और सुनेगा भी तो कौन? यह एक ऐसा सच है, जिसे शिष्य हुए बिना गाया नहीं जा सकता। जिनके जीवन में सारे रिश्ते उसके गुरूदेव में ही समा चुके हों, वह भला किसी और की याद कैसे करें और क्यों करें? वह तो अपने जीवन की हर साँस में अपने गुरू का नाम लेता है। वह तारे, चाहे मारे, शिष्य की गति और कहीं नहीं हो सकती।
🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में शिष्य के जीवन का यह यथार्थ नए- नए प्रसंगों नए- नए संदर्भों में नए- नए ढंग से कहा गया है। पिछले क्रम में भी इन्हीं स्वरों की गूँज उठी थी कि जो शिष्य है, उनके जीवन का परम शास्त्र गुरूगीता के सिवा और कुछ नहीं है। गुरूगीता का भक्तिपूर्ण पठन, श्रवण एवं लिखकर इसका दान करने से सभी सुफल प्राप्त होते हैं। भगवान् सदाशिव ने भगवती जगदम्बा से यही कहा था कि गुरूगीता का जो शुद्धतत्त्व मैंने आपके सामने कहा है, उसके सविधि जप से संसार की सारी कठिनाइयाँ दूर होती हैं। गुरूगीता स्वयं में मंत्रराज है, इसके जप का अनन्त फल है। इसका पाठ करने वाला इस अनन्त फल को प्राप्त किए बिना नहीं रहता। ऐसा करने से उसके पाप एवं दरिद्रता दोनों ही सदा के लिए नष्ट हो जाते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 161
🔷 गुरूगीता शिष्य की हृदयवीणा से निकले भक्ति के स्वरों की गूँज है। यह ऐसी झंकार है, जो शिष्य के भाव विह्वल हृदय से उठकर सीधे अपने सारे सद्गुरू के प्रेम विह्वल को झंकृत कर देती है। शिष्य के हृदय के इस मौन कंपन को भला उसके गुरूदेव के अलावा और सुनेगा भी तो कौन? यह एक ऐसा सच है, जिसे शिष्य हुए बिना गाया नहीं जा सकता। जिनके जीवन में सारे रिश्ते उसके गुरूदेव में ही समा चुके हों, वह भला किसी और की याद कैसे करें और क्यों करें? वह तो अपने जीवन की हर साँस में अपने गुरू का नाम लेता है। वह तारे, चाहे मारे, शिष्य की गति और कहीं नहीं हो सकती।
🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में शिष्य के जीवन का यह यथार्थ नए- नए प्रसंगों नए- नए संदर्भों में नए- नए ढंग से कहा गया है। पिछले क्रम में भी इन्हीं स्वरों की गूँज उठी थी कि जो शिष्य है, उनके जीवन का परम शास्त्र गुरूगीता के सिवा और कुछ नहीं है। गुरूगीता का भक्तिपूर्ण पठन, श्रवण एवं लिखकर इसका दान करने से सभी सुफल प्राप्त होते हैं। भगवान् सदाशिव ने भगवती जगदम्बा से यही कहा था कि गुरूगीता का जो शुद्धतत्त्व मैंने आपके सामने कहा है, उसके सविधि जप से संसार की सारी कठिनाइयाँ दूर होती हैं। गुरूगीता स्वयं में मंत्रराज है, इसके जप का अनन्त फल है। इसका पाठ करने वाला इस अनन्त फल को प्राप्त किए बिना नहीं रहता। ऐसा करने से उसके पाप एवं दरिद्रता दोनों ही सदा के लिए नष्ट हो जाते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 161
बुधवार, 9 मई 2018
👉 घनश्याम की वीरता
🔶 ‘तुम्हें रुपये देने हैं या नहीं’ क्रुद्ध आवाज में दीवान भीमराव भी चिल्ला रहे थे। ‘मैं जल्दी ही दे दूँगा। इस बार सूखा पड़ गया इसलिए नहीं दे पाया। आपने तो मेरी सदा ही सहायता की है। थोड़ी दया और कीजिए साहब।’ दोनों हाथ जोड़कर गरीब कृषक कह रहा था।
🔷 ‘मैं कुछ नहीं जानता। बस मैं इतना ही कह रहा हूँ कि यदि तुमने एक सप्ताह के अन्दर पैसे नहीं दिये तो तुम्हारे घर की नीलामी करा दूँगा। तुम्हें रुपये इसलिये नहीं दिये थे कि उन्हें दबाकर बैठ जाओ। मूल देना तो दूर रहा, तुमने तो दो वर्ष में ब्याज तक नहीं दी है।’ दीवान जी चिल्लाकार बोले फिर वे क्रोध से पैर पटकते बैलगाड़ी में जाकर बैठ गये। उनके दोनों बेटे एक कोने में सहमें खड़े यह सब सुन रहे थे। पिता की दृष्टि उन पर गयी। तो बोले- ‘अरे तुम लोग क्या कर रहे हो यहाँ। स्कूल जाओ जल्दी से नहीं तो देर हो जायेगी।’
🔶 पिता का आदेश सुनकर घनश्याम और उसके भाई ने बस्ता उठाया और स्कूल की ओर दौड़ चले। रास्ते भर घनश्याम के मन में वही दृश्य उभरता रहा। दीवान जी का क्रोध से तमतमाया चेहरा और रौबीली आवाज जैसे उसके सामने अभी भी साकार थे। पिता का करुण चेहरा भी उसकी आँखों के आगे आ रहा था। उसने सुना था कि दीवान बड़ा कठोर है। जो कहता है, वह करते उसे देर नहीं लगती। वह अनेक गरीब व्यक्तियों को ऋण देकर उन्हें ऐसे ही सताया करता था। कई बार तो घनश्याम ने लोगों को उसकी मौत की कामना करते हुए भी सुना था।
🔷 यही बात सोचते-सोचते घनश्यामकृष्ण काले आगे बढ़ रहा था कि बाजार के बीच में उसे दीवान जी की बैलगाड़ी दिखाई दी। कुछ हल्ला-सा भी सुनाई दिया। लोग इधर-उधर भाग रहे थे। घनश्याम भी एक ऊँची दुकान पर चढ़ गया और देखने लगा कि मामला क्या है ? उसने देखा कि दीवान की गाड़ी के बैल बिगड़ गए थे, वे तेजी से भाग रहे थे। उनके साथ जुती गाड़ी घिसटती पीछे चल रही थी। गाड़ी पर बैठे दीवानजी के हाथ से लगाम छूट चुकी थी। कुछ पल बाद ही उसने देखा कि गाड़ी उलट गयी। जुआ तुड़ाकर एक बैल तो भाग गया, पर दूसरा दीवान जी को अपनी सींगों से मारने दौड़ा। लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। किसी का यह साहस न हो पा रहा था कि दीवान जी को बचाए। एक बार घनश्याम के मन में आया- ‘इसको अपनी करनी का दण्ड मिल रहा है।’ पर शीघ्र ही उसे मास्टरजी की सीख याद आ गयी, जो सदा यह कहा करते थे कि संकट में पड़े हुए की रक्षा करना ही मनुष्यता है। वे बालकों को वीर बच्चों की कहानियाँ सुना-सुना कर उनमें वीरता का संचार किया करते थे।
🔶 घनश्याम अपने प्राणों की परवाह न कर वहाँ से कूदा और दौड़कर बैल के सामने जा खड़ा हुआ। लोग साँस रोके यह दृश्य देख रहे थे। घनश्याम ने तेजी से बैल की रस्सी पकड़ी और अपनी ओर खींचने लगा। क्रुध बैल और भी चिढ़ गया और दीवान को छोड़कर घनश्याम पर झपटा, पर घनश्याम तो पहले से ही इसके लिए तैयार था। उसने बिना समय खोए और साहस छोड़े विलक्षण चतुराई से जल्दी बैल की रस्सी एक खंभे से लपेट दी। बैल को बँधा देख और भय का कारण दूर जानकर लोग पास आने लगे। थोड़ी देर में बैल भी शांत हो गया। घनश्याम और दूसरे व्यक्तियों ने मिलकर दीवान जी को उठाया।
🔷 उन्होंने घनश्याम को गले लगाते हुए कहा- ‘बेटा ! आज तुमने अपने प्राणों की परवाह न करके मेरी रक्षा की है। मैं तुम्हारे उपकार से झुक गया हूँ। किसके बेटे हो तुम ?’
🔶 घनश्याम ने अपने पिता का नाम बताया तो उन्होंने ध्यान से उसकी ओर देखा। उन्हें याद आया कि जब वे किसान को डांट रहे थे, तो यही बच्चा सहमा-सा एक कोने में खड़ा था। उनका मन उन्हें धिक्कारने लगा- ‘एक मैं पापी हूँ, जो दूसरों को सताता हूँ और एक यह है, जिसने मुझ अपकारी का भी ऐसा उपकार किया है।’
🔷 उन्होंने घनश्याम का हाथ पकड़ा और बोले- ‘चलो मैं तुम्हारे पिता से मिलना चाहता हूँ।’
🔶 वह किसान तो दीवानजी को फिर से आया देखते ही काँपने लगा। घनश्याम को उनके साथ देखकर उसका मन और भी भयभीत हो गया। इस शरारती बालक ने न जाने क्या अपराध किया है। अब तो भगवान ही रक्षक हैं।’ वह मन ही मन सोचने लगा।
🔷 दीवानजी ने किसान को पूरी बात बतायी और कहा कि पूरा पैसा उसने माफ कर दिया है। किसान बहुतेरा कहता रहा- ‘नहीं-नहीं मैं आपका पैसा दे दूँगा, बस मुझे थोड़ा समय और दे दीजिए।’’ परन्तु दीवान ने उसकी बात स्वीकार न की। वे बोले- ‘मैं तुम्हारे ऋण को कभी चुका नहीं सकता।’
🔶 घनश्याम कृष्ण काले के साहस और दयालुता ने पिता के संकट को भी दूर कर दिया उसे वीर बच्चे के रूप में भी पुरस्कृत किया गया।
🔷 ‘मैं कुछ नहीं जानता। बस मैं इतना ही कह रहा हूँ कि यदि तुमने एक सप्ताह के अन्दर पैसे नहीं दिये तो तुम्हारे घर की नीलामी करा दूँगा। तुम्हें रुपये इसलिये नहीं दिये थे कि उन्हें दबाकर बैठ जाओ। मूल देना तो दूर रहा, तुमने तो दो वर्ष में ब्याज तक नहीं दी है।’ दीवान जी चिल्लाकार बोले फिर वे क्रोध से पैर पटकते बैलगाड़ी में जाकर बैठ गये। उनके दोनों बेटे एक कोने में सहमें खड़े यह सब सुन रहे थे। पिता की दृष्टि उन पर गयी। तो बोले- ‘अरे तुम लोग क्या कर रहे हो यहाँ। स्कूल जाओ जल्दी से नहीं तो देर हो जायेगी।’
🔶 पिता का आदेश सुनकर घनश्याम और उसके भाई ने बस्ता उठाया और स्कूल की ओर दौड़ चले। रास्ते भर घनश्याम के मन में वही दृश्य उभरता रहा। दीवान जी का क्रोध से तमतमाया चेहरा और रौबीली आवाज जैसे उसके सामने अभी भी साकार थे। पिता का करुण चेहरा भी उसकी आँखों के आगे आ रहा था। उसने सुना था कि दीवान बड़ा कठोर है। जो कहता है, वह करते उसे देर नहीं लगती। वह अनेक गरीब व्यक्तियों को ऋण देकर उन्हें ऐसे ही सताया करता था। कई बार तो घनश्याम ने लोगों को उसकी मौत की कामना करते हुए भी सुना था।
🔷 यही बात सोचते-सोचते घनश्यामकृष्ण काले आगे बढ़ रहा था कि बाजार के बीच में उसे दीवान जी की बैलगाड़ी दिखाई दी। कुछ हल्ला-सा भी सुनाई दिया। लोग इधर-उधर भाग रहे थे। घनश्याम भी एक ऊँची दुकान पर चढ़ गया और देखने लगा कि मामला क्या है ? उसने देखा कि दीवान की गाड़ी के बैल बिगड़ गए थे, वे तेजी से भाग रहे थे। उनके साथ जुती गाड़ी घिसटती पीछे चल रही थी। गाड़ी पर बैठे दीवानजी के हाथ से लगाम छूट चुकी थी। कुछ पल बाद ही उसने देखा कि गाड़ी उलट गयी। जुआ तुड़ाकर एक बैल तो भाग गया, पर दूसरा दीवान जी को अपनी सींगों से मारने दौड़ा। लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। किसी का यह साहस न हो पा रहा था कि दीवान जी को बचाए। एक बार घनश्याम के मन में आया- ‘इसको अपनी करनी का दण्ड मिल रहा है।’ पर शीघ्र ही उसे मास्टरजी की सीख याद आ गयी, जो सदा यह कहा करते थे कि संकट में पड़े हुए की रक्षा करना ही मनुष्यता है। वे बालकों को वीर बच्चों की कहानियाँ सुना-सुना कर उनमें वीरता का संचार किया करते थे।
🔶 घनश्याम अपने प्राणों की परवाह न कर वहाँ से कूदा और दौड़कर बैल के सामने जा खड़ा हुआ। लोग साँस रोके यह दृश्य देख रहे थे। घनश्याम ने तेजी से बैल की रस्सी पकड़ी और अपनी ओर खींचने लगा। क्रुध बैल और भी चिढ़ गया और दीवान को छोड़कर घनश्याम पर झपटा, पर घनश्याम तो पहले से ही इसके लिए तैयार था। उसने बिना समय खोए और साहस छोड़े विलक्षण चतुराई से जल्दी बैल की रस्सी एक खंभे से लपेट दी। बैल को बँधा देख और भय का कारण दूर जानकर लोग पास आने लगे। थोड़ी देर में बैल भी शांत हो गया। घनश्याम और दूसरे व्यक्तियों ने मिलकर दीवान जी को उठाया।
🔷 उन्होंने घनश्याम को गले लगाते हुए कहा- ‘बेटा ! आज तुमने अपने प्राणों की परवाह न करके मेरी रक्षा की है। मैं तुम्हारे उपकार से झुक गया हूँ। किसके बेटे हो तुम ?’
🔶 घनश्याम ने अपने पिता का नाम बताया तो उन्होंने ध्यान से उसकी ओर देखा। उन्हें याद आया कि जब वे किसान को डांट रहे थे, तो यही बच्चा सहमा-सा एक कोने में खड़ा था। उनका मन उन्हें धिक्कारने लगा- ‘एक मैं पापी हूँ, जो दूसरों को सताता हूँ और एक यह है, जिसने मुझ अपकारी का भी ऐसा उपकार किया है।’
🔷 उन्होंने घनश्याम का हाथ पकड़ा और बोले- ‘चलो मैं तुम्हारे पिता से मिलना चाहता हूँ।’
🔶 वह किसान तो दीवानजी को फिर से आया देखते ही काँपने लगा। घनश्याम को उनके साथ देखकर उसका मन और भी भयभीत हो गया। इस शरारती बालक ने न जाने क्या अपराध किया है। अब तो भगवान ही रक्षक हैं।’ वह मन ही मन सोचने लगा।
🔷 दीवानजी ने किसान को पूरी बात बतायी और कहा कि पूरा पैसा उसने माफ कर दिया है। किसान बहुतेरा कहता रहा- ‘नहीं-नहीं मैं आपका पैसा दे दूँगा, बस मुझे थोड़ा समय और दे दीजिए।’’ परन्तु दीवान ने उसकी बात स्वीकार न की। वे बोले- ‘मैं तुम्हारे ऋण को कभी चुका नहीं सकता।’
🔶 घनश्याम कृष्ण काले के साहस और दयालुता ने पिता के संकट को भी दूर कर दिया उसे वीर बच्चे के रूप में भी पुरस्कृत किया गया।
👉 Amrit Chintan 10 May
🔶 This is the demand of the time, that men’s thinking must change. In prehistoric time, the great Rishi Parashuram destroyed all evil minded kings of that time and established the ruling of justice on throne.
🔷 The famous philosopher cart Jung have opened that worship is a important factor for harmony in life in every sect and religion. People worship in one way or other and have accepted it for good health and all developments and self rectification. They have concluded that all the physicians and psychologist combined have not benefited to that level as only true worship can do.
🔶 The power of spirituality is far ahead of the power of science. It is the spiritual component of man that controls the disasterous power of science. If man can develop this spiritual power of penance and austerity, he will not develop lethal devices for the mankind. Our planning is to develop that true wisdom of life for the vision of 21st century’s Golden era for all.
🔷 One who is friendly with his own soul be will be utmost sincere in all his duties of his life. He will help others and will give all his services to the down trodden people. Such a person is never alone. God and nature works with him.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
🔷 The famous philosopher cart Jung have opened that worship is a important factor for harmony in life in every sect and religion. People worship in one way or other and have accepted it for good health and all developments and self rectification. They have concluded that all the physicians and psychologist combined have not benefited to that level as only true worship can do.
🔶 The power of spirituality is far ahead of the power of science. It is the spiritual component of man that controls the disasterous power of science. If man can develop this spiritual power of penance and austerity, he will not develop lethal devices for the mankind. Our planning is to develop that true wisdom of life for the vision of 21st century’s Golden era for all.
🔷 One who is friendly with his own soul be will be utmost sincere in all his duties of his life. He will help others and will give all his services to the down trodden people. Such a person is never alone. God and nature works with him.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 2)
🔶 कर्म योगी का विशाल हृदय होना चाहिये। उसमें कुटिलता, नीचता कृपणता और स्वार्थ बिल्कुल नहीं होना चाहिए, उसे लोभ, काम, क्रोध और अभिमान रहित होना चाहिए। यदि इन दोषों के चिन्ह भी दिखाई देवें तो उन्हें एक एक करके दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए, वह जो कुछ भी खाय उसमें से पहले नौकरों को देना चाहिये, यदि कोई निर्धन रोगी दूध की चाहना रखकर उसी के घर आये और घर में उसी के लिए दूध नहीं बचा हो तो उसे चाहिये कि अपने हिस्से का दूध फौरन ही उसे देदे और उससे कहे कि ‘हे नारायण! यह दूध आपके वास्ते है, कृपा कर इसे पीलो, आपकी जरूरत मुझसे ज्यादा है।’ तब ही वह सच्ची उपयोगी सेवा कर सकता है।
🔷 कर्मयोगी का स्वभाव प्रेमयुक्त, मिलनसार, समाज−सेवी होना चाहिए। उसे जाति, धर्म या वर्ण के विचार बिना हर एक व्यक्ति के साथ मिलना चाहिए, उसमें सहनशीलता, सहानुभूति, विश्व−प्रेम, दया और सबमें मिल जाने की सामर्थ्य होनी चाहिये। उसे दूसरों के स्वभाव और रीति से संयोग रखने की क्षमा होनी चाहिये, उसे उपस्थित बुद्धि होनी चाहिये, उसका मन शान्त और सम होना चाहिये। उसे दूसरों की उन्नति में प्रसन्न होना चाहिये, उसको सारी इन्द्रियों पर पूरा संयम होना चाहिये, और हर एक वस्तु केवल अपने ही लिए चाहता है तो वह अपनी सम्पत्ति दूसरों को कैसे बाँट सकता है, उसे अपने स्वार्थ को जला डालना चाहिए।
🔶 ऐसा ही मनुष्य अच्छा कर्मयोगी बन सकता है और अपने लक्ष्य को जल्दी प्राप्त कर लेता है।
✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 7
🔷 कर्मयोगी का स्वभाव प्रेमयुक्त, मिलनसार, समाज−सेवी होना चाहिए। उसे जाति, धर्म या वर्ण के विचार बिना हर एक व्यक्ति के साथ मिलना चाहिए, उसमें सहनशीलता, सहानुभूति, विश्व−प्रेम, दया और सबमें मिल जाने की सामर्थ्य होनी चाहिये। उसे दूसरों के स्वभाव और रीति से संयोग रखने की क्षमा होनी चाहिये, उसे उपस्थित बुद्धि होनी चाहिये, उसका मन शान्त और सम होना चाहिये। उसे दूसरों की उन्नति में प्रसन्न होना चाहिये, उसको सारी इन्द्रियों पर पूरा संयम होना चाहिये, और हर एक वस्तु केवल अपने ही लिए चाहता है तो वह अपनी सम्पत्ति दूसरों को कैसे बाँट सकता है, उसे अपने स्वार्थ को जला डालना चाहिए।
🔶 ऐसा ही मनुष्य अच्छा कर्मयोगी बन सकता है और अपने लक्ष्य को जल्दी प्राप्त कर लेता है।
✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 7
👉 गुरुगीता (भाग 105)
👉 गुरूगीता का प्रत्येक अक्षर मंत्रराज है
🔶 गुरूगीता के उपदेष्टा के रूप में स्वयं परात्पर महेश्वर, जिनसे सारे शास्त्र एवं योग मार्गों का उद्गम हुआ है और श्रोता के रूप में स्वयं भगवती जगज्जननी, जिनकी गोद में समूची सृष्टि आश्रय पाती है, इनके संवाद के रूप में उदय हुई गुरूगीता के मांत्रिक महत्त्व का यथार्थ विवरण दे पाना किसी भी साधक -सिद्ध के वश की बात नहीं है। हाँ, ऐसे महान् साधकों की अनुभूतियों के विवरण एवं वर्णन पढ़कर रोमाञ्चित, गद्गद्, पुलकित एवं प्रेरित हुआ जा सकता है। ऐसी ही प्रेरक एवं अनुभूतिपूर्ण कथा खाकी बाबा की है।
🔷 खाकी बाबा उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल के विख्यात सन्त हुए हैं इनकी योग विभूतियों की अनेक कथाएँ अभी भी पूर्वांचल के गाँवों में बड़ी श्रद्धा से कही- सुनी जाती है। खाकी बाबा का अधिकाशं समय कुसुमी के जंगल में बीता। हाँ अपने अन्तिम समय में वह अवश्य चित्रकूट चले गए। खाकी बाबा के अनेक कृपा पात्रों में मुस्लिम सन्त सैयद रोशन अलीशाह एवं उनके शिष्य सिराजउद्दीन का विशेष नाम आता है। भट्टमयूरवंशीय मझौली नरेश भी खाकी बाबा के कृपा पात्रों में थे। कहते हैं कि बाबा को आध्यात्मिक पथ पर स्वयं भगवान् सदाशिव चलाया था। उन्होंने स्वयं ही इन योगीराज को तारक मंत्र की दीक्षा दी थी।
🔶 कहते हैं कि बाबा की गहन आध्यात्मिक अभिरूचि थी। बचपन से ही उनका मन संसार में नहीं लगता था। पर कहाँ जाएँ? क्या करें? कोई मार्ग भी तो नहीं था। हारकर उन्होंने श्री दुर्गासप्तशती का आश्रय लिया। स्वयं भगवती रूपी सप्तशती का आश्रय लेकर माँ, जो कण- कण में अग- जग में है। एक दिन जब वे पाठोपरान्त माँ के ध्यान में बैठे, तो अद्भुत झलक मिली। उन्होंने देखा कि आकाश मार्ग से भगवान् भोलेनाथ माता जगदम्बा के साथ जा रहे हैं। माँ ने प्रभु से कहा- हे दयानिधान इस बालक का भी कल्याण करें। भगवान् शिव ने माँ की इन बातों को अनसुना कर दिया। कई बार के आग्रह के बाद उन्होंने केवल एक बात कही- देवि! यह अभी सत्पात्र नहीं है। अपने को सत्पात्र बनाने के लिए इसे अभी और भी बहुत कुछ करना है। ऐसा करके उन्होंने माँ से कुछ कहा।
🔷 जो कहा गया- वह तो खाकी बाबा नहीं सुन- समझ पाए ; परन्तु उन्हें इतना अवश्य समझ में आया कि माँ उनसे कह रही हैं कि पुत्र तुम सद्गुरू प्राप्ति के लिए गुरूगीता का आश्रय लो। तुम्हारा सर्वविधि कल्याण होगा। बस, खाकी बाबा ने उस दिन से गुरूगीता का प्रातः, मध्याहृ सायं एवं तुरीय संध्या में पाठ प्रारम्भ कर दिया। ऐसा करते हुए उन्हें बरसों बीत गए। तब एक दिन तुरीय संध्या के समय यानि कि मध्यरात्रि की साधना के समय ध्यानावस्था में भगवान् शिव की झलक फिर मिली। इस बार प्रभु ने उन्हें स्वयं तारक मंत्र का उपदेश दिया। दयानिधान ने स्वयं दक्षिणामूर्ति रूप में उन्हें शिष्य के रूप में अंगीकार किया। अन्तश्चेतना में तारक मंत्र के प्रविष्ट होने के साथ उनकी कुण्डलिनी का उत्थापन हो गया और अनेक योग विभूतियाँ स्वयं ही प्रकट हो गयी।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 159
🔶 गुरूगीता के उपदेष्टा के रूप में स्वयं परात्पर महेश्वर, जिनसे सारे शास्त्र एवं योग मार्गों का उद्गम हुआ है और श्रोता के रूप में स्वयं भगवती जगज्जननी, जिनकी गोद में समूची सृष्टि आश्रय पाती है, इनके संवाद के रूप में उदय हुई गुरूगीता के मांत्रिक महत्त्व का यथार्थ विवरण दे पाना किसी भी साधक -सिद्ध के वश की बात नहीं है। हाँ, ऐसे महान् साधकों की अनुभूतियों के विवरण एवं वर्णन पढ़कर रोमाञ्चित, गद्गद्, पुलकित एवं प्रेरित हुआ जा सकता है। ऐसी ही प्रेरक एवं अनुभूतिपूर्ण कथा खाकी बाबा की है।
🔷 खाकी बाबा उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल के विख्यात सन्त हुए हैं इनकी योग विभूतियों की अनेक कथाएँ अभी भी पूर्वांचल के गाँवों में बड़ी श्रद्धा से कही- सुनी जाती है। खाकी बाबा का अधिकाशं समय कुसुमी के जंगल में बीता। हाँ अपने अन्तिम समय में वह अवश्य चित्रकूट चले गए। खाकी बाबा के अनेक कृपा पात्रों में मुस्लिम सन्त सैयद रोशन अलीशाह एवं उनके शिष्य सिराजउद्दीन का विशेष नाम आता है। भट्टमयूरवंशीय मझौली नरेश भी खाकी बाबा के कृपा पात्रों में थे। कहते हैं कि बाबा को आध्यात्मिक पथ पर स्वयं भगवान् सदाशिव चलाया था। उन्होंने स्वयं ही इन योगीराज को तारक मंत्र की दीक्षा दी थी।
🔶 कहते हैं कि बाबा की गहन आध्यात्मिक अभिरूचि थी। बचपन से ही उनका मन संसार में नहीं लगता था। पर कहाँ जाएँ? क्या करें? कोई मार्ग भी तो नहीं था। हारकर उन्होंने श्री दुर्गासप्तशती का आश्रय लिया। स्वयं भगवती रूपी सप्तशती का आश्रय लेकर माँ, जो कण- कण में अग- जग में है। एक दिन जब वे पाठोपरान्त माँ के ध्यान में बैठे, तो अद्भुत झलक मिली। उन्होंने देखा कि आकाश मार्ग से भगवान् भोलेनाथ माता जगदम्बा के साथ जा रहे हैं। माँ ने प्रभु से कहा- हे दयानिधान इस बालक का भी कल्याण करें। भगवान् शिव ने माँ की इन बातों को अनसुना कर दिया। कई बार के आग्रह के बाद उन्होंने केवल एक बात कही- देवि! यह अभी सत्पात्र नहीं है। अपने को सत्पात्र बनाने के लिए इसे अभी और भी बहुत कुछ करना है। ऐसा करके उन्होंने माँ से कुछ कहा।
🔷 जो कहा गया- वह तो खाकी बाबा नहीं सुन- समझ पाए ; परन्तु उन्हें इतना अवश्य समझ में आया कि माँ उनसे कह रही हैं कि पुत्र तुम सद्गुरू प्राप्ति के लिए गुरूगीता का आश्रय लो। तुम्हारा सर्वविधि कल्याण होगा। बस, खाकी बाबा ने उस दिन से गुरूगीता का प्रातः, मध्याहृ सायं एवं तुरीय संध्या में पाठ प्रारम्भ कर दिया। ऐसा करते हुए उन्हें बरसों बीत गए। तब एक दिन तुरीय संध्या के समय यानि कि मध्यरात्रि की साधना के समय ध्यानावस्था में भगवान् शिव की झलक फिर मिली। इस बार प्रभु ने उन्हें स्वयं तारक मंत्र का उपदेश दिया। दयानिधान ने स्वयं दक्षिणामूर्ति रूप में उन्हें शिष्य के रूप में अंगीकार किया। अन्तश्चेतना में तारक मंत्र के प्रविष्ट होने के साथ उनकी कुण्डलिनी का उत्थापन हो गया और अनेक योग विभूतियाँ स्वयं ही प्रकट हो गयी।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 159
मंगलवार, 8 मई 2018
👉 "उल्टे हाथ कर लेना"
🔷 एक नगर का राजा जिसे ईश्वर ने सब कुछ दिया एक समृद्ध राज्य सुशील और गुणवती पत्नी, संस्कारी सन्तान सब कुछ था उसके पास पर फिर भी दुःखी का दुःखी रहता!
🔶 एक बार वो घुमते घुमते एक छोटे से गाँव मे पहुँचा जहाँ एक कुम्हार भगवान भोले बाबा के मन्दिर के बाहर मटकीया बेच रहा था और कुछ मटकीयों मे पानी भर रखा था और वही पर लेटे लेटे हरिभजन गा रहा था!
🔷 राजा वहाँ आया और भगवान भोले बाबा के दर्शन किये और कुम्हार के पास जाकर बैठा तो कुम्हार बैठा हुआ और उसने बड़े आदर से राजा को पानी पिलाया! राजा कुम्हार से कुछ प्रभावित हुआ और राजा ने सोचा की ये इतनी सी मटकीयों को बेच कर क्या कमाता होगा?
🔶 तो राजा ने पूछा क्यों भाई प्रजापति जी मेरे साथ नगर चलोगे तो प्रजापति ने कहा नगर चलकर क्या करूँगा राजाजी?
🔷 राजा - वहाँ चलना और वहाँ खुब मटकीया बनाना!
🔶 प्रजापति - फिर उन मटकीयों का क्या करूँगा?
🔷 राजा - अरे क्या करेगा? उन्हे बेचना खुब पैसा आयेगा तुम्हारे पास!
🔶 प्रजापति - फिर क्या करूँगा उस पैसे का?
🔷 राजा - अरे पैसे का क्या करेगा? अरे पैसा ही सबकुछ है!
🔶 प्रजापति - अच्छा राजन अब आप मुझे ये बताईये की उस पैसे से क्या करूँगा?
🔷 राजा - अरे फिर आराम से भगवान का भजन करना और फिर तुम आनन्द मे रहना!
🔶 प्रजापति - क्षमा करना हॆ राजन पर आप मुझे ये बताईये की अभी मै क्या कर रहा हुं और हाँ पुरी ईमानदारी से बताना! काफी सोच विचार किया राजा ने और मानो इस सवाल ने राजा को झकझोर दिया!
🔷 राजा - हाँ प्रजापति जी आप इस समय आराम से भगवान का भजन कर रहे हो और जहाँ तक मुझे दिख रहा है आप पुरे आनन्द मे हो!
🔶 प्रजापति - हाँ राजन यही तो मै आपसे कह रहा हुं की आनन्द पैसे से प्राप्त नही किया जा सकता है!
🔷 राजा - हॆ प्रजापति जी कृपया कर के आप मुझे ये बताने की कृपा करे की आनन्द की प्राप्ति कैसे होगी?
🔶 प्रजापति - बिल्कुल सावधान होकर सुनना और उस पर बहुत गहरा मंथन करना राजन! हाथों को उल्टा कर लिजिये!
🔷 राजा - वो कैसे?
🔶 प्रजापति - हॆ राजन मांगो मत देना सीखो और यदि आपने देना सिख लिया तो समझ लेना आपने आनन्द की राह पर कदम रख लिया! स्वार्थ को त्यागो परमार्थ को चुनो! हॆ राजन अधिकांशतः लोगो के दुःख का सबसे बड़ा कारण यही है की जो कुछ भी उसके पास है वो उसमे सुखी नही है और बस जो नही है उसे पाने के चक्कर मे दुःखी है! अरे भाई जो है उसमे खुश रहना सीख लो दुःख अपने आप चले जायेंगे और जो नही है क्यों उसके चक्कर मे दुःखी रहते हो!
🔷 आत्मसंतोष से बड़ा कोई सुख नही और जिसके पास सन्तोष रूपी धन है वही सबसे बड़ा सुखी है और वही आनन्द मे है और सही मायने मे वही राजा है!
🔶 एक बार वो घुमते घुमते एक छोटे से गाँव मे पहुँचा जहाँ एक कुम्हार भगवान भोले बाबा के मन्दिर के बाहर मटकीया बेच रहा था और कुछ मटकीयों मे पानी भर रखा था और वही पर लेटे लेटे हरिभजन गा रहा था!
🔷 राजा वहाँ आया और भगवान भोले बाबा के दर्शन किये और कुम्हार के पास जाकर बैठा तो कुम्हार बैठा हुआ और उसने बड़े आदर से राजा को पानी पिलाया! राजा कुम्हार से कुछ प्रभावित हुआ और राजा ने सोचा की ये इतनी सी मटकीयों को बेच कर क्या कमाता होगा?
🔶 तो राजा ने पूछा क्यों भाई प्रजापति जी मेरे साथ नगर चलोगे तो प्रजापति ने कहा नगर चलकर क्या करूँगा राजाजी?
🔷 राजा - वहाँ चलना और वहाँ खुब मटकीया बनाना!
🔶 प्रजापति - फिर उन मटकीयों का क्या करूँगा?
🔷 राजा - अरे क्या करेगा? उन्हे बेचना खुब पैसा आयेगा तुम्हारे पास!
🔶 प्रजापति - फिर क्या करूँगा उस पैसे का?
🔷 राजा - अरे पैसे का क्या करेगा? अरे पैसा ही सबकुछ है!
🔶 प्रजापति - अच्छा राजन अब आप मुझे ये बताईये की उस पैसे से क्या करूँगा?
🔷 राजा - अरे फिर आराम से भगवान का भजन करना और फिर तुम आनन्द मे रहना!
🔶 प्रजापति - क्षमा करना हॆ राजन पर आप मुझे ये बताईये की अभी मै क्या कर रहा हुं और हाँ पुरी ईमानदारी से बताना! काफी सोच विचार किया राजा ने और मानो इस सवाल ने राजा को झकझोर दिया!
🔷 राजा - हाँ प्रजापति जी आप इस समय आराम से भगवान का भजन कर रहे हो और जहाँ तक मुझे दिख रहा है आप पुरे आनन्द मे हो!
🔶 प्रजापति - हाँ राजन यही तो मै आपसे कह रहा हुं की आनन्द पैसे से प्राप्त नही किया जा सकता है!
🔷 राजा - हॆ प्रजापति जी कृपया कर के आप मुझे ये बताने की कृपा करे की आनन्द की प्राप्ति कैसे होगी?
🔶 प्रजापति - बिल्कुल सावधान होकर सुनना और उस पर बहुत गहरा मंथन करना राजन! हाथों को उल्टा कर लिजिये!
🔷 राजा - वो कैसे?
🔶 प्रजापति - हॆ राजन मांगो मत देना सीखो और यदि आपने देना सिख लिया तो समझ लेना आपने आनन्द की राह पर कदम रख लिया! स्वार्थ को त्यागो परमार्थ को चुनो! हॆ राजन अधिकांशतः लोगो के दुःख का सबसे बड़ा कारण यही है की जो कुछ भी उसके पास है वो उसमे सुखी नही है और बस जो नही है उसे पाने के चक्कर मे दुःखी है! अरे भाई जो है उसमे खुश रहना सीख लो दुःख अपने आप चले जायेंगे और जो नही है क्यों उसके चक्कर मे दुःखी रहते हो!
🔷 आत्मसंतोष से बड़ा कोई सुख नही और जिसके पास सन्तोष रूपी धन है वही सबसे बड़ा सुखी है और वही आनन्द मे है और सही मायने मे वही राजा है!
👉 सत्य की शोध कीजिए (भाग 3)
🔷 मैं जिस बात का समर्थन करना चाहता हूँ वह यह है कि इस उपेक्षित सत्य को लोग जीते जागते रूप में स्वीकार करें कि धर्म की वास्तविकता का आधार बहुत आवश्यक और विश्वव्यापी आवश्यकता के रूप में मानव प्रकृति की सत्यता में है और इसीलिए मानव प्रकृति के द्वारा उस धर्म की वास्तविकता की लगातार परीक्षा होती रहनी चाहिए। जहाँ पर यह उस आवश्यकता की उपेक्षा और तर्क का उल्लंघन करती है वहाँ पर यह स्वयं अपने औचित्य को दूर भगा देती है।
🔶 मुझे इस कथन को मध्यकालीन भारतवर्ष के बहुत बड़े रहस्यवादी कवि कबीर, जिन्हें मैं अपने देश के सर्वप्रधान आध्यात्मिक विशेष बुद्धिमानों में से एक व्यक्ति मानता हूँ, की कुछ निम्नलिखित पंक्तियों को देते हुए समाप्त करने दीजिए।
🔷 “रत्न कीचड़ में खो गया है और सब लोग उसे ढूँढ़ रहे हैं। कुछ लोग पूरब की ओर खोजते हैं, कुछ पश्चिम की ओर। कुछ लोग पानी में खोजते हैं और कुछ पत्थरों में। किन्तु दास कबीर ने उस के सच्चे मूल्य को जान लिया है और स्वयं अपने हृदयरूपी वस्त्र के एक आँचल में उसे बड़े यत्न के साथ लपेट रखा है।”
✍🏻 विश्व कवि श्री रवीन्द्रनाथ जी टैगोर
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 9
🔶 मुझे इस कथन को मध्यकालीन भारतवर्ष के बहुत बड़े रहस्यवादी कवि कबीर, जिन्हें मैं अपने देश के सर्वप्रधान आध्यात्मिक विशेष बुद्धिमानों में से एक व्यक्ति मानता हूँ, की कुछ निम्नलिखित पंक्तियों को देते हुए समाप्त करने दीजिए।
🔷 “रत्न कीचड़ में खो गया है और सब लोग उसे ढूँढ़ रहे हैं। कुछ लोग पूरब की ओर खोजते हैं, कुछ पश्चिम की ओर। कुछ लोग पानी में खोजते हैं और कुछ पत्थरों में। किन्तु दास कबीर ने उस के सच्चे मूल्य को जान लिया है और स्वयं अपने हृदयरूपी वस्त्र के एक आँचल में उसे बड़े यत्न के साथ लपेट रखा है।”
✍🏻 विश्व कवि श्री रवीन्द्रनाथ जी टैगोर
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 9
👉 Science and spirituality
🔷 The discovery of the powers of Nature, their organisation and the skills that make them useful is called science. Science can thus be called the unison of matter and consciousness. Science has made possible the progress of the human civilisation.
It should be noted that the knowledge of the use of matter is not enough; its righteous use should also be considered. The same criterion also applies to consciousness. In the absence of their righteous use, matter and consciousness are abused. The attraction of immediate gains is such that its long-term effects are not appreciated and this shortsighted judgement prompts man to misuse power. Ultimately, he creates a web in which he gets trapped, just like a fish caught in a net. This is accompanied by suffering, public anger and self-destruction, and yet it is a practice generally adopted by people. The society and the government rarely succeed in preventing such practices.
🔶 Science can be credited for the current progress and prosperity, but it is incapable of differentiating between use and abuse. The only way to control its misuse is to incorporate wisdom based on foresightedness and the greatness associated with human glory. This is the essence of spirituality. Spirituality means, “centred and established on the soul”, that is, activities in life are designed keeping the welfare of the soul as the aim. The soul is the consciousness present in the human body.
🔷 Consciousness is more powerful than matter. As discussed earlier, it is the miracle of consciousness that organises matter in a useful state. However, unrestrained consciousness has drawbacks too. For example, it is easy to find faults in others, but does anyone try to inspect their own self for their own faults? Usually, an individual is biased towards his shortcomings and considers himself the best. A person trying to prove himself will present several arguments in his favour. This distorts the reality and generates undesirable thoughts.
🔶 The dual accomplishment of the righteous use of science and the refinement of consciousness is possible only through spirituality.
📖 Akhand Jyoti Jan 2001
It should be noted that the knowledge of the use of matter is not enough; its righteous use should also be considered. The same criterion also applies to consciousness. In the absence of their righteous use, matter and consciousness are abused. The attraction of immediate gains is such that its long-term effects are not appreciated and this shortsighted judgement prompts man to misuse power. Ultimately, he creates a web in which he gets trapped, just like a fish caught in a net. This is accompanied by suffering, public anger and self-destruction, and yet it is a practice generally adopted by people. The society and the government rarely succeed in preventing such practices.
🔶 Science can be credited for the current progress and prosperity, but it is incapable of differentiating between use and abuse. The only way to control its misuse is to incorporate wisdom based on foresightedness and the greatness associated with human glory. This is the essence of spirituality. Spirituality means, “centred and established on the soul”, that is, activities in life are designed keeping the welfare of the soul as the aim. The soul is the consciousness present in the human body.
🔷 Consciousness is more powerful than matter. As discussed earlier, it is the miracle of consciousness that organises matter in a useful state. However, unrestrained consciousness has drawbacks too. For example, it is easy to find faults in others, but does anyone try to inspect their own self for their own faults? Usually, an individual is biased towards his shortcomings and considers himself the best. A person trying to prove himself will present several arguments in his favour. This distorts the reality and generates undesirable thoughts.
🔶 The dual accomplishment of the righteous use of science and the refinement of consciousness is possible only through spirituality.
📖 Akhand Jyoti Jan 2001
👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 1)
🔷 मनुष्य−समाज की स्वार्थहीन सेवा कर्मयोग है। यह हृदय को शुद्ध करके अन्तःकरण को आत्मज्ञान रूपी दिव्य ज्योति प्राप्त करने योग्य बना देता है। विशेष बात तो यह है कि बिना किसी आसक्ति अथवा अहंभाव के आपको मानव−जाति की सेवा करनी होगी। कर्मयोग में कर्मयोगी सारे कर्मों और उनके फल को भगवान के अर्पण कर देता है। ईश्वर में एकता रखते हुए, आसक्ति को दूर करके सफलता व निष्फलता में समान रूप से रह कर कर्म करते रहना कर्म−योग है।
🔶 जैमिनी ऋषि के मतानुसार अग्निहोत्रादि वैदिक कर्म ही कर्म है। भगवद्गीता के अनुसार निष्काम भाव से किया हुआ कोई भी कार्य कर्म है। भगवान् कृष्ण ने कहा है निरन्तर कर्म करते रहो, आपका धर्म फल की चाहना न रखते हुए कर्म करते रहना ही है। गीता का प्रधान उपदेश कर्म में अनासक्ति है। श्वास लेना, खाना, देखना, सुनना, सोचना सब कर्म हैं।
🔷 अपने गुरु या किसी महात्मा की सेवा कर्मयोग का सर्वोच्च रूप है। इससे आपका चित्त जल्दी शुद्ध हो जावेगा। उनकी सेवा करने से उनके दिव्य तेज का आप के ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। आपको उनसे दैवी प्रेरणा प्राप्त होगी। शनैः शनैः आप उनके सद्गुणों को ग्रहण कर लोगे।
✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 6
🔶 जैमिनी ऋषि के मतानुसार अग्निहोत्रादि वैदिक कर्म ही कर्म है। भगवद्गीता के अनुसार निष्काम भाव से किया हुआ कोई भी कार्य कर्म है। भगवान् कृष्ण ने कहा है निरन्तर कर्म करते रहो, आपका धर्म फल की चाहना न रखते हुए कर्म करते रहना ही है। गीता का प्रधान उपदेश कर्म में अनासक्ति है। श्वास लेना, खाना, देखना, सुनना, सोचना सब कर्म हैं।
🔷 अपने गुरु या किसी महात्मा की सेवा कर्मयोग का सर्वोच्च रूप है। इससे आपका चित्त जल्दी शुद्ध हो जावेगा। उनकी सेवा करने से उनके दिव्य तेज का आप के ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। आपको उनसे दैवी प्रेरणा प्राप्त होगी। शनैः शनैः आप उनके सद्गुणों को ग्रहण कर लोगे।
✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 6
👉 शिष्यत्व का समर्पण
🔷 शिष्यत्व का समर्पण आध्यात्मिक जीवन का सौभाग्य शिखर है। बड़े ही पुण्यवान् जनों के हृदयों में शिष्यत्व अंकुरित होता है। यह अंकुरण सहज नहीं है। अनेकों जन्मों के तप, व्रत, जप, दान और अनगिन शुभ कर्मों के सुयोग से हृदय भूमि इतनी उर्वर हो पाती है कि उसमें शिष्यत्व अंकुरित हो सके। इस अद्भुत-अलौकिक अंकुरण का बड़े जतन से रख-रखाव करना पड़ता है। एक तरफ सांसारिक विषय-वासना की विपदाओं से बचना पड़ता है, तो दूसरी ओर बड़ी आध्यात्मिक विकलता से सद्गुरु को टेर लगानी पड़ती है। बड़े ही भाव-विह्वल हृदय से उन्हें पुकारना पड़ता है। सद्गुरु की पुकार के अमृत जल से ही शिष्यत्व का यह बिरवा पल्लवित-पुष्पित होता है।
🔶 विकसित होते शिष्यत्व में बड़ा ही दैवी आकर्षण होता है। समस्त मानवीय सद्गुण अपने आप ही इस ओर खिंचे चले आते हैं। आध्यात्मिक शक्तियाँ और अनुभूतियाँ, दिव्य लोकों के ऋषि व देवगण अनायास ही इस पर अपनी कृपा वृष्टि करते हैं। लेकिन शिष्यत्व तो बस अपने सद्गुरु के चरणों का चंचरीक होता है। गुरु प्रेम की पुकार उसके प्राणों में बसती है। गुरुभक्ति में उसकी भावनाएँ पलती हैं। गुरुश्रद्धा उसका सर्वस्व होती है। उसे तो बस एक ही धुन रहती है कब मेरे समर्पण को पूर्णता मिलेगी? कब मेरे आराध्य मेरे समूचे अस्तित्त्व को स्वीकारेंगे? कब वह मेरे हृदय की भावनाओं को अपनी भावना बनाएँगे?
🔷 इस धुन में शिष्यत्व दिव्यता का महाचुम्बकत्व सघन हो जाता है। उसमें न लोक की कोई चाहत बचती है और न परलोक की। अब उसे न कोई कामना सताती है, न कोई वासना। स्वर्ग, मुक्ति, ज्ञान, ध्यान सबके सब गुरु प्रेम में विलीन हो जाते हैं। उसके प्रत्येक कर्म के कौशल में, विचारों के संवेदन में, भावनाओं की विह्वलता में बस समर्पण के स्वर गूंजते हैं। ‘सद्गुरु कृपा हि केवलम्, न हि अन्यत्र मे जीवनम्’ प्राणों में बस यही एक गीत पलता है। शिष्यत्व की कोई मांग नहीं होती, उसकी कोई शर्त नहीं होती। वह तो अपने प्रभु पर न्योछावर हो जाना चाहता है। स्वयं को उन पर लुटा देना चाहता है। उनके प्रत्येक संकेत व आदेश पर सौ-सौ बार जीना-मरना चाहता है। उसके इस समर्पण को पूर्णता देने के लिए परम कृपालु गुरुदेव उसकी अन्तर्चेतना में अवतरित होते हैं।
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 108
🔶 विकसित होते शिष्यत्व में बड़ा ही दैवी आकर्षण होता है। समस्त मानवीय सद्गुण अपने आप ही इस ओर खिंचे चले आते हैं। आध्यात्मिक शक्तियाँ और अनुभूतियाँ, दिव्य लोकों के ऋषि व देवगण अनायास ही इस पर अपनी कृपा वृष्टि करते हैं। लेकिन शिष्यत्व तो बस अपने सद्गुरु के चरणों का चंचरीक होता है। गुरु प्रेम की पुकार उसके प्राणों में बसती है। गुरुभक्ति में उसकी भावनाएँ पलती हैं। गुरुश्रद्धा उसका सर्वस्व होती है। उसे तो बस एक ही धुन रहती है कब मेरे समर्पण को पूर्णता मिलेगी? कब मेरे आराध्य मेरे समूचे अस्तित्त्व को स्वीकारेंगे? कब वह मेरे हृदय की भावनाओं को अपनी भावना बनाएँगे?
🔷 इस धुन में शिष्यत्व दिव्यता का महाचुम्बकत्व सघन हो जाता है। उसमें न लोक की कोई चाहत बचती है और न परलोक की। अब उसे न कोई कामना सताती है, न कोई वासना। स्वर्ग, मुक्ति, ज्ञान, ध्यान सबके सब गुरु प्रेम में विलीन हो जाते हैं। उसके प्रत्येक कर्म के कौशल में, विचारों के संवेदन में, भावनाओं की विह्वलता में बस समर्पण के स्वर गूंजते हैं। ‘सद्गुरु कृपा हि केवलम्, न हि अन्यत्र मे जीवनम्’ प्राणों में बस यही एक गीत पलता है। शिष्यत्व की कोई मांग नहीं होती, उसकी कोई शर्त नहीं होती। वह तो अपने प्रभु पर न्योछावर हो जाना चाहता है। स्वयं को उन पर लुटा देना चाहता है। उनके प्रत्येक संकेत व आदेश पर सौ-सौ बार जीना-मरना चाहता है। उसके इस समर्पण को पूर्णता देने के लिए परम कृपालु गुरुदेव उसकी अन्तर्चेतना में अवतरित होते हैं।
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 108
👉 गुरुगीता (भाग 104)
👉 गुरूगीता का प्रत्येक अक्षर मंत्रराज है
🔷 इस परम रहस्यमयी गुरूकथा को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ माँ जगदम्बा से कहते हैं-
🔶 इदं तु भक्तिभावेन पठते श्रृणुते यदि। लिखित्वा तत्प्रदातव्यं तत्सर्वं सफलं भवेत्॥ १३१॥
गुरूगीतात्मकं देवि शुद्धतत्त्वं मयोदितम्। भवव्याधिविनाशार्थं स्वयमेव जपेत्सदा॥ १३२॥
गुरूगीताक्षरैकं तु मंत्रराजमिमं जपेत्। अन्ये च विविधा मंत्राः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १३३॥
अनन्तफलमाप्रोति गुरूगीताजपेन तु। सर्वपापप्रशमनं सर्वदारिद्रयनाशनम्॥१३४॥
🔷 गुरूगीता का भक्तिपूर्वक पठन, श्रवण एवं इसका लेखन तथा दूसरों को इसे देने से सर्वसुफल प्राप्त होते हैं॥१३१॥ प्रभु कहते हैं- हे देवि! गुरूगीता रूपी इस शुद्ध तत्त्व को मैंने आपके सामने कहा है। इसका विधिपूर्वक जप सभी सांसारिक कठिनाइयों का विनाश करने वाला है॥ १३२॥ गुरूगीता का प्रत्येक अक्षर मंत्रराज है। अन्य सभी मंत्र मिलकर भी इसकी सोलहवीं कला भी नहीं हैं॥ १३३॥ इस गुरूगीता की मंत्रमाला के जप का अनन्तफल है। इसका पाठ करने वाला इस अनन्त फल को प्राप्त करता है। ऐसा करने से उसके सभी पापों का एवं सभी तरह की दरिद्रता का विनाश होता है॥१३४॥
🔶 भगवान् शिव के इस कथन में गुरूगीता के मांत्रिक महत्त्व का संकेत है। इसमें इसके पाठ के महत्त्व का वर्णन है। जिस तरह से श्रीमद्भगवद्गीता स्वयं योगेश्वर कृष्ण के मुखारविन्द से उपदेशित होने के कारण सर्वशास्त्रमयी है, उसी तरह गुरूगीता सभी योगियों के परम आराध्य योगीश्वर भगवान् शिव के श्रीमुख से उच्चरित है। एक अर्थ में इसका महत्व श्रीमद् भगवत् गीता से भी बढ़कर है और वह इस तरह कि श्रीमद् भगवद्गीता के श्रोता के रूप में अर्जुन हैं, जो कि मोहग्रस्त एवं किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में इसे सुनना प्रारम्भ करते हैं। जबकि गुरूगीता की श्रोता भगवती आदिशक्ति जगदम्बा स्वयं हैं। जो कि सम्पूर्ण सृष्टि को अपने गर्भ में धारण करती हैं। जिनकी चित् शक्ति से ही यह सृष्टि चेतना एवं शक्ति प्राप्त करती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 158
🔷 इस परम रहस्यमयी गुरूकथा को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ माँ जगदम्बा से कहते हैं-
🔶 इदं तु भक्तिभावेन पठते श्रृणुते यदि। लिखित्वा तत्प्रदातव्यं तत्सर्वं सफलं भवेत्॥ १३१॥
गुरूगीतात्मकं देवि शुद्धतत्त्वं मयोदितम्। भवव्याधिविनाशार्थं स्वयमेव जपेत्सदा॥ १३२॥
गुरूगीताक्षरैकं तु मंत्रराजमिमं जपेत्। अन्ये च विविधा मंत्राः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १३३॥
अनन्तफलमाप्रोति गुरूगीताजपेन तु। सर्वपापप्रशमनं सर्वदारिद्रयनाशनम्॥१३४॥
🔷 गुरूगीता का भक्तिपूर्वक पठन, श्रवण एवं इसका लेखन तथा दूसरों को इसे देने से सर्वसुफल प्राप्त होते हैं॥१३१॥ प्रभु कहते हैं- हे देवि! गुरूगीता रूपी इस शुद्ध तत्त्व को मैंने आपके सामने कहा है। इसका विधिपूर्वक जप सभी सांसारिक कठिनाइयों का विनाश करने वाला है॥ १३२॥ गुरूगीता का प्रत्येक अक्षर मंत्रराज है। अन्य सभी मंत्र मिलकर भी इसकी सोलहवीं कला भी नहीं हैं॥ १३३॥ इस गुरूगीता की मंत्रमाला के जप का अनन्तफल है। इसका पाठ करने वाला इस अनन्त फल को प्राप्त करता है। ऐसा करने से उसके सभी पापों का एवं सभी तरह की दरिद्रता का विनाश होता है॥१३४॥
🔶 भगवान् शिव के इस कथन में गुरूगीता के मांत्रिक महत्त्व का संकेत है। इसमें इसके पाठ के महत्त्व का वर्णन है। जिस तरह से श्रीमद्भगवद्गीता स्वयं योगेश्वर कृष्ण के मुखारविन्द से उपदेशित होने के कारण सर्वशास्त्रमयी है, उसी तरह गुरूगीता सभी योगियों के परम आराध्य योगीश्वर भगवान् शिव के श्रीमुख से उच्चरित है। एक अर्थ में इसका महत्व श्रीमद् भगवत् गीता से भी बढ़कर है और वह इस तरह कि श्रीमद् भगवद्गीता के श्रोता के रूप में अर्जुन हैं, जो कि मोहग्रस्त एवं किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में इसे सुनना प्रारम्भ करते हैं। जबकि गुरूगीता की श्रोता भगवती आदिशक्ति जगदम्बा स्वयं हैं। जो कि सम्पूर्ण सृष्टि को अपने गर्भ में धारण करती हैं। जिनकी चित् शक्ति से ही यह सृष्टि चेतना एवं शक्ति प्राप्त करती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 158
👉 विचारों का केन्द्र बिंदु- ’क्यों’?
🔶 जीवन एक विकट समस्या है इसमें न जाने कितने उतार- चढ़ाव आते हैं और स्मृति में विलीन हो जाते हैं। इनमें से कुछ ही विचार थोड़े समय के लिए हमारी स्मृति में रह पाते हैं पर उन पर भी हम सरसरी नजर भर डाल लेते हैं, गहराई से नहीं सोच पाते अन्यथा जीवन सबसे अधिक अध्ययन का विषय एवं ज्ञान का भंडार है। जीवन की प्रत्येक घटना के पीछे कार्यकारण परम्परा का अद्भुत रहस्य छिपा है। विचार करने पर छोटी से छोटी साधारण घटना जीवन का काया पलट कर देती है और विचार नहीं करने पर बड़ी से बड़ी घटनाओं का भी कोई असर नहीं हो पाता।
🔷 कथाओं में हम प्रायः पढ़ते हैं कि अमुक व्यक्ति को बादलों के रंग देखकर वैराग्य हो गया। अमुक को रोगी, दीन, वृद्ध एवं मृतक को देखकर संसार से उदासीनता हो गई, पर हम इनको रात दिन देखते है। फिर भी हम पर इनका असर नहीं होता, आखिर ऐसा क्यों? इस पर विचार करना आवश्यक है। एक घोर पापी किसी महात्मा के एक उपदेश वाक्य से सजग हो उठा पर हमने उनके वाक्यों को अनेक बार पढ़ा और मनन किया फिर भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ। एक ही बात एक को भोग की ओर आकर्षित करने वाली होती है और दूसरे को त्याग की ओर। इससे स्पष्ट है कि वह शक्ति घटनाओं में नहीं, हमारे विचारों में ही है।
🔶 विचारों से ही मनुष्य बनता है और उन्हीं से बिगड़ता भी है। अतः जीवन की हर एक समस्या- हर एक घटना पर, चाहे वह कितनी ही तुच्छ और साधारण क्यों न जान पड़े मनन करना आवश्यक है। उसका महत्त्व समझना आवश्यक है। प्रत्येक कार्य के कारण पर विचार किया जाय कि ऐसा हुआ तो क्यों हुआ? और ऐसा नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ?
🔷 अमुक मनुष्य कार्य कर सकता है तो मैं क्यों नहीं कर सकता? उसमें और मुझमें किन- किन बातों का क्या अन्तर है? मेरी और उसकी कार्य प्रणाली में कहाँ सामंजस्य हैं? कहाँ विषमता है? मेरी त्रुटि कहाँ है? मैं कैसे वैसा कर सकता हूँ या बन सकता हूँ? मैंने अमुक समय में वह कार्य किया तो क्यों किया? मुझे अमुक विचार आया तो क्यों आया? और अमुक कार्य या विचार नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? इस प्रकार “क्यों” की विचारधारा को आगे बढ़ाते जाने पर नया प्रकाश मिलता जायगा। नई समस्याओं के नये हल मिलेंगे और नए हलों के लिये नई समस्याएँ। क्यों एवं कैसे- विचारों के विकास का मूल मंत्र है उसे अपना कर आप लाभ उठाइये, विचारक बनिए।
🌹 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1949 पृष्ठ 12
http://awgpskj.blogspot.in/2017/06/blog-post_70.html
🔷 कथाओं में हम प्रायः पढ़ते हैं कि अमुक व्यक्ति को बादलों के रंग देखकर वैराग्य हो गया। अमुक को रोगी, दीन, वृद्ध एवं मृतक को देखकर संसार से उदासीनता हो गई, पर हम इनको रात दिन देखते है। फिर भी हम पर इनका असर नहीं होता, आखिर ऐसा क्यों? इस पर विचार करना आवश्यक है। एक घोर पापी किसी महात्मा के एक उपदेश वाक्य से सजग हो उठा पर हमने उनके वाक्यों को अनेक बार पढ़ा और मनन किया फिर भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ। एक ही बात एक को भोग की ओर आकर्षित करने वाली होती है और दूसरे को त्याग की ओर। इससे स्पष्ट है कि वह शक्ति घटनाओं में नहीं, हमारे विचारों में ही है।
🔶 विचारों से ही मनुष्य बनता है और उन्हीं से बिगड़ता भी है। अतः जीवन की हर एक समस्या- हर एक घटना पर, चाहे वह कितनी ही तुच्छ और साधारण क्यों न जान पड़े मनन करना आवश्यक है। उसका महत्त्व समझना आवश्यक है। प्रत्येक कार्य के कारण पर विचार किया जाय कि ऐसा हुआ तो क्यों हुआ? और ऐसा नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ?
🔷 अमुक मनुष्य कार्य कर सकता है तो मैं क्यों नहीं कर सकता? उसमें और मुझमें किन- किन बातों का क्या अन्तर है? मेरी और उसकी कार्य प्रणाली में कहाँ सामंजस्य हैं? कहाँ विषमता है? मेरी त्रुटि कहाँ है? मैं कैसे वैसा कर सकता हूँ या बन सकता हूँ? मैंने अमुक समय में वह कार्य किया तो क्यों किया? मुझे अमुक विचार आया तो क्यों आया? और अमुक कार्य या विचार नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? इस प्रकार “क्यों” की विचारधारा को आगे बढ़ाते जाने पर नया प्रकाश मिलता जायगा। नई समस्याओं के नये हल मिलेंगे और नए हलों के लिये नई समस्याएँ। क्यों एवं कैसे- विचारों के विकास का मूल मंत्र है उसे अपना कर आप लाभ उठाइये, विचारक बनिए।
🌹 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1949 पृष्ठ 12
http://awgpskj.blogspot.in/2017/06/blog-post_70.html
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026
शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...



















