रविवार, 3 दिसंबर 2017

👉 युगनिर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
देवियो! भाइयो!!

🔶 युगनिर्माण योजना का प्रारम्भ इस उद्देश्य से हुआ कि मनुष्य की भावनात्मक स्थिति में परिवर्तन किया जाए और उसे ऊँचा उठाया जाए। संसार में जितनी भी समस्याएँ हैं, उन सारी समस्याओं का एकमात्र उपाय यह है कि मनुष्यों का भावनात्मक स्तर ऊँचा हो तो जो समस्याएँ आज हमको दिखाई पड़ती हैं, उनमें से एक का भी अस्तित्व न रहे। जितनी भी कठिनाइयाँ मनुष्य के सामने हैं, वे उसकी स्वयं की पैदा की हुई हैं, वास्तविक नहीं। सृष्टि में जितने भी जीव रहते हैं, सारे के सारे अपने जीवन की सुविधाओं को आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। कीड़े-मकोड़ों से लेकर जलचर, नभचर और थलचर तक के सामने कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसके कारण से वह दुःखी रहते हों।
               
🔷 मनुष्यों के सम्पर्क में जो आ गये हैं, उन प्राणियों के दुःखी होने के कारण हैं। उनको मनुष्यों ने पाल रखा है, वे दुःखी भी हो सकते हैं, काटे भी जा सकते हैं, घायल भी हो सकते हैं, लेकिन जो प्रकृति की गोद में रहते हैं, उनके सामने कोई समस्या नहीं है, जीवनयापन करने के सम्बन्ध में फिर मनुष्य के सामने इतनी समस्याएँ क्यों? मनुष्य तो बुद्धिमान प्राणी है, प्रगतिशील प्राणी है, उन्नत प्राणी है, उसके सामने तो सुख-सुविधाओं के अम्बार होने चाहिए।
   
🔶 लेकिन हम देखते हैं कि दूसरे प्राणियों की तुलना में मनुष्य बहुत दुःखी है। उसका एकमात्र कारण यह है कि उसकी विचारणाएँ, उसकी भावनाएँ, उसके दृष्टिकोण निम्न स्तर के होते चले गये। अगर यह स्तर उनका ऊँचा उठा रहा होता तो अभावग्रस्त स्थितियों में भी मनुष्य ने शान्ति का जीवन जिया होता। कहा जाता है कि सम्पदाएँ मनुष्य के पास होंगी, सुख-सुविधाएँ मनुष्य के पास होंगी तो वह समुन्नत होगा, सुखी रहेगा और आनन्द से रहेगा, लेकिन बात सही नहीं है। गरीब लोगों के पास जिनके पास साधन और सामान नहीं होते, सम्पत्ति नहीं होती, वह भी बड़ी सुख और सुविधा का जीवन जीते हैं और उनकी वृद्धि का कोई मार्ग रुका नहीं रहता। ऋषियों का जीवन इसी प्रकार का था। उनके सामने ज्यादा अभावी दुनिया में कोई भी नहीं है।

🔷 पहनने के नाम पर एक लँगोटी, इस्तेमाल करने के नाम पर एक कमण्डलु, फूस की झोंपड़ी, जमीन पर सोना, फूस की बिछावन, घास-पात और कन्द-मूल खा करके गुजारा कर लेना। इतना सब होते हुए भी ऋषियों ने बताया कि अभावग्रस्तता में भी सुखी जीवन बन सकता है, सुख और शान्ति का स्त्रोत बन सकता है। इन परिस्थितियों में भी विद्या अध्ययन में कोई रुकावट पैदा नहीं हुई। मगर सही बात यह है कि जिन-जिन लोगों के पास विशेष सुविधाएँ थीं, उन लोगों की अपेक्षा उन लोगों ने ज्यादा सुखी और समुन्नत जीवन जिया। ये बात उन्होंने साबित करने के लिए की थी कि वक्त-बेवक्त सुविधाएँ न हो, साधन मनुष्य के पास न हों तो भी वह आदमी सुखी जीवन जी सकता है, समुन्नत जीवन जी सकता है और दूसरों के लिए बड़ा उपयोगी सिद्ध हो सकता है। फर्क केवल एक ही है कि भावनात्मक स्तर ऊँचा उठा हुआ हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 Dec 2018

🔶 हर वक्त शंकित रहने वाले, प्रत्येक काम में कोई नुक्स निकालने वाले, हर किसी की आलोचना करने वाले, छिद्रान्वेषी व्यक्ति अपनी आन्तरिक दुर्बलता का परिचय देते हैं। भय और शंका जिनके मन में जम जाते हैं वे हर वक्त डरते रहते हैं, असफलता, गन्दगी और आशंका ही हर तरफ उन्हें दिखाई देती है। वे अपने लिये कोई काम चुन नहीं पाते। जो करते हैं उसमें सन्तुष्ट नहीं रहते, अपने काम को तुच्छ, निन्दनीय, हानिकारक मानते हैं और उसे छोड़ने की बात बार-बार कहते रहते हैं। छोड़ भी नहीं पाते। क्योंकि नया कदम उठाने लायक साहस उनमें नहीं होता। पुराने को ठीक तरह कर नहीं पाते। कर तो तभी पावें जब उसकी श्रेष्ठता और सफलता पर उन्हें विश्वास हो!

🔷 ओछे आदमी का एक चिन्ह यह है कि वह अपने बारे में ही सदा सोचता रहता है। अपना लाभ, अपनी हानि, अपनी भूल, अपना भविष्य, अपनी कठिनाई, अपना न्याय, अपना स्वास्थ्य, अपनी प्रतिष्ठा, अपना दुर्भाग्य, अपना स्वर्ग, अपनी मुक्ति आदि बातें ही उसके चिन्तन का मुख्य विषय होती हैं। दूसरों से जब भी बात करेगा अपना रोना रोवेगा, अपनी शेखी मारेगा। वह यह भूल जाता है कि दूसरों को तुम्हारे रोने गाने सुनने की न तो फुरसत है और न उसमें कोई दिलचस्पी। हर आदमी अपनी जिम्मेदारियों से लदा हुआ है, उसे दूसरे की सहानुभूति या सहायता चाहिए। यह जानते हुए भी जो लोग अपनी राम कहानी ऐसे लोगों को सुनाते हैं जो उसको हल नहीं कर सकते तो ऐसा सुनाना एक प्रकार से उनका समय नष्ट करना ही है। ऐसे सिर खाऊ लोगों को भला कौन पसन्द करेगा?

🔶 आलस, गन्दगी और अव्यवस्था भी ऐसे दुर्गुण हैं जो यह साबित करते हैं कि यह व्यक्ति अपने आप से लापरवाह है। जो अपने समय की, सामान की, शरीर की, वस्त्रों की, कार्यक्रमों की व्यवस्था नहीं कर सकता या नहीं करना चाहता, उसे जीवट का, जोरदार, सावधान या चैतन्य नहीं कहा जा सकता। ढीले-पोले, अस्त-व्यस्त स्वभाव के लोग वस्तुतः इसी लायक हैं कि उन्हें दूसरे आदमी हल्की निगाह से देखें। अपना चलना, उठना, बैठना, कपड़े पहनना, हजामत, बातचीत सभी में एक व्यवस्था, तेजी तथा सावधानी हो, तभी किसी की आँखों में हम सतर्क, सावधान एवं प्रगतिशील जँच सकते हैं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 3 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Dec 2017


शनिवार, 2 दिसंबर 2017

👉 विद्या से विनय-

🔷 महर्षि आरुणि के पुत्र श्वेतकेतु ने गुरुकुल में रहकर लगन के साथ विद्याध्ययन किया। साथ ही गुरु-सेवा से उनके कृपा पात्र भी बन गये। यद्यपि गुरु को अपने सभी शिष्य प्रिय थे तथापि अपने सेवा बल से श्वेतकेतु ने विशेषता प्राप्त करली थी। गुरु सेवा की कृपा से जहाँ उन्होंने शीघ्र ही चारों वेदों का अखण्ड ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वहाँ गुरु की प्रशंसा और प्रियता के कारण उनमें कुछ अहंकार भी आ गया था। अपने पाण्डित्य के अभिमान में गुरु के सिवाय अन्य किसी का आदर करना ही भूल गये।

🔶 निदान श्वेतकेतु जब गुरु का आशीर्वाद और चारों वेदों का सम्पूर्ण ज्ञान लेकर घर आये तो अहंकारवश पिता को भी प्रणाम नहीं किया। उनके पिता महर्षि आरुणि को इसका बड़ा दुःख हुआ। दुःख इसलिये नहीं कि वे पुत्र के प्रणाम के भूखे थे और श्वेतुकेतु ने उन्हें प्रणाम नहीं किया। वरन् दुःख इसलिये हुआ कि पुत्र एक लम्बी अवधि के बाद जहाँ ज्ञानी वहाँ अभिमानी भी होकर आया है।
 
🔷 महर्षि आरुणि पुत्र की इस वृत्ति से चिन्तित हो उठे। क्योंकि वे जानते थे कि जिस विद्या के साथ विनय नहीं रहती वह न तो फलीभूत होती है और न आगे विकसित! उन्होंने पुत्र के हित में उसका यह विकार दूर करने के मन्तव्य से व्यंगपूर्वक कहा— “ऋषिवर ! आपने ऐसी कौन ज्ञान की गूढ़ पुस्तक पढ़ ली है जो गुरुजनों का आदर तक करना भूल गये। मानता हूँ आप बहुत बड़े विद्वान हो गये। चारों वेदों का ज्ञान आपने प्राप्त कर लिया है। किन्तु इसके साथ यह भी जानते होंगे कि विद्या का सच्चा स्वरूप विनय है। जब आप वही न सीख पाये विद्वान कैसे?

🔶 पिता की बात सुन कर श्वेतकेतु ने अपनी भूल अनुभव की और लज्जित होकर पिता के चरणों में गिर गये। महर्षि आरुणि ने श्वेतकेतु को उठाकर छाती से लगा लिया और कहा—”अभिमान तुम्हें नहीं, अपने पुत्र की विद्वता पर अभिमान तो मुझे होना चाहिये था।”
 

👉 आज का सद्चिंतन 2 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Dec 2017

👉 The Angels on Earth

🔶 There are people who are not attracted by worldly vices and have dedicated their lives for social uplift. Such people are really the angles on this Earth. Ancient India had an abundance of such angels. A long time ago, there ruled an Indian king called Bindujaat. One day he decided that all the monks in his empire be distributed gold coins for their livelihood. He assigned this task to his trusted councilor Gritsmud. For several days Gritsmud roamed around the kingdom but could not distribute a single coin. At last he came back to the king and returned all the gold coins.

🔷 Surprised, the King asked, "Couldn't you find a single needy monk in the entire kingdom, who would accept my help?" Gritsmud drew a deep breath and said, "O great King I have indeed failed to implement your orders. There is no shortage of monks who have dedicated their entire lives for missions of social uplift, but they have reduced their own personal needs to such an extent that they do not need our help. If you really wish to spend this wealth on monks, you have to invest it to their missions, since none of them is ready to accept it for their personal use."

📖 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 Dec 2017

🔶 युग निर्माण का महान् कार्य आज की प्रचण्ड आवश्यकता है। जिस खंडहर स्थिति में हमारे शरीर, मन और समाज के भग्नावशेष पड़े हैं, उन्हें उसी दशा में पड़े रहने देने की उपेक्षा जिन्हें संतोष दे सकती हैं उन्हें जीवित मृत ही कहना पड़ेगा। आज बेशक ऐसे ही लोगों की संख्या अधिक है, जिन्हें अपने काम से काम, अपने मतलब से मतलब रखने की नीति पसंद है, पर ऐसे लोगों का बीज नष्ट नहीं हुआ है जो परमार्थ की महत्ता समझते हैं और लोकहित के लिए यदि उन्हें कुछ प्रयत्न या त्याग करना पड़े तो उसके लिए भी इंकार न करेंगे।     

🔷 अखण्ड ज्योति का प्रत्येक सदस्य अब एक धार्मिक पत्रिका का पाठक मात्र न रहेगा, वरन् वह एक लोकशिक्षक के रूप में अपना उत्तरदायित्व अनुभव करें। युग निर्माण के लिए आवश्यक प्रकाश अखण्ड ज्योति प्रस्तुत करेगी, वह एक बिजलीघर के रूप में रहेगी और हममें से प्रत्येक एक बल्ब के रूप में प्रकाशित होकर अपने क्षेत्र में प्रकाश फैलाएँ। अज्ञान ही मानव जाति का सबसे बड़ा शत्रु है, इसी अंधकार में नाना प्रकार के पाप पनपते हैं। 

🔶 अखण्ड ज्योति के प्रत्येक पाठक को प्रातःकाल का समय ईश्वर चिन्तन के लिए और सायंकाल का समय आत्म-निरीक्षण के लिए नियत करना चाहिए। असुविधा और परिस्थितियों के कारण इसमें कुछ व्यतिरेक होना क्षम्य भी कहा जा सकता है, पर शैय्या पर नींद खुलने से लेकर जमीन पर पैर रखने के बीच का जो थोड़ा सा समय रहता है वह अनिवार्य रूप से हममें से हर एक को ईश्वर चिंतन में लगाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बड़प्पन की सही कसौटी

🔷 वैभव के आधार पर बड़प्पन आँकने की प्रथा इस संसार में है। जिनके पास जितनी संपदा, शिक्षा एवं चतुरता है, उसी अनुपात से उसके बड़प्पन का मूल्य आँका जाता है। बलिष्ठता और प्रतिभा भी उसी वर्ग में आती है, जो दूसरों पर अपनी छाप छोड़ती है तथा धाक जमाती है। लोग उग्रता, आतंकवाद, दुष्टता और हानि पहुंचाने की शाक्ति को देखते हुए भी डरते हैं, मान देते हैं।  

🔶 बड़प्पन के मूल्यांकन की यह सभी कसौटियाँ ओछी तथा खोटी हैं। इनके सहारे हम किसी व्यक्ति का सही मूल्यांकन नहीं कर सकते। कसौटी ही खोटी हो, तो सोने और पीतल का अन्तर कैसे जाना जाय?

🔷 व्यक्तित्व की वास्तविक ऊँचाई उसकी सुसंस्कारिता के आधार पर आँकी जानी चाहिए। देखा जाना चाहिए कि किसने अपने आप में गुण, कर्म, स्वभाव के क्षेत्र में कितनी उत्कृष्टता अपनाई है और निजी चरित्र तथा दूसरों के साथ सद्व्यवहार में किस सीमा तक अपनी विशिष्टता अपनाई है।

🔶 जो अपने को जितना संयत, सज्जन और अनुशासित बना सका, वह उतना ही महान् है। धर्म- चिह्नो या प्रचलनों से कोई धर्मात्मा नहीं बनता। जिसने आदर्शांे के प्रति अपनी निष्ठा जिस सीमा तक परिपक्व की है, वस्तुतः उसी का बड़प्पन सफल और सराहनीय है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

👉 श्रम से अधिक वेतन

🔶 जार्ज बर्नार्डशॉ को अपने आरम्भिक जीवन में एक अच्छी नौकरी मिली। उस नौकरी में काम कम और वेतन अधिक था। शॉ ने यह कहकर इस्तीफा दे दिया कि जितना पैसा मुझे मिलता है उतना काम मेरे पास नहीं है। यह एक आश्चर्यजनक त्यागपत्र था।

🔷 हरामखोरी करके भी श्रम से अधिक वेतन प्राप्त करने वाले इस घटना से कुछ सीख सकते हैं।

👉 नियत कर्तव्यों का पालन

🔷 क्रान्तिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को जिस दिन फाँसी लगनी थी उस दिन सवेरे जल्दी उठकर वे व्यायाम कर रहे थे। जेल वार्डन ने पूछा आज तो आप को एक घंटे बाद फाँसी लगने वाली है फिर व्यायाम करने से क्या लाभ? उनने उत्तर दिया- जीवन आदर्शों और नियमों में बँधा हुआ है जब तक शरीर में साँस चलती है तब तक व्यवस्था में अन्तर आने देना उचित नहीं है।

🔶 थोड़ी सी अड़चन सामने आ जाने पर जो लोग अपनी दिनचर्या और कार्य व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देते हैं उनको बिस्मिल जी मरते मरते भी अपने आचरण द्वारा यह बता गये है कि समय का पालन, नियमितता एवं धैर्य ऐसे गुण हैं जिनका व्यक्तिक्रम प्राण जाने जैसी स्थिति आने पर भी नहीं करना चाहिए।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 गुरुतत्त्व की गरिमा और महिमा (अन्तिम भाग)

🔶 आज गुरुपूर्णिमा का त्यौहार है। हम आपको बता रहे हैं कि भगवान् का नया अवतार होने जा रहा है। आज की परिस्थितियों के अनुरूप यह अवतार है। जब-जब दुष्टता बढ़ती है, तब-तब देशकाल की परिस्थितियों के अनुरूप भगवान् अवतार के रूप में जन्म लेते हैं। आज आस्थाओं में, जन-जन के मन-मन में असुर घुस गया है। इसे विचारों की विकृति कह सकते हैं। एक किश्त आज के अवतार की आज से २५०० वर्ष पूर्व बुद्ध के रूप में, विचारशील के रूप में आई थी। वही प्रज्ञा की, विवेक की, विचारों कह अब पुनः आई है। वह है गायत्री मन्त्र ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में। यह अवतार जो आ रहा है विचारों के संशोधन के रूप में दिमागों में ही नहीं, आस्थाओं में भी हलचलें पैदा करेगा।
                
🔷 विचार-क्रान्ति के रूप में जो आ रही है वह युगशक्ति गायत्री है। यह गायत्री हिन्दुस्तान मात्र की नहीं, सारे विश्व की है। नये विश्व की माइक्रोफिल्म इसमें छिपी पड़ी है। गायत्री मन्त्र विश्व मन्त्र है। व्यक्ति का अन्तस् व बहिरंग बदलने वाले बीज इस मन्त्र के अन्दर छिपे पड़े हैं। यदि आपको यह बात समझ में आ गई तो आप हमारे साथ नवयुग का स्वागत करने में जुट जाएँगे। हम अपने लिए एक ही नाम बताते हैं मुर्गा। मुर्गा वह जो प्रभात के आगमन का उद्घोष करें कि नवप्रभात आ रहा है, नया युग आ रहा है, युगशक्ति का अवतरण हो रहा है, कुकुडूकूँ........। यह तो मुर्गा करता है। हम नए युग की अगवानी करें।
    
🔶 हम गायत्री की फिलॉसफी व युग के देवता विज्ञान की बात आपको बताते आए हैं। यह ब्रह्मविद्या घर-घर पहुँचे, इसमें आप सबका सहयोग चाहते हैं। जैसे सेतुबन्ध के लिए, गोवर्धन के लिए, अवतारों को सहयोग मिला, हम भी चाहते हैं कि आप भी इस प्रवाह में सम्मिलित हो जाएँ। आपको भी बाद में लगेगा कि हम भी समय पर जुड़ गए होते तो अच्छा रहता। युगशक्ति का उदय एवं अवतरण हो रहा है। आप इस अवतरण में एक हाथ भर लगा दें। आपकी गणना युगान्तरकारी पुरुषों में होने लगेगी।

🔷 आप समय दीजिए, पैसा दीजिए। यह सोचकर नहीं कि हमारा काम रुकेगा। आप अपनी श्रद्धा को परिपक्व करने के लिए जो भी कर सकें वह कीजिए। हमें देने से, हमें गुरुदीक्षा से मतलब है। घर-घर, जन-जन तक गायत्री का सद्ज्ञान पहुँचाने का काम करना। दवा तो हमारे पास है आस्थाओं में छाई विषाक्तता की। आप मात्र सुई बन जाइए। आज की गुरुपूर्णिमा के दिन सम्पूर्ण समर्पण की, युगदेवता के काम के लिए खपने की मैं आपसे अपेक्षा रखता हूँ। आशा है आप मेरी इच्छा पूरी करेंगे।

🔶 अन्त में यह कामना करते हैं कि जिस श्रद्धा ने हमारा कल्याण किया, वह आपका भी कल्याण करे, ताकि आप महान् बनने के अधिकारी हो सकें। आप सबका कल्याण हो, सब स्वस्थ हों, सबका समर्पण भाव बढ़ा रहे।

‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखमाप्नुयात् ।।

आज की बात समाप्त।
ॐ शान्ति।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आज का सद्चिंतन 1 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Dec 2017


👉 महानता सदा सादगी में होती है, बड़प्पन व् दिखावे में नहीं।

🔴 “मैं भी एक सम्पन्न घराने का था, पर जुए और शराब की लत ने मुझे सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया” एक व्यक्ति अपनी करुण कथा दीनबन्धु एंड्रयूज से कह रहा था -”माता-पिता के प्यार और भाई-बहन के स्नेह से वंचित होना पड़ा। तभी से दर-दर की खाक छान रहा हूँ और अब स्थिति ऐसी है कि खाने के भी लाले पड़ रहे हैं। इसी मजबूरी ने चोरी करना भी सिखा दिया और कई वर्षों की जेल की सजा भी काट चुका हूँ। मेहनत-मजदूरी करते बन नहीं पड़ता। स्वास्थ्य भी साथ नहीं देता और फिर ऊपर से कोढ़ में खाज की तरह टी.बी. की शिकायत! जीवन से ऊब चुका हूँ। आत्महत्या करने को जी चाहता है।”

🔵 दीनबन्धु बड़ी धैर्य से उसकी कथा सुन रहे थे। सब कुछ सुनने के उपरान्त उनने प्रश्न किया- क्या तुम्हें पता नहीं बुरी आदतों का परिणाम भी बुरा होता है? व्यक्ति ने सकारात्मक जवाब में सिर हिला दिया।

🔴 “फिर तुमने यह गलती क्यों की?” दीनबन्धु का सवाल था।

🔵 कुछ तो मित्रों के बहकावे में आकर और कुछ बड़प्पन का अहंकार जताने हेतु।

🔴 दीनबन्धु उसे समझाने की दृष्टि से कहने लगे- व्यक्ति यहीं भ्रमित हो जाता है। यह समझता है कि वह पड़ोसियों पर, समाज पर ऐसे कृत्यों द्वारा अपनी छाप डाल लेगा। लोग उसे बड़ा प्रगतिशील, सभ्य, और आधुनिक मानने लगेंगे, पर होता ठीक इसके विपरीत है। उन्हीं के बिरादरी वाले ऐसे लोगों को बड़ा और आधुनिक मान सकते हैं, पर यदि कोई सचमुच ही विचारशील व्यक्ति हो, तो इस आधुनिक सभ्यता, और चिन्तन-चेतना की प्रवृत्ति द्वारा स्वयं को बड़ा बनाने और कहलाने को कभी उचित नहीं ठहरायेगा। व्यक्ति बड़ा और महान बाह्याडम्बर से पहनावे-ओढ़ावे से नहीं, वरन् कर्त्तृत्व से बनता है, चिन्तन-चरित्र से बनता है और यदि यह सब ओछे और बचकाने हों, तो भले ही आडम्बर का ढकोसला वह ओढ़े रहे, पर वास्तविकता जग-जाहिर हो ही जाती है और लोग उसके तथाकथित ‘बड़प्पन’ पर उँगली उठाने लगते हैं। याद रखो महानता सदा सादगी में होती है, बड़प्पन में नहीं।”

🔴 व्यक्ति का समाधान हो चुका था। वह बड़ी आर्तदृष्टि से दीनबन्धु की ओर देख रहा था, जैसे उसे अपना अपराध-बोध हो गया हो और वह उसे स्वीकार रहा हो। दीनबन्धु ने उसे कई महीनों तक अपने साथ रखा एवं उसका उपचार कराया। अनेक महीनों के पश्चात् जब उसका स्वास्थ्य और रोग लगभग सही हो गया, तो उनने युवक से कहा-”अब तुम जा सकते हो, पर फिर से इन गंदी लतों को पास फटकने मत देना और कहीं मेहनत-मजदूरी कर ईमानदारी की जिन्दगी जीना।”

🔵 व्यक्ति उनकी नसीहत की स्वीकारोक्ति में नतमस्तक हो प्रणाम कर चल पड़ा। अनेक वर्षों बाद एक सुबह दीनबन्धु की झोंपड़ी के सामने आकर एक कार रुकी। उससे सीधे-साधे लिबास में एक प्रौढ़ सा दीखने वाला व्यक्ति उतरा। दरवाजा खटखटाया। कुछ क्षण पश्चात् दीनबन्धु बाहर आये। व्यक्ति ने भाव विभोर होकर कहा-”पहचाना।” दीनबन्धु असमंजस में पड़ गये तभी अपना परिचय न देते हुए उसने कहा “ मैं वही हूँ, जिसने आपसे अमुक महीनों तक सेवा करवायी थी।”

🔴 परिचय पाकर दीनबन्धु ने मुस्कराते हुए कहा-”अरे! तुम। अन्दर आओ।” व्यक्ति ने संक्षेप में अपनी प्रगति-कथा सुनायी कि किस तरह अखबार बेचते हुए आज वह एक फैक्ट्री का मालिक बन गया है। वह अपने साथ ढेर सारे उपहार और एक प्रस्ताव लेकर आया था कि वह इस झोंपड़ी से एक अच्छे मकान में चले चलें, जिसे उसने हाल ही में खरीदा था। प्रस्ताव अस्वीकारते हुए उन्होंने कहा-इस पैसे को गरीबों की सवा में लगा देना। रही उपहार की बात तो उनने एक गुलदस्ता भर रख कर शेष को अभावग्रस्तों में बाँट देने को कहा। चलते-चलते दीनबन्धु ने एक बात और कही कि “जीवन भर दूसरों की सेवा करना, पिछड़ों को उठाना। यही मेरे प्रति तुम्हारा सच्चा कृतज्ञता-ज्ञापन होगा”। निहाल वह व्यक्ति एक और मंत्र सीखकर पुनः सेवा क्षेत्र की ओर चल पड़ा।

बुधवार, 29 नवंबर 2017

👉 सेवा धर्म :-

🔷 सत्यनगर का राजा सत्यप्रताप सिंह अत्यंत न्यायप्रिय शासक था। एक बार उसे पता चला कि सौम्यदेव नामक एक ऋषि अनेक सालों से लोहे का एक डंडा जमीन में गाड़कर तपस्या कर रहे हैं और उनके तप के प्रभाव से डंडे में कुछ अंकुर फूट कर फूल-पत्ते निकल रहे हैं और जब वह अपनी तपस्या में पूर्ण सफलता प्राप्त कर लेंगे तो उनका डंडा फूल-पत्तों से भर जाएगा।

🔶 सत्यप्रताप ने सोचा कि यदि उनके तप में इतना बल है कि लोहे के डंडे में अंकुर फूट कर फूल-पत्ते निकल सकते हैं तो फिर मैं भी क्यों न तप करके अपना जीवन सार्थक बनाऊं।

🔷 यह सोच कर वह भी ऋषि के समीप लोहे का डंडा गाड़कर तपस्या करने लगा। संयोगवश उसी रात जोर का तूफान आया। मूसलाधार बारिश होने लगी। राजा और ऋषि दोनों ही मौसम की परवाह न कर तपस्या में मगन रहे।

🔶 कुछ देर बाद एक व्यक्ति बुरी तरह भीगा हुआ ठंड से कांपता आया। उसने ऋषि से कहीं ठहरने की जगह के बारे में पूछा पर ऋषि ने आंख खोलकर भी नहीं देखा। निराश होकर वह राजा सत्यप्रताप के पास पहुंचा और गिर पड़ा।

🔷  राजा ने उसकी इतनी बुरी हालत देखकर उसे गोद में उठाया। उसे नजदीक ही एक कुटिया नजर आई। उसने उस व्यक्ति को कुटिया में लिटाया और उसके समीप आग जलाकर गर्माहट पैदा की। गर्माहट मिलने से व्यक्ति होश में आ गया। इसके बाद राजा ने उसे कुछ जड़ी-बूटी पीसकर पिलाई।

🔶 कुछ ही देर बाद वह व्यक्ति बिल्कुल ठीक हो गया। सुबह होने पर राजा जब उस व्यक्ति के साथ कुटिया से बाहर आया तो यह देखकर हैरान रह गया कि जो लोहे का डंडा उसने गाड़ा था वह ताजे फूल-पत्तों से भरकर झुक गया था। इसके बाद राजा ने ऋषि के डंडे की ओर देखा। ऋषि के थोड़े  बहुत निकले फूल-पत्ते भी मुरझा गए थे।

🔷 राजा समझ गया कि मानव सेवा से बड़ी तपस्या कोई और नहीं है। वह अपने राज्य वापस आकर प्रजा की समुचित देखभाल करने लगा।

👉 आज का सद्चिंतन 30 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Nov 2017


👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 Nov 2017

🔶 लोगों के हाथों अपनी प्रसन्नता-अप्रसन्नता बेच नहीं देनी चाहिए। कोई प्रशंसा करे तो हम प्रसन्न हों और निन्दा करने लगे तो दुःखी हो चलें? यह तो पूरी पराधीनता हुई। हमें इस संबंध में पूर्णतया अपने ही ऊपर निर्भर रहना चाहिए और निष्पक्ष होकर अपनी समीक्षा आप करने की हिम्मत इकट्ठी करनी चाहिए। निन्दा से दुःख लगता हो तो अपनी नजर में अपने कामों को ऐसे घटिया स्तर का साबित न होने दें जिसकी निन्दा करनी पड़े। यदि प्रशंसा चाहते हैं तो अपने कार्यों को प्रशंसनीय बनायें।     

🔷 घृणा पापी से नहीं, पाप से करो। यथार्थ में पापी कोई मनुष्य नहीं होता, वरन् पाप मनुष्य की एक अवस्था है। इसलिए यदि संशोधन करना हो तो पाप का ही करना चाहिए। अपराधी को यदि दण्ड देना हो तो उसे सुधारने के लिए ही दिया जाना चाहिए। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज की प्रत्येक अवस्था का उस पर प्रभाव पड़ सकता है इसलिए किसी को घृणापूर्वक बहिष्कृत कर देने से समस्या का समाधान नहीं होता, वरन् बुराई का शोधन करके अच्छे व्यक्तियों का निर्माण करने से ही उस अवस्था का नाश किया जा सकता है, जो घृणित है, हेय और जिससे सामाजिक जीवन में विष पैदा होता है।

🔶 हमारे सान्निध्य और सत्संग की जिन्हें उपयोगिता प्रतीत होती हो उसे आदि से अंत तक अखण्ड ज्योति पढ़ते रहना चाहिए। एक महीने में हमने जो कुछ सोचा, विचारा, पढ़ा, मनन किया, समझा और चाहा है, उसका सारांश पत्रिका की पंक्तियों में मिल जाएगा। इस सत्संग की उपेक्षा को हम अपनी उपेक्षा ही समझते हैं और प्रत्येक प्रेमी से यह आशा करते हैं कि वह हमें हमारी भावना, आकाँक्षा और गतिविधियों को समझने के लिए पत्रिका को उसी मनोयोग से पढ़ें जैसे हमारे पास बैठकर हमारी बातों को सुना जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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