रविवार, 11 मार्च 2018

👉 प्रेम की कसौटी

🔶 नारदजी को अभिमान हो गाया कि मैं भगवान को बहुत प्यार करता हूँ। भगवान ने इस बात को जाना और अभिमान के निवारण का प्रयत्न किया क्योंकि अभिमान ही अध्यात्म मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।

🔷 भगवान नारद को साथ लेकर भ्रमण को चल दिये। चलते-चलते एक तपस्वी ब्राह्मण मिला जो सूखे पत्ते खाकर तप कर रहा था। शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया था। फिर भी कमर में तलवार लटकाए था।

🔶 भगवान साधारण वेश में थे। उनने तपस्वी से पूछा “आपके पत्ते खाने और तलवार धारण करने का क्या कारण है?”

🔷 तपस्वी ने कहा- पत्ते इसलिए खाता हूँ कि मेरे भगवान की प्रजा को अन्न दूध आदि वस्तुऐं पर्याप्त मात्रा में मिले। मेरे खाने के कारण किसी जीव के आहार में कमी न पड़े, और तलवार इसलिए बाँधे हुए हूँ कि संसार में तीन भक्ति को कलंकित करने वाले है, ये कभी मिल जायें तो इस तलवार से उनका सिर काट दूँ।

🔶 नरवेशधारी भगवान ने पूछा- भक्ति को कलंकित करने वाले तीन भला वे कौन-कौन है? तपस्वी ने कहा-एक अर्जुन जिसने मेरे भगवान से अपने स्वार्थ के लिए रथ हँकवाया; दूसरी, द्रौपदी जिसके चीर को बढ़ाने के लिए भगवान को नंगे पैरों दौड़ना पड़ा; तीसरा, नारद जिसे आत्मज्ञान पर संतोष नहीं, कभी कुछ कभी कुछ पूछकर मेरे भगवान का सिर खाता रहता है।

🔷 दोनों तपस्वी को प्रणाम करके चल दिए। नारद की समझ में अब आया कि उच्च कोटि के प्रेम का क्या लक्षण है? अपने प्रेमी को ही नहीं उसके प्रिय जनों को भी अपने कारण कुछ कष्ट न पहुँचने देना और अपने सुख के लिये किसी प्रकार की भी प्रेमी से याचना न करना।

🔶 नारद ने अपने प्रेम की तुलना उस तपस्वी के प्रेम से की तो उनका अभिमान चूर हो गया।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 March 2018

👉 आज का सद्चिंतन 12 March 2018


👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (भाग 3)

🔶 दूरदर्शी विवेकशीलता, महाप्रज्ञा यदि किसी बड़भागी पर अनुग्रह करे तो उसका स्वरूप एक ही होना चाहिए कि वह जीवन सम्पदा की गरिमा समझें और उसके सदुपयोग की बात सोचे। इस चिन्तन से एक ही निष्कर्ष उभरकर ऊपर आता है कि समय को प्रत्यक्ष सौभाग्य माना जाय और इसके उपयोग का जो सर्वश्रेष्ठ निर्धारण सम्भव हो उसे कर गुजरने का साहस अपनाया जाय।

🔷 महामानवों के पराक्रम का उपयोग दो प्रयोजनों के निमित्त होता रहा है। एक में उनने अपनी क्षमता एवं वरिष्ठता का अभिवर्धन किया है और दूसरे में उनने विश्व वसुधा के साथ जुड़े हुए उत्तरदायित्वों को संकल्प पूर्वक निभाया है। इन्हीं दो कार्यों को आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण के नाम से जाना जाता है। कोई चाहे तो उसे आत्मा और परमात्मा को प्रसन्नता उपलब्ध कराने वाली साधना भी कह सकता है। इनमें से एक स्वार्थ है और दूसरा परमार्थ। इनके समन्वय से ही मनुष्य जन्म सार्थक और कृत-कृत्य होता है।

🔶 आत्म-कल्याण का तात्पर्य है-व्यक्तित्व का निखार परिष्कार। इसके लिए आन्तरिक संघर्ष करना पड़ता है और गुण, कर्म, स्वभाव की वरिष्ठता सम्पादित करने वाले निर्धारणों का जीवनचर्या में समावेश करना पड़ता है। संचित कुसंस्कारों का एक पहाड़ हर किसी के सामने है। प्रचलन, वातावरण, स्वजन और आदतों का एक ऐसा जाल-जंजाल है जिसके रहते न कुछ उच्चस्तरीय सोचते बनता है और न करते धरते। इससे बाहर निकल सकना परम पुरुषार्थ है। जीवन से सम्बन्धित समस्याओं का स्वरूप सही अर्थों में समझ सकना आत्मबोध है। इस स्थिति तक पहुँचने के लिए वर्तमान चिन्तन प्रवाह को एक प्रकार से उलटना ही पड़ता है। इसके लिए स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन-मनन जैसे उच्चस्तरीय पुरुषार्थों में मन को बलपूर्वक नियोजित करना पड़ता है। साधना-उपासना भी इसी एक प्रयोजन के लिए की जाती है। यह अध्यात्म क्षेत्र का मानसिक पराक्रम हुआ जिसके लिए समय भी लगाना पड़ता है और श्रम भी करना पड़ता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 5)

Some statistics that will touch your hearts

🔶 I feel like presenting some more statistics to you. According to an estimate, the annual average income of an individual is around Rs 25000. But the same society buys around 800 tonnes of gold per year (note that the cost of gold has become more than 18000/- for 10gms). 600 tonnes of gold is exclusively used for making jewellery. In this country, a mere 3% of the people pay income tax every year. Then where does this huge amount come from? So, definitely the money being spent in profligate weddings must be the savings of the family. These savings can be brought into circulation through various mediums. This amount is beyond any kind of taxation. In the name of celebration and public merry-making, is this not a display of our sick mindset? Each and every intelligent person in the society should think about this.

🔷 More than 70 crores of our country’s population eke out a living with less than Rs. 30 income per day. More than 39 crores of the people are below the poverty line. Clean drinking water is not available for more than 60 crore people. 35 crore do not have access to primary education. 62 crores do not have their own houses. 20 crore sleep on the city footpaths.  15 crore are living out of compensation. On the contrary, political leaders have an average annual income of 9 lakh rupees. The annual income of about 30 crore of the population is more than Rs. 2 crores.  In India, 15 crore people are millionaires and 24 are billionaires. 25 crore people spend about 50 crore rupees on bottled water. 1.5 crore like to live in hotels while 7 crore own more than one house.

🔶 Aren’t these statistics an eye opener? But they depict a little less than the entire truth. Where do these expensive weddings take birth? This can be understood. Will group conflicts not rise in such situations? Why are divorces becoming more rampant? Why is domestic and social violence continuing on women? Why are social thinkers mum on this issue?

✍🏻 Pranav Pandya
📖 From Akhand Jyoti

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 2)

🔶 आपने गलतियाँ की हैं और अपने शरीर को कमजोर बना डाला है। आप पापकर्म से कैसे बचेंगे? पढ़ेंगे के समय में और पढ़ने के दिनों में लापरवाही बरती आपने और पढ़ने से इनकार कर दिया। अब आप बिना पड़े हैं, दम्भ से बचिए न जरा। नहीं साहब, हम तो प्रार्थना करेंगे, भगवान की पूजा करेंगे और विद्वान हो जाएँगे। आपने विद्वान बनने के लिए जो करना चाहिए था, वह किया था क्या? नहीं किया था। फिर क्या मतलब है? नहीं, हम तो पूजा करने मात्र से बन जाएँगे। नहीं भाईसाहब, ऐसा नहीं हो सकता। आप वास्तविकता को समझिए तो सही। यहाँ आ करके भी वास्तविकता को नहीं समझेंगे, आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद भी वास्तविकता और सच्चाई अगर आपकी समझ में न आ सकी, तो इसमें प्रवेश करने का क्या फायदा हुआ? आप अज्ञान में ही फँसे रहे, भ्रम में ही फँसे रहे और आप अज्ञान और भ्रमों को ही छाती से लगाए रहे, तो क्या बात बनी? आप यहाँ अध्यात्म को सच्चाई का प्रतीक मानिये और यह मानकर चलिए कि कर्मफल एक वास्तविकता है और उसमें जो भूतकाल के कर्म हैं, वह भी ज्यों के त्यों हैं।

🔷 पिताजी ने आपके लिए कर्ज लिया था और उससे आपने डिग्री हासिल की थी, लेकिन पिताजी के मरने के बाद में वह डिग्री आपको भुगतानी पड़ेगी, चाहे आपका मकान बिके या आपकी जमीन बिके। साहब हम तो क्षमा माँगेंगे, पुरानी बात तो पुरानी हो गई। पुरानी बात कैसे हो गई? बैंक से आप कर्जा लाए थे और बैंक का कर्जा बढ़ते-बढ़ते दुगुना हो गया है, अब आप चुकायेंगे कि नहीं, चुकायेंगे। नहीं साहब, बैंक मैनेजर से प्रार्थना करेंगे, हाथ जोड़ेंगे, पैर छुएँगे, पंचामृत पिलाएँगे और माफ करा लेंगे। आप यह बेकार की बात मत कीजिए। बेकार की बात करने से आपको भ्रमित, घृणित और अज्ञानियों की श्रेणी में गिना जाएगा।

🔶 आप भ्रमग्रस्त मत रहिए और अज्ञानियों की श्रेणी में अपने आपको शामिल मत कराइए। भूतकाल के पापों से या भूतकाल की घटनाओं से आप प्रभावित हैं, तो भूतकाल को मजाक में नहीं उड़ा सकते। भूतकाल में जो आपने किया था, लड़ाई-झगड़े किए थे, किसी आदमी का कत्ल कर दिया था, तो आप पर मुकदमा चलेगा और आप फाँसी के लिए तैयार रहिए। नहीं साहब, भूतकाल को छोड़िए, जो मार डाला, सो मार डाला और मर गया, सो मर गया। आप यों कहेंगे कैसे? भूतकाल ऐसे मजाक की चीज है? मजा की चीज नहीं है। आप ऐसा मत कीजिए। आप वास्तविकता से इतनी दूर रहेंगे, तो फिर वहाँ नहीं पहुँच सकेंगे, जहाँ आपको वास्तविकता के सहारे पहुँचना है। पापों का प्रायश्चित एक बहुत बड़ी बात है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 62)

👉 मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यम्

🔶 इस सत्य को बताने वाली एक बहुत ही प्यारी घटना है, जिसे जानकर शिष्यगणों को सहज ही गुरुदेव की महिमा का बोध होगा। यह सत्य घटना बंगाल के महान साधक सुरेन्द्र नाथ बनर्जी के बारे में है। बनर्जी महाशय उन दिनों सर्वेयर के पद पर कार्यरत थे। इस पद पर उनकी आमदनी तो ठीक थी। पर पारिवारिक जीवन समस्याओं से घिरा था। पहले बेटी का मरना, फिर पत्नी का लम्बी बीमारी के बाद देहत्याग! इन विषमताओं ने उन्हें विचलित कर दिया था। ऐसे में उनकी मुलाकात महान् सन्त सूर्यानन्द गिरी से हुई। सुरेन्द्र नाथ के विकल मन ने सन्त की शरण में छाँव पाना चाहा। इसी उद्देश्य से वह उन संन्यासी महाराज की कुटिया में गए और दीक्षा देने की प्रार्थना की।

🔷 इस प्रार्थना को सुनकर संन्यासी महाराज नाराज हो गए और उन्हें डपटते हुए बोले-  ‘आज तक तुमने सत्कर्म किया है, जो मेरा शिष्य बनना चाहते हो। जाओ पहले सत्कर्म करो।’ उनकी इस झिड़की को सुनकर सुरेन्द्रनाथ विचलित नहीं हुए और बोले- आज्ञा दीजिए महाराज! संन्यासी सूर्यानन्द गिरी ने कहा- इस संसार में पीड़ित मनुष्यों की संख्या कम नहीं है। उन पीड़ितों  की सेवा करो। जो आज्ञा प्रभो! सुरेन्द्र नाथ ने कहा- मैंने सम्पूर्ण अन्तस् से आपको अपना गुरु माना है, आपके द्वारा कहा गया प्रत्येक वाक्य मेरे लिए मूलमंत्र है। आपके द्वारा उच्चारित प्रत्येक अक्षर मेरे लिए परा बीज है।

🔶 ऐसा कहकर सुरेन्द्रनाथ कलकत्ता चले आए और अभावग्रस्त, लाचार, दुःखी मनुष्यों की सेवा करने लगे। उन्हें अस्पताल ले जाकर भर्ती करने लगे। निराश्रितों के सिरहाने बैठकर सेवा करते हुए वे गरीबों के मसीहा बन गए। धीरे-धीरे पास की सारी रकम समाप्त हो जाने पर वे कुली का काम करने लगे। उससे जो आमदानी होती, उससे अपाहिजों की सहायता करने लगे। ऐसी दशा में उनके कई वर्ष गुजर गए। इस बीच संन्यासी सूर्यानन्द गिरी से उनकी कोई मुलाकात नहीं हुई।

🔷 एक दिन जब वे कुली का काम करके जूट मिल से बाहर निकले, तो देखा कि सामने गुरुदेव खड़े हैं। सुरेन्द्र के प्रणाम करते ही उनसे गुरुदेव ने कहा-सुरेन्द्र, तुम्हारी परीक्षा समाप्त हो गयी है, अब मेरे साथ चलो।  इस आदेश को शिरोधार्य करके वे चुपचाप गुरु  के पीछे-पीछे चल पड़े। गुरुदेव उन्हें बंगाल, आसाम पार कराते हुए बर्मा के जंगलों में ले गए। यहीं से उनकी साधना का क्रम शुरू हुआ। गुरु- कृपा से वह महान् सिद्ध सन्त महानन्द गिरी के नाम से प्रसिद्ध हुए। परवर्ती काल में जब कोई उनसे साधना का रहस्य जानना चाहता, तो वे एक ही बात कहते, ‘मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं’ गुरु वाक्य मूल मंत्र है। इसकी साधना से सब कुछ स्वयं ही हो जाता है। सचमुच ही गुरुदेव की महिमा अनन्त व अपार है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 99

शनिवार, 10 मार्च 2018

👉 शेख सादी की सूक्तियाँ

🔶 “ऐ कनाअत तदन्गरम गरदाँ। क वराये तो हेच नेमत नेस्त॥”
“ऐ सन्तोष! मुझे दौलतमंद बना दें, क्योंकि संसार की कोई दौलत तुझसे बढ़कर नहीं है।”

🔷 एक अफ्रीकी सानिया कपड़ा बेचने वालों के कूचे में इस तरह कह रहा था, “ऐ धनी लोगों ! अगर तुम लोगों में न्याय होता और हम लोगों में संतोष होता, तो संसार से भीख माँगने की प्रथा ही उठ जाती।” हे संतोष ! मुझे धनी बना दे क्योंकि तेरे बिना कोई धनी नहीं है। लुकमान ने एकाँतवास में संतोष धारण किया था। जिसके दिल में संतोष नहीं है, उसमें तत्वज्ञान की हिकमत नहीं है।

🔶 तात्पर्य यह है कि जगत में ‘संतोष’ ही सबसे बड़ा धन है। जिसमें संतोष नहीं है, वह भारी से भारी धनी होने पर भी निर्धन है। जिसके हृदय में असंतोष नहीं है वही सदा सुखी है। लाख, करोड़ और अरब-खरब की सम्पदा होने पर भी जो संतोषहीन है वह परम दुखी है। सन्तोषी मनुष्य ही सब सुख भोग सकता है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 आत्म-भाव का विस्तार

🔶 इस संसार का अणु-अणु एक दूसरे से संबंधित है। एक दूसरे को पकड़े हुए है। यह कण यदि आपस में बँधे न रहें सहयोग न करें। परस्पर बँधे रहने की प्रक्रिया से मुँह मोड़ ले तो सृष्टि क्रम ही बिखर जायेगा, प्रत्येक पदार्थ के भीतर विघटन आरम्भ हो जायेगा और वह अपने अस्तित्व को ही खो बैठेगा। एकता के बंधनों का ऐसा ही महत्व है। जड़ जगत में ही नहीं सब चैतन्य प्राणियों विशेषतया मानव-समाज में यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि एकता, प्रेम और आत्मीयता के आधार पर उनका बल तथा विस्तार सुदृढ़ होता है। जो जितना ही आत्मीयता की भावनाओं से ओतप्रोत है वह उतना ही विकसित कहा जा सकता है। उदारमना महापुरुष-वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श को अपनाते हैं, उन्हें सभी अपने ही दिखाई पड़ते हैं। जिसका स्वार्थ-आत्मभाव जितना छोटा है, जितना संकीर्ण है उस व्यक्ति को उतना ही तुच्छ माना जायेगा।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 11 March 2018


👉 Be Good and Do Good

🔶 The truth behind performing good deeds to gain entry into heaven may be debatable. There are some references about such idea in the scriptures but its fundamental aim is to motivate people to follow the path in life which is moral and good for the self and the society at large.Getting a sick child take medicine is a great challenge. A mother has to resort to cajoling the child into taking medicine by saying that she would reward him with a toy. The child does not know the worth of the medicine, but he does know the worth of a toy. In the hope of getting rewarded with a toy, he takes the medicine which works in his best interest.

🔷 Similarly, an average individual does not appreciate the worth of living a high ideal life. Sensual pleasures are what interests him more. He can visualize his interest of securing the heavens which is the happiness he is seeking for. The prospects of heaven makes him take up a worthy course in life. This can’t be thought of as a deceit or a lie as it would indeed usher him in the direction which has much more to offer than the said reward.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Saṁsṛti saṅjivani Srimad-Bhagwata evam Gita Vangmay 31 Page 5.18

👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (भाग 2)

🔶 बहुमूल्य मानव जीवन का एक-एक क्षण अनमोल है। हर साँस को हीरे मोतियों से तोला जा सकता है। जिसने इस तथ्य को जाना, समझना चाहिए उसने जो सबसे अधिक महत्त्व का था उसे जान लिया। बुद्धिमत्ता की प्रशंसा तब है जब समय के सदुपयोग का उच्चस्तरीय निर्धारण बन सके। जिसकी भी प्रज्ञा ने इस प्रकार का अनुग्रह अनुदान प्रदान किया है, उसे सच्चे अर्थों में भाग्यवान कहना चाहिए। अन्यथा लोग ऐसे ही नर वानरों की तरह जीते और ज्यों-त्यों करके दिन गुजारते हैं।

🔷 ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदा को कौड़ी मोल गँवा देने वाले तीन भूल करते हैं-एक यह कि आलस्य-प्रमाद, विलास-विनोद में समय काटते हैं। दूसरे ललक लिप्सा की पूर्ति के लिए धन बटोरने में लगे रहते हैं। आम आदमी का अधिकांश समय नियोजन प्रायः इन्हीं दो कामों के लिए होता है। तीसरे स्तर के कुछ उद्धत प्रकृति के ऐसे भी होते हैं जो विनाश विध्वंस में लगे रहते हैं अथवा दर्प दिखाने, ठाठ बनाने के लिए, प्रशंसा सुनने के लिए ऐसे कृत्य करते हैं जिसमें प्रवंचना और विडम्बना के अतिरिक्त और कोई सार तत्व नहीं होता।

🔶 इन प्रयोजनों की परिणति पर ध्यान दिया जाय और महामानवों द्वारा अपनाई गई गतिविधियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो प्रतीत होगा कि दोनों के मध्य जमीन-आसमान जितना अन्तर है। दोनों की उपलब्धियों में इतना अन्तर है जिन्हें काँच और हीरे जैसा कहा जा सके। आलसी, प्रमादी, अनगढ़, पिछड़ी परिस्थितियों में पड़े रहते हैं। तृष्णातुर उद्यमी तो होते हैं, पर उनकी योग्यता उस अनावश्यक संचय और अवांछनीय उपभोग में लग जाती है जिसकी निरर्थकता को सहज समझा जा सकता था और देखा जा सकता था कि ललक में जिस सुखोपभोग की आशा की गई थी, उसकी छाया ही दिवास्वप्न की तरह लुभाती रही। पल्ले खीज़ और थकान के अतिरिक्त और कुछ लगा नहीं। बड़प्पन और दर्प की विडम्बना और भी अधिक उपहासास्पद है।

🔷 इस नक्कारखाने में तूती की क्या बिसात? एक से एक प्रतापी, कठपुतली जैसा नाच दिखाकर बाजीगर के झोली में घुस गये। यहाँ कौन किसका बड़प्पन मानता है? अपनी चिन्ता, समस्याओं से फुरसत नहीं फिर कौन किसका दर्प देखे और किसलिए, किस-किस समय किसी को सराहें? अपनी ओर ध्यान खींचने और चकाचौंध उत्पन्न करने की लिप्सा को बचकानी बालक्रीड़ा के अतिरिक्त और कुछ कहते नहीं बनता। यही हैं वे ललक लिप्साएँ जिसमें जिन्दगी का बहुमूल्य अवसर ऐसे ही गुम जाता है। विदाई के दिनों जब ईश्वर प्रदत्त अनुदान को किस निमित्त उपयोग किया गया, यह सोचने का अवसर मिलता तो प्रतीत होता कि भूल ही भूल में उस वैभव को गँवा दिया गया, जिसके सही सदुपयोग की बात यदि सूझ पड़ी होती तो सार्थकता का स्वरूप ही दूसरा होता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 4)

Expensive arrangements should become a laughing stock

🔶 Cost of living has increased, so has the list of items on the dinner menu. Today, we see people spending as much as Rs. 800-2400 per plate during the wedding dinners. This is partly because of the demand in the hotels due to limited muhurats available. This has undoubtedly led to boom in the hotel business; banquet halls are minting money; pundits who perform the weddings are in great demand, but the pockets of the people are getting lighter.

🔷 Can anyone say – this is my money and I will spend it the way I want; I can blow it off in smoke just like the crackers. No, it does make a difference. This money belongs to the entire society. This is not the money of an individual. They have extracted this money from the society, but are spending it according to their whims and fancies and setting up a very bad example indeed. This is a tradition that is working against our culture and the progress of the nation. This is an insult to the values of the society.

📖 From Akhand Jyoti
✍🏻 Pranav Pandya

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो! भाइयो!!

🔶 उन्नति के मार्ग पर सबसे बड़ी रुकावट वह है, जिसके कारण से हमारे पैर रुक जाते हैं। प्रायश्चित की प्रक्रिया इसीलिए है कि हमने भूतकाल में जो गलतियाँ की हैं, उनकी रोकथाम कर सकें। इस संसार का यह नियम है कि जो गलतियाँ होती हैं, भूलें होती हैं, उसका दण्ड तो मिलता-ही है। हमारे लिए सबसे बड़ा व्यवधान यही है कि पिछली गलतियाँ, वह रास्ता रोककर खड़ी हो जाती है और हमको उन्नति नहीं करने देतीं। अगर हम अपने ध्यान, जप और साधना में समर्थ हो जाएँ तब? तब फिर उन गलतियों का दण्ड कैसे मिलेगा? पापों का प्रायश्चित कैसे होगा? उज्ज्वल भविष्य तो सुख और शान्ति का हो जाएगा, फिर पापों का क्या होगा?

🔷 पाप इतनी छोटी बात नहीं हैं कि आप गंगा नहा करके या उसका प्रायश्चित करके, प्रार्थना करके खत्म कर सकें। वह आपके जीवन की कोई महत्त्वहीन घटना नहीं है। बुरे कामों का। अच्छे फलों की ही क्यों आशा करते हैं? जब आप अच्छे फलों की आशा करते हैं कि हमने यह अच्छा किया है, विद्या पढ़ी है, तो हमको उत्तीर्ण होना चाहिए, हमने मेहनत की है, तो हमको इनाम मिलना चाहिए, हमने ब्याह-शादी की है, तो हमारी घर-गृहस्थी चलनी चाहिए। जब आप श्रेष्ठ कामों के बारे में यह विश्वास करते हैं, कि हमको अपने कर्मों का अच्छा फल मिलना ही चाहिए, फिर आप एक और बात क्यों भूल जाते हैं कि हमने जो बुरे कर्म किये हैं या भूलें की हैं, उनका दण्ड मिलना चाहिए।

🔶 उसके बारे में फिर क्यों उपेक्षा करते हैं? इसकी उपेक्षा कीजिए न कि हम खेती करेंगे नहीं, पैदा हुआ तो क्या हुआ, हम विद्या पढ़ेंगे नहीं, पढ़ना आया तो क्या हुआ? आप यह क्यों सोचते हैं कि हमारे अच्छे कर्मों का फल तो हमको मिलना चाहिए और बुरे कर्मों के बारे में इतने ज्यादा लापरवाह हैं कि आप यह ख्याल कर लें कि हम राम नाम लेंगे, पंचामृत पी लेंगे, गंगाजी में डुबकी मार लेंगे, फलाना कर लेंगे, तो ऐसे दिल्लगी, मजाक जैसे छोटे-छोटे कारणों से आप छुटकारा पा जाएँगे?

🔷 ऐसा कैसे हो सकता है? यह मुमकिन नहीं है। जहर खाया है, तो आपको मरना पड़ेगा अथवा जहर को सारी नसों में से निकालना पड़ेगा। नहीं साहब, जहर खा लिया है, तो क्या हुआ, प्रार्थना कर लेंगे, फाँसी लगा ली है, तो क्या हुआ, प्रार्थना कर लेंगे, रेल की पटरी पर बैठ करके सिर कटा लिया है, तो क्या हुआ, प्रार्थना कर लेंगे। नहीं भाईसाहब, ऐसी कल्पना मत कीजिए बच्चों जैसी। आप जरा समझदारों की तरह बात कीजिए। पाप भी आपके जीवन की एक इकाई है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 61)

👉 मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यम्

🔶 परम पूज्य गुरुदेव की भावमयी मूर्ति ध्यान का मूल है। उनके चरण कमल पूजा का मूल हैं। उनके द्वारा कहे गए वाक्य मूल मंत्र हैं। उनकी कृपा ही मोक्ष का मूल है॥ ७६॥ गुरुदेव ही आदि और अनादि हैं, वही परम देव हैं। उनसे बढ़कर और कुछ भी नहीं। उन श्रीगुरु को नमन है॥ ७७॥ सप्त सागर पर्यन्त जितने भी तीर्थ उन सभी के स्नान का फल गुरुदेव के पादप्रक्षालन के जल बिन्दुओं का हजारवाँ हिस्सा भी नहीं है॥ ७८॥ यदि भगवान् शिव स्वयं रूठ जायें, तो श्री गुरु की कृपा से रक्षा हो जाती है; लेकिन यदि गुरु रूठ जाएँ, तो कोई भी रक्षा करने में समर्थ नहीं होता। इसलिए सभी प्रकार से कृपालु सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए॥ ७९॥ ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव रूप यह जो जगत् है-वह गुरुदेव का ही स्वरूप है।  गुरुदेव से अधिक और कुछ भी नहीं है। इसलिए सब तरह से गुरुवर की अर्चना करनी चाहिए॥ ८०॥

🔷 सद्गुरु चेतना की महिमा का गायन करने वाले इन मंत्रों में आध्यात्मिक जीवन के कई रहस्यों की दुर्लभ झलकियाँ हैं। गुरुदेव का ध्यान, उन्हीें की पूजा, उनके ही वाक्यों के अनुुसार जीवन एवं उनकी ही कृपा से परम पद की प्राप्ति-यह साधना का सहज पथ है। वही सब कुछ है। इस सृष्टि में जो भी विस्तार है, वह ब्राह्मी चेतना के साकार रूप गुरुदेव का ही है। गुरुदेव प्रसन्न हों तो काल को भी अपने पाँव पीछे लौटाने पड़ते हैं। जो शिष्य अपने सद्गुरु की कृपा छाँव में रहता है, उसका भला कौन क्या बिगाड़ सकता है? अपने शिष्य के जीवन के लिए ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर गुरुदेव के सिवा और कोई भी नहीं। परम समर्थ एवं परम कृपालु गुरुदेव से अधिक शिष्य के लिए और कुछ भी नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 98

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

👉 सत्य को न समझ पाने की आत्मघाती विडम्बना

🔷 किसी गाँव में कन्फ्यूशियस शिष्यों सहित पधारे। गाँव के पाँच युवक एक अन्धे को पकड़कर उनके पास लाये। उनमें से एक बोला- “भगवन्! एक समस्या हम सबके लिए उत्पन्न हो गई है। यह व्यक्ति आंख का तो अन्धा है पर है बहुत मूर्ख एवं हद दर्जे का तार्किक। हम इसको सतत् समझा रहे हैं कि प्रकाश का अस्तित्व है। प्रकृति के दृश्यों में सौंदर्य की अद्भुत छटा है। दुनिया में कुरूपता एवं सुन्दरता का युग्म सर्वत्र विद्यमान है। सूर्य, चाँद, सितारे प्रकाशवान हैं। समस्त संसार उनसे प्रकाशित-आलोकित होता है। रंग-बिरंगे पुष्पों में एक प्राकृतिक आकर्षण है जो सब का मन मोह लेता है। बसन्त के साथ प्रकृति श्रृंगार करके अवतरित होती- सबको मनमोहित करती है।”

🔶 “हमारी हर बात को यह अन्धा अपने तर्कों के सहारे काट कर रख देता है। कहता है कि प्रकाश की सत्ता कल्पित है। तुम लोगों ने मुझे अन्धा सिद्ध करने के लिए प्रकाश के सिद्धान्त गढ़ लिए हैं। वस्तुतः प्रकाश का अस्तित्व ही नहीं है। यदि है तो सिद्ध करके बताओ। मुझे स्पर्श कराके दिखाओ कि प्रकाश है। यदि स्पर्श के माध्यम से सम्भव नहीं है तो मैं चखकर देखना चाहता हूँ। यदि तुम कहते हो वह स्वाद रहित है तो मैं सुन सकता हूँ। प्रकाश की आवाज सम्प्रेषित करो। यदि उसे सुना भी नहीं जा सकता तो तुम मुझे प्रकाश की गन्ध का पान करा दो। मेरी घ्राणेंद्रियां सक्षम हैं- गन्ध को ग्रहण करने में। मेरी चारों इन्द्रियाँ समर्थ हैं। इनमें से किसी एक से प्रकाश का संपर्क करा दो। अनुभूति होने पर ही तो मैं मान सकता हूँ कि प्रकाश की सत्ता है।

🔷 उन पांचों ने कन्फ्यूशियस से कहा- “आप ही बतायें, इस अंधे को कैसे समझायें? प्रकाश को चखाया तो जा नहीं सकता। न ही स्पर्श कराया जा सकता। उसमें से गन्ध तो निकलती नहीं कि इसे सुँघाया जा सके न ही ध्वनि निकलती है जिसे सुना जा सके। आप समर्थ हैं, सम्भव है आपके समझाने से उसे सत्य का ज्ञान हो।

🔶 कन्फ्यूशियस बोले- प्रकाश को यह नासमझ जिन इन्द्रियों के माध्यम से समझना अनुभव करना चाहता है, उनसे कभी सम्भव नहीं है कि वह प्रकाश का अस्तित्व स्वीकार ले। उसको बोध कराने में तो मैं भी असमर्थ हूँ। तुम्हें मेरे पास नहीं किसी चिकित्सक के पास जाना चाहिए जब तक नेत्र नहीं मिल जाते, कोई भी उसे समझाने में सफल नहीं हो सकता। इसलिए कि आँखों के अतिरिक्त दृश्य प्रकाश का कोई प्रमाण नहीं है।

🔷 महान दार्शनिक का निर्देश पाकर पाँचों उस जन्मजात अंधे को एक कुशल वैद्य के पास लेकर पहुँचे। विशेषज्ञ वैद्य बोला- ‘‘इस रोगी को तो और पहले लाना चाहिए था। इसका रोग इतना गम्भीर नहीं है। बेकार में यह अपनी आयु की इतनी लम्बी अवधि अन्धेपन का भार लादे व्यतीत करता रहा।”

🔶 वैद्य ने शल्य क्रिया द्वारा आँखों की ऊपरी झिल्ली हटादी जिससे प्रकाश को आने का मार्ग मिल गया। अल्पावधि के उपचार से ही वह अन्धा ठीक हो गया। उसके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा। उसके सारे तर्क अपने आप तिरोहित हो गये। अपनी भूल तिरोहित हो गयी। अपनी भूल  उसे समझ में आ गयी कन्फ्यूशियस ने शिष्य मण्डली से कहा- “तुम्हें उस अंधे की मूर्खता तथा तर्क शीलता पर हँसी आ सकती है पर उन तथाकथित बुद्धिमानों को किस श्रेणी में रखा जाय जो ईश्वर जैसी अगोचर, निराकार, इन्द्रियातीत सत्ता को प्रत्यक्ष इन्द्रियों के सहारे समझने का प्रयास करते हैं। उसमें असफल होने पर ऐसे असंख्यों अन्धे उद्घोष करते दिखाई देते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है वह तो आस्तिकों की मात्र कल्पना है।”

🔷 सचमुच ही अन्तःकरण पर छाये कषाय-कल्मषों को धोकर परिमार्जित किया जा सके, उसे निर्मल बनाया जा सके तो उसमें ईश्वरीय प्रकाश को झिलमिलाते देखा- अनुभव किया जा सकता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 10 March 2018


👉 Non-vegetarian food can be eaten only after leaving humanity

🔷 Compassion cannot be separated between human beings and animals. Cruel actions towards animals will directly affect behavior towards human beings. One who understands having affection & love for a human being, will never be cruel & merciless to animals. The famous travelers, Fahiyan and Marco Polo, have written that, “Aside from a wretch, nobody eats non-vegetarian food in India,” As per our religious books, non vegetarian food is always reprehensible. Non vegetarianism is frowned upon by various cultures throughout the world.

🔶 Buddist and Jain philosophies are based on non-violence and Vaishnavs also treat non-vegetarianism as a sin. The same concept is mentioned in Hindu holy books such as the Vedas and Purans.

🔷 The Bible says “Oh, what are you seeing, do open your mouth in favor of animals which are being cut.” Christ also praises vegetarianism in saying, “Do not hurt anyone neither kill animals nor eat meat.”

🔶 Similarly, the Quran says, “God never forgives those who cut green trees, sell human beings, cut animals, and have relationships with another’s wife. One who has mercy on others will get mercy from the God.” We must analyze the disadvantages of non-vegetarianism and act according to our basic nature and tendencies to keep ourselves physically and mentally healthy. Practicing non vegetarianism can be seen as mercilessness and cruelty towards animals. It will be beneficial if we, ourselves, get out from such cruel habits otherwise we will demonstrate the same cruelty towards human beings, and then the world will become hell.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 YUG NIRMAN YOJANA – DARSHAN, SWAROOP AND KARYAKRAM – Vangmay 66 Page 6.86

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...