शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 13)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 मित्रो! आपको समय से पहले बदल जाना चाहिए, नहीं तो आपको पश्चाताप ज्यादा करना पड़ेगा। जब कोई डाकू चीजें छीन ले जाता है, तो आदमी को ज्यादा अफसोस होता है, लेकिन अगर अपने हाथों से किसी भिखारी को दे देता है, स्कूल की इमारत बनाने के लिए दे देता है, तो उसको संतोष होता है। पैसा तो चला गया न, चाहे वह डाकू ले गया हो तो भी और चाहे स्कूल बनाने के लिए दे दिया तो भी। लेकिन अपने हाथ से देने पर संतोष रहता है। अतः आपको लोगों से यह कहने के लिए जाना है क अब युग बदल रहा है, समय बदला रहा है, युग की धाराएँ बदल रही हैं। धन के बारे में मूल्यांकन बदल रहा है। धन लोगों के पास रहने वाला नहीं है।

🔷 धन बहुत तेजी से चला जाने वाला है। आप देख नहीं रहे हैं क्या? गवर्नमेंट क्या-क्या कर रही है? मृत्यु टैक्स लगा रही है। संपत्ति टैक्स लगा रही है और दूसरे टैक्स लगा रही है। सब अगले दिनों जो गवर्नमेंट आने वाली है, अगले दिनों जो समय आने वाला है, उसमें रशिया वाला कानून लागू हो जाएगा, चाइना वाला कानून लागू हो जाएगा। हमको और आपको बस हाथ-पाँव से मेहनत करनी पड़ेगी, परिश्रम करना पड़ेगा और उस मेहनत के बदले में जो खुराक हमको मिलनी चाहिए, जो रोटी मिलनी चाहिए, वह मिल जाएगी। खुराक की सारी-की-सारी चीजें मिल जाएँगी।

🔶 साथियो! लोगों से कहना कि आपको भगवान् ने जो विभूतियाँ दी हैं, क्षमताएँ दी हैं, उसका सवाब आप उठा सकते हैं, लाभ उठा सकते हैं, जीवात्मा को शांति दे सकते हैं। जीवात्मा की शांति के लिए, पुण्य के लिए अपने आपको तैयार कर लेना चाहिए, ताकि आपका अंतःकरण शांति में रहे और समाज को भी आपके बदले का अनुदान मिले और हमारा सिर भी गर्व से ऊँचा उठ जाए। समय से पहले हम अंगद के तरीके से इसीलिए आपके पास आए हैं, ताकि यह बता सकें कि आपको वक्त रहते बदल जाना चाहिए और लाभ उठा लेना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 50)

👉 मंत्रराज है सद्गुरु का नाम

🔶 गुरुगीता के गायन से गुरुभक्ति जाग्रत् होती है। शिष्य में समर्पण की सजलता पनपती है। ज्यों-ज्यों इसकी प्रगाढ़ता बढ़ती है, त्यों-त्यों शिष्य की चेतना अपने गुरुदेव में विलीन हो जाती है। शिष्य गुरुमय हो जाता है। यह सब प्रभाव-प्रताप गुरुगीता का है। धन्य हैं वे, जो इसका निरन्तर पठन, चिन्तन व मनन करते हैं। गुरुभक्ति का यह शास्त्र सब भाँति से अद्भुत-अनुपम है। जो अनुभवी हैं, वे इसके मर्म को जानते हैं। जिन्हें अभी इसका अनुभव नहीं मिला है, वे प्रयास करने पर इसका स्वाद चख सकते हैं। शिव के वचन- आदिमाता पार्वती के द्वारा श्रवण से उपजा यह शास्त्र अनेक आध्यात्मिक रहस्यों से भरा है। इसके प्रत्येक मंत्र में सद्गुरु की कृपा का अमृत है।
  
🔷 अमृत सिंचन के उपर्युक्त मंत्र में गुरुगत प्राण शिष्यों ने पढ़ा कि श्रीगुरु की कृपादृष्टि से ही इस जगत् की सृष्टि हुई है। जगत् के सभी पदार्थ इसी से पुष्ट होते हैं। सत्शास्त्रों का सार मर्म इसी में समाया है। गुरुदेव की कृपादृष्टि की अनुभूति होने पर पता चलता है कि जगत् की सभी सम्पदाएँ व्यर्थ हैं। इस दृष्टि से ही शिष्य के अवगुण घुलकर परिमार्जित होते हैं। तत् सत्ता यही है। इसी से साधक में एकत्व से युक्त समत्व दृष्टि विकसित होती है। गुणों को विकसित करने वाली, मोक्ष मार्ग को प्रकाशित करने वाली, सकल भुवनों की स्थापना का परम कारण यही है। सद्गुरु की दृष्टि में ही पुरुष-प्रकृति एवं अन्य चौबीस तत्त्व समाये हैं। समष्टि की रूपमाला व जीवन के सभी नियम-काल सभी कुछ गुरुदेव की कृपादृष्टि में समाहित हैं।
  
🔶 गुरुकृपा और गुरुदेव के नाम की महिमा के एक नये आयाम को उद्घाटित करते हुए भगवान् साम्ब सदाशिव माता पार्वती से कहते हैं-
  
अग्निशुद्धसमंतात    ज्वालापरिचकाधिया। मंत्रराजमिमं   मन्येऽहर्निशं   पातु  मृत्युतः॥ ६१॥
तदेजति   तन्नैजति    तद्दूरे    तत्समीपके। तदन्तरस्य  सर्वस्य  तदु  सर्वस्य  बाह्यतः॥ ६२॥
अजोऽहमजरोऽहं च अनादिनिधनः स्वयम्।     अविकारश्चिदानन्द  अणीयान्महतो  महान्॥ ६३॥
  
🔷 हे देवि! सद्गुरु का नाम परम मंत्र है। यह मंत्रराज है। इसका जप करने से बुद्धि अग्नि में तपाए सुवर्ण की भाँति शुद्ध होती है। इसके स्मरण-चिंतन से निरन्तर मृत्यु से रक्षा होती है॥ ६१॥ चलते हुए या बैठे हुए, दूर होने पर, पास रहने पर, बाहर होने पर अथवा अन्दर रहने पर गुरु नाम का यह महामंत्र समूची सामर्थ्य से रक्षा करता है॥ ६२॥ जो इस मंत्रराज की साधना करता है, उसे अजन्मा, अमर, अजर, अनादि, मृत्युरहित, निर्विकार, चिदानन्द, अणु से भी सूक्ष्म और महत् से भी विराट् आत्मतत्त्व की निरन्तर अनुभूति होती रहती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 80

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

👉 दोस्ती

🔷 एक तितली मायूस सी बैठी हुई थी।पास ही से एक और तितली उड़ती हुई आई। उसे उदास देखकर रुक गई और बोली - क्या हुआ? उदास क्यों इतनी लग रही हो?

🔶 वह बोली - मैं एक फूल के पास रोज जाती थी। हमारी आपस में बहुत दोस्ती थी। बड़ा प्रेम था। पर अब उसके पास समय ही नहीं है मेरे लिए। वह तो बहुत व्यस्त हो गया है।

🔷 दूसरी तितली बोली - वह व्यस्त हो गया है तो तेरे पास तो समय है न तू तो जा सकती है। तू गई?

🔶 मैं क्यों जाऊँ? जब अब उसे मेरी ज़रूरत नहीं में क्यों जाऊँ?

🔷 तितली बोली - पगली ! तू कैसे कह सकती है कि उसे तेरी ज़रूरत नहीं। अनुमान क्यों लगाती है? क्या पता वह तेरा ही उस भीड़ में इंतज़ार करता हो।

🔶 तितली के आँसू निकल आए। उसने अपनी सखी को गले लगाया और गई अपने मित्र से मिलने। फूल बोला - कहाँ रही इतने दिन ! मेरा बिल्कुल मन नहीं लगा तुम्हारे बिन !! कहाँ थी ??

🔷 तितली मुस्कुराई और बोली कहीं नहीं रास्ता गुम हो गया था।

🔶 प्रेम लेने का मन करे तो प्रेम दे दो। किसी से बात करने का मन करे तो बात कर लो। दूसरे का इंतज़ार न करो। कुछ पता नहीं दूसरा भी इंतज़ार कर रहा हो।

🔷 प्रभु हमसे प्रेम करें या प्रभु हमसे पहले प्रेम करें,यह सोचने की बजाय उनसे पहले ही प्रेम करना प्रारम्भ कर दो। उनके प्रेम के इंतज़ार में नहीं, अपितु उनसे लाड प्यार करने में समय व्यतीत करो।

🔶 प्यार देने में अलग आनन्द है ..और प्यार लेने में अलग।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 23 Feb 2018


👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 2)

🔶 शरीर के साथ अनाचार करने वाले ही आमतौर से दुर्बल, रुग्ण रहते हैं। स्वयं कष्ट सहते और साथियों को त्रास देते हैं। ठीक यही बात मस्तिष्क पर भी लागू होती है। विचारणा की भी एक विधा और मर्यादा है। पटरी पर चलने वाली रेल की तरह ही उसकी भी दिशाधारा होनी चाहिए। नदियाँ जब किनारों का अतिक्रमण करके उफनने लगती हैं तो बाढ़ के रूप में अपनी विकरालता का परिचय देती हैं। रेल भी पटरी छोड़कर बेहिसाब किधर को ही चल पड़े तो उससे होने वाले दुष्परिणाम की कल्पना कोई भी कर सकता है।

🔷 विचारों की शक्ति असीम है। इस संसार पर अदृश्य शासन करने वाले-दैत्य दानवों की पौराणिक मान्यता को यदि प्रत्यक्ष देखना हो तो एक शब्द में उस समूचे परिवार को विचार प्रवाह कह सकते हैं। यही क्षेत्र है जिसका स्तर मनुष्य के उत्थान-पतन का आधारभूत कारण माना जाता है। आम आदमी का मस्तिष्क सम्बद्ध वातावरण के अनुरूप ढलता पाया गया है। किन्तु यह पत्थर की लकीर नहीं है, कोई चाहे तो उसका परिपूर्ण परिशोधन और उपयुक्त नव निर्धारण कर सकने में भी समर्थ हो सकता है। आदिवासी वन प्रदेशों में रहते हैं, पर उन पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है कि वे नगरों में प्रवेश नहीं कर सकते या वहाँ जाकर कोई काम धन्धा नहीं कर सकते।

🔶 गाड़िया लुहार जहाँ-तहाँ भटकते और लोहा पीटकर गुजारा करने के अभ्यस्त हैं। पीढ़ियों से इसी तरह रहते हैं। फिर भी इसे उनका स्वेच्छा निर्धारण ही कहा जायेगा। वे चाहें तो अन्य नागरिकों की तरह अपने निवास निर्वाह में बिना किसी कठिनाई के स्थायित्व भी ला सकते हैं। विचारणा के सम्बन्ध में भी यही बात है। यों वह बनती और पकती तो वातावरण के चाक और आवे में ही है। फिर भी मनुष्य मिट्टी नहीं है, वह घोंसले के पक्षी की तरह किसी भी दिशा में कभी भी उड़ सकता है और अपने दायरे-कार्यक्षेत्र में असाधारण परिवर्तन कर सकने के लिए स्वतंत्र है। हमें अपना वर्तमान सुधारने की जब उमंग उठे तो सर्व प्रथम इस मनःक्षेत्र का ही निरीक्षण-परीक्षण करना चाहिए और उसकी दिशाधारा में, स्तर एवं अभ्यास में तदनुरूप परिवर्तन करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Transformation of an Age (Part 2)

🔶 If it is allowed to go on this way and if the current trend of scientific progress, growth in selfishness within men is allowed to continue and if no control over humans is managed this world will end. If situation remains the same keep this in mind that the state of affairs of this world after 100 years is going to be worsened if any of you is alive by then, I however will not be alive. But there is one more situation I dream of. Dreams I see. My dream world is very beautiful world. It is such a world that is soaked in love, faith, mutual respects and cooperation. It is a world wherein each one is intending to serve other, so sweet, so nice is my dream world that keeps rounding in my mind. If somehow my dream comes true then all this wealth, science, amenities and facilities, I feel, will make this earth a heaven.
                                      
🔷 Thousands and millions of years ago where were such roads, electricity, lightening, telephone and post offices. There were nothing like that but in such a scenario our ancestors used to live heavenly life. Today when we have far better circumstances, the same world could be far more peaceful, easy and pleasuring and create immense happiness. Today we are positioned at a crossroad from here we have to proceed whether towards destruction or towards development. You have to play a role here at this point. You have to cast your vote. When two sides have same votes, vote of president proves to be game changer .your vote is game changer. It is up to you which side you choose to vote. You may either vote for destruction-side or other side of constructive measures.
                                           
🔶 I feel you must vote for peace and harmony. For this you must stop living like an animal rather start living like a man, thoughtful man and like a wise man. This is very crucial phase of time which is not going to repeat itself in future.   

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 12)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! आप वहाँ जाना और लोगों से यह कहना कि अगर कहीं आपके अंदर जिंदादिली हो, तो आपको समय की पुकार सुननी चाहिए और युग की पुकार सुननी चाहिए। समय की माँग को पूरा करना चाहिए और युग की माँग को पूरा करना चाहिए और महाकाल ने, भगवान् ने जहाँ आपको बुलाया है, वहाँ आपको चलना चाहिए। हनुमान् जी भगवान् की पुकार सुनकर चले गए थे, रीछ और बंदर चले गए थे, गिलहरी चली गई थी। आपके लिए क्या यह संभव नहीं है? क्या आप इस लोभ और मोह से, अपने वासना और तृष्णा के बंधनों को काटते हुए अंगद के तरीके से चलने के लिए तैयार हैं?

🔶 मित्रो! मैं आपको अंगद के तरीके से संदेशवाहक बनाकर के भेजता हूँ। मेरे गुरु ने मुझे संदेशवाहक बनाकर भेजा। हिंदुस्तान से बाहर कई बार अंगद की तरह से मैं केवल संदेशवाहक के रूप में गया हूँ। मैंने कोई व्याख्यान नहीं दिए और न संगठन किए। सारे-के-सारे देशों में, विदेशों में और न जाने कहाँ-से-कहाँ गया, लेकिन अपने गुरु का संदेश लेकर के गया। मैंने लोगों से कहा, देखो अपने को बदल दो। समय बदल रहा है। परिस्थितियाँ बदल रही हैं। धन किसी के पास रहने वाला नहीं है। अगले दिनों में, थोड़े दिनों में आप देखना कि धन किस तरीके से गायब हो जाता है। राजाओं के राज किस तरीके से चले गए, यह हमने और आपने देख लिया। आपने देखा कि थोड़े दिनों पहले जो लोग राजा कहलाते थे, सोने-चाँदी की तलवारें लेकर हाथी पर चला करते थे, आज वे किस तरीके से अपनी दोनों वक्त की रोटी का जुगाड़ कर रहे हैं।

🔷 साथियो! जहाँ कहीं भी जाएँगे, वहाँ आप लोगों से कहना कि समय बहुत जबरदस्त है। समय सबसे बड़ा है। धन बड़ा नहीं है। जहाँ कहीं भी विभूतियाँ आपको दिखाई पड़ती हों, वहाँ आप हमारे संदेशवाहक के रूप में जाना, जैसे कि हमारे गुरुजी ने सारी दुनिया के जबरदस्त आदमियों के पास और भावनाशील आदमियों के पास हमको संदेश दे करके भेजा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 49)

👉 सद्गुरु की कृपादृष्टि की महिमा

🔷 इनमें से एक सत्य घटना ऐसी है, जिसमें से गुरुगीता के इन महामंत्रों का मर्म उद्घाटित होता है। यह घटना विशिष्टाद्वैत सम्प्रदाय के संस्थापक भगवत्पाद श्री रामनुजाचार्य के जीवन की है। आचार्य की कृपा से अनेकों धन्य हुए। इन धन्यभागी लोगों में कुरेशभट्ट की चर्चा होती है। इन कुरेशभट्ट ने अपने सच्चे शिष्यत्व से, सार्थक समर्पण से, स्वयं की अहंता के विसर्जन से गुरु की कृपा दृष्टि को अनुभव किया। जीवन की सार्थकता पायी। सच्चा अध्यात्म लाभ अर्जित किया।
  
🔶 कुरेशभट्ट असाधारण मनीषी, परम तपस्वी एवं ख्याति प्राप्त विद्वान् थे। उनके तर्कों की धार, प्रवाहपूर्ण प्राञ्जल भाषा पण्डित मण्डली को कुण्ठित कर देती थी। पण्डित समाज में उनका भारी मान था। अनेकों योग एवं तंत्र की सिद्धियाँ उन्हें सहज सुलभ थीं; पर अध्यात्म के यथार्थ तत्त्व से वे वंचित थे। इस बात की कसक उनमें थी; लेकिन साथ ही उनमें कहीं इस बात का सूक्ष्म अहं भी था कि वे परम विद्वान् एवं सिद्धि सम्पन्न हैं। अध्यात्म की जिज्ञासा एवं विद्वत्ता के अहं ने उन्हें द्वन्द्व में डाल रखा था। समझ में नहीं आ रहा था कि वे किसे अपना मार्गदर्शक गुरु बनाएँ। अन्त में बड़े सोच-विचार के बाद उन्होंने आचार्य रामानुज की शरण में जाने का निश्चय किया। आचार्य उन दिनों भारत की धरती पर सर्वमान्य विद्वान् थे। उनके तप की प्रभा से समस्त दिशाएँ प्रकाशित थीं।
  
🔷 अपनी जिज्ञासा को लेकर वे रामानुज के पास पहुँच गए; परन्तु उनकी अहं वृत्ति के कारण आचार्य ने उन्हें अस्वीकृत कर दिया। कई बार उन्होंने इसके लिए प्रयास किया, पर हर बार असफल रहे। एक दिन जब वे आचार्य के पास बैठे थे, आचार्य की मुँहबोली बहिन अतुला उनके पास आयी और बोली- भैया ससुराल में मुझे रोटी बनाने में बड़ा कष्ट होता है। आपके पास यदि कोई उपयुक्त व्यक्ति हो, तो उसे मुझे दे दीजिए ; ताकि वह मेरी ससुराल में खाना पका सके। कुछ देर सोचने के बाद आचार्य की दृष्टि पास बैठे कुरेश भट्ट की ओर गयी और उन्होंने कहा- कुरेश, मैं तुम्हें अपना शिष्य तो नहीं बना सकता, परन्तु यदि तुम चाहो तो मेरी इस बहिन के यहाँ रसोइया बन सकते हो। परम धनवान्, महाविद्वान्, प्रचण्ड तपस्वी सिद्धि सम्पन्न कुरेश के लिए ऐसा प्रस्ताव सुनकर पास बैठे लोग चौंक पड़े।
  
🔶 लेकिन कुरेश अहंभाव से भले ग्रस्त हो, पर शास्त्रों के मर्म से परिचित थे। उन्हें सद्गुरु की कृपादृष्टि का मर्म पता था। बिना क्षण की देर लगाए उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार करते हुए कहा, प्रभु! आप शिष्य न सही, मुझे अपना सेवक होने का गौरव दे रहे हैं। यही मेरे लिए सब कुछ है। उस क्षण से लेकर वर्षों तक वह अतुला की ससुराल में रोटी बनाते रहे। सबको प्रेमपूर्ण भोजन कराते रहे। साथ ही उनका मन सद्गुरु के ध्यान में रमा रहा। प्रार्थना की इस निरन्तरता ने उनके अहं को धो डाला।  उनकी चेतना उनके सद्गुरु से एक हो गयी। आत्मज्ञान एवं ब्रह्मज्ञान की विभूतियाँ उनमें आ विराजी। एक दिन आचार्य स्वयं उन्हें लेने उनके पास आए और बोले- वत्स! अब तुम स्वतः ही मेरे शिष्य बन गए हो। सद्गुरु की अमृतवर्षिणी कृपा दृष्टि को पाकर उनका जीवन कृतकृत्य हो गया। सचमुच ही सद्गुरु कृपा ऐसी है, जो शिष्य के जीवन को शुद्धतम बना देती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 78

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

👉 सतर्कता

🔶 सलोनी ने आज कई दिनों के बाद फेसबुक खोला था, एग्जाम के कारण उसने अपने स्मार्ट फोन से दूरी बना ली थी, फेसबुक ओपन हुआ तो उसने देखा की 35-40 फ्रेंड_रिक्वेस्ट पेंडिंग पड़ी थीं, उसने एक सरसरी निगाह से सबको देखना शुरू कर दिया, तभी उसकी नज़र एक लड़के की रिक्वेस्ट पर ठहर गई, उसका नाम रवि था, बला का स्मार्ट और हैंडसम दिख रहा था अपनी डी पी मे।

🔷 सलोनी ने जिज्ञासावश उसके बारे मे पता करने के लिये उसकी प्रोफाइल खोल कर देखी तो वहाँ पर उसने एक से बढ़कर एक रोमान्टिक शेरो शायरी और कवितायेँ पोस्ट की हुई थीं, उन्हें पढ़कर वो इम्प्रेस हुए बिना नहीं रह पाई, और फिर उसने रवि की रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली, अभी उसे रवि की रिक्वेस्ट एक्सेप्ट किये हुए कुछ ही देर हुई होगी की उसके मैसेंजर का नोटिफिकेशन टिंग के साथ बज उठा, उसने चेक करा तो वो रवि का मैसेज था, उसने उसे खोल कर देखा तो उसमें रवि ने लिखा था " थैंक यू वैरी मच ",

🔶 वो समझ तो गई थी की वो क्यों थैंक्स कह रहा है फिर भी उससे मज़े लेने के लिये उसने रिप्लाई करा " थैंक्स किसलिये ?"

🔷 उधर से तुरंत जवाब आया " मेरी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने के लिये ",

🔶 सलोनी ने कोई जवाब नहीं दिया बस एक स्माइली वाला स्टीकर पोस्ट कर दिया और फिर मैसेंजर बंद कर दिया, वो नहीं चाहती थी की एक ही दिन मे किसी अनजान से ज्यादा खुल जाये और फिर वो घर के कामों मे व्यस्त हो गई।

🔷 अगले दिन उसने अपना फेसबुक खोला तो उसे रवि के मैसेज नज़र आये, रवि ने उसे कई रोमान्टिक कवितायेँ भेज रखीं थीं, उन्हें पढ़ कर उसे बड़ा अच्छा लगा, उसने जवाब मे फिर से स्माइली वाला स्टीकर सेंड कर दिया।

🔶 थोड़ी देर मे ही रवि का रिप्लाई आ गया, वो उससे उसके उसकी होबिज़ के बारे मे पूँछ रहा था,

🔷 उसने रवि को अपना संछिप्त परिचय दे दिया, उसका परिचय जानने के बाद रवि ने भी उसे अपने बारे मे बताया कि वो एम बी ए कर रहा है और जल्दी ही उसकी जॉब लग जायेगी।

🔶 और फिर इस तरह से दोनों के बीच चैटिंग का सिलसिला चल निकला, सलोनी की राज से दोस्ती हुए अब तक डेढ़ महीना हो चुका था।

🔷 सलोनी को अब उसके मेसेज का इंतज़ार रहने लगा था, जिस दिन उसकी रवि से बात नहीं हो पाती थी तो उसे लगता जैसे कुछ अधूरापन सा है, रवि उसकी ज़िन्दगी की आदत बनता जा रहा था,आज रात फिर सलोनी रवि से चैटिंग कर रही थी, इधर-उधर की बात होने के बाद रवि ने सलोनी से कहा ...

🔶 " यार हम कब तक यूंहीं सिर्फ फेसबुक पर बाते करते रहेंगे, यार मै तुमसे_मिलना_चाहता हूँ, प्लीज कल मिलने काप्रोग्राम बनाओ ना ",
सलोनी खुद भी उससे मिलना चाहती थी और एक तरह से उसने उसके दिल की ही बात कह दी थी लेकिन पता नहीं क्यों वो उससे मिलने से डर रही थी,

🔷 शायद अंजान होने का डर था वो, सलोनी ने यही बात रवि से कह दी," अरे यार इसीलिये तो कह रहा हूँ की हमें मिलना चाहिये, जब हम मिलेंगे तभी तो एक दूसरे को जानेंगे।

🔶 रवि ने उसे समझाते हुए मिलने की जिद्द की," अच्छा ठीक है बोलो कहाँ मिलना है, लेकिन मै ज्यादा देर नहीं रुकुंगी वहाँ " सलोनी ने बड़ी मुश्किल से उसे हाँ की," ठीक है तुम जितनी देर रुकना चाहो रुक जाना " रवि ने अपनी खुशी छिपाते हुए उसे कहा, और फिर वो सलोनी को उस जगह के बारे मे बताने लगा जहाँ उसे आना था।

🔷 अगले दिन शाम को 6 बजे, शहर के कोने मे एक सुनसान जगह पर एक पार्क, जहाँ पर सिर्फ प्रेमी जोड़े ही जाना पसंद करते थे, शायद एकांत के कारण, रवि ने सलोनी को वहीँ पर बुलाया था, थोड़ी देर बाद ही सलोनी वहाँ पहुँच गई।

🔶 रवि उसे पार्क के बाहर गेट के पास अपनी कार से पीठ लगा के खड़ा हुआ नज़र आ गया।

🔷 पहली बार उसे सामने देख कर वो उसे बस देखती ही रह गई, वो अपनी फोटोज़ से ज्यादा स्मार्ट और हैंडसम था।

🔶 सलोनी को अपनी तरफ देखता हुआ देखकर उसने उसे अपने पास आने का इशारा किया उसके इशारे को समझकर वो उसके पास आ गई और मुस्कुरा कर बोली " हाँ अब बोलो मुझे यहाँ किसलिये बुलाया है।

🔷 " अरे_यार क्या सारी बात यहीं सड़क पर खड़ी-2 करोगी, आओ कार मे बैठ_कर_बात करते हैं "
और फिर रवि ने उसे कार मे बैठने का इशारा करके कार का पिछला गेट खोल दिया, उसकी बात सुनकर सलोनी मुस्कुराते हुए कार मे बैठने के लिये बढ़ी।

🔶 जैसे ही उसने कार मे बैठने के लिये अपना पैर अंदर रखा तो उसे वहाँ पर पहले से ही एक_आदमी_बैठा हुआ नज़र आया, शक्ल से वो आदमी कहीँ से भी शरीफ नज़र नहीं आ रहा था, सलोनी के बढ़ते कदम ठिठक गये, वो पलट कर रवि से पूँछने ही जा रही थी की ये कौन है कि तभी उस आदमी ने उसका हाँथ पकड़ कर अंदर_खींच लिया और बाहर से रवि ने उसे अंदर धक्का दे दिया।

🔷 ये सब कुछ इतनी तेजी से हुआ की वो संभल भी नहीं पाई, और फिर अंदर बैठे आदमी ने उसका मुँह कसकर दबा लिया ताकि वो चीख ना पाये और उसके हाँथों को रवि ने पकड़ लिया।

🔶 अब वो ना तो चीख सकती थी और ना ही अपने बचाव में कुछ कर सकती थी।।

🔷 दोस्तों फेसबुक अपने विचारो को व्यक्त करना का अच्छा साधन हैं।

🔶 यहा किसी से भी जरूरत से ज्यादा Attached ना हो आपकी सुरक्षा आपके ही हाथ हैं।।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 Feb 2018

👉 आज का सद्चिंतन 22 Feb 2018


👉 व्यक्तित्व को सुसंस्कृत बनायें

🔶 मनुष्य एक अबोध शिशु के रूप में इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। तब न उसमें भला-बुरा सोचने की क्षमता होती है और न किसी तथ्य को समझाने, परिस्थितियों से लाभ उठाने या अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने की शक्ति। मनुष्य की जीवन यात्रा किसी पाठशाला में भर्ती कराए गए छोटे से बालक की तरह आरम्भ होती है। उस समय उसे जो कुछ सिखा व समझा दिया जाय तदनुरूप वह आगे बढ़ता रहता है। उस समय व्यक्तित्व की आधार शिला रखने का उत्तरदायित्त्व अभिभावकों का है। परन्तु जब कुछ सोचने समझने लायक स्थिति हो जाती है और व्यक्ति अपना भला-बुरा देखने लगता है तब अपना व्यक्तित्व इस प्रकार गढऩा आरम्भ कर देना चाहिए जिससे कि जीवन समर में सफलता प्राप्त की जा सके। व्यक्ति का निजी जीवन सुसंस्कृृत बनाना जीवन साधना का एक अंग है तथा समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को सुघड़ता पूर्वक पूरा करना, समाज से अपने व्यवहार सम्बन्धों का स्तर स्थापित करना दूसरा अंग है। इन्हीं का नाम संस्कृति और सभ्यता है।
  
🔷 व्यक्ति और समाज कोई भिन्न सत्ताएँ नहीं हैं। एक इकाई है, तो दूसरा समुच्चय। व्यक्ति इकाई है और समाज व्यक्तियों का समूह।  इसलिए समाज की स्थिति व्यक्तियों के स्तर पर निर्भर करती है। फिर भी व्यक्ति को स्वयं के प्रति और समाज के प्रति दूरदर्शिता के दृष्टिकोण से सोचना तथा जीवन साधना का स्वरूप निर्धारित करना पड़ेगा। व्यक्ति स्वयं के प्रति कितना सजग, सद्गुणी, संस्कारवान तथा चरित्रनिष्ठ है यह जीवन साधना की पहली सीढ़ी या एक पक्ष है, जिसे संस्कृति कहा जा सकता है। जीवन साधना का दूसरा पक्ष समाज के प्रति व्यक्ति की रीति-नीति से सम्बद्ध है, जिसमें सद्व्यवहार, शिष्टाचार, सामाजिकता, सहकार आदि प्रवृत्तियाँ आती हैं।
  
🔶 व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने के लिए अपने गुण, कर्म और स्वभाव के परिष्कार की प्रक्रिया पद्धति अपनानी चाहिए। मनुष्य के प्रारंभ के कुछ वर्ष ही वह अपने अभिभावकों पर निर्भर रहता है। विचार क्षमता और विवेक चेतना जागृत होते ही उसे अपने व्यक्तित्व निर्माण में लगना चाहिए, क्योंकि सुसंस्कृत व्यक्तित्व से ही परिस्थितियों का लाभ उठाया तथा जीवन को ऊँचा बनाया जा सकता है। असंस्कृत और फूहड़ व्यक्तित्व अनुकूल परिस्थितियों का लाभ नहीं उठा पाते जबकि सुसंस्कृत व्यक्तित्व से प्रतिकूलाताओं को भी सहायक बनाया जा सकता है और राह के पत्थर को भी सीढ़ी बनाकर ऊँचा उठाया जा सकता है।
  
🔷 व्यक्तित्व का गठन गुण, कर्म और स्वभाव से मिलकर बनता है। लम्बे समय तक अभ्यास में आते रहने पर गुण ही स्वभाव बन जाते हैं और स्वभाव में आई विशेषताएँ ही गुण कहलाती हैं। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति ईमानदारी के गुण का अभ्यास शुरू करता है। विगत जीवन में अनीति उपार्जन करने के बाद भी ईमानदारी का महत्त्व समझ मेें आ जाय और उसे जीवन नीति बनाने की आकांक्षा उत्पन्न हो, तो प्रारम्भ में उसका अभ्यास गुण की भाँति ही करना पड़ता है। प्रलोभन के अवसर प्रस्तुत होने पर भी दृढ़ रहा जाय तथा लम्बे समय तक ईमानदारी को जीवनक्रम में शामिल रखा जाय तो एक स्थिति ऐसी आती है जब यह गुण अपने स्वभाव में सम्मिलित हो जाता है।

🔶 स्वभाव में सम्मिलित होने के बाद उस अभ्यास को तोडऩा मुश्किल हो जाता है। गुणों के अभ्यास द्वारा स्वभाव का परिष्कार करने के साथ अपने व्यक्तित्व को सुगठित करने के लिए इच्छाओंं, भावनाओं और क्रियाओं को परिष्कृत करना आवश्यक है। मनुष्य को अपने व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू सजाने-सँवारने और परिष्कृत करने चाहिए। मनुष्य को अपने कर्म, विचार और भावनाओं की गतिविधियों, क्रियाओं, विचारणाओं एवं आकांक्षाओं का परिष्कार सतत करते रहना ही चाहिए, ताकि सुसंस्कृत व्यक्तित्व का निर्माण किया जा सके।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विश्वास करो

🔷 विश्वास करो कि तुम जगत में महान कार्य के लिये आये हो, तुम्हारे भीतर महान आत्मा का निवास है। विश्वास करो कि तुम शरीर नहीं आत्मा हो, तुम मृत्यु नहीं अमर हो, इसलिए तुम्हें कोई नष्ट नहीं कर सकता, कोई तुम्हें विचलित नहीं कर सकता।

🔶 विश्वास करो कि तुम अकेले नहीं हो। जंगल, नदी, पर्वत और एकान्त में भी तुम अकेले नहीं हो, तुम्हारे साथ सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक परमात्मा है। जब तुम सोते हो और गाढ़ निद्रा में होते को तब भी परम प्रभु तुम्हारे अंग संग होता है। तुम्हारा वह अनन्त पिता तुम्हें जीवन दे रहा है, वह तुम्हें महान और चिरायु बनाना चाहता है इसलिए किसी भी दशा में अपने आपको अकेला और असहाय न मानो, भला जब अमरत्व सहायों का भी सहाय राजाओं का भी राजा परम प्रभु तुम्हारे साथ हैं तब तुम अपने आपको निराश्रित और असहाय क्यों समझते हो।

🔷 क्या हुआ यदि तुम्हारा विनाश करने के लिए सब साँसारिक शक्तियाँ एकत्र हैं। यदि परमपिता तुम्हारी रक्षा कर रहा है तो विश्वास करो कोई तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं कर सकता। विश्वास करो, तुम्हारा पिता तुम्हें प्यार करता है। वह तुम्हें अपने पास बुला रहा है। परन्तु तुम अपने पिता के पास न जाकर बाहर की ओर बढ़े जा रहे हो। जरा रुको, अनन्त प्रेम की प्राप्ति तुम्हें परम पिता के पास होगी।

🔶 विश्वास करो। ईश्वर तुम से बहुत उपयोगी कार्य लेना चाहता है। तुम ईश्वर का निमित्त बन कर प्रभु को आत्म समर्पण कर दो, समर्पण करने से तुम्हें बड़ी शक्ति मिलेगी।

🔷 आत्म-समर्पण का अर्थ यह नहीं कि तुम आत्मविश्वास खो बैठो। जब तुमने परम आत्मा को आत्मसमर्पण किया है। तब तुम में पूर्ण आत्म-विश्वास जागृत होना चाहिए। उस दशा में तुम महान बन गये हो, तुम्हें भय नहीं रहा ऐसा सोचो तुम महान से मिलकर महान बन गये यह विश्वास करो। विश्वास करो, तुम बलवान हो। निर्बलता पाप है। तुम अपने मन में से निर्बलता को सदा के लिये भगा दो। आत्मा और परमात्मा दोनों बल हैं। तुम्हारी निर्बल मनोवृत्ति मानसिक है। मन भी प्राकृतिक है तुम तो प्रकृति से परे हो। इसलिए मन में कभी निर्बलता को न आने दो।

🔶 विश्वास करो, तुम पवित्र और शुद्ध हो। अशुद्धता और अपवित्रता को तुम जब चाहो झाड़ सकते हो, इस लिए यदि तुम से कभी भूल भी हो गई है तो उससे अधिक चिन्तित न बनो। आगे से उस बुराई को कभी न करने के दृढ़ संकल्प के साथ बढ़ो। बढ़ते ही चलो तुम्हें कोई नहीं रोक सकता। आज तक बढ़ने वाले को कोई नहीं रोक पाया। यदि तुम यह सोचो कि कोई तुम्हारा विरोध न करे तभी तुम कर सकोगे तो यह भी कभी न होगा। बहुधा तुम जीवन संघर्ष को ही विरोध मान लेते हो। विरोध के बिना तुम बढ़ने का विचार न करो। तुम विश्वास करो कि तुम सब बाधाओं पर विजयी हो सकोगे, उठो और आगे बढ़ो।

.... कर्मयोग से
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1949 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/December/v1.9

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 1)

🔷 मोटर की ठीक प्रकार साज-संभाल न रखी जाय तो मजबूत और कीमती होने पर भी कुछ ही दिन में उसका कचूमर निकल जाता है। अच्छे-खासे शरीरों की भी दुर्गति इसी कारण होती देखी गयी है। यही बात हर उपकरण, प्राणी, पदार्थ आदि पर लागू होती देखी गयी है। वे सभी अपने सदुपयोग और रख रखाव पर पूरा ध्यान रखे जाने की माँग करते हैं। उपेक्षा या अतिक्रमण के शिकार होने पर वे अपनी क्षमता गँवा बैठते हैं और अन्ततः कष्ट दायक बनते हैं।

🔶 मस्तिष्क मानवी सत्ता का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भाग है। समूचे शरीर पर उसी का शासन है। पेट, हृदय, गुर्दे आदि तो श्रमजीवी मात्र हैं। उनका सूत्र संचालन एवं नियमन तो मस्तिष्क द्वारा ही होता है। यह निर्वाह की बात हुई। उत्थान-पतन में भी उसी के निर्धारणों को श्रेय दिया जाता है। राज्याधिकारी को मुकुट पहनाया जाता है। प्रतिष्ठा सिर की होती है। नियति ने जीवधारी को मस्तिष्क रूपी मुकुट प्रदान किया है। यह उसकी मर्जी है कि यथास्थान रखे अथवा पैरों तले कुचले। पैरों तले कुचलने से तात्पर्य है-उसकी क्षमता को अविकसित स्थिति में पड़े रहने देना अथवा दुष्प्रयोजनों में प्रयुक्त करना। ‘भाग्य विधान ललाट पर लिखा होता है’ की उक्ति से यही तात्पर्य निकलता है कि विचार क्षेत्र के ऊपर ही यह अवलम्बित है कि व्यक्ति पिछड़ा, अभागा, उपेक्षित, तिरस्कृत होकर जिये, भर्त्सना और प्रताड़ना का पात्र बने अथवा अनुकरणीय, अभिवन्दनीय, श्रेय, समुन्नत एवं गौरवान्वित सुसम्पन्न होकर जिये।

🔷 इस महत्त्वपूर्ण अवयव को प्रदान करते समय सृष्टा ने उसकी भी जिम्मेदारी मनुष्य को सौंप दी है और यह अधिकार दिया है कि जो जब चाहे जिस तरह उपयोग करे। उसके पीछे एक अनुबन्ध भी है कि उसका भला-बुरा प्रयोग करने पर तदनुरूप प्रतिफल वहन करने के लिए भी बाधित होना पड़ेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Transformation of an Age (Part 1)

🔷 Few such things that must be note in your mind to never forget. Note this in your mind and never forget. I have to tell you one thing that you are born with some exclusive objective in a very exclusive phase of time. It is a transitional phase. You however cannot see but I can and I must say. The time you are born is not an ordinary one rather extraordinary one. At this time the age is changing very fast. Don’t you see how the characteristics of problems of the world are changing?

🔶 Don’t you see the progress made by science? Neither gunpowder nor any bullets rather only x-ray is shoot out to jam the whole area leaving people in that area dead. Such scientific weapons are being built that can destroy the whole world in seconds if so desired. The science is heading towards destruction so speedily that any man of disturbed mind can destroy the beauty of this world for which the man has been working hard for millions of years. Such is the time. The man has become so wicked and shrewd today as never before in history of universe.
                                         
🔷 On the stage of the world, history tells, the man has never been so unreadable. The man now is growing on scales of intelligence, education, luxury, houses and money but on the scales of humanity it has become so weak, so wicked, so shrewd, so dishonest, so cheat and so cunning that I fear if high-jacking of public minds is further allowed then each one will be swallowing other live and no one will believe even own shadow for any help. Such a critical situation today is O SON! I just can’t say anything. As grave is the situation of this world, the danger is before the world. One section of this Age is on the verge of destruction.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 11)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 मित्रो! ये क्या होता है? ये मैं किसकी कहानियाँ सुना रहा हूँ? मुरदे की। जिंदा आदमियों की भी कह रहा हूँ। आपके जिम्मे मैं एक काम सुपुर्द कर रहा हूँ कि जहाँ भी आपको जिंदा आदमी मालूम पड़ें, जिंदादिल आदमी मालूम पड़े, आप उनके पास जाना। आप उनको मेरा संदेश लेकर के जाना और खुशामद करने के लिए जाना और यह कहना कि भगवान् ने जो विशेषताएँ आपके अंदर दी हैं, आपके अंदर जो प्रतिभा है, जो क्षमता है और जो आपके अंदर विशेषता है, उसके लिए भगवान् ने निमंत्रण दिया है, समय ने निमंत्रण दिया है। युग ने निमंत्रण दिया है, मनुष्य जाति के गिरते हुए भविष्य ने और यह कहा है कि पेट भरने के लिए आपको जिंदा रहना काफी नहीं है।

🔷 पेट तो मक्खी-मच्छर भी भर लेते हैं, कीड़े-मकोड़े और कुत्ते भी भर लेते हैं। किसी ने जलेबी खा ली तो क्या और मक्का की रोटी खा ली तो क्या? खाने के लिए आदमी को पैदा नहीं किया गया है। औलाद पैदा करने के लिए आदमी को पैदा नहीं किया गया है। खाने के लिए और औलाद पैदा करने के लिए सुअर को पैदा किया गया है, जो एक-एक साल में बारह-बारह बच्चे पैदा कर देता है। गंदी-संदी चीजें खाकर के भी हट्टा-कट्टा होकर मोटा पड़ा रहता है। पेट भर गया, बस खर्राटे भरता रहता है। पेट भरने के लिए इंसान को पैदा नहीं किया गया है।

🔶 मित्रो! इंसान बड़े कामों के लिए पैदा किया है। इंसान की जिंदगी कई लाख योनियों में घूमने के बाद आती है। एकाएक कहाँ आ पाती है? इसलिए मित्रो! वहाँ हमारा संदेश लेकर के जाना, युग की पुकार लेकर के जाना। वक्त की पुकार लेकर के जाना और यह कहना कि आपको समय ने पुकारा है, युग ने पुकारा है, राष्ट्र ने पुकारा है, गुरुजी ने पुकारा है। अगर आप उनकी पुकार सुन सकते हों, अगर आपके कान हैं, अगर आपके अंदर दिल है; अगर आपके पास कान नहीं है, दिल नहीं है, तो हम क्या कह सकते हैं। फिर कौन आदमी सुनेगा? रामायण की कथा हम सुन लेते हैं और जैसे ही आते हैं, पल्ला झाड़ करके आ जाते हैं। भागवत की कथा हम सुनकर के आते हैं, व्याख्यान हम सुन करके आते हैं और जैसे ही आते हैं, पल्ला झाड़ करके आते हैं। चिकने घड़े के तरीके से हमारे आपके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 48)

👉 सद्गुरु की कृपादृष्टि की महिमा

🔶 धन्यभागी हैं वे शिष्य, जो निरन्तर इस बात के लिए प्रार्थनाशील हैं कि श्रीगुरु की कृपादृष्टि उनमें नित्य निवास करे; उनका हृदय अपने सद्गुरु की दिव्यदृष्टि के आलोक से आलोकित रहे। श्रीगुरु की कृपादृष्टि से ही समस्त जगत् की सृष्टि हुई है। इसी से जगत् के समस्त पदार्थों की पुष्टि होती है। समस्त सत्शास्त्रों का मर्म इसी में समाया है। श्रीगुरु की कृपादृष्टि मिलने पर ही जगत् की समस्त सम्पदाओं की व्यर्थताओं का पता चलता है। यही शिष्यों के समस्त अवगुणों को धुलकर परिमार्जित करती है। तत् सत्ता यही है।

🔷 इसी से साधक में एकत्व से युक्त समत्व दृष्टि विकसित होती है। संसार में गुणों को विकसित करने वाली, मोक्ष मार्ग को प्रकाशित करने वाली, सकल भुवनों के रंग-मञ्च की स्थापना का परम कारण यही है, यही आधार स्तम्भ है। करुणरस का वर्षण करने वाली इस सद्गुरु की कृपादृष्टि में पुरुष एवं प्रकृति अन्य चौबीस तत्त्व समाए हैं। समष्टि की रूपमाला, जीवन के सभी नियम काल आदि सभी कारण जिसमें समाए हैं, वह सच्चिदानन्द स्वरूप श्रीगुरु की कृपा दृष्टि ही है॥ ५९-६०॥
  
🔶 सद्गुरु कृपा दृष्टि का यह मर्म साधना का गहन रहस्य है, जो केवल योग्य शिष्य के सामने ही प्रकट होता है। सामान्य जन तो इसकी सही अवधारणा भी नहीं कर सकते, इसके रहस्य को पहचानना तो बहुत दूर की बात है। जिसमें शिष्यत्व प्रगाढ़ है, जो समर्पण की साधना में प्रवीण है। जिसने अपनी अहंता को गुरुचरणों में विसर्जित कर दिया है, वही साधक इस अनुभूति का अधिकारी बनता है। अन्य जनों को, तो ये बातें कोरी काव्य कल्पना लगती हैं। कई तो ऐसे हैं, जो इस बारे में केवल तर्क-वितर्क में ही जूझते रह जाते हैं; लेकिन जो सच्चे शिष्य हैं, उन्हें अपने आप ही इस सत्य की मिठास का स्वाद मिलता रहता है। इस बारे में अनेक मार्मिक प्रसंग विख्यात हैं। कई सत्य घटनाएँ संत-समाज में प्रचलित हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 77

👉 चीनी एक जहर है

👉 चीनी एक जहर है जो अनेक रोगों का कारण है, जानिये कैसे...

🔷 (1) चीनी बनाने की प्रक्रिया में गंधक का सबसे अधिक प्रयोग होता है। गंधक माने पटाखों का मसाला

🔶 (2) गंधक अत्यंत कठोर धातु है जो शरीर मे चला तो जाता है परंतु बाहर नही निकलता।

🔷 (3) चीनी कॉलेस्ट्रॉल बढ़ाती है जिसके कारण हृदयघात या हार्ट अटैक आता है।

🔶 (4) चीनी शरीर के वजन को अनियन्त्रित कर देती है जिसके कारण मोटापा होता है।

🔷 (5) चीनी रक्तचाप या ब्लड प्रैशर को बढ़ाती है।

🔶 (6) चीनी ब्रेन अटैक का एक प्रमुख कारण है।

🔷 (7) चीनी की मिठास को आधुनिक चिकित्सा मे सूक्रोज़ कहते है जो इंसान और जानवर दोनो पचा नही पाते।

🔶 (8) चीनी बनाने की प्रक्रिया मेँ तेइस हानिकारक रसायनो का प्रयोग किया जाता है।

🔷 (9) चीनी डाइबिटीज़ का एक प्रमुख कारण है।

🔶 (10) चीनी पेट की जलन का एक प्रमुख कारण है।

🔷 (11) चीनी शरीर मे ट्राइ ग्लिसराइड को बढ़ाती है।

🔶 (12) चीनी पेरेलिसिस अटैक या लकवा होने का एक प्रमुख कारण है।

🔷 (13) चीनी बनाने की सबसे पहली मिल अंग्रेजो ने 1868 मे लगाई थी। उसके पहले भारतवासी शुद्ध देशी गुड़ खाते थे और कभी बीमार नही पड़ते थे।

🔶🔶  कृपया जितना हो सके, चीनी से गुड़ पे आएँ। 🔶🔶

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

👉 संघर्ष

🔷 पिकासो (Picasso) स्पेन में जन्मे एक अति प्रसिद्ध चित्रकार थे। उनकी पेंटिंग्स दुनिया भर में करोड़ों और अरबों रुपयों में बिका करती थीं...!!

🔶 एक दिन रास्ते से गुजरते समय एक महिला की नजर पिकासो पर पड़ी और संयोग से उस महिला ने उन्हें पहचान लिया। वह दौड़ी हुई उनके पास आयी और बोली, 'सर, मैं आपकी बहुत बड़ी फैन हूँ। आपकी पेंटिंग्स मुझे बहुत ज्यादा पसंद हैं। क्या आप मेरे लिए भी एक पेंटिंग बनायेंगे...!!?'

🔷 पिकासो हँसते हुए बोले, 'मैं यहाँ खाली हाथ हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं फिर कभी आपके लिए एक पेंटिंग बना दूंगा..!!'

🔶 लेकिन उस महिला ने भी जिद पकड़ ली, 'मुझे अभी एक पेंटिंग बना दीजिये, बाद में पता नहीं मैं आपसे मिल पाऊँगी या नहीं।'

🔷 पिकासो ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला और अपने पेन से उसपर कुछ बनाने लगे। करीब 10 मिनट के अंदर पिकासो ने पेंटिंग बनायीं और कहा, 'यह लो, यह मिलियन डॉलर की पेंटिंग है।'

🔶 महिला को बड़ा अजीब लगा कि पिकासो ने बस 10 मिनट में जल्दी से एक काम चलाऊ पेंटिंग बना दी है और बोल रहे हैं कि मिलियन डॉलर की पेंटिग है। उसने वह पेंटिंग ली और बिना कुछ बोले अपने घर आ गयी..!!

🔷 उसे लगा पिकासो उसको पागल बना रहा है। वह बाजार गयी और उस पेंटिंग की कीमत पता की। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह पेंटिंग वास्तव में मिलियन डॉलर की थी...!!

🔶 वह भागी-भागी एक बार फिर पिकासो के पास आयी और बोली, 'सर आपने बिलकुल सही कहा था। यह तो मिलियन डॉलर की ही पेंटिंग है।'

🔷 पिकासो ने हँसते हुए कहा,'मैंने तो आपसे पहले ही कहा था।'

🔶 वह महिला बोली, 'सर, आप मुझे अपनी स्टूडेंट बना लीजिये और मुझे भी पेंटिंग बनानी सिखा दीजिये। जैसे आपने 10 मिनट में मिलियन डॉलर की पेंटिंग बना दी, वैसे ही मैं भी 10 मिनट में न सही, 10 घंटे में ही अच्छी पेंटिंग बना सकूँ, मुझे ऐसा बना दीजिये।'

🔷 पिकासो ने हँसते हुए कहा, 'यह पेंटिंग, जो मैंने 10 मिनट में बनायी है ... इसे सीखने में मुझे 30 साल का समय लगा है। मैंने अपने जीवन के 30 साल सीखने में दिए हैं ..!! तुम भी दो, सीख जाओगी..!!

🔶 वह महिला अवाक् और निःशब्द होकर पिकासो को देखती रह गयी...!!

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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