शनिवार, 13 जनवरी 2018

👉 नन्हीं चिड़िया

🔶 बहुत समय पुरानी बात है, एक बहुत घना जंगल हुआ करता था। एक बार किन्हीं कारणों से पूरे जंगल में भीषण आग लग गयी| सभी जानवर देख के डर रहे थे की अब क्या होगा?

🔷 थोड़ी ही देर में जंगल में भगदड़ मच गयी सभी जानवर इधर से उधर भाग रहे थे पूरा जंगल अपनी अपनी जान बचाने में लगा हुआ था। उस जंगल में एक नन्हीं चिड़िया रहा करती थी उसने देखा क़ि सभी लोग भयभीत हैं जंगल में आग लगी है मुझे लोगों की मदद करनी चाहिए।

🔶 यही सोचकर वह जल्दी ही पास की नदी में गयी और चोच में पानी भरकर लाई और आग में डालने लगी। वह बार बार नदी में जाती और चोच में पानी डालती| पास से ही एक उल्लू गुजर रहा था उसने चिड़िया की इस हरकत को देखा और मन ही मन सोचने लगा बोला क़ि ये चिड़िया कितनी मूर्ख है इतनी भीषण आग को ये चोंच में पानी भरकर कैसे बुझा सकती है।

🔷 यही सोचकर वह चिड़िया के पास गया और बोला कि तुम मूर्ख हो इस तरह से आग नहीं बुझाई जा सकती है।

🔶 चिड़िया ने बहुत विनम्रता के साथ उत्तर दिया- “मुझे पता है कि मेरे इस प्रयास से कुछ नहीं होगा लेकिन मुझे अपनी तरफ से प्रयास करना है, आग कितनी भी भयंकर हो लेकिन मैं अपना प्रयास नहीं छोड़ूँगी”

🔷 उल्लू यह सुनकर बहुत प्रभावित हुआ।

🔶 तो मित्रों यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है। जब कोई परेशानी आती है तो इंसान घबराकर हार मान लेता है लेकिन हमें बिना डरे प्रयास करते रहना चाहिए यही इस कहानी की शिक्षा है।

👉 कोढ़ी का अभ्युत्थान

🔷 बंगाल के राजमहल जिले के रूप और सनातन नामक दो भगवद् भक्त हुए है। सनातन को कोढ़ था। चैतन्य महाप्रभु से सनातन की भेंट हुई, उन्हें मालूम हुआ कि यह भगवद् भक्त है तो उन्होंने यह जानते हुए भी कि यह कोढ़ी है, उठा कर छाती से लग लिया। कोढ़ का मवाद उनके शरीर पर लग गया तो भी उनने उससे किसी प्रकार की घृणा न की। उन्होंने सनातन को पढ़ाया भी। उस शिक्षा के आधार पर सनातन ने भक्ति रस के कई ग्रन्थ भी लिखे। कोढ़ी होते हुए भी वे महान भगवद् भक्त बन सके।

🔶 पतित और तुच्छ दीखने वाले में भी कितनी ही ऐसी आत्माऐं होती है जिन्हें उत्कर्ष का अवसर मिले तो वे महान बन सकती है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 14 Jan 2018


👉 घृणा का स्थान

🔶 निंदा, क्रोध और घृणा ये सभी दुर्गुण हैं, लेकिन मानव जीवन में से अगर इन दुर्गुणों को निकल दीजिए, तो संसार नरक हो जायेगा। यह निंदा का ही भय है, जो दुराचारियों पर अंकुश का काम करता है। यह क्रोध ही है, जो न्याय और सत्य की रक्षा करता है और यह घृणा ही है जो पाखंड और धूर्तता का दमन करती है। निंदा का भय न हो, क्रोध का आतंक न हो, घृणा की धाक न हो तो जीवन विश्रृंखल हो जाय और समाज नष्ट हो जाय। इनका जब हम दुरुपयोग करते हैं, तभी ये दुर्गुण हो जाते हैं, लेकिन दुरुपयोग तो अगर दया, करुणा, प्रशंसा और भक्ति का भी किया जाय, तो वह दुर्गुण हो जायेंगे। अंधी दया अपने पात्र को पुरुषार्थ-हीन बना देती है, अंधी करुणा कायर, अंधी प्रशंसा घमंडी और अंधी भक्ति धूर्त। प्रकृति जो कुछ करती है, जीवन की रक्षा ही के लिए करती है।

🔷 आत्म-रक्षा प्राणी का सबसे बड़ा धर्म है और हमारी सभी भावनाएँ और मनोवृत्तियाँ इसी उद्देश्य की पूर्ति करती हैं। कौन नहीं जानता कि वही विष, जो प्राणों का नाश कर सकता है, प्राणों का संकट भी दूर कर सकता है। अवसर और अवस्था का भेद है। मनुष्य को गंदगी से, दुर्गन्ध से, जघन्य वस्तुओं से क्यों स्वाभाविक घृणा होती है? केवल इसलिए कि गंदगी और दुर्गन्ध से बचे रहना उसकी आत्म-रक्षा के लिए आवश्यक है। जिन प्राणियों में घृणा का भाव विकसित नहीं हुआ, उनकी रक्षा के लिए प्रकृति ने उनमें दबकने, दम साथ लेने या छिप जाने की शक्ति डाल दी है। मनुष्य विकास-क्षेत्र में उन्नति करते-करते इस पद को पहुँच गया है कि उसे हानिकर वस्तुओं से आप ही आप घृणा हो जाती है। घृणा का ही उग्र रूप भय है और परिष्कृत रूप विवेक। ये तीनों एक ही वस्तु के नाम हैं, उनमें केवल मात्रा का अंतर है।

🔶 तो घृणा स्वाभाविक मनोवृति है और प्रकृति द्वारा आत्म-रक्षा के लिए सिरजी गयी है। या यों कहो कि वह आत्म-रक्षा का ही एक रूप है। अगर हम उससे वंचित हो जाएँ, तो हमारा अस्तित्व बहुत दिन न रहे। जिस वस्तु का जीवन में इतना मूल्य है, उसे शिथिल होने देना, अपने पाँव में कुल्हाड़ी मारना है। हममें अगर भय न हो तो साहस का उदय कहाँ से हो। बल्कि जिस तरह घृणा का उग्र रूप भय है, उसी तरह भय का प्रचंड रूप ही साहस है। जरूरत केवल इस बात की है कि घृणा का परित्याग करके उसे विवेक बना दें। इसका अर्थ यही है कि हम व्यक्तियों से घृणा न करके उनके बुरे आचरण से घृणा करें। धूर्त से हमें क्यों घृणा होती है? इसलिए कि उसमें धूर्तता है। अगर आज वह धूर्तता का परित्याग कर दे, तो हमारी घृणा भी जाती रहेगी।

🔷 एक शराबी के मुँह से शराब की दुर्गन्ध आने के कारण हमें उससे घृणा होती है, लेकिन थोड़ी देर के बाद जब उसका नशा उतर जाता है और उसके मुँह से दुर्गन्ध आना बंद हो जाती है, तो हमारी घृणा भी गायब हो जाती है। एक पाखंडी पुजारी को सरल ग्रामीणों को ठगते देखकर हमें उससे घृणा होती है, लेकिन कल उसी पुजारी को हम ग्रामीणों की सेवा करते देखें, तो हमें उससे भक्ति होगी। घृणा का उद्देश्य ही यह है कि उससे बुराइयों का परिष्कार हो। पाखंड, धूर्तता, अन्याय, बलात्कार और ऐसी ही अन्य दुष्प्रवृत्तियों के प्रति हमारे अंदर जितनी ही प्रचंड घृणा हो उतनी ही कल्याणकारी होगी। घृणा के शिथिल होने से ही हम बहुधा स्वयं उन्हीं बुराइयों में पड़ जाते हैं और स्वयं वैसा ही घृणित व्यवहार करने लगते हैं। जिसमें प्रचंड घृणा है, वह जान पर खेलकर भी उनसे अपनी रक्षा करेगा और तभी उनकी जड़ खोदकर फेंक देने में वह अपने प्राणों की बाजी लगा देगा। महात्मा गाँधी इसलिए अछूतपन को मिटाने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर रहे हैं कि उन्हें अछूतपन से प्रचण्ड घृणा है।

🔶 जीवन में जब घृणा का इतना महत्व है, तो साहित्य कैसे उसकी उपेक्षा कर सकता है, जो जीवन का ही प्रतिबिंब है? मानव-हृदय आदि से ही सु और कु का रंगस्थल रहा है और साहित्य की सृष्टि ही इसलिए हुई कि संसार में जो सु या सुंदर है और इसलिए कल्याणकर है, उसके प्रति मनुष्य में प्रेम उत्पन्न हो और कु या असुंदर और इसलिए असत्य वस्तुओं से घृणा। साहित्य और कला का यही मुख्य उद्देश्य है। कु और सु का संग्राम ही साहित्य का इतिहास है। प्राचीन साहित्य धर्म और ईश्वर द्रोहियों के प्रति घृणा और उनके अनुयायियों के प्रति श्रद्धा और भक्ति के भावों की सृष्टि करता रहा।

✍🏻 प्रेमचंद

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (भाग 2)

🔶 इस विषय में पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों से भारतीय दार्शनिकों का कहना है कि जीव अर्थात् मनुष्य की स्वाभाविक स्थिति सुखमय है। उसका सत्य रूप आनन्दस्वरूप है। संसार की बाधायें माया जन्य हैं जो दुःख रूप में मानव मन पर आरोपित होती हैं। यदि जीव अपने सत्यस्वरूप का ज्ञान प्राप्त करले तो दुःख की सारी अनुभूतियों का अत्यन्ता भाव हो जाये, फिर वह न तो कभी दुःखी हो और न पीड़ित।

🔷 इस प्रश्न के उत्तर में कि जब संसार में शोक संघर्षों का अस्तित्व स्थायी है और मनुष्य सांसारिक प्राणी है तो उसे सुख प्राप्ति ही किस प्रकार हो सकती है। उसके भाग्य में मानो सदा सर्वदा के लिए दुःख शोक ही अंकित हो गये हैं।—उत्तर में आधुनिक मानस वेत्ताओं का उत्तर है कि मानव-मन की कुछ अभिलाषायें होती हैं, इच्छायें तथा कामनायें होती हैं। जिनकी पूर्ति के लिये वह लालायित रहता है। अपनी कामनाओं की आपूर्ति में ही मन को दुःख तथा अशांति होती है। यदि उसकी लालसाओं, अभावों तथा आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे तो मन के दुःखी अथवा अशान्त होने का कोई कारण ही उपस्थित न हो। इसलिये मनुष्य को सुखी होने अथवा मन को सुखी करने के लिये उसी दिशा में बढ़ना होगा जिस दिशा में उसकी लालसाओं का पूर्ति-लाभ हो। मन जो कुछ चाहता है वह उसे मिल जाये तो निश्चय ही वह सुखी एवं सन्तुष्ट रहे।

🔶 सुनने में तो पाश्चात्यों का यह उत्तर बड़ा सीधा, सरल तथा समीचीन मालूम होता है पर भारतीय दार्शनिकों के मतानुसार वह वैसा है नहीं। उनका कहना है कि मनुष्य का मन-मानस हर समय तरंगित होता रहता है। उसकी हर तरंग की तृप्ति नहीं की जा सकती। मनुष्य के चंचल मन की वासनाओं, कामनाओं, इच्छाओं, अभिलाषाओं तथा लालसाओं का वारापार नहीं। एक की पूर्ति होते ही दूसरी उठ खड़ी होती है। साथ ही चंचल मन में असन्तोष का एक दोष रहता है। किसी विषय की कामना करने पर यदि वह उसे मिल भी जाये तो वह उससे तृप्त नहीं होता, उसे ‘और-और’ का दौरा जैसा पड़ने लगता है। इस प्रकार वह विषय की पूर्ति में भी असन्तुष्ट एवं अशान्त रहने लगता है, और यदि एक बार उसकी और, और की तृष्णा भी बहुतायत से पूरी की जा सके तो उसे शीघ्र ही उस विषय से अरुचि होने लगती है और वह नवीन विषय के लिये उत्सुक हो उठता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 8
http://awgpskj.blogspot.in/2018/01/1_12.html

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.8

👉 Sacrifice-Dedication (Part 1)

🔷 I have been sharing with you the knowledge; I have gained from this world. I have talking to you the whole night; I, seated beside you, have been caressing, telling you lullaby, while you have been in sleep and many other things I have been doing to you. I have been for long trying to convince you. O men! My friends! Will you not see me? Will you continue to treat me like a teacher blessing his pupils? I am a burning man; I am a right man. Would you too not become a burning man? Can’t you induce a fire within you to ignite the fires of knowledge within many others?

🔶  I have been explaining so many things. I have been using my all the four voices-PARAA, PASHAYANTI, MADHYAMAA & BAIKHARI. I have been speaking through your soul, heart, brain and ears. You go and go with my voice impressed in your mind. I am not going to leave you. I will be talking to you, quarreling with you, wherever I live. I will stop saying only when you begin to proceed on my path, the path I have been heading on the advice of my GURUDEV. I spent all my life on his hints.
                                                 
🔷 I wish your time, sweat and money to be spent for the divine cause for which I have been born and for which I have lived my life, for the works which are for the welfare of the world that is uplifting of humanity. For this very reason I have been asking you to do a minor SADHANA in which you are expected to spend 10 paisa per day and time of 1 hour per day. These were little things to begin with, which I have been regularly saying to you but in days to come you will have to dedicate all you have at your disposal in the feet of BHAGWAN, as I have done so that you become eligible to have all that BHAGWAN has.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 8)

🔶 हम किसी से प्यार करते हैं क्या? नहीं, हम किसी से प्यार नहीं करते। बीबी से प्यार करते हैं? नहीं। बीबी के लिए तो हम जोंक है। खून की प्यासी जोंक जिससे चिपकती है उसका खून पी जाती है। औरत के लिए तो हम जोंक हैं। उसकी जवानी हमने चूस ली। उसको छूँछ बना दिया। पचासों बीमारियों की वह मरीज बन गई है। उसके पास जो कुछ भी था, अपने माँ-बाप के घर से गुलाब का सा शरीर लेकर आई थी हमने उसको वासना की आग में जला दिया। वह जली हुई औरत कराहती, कसकती, सिसकती हुई पड़ी रहती है। जल्लाद छुरे लेकर के जिस तरह से मारता है, हमने भी अपनी औरत में इतने छुरे मारे कि सारा का सारा खून निकाल करके फेंक दिया।

🔷 बच्चे पर बच्चा पैदा करते रहे और वह चिल्लाती रही कि हमारी हड्डियाँ इस लायक नहीं हैं और हमारे पास माँस उतना नहीं है, कृपा कीजिए अब हम बच्चा पैदा नहीं कर सकते और आप हैं कि बच्चे पैदा करते चले गए। वह हजार बीमारियाँ लेकर के कभी हकीम जी के यहाँ चक्कर काटती है, कभी आचार्य जी के यहाँ चक्कर काटती है और कहती है कि गुरुजी यह बीमारी है, वह बीमारी है। अगर आपने अपनी स्त्री को प्यार किया होता तो उसको पढ़ाया होता, शिक्षा दी होती, दीक्षा दी होती। उसके स्वास्थ्य की रखवाली की होती और उसको सुयोग्य बनाया होता, उसको विकसित किया होता और श्रेष्ठ बनाया होता, पर अब तो वह किसी काम की नहीं बची।
 
🔶 प्यार है आपके पास? भक्ति है आपके पास? नहीं है। अगर भक्ति और प्यार रहा होता तो आपने अपने माँ-बाप की सेवा को होती। बहन-भाइयों की सेवा की होती। अपने बच्चों की सेवा की होती। नहीं, गुरुजी हमने तो की है। बेटे आप सेवा करना नहीं जानते। प्यार करना जानते ही नहीं हैं। आप तो एक ही बात जानते हैं-पैसा। बेटे को पैसा दे जा। अरे क्यों पड़ा हुआ है इन बच्चों के पीछे। इनका भविष्य खराब करने के लिए पैसा जमा करता चला जा रहा है, क्या इनको शराबी बनाएगा, ऐय्याश बनाएगा? दुराचारी बनाएगा? क्या बनाएगा? नहीं, महाराज जी मैं तो पैसा छोड़ करके जाऊँगा, बेटे को देकर के जाऊँगा और वह सारी को मारी जिंदगी मौज करेगा। बेटे वह मौज नहीं अपनी जिन्दगी खराब करेगा और सबका सत्यानाश करेगा।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 16)

👉 साक्षात् भगवान् विश्वनाथ होते हैं—सद्गुरु

🔶 गुरुगीता के महामंत्रों में साधना का परम रहस्य है। इसे जानने वाला जीवन की सारी भटकन से क्षण में ही उबर जाता है। जब समर्थ सद्गुरु के चरणों का आश्रय सुलभ हो, तब भला और कहीं भटकने से क्या फायदा? दयामय गुरुदेव के चरणों की महिमा की कथा उपर्युक्त मंत्रों में कही गयी है। इसमें भगवान् महादेव ने माता पार्वती को बताया  है कि सद्गुरु के चरणों के जल से किस तरह से साधक को यौगिक ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। किस तरह उसमें ज्ञान-वैराग्य आदि गुणों का विकास होता है। शिष्य के अन्तर्मन में ज्यों-ज्यों गुरु भक्ति प्रगाढ़ होती है, त्यों-त्यों उसका अन्तःकरण ज्ञान के प्रकाश से भरता जाता है। ‘गुरुकृपा ही केवलम्’ शिष्य के साधनामय जीवन का एक मात्र सत्य है।
इसे समझाते हुए देवाधिदेव भगवान् महादेव जगदम्बा पार्वती से आगे कहते हैं-

गुरोः पादोदकं पीत्वा गुरोरुच्छिष्टभोजनम्।
गुरुमूर्तेः सदा ध्यानं गुरुमन्त्रं सदा जपेत्॥ १५॥
काशीक्षेत्रं तन्निवासो जाह्नवी चरणोदकम्।
गुरुःविश्वेश्वरः साक्षात् तारकं ब्रह्मनिश्चितम्॥ १६॥
गुरोः पादोदकं यत्तु गयाऽसौ सोऽक्षयोवटः।
तीर्थराज प्रयागश्च गुरुमूर्त्यै नमोनमः॥ १७॥

🔷 गुरु भक्त साधक की समर्थ साधना का सार इतना ही है कि वह गुरु चरणों के जल (चरणामृत) को पिए। गुरु को पहले भोज्य पदार्थों को समर्पित कर बाद में स्वयं उन्हें प्रसाद रूप में ग्रहण करे॥ १५॥ गुरु का निवास ही मुक्तिदायिनी काशी है। उनका चरणोदक ही इस काशीधाम को आध्यात्मिक ऊर्जा से भरने वाला गंगाजल है। गुरुदेव ही भगवान् विश्वनाथ हैं। वही साक्षात् तारक ब्रह्म हैं॥ १६॥ गुरुदेव का चरणोदक गया तीर्थ है। वह स्वयं अक्षयवट एवं तीर्थराज प्रयाग है। ऐसे सद्गुरु भगवान् को प्रणाम करना, नमन करना ही साधक के जीवन का सार सर्वस्व है॥ १७॥

🔶 इन मंत्रों के भाव गहन हैं, पर इनकी साधना अति सुगम और महाफलदायी है। जब सर्वदेव देवीमय कृपालु सद्गुरु का सान्निध्य हमें सुलभ है, तब अन्यत्र क्यों भटका जाए? गुरुदेव का चरणोदक महाप्रभावशाली है। यह सामान्य जल नहीं है। इसमें तो उनकी तप चेतना घुली रहती है। गुरुदेव जब स्थूल कलेवर में नहीं हैं, तब ऐसी स्थिति में जल पात्र में उनके चरणों की भावना करते हुए चरणोदक तैयार किया जा सकता है। इसका पान साधक के हृदय में भक्ति को प्रगाढ़ करता है। इसी तरह साधक का भोजन भी गुरुदेव का प्रसाद होना चाहिए। स्वयं भोजन करने से पहले गुरुदेव को भोग लगाए। मन ही मन सभी भोज्य पदार्थों को उन्हें अर्पित करे। प्रगाढ़ता से भावना करे कि कृपालु गुरुदेव हमारे द्वारा अर्पित पदार्थों को ग्रहण कर रहे हैं। बाद में उस भोजन को उनका प्रसाद समझ कर ग्रहण करे।

🔷 मनुष्य शरीर में होने पर भी सद्गुरु कभी भी सामान्य मनुष्य नहीं होते। वह तो परमात्म चेतना का घनीभूत रूप है। उनका निवास शिष्यों के लिए मुक्तिदायिनी काशी है। इस कथन में तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है; क्योंकि सद्गुरु जहाँ रहते हैं, वहाँ उनकी तपश्चेतना का घनीभूत प्रभाव छाया रहता है। न जाने कितने देवी-देवता, ऋषि-महर्षि सिद्धजन उनसे मिलने के लिए आते हैं। उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा भी उस क्षेत्र में घुलती रहती है। इस समस्त ऊर्जा की आध्यात्मिक प्रतिक्रिया अपने आप ही वहाँ रहने वालों पर पड़ती रहती है। जिनका हृदय अपने गुरु के प्रति भक्ति से भरा है। जो गुरुदेव की चेतना के प्रति ग्रहणशील हैं, ऐसे भक्त-साधकों का मोक्ष निश्चित है। गुरुधाम में निवास काशीवास से किसी भी तरह से कम नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 29

👉 लोहड़ी उत्सव की शुभकामनाएं Lohri Utsav


🔶 वीर पंजाबी नायक, युग निर्माणी दुल्ला भट्टी जिसने मुगलों से विद्रोह कर कुँवारी लड़कियों को दासत्व से मुक्त कर उनका घर बसाया, लोहड़ी के पर्व में हम उसे याद कर वैसा ही अपने समाज में बुराईयों के नाश के लिए संकल्पित हों, युग निर्माणी समाज सेवक युवाओं का आवाहन अखिल विश्व गायत्री परिवार (All World Gayatri Pariwar) करता है, जो समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व निर्भीक साहसी दुल्ला भट्टी सा निबाहें। 24 गायत्री मन्त्र और 5 महामृत्यंजय मन्त्र के साथ लोहड़ी की अग्नि में टिल,रेवड़ी, मूंगफली, लावा का हवन करें और सामूहिक यज्ञ प्रसाद लें।

लोहड़ी की सभी गानों को दुल्ला भट्टी से ही जुड़ा तथा यह भी कह सकते हैं की लोहड़ी के गानों का केंद्र बिंदु दुल्ला भट्टी को ही बनाया जाता हैं।

🔶 दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था! उस समय संदल बार के जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न की मुक्त ही करवाया बल्कि उनकी शादी की हिन्दू लडको से करवाई और उनके शादी के सभी व्यवस्था भी करवाई।

दुल्ला भट्टी एक विद्रोही था और जिसकी वंशवली भट्टी राजपूत थे। उसके पूर्वज पिंडी भट्टियों के शासक थे जो की संदल बार में था अब संदल बार पकिस्तान में स्थित हैं। वह सभी पंजाबियों का नायक था।

🔶 गायत्री मन्त्र - ॐ भूर्भूवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्

🔷 महामृत्युंज मन्त्र- ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्

🙏🏻 विचारक्रांति अभियान शांतिकुञ्ज हरिद्वार

🔶 सही उद्देश्य और लोहड़ी की कहानी को जन जन तक पहुंचाने के लिए ये पोस्ट शेयर अवश्य करें। अधिकांश लोग लोहड़ी का महत्व नहीं जानते।

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शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

👉 जीवन में सूझ-बूझ

🔶 एक किसान थककर खेतो में लौट रह था। उसे भूख भी बहुत लगी थी लेकिन जेब में चंद सिक्के ही थे। रास्ते में हलवाई की दुकान पड़ती थी। किसान हलवाई ककी दुकान पर रुका तो उसकी मिठाइयो की सुगंध का आनंद लेने लगा।

🔷 हलवाई ने उसे एसा करते देखा तो उसकी कुटिलता सूझी। जैसे ही किसान लौटने लगा, हलवाई ने उसे रोक लिया।

🔶 किसान हैरान होकर देखने लगा। हलवाई बोला- पैसे निकालो। किसान ने पूछा पैसे किस बात के? मेने तो मिठाई खाई ही नहीं।

🔷 जवाब में हलवाई बोला- तुमने मिठाई खाई बेशक नहीं हैं लेकिन यहाँ यहाँ इतनी देर खड़े होकर आनंद तो लिया हैं न।

🔶 मिठाई कि खुबसू लेना मिठाई खाने के बराबर हैं | तो तुम्हे उस खुसबू का आनंद उठाने के ही पैसे भरने होगे।

🔷 किसान पहले तो घबरा गया लेकिन थोड़ी सूझ-बूझ बरतते हुए उसने अपनी जेब से सिक्के निकले।

🔶 उन सिक्को को दोनों हाथो के बिच डालकर खनकाया। जब हलवाई ने सिक्को कि खनक सुन ली तो किसान जाने लगा।

🔷 हलवाई ने फिर पैएसे मांगे तो उसने कहा- जिस तरह मिठाई कि खुशबु लेना मिताही खाने के बराबर हैं, उसी तरह सिक्को कि खनक सुनना पैसे लेने के बराबर हैं।

🔶 मंत्र : सूझबूझ से मुश्किल हल करे।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 13 Jan 2018


👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 Jan 2018

🔶 पाठको! जिस प्रकार आपको प्रशंसा प्रिय है, वैसे ही दूसरों को भी। आप दूसरों से सहयोग और सहानुभूति चाहते हैं, वैसे ही आपके मित्र- बन्धु पड़ौसी भी आपसे ऐसी ही अपेक्षा रखते हैं। दूसरों की इच्छा के लिए यदि अपनी अभिरुचि का दमन कर देते हैं ,तो प्रत्याशी पर आपकी इस सद्भावना का असर जरूर पड़ेगा। आत्मीयता, उदारता, साहस् नैतिकता, श्रमशीलता जैसे सदाचारों में से कोई न कोई सम्पत्ति हर किसी के पास मिलेगी। इन्हें ढूँढ़ने का प्रयास करें।

🔷 सहृदयता मानवीय गरिमा का मेरुदण्ड है। जिसका सम्बल पाकर ही व्यक्ति एवं समाज ऊँचे उठते, मानवी गुणों से भरे- पूरे बनते हैं। इसका अभाव निष्ठुरता, कठोरता, असहिष्णुता जैसी प्रवृत्तियों के रूप में प्रकट होता है। मानवी गरिमा के टूटते हुए इस मेरुदण्ड को हर कीमत पर बचाया जाना चाहिए।

🔶 कठिनाइयाँ एक ऐसी खराद की तरह है, जो मनुष्य के व्यक्तित्व को तराश कर चमका दिया करती है। कठिनाइयों से लड़ने और उन पर विजय प्राप्त करने से मनुष्य में जिस आत्म बल का विकास होता है, वह एक अमूल्य सम्पत्ति होती है ,जिसको पाकर मनुष्य को अपार सन्तोष होता है। कठिनाइयों से संघर्ष पाकर जीवन मे ऐसी तेजी उत्पन्न हो जाती है, जो पथ के समस्त झाड़- झंखाड़ों को काट कर दूर कर देती है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अध्यात्म और विज्ञान का मिलन

🔷 अपने शरीर से लेकर सम्पूर्ण दृश्य जगत् में कहीं भी देखें, सर्वत्र जड़ और चेतन की सड्ड;ह्नष्ठह्म् सत्ता दृष्टिगोचर होती है। दोनों का संयोग बिखर जाने पर न तो कहीं प्राणी के लिए पदार्थ रहेगा और न ही पदार्थ के लिए प्राणी। बुद्धि और मन की परिधि यह संसार ही है। वे इसी परिधि के इर्द-गिर्द चक्कर काटते हैं। इन्द्रियों की अनुभूतियां हों या मानसिक कल्पनाएँ अथवा अन्त:करण की भाव संवेदनाएं, इसकी क्षमता का प्रकटीकरण तभी होता है जब शरीर या पदार्थों के बीच उनका सम्बन्ध स्थापित हो सके। इसके बिना सारा का सारा चिन्तन का ढांचा ढह जायेगा।
  
🔶 ऐसे ही अन्योन्याश्रित सम्बन्धों में एक युग्म अध्यात्म और विज्ञान का है। पदार्थ विज्ञान में बुद्धि और पदार्थ का का संयोग काम करता है। आत्मिकी में बुद्धि का स्थूल रूप नहीं, अपितु  परिष्कृत रूप- ऋतम्भरा प्रज्ञा काम करता है। तत्त्व चिन्तन के ब्रह्म विद्या प्रकरण में इसी की चर्चा की गई है। इस तरह पारस्परिक तालमेल की आवश्यकता स्पष्ट हो जाती है। यदि ये दोनों एक-दूसरे के अस्तित्व को नकारने लगें तो यही मानना होगा कि दु:ख और दुर्भाग्य ही राहु-केतु के सदृश हमारे चिन्तन क्षेत्र पर ग्रहण की तरह लग गए हैं। जीव के परिपूर्ण विकास के लिए दोनों का अपना महत्त्व है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि वैज्ञानिकता के बिना धर्म अन्धविश्वास बन जायेगा। इसी तरह आत्मिकी के बगैर विज्ञान अनैतिक और उच्छृंखल। समय की महती आवश्यकता है- दोनों मेंं ताल-मेल हो। इनका पारस्परिक विरोध संसार की प्रगति और संस्कृति को नष्ट कर देगा।
  
🔷 आध्यात्मिक उपलब्धियां हैं-श्रेष्ठ व्यक्तित्व एवं आदर्श कत्र्तव्य। आध्यात्मिकता सच्ची वही है, जो मानवी विकास में सहायक हो। उसमें व्यवहारिक जीवन जीने की कला व जीवन की विविध समस्याओं का समाधान निहित हो। मात्र कर्मकाण्डों का अन्धानुकरण करने, श्रद्धा विश्वास के नाम पर लकीर पीटने को आज का बौद्धिक वर्ग तैयार न होगा। इन कर्मकाण्डों के साथ परिष्कृत जीवन के सूत्र-सिद्धातों का दार्शनिक क्रम भी होना चाहिए। इसके अभाव में तो धर्म की गरिमा गिरेगी। अपनी भूमिका का भली प्रकार निर्वाह करके ही धर्म जाग्रत और जीवन्त बना रह सकता है। अन्यथा बुद्धिवाद उसे आसानी से न स्वीकार करेगा, उल्टे उस पर प्रहार करने की सोचेगा।

🔶 लन्दन विश्वविद्यालय के एस्ट्रोफिजीसिस्ट प्रो. हर्बर्ट डिग्ले का कहना है कि ‘‘विज्ञान की अपनी परिधि सीमित है, यह मात्र पदार्थ के स्वरूप एवं प्रयोग का ही विश्लेषण करता है। पदार्थ को बनाया किसने? क्यों बना? इसका उत्तर दे पाना अभी सम्भव नहीं है। इसके लिए विज्ञान को ऊँची और विलक्षण कक्षा में प्रवेश लेना पड़ेगा। यह कक्षा लगभग उसी स्तर की होगी, जैसी कि अध्यात्म के तत्वांश को समझने के लिए अपनानी होती है।’’
  
🔷 विख्यात दार्शनिक पालटिलिच का कथन है-न तो धर्म शास्त्रों के आधार पर खगोल, रसायन, भौतिकी के निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं और न ही दुनिया भर की प्रयोगशालाएं ईश्वर, आत्मा, सदाचार, भाव-प्रवाह जैसे तथ्यों पर कुछ प्रामाणिक प्रकाश डाल सकती हैं। मात्र दार्शनिक स्तर ही ऐसा है, जहां दोनों धाराओं का मिलन सम्भव है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक रूनेग्लोविश का भी यही मानना है कि धर्म और विज्ञान का ब्राह्म स्वरूप भले ही पृथ्वी के दो धु्रवों की तरह सर्वथा भिन्न दिखे, पर अन्तस्थल में एक है। ये दोनों सर्वथा एक-दूसरे के पूरक हैं। स्वामी विवेकानन्द ने धर्म की वैज्ञानिकता घोषित करते हुए कहा था कि ‘‘मेरा अपना विश्वास है कि बाह्म ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में जिन अन्वेषण पद्धतियों का प्रयोग होता हैं, उन्हें धर्म क्षेत्र में भी प्रयुक्त किया जाना चाहिए। यह कार्य जितना शीघ्र हो उतना ही अच्छा। यदि कोई धर्म इन अन्वेषणों से ध्वस्त हो जाय तो यही समझना चाहिए कि वह निरर्थक था।

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (भाग 1)

🔶 मनोविश्लेषण आधुनिक समय का एक विशेष तथा नवीन विज्ञान माना जा रहा है। यह मनोविज्ञान पाश्चात्य देशों के लिये कोई नवीन अथवा विज्ञान हो सकता है। किन्तु भारत के लिये यह एक प्राचीन विषय है। दुःख सुख की अनुभूतियां, काम क्रोध, लोभ-मोह आदि की वृत्तियों, उनका कारण एवं निवारण का उपाय इस देश का चिर परिचित तथा प्राचीन विषय है। अन्तर केवल यह है कि भारत के प्राचीन वेत्ताओं ने इस विषय को दर्शन का नाम दिया था और आज के पाश्चात्य विद्वानों ने इसे मनोज्ञान अथवा मानस-विज्ञान की संज्ञा दी है। ध्येय दोनों का मनःस्थिति द्वारा आन्तरिक सुख शान्ति ही रहा है।

🔷 सुख-दुःख की अनुभूति मन में होती है। अस्तु, मन की स्थिति पर सुख दुःख का आना जाना स्वाभाविक है। पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्य सांसारिक प्राणी है। उसका संसार के विषयों की ओर झुकाव होना अनिवार्य है। संसार में जहां इच्छा, अभिलाषाओं तथा कामनाओं का बाहुल्य है वहां शोक संघर्षों की भी कमी नहीं है। संसार में निवास करने वाला मनुष्य इन अवस्थाओं से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। कामनायें होंगी, अभाव खटकेगा, फलस्वरूप मन को अशान्ति होगी। मन अशांत रहने पर तरह-तरह की बाधाओं तथा व्यामोहों का जन्म होगा और चिन्ताओं की वृद्धि होगी, जिसका परिणाम दुःख के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता।

🔶 पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों का यह कथन किसी प्रकार भी गलत नहीं कहा जा सकता। निःसन्देह बाधाओं का यही क्रम है जिससे मनुष्य को दुःख का अनुभव करने के लिये विवश होना पड़ता है। किन्तु उनके इस कथन से जो यह ध्वनि निकलती है कि मनुष्य को दुःख होना ही स्थायी अनुभूति है अथवा सांसारिक स्थिति के अनुसार पीड़ा उसका प्रारब्ध भाग है—ठीक नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 8

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.8

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.9

👉 Buddha Derives Inspiration from a Bug


🔷 Buddha had not yet obtained self-realization. He was engaged in intense penance. His mind was restless. A thought crossed his mind, "Despite trying very hard, I have failed to attain the objective of self realization. Instead of wasting away all this time in penance, I should have enjoyed my princely life in the palace."

🔶  All of a sudden he saw a tiny bug trying to climb up a nearby tree. The bug tried again and again but would fall off. Still it would not give up. It tried ten times but failed. On the eleventh attempt it successfully climbed up the tree. It appeared as if this scene was enacted just for the guidance of Buddha. The self-belief in him woke up, and he continued his penance with great conviction and ultimately attained his objective of self realization. He then applied his wisdom for guiding the society on the virtuous path.

📖 From Pragya Puran

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 7)

🔶 मित्रो, तीसरा वाला प्रकाश का जो ध्यान हमने बताया है, वह अंतःकरण का प्रकाश है, विश्वासों का प्रकाश है, आस्थाओं का, निष्ठाओं का, करुणा का प्रकाश है। जो चारों और प्रेम के रूप में प्रकाशित होता है। हम प्रेम के रूप में भक्तियोग कहते हैं। भक्तियोग से क्या मतलब होता है? भक्तियोग का मतलब है-मोहब्बत। जिस तरह से हम व्यायामशाला में अभ्यास करते हैं और उससे अपने शरीर और कलाइयों को मजबूत बनाते हैं और फिर उसका हर जगह इस्तेमाल करते हैं। सामान उठाने में, कपड़े धोने में, बिस्तर उठाने में करते हैं। हर जगह काम में लाते हैं-किसको? जो व्यायामशाला में ताकत इकट्ठा की थी उसको। इसी तरीके है हम भगवान के साथ मोहब्बत शुरू करते हैं, प्यार शुरू करते हैं, भक्ति करते हैं।

🔷 भगवान की भक्ति के माध्यम से जो हम ताकत इकट्ठा करते हैं, उस मोहब्बत को हर जगह फैल जाना चाहिए। हम अपने शरीर को मोहब्बत करें ताकि इसको हम अस्त-व्यस्त न होने दें, नष्ट-भ्रष्ट न होने दें। हम अपने शरीर को प्यार करें ताकि वह नीरोग होकर के दीर्घजीवी बन सके। यह हमारा शरीर के प्रति प्यार है। यह भक्ति है शरीर के प्रति भगवान की। मन के प्रति हमारी भक्ति यह है कि हम पागलों के तरीके से अपने मन-मस्तिष्क को खराब न कर दें। यह देवमन्दिर है और इतना सुंदर मन्दिर है कि हमारे विचारों की क्षमता सूर्य की क्षमता के बराबर है। इसको हम असंतुष्टि न होने दें ।। हम अपने आप से प्यार करें। अपनी जीवात्मा से प्यार करें।
 
🔶 जीवात्मा ! जीवात्मा की तो हमने इतनी उपेक्षा की है कि यह बिचारी कराहती रहती है और यह पूछती रहती है कि दोस्त हमारा क्या होना है? बेटे हमारा क्या होना है? यह पूछते-पूछते वह बूढ़ी हो गई। बुढ़िया पूछती रहती है कि बेटा हमारा भी कुछ होना है क्या? और आप कहते रहते हैं कि अरे बुढ़िया तू तो मरने वाली? तेरा तो यही बद्रीनाथ है तू कहीं मत जा यहीं पड़ी रह। यह बुढ़िया जो है हमारी जीवात्मा है और यह ऐसी ही कसकती-कराहती रहती है। वह अंधी हो गई है, आँखों से दिखाई नहीं पड़ता जीवात्मा को। अपनी जीवात्मा से यदि हमें प्यार रहा होता तो बेटे वह जवान हो गई होती। जीवात्मा से मोहब्बत अगर हमें होती तो वह इतनी प्रचंड और प्रखर हो गई होती कि हम साक्षात भगवान के रूप में काम आते। पर हमारी जीवात्मा मर गई, क्योंकि हम उससे प्यार नहीं करते।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 15)

👉 गुरु-चरण व रज का माहात्म्य

🔶 दिन-महीने और साल बीतते गए। एक बार जन्म दिवस के अवसर पर माताजी से मिलना हुआ। प्रेमपूर्वक आशीष देते हुए माता जी ने पूछा- बोल, तुझे जन्मदिन के अवसर पर क्या चाहिए? उत्तर में मैने विनम्रता से कहा, माँ! यदि आप कुछ देना चाहती हैं, तो मुझे आप अपनी और श्री अरविन्द की चरण रज एवं आप दोनों का चरण जल दीजिए। इस भक्तिपूर्ण आग्रह को माताजी ने स्वीकार कर लिया। फिर तो हर वर्ष जन्मदिन के अवसर पर यह क्रम बन गया। बाद में चरण रज को सामान्य धूल में मिलाकर और चरण जल को गंगाजल में मिलाकर रखने की मेरी आदत बन गयी। बीतते वर्षों के साथ श्री अरविन्द ने शरीर छोड़ दिया। माताजी भी नहीं रहीं; परन्तु जिस किसी तरह मेरे पास उनकी चरण रज एवं चरण जल विद्यमान था।
  
🔷 गंगाधरण जी ने बताया कि अपनी पूजा की चौकी पर मैं इन दोनों दुर्लभ वस्तुओं को रखता था। इन्हीं के पास पूजा वेदी पर श्री अरविन्द के दोनों महाग्रन्थ ‘लाइफ डिवाइन’ एवं ‘सावित्री’ भी सजा कर रखे थे। श्री अरविन्द एवं माँ के महानिर्वाण के बाद इन दिव्य वस्तुओं की पूजा मेरे जीवन का आधार बन गयी। पढ़ा-लिखा न होने के कारण और करता भी क्या? लाइफ डिवाइन एवं सावित्री को समझ सकने लायक बुद्धि भी तो नहीं थी मेरी। सद्गुरु चरण रज एवं सद्गुरु चरण जल के साथ इनकी पूजा मेरा नित्य का क्रम था। साथ ही आश्रम के कामों को भी गुरुभक्ति समझ कर करता था।
  
🔶 एक दिन अपने सद्गुरु के बारे में सोचते हुए गंगाधरण जी का हृदय भर आया। वह सोचने लगे कि सत्रह साल की आयु में आये थे और अस्सी से ज्यादा उम्र होने जा रही है; परन्तु अभी तक कोई विशेष अनुभूति नहीं हुई। यही सोच कर वह पूजा स्थली पर गुरु चरण रज एवं चरण की पूजा करते हुए प्रार्थना करने लगे- हे अन्तर्यामी गुरुदेव, हे जगन्माता! मैं तो आपका अज्ञानी बालक हूँ, पढ़ना-लिखना भी ढंग से नहीं जानता। जो आपने अपना दिव्य ज्ञान लिखा है, उसे मैं पढ़ भी नहीं सकता। हे सर्वसमर्थ प्रभु! मुझे तो बस आपकी कृपा का भरोसा है, उनकी यह भावभरी प्रार्थना अनवरत चलती रही। आँखों से आँसू झरते रहे।

🔷 पता नहीं कितनी देर तक यह क्रम चला। उन्हें होश तो तब आया, जब स्वयं श्री अरविन्द एवं माताजी अपने अतिमानसिक शरीर से उनके पास आए। अतिमानसिक प्रकाश से उनका कण-कण भर गया। श्री अरविन्द ने कृपा करके उन्हें अतिमानसिक जगत् की दिव्य अनुभूतियाँ प्रदान कीं। अपने इस संस्मरण का उपसंहार करते हुए गंगाधरण ने कहा- मुझे तो सब कुछ गुरुचरणों की रज एवं जल ने दे दिया। यह सत्य कथा हमारे-आपके जीवन की भी सत्यकथा बन सकती है। सद्गुरु चरणों की महिमा है ही कुछ ऐसी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 27

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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