बुधवार, 31 जनवरी 2018

👉 परोपकारः पुण्याय:-

🔶 फारस में एक बादशाह बड़ा ही न्याय प्रिय था। वह अपनी प्रजा के दुख-दर्द में बराबर काम आता था। प्रजा भी उसका बहुत आदर करती थी। एक दिन बादशाह जंगल में शिकार खेलने जा रहा था, रास्ते में देखता है कि एक वृद्ध एक छोटा सा पौधा रोप रहा है।

🔷 बादशाह कौतूहलवश उसके पास गया और बोला, ‘‘यह आप किस चीज का पौधा लगा रहे हैं?’’ वृद्ध ने धीमें स्वर में कहा, ‘‘अखरोट का।’’ बादशाह ने हिसाब लगाया कि उसके बड़े होने और उस पर फल आने में कितना समय लगेगा। हिसाब लगाकर उसने अचरज से वृद्ध की ओर देखा, फिर बोला, ‘‘सुनो भाई, इस पौधै के बड़े होने और उस पर फल आने मे कई साल लग जाएंगे, तब तक तु कहॉं जीवित रहोगे ’’ वृद्ध ने बादशाह की ओर देखा। बादशाह की आँखों में मायूसी थी। उसे लग रहा था कि वह वृद्ध ऐसा काम कर रहा है, जिसका फल उसे नहीं मिलेगा।

🔶 यह देखकर वृद्ध ने कहा, ‘‘आप सोच रहें होंगे कि मैं पागलपन का काम कर रहा हूँ। जिस चीज से आदमी को फायदा नहीं पहुँचता, उस पर मेहनत करना बेकार है, लेकिन यह भी सोचिए कि इस बूढ़े ने दूसरों की मेहनत का कितना फायदा उठाया है? दूसरों के लगाए पेड़ों के कितने फल अपनी जिंदगी में खाए हैं? क्या उस कर्ज को उतारने के लिए मुझे कुछ नहीं करना चाहिए? क्या मुझे इस भावना से पेड़ नहीं लगाने चाहिए कि उनके फल दूसरे लोग खा सकें? जो अपने लाभ के लिए काम करता है, वह स्वार्थी होता है।’’ बूढ़े की यह दलील सुनकर बादशाह चुप रह गया।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 1 Feb 2018

👉 Amrit Chintan 1 Feb

🔷 As long as man is totally materialistic in life, he will grow roots of evil in himself. It is only spiritual way of life. That man starts hating sins of his own when he become his own soul conscious. The worldly atmosphere always put one down and resists ideal growth of life. Only spiritual life can save a person from the bad effect of the prevailing atmosphere.
 
🔶 You all my loving soul! I wish that you strictly follow the path of truth. Truth must be follow at the cost of all hurdles and difficulties of life. Voice of the soul should always be followed. Truth itself is such a great power, which gives tremendous power and courage to stick to the right path and object of life.
 
🔷  The beauty of life is not its external appearance but it is his changed life. The changed life must radiate love for all and they appreciate his virtues. To earn all these one will have to develop his character behavior and make his actions ideal for others.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 10)

🔷 मित्रो! यही हमारे मिशन का संदेश है और यही मिशन का संदेश है। यही हमारे युग निर्माण योजना का संदेश है और यही हमारे गायत्री परिवार का संदेश है। यही हमारे अध्यात्म का संदेश है और यही हमारी गुरु परम्परा का संदेश है। आप जाना और हमारे कार्यकर्ताओं को हमारा संदेश सुनाना। आप जनता को ज्यादा जोर मत देना। आपके रथयात्रा के लिए कितनी भीड़ आ गयी, कितनी नहीं, इसके ऊपर जोर देने की जरूरत नहीं है। आपके यज्ञ में कितने आदमी हवन करने वाले आये कितने नहीं आये इस पर भी बहुत जोर देने की आवश्यकता नहीं है। जितना बन जाय-उतना अच्छा ही है। हम कब मा करते हैं कि जनता को आपको इकट्ठा नहीं करना चाहिए।

🔶 जनता इकट्ठी हो तो अच्छी बात है। आपका पंडाल अच्छा बन गया, तो अच्छी बात है। उससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। परन्तु हमको शुरुआत वहाँ से करनी पड़ेगी कि जो हमारा बगीचा लगाया हुआ था, वह सूख तो नहीं रहा है, कुम्हला तो नहीं रहा है। कहीं वह जानवरों द्वारा खाया तो नहीं जा रहा है? जिसके लिए हमने इतना परिश्रम किया, उतना वह विकसित होना चाहिए था पर विकसित नहीं हो रहा है। हमको ज्यादा ध्यान वहाँ देना है। इसलिए हम जहाँ कहीं भी आपको भेजते हैं, आप यह प्रयत्न करना कि जो आदमी हमारे कर्मठ कार्यकर्ता हैं, जो भी हमसे संबंधित व्यक्ति हैं, उनके अंदर मिशन की प्रेरणा, मिशन का संदेशा पहुँचाने में आप समर्थ हों।

🔷 इसके लिए मित्रो! करना क्या पड़ेगा? आपको ज्यादातर उनके संपर्क में रहना पड़ेगा। आपको उनसे दूर नहीं रहना चाहिए। नेता और जनता के बीच जो खाई पैदा हो गयी है, वह खाई आपको पैदा नहीं करना चाहिए। हमने जो संगठन किया है, उसका नाम सभा या सम्मेलन नहीं रखा है। हमारा यह मठ नहीं है और हमारे यहाँ उतनी गुरु-शिष्य परम्परा भी नहीं है। हमारे यहाँ तो परिवार प्रणाली है। कुटुम्ब में किस तरीके से भाई-बहन एक साथ रहते हैं, माँ-बाप एक साथ रहते हैं, बेटे और भतीजे एक साथ रहते हैं। उसी प्रणाली का, उसी परंपरा को हमने जन्म दिया है। आप भी उसी प्रणाली में अपने को फिट करने की कोशिश करना।

🔶 जहाँ कहीं भी आप जायँ और वहाँ गायत्री परिवार के लोग और युग निर्माण परिवार के लोग मिलें, तो उन पर आपको ज्यादा ध्यान देना है और उन लोगों के साथ में आत्मीयता का विस्तार करना है और वह भी चापलूसी के द्वारा नहीं, लम्बी-चौड़ी लच्छेदार बात के साथ नहीं, क्योंकि आप उनके कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वालों में से हैं। हमारी आत्मीयता का तरीका हमेशा से यही रही है। लच्छेदार बातें कभी किसी आदमी को आत्मीय नहीं बनाती हैं। आत्मीयता तब बनती है जब हम और आप कंधे से कंधा मिला करके, हाथ में हाथ मिला करके और पाँव से पाँव मिला करके साथ-साथ चलना शुरू करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 28)

👉 शंकर रूप सद्गुरु को बारंबार नमन्

🔶 गुरु महिमा के साथ गुरु नमन की महिमा ही अपरिमित है। इसे गुरुगीता के अगले महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् भोलेनाथ आदिमाता पार्वती से कहते हैं-

यत्सत्येन जगत्सत्यं यत्प्रकाशेन भाति तत्। यदानन्देन नन्दन्ति तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ३६॥
यस्य स्थित्या सत्यमिदं यद्भाति भानुरूपतः। प्रियं पुत्रादि यत्प्रीत्या तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ३७॥
येन चेतयते हीदं चित्तं चेतयते न यम्। जाग्रत्स्वप्न सुषुप्त्यादि तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ३८॥
यस्य ज्ञानादिदं विश्वं न दृश्यं भिन्नभेदतः। सदेकरूपरूपाय तस्मै श्री  गुरवे नमः॥ ३९॥
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः। अनन्यभावभावाय तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ४०॥

🔷 सद्गुरु नमन के इन महामंत्रों में गहन तत्त्वचर्चा है। गुरुतत्त्व, परमात्मतत्त्व और प्रकृति या सृष्टि तत्त्व अलग-अलग नहीं है। यह सब एक ही है- भगवान् शिव के वचन शिष्य को समझाते हैं, जिस सत्य के कारण जगत् सत्य दिखाई देता है अर्थात् जिनकी सत्ता से जगत् की सत्ता प्रकाशित होती है, जिनके आनन्द से जगत् में आनन्द फैलता है, उन सच्चिदानन्द रूपी सद्गुरु को नमन है॥ ३६॥

🔶 जिनके सत्य पर अवस्थित होकर यह जगत् सत्य प्रतिभासित होता है, जो सूर्य की भाँति सभी को प्रकाशित करते हैं। जिनके प्रेम के कारण ही पुत्र आदि सभी सम्बन्ध प्रीतिकर लगते हैं, उन सद्गुरु को नमन है॥ ३७॥

🔷 जिनकी चेतना से यह सम्पूर्ण जगत् चेतन प्रतीत होता है, हालांकि सामान्य क्रम में मानव चित्त को इसका बोध नहीं हो पाता। जाग्रत्-स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्था को जो प्रकाशित करते हैं, उन चेतनारूपी सद्गुरु को नमन है॥ ३८॥

🔶 जिनके द्वारा ज्ञान मिलने से जगत् की भेददृष्टि समाप्त हो जाती है और वह शिव स्वरूप दिखाई देने लगता है। जिनका स्वरूप एकमात्र सत्य का स्वरूप ही है, उन सद्गुरु को नमन है॥ ३९॥

🔷 जो कहता है कि मैं ब्रह्म को नहीं जानता, वही ज्ञानी है। जो कहता है कि मैं जानता हूँ, वह नहीं जानता। जो स्वयं ही अभेद एवं भावपूर्ण ब्रह्म है, उस सद्गुरु को नमन है॥ ४०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 50

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

👉 ज्ञान का नया संदेश

🔶 महर्षि_वेदव्यास ने एक कीड़े को तेजी से भागते हुए देखा। उन्होंने उससे पूछा, 'हे क्षुद्र जंतु, तुम इतनी तेजी से कहां जा रहे हो?' उनके प्रश्न ने कीड़े को चोट पहुंचाई और वह बोला, 'हे महर्षि, आप तो इतने ज्ञानी हैं। यहां क्षुद्र कौन है और महान कौन? क्या इस प्रश्न और उसके उत्तर की सही-सही परिभाषा संभव है?' कीड़े की बात ने महर्षि को निरुत्तर कर दिया।

🔷 फिर भी उन्होंने उससे पूछा, 'अच्छा यह बताओ कि तुम इतनी तेजी से कहां जा रहे हो?' कीड़े ने कहा, 'मैं तो अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा हूं। देख नहीं रहे, पीछे से कितनी तेजी से बैलगाड़ी चली आ रही है।' कीड़े के उत्तर ने महर्षि को चौंकाया। वे बोले, 'तुम तो इस कीट योनि में पड़े हो। यदि मर गए तो तुम्हें दूसरा और बेहतर शरीर मिलेगा।'

🔶 इस पर कीड़ा बोला, 'महर्षि, मैं तो इस कीट योनि में रहकर कीड़े का आचरण कर रहा हूं, परंतु ऐसे प्राणी असंख्य हैं, जिन्हें विधाता ने शरीर तो मनुष्य का दिया है, पर वे मुझसे भी गया-गुजरा आचरण कर रहे हैं। मैं तो अधिक ज्ञान नहीं पा सकता, पर मानव तो श्रेष्ठ शरीरधारी है, उनमें से ज्यादातर ज्ञान से विमुख होकर कीड़ों की तरह आचरण कर रहे हैं।' कीड़े की बातों में महर्षि को सत्यता नजर आई। वे सोचने लगे कि वाकई जो मानव जीवन पाकर भी देहासक्ति और अहंकार से बंधा है, जो ज्ञान पाने की क्षमता पाकर भी ज्ञान से विमुख है, वह कीड़े से भी बदतर है।

🔷 महर्षि ने कीड़े से कहा, 'नन्हें जीव, चलो हम तुम्हारी सहायता कर देते हैं। तुम्हें उस पीछे आने वाली बैलगाड़ी से दूर पहुंचा देता हूं।' कीड़ा बोला: 'किंतु मुनिवर श्रमरहित पराश्रित जीवन विकास के द्वार बंद कर देता है।' कीड़े के कथन ने महर्षि को ज्ञान का नया संदेश दिया।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 31 Jan 2018


👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 6)

🔷 पड़ोस में आग लगने पर भोजन पकाने जैसा आवश्यक काम भी पीछे कभी के लिए छोड़ना पड़ता है। कितने ही काम सामने हो तो उसमें बुद्धिमानी का कदम यह होता है कि प्राथमिकता देने और पीछे धकेलने की एक सुव्यवस्थित शृंखला बनाई जाय। इसका निर्धारण ही सुव्यवस्था कहा जाता है। इस क्रम को बिगाड़ देने पर पूरा परिश्रम करने पर भी बात बनती नहीं और समस्याएँ सुलझने के स्थान पर और भी अधिक उलझ जाती है। इन दिनों प्रत्येक विज्ञजन के लिए करने योग्य सामयिक कार्य एक ही है, कि लोक मानस के परिष्कार का महत्त्व समझा जाय और आस्था संकट का निवारण करने के लिए प्राण प्रण से जुट पड़ा जाय। इस एक ही व्यवधान के समाधान पर समय की समस्त गुत्थियों का सुलझ सकना निर्भर है।

🔶 यह सब अनायास ही संभव नहीं हो सकता। इस श्रेय पथ पर चल सकना मात्र उन्हीं के लिए संभव है, जो अपनी आकांक्षा उत्कंठा को तृष्णा से हटाये और उसे उतनी ही भावना पूर्वक श्रेय साधना के लिए लगायें। यह आन्तरिक परिवर्तन ही बाह्य क्षेत्र में वह सुविधा उत्पन्न कर सकता है, जिसके सहारे शरीर निर्वाह की तरह ही आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण का महान प्रयोजन बिना किसी के, नितान्त सरलतापूर्वक सधता रहे। परमार्थ परायणों में से एक भी भूखा, नंगा नहीं रहा। उनके पारिवारिक उत्तरदायित्वों में से एक भी रुका नहीं पड़ा रहा। तरीके अनेकानेक हैं। अपना सोचा हुआ तरीका ही एक मात्र मार्ग नहीं है।

🔷 नये सिरे से नये उपाय सोचने पर ऐसे समाधान हर किसी को उपलब्ध हो सकते हैं जिनमें से साँप मरे न लाठी टूटे। निर्वाह किसी के लिए समस्या नहीं। कठिनाई एक ही है-अनन्त वैभव की लिप्सा और कुटुम्बियों को सुविधा सम्पदा से लाद देने की लालसा। यदि परिवार के समस्त सदस्यों को श्रमजीवी, स्वावलम्बी बनाने की बात सोची जाय, औसत नागरिक स्तर का निर्वाह स्वीकार किया जाय तो इतने भर से जीवन को सार्थक बनाने वाली राह मिल सकती है। प्रश्न एक ही है कि शरीर के लिए जिया जाय या आत्मा के लिए। दोनों में से एक को प्रधान एक को गौण मानना पड़ेगा। यदि आत्मा की वरिष्ठता स्वीकार की जा सके तो उन प्रयोजनों को पूरा करना पड़ेगा, जिनके लिए सृष्टा ने यह सुर दुर्लभ अवसर उच्चस्तरीय उपयोग के निमित्त प्रदान किया है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 31 Jan

🔷 Farmers shade their perspiration in the field and they grow the crop in their fields. In the same way good persons get co-operation and followers from all sides. If one is keen to get the answer of his problem he will surely find suitable person to answer. There are examples where the prisoners under iron curtain can learn a lot just using a chalk and precocious on some metal vessel as the writing pad. Actually it is the keen desire of the person that can give any thing is this word but for that what is needed is hard labour and constant practice whole heartedly.
 
🔶 All the three dimensions of spiritual growth atheism, concept of soul and duty must be covered for proper development. Devotion to God is devotion to ideality, because God is representation of all virtues of human life. Worship is the starting point to achieve those virtues in his own life.
 
🔷  A woman’s body is not her anatomy but is truly complimentary to the make figure. The women create the true happiness of the family. It is that motherhood of a lady which creates a heavenly atmosphere in family. Women mean the source of  loving atmosphere in family. She wipes of the gloomy condition among the members. Her life is full of love, sacrifice, tolerance and bliss of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 9)

🔷 मित्रो! यह सब देखकर मुझे बड़ा क्लेश होता है, बड़ा दुःख होता है। लोगों ने तो रामचंद्र जी की भी मिट्टी पलीद कर दी थी। उनको गये हुए कितने वर्ष हो गये। भगवान श्रीकृष्ण की भी लोगों ने मिट्टी पलीद कर दी। उन्हें गये हुए पाँच हजार वर्ष से अधिक दिन हो गये। गाँधी जी की भी मिट्टी पलीद हो जाय, राणाप्रताप की भी मिट्टी पलीद हो जाय, तो क्या कह सकते हैं? लोग उनके नाम पर भी धंधा करने लग जायँ तो क्या कहा जा सकता है? तुम लोग मेरी भी मिट्टी पलीद क्यों कर रहे हो? मेरी जिंदगी में ही मुझे क्यों बदनाम कर रहे हो? मेरे जाने के बाद मुझे बदनाम करना? अभी तो अपनी सफाई पेश करने के लिए मैं जिन्दा हूँ। अभी मुझे क्यों तंग करते हो।

🔶 मित्रो! आप लोगों के पास जाना और जिन आदमियों को-लाखों मनुष्यों को, जिनको मैंने अपने खून-पसीने से और अपनी मेहनत के बाद तैयार किया है, उन्हें यह संदेश सुनाना कि गुरुजी क्या हैं और यह मिशन क्या है? हमारा मिशन इन्सान में भगवान पैदा करने की कल्पना करता है। हम इन्सान में भगवान पैदा करेंगे। हम इन्सान को भगवान बनायेंगे। भगवान की खुशामद करके मनोकामना पूर्ण कराने का प्रोत्साहन हम नहीं देंगे। हम ऐसा कोई आश्वासन नहीं देंगे, वरन् हम यह आश्वासन देंगे कि इंसान अपने आपमें भगवान है और अपने आपके भगवान को विकसित करने के लिए उनको खाद-पानी और बीज-तीनों की आवश्यकता पड़ेगी। हमको हर आदमी को आस्तिक बनाना पड़ेगा, जो कि आज नहीं है। आज जो है, वे नास्तिक हैं। आपको उन तक आस्तिकता का संदेश पहुँचाना पड़ेगा और आस्तिकता की व्याख्या करनी पड़ेगी, जो मैंने इस समय तक आपको कही।

🔷 मित्रो! आपको लोगों के पास जाना पड़ेगा। मनुष्यों में महानता विकसित करने के लिए, महानता के लिए बरगद का पेड़ उगाने के लिए, जीवन का कल्पवृक्ष उगाने के लिए उसमें खाद देनी पड़ेगी। खाद का नाम वह है-जिसको हम आस्तिकता कहते हैं। जिसको हम आध्यात्मिकता कहते हैं, अर्थात् अपने आप पर विश्वास करना और अपने आपका परिशोधन करना। आप हर आदमी से यह कहना कि मनुष्य को सुख और शांति देने के लिए, जीवन को कल्पवृक्ष बनाने के लिए जिस चीज की आवश्यकता है, उस चीज का नाम धार्मिकता है।

🔶 पौधे को विकसित करने के लिए बीज बोना-एक, पौधे में पानी देना-दो और खाद लगाना-तीन तीनों काम अगर आप कर लेंगे, तो आपका विशाल बरगद जैसा वृक्ष बढ़ता हुआ चला जायेगा। आपका जीवन रूपी बरगद का विशाल वृक्ष पल्लवित-पुष्पित होता हुआ चला जायेगा। उसके ऊपर फूल आयेंगे, उसके ऊपर फल आयेंगे और उसके ऊपर डालियाँ आयेंगी। ऐसे आदमी न केवल उस व्यक्ति को, जो अभावों में डूबा हुआ है, कंगाली में डूबा हुआ है, उसका न केवल उद्धार करेंगे, वरन् उसको इस लायक बना देंगे कि अपनी नाव में बिठा करके वह हजारों मनुष्यों को पार करने में सफल हो सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 27)

👉 शंकर रूप सद्गुरु को बारंबार नमन्

🔶 गुरुगीता अध्यात्मविद्या का परमगोपनीय शास्त्र है। हाँ, इसे समझने के लिए गहरी तत्त्वदृष्टि चाहिए। यह तत्त्व दृष्टि विकसित हो सके, तो पता चलता है कि वैदिक ऋचाएँ जिस सत्य का बोध कराती हैं, उपनिषद् की श्रुतियों में जिसका बखान हुआ है, गुरुगीता में भी वही प्रतिपादित है। अठारह पुराणों में जिन परमेश्वर की लीला का गुणगान है- वही सर्वेश्वर प्रभु शिष्यों के लिए सद्गुरु का रूप धरते हैं। अध्यात्म विद्या के सभी ग्रन्थों-शास्त्रों को पढ़ने का सुफल इतना ही है कि अपने कृपालु सद्गुरु के नाम में प्रीति जगे। सन्तों ने इसे कहा भी है-
    पढ़िबे को फल गुनब है, गुनिबे को फल ज्ञान।
    ज्ञान को फल गुरु नाम है, कह श्रुति-सन्त पुराण॥
  
🔷 यानि कि समस्त शास्त्रों को पढ़ने का फल यह है कि उस पर चिन्तन-मनन-निदिध्यासन हो। और इस निदिध्यासन का फल है कि साधक को तत्त्वदृष्टि मिले, उसे ज्ञान हो तथा ज्ञान का महाफल है कि उसे सद्गुरु के नाम की महिमा का बोध हो। उनके नाम में प्रीति जगे। उन्हें नमन का बोध जगे। यही श्रुति, सन्त और पुराण कहते हैं।
  
🔶 ऊपर के मंत्रों में गुरुभक्त शिष्यों को इसकी अनुभूति कराने की चेष्टा की गयी है। इसमें बताया गया है कि शिष्य का परम कर्त्तव्य है कि वह अपने सद्गुरु को नमन करें, क्योंकि वही संसार वृक्ष पर आरूढ़ जीव का नरक सागर में गिरने से उद्धार करते हैं। नमन उनश्री गुरु को, जो अपने शिष्य के लिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर होने के साथ स्वयं परब्रह्म परमेश्वर हैं। शिव रूपी उन सद्गुरु को नमन करना शिष्य का परम कर्त्तव्य है, जो समस्त विद्याओं का उदय स्थान और संसार का आदि कारण हैं और संसार सागर को पार करने के लिए सेतु हैं। वे गुरुदेव भगवान् ही अज्ञान के अन्धकार से अन्धे जीव की आँखों को ज्ञानाञ्जन की शलाका से खोलते हैं। गुरुवर ही अपने शिष्य के लिए पिता हैं, माता हैं, बन्धु हैं और इष्ट देवता हैं। वे ही उसे संसार के सत्य का बोध कराने वाले हैं। ऐसे परम कृपालु सद्गुरु को शिष्य बार-बार नमन करे और करता रहे

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 49

सोमवार, 29 जनवरी 2018

👉 गलती को भी मानें

🔷 अक्सर हम आवेश में आकर ऐसी प्रतिक्रिया दे देते हैं जो बाद में जाकर हमें दुःख देती है। कई बार परिवार के भीतर या कंपनी में ही हम अपने वरिष्ठों ये कनिष्ठों की बात को पूर्ण सुने बिना ही अपनी प्रतिक्रिया दे देते हैं। हम दूसरों में खोट, कपट, बेईमानी के लक्षण ढूँढते रहते हैं पर स्वयं की गलतियाँ मानने में हमारा ही अहं हमें रोकता है।

🔶 एक छोटी-सी कहानी है जिसके माध्यम से हम जान सकते हैं कि जल्दबाजी में प्रतिक्रिया देने का असर क्या होता है। कॉलेज में अच्छे नंबरों से पास होने के बाद एक युवा की अच्छी कंपनी में नौकरी लगती है। वह एक बहुत ही बड़े बिजनेसमैन का लड़का रहता है और कॉलेज में जाने से पूर्व से उसकी इच्छा रहती है कि उसके पास महँगी कार होना चाहिए।

🔷 अपने युवा पुत्र को उन्होंने यह वादा किया था कि अगर वह अच्छे नंबरों से पास हो जाता है और अपने बल पर नौकरी प्राप्त कर लेता है तब उसे वे कार जरूर लेकर देंगे। उस लड़के ने काफी दिनों से एक विशेष मॉडल की कार के सपने देखे थे और वह चाहता था कि पिता वही कार उसे दें।

🔶 पिता को भी यह बात पता थी। पास होने के बाद एक दिन पिता ने पुत्र को बुलाया। पुत्र समझ गया था कि आज उसे निश्चित रूप से कार मिलेगी। उसने अपने सभी साथियों से पहले ही कह दिया था कि सभी कार से लांग ड्राइव पर चलेंगे। वह पिता से मिलने जाता है। पिता उसे शाबासी देते हैं, साथ ही एक प्रेरक पुस्तक बक्से में रखकर देते हैं और कहते हैं कि बेटा तुम पास हो गए हो और अब आगे की जिंदगी बड़ी कठिनाई भरी होगी इस कारण तुम इस किताब को जरूर पढ़ो।

🔷 कार के सपनों में खोया युवा साथी किताब की बात सुनकर ही भड़क जाता है और उस बक्से को फेंक देता है और वहाँ से बाहर आ जाता है। वह काफी मायूस होता है कि क्या सोचा था और क्या हो गया? उसके मन में ऐसे विचार आने लगते हैं कि क्यों न घर ही छोड़ दे? काफी विचार करने के बाद वह नौकरी करने दूसरे शहर चले जाता है और पिता के काफी संपर्क करने के बाद भी वापस नहीं आता।

🔶 कई वर्षों तक वह पिता से संपर्क हीं नहीं करता। एक दिन उसके पास खबर आती है कि पिता की मृत्यु हो गई है। अपनी पत्नी के कहने पर वह पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने जाता है। अंतिम संस्कार के बाद वह पिता के कमरे में जाता है जहाँ पर वहीं बक्सा रखा होता है जिसमें किताब रहती है।

🔷 वह उस बक्से को उठाता है और किताब के पन्ने पलटता है तब उसमें से चाबी गिरती है। यह उसी कार की चाबी होती है जो उसके पिता ने वर्षों पूर्व खरीदी रहती है और यह वही कार होती है जिसके सपने वह देखा करता था। साथ ही किताब के नीचे कुछ कागजात रहते हैं जिनमें संपूर्ण संपत्ति व जायदाद उसके नाम की होती है। यह देखकर युवा लड़के की आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं और वह स्वयं से ही कहने लगता है कि मैं अपने आपको कभी माफ नहीं कर पाऊँगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 30 Jan 2018


👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 5)

🔷 करना क्या चाहिए? यदि इस प्रश्न का उत्तर गम्भीरता और दूरदर्शिता के सहारे उपलब्ध करना हो तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि शरीर को जीवित रखने भर के साधन जुटा देने के उपरान्त जो सामर्थ्य शेष रहती है, उसे आत्मा का कल्याण कर सकने वाले परमार्थ में लगा देने का साहस करना चाहिए। मात्र औचित्य अपनाने की इस समझदारी को साहस इस अर्थ में कहा जा रहा है, कि जन समुदाय के अधिकांश सदस्य अनर्थरत ही देखे जाते हैं उन्हें लोभ मोह की आग भड़काने और उसे बुझाने के लिए ईंधन जुटाने में ही निरन्तर कार्यरत देखा जाता है।

🔶 सुना है कि तेल या ईंधन डालने से आग भड़कती है, पर मनुष्य है जो तृष्णा को भड़काता और उसकी पूत के लिए, रावण जितना वैभव जुटाने के लिए अहर्निश श्रम करता है। अपना ही नहीं पड़ोसियों का सामान समेट कर भी उसी दावानल में झोंकता रहता है। यही है असफल और उद्विग्न जीवन का स्वरूप, जिसे अपनाने के लिए अधिकांश लोग उन्मादियों की तरह दौड़-धूप करते रहते हैं। यही है प्रवाह जिसमें जन समुदाय को तिनके पत्तों की तरह बहते देखा जाता है। इस भगदड़ भेड़चाल से भिन्न दिशा में कोई अपना मार्ग निर्धारित करता है तो उसे साहस ही कहना चाहिए। दिग्भ्रान्तों के झुण्ड को चुनौती देकर सही रास्ते का सुझाव देने वाला मूर्ख कहलाता और उपहासास्पद बनता है। तथाकथित जन समुदाय का विशेषतया कुटुम्बियों, हितैषियों का उपहास, तिरष्कार सहने की क्षमता सँजोना निस्संदेह साहस भरा कदम है। इसी से कहा जा रहा है कि आदर्शवाद को, सत्य और तथ्य को अपनाना भी इस अवांछनीयता के माहौल में साहस ही नहीं दुस्साहस भरा कदम है।

🔷 औचित्य कहा जाय या साहस। जीवन की सार्थकता का रास्ता एक ही है कि अमीरी और लिप्सा पर अंकुश लगाकर औसत नागरिक स्तर का निर्वाह क्रम अपनाया जाय। उतना जुट जाने पर पूरा-पूरा संतोष किया जाय। इसके उपरान्त जो भी बचा रहता है उस समूचे को ऐसे उपक्रम में नियोजित किया जाय, जिससे मानवी गरिमा का अभिवर्धन होता हो। आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण का उभय पक्षीय प्रयोजन सधता है। इस निर्धारण में भी यह देखना होता है कि सामयिक आवश्यकता पर ध्यान रखते हुए जो सर्वप्रथम सँभालने सुधारने योग्य है उसी को हाथ में लिया जाय।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 30 Jan

🔷 There is somewhere oneness in visible different forms. And this is the base of development and progress. When we divide or break in pieces. The power is reduced and the collective power of any material thing makes it strong and useful. A drop of water is same as a glass of water qualitatively, but drop can not quench the thirst. The law exists for human development as well.
 
🔶 My dear sons,
You can do a lot for me and for the mission I am committed if you decide so. You must grow sacredness and selfless love in life not only you will be my beloved son but you will be blessed by Rishis of Himalaya and saints who are our guide for the success of the mission of Yug Nirman Yojna.
 
🔷 The whole progress in life is right thinking and developing that in action. The objects of all religions are proper guidance to do good for self and others. God showers his grace to give you more courage to stick to right path. If that courage does not develop in one’s life is meant that his religion and spiritual path in simply a mimic.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 8)

🔷 मित्रो! क्या करना पड़ेगा? अधिक से अधिक लोग जो इस मिशन के विचारों को सुनने में समर्थ हों, उन तब हमारा संदेश पहुँचाया जा सके जिसको हमने आस्तिकता कहा है, जिसको हमने अध्यात्मवाद कहा है, जिसको हमने धर्म परम्पराएँ कहा है, उसका संदेश अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच जाय, तो अच्छा है। लेकिन अगर अधिक संख्या में लोग इकट्ठा नहीं होते, तो आप कभी सफलता-असफलता का अंदाज मत लगाना। हमने संख्या की दृष्टि से क्रियाकलापों को महत्त्व नहीं दिया है। बहिरंग रूप से कितना बड़ा पंडाल बना, कितना खर्च हुआ, कितने लोग आये-आदि की दृष्टि से आप सफलता-असफलता का अन्दाज कभी मत लगाना। आपको अन्दाज लगाना है, तो इस तरह से लगायें कि जहाँ और जिस कार्य के लिए आपको भेजा गया था, वहाँ जा करके आपने लोगों के अंदर भावनायें उत्पन्न करने में कितनी सफलतायें प्राप्त की। लोगों की भावनाओं को जाग्रत करके उन्हें ऊँचा उठाने में कदाचित आपने सफलता प्राप्त कर ली, तो मैं यह समझूँगा कि आपने अपना काम पूरा कर लिया और आपका काम पूरा हो गया। तब मैं समझूँगा कि आपका उद्देश्य सही था और आप यह समझते थे कि आपको किस काम के लिए भेजा गया है।

🔶 मित्रो! आप जिन लोगों के संपर्क में आयें, उनसे बराबर बात करना, सलाह देना, परामर्श देना, उनके साथ रहना, उनसे हिलना-मिलना और खासतौर से उन लोगों से जिनको हम अपना कार्यकर्ता कहते हैं। जनता हमारे कार्यों में भाग लेती है कि नहीं लेती है, अभी हमको उसकी फिकर नहीं है। अभी हमको यह फिकर है कि जिन लाखों आदमियों को हमने अब तक की अपनी लम्बी जिंदगी में कितनी मेहनत करने के बाद और कितना परिश्रम करने के बाद तैयार किया है और अपने संपर्क में लाया है। उनको हमारे उद्देश्यों की सही बात मालूम न हो सकी और उन सब को हमारी क्रियाओं का आभास न हो सका और उन सब तक हमारी गतिविधियों की कोई बात मालूम न हो सकी। यह कैसी मुसीबत है और कैसी कठिनाई है और कैसी दिक्कत है? सबसे बड़ी कठिनाई, सबसे बड़ी दिक्कत और सबसे बड़ी मुसीबत इस बात की है कि हम अपनी टीमवालों को ही नहीं समझा सके, तो बाहर वालों को कैसे समझाएँगे?

🔷 साथियो! अभी तक लोग हमें मैजेशियन-जादूगर समझते हैं। संतोषी माता समझते हैं। गुरुजी के मायने वे समझते हैं-मनोकामनाएँ पूरी करने की मशीन। गुरुजी के गले में माला डालो और उनके मुँह से आशीर्वाद निकालो। स्टेशनों पर यही होता है। हर स्टेशन पर वेट करने की-तौलने की मशीन लगी होती है। लोग उस पर खड़े हो जाते हैं और दस पैसे का सिक्का डालते हैं। दस पैसा डालते ही मशीन घूमी और वजन लिखा हुआ टिकट बाहर आ जाता है। गुरुजी क्या हैं? वही हैं जो स्टेशन पर मशीन लगी है। किसकी मशीन? वेट जानने की मशीन। वेट जानने में क्या करना पड़ता है? उनके गले में माला पहनानी पड़ती है और क्या करना पड़ता है? पैर छूने पड़ते हैं। पैर छूने के बाद में और माला पहनाने के बाद में और क्या करना पड़ता है? उनके पेट में से, उनके मुँह में से जाकर खट से टिकट आ जाता है। किसका टिकट आ जाता है? आशीर्वाद का टिकट आ जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 26)

👉 आओ, गुरु को करें हम नमन
🔶 यह घटना समर्थ गुरु रामदास और उनके शिष्य शिवराम के सम्बन्ध में है। उन दिनों स्वामी रामदास अपनी तेरह वर्षीय कठोर साधना को पूर्ण करके सारे देश में अलख जगा रहे थे।
  
🔷 इस क्रम में उन्हें बनारस आना था। अपनी बनारस यात्रा की चर्चा उन्होंने अपने शिष्यों से करते हुए कहा कि इस बार की यात्रा मैं अकेले ही करूँगा। सब शिष्यों ने उनका आदेश स्वीकार कर लिया, पर बालभक्त शिवराम ने जिद्द पकड़ ली कि वह भी उनके साथ जाएगा। शिवराम की आयु बारह साल थी। समर्थ गुरु ने बहुत समझाया कि बेटा तुम इतनी लम्बी यात्रा पैदल कैसे करोगे? पर बालहठ पर कोई असर नहीं हुआ। अन्त में स्वामी रामदास ने उससे कहा- अच्छा बेटा! तुम अपनी मां से आज्ञा ले लो। अगर वह आज्ञा दे देगी, तो हम तुम्हें ले चलेंगे। शिवराम की मां एक भक्तिमती विधवा महिला थी। शिवराम उनकी इकलौती सन्तान था। सन्तान के प्रति उनका जितना गहरा ममत्व था, समर्थ गुरु के चरणों में उतनी ही गहरी भक्ति थी। पुत्र की बात सुनकर उन्होंने एक पल की देर लगाये बिना आज्ञा दे दी।
  
🔶 शिवराम की भक्ति और उसकी मां की आस्था से द्रवित होकर समर्थ गुरु उसे अपने साथ काशी ले आए। काशी आने पर गुरु आज्ञा से शिवराम भिक्षा मांगने के लिए निकला। समर्थ रामदास और उनके शिष्यों का भिक्षा हेतु एक नियम था। वह किसी के द्वार पर खड़े होकर केवल तीन बार पुकारते थे- जय-जय रघुवीर समर्थ। तीन बार पुकारने पर यदि किसी ने भिक्षा दी तो ठीक अन्यथा आगे बढ़ जाते थे। इस तरह तीन घरों में भिक्षा मांगना उनका नियम था। तीन घरों में यदि भिक्षा न मिली तो वे उस दिन उपवास कर लेते थे। शिवराम ने भी इसी नियम के अनुसार एक द्वार पर आवाज लगायी। यह द्वार काशी के महातांत्रिक भैरवानन्द का था। भैरवानन्द को अनेकों तामसी तान्त्रिक क्रियाएँ सिद्ध थीं। यह महातांत्रिक होने के साथ महाक्रोधी भी था।
  
🔷 अपने द्वार पर जय-जय रघुवीर समर्थ की आवाज सुनते ही वह भड़क उठा। क्रोधावेश में वह द्वार पर निकलकर आया और बालक शिवराम को डांटते हुए बोला कि कौन है, जो अपने को समर्थ कहता है। शिवराम ने बिना किसी भय के कहा कि समर्थ हैं मेरे गुरु और उनकी सामर्थ्य का स्रोत उनके आराध्य भगवान् राम हैं। छोटे बालक को अपने सामने इस तरह बोलते हुए देख उस क्रोधी तांत्रिक ने कहा, जा मैं भैरवानन्द तुझसे कहता हूँ कि तू कल प्रातःकाल तक मर जाएगा, तेरे गुरु में सामर्थ्य है, तो तुझे बचा लें। शिवराम ने समर्थ रामदास के पास उपस्थित होकर उस तांत्रिक की सारी बातें बतायी। उन बातों से भी उन्हें अवगत कराया, जो रास्ते में बनारस के लोगों ने उसे महातांत्रिक की आश्चर्यजनक शक्तियों के बारे में बतायी थी। इन सारी बातों को सुनकर समर्थ रामदास हंसे और बोले बेटा- समर्थ रघुवीर के होते डर कैसा? तू तो बस आराम से गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु वाला मन्त्र पढ़ता रह और आराम से मेरे पांव दबाए जा। इतना कहकर समर्थ रामदास लेट गए।
  
🔶 बालक शिवराम ने उनके पांव दबाते हुए गुरु नमन के मंत्र पढ़ने शुरू किए। इधर भैरवानन्द ने भी उसके मारण के लिए महाकृत्या का प्रयोग किया था। पूरी रात महाकृत्या ने शिवराम को मारने के लिए अनेकों रूप धरे, उसको कई तरह से गुरु नमन से विरत करना चाहा, परन्तु शिवराम की अटल गुरुभक्ति के सामने उसकी एक न चली। अन्त में असफल होकर उसने भैरवानन्द पर ही अपना आक्रमण किया। महातांत्रिक अपनी क्रिया को इस तरह उलटते देखकर घबरा गया। वह भागा-भागा आकर समर्थ के चरणों में गिर गया। समर्थ रामदास ने उसे अभय देते हुए कृत्या का शमन किया और उसे चेताया—गुरुगीता के गुरु नमन मंत्र साधारण नहीं हैं। जिसकी वाणी में ये मंत्र हैं और हृदय में गुरुभक्ति है, वह गुरुकृपा के कवच से सदा सुरक्षित है। कोई अभिचार क्रिया उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। गुरु नमन के इन नमन मंत्रों की शृंखला में आगे कहा गया है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 47

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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