बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

👉 सतर्कता

🔶 सलोनी ने आज कई दिनों के बाद फेसबुक खोला था, एग्जाम के कारण उसने अपने स्मार्ट फोन से दूरी बना ली थी, फेसबुक ओपन हुआ तो उसने देखा की 35-40 फ्रेंड_रिक्वेस्ट पेंडिंग पड़ी थीं, उसने एक सरसरी निगाह से सबको देखना शुरू कर दिया, तभी उसकी नज़र एक लड़के की रिक्वेस्ट पर ठहर गई, उसका नाम रवि था, बला का स्मार्ट और हैंडसम दिख रहा था अपनी डी पी मे।

🔷 सलोनी ने जिज्ञासावश उसके बारे मे पता करने के लिये उसकी प्रोफाइल खोल कर देखी तो वहाँ पर उसने एक से बढ़कर एक रोमान्टिक शेरो शायरी और कवितायेँ पोस्ट की हुई थीं, उन्हें पढ़कर वो इम्प्रेस हुए बिना नहीं रह पाई, और फिर उसने रवि की रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली, अभी उसे रवि की रिक्वेस्ट एक्सेप्ट किये हुए कुछ ही देर हुई होगी की उसके मैसेंजर का नोटिफिकेशन टिंग के साथ बज उठा, उसने चेक करा तो वो रवि का मैसेज था, उसने उसे खोल कर देखा तो उसमें रवि ने लिखा था " थैंक यू वैरी मच ",

🔶 वो समझ तो गई थी की वो क्यों थैंक्स कह रहा है फिर भी उससे मज़े लेने के लिये उसने रिप्लाई करा " थैंक्स किसलिये ?"

🔷 उधर से तुरंत जवाब आया " मेरी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने के लिये ",

🔶 सलोनी ने कोई जवाब नहीं दिया बस एक स्माइली वाला स्टीकर पोस्ट कर दिया और फिर मैसेंजर बंद कर दिया, वो नहीं चाहती थी की एक ही दिन मे किसी अनजान से ज्यादा खुल जाये और फिर वो घर के कामों मे व्यस्त हो गई।

🔷 अगले दिन उसने अपना फेसबुक खोला तो उसे रवि के मैसेज नज़र आये, रवि ने उसे कई रोमान्टिक कवितायेँ भेज रखीं थीं, उन्हें पढ़ कर उसे बड़ा अच्छा लगा, उसने जवाब मे फिर से स्माइली वाला स्टीकर सेंड कर दिया।

🔶 थोड़ी देर मे ही रवि का रिप्लाई आ गया, वो उससे उसके उसकी होबिज़ के बारे मे पूँछ रहा था,

🔷 उसने रवि को अपना संछिप्त परिचय दे दिया, उसका परिचय जानने के बाद रवि ने भी उसे अपने बारे मे बताया कि वो एम बी ए कर रहा है और जल्दी ही उसकी जॉब लग जायेगी।

🔶 और फिर इस तरह से दोनों के बीच चैटिंग का सिलसिला चल निकला, सलोनी की राज से दोस्ती हुए अब तक डेढ़ महीना हो चुका था।

🔷 सलोनी को अब उसके मेसेज का इंतज़ार रहने लगा था, जिस दिन उसकी रवि से बात नहीं हो पाती थी तो उसे लगता जैसे कुछ अधूरापन सा है, रवि उसकी ज़िन्दगी की आदत बनता जा रहा था,आज रात फिर सलोनी रवि से चैटिंग कर रही थी, इधर-उधर की बात होने के बाद रवि ने सलोनी से कहा ...

🔶 " यार हम कब तक यूंहीं सिर्फ फेसबुक पर बाते करते रहेंगे, यार मै तुमसे_मिलना_चाहता हूँ, प्लीज कल मिलने काप्रोग्राम बनाओ ना ",
सलोनी खुद भी उससे मिलना चाहती थी और एक तरह से उसने उसके दिल की ही बात कह दी थी लेकिन पता नहीं क्यों वो उससे मिलने से डर रही थी,

🔷 शायद अंजान होने का डर था वो, सलोनी ने यही बात रवि से कह दी," अरे यार इसीलिये तो कह रहा हूँ की हमें मिलना चाहिये, जब हम मिलेंगे तभी तो एक दूसरे को जानेंगे।

🔶 रवि ने उसे समझाते हुए मिलने की जिद्द की," अच्छा ठीक है बोलो कहाँ मिलना है, लेकिन मै ज्यादा देर नहीं रुकुंगी वहाँ " सलोनी ने बड़ी मुश्किल से उसे हाँ की," ठीक है तुम जितनी देर रुकना चाहो रुक जाना " रवि ने अपनी खुशी छिपाते हुए उसे कहा, और फिर वो सलोनी को उस जगह के बारे मे बताने लगा जहाँ उसे आना था।

🔷 अगले दिन शाम को 6 बजे, शहर के कोने मे एक सुनसान जगह पर एक पार्क, जहाँ पर सिर्फ प्रेमी जोड़े ही जाना पसंद करते थे, शायद एकांत के कारण, रवि ने सलोनी को वहीँ पर बुलाया था, थोड़ी देर बाद ही सलोनी वहाँ पहुँच गई।

🔶 रवि उसे पार्क के बाहर गेट के पास अपनी कार से पीठ लगा के खड़ा हुआ नज़र आ गया।

🔷 पहली बार उसे सामने देख कर वो उसे बस देखती ही रह गई, वो अपनी फोटोज़ से ज्यादा स्मार्ट और हैंडसम था।

🔶 सलोनी को अपनी तरफ देखता हुआ देखकर उसने उसे अपने पास आने का इशारा किया उसके इशारे को समझकर वो उसके पास आ गई और मुस्कुरा कर बोली " हाँ अब बोलो मुझे यहाँ किसलिये बुलाया है।

🔷 " अरे_यार क्या सारी बात यहीं सड़क पर खड़ी-2 करोगी, आओ कार मे बैठ_कर_बात करते हैं "
और फिर रवि ने उसे कार मे बैठने का इशारा करके कार का पिछला गेट खोल दिया, उसकी बात सुनकर सलोनी मुस्कुराते हुए कार मे बैठने के लिये बढ़ी।

🔶 जैसे ही उसने कार मे बैठने के लिये अपना पैर अंदर रखा तो उसे वहाँ पर पहले से ही एक_आदमी_बैठा हुआ नज़र आया, शक्ल से वो आदमी कहीँ से भी शरीफ नज़र नहीं आ रहा था, सलोनी के बढ़ते कदम ठिठक गये, वो पलट कर रवि से पूँछने ही जा रही थी की ये कौन है कि तभी उस आदमी ने उसका हाँथ पकड़ कर अंदर_खींच लिया और बाहर से रवि ने उसे अंदर धक्का दे दिया।

🔷 ये सब कुछ इतनी तेजी से हुआ की वो संभल भी नहीं पाई, और फिर अंदर बैठे आदमी ने उसका मुँह कसकर दबा लिया ताकि वो चीख ना पाये और उसके हाँथों को रवि ने पकड़ लिया।

🔶 अब वो ना तो चीख सकती थी और ना ही अपने बचाव में कुछ कर सकती थी।।

🔷 दोस्तों फेसबुक अपने विचारो को व्यक्त करना का अच्छा साधन हैं।

🔶 यहा किसी से भी जरूरत से ज्यादा Attached ना हो आपकी सुरक्षा आपके ही हाथ हैं।।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 Feb 2018

👉 आज का सद्चिंतन 22 Feb 2018


👉 व्यक्तित्व को सुसंस्कृत बनायें

🔶 मनुष्य एक अबोध शिशु के रूप में इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। तब न उसमें भला-बुरा सोचने की क्षमता होती है और न किसी तथ्य को समझाने, परिस्थितियों से लाभ उठाने या अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने की शक्ति। मनुष्य की जीवन यात्रा किसी पाठशाला में भर्ती कराए गए छोटे से बालक की तरह आरम्भ होती है। उस समय उसे जो कुछ सिखा व समझा दिया जाय तदनुरूप वह आगे बढ़ता रहता है। उस समय व्यक्तित्व की आधार शिला रखने का उत्तरदायित्त्व अभिभावकों का है। परन्तु जब कुछ सोचने समझने लायक स्थिति हो जाती है और व्यक्ति अपना भला-बुरा देखने लगता है तब अपना व्यक्तित्व इस प्रकार गढऩा आरम्भ कर देना चाहिए जिससे कि जीवन समर में सफलता प्राप्त की जा सके। व्यक्ति का निजी जीवन सुसंस्कृृत बनाना जीवन साधना का एक अंग है तथा समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को सुघड़ता पूर्वक पूरा करना, समाज से अपने व्यवहार सम्बन्धों का स्तर स्थापित करना दूसरा अंग है। इन्हीं का नाम संस्कृति और सभ्यता है।
  
🔷 व्यक्ति और समाज कोई भिन्न सत्ताएँ नहीं हैं। एक इकाई है, तो दूसरा समुच्चय। व्यक्ति इकाई है और समाज व्यक्तियों का समूह।  इसलिए समाज की स्थिति व्यक्तियों के स्तर पर निर्भर करती है। फिर भी व्यक्ति को स्वयं के प्रति और समाज के प्रति दूरदर्शिता के दृष्टिकोण से सोचना तथा जीवन साधना का स्वरूप निर्धारित करना पड़ेगा। व्यक्ति स्वयं के प्रति कितना सजग, सद्गुणी, संस्कारवान तथा चरित्रनिष्ठ है यह जीवन साधना की पहली सीढ़ी या एक पक्ष है, जिसे संस्कृति कहा जा सकता है। जीवन साधना का दूसरा पक्ष समाज के प्रति व्यक्ति की रीति-नीति से सम्बद्ध है, जिसमें सद्व्यवहार, शिष्टाचार, सामाजिकता, सहकार आदि प्रवृत्तियाँ आती हैं।
  
🔶 व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने के लिए अपने गुण, कर्म और स्वभाव के परिष्कार की प्रक्रिया पद्धति अपनानी चाहिए। मनुष्य के प्रारंभ के कुछ वर्ष ही वह अपने अभिभावकों पर निर्भर रहता है। विचार क्षमता और विवेक चेतना जागृत होते ही उसे अपने व्यक्तित्व निर्माण में लगना चाहिए, क्योंकि सुसंस्कृत व्यक्तित्व से ही परिस्थितियों का लाभ उठाया तथा जीवन को ऊँचा बनाया जा सकता है। असंस्कृत और फूहड़ व्यक्तित्व अनुकूल परिस्थितियों का लाभ नहीं उठा पाते जबकि सुसंस्कृत व्यक्तित्व से प्रतिकूलाताओं को भी सहायक बनाया जा सकता है और राह के पत्थर को भी सीढ़ी बनाकर ऊँचा उठाया जा सकता है।
  
🔷 व्यक्तित्व का गठन गुण, कर्म और स्वभाव से मिलकर बनता है। लम्बे समय तक अभ्यास में आते रहने पर गुण ही स्वभाव बन जाते हैं और स्वभाव में आई विशेषताएँ ही गुण कहलाती हैं। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति ईमानदारी के गुण का अभ्यास शुरू करता है। विगत जीवन में अनीति उपार्जन करने के बाद भी ईमानदारी का महत्त्व समझ मेें आ जाय और उसे जीवन नीति बनाने की आकांक्षा उत्पन्न हो, तो प्रारम्भ में उसका अभ्यास गुण की भाँति ही करना पड़ता है। प्रलोभन के अवसर प्रस्तुत होने पर भी दृढ़ रहा जाय तथा लम्बे समय तक ईमानदारी को जीवनक्रम में शामिल रखा जाय तो एक स्थिति ऐसी आती है जब यह गुण अपने स्वभाव में सम्मिलित हो जाता है।

🔶 स्वभाव में सम्मिलित होने के बाद उस अभ्यास को तोडऩा मुश्किल हो जाता है। गुणों के अभ्यास द्वारा स्वभाव का परिष्कार करने के साथ अपने व्यक्तित्व को सुगठित करने के लिए इच्छाओंं, भावनाओं और क्रियाओं को परिष्कृत करना आवश्यक है। मनुष्य को अपने व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू सजाने-सँवारने और परिष्कृत करने चाहिए। मनुष्य को अपने कर्म, विचार और भावनाओं की गतिविधियों, क्रियाओं, विचारणाओं एवं आकांक्षाओं का परिष्कार सतत करते रहना ही चाहिए, ताकि सुसंस्कृत व्यक्तित्व का निर्माण किया जा सके।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विश्वास करो

🔷 विश्वास करो कि तुम जगत में महान कार्य के लिये आये हो, तुम्हारे भीतर महान आत्मा का निवास है। विश्वास करो कि तुम शरीर नहीं आत्मा हो, तुम मृत्यु नहीं अमर हो, इसलिए तुम्हें कोई नष्ट नहीं कर सकता, कोई तुम्हें विचलित नहीं कर सकता।

🔶 विश्वास करो कि तुम अकेले नहीं हो। जंगल, नदी, पर्वत और एकान्त में भी तुम अकेले नहीं हो, तुम्हारे साथ सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक परमात्मा है। जब तुम सोते हो और गाढ़ निद्रा में होते को तब भी परम प्रभु तुम्हारे अंग संग होता है। तुम्हारा वह अनन्त पिता तुम्हें जीवन दे रहा है, वह तुम्हें महान और चिरायु बनाना चाहता है इसलिए किसी भी दशा में अपने आपको अकेला और असहाय न मानो, भला जब अमरत्व सहायों का भी सहाय राजाओं का भी राजा परम प्रभु तुम्हारे साथ हैं तब तुम अपने आपको निराश्रित और असहाय क्यों समझते हो।

🔷 क्या हुआ यदि तुम्हारा विनाश करने के लिए सब साँसारिक शक्तियाँ एकत्र हैं। यदि परमपिता तुम्हारी रक्षा कर रहा है तो विश्वास करो कोई तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं कर सकता। विश्वास करो, तुम्हारा पिता तुम्हें प्यार करता है। वह तुम्हें अपने पास बुला रहा है। परन्तु तुम अपने पिता के पास न जाकर बाहर की ओर बढ़े जा रहे हो। जरा रुको, अनन्त प्रेम की प्राप्ति तुम्हें परम पिता के पास होगी।

🔶 विश्वास करो। ईश्वर तुम से बहुत उपयोगी कार्य लेना चाहता है। तुम ईश्वर का निमित्त बन कर प्रभु को आत्म समर्पण कर दो, समर्पण करने से तुम्हें बड़ी शक्ति मिलेगी।

🔷 आत्म-समर्पण का अर्थ यह नहीं कि तुम आत्मविश्वास खो बैठो। जब तुमने परम आत्मा को आत्मसमर्पण किया है। तब तुम में पूर्ण आत्म-विश्वास जागृत होना चाहिए। उस दशा में तुम महान बन गये हो, तुम्हें भय नहीं रहा ऐसा सोचो तुम महान से मिलकर महान बन गये यह विश्वास करो। विश्वास करो, तुम बलवान हो। निर्बलता पाप है। तुम अपने मन में से निर्बलता को सदा के लिये भगा दो। आत्मा और परमात्मा दोनों बल हैं। तुम्हारी निर्बल मनोवृत्ति मानसिक है। मन भी प्राकृतिक है तुम तो प्रकृति से परे हो। इसलिए मन में कभी निर्बलता को न आने दो।

🔶 विश्वास करो, तुम पवित्र और शुद्ध हो। अशुद्धता और अपवित्रता को तुम जब चाहो झाड़ सकते हो, इस लिए यदि तुम से कभी भूल भी हो गई है तो उससे अधिक चिन्तित न बनो। आगे से उस बुराई को कभी न करने के दृढ़ संकल्प के साथ बढ़ो। बढ़ते ही चलो तुम्हें कोई नहीं रोक सकता। आज तक बढ़ने वाले को कोई नहीं रोक पाया। यदि तुम यह सोचो कि कोई तुम्हारा विरोध न करे तभी तुम कर सकोगे तो यह भी कभी न होगा। बहुधा तुम जीवन संघर्ष को ही विरोध मान लेते हो। विरोध के बिना तुम बढ़ने का विचार न करो। तुम विश्वास करो कि तुम सब बाधाओं पर विजयी हो सकोगे, उठो और आगे बढ़ो।

.... कर्मयोग से
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1949 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/December/v1.9

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 1)

🔷 मोटर की ठीक प्रकार साज-संभाल न रखी जाय तो मजबूत और कीमती होने पर भी कुछ ही दिन में उसका कचूमर निकल जाता है। अच्छे-खासे शरीरों की भी दुर्गति इसी कारण होती देखी गयी है। यही बात हर उपकरण, प्राणी, पदार्थ आदि पर लागू होती देखी गयी है। वे सभी अपने सदुपयोग और रख रखाव पर पूरा ध्यान रखे जाने की माँग करते हैं। उपेक्षा या अतिक्रमण के शिकार होने पर वे अपनी क्षमता गँवा बैठते हैं और अन्ततः कष्ट दायक बनते हैं।

🔶 मस्तिष्क मानवी सत्ता का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भाग है। समूचे शरीर पर उसी का शासन है। पेट, हृदय, गुर्दे आदि तो श्रमजीवी मात्र हैं। उनका सूत्र संचालन एवं नियमन तो मस्तिष्क द्वारा ही होता है। यह निर्वाह की बात हुई। उत्थान-पतन में भी उसी के निर्धारणों को श्रेय दिया जाता है। राज्याधिकारी को मुकुट पहनाया जाता है। प्रतिष्ठा सिर की होती है। नियति ने जीवधारी को मस्तिष्क रूपी मुकुट प्रदान किया है। यह उसकी मर्जी है कि यथास्थान रखे अथवा पैरों तले कुचले। पैरों तले कुचलने से तात्पर्य है-उसकी क्षमता को अविकसित स्थिति में पड़े रहने देना अथवा दुष्प्रयोजनों में प्रयुक्त करना। ‘भाग्य विधान ललाट पर लिखा होता है’ की उक्ति से यही तात्पर्य निकलता है कि विचार क्षेत्र के ऊपर ही यह अवलम्बित है कि व्यक्ति पिछड़ा, अभागा, उपेक्षित, तिरस्कृत होकर जिये, भर्त्सना और प्रताड़ना का पात्र बने अथवा अनुकरणीय, अभिवन्दनीय, श्रेय, समुन्नत एवं गौरवान्वित सुसम्पन्न होकर जिये।

🔷 इस महत्त्वपूर्ण अवयव को प्रदान करते समय सृष्टा ने उसकी भी जिम्मेदारी मनुष्य को सौंप दी है और यह अधिकार दिया है कि जो जब चाहे जिस तरह उपयोग करे। उसके पीछे एक अनुबन्ध भी है कि उसका भला-बुरा प्रयोग करने पर तदनुरूप प्रतिफल वहन करने के लिए भी बाधित होना पड़ेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Transformation of an Age (Part 1)

🔷 Few such things that must be note in your mind to never forget. Note this in your mind and never forget. I have to tell you one thing that you are born with some exclusive objective in a very exclusive phase of time. It is a transitional phase. You however cannot see but I can and I must say. The time you are born is not an ordinary one rather extraordinary one. At this time the age is changing very fast. Don’t you see how the characteristics of problems of the world are changing?

🔶 Don’t you see the progress made by science? Neither gunpowder nor any bullets rather only x-ray is shoot out to jam the whole area leaving people in that area dead. Such scientific weapons are being built that can destroy the whole world in seconds if so desired. The science is heading towards destruction so speedily that any man of disturbed mind can destroy the beauty of this world for which the man has been working hard for millions of years. Such is the time. The man has become so wicked and shrewd today as never before in history of universe.
                                         
🔷 On the stage of the world, history tells, the man has never been so unreadable. The man now is growing on scales of intelligence, education, luxury, houses and money but on the scales of humanity it has become so weak, so wicked, so shrewd, so dishonest, so cheat and so cunning that I fear if high-jacking of public minds is further allowed then each one will be swallowing other live and no one will believe even own shadow for any help. Such a critical situation today is O SON! I just can’t say anything. As grave is the situation of this world, the danger is before the world. One section of this Age is on the verge of destruction.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 11)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 मित्रो! ये क्या होता है? ये मैं किसकी कहानियाँ सुना रहा हूँ? मुरदे की। जिंदा आदमियों की भी कह रहा हूँ। आपके जिम्मे मैं एक काम सुपुर्द कर रहा हूँ कि जहाँ भी आपको जिंदा आदमी मालूम पड़ें, जिंदादिल आदमी मालूम पड़े, आप उनके पास जाना। आप उनको मेरा संदेश लेकर के जाना और खुशामद करने के लिए जाना और यह कहना कि भगवान् ने जो विशेषताएँ आपके अंदर दी हैं, आपके अंदर जो प्रतिभा है, जो क्षमता है और जो आपके अंदर विशेषता है, उसके लिए भगवान् ने निमंत्रण दिया है, समय ने निमंत्रण दिया है। युग ने निमंत्रण दिया है, मनुष्य जाति के गिरते हुए भविष्य ने और यह कहा है कि पेट भरने के लिए आपको जिंदा रहना काफी नहीं है।

🔷 पेट तो मक्खी-मच्छर भी भर लेते हैं, कीड़े-मकोड़े और कुत्ते भी भर लेते हैं। किसी ने जलेबी खा ली तो क्या और मक्का की रोटी खा ली तो क्या? खाने के लिए आदमी को पैदा नहीं किया गया है। औलाद पैदा करने के लिए आदमी को पैदा नहीं किया गया है। खाने के लिए और औलाद पैदा करने के लिए सुअर को पैदा किया गया है, जो एक-एक साल में बारह-बारह बच्चे पैदा कर देता है। गंदी-संदी चीजें खाकर के भी हट्टा-कट्टा होकर मोटा पड़ा रहता है। पेट भर गया, बस खर्राटे भरता रहता है। पेट भरने के लिए इंसान को पैदा नहीं किया गया है।

🔶 मित्रो! इंसान बड़े कामों के लिए पैदा किया है। इंसान की जिंदगी कई लाख योनियों में घूमने के बाद आती है। एकाएक कहाँ आ पाती है? इसलिए मित्रो! वहाँ हमारा संदेश लेकर के जाना, युग की पुकार लेकर के जाना। वक्त की पुकार लेकर के जाना और यह कहना कि आपको समय ने पुकारा है, युग ने पुकारा है, राष्ट्र ने पुकारा है, गुरुजी ने पुकारा है। अगर आप उनकी पुकार सुन सकते हों, अगर आपके कान हैं, अगर आपके अंदर दिल है; अगर आपके पास कान नहीं है, दिल नहीं है, तो हम क्या कह सकते हैं। फिर कौन आदमी सुनेगा? रामायण की कथा हम सुन लेते हैं और जैसे ही आते हैं, पल्ला झाड़ करके आ जाते हैं। भागवत की कथा हम सुनकर के आते हैं, व्याख्यान हम सुन करके आते हैं और जैसे ही आते हैं, पल्ला झाड़ करके आते हैं। चिकने घड़े के तरीके से हमारे आपके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 48)

👉 सद्गुरु की कृपादृष्टि की महिमा

🔶 धन्यभागी हैं वे शिष्य, जो निरन्तर इस बात के लिए प्रार्थनाशील हैं कि श्रीगुरु की कृपादृष्टि उनमें नित्य निवास करे; उनका हृदय अपने सद्गुरु की दिव्यदृष्टि के आलोक से आलोकित रहे। श्रीगुरु की कृपादृष्टि से ही समस्त जगत् की सृष्टि हुई है। इसी से जगत् के समस्त पदार्थों की पुष्टि होती है। समस्त सत्शास्त्रों का मर्म इसी में समाया है। श्रीगुरु की कृपादृष्टि मिलने पर ही जगत् की समस्त सम्पदाओं की व्यर्थताओं का पता चलता है। यही शिष्यों के समस्त अवगुणों को धुलकर परिमार्जित करती है। तत् सत्ता यही है।

🔷 इसी से साधक में एकत्व से युक्त समत्व दृष्टि विकसित होती है। संसार में गुणों को विकसित करने वाली, मोक्ष मार्ग को प्रकाशित करने वाली, सकल भुवनों के रंग-मञ्च की स्थापना का परम कारण यही है, यही आधार स्तम्भ है। करुणरस का वर्षण करने वाली इस सद्गुरु की कृपादृष्टि में पुरुष एवं प्रकृति अन्य चौबीस तत्त्व समाए हैं। समष्टि की रूपमाला, जीवन के सभी नियम काल आदि सभी कारण जिसमें समाए हैं, वह सच्चिदानन्द स्वरूप श्रीगुरु की कृपा दृष्टि ही है॥ ५९-६०॥
  
🔶 सद्गुरु कृपा दृष्टि का यह मर्म साधना का गहन रहस्य है, जो केवल योग्य शिष्य के सामने ही प्रकट होता है। सामान्य जन तो इसकी सही अवधारणा भी नहीं कर सकते, इसके रहस्य को पहचानना तो बहुत दूर की बात है। जिसमें शिष्यत्व प्रगाढ़ है, जो समर्पण की साधना में प्रवीण है। जिसने अपनी अहंता को गुरुचरणों में विसर्जित कर दिया है, वही साधक इस अनुभूति का अधिकारी बनता है। अन्य जनों को, तो ये बातें कोरी काव्य कल्पना लगती हैं। कई तो ऐसे हैं, जो इस बारे में केवल तर्क-वितर्क में ही जूझते रह जाते हैं; लेकिन जो सच्चे शिष्य हैं, उन्हें अपने आप ही इस सत्य की मिठास का स्वाद मिलता रहता है। इस बारे में अनेक मार्मिक प्रसंग विख्यात हैं। कई सत्य घटनाएँ संत-समाज में प्रचलित हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 77

👉 चीनी एक जहर है

👉 चीनी एक जहर है जो अनेक रोगों का कारण है, जानिये कैसे...

🔷 (1) चीनी बनाने की प्रक्रिया में गंधक का सबसे अधिक प्रयोग होता है। गंधक माने पटाखों का मसाला

🔶 (2) गंधक अत्यंत कठोर धातु है जो शरीर मे चला तो जाता है परंतु बाहर नही निकलता।

🔷 (3) चीनी कॉलेस्ट्रॉल बढ़ाती है जिसके कारण हृदयघात या हार्ट अटैक आता है।

🔶 (4) चीनी शरीर के वजन को अनियन्त्रित कर देती है जिसके कारण मोटापा होता है।

🔷 (5) चीनी रक्तचाप या ब्लड प्रैशर को बढ़ाती है।

🔶 (6) चीनी ब्रेन अटैक का एक प्रमुख कारण है।

🔷 (7) चीनी की मिठास को आधुनिक चिकित्सा मे सूक्रोज़ कहते है जो इंसान और जानवर दोनो पचा नही पाते।

🔶 (8) चीनी बनाने की प्रक्रिया मेँ तेइस हानिकारक रसायनो का प्रयोग किया जाता है।

🔷 (9) चीनी डाइबिटीज़ का एक प्रमुख कारण है।

🔶 (10) चीनी पेट की जलन का एक प्रमुख कारण है।

🔷 (11) चीनी शरीर मे ट्राइ ग्लिसराइड को बढ़ाती है।

🔶 (12) चीनी पेरेलिसिस अटैक या लकवा होने का एक प्रमुख कारण है।

🔷 (13) चीनी बनाने की सबसे पहली मिल अंग्रेजो ने 1868 मे लगाई थी। उसके पहले भारतवासी शुद्ध देशी गुड़ खाते थे और कभी बीमार नही पड़ते थे।

🔶🔶  कृपया जितना हो सके, चीनी से गुड़ पे आएँ। 🔶🔶

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

👉 संघर्ष

🔷 पिकासो (Picasso) स्पेन में जन्मे एक अति प्रसिद्ध चित्रकार थे। उनकी पेंटिंग्स दुनिया भर में करोड़ों और अरबों रुपयों में बिका करती थीं...!!

🔶 एक दिन रास्ते से गुजरते समय एक महिला की नजर पिकासो पर पड़ी और संयोग से उस महिला ने उन्हें पहचान लिया। वह दौड़ी हुई उनके पास आयी और बोली, 'सर, मैं आपकी बहुत बड़ी फैन हूँ। आपकी पेंटिंग्स मुझे बहुत ज्यादा पसंद हैं। क्या आप मेरे लिए भी एक पेंटिंग बनायेंगे...!!?'

🔷 पिकासो हँसते हुए बोले, 'मैं यहाँ खाली हाथ हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं फिर कभी आपके लिए एक पेंटिंग बना दूंगा..!!'

🔶 लेकिन उस महिला ने भी जिद पकड़ ली, 'मुझे अभी एक पेंटिंग बना दीजिये, बाद में पता नहीं मैं आपसे मिल पाऊँगी या नहीं।'

🔷 पिकासो ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला और अपने पेन से उसपर कुछ बनाने लगे। करीब 10 मिनट के अंदर पिकासो ने पेंटिंग बनायीं और कहा, 'यह लो, यह मिलियन डॉलर की पेंटिंग है।'

🔶 महिला को बड़ा अजीब लगा कि पिकासो ने बस 10 मिनट में जल्दी से एक काम चलाऊ पेंटिंग बना दी है और बोल रहे हैं कि मिलियन डॉलर की पेंटिग है। उसने वह पेंटिंग ली और बिना कुछ बोले अपने घर आ गयी..!!

🔷 उसे लगा पिकासो उसको पागल बना रहा है। वह बाजार गयी और उस पेंटिंग की कीमत पता की। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह पेंटिंग वास्तव में मिलियन डॉलर की थी...!!

🔶 वह भागी-भागी एक बार फिर पिकासो के पास आयी और बोली, 'सर आपने बिलकुल सही कहा था। यह तो मिलियन डॉलर की ही पेंटिंग है।'

🔷 पिकासो ने हँसते हुए कहा,'मैंने तो आपसे पहले ही कहा था।'

🔶 वह महिला बोली, 'सर, आप मुझे अपनी स्टूडेंट बना लीजिये और मुझे भी पेंटिंग बनानी सिखा दीजिये। जैसे आपने 10 मिनट में मिलियन डॉलर की पेंटिंग बना दी, वैसे ही मैं भी 10 मिनट में न सही, 10 घंटे में ही अच्छी पेंटिंग बना सकूँ, मुझे ऐसा बना दीजिये।'

🔷 पिकासो ने हँसते हुए कहा, 'यह पेंटिंग, जो मैंने 10 मिनट में बनायी है ... इसे सीखने में मुझे 30 साल का समय लगा है। मैंने अपने जीवन के 30 साल सीखने में दिए हैं ..!! तुम भी दो, सीख जाओगी..!!

🔶 वह महिला अवाक् और निःशब्द होकर पिकासो को देखती रह गयी...!!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 21 Feb 2018


👉 मौन साधना के सिद्ध साधक- महर्षि रमण

🔶 मदुरै जिले के तिरुचुपि नामक एक देहान्त में उत्पन्न वैंकट रमण अपनी ही साधना से इस युग के महर्षि बन गये। आत्मज्ञान उन्होंने अपनी ही साधना से उपलब्ध किया। अठारह वर्ष की आयु में उनने अपना विद्यार्थी जीवन पूर्ण कर लिया। दक्षिण भारत में बोली जाने वाली चारों भाषाओं का उन्हें अच्छा ज्ञान था। साथ ही अंग्रेजी और संस्कृत का भी। यह भाषा ज्ञान उन्होंने किशोरावस्था में ही प्राप्त कर लिया था। अब आत्म-ज्ञान की बारी थी, जिसके लिए उनकी आत्मा निरन्तर बेचैन थी।

🔷 एक दिन जीवन और मृत्यु का मध्यवर्ती अन्तर समझने के लिए उन्होंने अपने मकान की छत पर ही एकाकी अभ्यास किया। शरीर को सर्वथा ढीला करके अनुभव करले लगे कि उनके प्राण निकल गये, काया सर्वथा निर्जीव पड़ी है। प्राण अलग है। प्राण के द्वारा शरीर की उलट-पलट कर देखने की अनुभूति वे देर तक करते रहे। शरीर और प्राण की भिन्नता का उन्हें गहरा अनुभव होता रहा इसके बाद वस्त्र की तरह उन्होंने शरीर को पहन लिया। यह अनुभव उन्हें आजन्म बना रहा।

🔶 आत्मानुभूति का आनन्द जीवन भर लेते रहने के लिए वे अरुणाचलम् चल दिये यह पर्वत दक्षिण भारत में पार्वती जी की तपस्थली माना जाता है। तप के लिए यह स्थान निकटवर्ती और परम पवित्र लगा। घर से बिना सूचना दिये यहाँ चले आये थे सो उन्होंने घर वालों के कष्ट का ध्यान रखते हुए एक पत्र भेज दिया। साथ ही सदा यहीं रहकर सदा तपश्चर्या करने का अभिप्राय भी। मौन उन्होंने अपना तप स्वरूप बनाया। घर के सब लोग उनका दर्शन कर गये। वापस लौटने का अभिप्राय भी कहते रहे पर उनने अस्वीकृति सिर हिलाकर ही प्रकट कर दी।

🔷 महर्षि मौन रहते थे पर उनके समीप आने वालों और प्रश्न पूछने वालों को मौन भाषा में ही उत्तर मिल जाते थे। उनकी दृष्टि नीची रहती थी। पर कभी किसी को आँख से आँख मिलाकर देखा तो इसका अर्थ होता था, उसकी दीक्षा हो गई। उन्हें ब्रह्मज्ञान का लाभ मिल गया। ऐसे ब्रह्मज्ञानी बड़भागी थोड़े से ही थे।

🔶 आरम्भिक दिनों में वे अरुणाचल के कतिपय अनुकूल स्थानों में निवास करते रहे। पीछे उन्होंने एक स्थान स्थायी रूप से चुन लिया। आरम्भ में उनकी साधना का कोई नियत स्थान और समय नहीं था। पीछे वे नियमबद्ध हो गये, ताकि दर्शनार्थी आगंतुकों को यहाँ वहाँ तलाश में न भटकना पड़े।

🔷 महर्षि रमण सिद्ध पुरुष थे। मौन ही उसकी भाषा थी। उनके सत्संग में सब को एक जैसे ही सन्देश मिलते थे मानों वे वाणी से दिया हुआ प्रचलन सुन कर उठे थे। सत्संग के स्थान में उस प्रदेश के निवासी कितने ही प्राणी नियत स्थान और नियत समय पर उनका सन्देश सुनने आया करते थे। बन्दर, तोते, साँप, कौए सभी को ऐसा अभ्यास हो गया कि आगन्तुकों की भीड़ से बिना डरे झिझके अपने नियत स्थान पर आ बैठते थे और मौन सत्संग समाप्त होते ही उड़कर अपने-अपने घोंसलों को चले जाया करते थे।

🔶 संस्कृत के कितने ही विद्वान उनकी सेवा में आये अपने-अपने समाधान लेकर वापस गये। उन्हीं लोगों ने रमण गीता आदि कतिपय संस्कृत पुस्तकें लिखीं जिनमें महर्षि की अनुभूतियों तथा शिक्षाओं का उल्लेख मिलता है।

🔷 वे सिद्ध पुरुष थे पर उनने जान-बूझकर कभी सिद्धियों का प्रदर्शन नहीं किया। भारत में योगियों की खोज करने वाले पाल ब्रंटन ने बड़े सम्मानपूर्वक उनकी कितनी ही अलौकिकताओं का उल्लेख किया है।

🔶 भारत को स्वतन्त्रता दिलाने में जिन तपस्वियों का उल्लेख किया जाता है उनमें योगीराज अरविन्द, राम-कृष्ण परमहंस और महर्षि रमण के नाम प्रमुख हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1984 अगस्त पृष्ठ 61
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/August/v1.61

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (अन्तिम भाग)

🔶 कामुक चिन्तन में मानसिक शक्ति का इतना अधिक क्षरण होता है जितना कदाचित ही अन्य किसी प्रयोजन में होता हो। शरीर का ओजस् वीर्यपात से नष्ट होता है, किन्तु उससे भी कहीं अधिक महत्त्व की मानसिक क्षमता को आनन्दमय उत्तेजना से अस्त-व्यस्त कर डालने में कामुक चिन्तन का आक्रमण और भी अधिक विनाशकारी है। इस स्तर की कुकल्पनाओं में से कदाचित ही कोई एक प्रतिशत साकार कर पाता है, किन्तु इस कारण पूरी-पूरी हानि उठा लेता है। नीति मर्यादा को तोड़-फोड़ कर रख देने वाली इस विडम्बना से मनुष्य परोक्षतः मानवी गरिमा का अनुशीलन भी गँवा बैठता है। बाहर से भले ही वह निर्दोष दीखता रहे पर यह हानि ऐसी है, जिसके कारण उत्कृष्टता के अन्यान्य क्षेत्र भी मनुष्य के हाथ से चले जाते हैं और वह क्रमशः अन्यान्य अनुबन्ध उल्लंघन की मनोभूमि भी अपनाने लगता है। शारीरिक ब्रह्मचर्य तो प्रतीक मात्र है। जिस ब्रह्मचर्य की अध्यात्म क्षेत्र में अतिशय प्रशंसा की गई और माहात्म्य-गाथा गाई गई है, उसे मानसिक स्तर की कामुक प्रसंग में बरती जाने वाली पवित्रता ही समझनी चाहिए।

🔷 मानसिक आवेशों में लोभ लिप्सा का अतिवाद भी ऐसा है जिससे प्रेरित होकर व्यक्ति बेईमानी, विश्वासघात से लेकर आक्रामक कुकृत्यों तक में लीन होता और अपराधी जीवन व्यतीत करता है। ऐसे आवेशग्रस्त अनीति उपार्जन को दुर्व्यसनों और उद्धत प्रदर्शनों में ही खर्च करते और बदले में अनेकों संकट ओढ़ते देखे गये हैं।

🔶 काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के षट्-रिपुओं को उत्तेजक मनोविकार ही समझा जाना चाहिए। उन्हें ऐसे मनोरोग भी कह सकते हैं जो सन्तुलन और सौजन्य का सर्वनाश करके रख दें। इनसे बचना और बचाना ही उचित है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Exclusive Phase of Time (Part 2)

🔶 The first step that you will have to take is that you have to stop living like ordinary men and say we would live like special and exclusive men.  Serving stomach is one thing. It is not the only job so why to do it absurdly? Why not to fill it through righteous measures? Why shouldn’t we do works that we can do other than serving the stomach? This question will appear before us leading us to feel the need of reshuffling our mind-set in a new way, changing our mind-set so that we would prioritize the assignments given by BHAGWAN over worldly appeals for the former is more regular and profitable. It is more profitable to partner with BHAGWAN, to allow BHAGWAN to pervade in our life. The world history tells us that persons partnering with BHAGWAN have never been and will never be in loss. It will be great to realize that. It must be understood that a great solution to our life-touching issues has been gained.
                                    
🔷 If we could feel that now it is the right time to change our mentality in order to go with BHAGWAN instead of clubbing with world. It will be our second step to excel. The third step to excel is to shift our ambitions, longings and wishes to centre of greatness from that of a bigwig. This should not be our ambitions that we will continue to concentrate on saturating our desires, spending our brain in managing ego, pomp-show and features of a bigwig and dancing in tune with worldly appeals. If our conscience and mind concede to this fact that these things are trivial and childish issues serving no purpose and if we could relinquish timidity, shrewdness and juvenile attitude only then we could endeavor to attain greatness after all How a glass of water can be filled with milk if the water is not taken out of that glass?
                                      
🔶 The same should be our characters, activities & thinking styles as was that of great men and noble men. After conceding to this fact, conceiving these theories in our mind, changing centers of desires & longings we must initiate some actions in our practical life also. Very this is the way prescribed for SADHAKs.

Finished, today’s session.
                                  
===OM SHANTI===

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 10)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 मित्रो! क्षमताएँ जिनके अंदर हैं, प्रतिभाएँ जिनके अंदर हैं, वह कहीं-से-कहीं जा पहुँचता है। आम्रपाली जब तक वेश्या रही, तो पहले नंबर की रही। राजकुमार, राजाओं से लेकर सेठ-साहूकार तक उसकी एक निगाह के लिए, उसकी एक चितवन और एक इशारे के लिए ढेरों रुपया खरच कर डालते थे और उसके गुलाम हो जाया करते थे, लेकिन जब आम्रपाली अपनी करोड़ों की संपत्ति को लेकर भगवान् बुद्ध की ओर चली गई, तो न जाने क्या-से-क्या हो गई और सम्राट् अशोक जो था, ऐसा खूनी था कि उसने खानदान-के-खानदान समाप्त कर दिए थे। सभी शाही खानदानों को एक ओर से उसने मरवा डाला था। मुसलमानों ने एक-आध को मारा था, लेकिन उसने तो किसी को जिंदा ही नहीं छोड़ा। ऐसी खूनी था अशोक। उसने चंगेज खाँ, नादिरशाह और औरंगजेब, सबको एक किनारे रख दिया था। जहाँ कहीं भी हमले किए, वहाँ खून की नदियाँ ही बहाता चला गया।

🔷 लेकिन मित्रो! जब उसने पलटा खाया और जब अपने आप में परिवर्तन कर डाला, तो फिर वह कौन हो गया? सम्राट् अशोक हो गया, जिसने बौद्ध संघ और बौद्ध धर्म का सारे-का-सारा संचालन किया। आज जो हमारे झंडे के ऊपर और हमारे सिक्कों-नोटों के ऊपर तीन शेर वाला निशान बना हुआ है, वह सम्राट् अशोक की निशानी है। और जो हमारे राष्ट्रीय ध्वज पर चौबीस धुरी वाला और चौबीस पँखुड़ी वाला चक्र लगा हुआ है, यह क्या है? यह सम्राट् अशोक के द्वारा पारित किया और प्रतिपादित किया हुआ धर्मचक्र प्रवर्तन है, जिसको हमने राष्ट्रीय झंडे के ऊपर स्थान दिया हुआ है। ये किसकी हिम्मत, किसकी दिलेरी थी किसकी बहादुरी थी? उसकी थी, जो डाकू था और खूँखार था।

🔶 मित्रो! भगवान् जहाँ कहीं भी अपना अंश देता है, विभूति देता है, उसके अंदर चमक होती है, लगन होती है, उसके अंदर तड़प होती है और मुरदे? मुरदे हमारे और आपके जैसे होते हैं। साँस लिया करते हैं। भगवान् की जब पूजा करते हैं, तो भी ऐसे-ऐसे सिर हिलाते रहते हैं और साँस लेते रहते हैं। सेवा करने जाते हैं, तो वहाँ भी निठल्ले की तरह पड़े रहते हैं। सत्संग करने, शिविर करने आते हैं, तो यहाँ भी मौसी जी-मौसा जी की याद सताती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 47)

👉 सद्गुरु की कृपादृष्टि की महिमा

🔶 गुरुगीता का प्रत्येक महामंत्र गुरुभक्ति का गीत है। यह जब शिष्य की समर्पण साधना की सरगम से सुरबद्ध होता है, तो इसकी सम्मोहकता भुवन मोहिनी होती है। गुरुभक्ति के ये गीत-समर्पण के संगीत से सजकर शिष्य की चेतना में ईश्वरीय प्रकाश की सृष्टि करते हैं। इस महासत्य की अनुभूति अब तक अनेकों शिष्यों को हुई है। इन क्षणों में भी बहुतेरे इस सत्य को अपने जीवन की परिभाषा मानकर जुटे हैं। उनकी लगन उन्हें अन्तर्जगत के अनेकों रहस्यों से परिचित करा रही है। इन रहस्यों में सबसे परम रहस्य एक ही है कि गुरुकृपा से सब कुछ सम्भव है। यहाँ तक कि गुरु कृपा से परम असम्भव भी सहज सम्भव है। इस सच्चाई को जब भी कोई चाहे अपने जीवन में अनुभव कर सकता है।

🔷 गुरु समर्पण की भक्ति कथा में रमे हुए शिष्यों ने गुरु गीता के पूर्वोक्त मंत्रों में भगवान् सदाशिव के इन बोध वचनों को पढ़ा कि गुरुदेव के चरण कमल संसार के सभी दावानलों का विनाश करने वाले हैं। गुरुभक्त साधकों को उन सद्गुरु का ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में करना चाहिए। यह ध्यान चन्द्रमण्डल के अन्दर श्वेत कमल में अकथ आदि तीन रेखाओं से बने हंस वर्ण युक्त त्रिकोण में करना चाहिए। ध्यान की यह गुप्त गोपनीय विधि अपने परिणाम में साधक को अध्यात्म साधना का चरम फल देने वाली है। जिन्होंने भी इसे किया है, वे सद्गुरु के कृपा के श्रेष्ठतम प्रसाद को पाने में सफल हुए हैं।

🔶 गुरु कृपा की इस साधना महिमा को और भी अधिक स्पष्टता देते हुए भगवान् भोलेनाथ जगन्माता पार्वती से कहते हैं-

सकलभुवनसृष्टिः कल्पिताशेषपुष्टिर निखिलनिगमदृष्टिः संपदां व्यर्थदृष्टिः।
अवगुणपरिमार्ष्टिस्तत्पदार्थैकदृष्टिर भवगुणपरमेष्टिर्मोक्षमार्गैकदृष्टिः॥ ५९॥
सकलभुवनरंगस्थापनास्तंभयष्टिः सकरुणरसवृष्टिस्तत्त्वमालासमष्टिः।
सकलसमयसृष्टिः सच्चिदानंददृष्टिर निवसतु मयि नित्यं श्रीगुरोर्दिव्यदृष्टिः॥ ६०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 76

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 6)

🔷 कामुक चिन्तन इस सुव्यवस्थित निर्धारण पर सीधा आक्रमण करता है और पशुओं जैसी स्थिति में लौटना चाहता है जिसमें यौनाचार को शरीर कृत्य विनोद भर माना जाता है। ऐसी छूट पाने से पूर्व परिवार संस्था और समाज गठन को समाप्त करके आदिम युग में लौटना पड़ेगा। इस पर भी समाधान नहीं। बलिष्ठ कुत्ते कमजोरों को खदेड़ कर यौनाचार का लाभ लेते हैं। आदिम युग में भी स्वेच्छाचार नहीं चलता था। सभ्य युग में मर्यादा पालन का अनुबन्ध है तो आदिम युग में इस प्रयोजन के लिए ठनने वाले मल्ल में स्वयंवर का विजेता होने का। दोनों ही दृष्टि से मनचाही स्वच्छन्दता को छूट नहीं है। मनुष्य न भौंरे हो सकते और न नारियाँ तितली। एक फूल से उड़कर दूसरे पर जा बैठने की छूट उन्हें तब तक नहीं मिल सकती, जब तक कि मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनकर रहना अंगीकार है।

🔶 कामुक चिन्तन असंख्यों पर हावी रहता है। विपरीत लिंग वालों के रूप में यौवन का स्मरण आता रहता है और रमण के लिए मन चलता है। कल्पनाएँ उठती हैं और एक परीलोक बनकर खड़ी हो जाती है। मन मोदक खाने में मनोयोग ऐसे जंजाल में जकड़ जाता है जिसके कारण किन्हीं महत्त्वपूर्ण प्रसंगों पर ध्यान ही नहीं जमता। इस कुचक्र में कितने ही प्रतिभावान छात्र अनुत्तीर्ण होते और भविष्य गँवाते देखे गये हैं। कितने ही कुटेवों के शिकार होते और ओजस्-तेजस् गँवाकर छूँछ बनते हैं। कई उस स्वप्नलोक के साथ इतने अधिक लिपट जाते हैं कि अश्लीलता का उद्धत प्रदर्शन करके अनजानों तक से छेड़खानी करने जैसी कुचेष्टा करते देखे गये हैं। परिणाम स्पष्ट है।

🔷 बहुत बार तो हाथ मलते और खीजते रहने से भी काम चल जाता है, पर बहुत बार बदले में ऐसा मजा चखने को भी मिलता है, जिसका स्मरण जन्म भर बना रहे और छठी का दूध याद आये। व्यभिचार की सीमा तक जा पहुँचने पर भी इस कामुक चिन्तन की परिणति और भी अधिक भयावह होती है। उससे दोनों ही क्षेत्रों के गृहस्थ जीवन बेतुके, अप्रामाणिक, नीरस स्तर के बनते देखे गये हैं। सन्तान पर तो इसका प्रभाव निश्चित रूप से अत्यधिक पड़ता है। वे व्यभिचारी अभिभावकों को क्षमा नहीं करते। इसके कई आर्थिक, सामाजिक एवं भावनात्मक कारण भी हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Exclusive Phase of Time (Part 1)

🔷 Each fellow of us must conceive deeply in our minds that the present time in which we & you are living is the most exclusive one. This is such a transition period in which the Age is changing. Each one of us must conceive that our personality is very special. We have been sent by BHAGWAN for some specific task. Insects and wicked creatures are usually born for reproduction and servicing the stomach. Many of humans too serve only this purpose and live like human-fool and human-insect, also no account of their lives is maintained. Such men also cannot do anything other than serving stomach and reproduction, but BHAGWAN pose his faith on some persons and believes such persons to do some work exclusively for BHAGWAN also and not be busy in own labyrinth only.
                                         
🔶 Every person of YUG NIRMAN PARIVAR must frame an idea about himself that BHAGWAN has sent us for some every exclusive jobs; that this is such some exclusive time-span and each one of us has to feel it that we have been entrusted with duties to fulfill the needs of the Age. If you could believe that path to progress can be opened and you can proceed on the way of great men, thus you can successfully achieve the object of our family of Age-building. You will get exclusive personality which will not be like that of ordinary men.
                                          
🔷 Now is very exclusive phase of time, not like that of usual normal time rather it is emergency-like situation and we all know that emergent actions are to be taken in any emergency-like situation. The responsibility upon our shoulders is not ordinary one only of serving stomach. There are additional responsibilities we have to discharge as Monkeys, Bears; cow-boys came to accompany KRISHAN and RAM to contribute exclusively for some specific objectives. If you too could  feel like that and realize that you people too are associated with MAHAKAAL the same way then new questions,  problems and also new grounds and reasons behind  exciting scenario will be clear to you.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...