शनिवार, 5 मई 2018

👉 भगवान बुद्ध

🔷 भगवान् बुद्ध अनाथ पिण्डक के जैतवन में ग्रामवासियों को उपदेश कर रहे थे। शिष्य अनाथ पिण्डक भी समीप ही बैठा, धर्म चर्चा का लाभ ले रहा था।

🔶 तभी सामने से महाकाश्यप मौद्गल्यायन, सारिपुत्र, चुन्द और देवदत्त आदि आते हुए दिखाई दिये। उन्हें देखते ही बुद्ध ने कहा-वत्स! उठो, यह ब्राह्मण मण्डली आ रही है, उसके लिये योग्य आसन का प्रबन्ध करो।

🔷 अनाथ पिण्डक ने आयुष्मानों की ओर दृष्टि दौड़ाई, फिर साश्चर्य कहा- भगवन्! आप सम्भवतः इन्हें जानते नहीं। ब्राह्मण तो इनमें कोई एक ही है, शेष कोई क्षत्रिय, कोई वैश्य और कोई अस्पृश्य भी हैं।

🔶 गौतम बुद्ध अनाथ पिण्डक के वचन सुनकर हंसे और बोले- तात! जाति-जन्म से नहीं, गुण, कर्म और स्वभाव से पहचानी जाती है। श्रेष्ठ, रागरहित, धर्मपरायण, संयमी और सेवाभावी होने के कारण ही इन्हें मैंने ब्राह्मण कहा है। ऐसे पुरुष को तू निश्चय ही ब्राह्मण मान जन्म से तो सभी जीव शूद्र होते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1970

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 6 May 2018


👉 Humanity: Our Precious Heritage – Part 2

🔷 There was an era during which ennobling feelings of helping others reigned. A person used to think, “How could I be of help to others? Whom should I offer my services to so as to uplift his condition?” This was considered a measure of superiority. People did not yearn as much for riches, glory, etc as they did for sacrificing themselves in the interest of the society and the world. They considered it honourable to give up life for ideals and whosoever got this opportunity considered it God’s grace bestowed upon them.

🔶 History contains several examples of sacrifices of highest stature. Pannadai sacrificed her son for the security of the royal throne. Sukanya had accidentally damaged the eyes of Rishi Chyavan. In repentance, she married him and shared all his hardships. Is such sacrifice less than ideal? Gandhari’s husband Dhritrashtra was blind; she could not bear the difficulties he was going through due to his blindness. Hence she voluntarily chose blindness by covering her eyes with a strip of cloth. Can anyone forget this piece of history? Such glorious examples of unbelievable sacrifices have been the backbone of the Hindu culture. It is the reason why India’s fame radiates even today like a brilliant constellation in the sky.

📖 Akhand Jyoti Jan 2001

👉 साँचे बनें, सम्पर्क करें

🔷 प्रज्ञा परिवार  सृजन का संकल्प लेकर चला है। उसके सदस्यों, सैनिकों का स्तर ऊँचा होना चाहिए। ऐसा ऊँचा इतना अनुशासित कि उसके कृ र्तृत्व को देखकर अनेक की चेतना जाग पड़े और पीछे चलने वालों की कमी न रहे। बढ़िया साँचों में ही बढ़िया आभूषण, पुर्जे या खिलौने ढलते हैं। यदि साँचे ही आड़े-तिरछे हों तो उनके संपर्क क्षेत्र में आने वाले भी वैसे ही घटिया—वैसे ही फूहड़ होंगे। इसी प्रयास को संपन्न करने के लिए कहा गया है। इसी को उच्चस्तरीय आत्म परिष्कार कहा गया है। यही महाभारत जीतना है। जन-नेतृत्व करने वालों को आग पर भी, कसौटी पर भी खरा उतरना चाहिए। लोभ, मोह और अंहकार पर जितना अंकुश लगाया जा सके लगाना चाहिए। तभी वर्तमान प्रज्ञा परिजनों से यह आशा की जा सकेगी कि वे अपनी प्रतिभा से अपने क्षेत्र को आलोकित कर सकें गे और सृजन का वातावरण बना सकेंगे।

🔶 दूसरा कार्य यह है कि नवयुग के संदेश को और भी व्यापक बनाया जाए। इसके लिए जन-जन से संपर्क  साधा जाए। घर-घर अलख जगाया जाए। मिशन की पृष्ठभूमि से अपने समूचे संपर्क क्षेत्र को अवगत कराया जाए। पढ़ाकर भी और सुनाकर भी। इन अवगत होने वालों में से जो भी उत्साहित होते दिखाई पड़ें उन्हें कुछ छोटे-छोटे काम सौंपे जाएँ। भले ही वे जन्मदिन मनाने जैसे अति सुगम और अति साधारण ही क्यों न हों। पर उनमें कुछ श्रम करना, कुछ सोचना और कुछ कहना पड़ता है। तभी वह व्यवस्था जुटती है। ऐसे छोटे आयोजन संपन्न कर लेने पर मनुष्य की झिझक छूटती है, हिम्मत बढ़ती है और वह क्षमता उदय होती है, जिसके माध्यम से नव सृजन प्रयोजन के लिए जिन बड़े-बड़े कार्यों की आवश्यकता है, उन्हें पूरा किया जा सके।
  
🔷 जो कार्य अगले दिनों करने हैं, वे पुल खड़े करने, बाँध बाँधने, बिजली घर तैयार करने जैसे विशालकाय होंगे। इसके लिए इंजीनियर नहीं होंगे, और न ऊँचे वेतन पर उनकी क्षमता को खरीदा जा सकेगा। वे अपने ही रीछ वानरों में से होंगे। समुद्र पर पुल बाँधने जैसे कार्य में नल-नील जैसे प्रतिभावान भावनाशील ही चाहिए। इसके लिए बुद्ध, गाँधी, विनोबा जैसे चरित्र भी चाहिए और प्रयास भी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अगस्त 1985 पृष्ठ 65   

👉 सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति (भाग 2)

🔷 अज्ञान, आसक्ति, अहंकार वासना एवं संकीर्णता के बंधनों से छुटकारा पाने को ही मुक्ति कहते हैं। आत्मा-परमात्मा का अंश होने के कारण स्वभावतः युक्त है, उसे यह कुप्रवृत्तियाँ ही अपने बंधन में बाँधकर मायाबद्ध जीव बना लेती है। इन बंधनों से छुटकारा मिलते ही आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है और जीवन मुक्ति का अनिर्वचनीय उपलब्ध करने लगता है।

🔶 अपनी भूल आप समझ में नहीं आती, यदि समझ में आ जाय तो उसे तुरन्त सुधार लें। रोगी यह नहीं समझता कि मैं कुपथ्य कर रहा हूँ यदि उसे ऐसा पता होता तो कुपथ्य करके प्राणों को संकट में क्यों डालता? यों तो कहने सुनने को हर एक भूल करने वाला और कुमवृध करने वाला यह जानता है कि जो कर रहे हैं वह ठीक नहीं पर ऐसा केवल बाहरी रूप से ही सोचा जाता है, यदि अन्तःकरण के गहन अन्तराल को सच्चे हृदय से या कुपंथ की बुराई मालूम हो जाय तो उसे छोड़ते हुए देर न लगे।

🔷 बात माया बन्धन के बारे में है। स्वार्थ, वासना के निकृष्ट सुख में लोग वैसे ही अनुभव करते रहते हैं जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चबा कर मसूड़े छिलने से निकलने वाले ही रक्त को ही चाटता है और रक्तपान का अनुभव करता है। यदि मानव मन को अनुभूति अंतःकरण के गहरे अन्तराल में होना कि माया बन्धन के कटघरे में जो सुख है क्रमवश सुख लगता है वस्तुतः वह भारी घाटे विपत्ति का कारण है तो उसे अपने बन्धनों को तोड़ने में निश्चय ही तत्परता हो जाएगी।

🔶 इस अनुभूति के लिए ही आध्यात्मवाद समस्त शिक्षा और साधना है। इस श्रेय मार्ग पर चलने वाला सत् का महत्व समझ जाता वह सद्विचारों को अपनाता है, जिससे सुदूर और सत्कार्यों में उसकी प्रवृत्ति होती है और धीरे-धीरे वह सत्पुरुष बनता हुआ सन्मार्ग चलता हुआ जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15

👉 गुरुगीता (भाग 102)

👉 सच्चे शिष्य का एक ही स्वर- निष्काम कर्म

🔷 गुरूगीता के पिछले क्रम में भगवान् भोलेनाथ ने जगन्माता से ऐसे सिद्ध साधक के विषय में कहा था कि ऐसा मुक्त पुरूष स्वयं सर्वमय होकर परम तत्त्व को देखता है। वह इस सत्य का अनुभव करता है कि आत्म तत्त्व ही श्रेष्ठ है। श्री गुरूकृपा से इस परम तत्त्व का अवलोकन करने के बाद वह शिष्य ,साधक सभी आसक्तियों से रहित, एकाकी, निःस्पृह, शान्त और स्थिर हो जाता है। उसे अभीष्ट मिले या फिर न मिले, उसे ज्यादा मिले या कम मिले, इस चिन्ता को छोड़कर वह सभी कामनाओं से
रहित, संतुष्ट चित्त होकर जीवन यापन करता है। उसे यह सब मिलता है- गुरू द्वारा प्रदर्शित मार्ग का अनुसरण करने से।

🔶 इस गुरू मार्ग की महिमा को बताते हुए भगवान् शिव माता पार्वती से कहते हैं-

उपदेशः तथा देवि गुरूमार्गेण मुक्तिदः। गुरूभक्तिस्तथा ध्यानं सकलं तव कीर्तितम्॥ १२८॥
अनेन यदभवेत् कार्य तद्वदामि महामते। लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु न भावयेत् ॥ १२९॥
लौकिकात्कर्मणो यान्ति ज्ञानहीना भवार्णवम्। ज्ञानी तू भावयेत्सर्वं कर्म निष्कर्म यत्कृतम्॥ १३०॥

🔷 हे देवि! उपदेशित गुरू मार्ग मुक्ति दायक है। गुरू की भक्ति, गुरू का ध्यान और वह सब जो आपसे कहा गया है॥ १२८॥ इस सबका उपयोग साधक को लोक कल्याण के लिए करना चाहिए न कि लौकिक कामनाओं को पूरा करने के लिए॥ १२९॥ जो ज्ञानहीन लोग इन सबका लौकिक कामनाओं के लिए उपयोग करते हैं, उन्हें बार- बार भवसागर में गिरना पड़ता है, परन्तु जो ज्ञानी अपने कर्म का निष्काम भाव से प्रतिपादन करते हैं, वे सभी कर्म बन्धनों से मुक्त रहते हैं॥ १३०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 155

शुक्रवार, 4 मई 2018

👉 इंसान और भगवान

🔶 एक बार एक गरीब किसान एक अमीर साहूकार के पास आया, और उससे बोला कि आप अपना एक खेत एक साल के लिए मुझे उधार दे दीजिये। मैं उसमें मेहनत से काम करुँगा, और अपने खाने के लिए अन्न उगाऊंगा।

🔷 अमीर साहूकार बहुत ही दयालु व्यक्ति था। उसने किसान को अपना एक खेत दे दिया, और उसकी मदद के लिए 5 व्यक्ति भी दिए। साहूकार ने किसान से कहा कि मैं तुम्हारी सहायता के लिए ये 5 व्यक्ति दे रहा हूँ, तुम इनकी सहायता लेकर खेती करोगे तो तुम्हे खेती करने में आसानी होगी।

🔶 साहूकार की बात सुनकर किसान उन 5 लोगों को अपने साथ लेकर चला गया, और उन्हें ले जाकर खेत पर काम पर लगा दिया। किसान ने सोचा कि ये 5 लोग खेत में काम कर तो रहे हैं, फिर मैं क्यों करू? अब तो किसान दिन रात बस सपने ही देखता रहता, कि खेत में जो अन्न उगेगा उससे क्या क्या करेगा, और उधर वे पाँचो व्यक्ति अपनी मर्जी से खेत में काम करते। जब मन करता फसल को पानी देते, और अगर उनका मन नहीं करता, तो कई दिनों तक फसल सुखी खड़ी रहती।

🔷 जब फसल काटने का समय आया, तो किसान ने देखा कि खेत में खड़ी फसल बहुत ही ख़राब है, जितनी लागत उसने खेत में पानी और खाद डालने में लगा दी खेत में उतनी फसल भी खेत में नहीं उगी। किसान यह देखकर बहुत दुखी हुआ।

🔶 एक साल बाद साहूकार अपना खेत किसान से वापिस माँगने आया, तब किसान उसके सामने रोने लगा और बोला आपने मुझे जो 5 व्यक्ति दिए थे मैं उनसे सही तरीके से काम नहीं करवा पाया और मेरी सारी फसल बर्बाद हो गयी। आप मुझे एक साल का समय और दे दीजिये मैं इस बार अच्छे से काम करूँगा और आपका खेत आपको लौटा दूँगा।

🔷 किसान की बात सुनकर साहूकार ने कहा- बेटा यह मौका बार बार नहीं मिलता, मैं अब तुम्हें अपना खेत नहीं दे सकता। यह कहकर साहूकार वहाँ से चला गया, और किसान रोता ही रह गया।

🔶 मित्रो अब आप यहाँ ध्यान दीजिये

🔷 वह दयालु साहूकार “भगवान” हैं। गरीब किसान “हम सभी व्यक्ति” हैं। साहूकार से किसान ने जो खेत उधार लिया था, वह हमारा “शरीर” है।

🔶 साहूकार ने किसान की मदद के लिए जो पांच किसान दिए थे, वो है हमारी पाँचो इन्द्रियां “आँख, कान, नाक, जीभ और मन”

🔷 भगवान ने हमें यह शरीर अच्छे कर्मो को करने के लिए दिया है, और इसके लिए उन्होंने हमें 5 इन्द्रियां “आँख, कान, नाक, जीभ और मन” दी है। इन इन्द्रियों को अपने वश में रखकर ही हम अच्छे काम कर सकते हैं ताकि जब भगवान हमसे अपना दिया शरीर वापिस मांगने आये तो हमें रोना ना आये।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 5 May 2018


👉 सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति

🔶 प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों द्वारा ही अपना आत्म निर्माण करता है। क्योंकि विचार का बीज ही समयानुसार फलित होकर गुणों का रूप धारण करता है और वे गुण, मनुष्य के दैनिक जीवन में कार्य बनकर प्रकट होते रहते हैं। विचार ही वह तत्व है जो गुण, कर्म, स्वभाव के रूप में, दृष्टिगोचर होता है। मन, कर्म, वचन में विचारों का ही प्रतिबिम्ब सदा परिलक्षित होता रहता है।

🔷 मानव मनोभूमि में सत् और असत् दो प्रकार के संकल्प काम करते रहते हैं। भलाई और बुराई दोनों ही ओर मन चलता रहता है। इस द्विधा में जिधर रुचि अधिक हुई, उधर ही प्रकृतियां बढ़ जाती है। यदि असत मार्ग पर चला गया तो अपयश, द्वेष, चिन्ता, दैवी प्रकोप, शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता दरिद्रता एवं अप्रतिष्ठा प्राप्त होती है। और यदि सत मार्ग का अनुगमन किया गया तो प्रशंसा, प्रतिष्ठा, प्रेम, सहयोग, संतोष, दीर्घ जीवन, शारीरिक और आत्मिक बलिष्ठता एवं सदा आनन्द ही आनन्द का रसास्वादन होता है। दो प्रकार के विचार ही मनुष्य समाज को दो भागों में बाँटते हैं। सुखी-दुखी, रोगी-निरोगी, दरिद्र-सम्पन्न, दृष्ट-सज्जन, पापी-पुण्यात्मा, निन्दित-पूज्य, प्रसन्न-चिन्तित आदि द्विविधि श्रेणियाँ केवल मात्र द्विविधि विचारों द्वारा ही विनिर्मित होती हैं।

🔶 अधिक संख्या में जनसमुदाय का मानसिक धरातल परिमार्जित नहीं होता, उसमें पाश्विक वृत्तियों की प्रधानता रहती हैं। अविवेक, अज्ञान, अदूरदर्शिता, संकुचित स्वार्थपरायणता, लोभ विषय विकारों में आसक्ति एवं निकृष्ट कोटि के मनोरंजन की अभिलाषाओं से मनः दोष भरा रहता है। जिससे उसके सोचने, कार्य करने और आनंद लाभ करने की परिधि ऐसी सीमित हो जाती है जिसमें बुराई, तामसिकता एवं अशान्ति ही उत्पन्न हो सकती है। इसी कटघरे में अधिकाँश लोग बंद रहते हैं माया का यह घेरा मनुष्य को बुरी तरह जकड़े रहता है। वह जकड़ा हुआ प्राणी पराधीनता जन्म नाना प्रकार के दुखों को प्राप्त करता रहता है। यही भव बन्धन है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15

👉 Humanity: Our Precious Heritage

🔶 When the whole world was following the policy of selfishness, whereby a person would accumulate in excess and deprive others, saints in India mused, what was the uniqueness of man in practising this dictum? Everybody is desirous of indulging in pleasures. Everyone is willing to commit unethical deeds for earning money. The society is tormented by people’s habit of loafing around in idleness. Who does not crave to eat the best food and wear best clothes? All these are the features of an ordinary man.

🔷 Many of these tendencies are found in animals too, and if man also wallows in them, what is his speciality? Such an attitude does not make the right use of his knowledge, intellect and wisdom. In spite of being the possessor of extraordinary strength and abilities, if man leads a contemptible life, then where does lie the meaningfulness of the human life? Superior possessions should be used for superior deeds – only Indians have apprehended this fact. For this very reason alone our authority and eminence have subsisted in the world.

🔶 The problem of bread and butter could not be more acute for man than the need to understand the aim of life. Even an atheist will accept that human life is a rare opportunity. It would be unwise to waste it like ordinary people do. Going in an opposite direction of the routine, the purpose of human life can be ascertained. The outcome of living life casually, pain and suffering, is evident to us all. Therefore the saints asked: why not go in an opposite direction and discover some new facts? With this ideology a new philosophy emerged in India. It inspired the birth of sadhana. The achievements (siddhis) of sadhana were majestic and great.

🔷 The dispersal of even a fraction of these achievements resulted in heavenly happiness in the world. The name of these achievements was “humanity”, meaning practising the dictum “I do not want it, you take it. Nothing belongs to me; everything belongs to the Almighty God” (i.e. selflessness and sacrifice). After thorough sadhanas and the resulting experiences, saints concluded that everyone is entitled to God’s gifts, so they should be distributed to all. By pursuing this guideline, the development of happiness can take place and the world can be kept secure. Save this, there is no other way to establish peace in man’s life.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 लोक सेवा इन दिनों क्या होनी चाहिए?

🔶 लोक सेवा इन दिनों क्या होनी चाहिए, इसकी जानकारी दूरदर्शी विवेकवानों को समय-समय पर कराई जाती रही है और कहा जाता रहा है कि दुर्मति ही दुर्गति का कारण है। चिन्तन का भटकाव ही असंख्य समस्याओं का मूल है। सड़े कीचड़ में से दुर्गन्धित कृमि कीट उपजते हैं और रक्त के विषाक्त होने पर अनेकानेक चर्म रोगों का उद्भव होता है। प्रज्ञा युग के अवतरण के लिए हमें घर-घर युग चेतना का अलख जगाना और जन-जन के मन-मन में युग संदेश का आलोक पहुँचाना है।

🔷 युग समस्याओं को प्राथमिकता देते हुए हम कुछ समय के लिए धर्मशाला, मन्दिर, कूप, तालाब, औषधालय, प्याऊ, सदावर्त आदि ख्याति प्रदान करने वाले निर्माणों से हाथ खींच सकते हैं, और सर्वप्रथम सर्वोत्तम एवं सामयिक प्रज्ञा प्रसार को अग्रगामी बनाने के लिए प्रयत्नरत हो सकते हैं। इसके लिए जैसे-जैसे लोभ, मोह के बन्धन शिथिल होते जाँय, समय एवं साधन दान को आज की परम आवश्यकता मानते हुए हर परिजन को युग धर्म के निर्वाह में जुट जाना चाहिए।

🔶 पतन निवारण की इस सेवा के निमित्त दो ही उपाय हैं- (1) स्वाध्याय (2) सत्संग।  इन्हीं दो के सहारे सद्ज्ञान का विस्तार हो सकता है और युग तमिस्रा से छुटकारा मिल सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1985 62  

👉 गुरुगीता (भाग 101)

👉 सच्चे शिष्य का एक ही स्वर- निष्काम कर्म

🔶 गुरूगीता के महामंत्रों की साधना से सद्गुरू का सामीप्य एवं सद्गुरू की कृपा दोनों ही सम्भव है। कई बार नवीन साधक के मन में जिज्ञासा होती है कि कहाँ ढुँढे अपने सद्गुरू को? कैसे मिले सद्गुरू? किसके चरणों में करें अपने समर्पण की साधना? कुछ अक्षरों में गुँथे इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढना आसान नहीं लगता, क्योंकि व्यावहारिक अनुभव यही कहता है कि सद्गुरू की प्राप्ति आसान नहीं होती। प्रायः यही होता हैं कि सद्गुरू मिलते ही नहीं और यदि किसी संयोगवश मिल भी गये, तो उनकी सद्गुरू के रूप में पहचान आसान नहीं होती। यह एक ऐसी जटिल पहेली है, जिसे हल करने में लोग अपना सम्पूर्ण जीवन गँवा देते हैं, फिर भी समस्या ज्यों की त्यों रहती है।

🔷 इस समस्या के समाधान में एक अनुभव कथा कहने का मन है। यह कथा एक किशोरवय के साधक की है, जो अपने सद्गुरू को ढूँढ रहा था। अपनी इस खोज को उसने अपनी साधना बना लिया। उसकी इस साधना के तीन पहलू रहे- पहला का आस्थापूर्वक पाठ। दूसरा- गुरू रूप में भगवान् शिव का वरण एवं तीसरा- गुरूमंत्र के रूप में गायत्री मंत्र का जप। जो सतत साधना करते हैं, जिनका शास्त्र ग्रन्थों का सम्यक् अध्ययन है- वे इस सत्य को भलीभाँति जानते हैं कि भगवान् शिव अपने दक्षिणामूर्ति स्वरूप में सभी प्राणियों के गुरू हैं। दस रूप में वे सभी को सद्गुरू प्राप्ति का वरदान देते हैं।

🔶 कोई भी साधक यदि उपरोक्त साधना ठीक से करता रहे, तो एक दिन भगवान् शिव ही उसे उसके सद्गुरू का परिचय देते हैं और उनकी प्राप्ति कराते हैं। अनुभूति कथा के इस किशोर साधक को भी अपनी यह साधना निरन्तर आठ वर्षों तक करनी पड़ी। अन्त में एक दिन स्वयं भगवान् सदाशिव ने उसके स्वप्न में आकर कहा- देख, मुझे पहचान मैं हूँ तेरा सद्गुरू। और इस स्वप्न में ही भगवान् शिव का दिव्य कलेवर उसके सद्गुरू के रूप में बदल गया। हाँ यह बात अलग है, इस स्वप्न परिचय को साकार होने में उसे दो वर्षों की साधना और करनी पड़ी। इन दो वर्षों में परिस्थिति चक्र में आश्चर्यजनक मोड़ आये, उसे उसके सद्गुरू का सान्निध्य भी मिला और कृपा भी। यह सत्य कथा किसी भी साधक के जीवन का सच बन सकती है। बस, प्रयास हो भावभरे मन से साधना की। साधना बनी रहे, तो सिद्धि मिलते, सिद्ध बनते देर नहीं लगती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 154

गुरुवार, 3 मई 2018

👉 जो सहेगा वह चलेगा और लगातार वही चलेगा

🔷 एक नगर मे नन्दु नाम का साधक रहता था साधना करता था पर बाधायें रुकने का नाम नही लेती थी अक्सर वो किसी सन्त के दरबार मे जाया करता था एक बार वो बहुत हताशा और निराशा मे डुबा हुआ आश्रम के बाहर बैठा था तो अन्दर से महात्मा जी बाहर आये!

🔶 महात्मा - बेटा नन्दु लो ये दो टुकडे इनको नगर मे सुनार की दुकान पे ले जाना और कहना की इनका एक कड़ा बना दो और उस कड़े को मैं तुम्हे पहना दूँगा ताकि तुम्हारी समस्या का समाधान हो जायें!

🔷 नन्दु गया वापस आया और कहा हॆ देव दुकानदार ने एक टुकडे को तो फेंक दिया और दुसरे टुकडे को ले लिया!

🔶 महात्मा - पर उन्होंने ऐसा क्यों किया तुमने पुछा नही?

🔷 नन्दु - पुछा देव उन्होंने कहा की इसमे एक सोने का टुकड़ा है और दुसरा लोहे का उन्होने लोहे के टुकडे को फेंक दिया!

🔶 महात्मा - फिर क्या किया वत्स?

🔷 नन्दु - फिर उन्होंने सोने के टुकडे को छिनी और हथोडी से छोटे छोटे टुकडे किये फिर उसे आग मे रखकर पिगलाया फिर हथोडे से उसकी खुब पिटाई की बारबार आग मे तपाये और पिटाई करे बहुत लम्बी प्रक्रिया के बाद ये कड़ा बनकर तैयार हुआ!

🔶 महात्मा - यही तो मैं तुमसे कह रहा हुं वत्स की परीक्षा सोने को ही देनी पड़ती है और आग मे तपना पड़ता है और बहुत लम्बी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद वो गहना बनकर तैयार होता है!

🔷 हॆ वत्स इस कड़े को अपने हाथ मे पहन लो ताकि तुम्हे हमेशा याद रहे की मुझे इस जीवन को ऐसा बनाना है की मेरे सद्गुरु मुझे अपने हाथों मे ले ले! हॆ वत्स एक बात हमेशा याद रखना की जब साधना के मार्ग पर बाधा पे बाधा आये तो समझ लेना की तुम्हारी साधना मे दम है और ऐसे समय मे घबराना मत सद्गुरु का आशीर्वाद लेकर और तेजी से आगे बढ़ना!

🔶 एक बात हमेशा ध्यान रखना की सोने को आग मे तपना पड़ता है गहना बनने के लिये असंख्य चोटें सहनी पड़ती है! हॆ मेरे सत्य के अतिप्रिय साधक चोटों से घबराकर हार कभी मत मानना लड़ते रहना और निरन्तर प्रकाश की ओर बढ़ते रहना! और सहन तो करना पड़ेगा वत्स यदि यहाँ नही तो फिर वहाँ सहन करना पड़ेगा और अच्छा होगा की यही सहन कर ले क्योंकि यहाँ सहन करेंगे तो आगे तरेगे और यदि यहाँ सहन करने से भागेंगे तो आगे की सारी यात्रा मे इधर उधर मारे मारे फिरेंगे!

🔷 हॆ वत्स ये हमेशा याद रखना की भागना जीवन नही है जागना जीवन है और जब जग जाओ तो फिर चलना और सहनशील बनना और सहना क्योंकि जो सहेगा वह चलेगा और लगातार वही चलेगा जो सहेगा ये कभी न भुलना की जो सहेगा वही बनेगा!

👉 आज का सद्चिंतन 4 May 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 May 2018


👉 इन तीन का ध्यान रखिए (अन्तिम भाग)

🔷 इन तीनों को स्मरण रखो- आरोग्य, सुमित्र और संतोष वृत्ति। ये तीनों ही आड़े समय काम में आने और रक्षा करने वाले है।

🔶 चाहे अन्य बातों में आप पीछे रहें, किन्तु इन स्वास्थ्य और आरोग्य सम्पादकों को प्राप्त करते रहिये। सच्चा मित्र जीवन का सब से बड़ा हितैषी और सहायता है। संतोषवृत्ति मनः शक्ति को परिपुष्ट करने, आन्तरिक समस्वरता को प्रदान करने वाली परमौषधि है।

🔷 इन तीनों का प्राप्त करो-(1) अच्छी पुस्तक (2) अच्छी सोबत और (3) अच्छी आदतें। अच्छे, उपयोगी, चरित्र का परिष्कार एवं आत्म सुधार करने वाले सद्ग्रन्थ जिस व्यक्ति के पास है, उसे अकेलापन, नीरसता, शुष्कता कभी न प्रतीत होगी। पुस्तकें सदा सर्वदा चौबीसों घंटे का आत्मसुधार करने को प्रस्तुत हैं, आपकी सद्शिक्षाएँ देने को मौजूद रहती हैं। इनके सत्संग से अनेक साधारण व्यक्ति महत्ता प्राप्त कर सकते हैं। सत्साहित्य से समाज के ज्ञान का संवर्द्धन चरित्र का संशोधन होता है। उच्च कोटि के साहित्य से ही घर की शोभा है।

🔶 महात्मा गाँधी जी ने कहा है, “अच्छी पुस्तकों के पास रहने से हमें अपने भले मित्रों के साथ न रहने की कमी नहीं खटकती। जितना ही मैं उत्तम पुस्तकों का अध्ययन करता गया, उतना ही मुझे उनकी विशेषताएं मालूम होती गईं। जिसे पुस्तकें पढ़ने का शौक है, वह सब जगह सुखी रह सकता है।” लोकमान्य तिलक के अनुसार, “मैं नर्क में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूंगा, क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि वे जहाँ होंगी, वहाँ आप ही स्वर्ग बन जायेगा।” अच्छी पुस्तकें ही अच्छी सोहबत और अच्छी आदतें प्रदान कर सकती हैं।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14

👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Last Part)

🔶 Yajóa is also supposed to be performed during the programme of katha-kirtan (the recital of a story along with devotional songs), religious celebrations and the occasions of special festivals. For example, Holi, which is celebrated these days as a colour festival was originally a festival of yajóa to celebrate the harvesting of new crop every year. A handful of new grains is supposed to be sacrificed in the “holi- yajóa” as a mark of expressing gratitude to God’s grace. The spirit of purifying the grain before using it in food preparation is also associated with this yajóa.  

🔷 Yajóa is also performed along with religious functions like Satya Narayan Katha, Bhagvat Katha, Ramayan Parayan, etc. Specific yajóas are also invariably linked with the Vedic as well as the tantrika sadhana anusthanas. Gayatri Sadhana is regarded incomplete without yajóa. The number of ahutis offered in the havans or yajóas organized to mark the end of Gayatri anusthana or mahapurashcharanas should at least equal the tenth or hundredth fraction of the number of japas completed everyday in these sadhanas.  Worshiping different manifestations of God is also supposed to be carried out with specific kinds of yajóa, as described in the holy scriptures.  

🔶 The prominence of tirthas, the places of pilgrimage, is also associated with yajóa since the Vedic Age. The places where grand yajóas were organized and conducted by the rishis became tirthas and are still revered as holy destinations of pilgrimage in India.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 गुरुगीता (भाग 100)

👉 गुरूकृपा गृहस्थ को भी विदेह बना देती है

🔶 गुरूगीता के इन मंत्रों में मुक्त पुरूष का व्यवहार बताया गया है। यह अतिदुर्लभ अवस्था जिसे जहाँ प्राप्त है, वह व्यक्ति तो कृतार्थ है ही। वह भूमि भी धन्य हो जाती है, जहाँ ऐसे लोग रहा करते हैं। ऐसे व्यक्ति संन्यासी हों या गृहस्थ, श्वेताम्बर हो या काषायाम्बर अथवा फिर दिगम्बर सर्वत्र पूजनीय हैं। इन्हें वेष से नहीं, अवस्था से पहचाना जाता है। ये जनक की भाँति राजा भी हो सकते हैं और महामुनि शुकदेव की भाँति सर्वत्यागी भी। परन्तु इनकी अन्तर्चेतना सदा विराट् में विलीन रहती है। हाँ, उन्हें समझ पाना अति कठिन हो पाता है, केवल ज्ञानी जन ही इन्हें जान पाते हैं।

🔷 पुराण कथा के अनुसार राजा जनक को अपने गुरूदेव अष्टावक्र की कृपा से ज्ञान हुआ था। महर्षि अष्टावक्र की कृपा से ही उन्हें सिद्धि मिली थी। साधना से सिद्धि की यात्रा कर लेने के बावजूद वे गुरू आदेश से अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करते रहे। उनके लिए सभी कुछ समान था। परन्तु मूढ़ जन इस रहस्य को समझ न पाये और उन्हें साधारण गृहस्थ समझने की भूल करते रहे। इन्हीं दिनों ब्रहर्षि विश्वामित्र ने वेदान्त विदों का एक शिविर मिथिला नगरी में लगाया। इस शिविर में देशभर के ऋषि- मुनि, त्यागी वेश एवं कमण्डलुधारी, संन्यासी सभी पधारे। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, योगी याज्ञवल्क्य, महर्षि अष्टावक्र सरीखें पारदर्शी ज्ञानी वहाँ रोज प्रवचन देते।

🔶 इस प्रवचन कक्षा में राजर्षि जनक भी शामिल होते। परन्तु आडम्बर में घिरे कई वेशधारी संन्यासी उन्हें उपेक्षा की नजर से देखते। यहाँ तक कि उन्हें समझ में ही नहीं आता था कि वे महर्षि जन इस राजा को इतना सम्मान क्यों देते हैं? ब्रह्मर्षि विश्वामित्र से यह सच्चाई छुपी न रही। उन्होनें इन आडम्बर धारियों की समस्या का निराकरण करने के लिए शिविर स्थल में अपने तपोबल से आग लगा दी। आग लगते ही सबकी झोपड़ियाँ जलने लगी। जिस समय आग लगी, उस समय वेदान्त का प्रवचन चल रहा था। आत्मज्ञान की चर्चा के समय आग लगने से सभी संन्यासी घबरा गये। उन्हें अपनी लंगोटी व कमण्डलु की चिन्ता होने लगी। ये सभी प्रवचन को छोड़कर अपना सामान बचाने के लिए भागे। इस सारे खेल में ब्रहर्षि विश्वामित्र हंस रहे थे।

🔷 यह आग बढ़ती गयी। राजा जनक भी वहीं बैठे थे। परन्तु उनके चित्त में स्थिरता थी। वह बिना किसी परेशानी के वेदान्त चर्चा में भाग ले रहे थे। ब्रहर्षि विश्वामित्र ने उन्हें चेताया- महाराज महाराज! आग लगी है। आप तो राजा हैं। आपका राज्य एवं महल जल रहा है। क्या आपको चिंता नहीं हों रही है? महर्षि के प्रश्न पर राजा जनक स्थिर चित्त से बोले- ऋषियों! आप चिंता न करें। सद्गुरू की कृपा से मैंने सत्य जान लिया है- मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दहति किंचन  केवल मिथिला नगरी जल रही है, मेरा कुछ नहीं जल रहा है। जनक के इस कथन के साथ ही आग बुझ गयी। महर्षि ने अपना खेल समेट लिया। ज्ञान और आसक्ति का भेद स्पष्ट हो गया। सचमुच सद्गुरू की कृपा से क्या नहीं हो सकता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 152

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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