सोमवार, 25 दिसंबर 2017

👉 देखने का नजरिया

🔷 एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ नदी में स्नान कर रहे थे। तभी एक राहगीर वहाँ से गुजरा तो संत को नदी में नहाते देख वो उनसे कुछ पूछने के लिए रुक गया। वो संत से पूछने लगा ” महात्मन मैं अभी अभी इस जगह पर आया हूँ और नया होने के कारण मुझे इस जगह के बारे कोई विशेष जानकारी नहीं है। कृपा करके आप मुझे एक बात बताईये कि यहाँ रहने वाले लोग कैसे है?

🔶 इस पर महात्मा ने उस व्यक्ति से कहा कि ” भाई में तुम्हारे सवाल का जवाब बाद में दूँगा। पहले तुम मुझे ये बताओ कि तुम जिस जगह से आये वो वहाँ के लोग कैसे है?”

🔷 इस पर उस आदमी ने कहा “उनके बारे में क्या कहूँ महाराज वहाँ तो एक से एक कपटी और दुष्ट लोग रहते है इसलिए तो उन्हें छोड़कर यहाँ बसेरा करने के लिए आया हूँ।” महात्मा ने जवाब दिया बंधू ” तुम्हे इस गाँव में भी वैसे ही लोग मिलेंगे कपटी, दुष्ट और बुरे।” उनका जवाब सुनकर वह आदमी आगे बढ़ गया।

🔶 थोड़ी देर बाद एक और राहगीर उसी मार्ग से गुजरता है और महात्मा से प्रणाम करने के बाद कहता है ” महात्मा जी मैं इस गाँव में नया हूँ और परदेश से आया हूँ और इस गाँव में बसने की इच्छा रखता हूँ लेकिन मुझे यहाँ की कोई खास जानकारी नहीं है इसलिए आप मुझे बता सकते है ये जगह कैसी है और यहाँ रहने वाले लोग कैसे है?”

🔷 महात्मा ने इससे भी वही प्रश्न किया और कहा कि ” मैं तुम्हारे सवाल का जवाब बाद में दूँगा। पहले तुम मुझे ये बताओ कि तुम जिस देश से भी आये हो वहाँ रहने वाले लोग कैसे है?”

🔶 उस व्यक्ति ने महात्मा से कहा ” गुरूजी जहाँ से मैं आया हूँ वहाँ सभी सभ्य, सुलझे हुए और नेकदिल इन्सान रहते है। मेरा वहाँ से कही और जाने का कोई मन नहीं था लेकिन व्यापार के सिलसिले में इस और आया हूँ और यहाँ की आबोहवा भी मुझे भा गयी है इसलिए मैंने आपसे ये सवाल पूछा था।”
इस पर महात्मा ने उससे कहा बंधू ” तुम्हे यहाँ भी नेकदिल और भले इन्सान मिलेंगे।” वह राहगीर भी उन्हें प्रणाम करके आगे बढ़ गया।

🔷 शिष्य ये सब देख रहे थे तो उन्होंने ने उस राहगीर के जाते ही पूछा – गुरूजी! ये क्या अपने दोनों राहगीरों को अलग अलग जवाब दिए। हमे कुछ भी समझ नहीं आया।

🔶 तब महात्मा मुस्कुराकर बोले – वत्स आमतौर पर हम आपने आस पास की चीजों को जैसे देखते है वो वैसी होती नहीं है। हम अपने अनुसार अपनी दृष्टि (point of view) से चीजों को जिस तरह से देखते है हमें सभी चीजे उसी तरह से दिखती हैं। अगर हम अच्छाई देखना चाहें तो हमे अच्छे लोग मिल जायेंगे और अगर हम बुराई देखना चाहें तो हमे बुरे लोग ही मिलेंगे। सब देखने के नजरिये पर निर्भर करता है।

🔷 मित्रों, ये बात वास्तव में सही है। हम खुद जैसे हैं या जिस नज़रिये से हम दूसरों को देखते है दूसरे लोग भी हमें वैसे ही दिखाई देते है। नकारात्मक सोच वाले हमेशा नकारात्मकता की ही बाते करेंगे क्योंकि वो हर एक चीज में नकारात्मकता ही देखते है। सकारात्मक सोच वाले हमेशा सकारात्मकता की ही बाते करेंगे क्योंकि वो हर एक चीज में सकारात्मकता ही देखते है। इसलिए आप अपने आप को बदलिये और अच्छे बन जाइये। आपको हर एक चीज अच्छी दिखाई देगी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 26 Dec 2017


👉 दुःखी संसार में भी सुखी रहा जा सकता है (भाग 3)

🔷 लालसायें जीवन में दुःख का बहुत बड़ा कारण बनती हैं। लालसाओं की पूर्ति सम्भव नहीं और न उनका कोई अन्त ही होता है। एक के बाद एक नित्य नई लालसायें बढ़ती ही जाती हैं। जिन लालसाओं की पूर्ति मनुष्य अपने जीवन में नहीं कर पाता उनकी पूर्ति वह अपनी सन्तान के जीवन में देखना चाहता है। इसके कारण वह सन्तान की कामना से व्यग्र हो उठता है। जिनके सन्तान नहीं होती, वे बड़े ही दुःखी और मलिन रहा करते हैं। एक इसी एषणा के कारण उनके अन्य सारे सुख, सारे साधन, यहां तक कि सारा जीवन ही निस्सार हो जाता है। ऐसे एषणातप्य व्यक्ति का सारा जीवन शोक-संताप से भरा रहता है। अस्तु, सुखी जीवन जीने के लिए लालसाओं और तत्जन्य एषणाओं को त्याग ही देना चाहिए।

🔶 निष्कामना सुखी जीवन का एक उत्तम उपाय है। जितना-जितना मनुष्य लालसाओं के चक्र से बचता जायेगा उतना-उतना ही उसका सुख बढ़ता जायेगा। निःसन्तान व्यक्ति को इस सत्य पर विचार करना ही चाहिए कि कुल का नाम सन्तान से चलेगा ही यह निश्चय नहीं। सन्तान कुल का नाम डुबोने वाली भी होती है। मनुष्य का अपना नाम सन्तान से नहीं अपने सत्कर्मों से चलता है। सन्तान गृहस्थियों के लिये अनेक चिन्ताओं का कारण बनती है। बच्चों के पालन-पोषण और उनके जीवन विकास के लिए न जाने कितने प्रलोभनों और दुर्बलताओं के जाल में फंसना पड़ता है। इतना ही क्यों उद्दण्ड, दुष्ट और धृष्ट सन्तान माता-पिता का जीवन बरबाद कर देते हैं। तब उनसे अपनी लालसाओं की पूर्ति की आशा कैसी की जा सकती।

🔷 निःसन्तान गृहस्थों को चाहिए कि वे अपनी इस एषणा को परास्त करने के लिए किन्हीं दूसरों के बच्चे पाला करें, पढ़ाया-लिखाया करें, उन्हें लाड़-दुलार देकर अपना सन्तोष प्राप्त करें। अपने-पराये का भाव वास्तविक भाव नहीं है। यह मनुष्य का अहंकार जन्य भ्रम मात्र ही है। जिसे प्यार दिया जायेगा, जिसको अपना समझकर पालन किया जायेगा, वह निश्चय ही अपना बन जायेगा। किसी गरीब का प्यारा सा बच्चा पाल लेने से जीवन का एक अभाव तो दूर हो ही जायेगा, साथ ही पुण्य-परमार्थ का भी फल मिलेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1969 पृष्ठ 33
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/April/v1.33

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.5

👉 Amrit Chintan 26 Dec

🔶 Happiness and pleasure of any type is never in materialize but it is in your love and feeling of one with him when we put our love or liking for anyone or any material, we stare to love that. So if we want to enjoy this world fully we will have to extend our love for others ignoring any selfishness or greed for any thing.

🔷 Twenty first century a era of bright future for all can only bring that heavenly atmosphere if people put on enough courage to face the evil and adversities we are facing in the society of today.

🔶 The human bio-electricity is miniature sample form austerity of the power of mind and some known is ojus. Brahmvarchas and Atm-Bal. If man has that internal force then all physical strength or material possession will fall short in comparison of that.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 धर्मतंत्र का दुरुपयोग रुके (भाग 2)

🔷 मित्रो। उससे भी एक और बड़ा सामाजिक कारण यह था कि प्रत्येक गाँव और गली मोहल्ले के लिए ऐसी आवश्यकता अनुभव की गई कि इन स्थानों पर सत्प्रवृत्तियाँ एव सद्भावनाएँ फैलाने के लिए, रचनात्मक कार्यों को दिशा देने के लिए ऐसे स्थान होने ही चाहिए, जहाँ अनेकानेक प्रकार की प्रवृत्तियों का संचालन किया जा सके। उदाहरण के लिए कथा के द्वारा लोक शिक्षण जितनी अच्छी तरह किया जा सकता है, उतना और किसी तरीके से नहीं। इसमें मनोरंजन भी है, इतिहास भी है और आनंद भी है। साथ-ही-साथ इसमें ऊँचे विचार एवं शिक्षाएँ भी जुड़ी हुई है। इस तरह से कथाएँ कहकर के जनता को उत्साह और मनोरंजन के साथ सन्मार्गगामी बनाया जा सकता है।

🔶 प्राचीनकाल में मंदिरों में कथाएँ होती थीं, संगीत का शिक्षण होता था और वह कीर्तन के माध्यमों से लोकगायन और लोकमंगल की शिक्षाओं के केंद्र बने रहते थे। मंदिरों के साथ पाठशालाएँ जुड़ी रहती थीं, पुस्तकालय जुड़े रहते थे। मंदिरों में सत्संग की व्यवस्था होती थी। मंदिरों के आस-पास व्यायामशालाओं की भी व्यवस्था थी। कहने का अर्थ यह है कि असंख्य रचनात्मक प्रवृत्तियों का एक ही केंद्र उस जमाने में था, जिसको हम कहते हैं-मंदिर। उन दिनों मंदिरों में जो कार्यकर्ता काम करते थे, वे बड़े प्रभावी, लोकसेवी होते थे। लोकसेवियों को जीविका की भी आवश्यकता है। लोकसेवी काम करे और खाने का प्रबंध न हो सके, तो काम कैसे चलेगा? इसी तरह यदि खाने का प्रबंध और गुजारे की व्यवस्था किसी को वेतन के रूप में लोग दें, तो लेने वाले का भी असम्मान होता है और देने वाले को अहंकार पैदा होता है।

🔷 इसलिए मित्रो ! विचार ये किया गया कि उस गाँव में काम करने वाले लोकसेवियों को गुजारा निर्वाह करने की व्यवस्था के लिए भगवान का भोग लगाया जाए। थाली भरकर सवेरे का भोग लगा दिया और थाली भरकर शाम को भोग लगा दिया। एक आदमी के गुजारे का प्रबंध हो गया। दोनों वक्त का भोजन मिल गया। लोगों ने यह समझा कि हमने भगवान को खाना खिलाया और सेवा करने वाले व्यक्ति ने समझा कि हमारे गुजारे का प्रबंध हो गया। असम्मान भी नहीं हुआ और किसी के ऊपर प्रत्यक्ष रूप से दबाव भी नहीं पड़ा। इस तरीके से मंदिरों में भगवान के जो खाने-पीने की व्यवस्था थी, वास्तव में वह वहाँ के कार्यकर्ता के लिए भोजन की व्यवस्था थी। लोग भगवान के पास दक्षिणा चढ़ाया करते थे, पैसा चढ़ाया करते थे। वे चढ़ावे की चीजें सिर्फ एक ही काम आती थीं कि उस क्षेत्र में सेवाकार्य करने वाले लोगों के गुजारे तथा मंदिर की देख−भाल का प्रबंध इस तरीके से हो जाता था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

रविवार, 24 दिसंबर 2017

👉 अंधी का बेटा

🔷 एक विधवा अंधी औरत का एक बेटा था, जिसे वह बहुत प्यार करती थी. वह चाहती थी कि पढ़-लिखकर उसका बेटा एक बड़ा आदमी बने. इसलिए गरीबी के बाद भी उसने कस्बे के सबसे अच्छे स्कूल में उसका दाखिला करवाया।

🔶 लड़का पढ़ाई में तो अच्छा था, लेकिन एक बात से हमेशा परेशान रहा करता था. उसे स्कूल में दूसरे बच्चे ‘अंधी का बेटा’ कहकर चिढ़ाते थे. वह जहाँ भी दिख जाता, सब उसे ‘देखो अंधी का बेटा आ गया’ कहकर चिढ़ाने लगते।

🔷 इसका उस पर बहुत विपरीत असर हुआ और उसके मन में अपनी माँ के प्रति शर्म की भावना घर  करने लगी. धीरे-धीरे ये शर्म चिढ़ में बदल गई. वह अपनी माँ के साथ कहीं भी आने-जाने से कतराने लगा।

🔶 समय बीता और लड़का पढ़-लिखकर एक अच्छी नौकरी करने लगा. उसकी नौकरी शहर में थी. वह अपनी माँ को कस्बे में ही छोड़ गया. उसने अपनी माँ से वादा तो किया कि शहर में रहने की व्यवस्था करने के बाद वह उसे भी अपने साथ ले जायेगा. लेकिन उसने अपना वादा नहीं निभाया. शहर जाने के बाद उसने अपनी माँ से कोई संपर्क नहीं किया।

🔷 कुछ महीनों तक अंधी औरत अपने बेटे का इंतज़ार करती रही. लेकिन जब वह नहीं आया, तो एक दिन वह उससे मिलने शहर पहुँच गई. इधर-उधर पूछते-पूछते किसी तरह वह अपने बेटे के घर पहुँची. बाहर गार्ड खड़ा हुआ था. उसने गार्ड से कहा कि उसे उसके मालिक से मिलना है. गार्ड ने अंदर जाकर जब अपने मालिक को बताया, तो जवाब मिला – “बाहर जाकर बोल दो कि मैं अभी घर पर नहीं हूँ.” गार्ड ने वैसा ही किया. अंधी औरत दु:खी होकर वहाँ से चली गई।

🔶 कुछ देर बाद लड़का अपनी कार में ऑफिस जाने के लिए निकला. रास्ते में उसने देखा कि एक जगह पर भीड़ लगी हुई है. भीड़ का कारण जानने के लिए जब वह कार से उतरा, तो बीच रास्ते में अपनी बूढ़ी माँ को मरा हुआ पाया।

🔷 उसकी माँ की लाश की मुठ्ठी में कुछ था. मुठ्ठी खोलने पर उसने देखा कि उसमें एक ख़त है. वह ख़त खोलकर पढ़ने लगा।

🔶 बेटा, बहुत खुश हूँ कि तू बड़ा आदमी बन गया है. तुझसे मिलने का मन किया, तो शहर चली आई. इसके लिये मुझे माफ़ करना. क्या करूं तेरी बहुत याद आ रही थी. सालों से मेरी इच्छा थी कि एक दिन तुझे बड़ा आदमी बना हुआ देखूं. मेरा सपना तो पूरा हुआ, लेकिन तुझे मैं देख नहीं सकती. काश कि बचपन में तेरे साथ वो घटना नहीं हुई होती. काश तेरी आँखों में सरिया न घुसा होता और मैंने तुझे अपनी आँखें न दी होती, तो आज मैं तुझे इस ओहदे पर देख पाती।

🔷 तेरी बदकिस्मत माँ

🔶 ख़त पढ़ने के बाद लड़का फूट-फूट कर रोने लगा. वह आत्मग्लानि से भर उठा. जिस माँ के अंधी होने के कारण वह उससे दूर हो गया था, उसने अपनी ही ऑंखें उसके लिए ही बलिदान कर दी थी. वह ताउम्र खुद को माफ़ नहीं कर सका।

🔷 दोस्तों, माता-पिता का प्रेम असीम है. ये वो अनमोल प्रेम है, जिसकी कोई कीमत नहीं. वे हमारे सुख लिए अपना सर्वस्य न्यौछावर कर देते हैं. हमें सदा उनका सम्मान और उनसे प्रेम करना चाहिए।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 25 Dec 2017


👉 दुःखी संसार में भी सुखी रहा जा सकता है (भाग 2)

🔷 पर क्या धन प्राप्त करके लोग सुखी हो जाते हैं? यदि ऐसा होता तो हर धनवान को अविवाद रूप से सुखी होना चाहिये और हर निर्धन को दुःखी। किन्तु ऐसा होता नहीं। बहुत से धनवान दुःखी दिखलाई देते हैं और अनेक निर्धन सुखी देखे जा सकते हैं। क्या धन और क्या स्वास्थ्य, स्त्री-बच्चे, मान-प्रतिष्ठा, सुख के जो भी साधन माने जाते हैं, सुख पाने के उपाय नहीं हैं। सुख पाने का उपाय कुछ और ही है। वह है जीवन जीने की एक पद्धति।

🔶 संसार में सुख जीवन व्यतीत करने के लिये कुछ बातों को ग्रहण करना होगा त्याज्य बातों में सबसे पहली बात है फलासक्ति। अपने कर्म के फलों में आसक्ति रखने से सफलता-असफलता, हानि-लाभ, आशा-निराशा के द्वन्द्व भाव में पड़ना होगा, जिसका परिणाम असुख ही होता है। भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा है—‘‘कर्म करो पर फल की आशा मत करो। सुख पाने में नहीं त्याग में है। सुख, कर्म-फल के लिये दीवाने रहने, लालायित रहने में नहीं है, बल्कि कर्म-शील होकर सफलता, असफलता की ओर उदासीन रहकर कर्त्तव्य करने में है। आसक्ति को त्याग कर दूसरों के लिये जिये। जो लोग संकीर्ण स्वार्थ और लोभ को छोड़कर दूसरों के लिये जीते हैं, वही लोग जीवन का सच्चा आनन्द उठाते हैं। स्वार्थी, संकीर्ण और लोभी व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता।’’

🔷 निःसन्देह फलासक्ति का त्याग और अनासक्ति का ग्रहण सुखी जीवन व्यतीत करने का बहुत बड़ा उपाय है। इसीलिये अनासक्त व्यक्ति को योगी कहकर सम्बोधित किया जाता है। अनासक्ति भाव के कारण कर्मों में आई दुःखदायी असफलता मनुष्य को प्रभावित नहीं कर पाती और न सफलता के लिये उसमें दुःखद स्पृहा का समावेश होता है। वह तो असफलता-सफलता में तटस्थ भाव से स्थित समत्व का आनन्द लिया करता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1969 पृष्ठ 32
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/April/v1.32

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.5

👉 Amrit Chintan 25 Dec

🔶 When we indulge in same sinful act there is feeling of restlessness or feel palpitation, dryness of mouth and some sort of resistance. One become conscious I may not be caught is seen. There is some one inside every human being who holds this check and curses. This unit of your consciousness is your ‘Sadguru’ of your self.

🔷 The highest component of character is Love, high emotions and selflessness. If that type of feeling and emotions prevail in family. It will create a heavenly atmosphere there. Eyes amidst economical distress will not disturb the harmony among them. It is for that the formula of God. Religion and his discipline have been imposed by Rishis of our culture.

🔶 This is wrong that any one can please God by enchanting name of Mantra or any form of ritual of worship. Why he should get pleased by repeating his name. What he means is Aradhna i. e. service to downtrodden people of the society. The whole world is a lager family of God and you are a member of that family. Hence you care and share their pains.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 धर्मतंत्र का दुरुपयोग रुके (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलिए-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो, भाइयो!

🔷 भगवान के मंदिर जगह-जगह बनाए जाएँ, यह विचार उस समय उत्पन्न हुआ, जब भगवान की विचारणा को जनमानस में स्थापित करने, भगवान की प्रेरणाओं को सर्वत्र प्रकाशित करने की आवश्यकता अनुभव की गई। भगवान सब जगह विराजमान हैं। पेड़-पत्ते से लेकर फूल-पौधों तक और मनुष्य के हृदय से लेकर इस आसमान तक, कोई भी स्थान ऐसा नहीं है, जहाँ वे विद्यमान न हों। फिर भगवान को एक स्थान पर बिठाने और खाना खिलाने की क्या जरूरत पड़ गई? यह विचारणीय प्रश्न है। भगवान तो बादलों को बरसाते हैं। जरूरत पड़े, तो जहाँ कहीं वर्षा हुआ करे, वहाँ जा बैठें और फुहारों का आनंद ले लें। नहाने की उनको क्या दिक्कत पड़ेगी? नदियाँ उनकी बहती हैं। जब कभी स्नान करना पड़े, घंटों नहा सकते हैं। उनको कोई रोकने वाला है क्या? फिर भगवान को स्नान कराने की क्या जरूरत थी?

🔶 मित्रो! भगवान तो एक विचारणा है, भावना है, एक चेतना है। उनको एक जगह बिठाया जाए, ये कैसे मुमकिन हो सकता है? भगवान की वृत्तियों और प्रवृत्तियों को हम लोग भूल गए हैं। उनको स्मरण दिलाने के लिए ही मंदिर, चेतना केंद्र बनाए गए हैं, जिनके माध्यम से भगवान की वृत्तियों को सर्वसाधारण के मनों तक पहुँचाना संभव हो सकेगा। गाँवों में देवालय इसीलिए बनाए गए हैं कि जो लोग भगवान को भूल गए हैं, वे इस माध्यम से अपने जीवन लक्ष्य को पहचानें। लोग भगवान का नाम तो जानते हैं कि भगवान कृष्ण होते हैं, भगवान राम होते हैं, हनुमान होते हैं, लेकिन सही बात यह है कि भगवान के स्वरूप, उनके आदेश, उनकी शिक्षाओं और मानव जीवन से उनका संबंध, इन सबको सौ फीसदी लोग भूल गए हैं। यदि वे भूले न होते तो उनने अपने जीवन लक्ष्य को याद रखा होता और यह स्मरण रखा होता कि भगवान ने इंसान को दुनिया में किसलिए भेजा है? उसके ऊपर क्या जिम्मेदारियाँ सौंपी हैं? भगवान ने मनुष्य से क्या उम्मीदें की हैं?

🔷 मित्रो! भगवान तो हृदय में, घट-घट में समाया हुआ है और वह मनुष्य के द्वारा अच्छी वृत्तियों को पूरा किया जाना देखना चाहता है। अगर ये बातें मनुष्य को याद नहीं हैं, उसे केवल किसी मंदिर की मूर्ति की शक्ल भर याद रहती है, तो कैसे कहा जाए कि इस आदमी को भगवान याद है और वह भगवान को भूला नहीं है? साथियो! लोग भगवान को भूलते जा रहे थे और भूल रहे हैं। इसीलिए उनको स्मरण दिलाए रखने के लिए मंदिरों की स्थापना की गई, ताकि जब कभी भी आदमी उधर से निकले, तो प्रणाम करे, दंडवत करे और सुबह शाम उनका दर्शन करे, ताकि उसे याद आए कि कोई भगवान नाम की सत्ता भी है और वह मनुष्य के जीवन से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। मनुष्य जीवन के विकास के लिए, जीवन में सुख शांति की स्थापना करने के लिए भगवान की सहायता और भगवान के सहयोग की नितांत आवश्यकता है। यह सिद्धांत और आवश्यकता मनुष्य को अनुभव होती रहे, इसलिए हर जगह मंदिर बनाए गए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 सत्य और सिद्धांत

🔶 सुकरात को जब मृत्यु दण्ड की सजा सुनाया गया, तो उसके कुछ विश्वस्त मित्रों ने उन्हें बंदी ग्रह से निकाल ले जाने का निश्चय किया। इसके लिए सारी योजना गुप्त रूप से तैयार का ली गई, किन्तु जब इसके बारे में उनको बताया गया, तो उन्होंने वैसा करने से इन्कार कर दिया। बहुत पूछने पर इतनी ही कहा, कि यदि मैं तुम्हारे साथ भाग गया तो सारी दुनिया मुझे यही कह कर कोसेगी कि सुकरात सचमुच देशद्रोही था ओर यदि मैं सत्य की खातिर बलिदान हो गया, तो उसके सत्य अनेक सत्य को एक सुकरात अगणित सुकरात को आने वाले समय में पैदा कर देगा, फिर कोई यह लाँछन नहीं लगा सकेगा कि सुकरात राजद्रोही था, अतः मेरा उत्सर्ग हो जाने दो।

🔷 इतना कह कर उन्होंने हँसते हँसते विषपान कर लिया। असत्य पर सदा सत्य और सिद्धांत की विजय होती है।

👉 लालच बुरी बला

🔷 एक व्यक्ति ने एक जिन्न साधा और वशवर्ती कर लिया। छोड़ने की शर्त यह तय हुई, कि जिस दिन उसका सुखा कुंआ भर जायेगा, उसी क्षण उसे मुक्त कर दिया जायेगा। जिन्न ने अपनी शक्ति द्वारा जल्दी ही भर दिया।

🔶 व्यक्ति लालची था उसने हाथ आये अवसर का भरपूर लाभ उठाना चाहा, कहा हमारा कोठार अभी खाली है, जब अन्न से वह भर जायेगा तब छोड़ देंगे।

🔷 जिन्न अड़ गया, कहा बात सिर्फ कुएँ की थी, सो शर्त के अनुसार उसे पूरी कर दी। अब मैं स्वतंत्र हूँ, पर व्यक्ति नहीं माना, कहा मनोरथ पूर्ति से पहले मैं तुम्हें छोड़ूँगा नहीं।

🔶 जिन्न बोला मैं पहले भी स्वतंत्र था, अब भी स्वतंत्र हूँ। तुमने कभी अपने काबू में किया ही नहीं। वह तो मैं था कि तंत्र की गरिमा रखने के लिए स्वयं को तुम्हारे सुपुर्द कर दिया, पर अब तुम लोभ वश मेरा दुरुपयोग करना चाहते हो, अतः इसका दण्ड भी तुम्हें मिलकर रहेगा।

🔷 इतना कहकर उसने ताँत्रिक का गला दबोच लिया और तत्काल यमलोक पहुँचा दिया। जाते जाते जिन्न ने एक व्यंग भरा अट्टहास किया और उसकी आत्मा से कहा “ लालच बुरी बला है।

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

👉 भुल भी जाना और भुलना भी मत

🔷 ऋषिवर के आश्रम मे एक दिन दुर नगर से एक राजा आये ऋषिवर को प्रणाम करने के बाद वो अपने मुख से ऋषिवर के सामने अपने किये गये शुभ-कर्मों का बखान करने लगे!

🔶 राजा - हॆ देव मैंने अपनी जिन्दगी मे कई धर्मशालाओ का निर्माण करवाया कई कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाया और कई निर्धन लोगो को खुब दानदक्षिणा दी! हॆ देव मेरे इन सभी सतकर्मों का कितना फल मिलेगा!

🔷 ऋषिवर - हॆ वत्स पर उन सब को ये कैसे पता की ये विवाह आपने करवाये और किसी को कैसे पता चलेगा की अमुक-अमुक निर्माण आपने करवाये है उन बच्चो को कैसे पता चलेगा की उनकी शिक्षा-दीक्षा आपने करवाई है?

🔶 राजा - हॆ देव ये तो बहुत ही आसान है क्योंकि मैंने जितने भी निर्माण करवाये उन सभी पर मैंने बड़े बड़े अक्षरों मे अपना नाम लिखवाया है की अमुक निर्माण मैंने करवाया है जैसै किसी मन्दिर मे पंखा लगवाया तो मैंने उस पर अपना नाम लिखवाया की ये पंखा मेरी तरफ से सप्रेम भेंट! और जिन कन्याओं का विवाह करवाया जिनको पढाया अथवा जिसकी भी किसी भी प्रकार की कोई मदद की मैं उन सबको बराबर याद दिलाता रहता हुं की मैंने तुम्हारे लिये किया है!

🔷 हॆ देव मैंने जो इतने महान कर्म किये है उसका कितना फल मिलेगा! और वो कितना हुआ अर्थात किसके बराबर है?

🔶 ऋषिवर - इसका उत्तर आपको तब मिलेगा जब आप पहले ये ताम्बे का लोटा बीहड़ मे बड़ी दुर एक नदी बह रही है वहाँ से इसे बिल्कुल साफ करके भरकर लाना और ध्यान रखना की थोड़ा भी खाली मत लाना नही तो सारी मेहनत व्यर्थ चली जायेगी! कुछ दिनो बाद राजा आया!

🔷 ऋषिवर - लाओ वत्स वो लोटा इधर लाओ

🔶 राजा - पर इसमे जल नही है देव!

🔷 ऋषिवर - पर क्यों ? और अपनी यात्रा का वर्णन बताओ!

🔶 राजा - मैं उस बहती हुई नदी तक तो सहजता से पहुँच गया और जल भी पात्र मे भर लिया पर जब वापिस रवाना हुआ तो राह मे बीहड़ मे अनेक रास्तों की वजह से मैं भटक गया जोरों से भुख लगने लगी चलते चलते किसी गाँव मे पहुँचा वहाँ कोई विवाह का समारोह हो रहा था आश्चर्य की बात की परिवार तो गरीब था पर पता नही न जाने किसने उसका विवाह करवाया मैंने वहाँ भोजन किया और फिर रवाना हुआ!

🔷 ऋषिवर - क्या आपने पता किया की वो विवाह कौन करवा रहा था?

🔶 राजा - हॆ देव बहुत कोशिश की पर मैं सफल न हो पाया की विवाह कौन करवा रहा था शायद कोई परदे के पिछे था!

🔷 फिर मैं रवाना हुआ तो पानी की प्यास सताने लगी जंगल मे एक जगह एक कुआँ था और एक डोर लोटा रखा हुआ था पानी की व्यवस्था मिल गई और वहाँ पानी पिया फिर मैंने सोचा इस बीहड़ मे ये व्यवस्था किसने की पर कुछ भी पता न चला फिर खुब चला और फिर पानी की प्यास सताने लगी चारों तरफ देखा पर पानी कही न मिला पानी के अभाव मे मैं दम तोड़ने लगा फिर मैं नीचे गिरा और कलश का लगभग आधा पानी व्यर्थ बह गया आधा पानी बचा फिर मैंने सोचा की जिन्दगी रही तो फिर आगे कुछ करेंगे पहले ये पानी पी लो! और वो बचा हुआ आधा पानी भी मैं पी गया!

🔶 ऋषिवर - हॆ राजन जिस तरह से इतनी मेहनत के बावजूद भी तुम खाली हाथ लोटे हो आपके प्रश्न का यही उत्तर है!

🔷 राजा - हॆ देव मैं कुछ समझा नही

🔶 ऋषिवर - ध्यान से सुनना राजन और उस पर गहरा चिन्तन भी करना दान है महान पर कब?

🔷 जब दान देकर भुला दिया जाता है और जो दान गुप्त हो वही दान सात्विक कर्म है पर जो दान गिनाया और दिखाया जाये वो राजसिक कर्म है और राजसीक दान का आधा पुण्य प्रदर्शन मे चला जाता है और जिसे बार-बार गिनाया जाये और मन मे ये भाव आये की ये मैंने तुम्हे दिया, ये भवन मैंने बनवाया है, मैंने तुम्हे पढाया है, अमुक निर्माण मैंने किया है, वो तामसिक कर्म है और ऐसे तामसिक दान का सारा पुण्य व्यर्थता मे चला जाता है!

🔶 सात्विक का एक आना राजसीक के लाख आनों से और तामसिक के करोड़ों आनों से ज्यादा श्रेष्ठ और महान है! दान और सेवा का प्रदर्शन मत करो दान और सेवा जितनी गुप्त होगी उतना ही ज्यादा अच्छा होगा!

🔷 सेवा करके भुल जाओ दान ऐसे दो की दायाँ हाथ दे तो बायें हाथ को भी पता न चले की दायें हाथ ने क्या दिया, और मत तो उसे गिनाना और मत उसे मन मे याद रखना नही तो किया न किया सब व्यर्थ हो जायेगा!

🔶 सबसे अच्छा तरीका जो भी करो उसे परमपिता परमेश्वर को समर्पित कर दो! अरे आप दिखावे के लिये कर रहे हो या उस परमतत्व के लिये? आपने किसी और के लिये क्या किया उसे भुल जाओ पर किसी और ने आपके लिये क्या किया उसे कभी मत भुलना!

🔷 राजा - हॆ नाथ अब तक मैं राजसीक और तामसिकता के मद मे अंधा होकर चल रहा था पर आज आपने मेरी आँखे खोल दी आज के बाद प्रभु मुझसे जो भी करवायेंगे वो सब गुप्त रखा जायेगा और सात्विकता से इस जीवन को चलाया जायेगा!

🔶 ऋषिवर - हाँ वत्स हमेशा याद रखना की जो नही है बस वही है और जो है वो कही नही है अर्थात प्रदर्शन से बचना और गोपनीय दान और गोपनीयता का अपना एक अलग ही स्थान है!

🔷 और सेवा करके भुल जाना पर सेवा लेके मत भुलना!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 24 Dec 2017


👉 दुःखी संसार में भी सुखी रहा जा सकता है (भाग 1)

🔷 गुरु नानक ने कहा है—‘‘नानक दुखिया सब संसार।’’ इसी प्रकार एक विचारक ने सुख की परिभाषा करते हुए कहा है—‘‘इस सृष्टि में दुःख ही व्याप्त है। दुःख के अभाव को सुख कहना उचित होगा।’’

🔶 इन दोनों कथनों से स्पष्ट है कि संसार में दुःखों की प्रधानता है। संसार का मूल भाव दुःख ही है। सुख स्वाभाविक नहीं है। यह बात बहुत अंशों तक सत्य होते हुए भी अक्षरशः सत्य नहीं है। क्योंकि यदि यह इसी प्रकार अक्षरशः सत्य होती तो संसार में किसी का जीना असम्भव हो जाता। संसार में लोग जीते हैं, जीना चाहते हैं। लोगों में उत्साहपूर्वक जीने की इच्छा है। इसका अर्थ है कि संसार में सुख का तत्त्व मौजूद है। यहां केवल दुःख ही दुःख होता तो कोई भी इस प्रकार जीने की इच्छा नहीं रखते। तथापि नानक जैसी महान् आत्माओं का कथन झूठा नहीं माना जा सकता। उसमें सत्य का एक बड़ा अंश है। संसार में दुःखी लोगों की ही बहुतायत है। सुख, स्वास्थ्य, धन-दौलत, यश-मान सभी कुछ होते हुए भी अधिकांश व्यक्ति दुःखी ही देखे जाते हैं। कोई विरले व्यक्ति ही अपनी परिस्थितियों में सुखी अथवा सन्तुष्ट दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को देखकर ही नानक ने यह भाव व्यक्त किया है कि—‘नानक दुखिया सब संसार।’

🔷 सांसारिक दृष्टि से यह बात सर्वथा सत्य है कि यहां दुःख का भाव अधिक स्वाभाविक है, वह सहज रूप प्राप्त होता रहता है। किन्तु सुख पाने के लिए उपाय करना होता है। वह यों ही अनायास प्राप्त नहीं हो सकता। धन को सुख का प्रधान साधन माना जाता है। इस साधन की उपलब्धि के लिए लोग कठोर परिश्रम करते हैं उद्योग-धन्धे, कार-रोजगार, खेती-बाड़ी, दुकान, हाट, नौकरी-चाकरी आदि न जाने कितने काम किया करते हैं। बहुत बार तो अनेक लोग इसके लिए अनैतिक और अनुचित कर्म करने की भूल भी कर बैठते हैं। इन साधनों एवं उपायों में भिन्नता भले ही है पर मूल उद्देश्य सबका एक ही है—सुख के लिये प्राप्त करना।

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✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1969 पृष्ठ 32
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/April/v1.32

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.5

👉 Amrit Chintan 2 Dec

🔶 If you want success – Be brave. Your masculine musculature and strong will to face the hurdles and probles of life will defeat your enemy. When gold is put overflame – all pollution burn up leaving pure gold in your hand. Difficulty and hard-ship of your life makes you strong to face other adversities of life.

🔷 The role of spirituality is to make your life. Free of weaknesses and vices of life and to adopt truth and bliss of life. In ancient India people has high moral character and honesty and as the result of that people were very happy and were living in good prosperity and equanimity. But in modern times inspite of all scientific development men have lost peace and Love among themselves. Today every one seems money minded at all cost of ethical codes.

🔶 To attain the status of a saint or sage one had to be a pious and lead a austerity. He leaves the material interest and adopts divine life. Without sadhana one can not attain that life. But these persons not only elevate them selves but also can help other.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (अन्तिम भाग)

🔷 तात्पर्य यह है कि दिन भर की समस्त कार्य-पद्धति के साथ उच्चकोटि की भावनायें नियोजित रखी जायें। हर दिन कागज पर पूरी दिनचर्या नोट कर ली जाय जिसमें दिन भर का समय विभाजन और हर कार्य के साथ जुड़ी रखी जाने वाली भावनाओं का विवरण लिखा रहें। यह कागज मेज़ पर या जेब में रखा रहे। निर्धारित कार्य पद्धति और विचार प्रक्रिया में कितनी सफलता मिल रही है कितनी असफलता, इसका निर्णय हर घंटे करते रहा जाय। इस प्रकार चलता हुआ क्रम रात को सोते समय यह बतायेगा कि सब मिलाकर कुल कितने प्रतिशत सफलता मिली कितनी असफलता। सफलता के लिए प्रसन्न हुआ जाय और जो भूलें हुई हो उन्हें दूसरे जनम में -दूसरे दिन सुधारने के लिए अधिक सतर्कता जागृत की जाय।

🔶 रात्रि को सोने के लिए जब बिस्तर पर जाया जाय तब संन्यास जैसी भावनाओं को हृदयंगम किया जाय। जो कुछ कर्तव्य थे वे ईश्वर के सौंपे हुए थे, ईमानदारी से पूरे किये गये। जो शेष हैं उन्हें ईश्वर पूरा करेगा। कुटुंब परिवार, धन, वैभव आदि सब भगवान का था उसकी धरोहर उसे सौंप कर निश्चिंतता पूर्वक निर्लिप्त मन से अनासक्त कर्मयोगी की तरह निद्रा मृत्यु की गोद में शयन किया जा रहा है। अंतिम मृत्यु के लिए यह श्रेष्ठतम साधना है। इस मनःस्थिति में यदि महाप्रयाण किया जाय तो परलोक में निश्चित रूप से परम शांति और सद्गति ही मिलेगी।

🔷 चिंतन का स्वरूप शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के खाँचे में इस तरह कर देता है कि असावधानी के कारण पनपने वाली दुष्प्रवृत्तियों के पनपने की कोई गुँजाइश न रहे। ढीली-पोली जीवनचर्या पर ही विकृतियाँ सवार होती हैं यदि जागरूकता और सतर्कता बनी रहे तो दुष्ट दुर्भावों को संग लगाने का अवसर नहीं मिले। यदि वे कदाचित् आक्रमण करें भी तो सदा लड़ने और अड़ने के लिए तैयार रखता है। कभी कामुकता के विचार मन में उठें तो उसे निरस्त करने के लिए व्यभिचार से उत्पन्न होने वाले सत्परिणामों की लंबी सूची तैयार रखता है और जैसे ही उस स्तर के दुष्ट विचार उठें कि प्रतिरोधी सदाचार परायण विचार शृंखला पर गंभीरता पूर्वक ऊहापोह आरंभ कर देता है। जहाँ यह प्रक्रिया आरंभ हुई वहाँ कुविचारों के निराकरण में तनिक भी देर नहीं लगती।

🔶 उच्चस्तरीय भावनात्मक साधना के लिए भजन, मनन और चिंतन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए। गायत्री महामंत्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही संभव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका माहात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।

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📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 6
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.3

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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