मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 2)

🔴 दूसरा वाला प्रयोग हमने किया- साधु का। जिसका नाम तपस्वी है। हमने अपने सारे छिद्रों को बन्द कर दिया। यह दूसरा कदम है। काँटे पर चलने वाले का नाम तपस्वी नहीं है। ठण्डे पानी से नहाने वाले का नाम तपस्वी नहीं है। उस आदमी का नाम साधु और तपस्वी है, जिसने अपने आप का तपाया, उसका नाम तपस्वी है, उसका नाम साधु है। हमने अपने आप को तपाया है। अक्ल की दृष्टि से आदमी से ज्यादा बेईमान, बहुरूपिया कोई नहीं है। हमने अपनी अक्ल को ठीक कर लिया है। आप भी मारे डण्डों से अपनी अक्ल को ठीक करें। हमने अपनी हर चीज को तपाया, भीतर वाले हिस्से को भी तपाया। हमने अपने मन को, बुद्धि को तपाया है, पर आपकी बुद्धि तो ऐसी चाण्डाल है, ऐसी पिशाचिनी है कि क्या कहें?
      
🔵 किसी के जिन्दगी की समस्या को हल करने का सवाल था तो आपकी अक्ल, आपकी बुद्धि ने ऐसी मक्कारी की कि क्या कहना? पैसे से लेकर समय तक हमने केवल समाज के लिए खर्च किया। यह कसा हुआ जीवन हमारा तपस्वी का जीवन है। मन्त्रों में शक्ति है, गलत बात नहीं है। देवताओं में शक्ति है, यह भी गलत नहीं है, किन्तु, अगर कोई आदमी तपस्वी है तो वह हर काम को कर सकता है। अपने अनुष्ठान काल में हमने किसी से बात नहीं की, कोई भी अन्य चीज नहीं खायी। जौ की रोटी एवं छाछ, बस यही दो चीजें हम खाते रहे।

🔴 जैसे हमने अनुष्ठान खत्म किया कि एक व्यक्ति आये जो नकली रेशम बनाते थे, उन्होंने कहा कि हम आपको गुरु बनायेंगे। उन्होंने सवा रुपया हमारे हाथ पर रखा। इस पर हमने सोचा कि तब तो हम ब्राह्मण नहीं हो सकते हैं, हम मजदूर हैं। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण को तो लेना चाहिए। यह आज से लगभग ३५-४० साल पहले सन् १९४५-४६ की बात है, उस सज्जन को लेकर हम बाजार गये। उस जमाने में ठण्डी में बिछाने के लिए पुराने कपड़ों के तथा रूई की हाथ से बनी दरियाँ दो रुपये में मिलती थीं। उससे वहीं चीजें खरीदकर जरूरतमन्दों में बाँट दी, पर अपने लिए हमने उसे स्वीकार नहीं किया। हमारी अक्ल एवं जो भी चीज हमारे पास थी, उसे हम हमेशा बाँटते चले गये। उस आदमी ने कुछ दिनों के बाद हमारे पास दो सौ रुपये भेजे। हमने उसे गायत्री तपोभूमि के मन्दिर बनाने में लगा दिया। यह वह पहला आदमी था जिसने हमें पैसा भेजा था। यह घटनाएँ सुना रहा हूँ मैं आपको अपने तपस्वी जीवन की। इसी तरह हमारे सारे कार्य होते चले गये। कोई काम हमारा रुका नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Oct 2017

🔵 अपनी आदतों का सुधार, स्वभाव का निर्माण, दृष्टिकोण का परिष्कार करना जीवन विद्या का आवश्यक अंग है। ओछी आदतें, कमीने स्वभाव, और संकीर्ण दृष्टिकोण वाला कोई व्यक्ति सभ्य नहीं गिना जा सकता। उसे किसी का सच्चा प्रेम और गहरा विश्वास प्राप्त नहीं हो सकता। कोई बड़ी सफलता उसे कभी न मिल सकेगी। कहते है कि बड़े आदमी सदा चौड़े दिल और ऊँचे दिमाग के होते है।” यहाँ लम्बाई चौड़ाई से मतलब नहीं वरन् दृष्टिकोण की ऊँचाई का ही अभिप्राय है।

🔴 वचन का पालन, समय की पाबन्दी, नियमित दिनचर्या, शिष्टाचार, आहार विहार की नियमितता, सफाई व्यवस्था आदि कितनी ही बातें ऐसी है जो सामान्य प्रतीत होते हुए भी जीवन की सुव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। पाश्चात्य देशों में इन छोटी बातों पर बहुत ध्यान दिया जाता है, फलस्वरूप भौतिक उन्नति के रूप में उन्हें उसका लाभ भी प्रत्यक्ष मिल रहा है। स्वास्थ्य, समृद्धि और ज्ञान की दृष्टि से पाश्चात्य देशों ने जो उन्नति की है उसमें इन छोटी बातों का बड़ा योग है। इन बातों के साथ-साथ यदि आध्यात्मिक सद्गुणों का समन्वय भी हो जाय तो फिर सोना और सुगन्धि वाली कहावत ही चरितार्थ हो जाती है।

🔵 आज चारों ओर अगणित कठिनाइयाँ, परेशानियाँ और उलझने दिखाई पड़ती है उनका कारण एक ही है- अनैतिक, असंस्कृत जीवन। समस्याओं को ऊपर-ऊपर से सुलझाने से काम न चलेगा वरन् भूल कारण का समाधान करना पड़ेगा मनुष्य के जीवन दिव्य देवालयों की तरह पवित्र, ऊँचे और शानदार हों तभी क्लेश और कलह से, शोक और संताप से, अभाव और आपत्ति से छुटकारा मिलेगा। व्यक्ति यदि भगवान के दिव्य वरदान मानव जीवन का समुचित लाभ उठाना चाहता हो तो उसे जिन्दगी जीने की समस्याओं पर विचार करना होगा और सुलझे हुए दृष्टिकोण से अपनी गति विधियों का निर्माण करना होगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 महान कर्मयोगी स्वामी विवेकानन्द (भाग 3)

🔴 अपनी इस भावना को कार्य रूप में परिणित करने के लिये स्वामी जी सन् 1893 में, जब कि उन की आयु केवल 30 वर्ष की थी, और बहुत थोड़े साधन उनको प्राप्त थे, अमरीका जा पहुँचे। वहाँ कुछ ही दिनों में हजारों व्यक्तियों को हिन्दू-धर्म का प्रेमी बना दिया और सैंकड़ों ही उनके पास रह कर भारतीय साधन प्रणाली का अनुसरण करके आध्यात्मिक प्रगति में दत्तचित्त हो गये। स्वामी जी लगातार कई वर्ष तक अमरीका में और इंग्लैण्ड में धर्म-प्रचार करते रहे और फिर अपने निश्चय के अनुसार वहाँ के अनेक सुयोग्य तथा साधन सम्पन्न व्यक्तियों को लेकर भारतवर्ष वापस आये। पहले उन्होंने देश भर का दौरा करके जनता को जागृति का सन्देश सुनाया, मुक्ति का मार्ग दिखलाया और फिर अपने गुरु के नाम पर राम कृष्ण मिशन’ की स्थापना की जिसका एकमात्र लक्ष स्वामी जी की भावना के अनुसार भारतीय जनता की हर प्रकार से सहायता और उन्नति का प्रयत्न करना था।
 
🔵 स्वामी जी संकीर्णता की भावना से भी बहुत परे थे और वास्तव जिस किसी को धर्म के सत्य स्वरूप के दर्शन हुये है, वह चाहे किसी भी महत्व का अनुयायी क्यों न हो उसमें सब के प्रति सहिष्णुता, उदारता, प्रेम की भावना अवश्य पाई जाएगी। अमरीका की ‘सर्वधर्म महासभा’ में स्वामी जी ने सबसे पहले दिन जो संक्षिप्त भाषण दिया उसमें उन्होंने अपनी इस भावना को पूर्ण रूप से व्यक्त कर दिया। उन्होंने कहा कि “मुझे यह कहते गर्व होता है कि मैं जिस सनातन हिन्दू धर्म का अनुयायी हूँ उसने जगत को उदारता और विश्व को अपना समझने की उच्च भावना सिखाई है। इतना ही नहीं हम सब धर्मों को सच्चा मानते है और हमने प्राचीन काल में यहूदी और पारसी जैसे भिन्न धर्म वालों को भी अपने यहाँ आश्रय दिया था। मैं छोटेपन से नित्य कुछ श्लोकों का पाठ करता रहा हूँ और अन्य लाखों हिन्दू भी उनका पाठ करते है।

🔴 उनका आशय यही है कि- “जिस प्रकार भिन्न-भिन्न स्थानों से उत्पन्न होने वाली नदियाँ अन्त में एक ही समुद्र में इकट्ठी हो जाती है, इसी प्रकार हे प्रभु! मनुष्य अपनी भिन्न-भिन्न प्रकृति के अनुकूल पृथक्-पृथक् धर्म-मार्गों से अन्त में तेरे ही पास पहुँचते है” इसी प्रकार गीता में भी भगवान ने यही कहा है कि “मेरे पास कोई भी व्यक्ति चाहे जिस तरह का आये, तो भी मैं उसे मिलता हूँ। लोग जिन भिन्न-भिन्न मार्गों से अग्रसर होने का प्रयत्न करते है, वे सब रास्ते अन्त में मुझ में ही मिल जाते है।” पंथ-द्वेष धर्मान्धता और इनसे उत्पन्न क्रूरतापूर्ण पागलपन के जोश ने इस सुन्दर धरती को दीर्घकाल से नष्ट कर रखा है; बार-बार भूमि को मानव रक्त से तर कर दिया है, और संस्कृति को छार-छार कर दिया है। पर अब इन बातों का समय पूरा हो चुका है और मैं आशा करता हूँ कि आज प्रातः इस सभा को आरम्भ करने का जो घण्टा बजाया गया था वह सब प्रकार की अनुदारता, संकीर्णता और तलवार तथा कलम द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों का अन्त करने वाला ‘मृत्यु घण्टा’ सिद्ध होगा।”

🌹 क्रमशः जारी
🌹 श्री भारतीय योगी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1945 पृष्ठ 28
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.28

👉 आज का सद्चिंतन 24 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Oct 2017


👉 साफ नीयत

🔵 एक नगर में रहने वाले एक पंडित जी की ख्याति दूर-दूर तक थी। पास ही के गाँव में स्थित मंदिर के पुजारी का आकस्मिक निधन होने की वजह से, उन्हें वहाँ का पुजारी नियुक्त किया गया था। एक बार वे अपने गंतव्य की और जाने के लिए बस में चढ़े, उन्होंने कंडक्टर को किराए के रुपये दिए और सीट पर जाकर बैठ गए। कंडक्टर ने जब किराया काटकर उन्हें रुपये वापस दिए तो पंडित जी ने पाया कि कंडक्टर ने दस रुपये ज्यादा दे दिए हैं।

🔴 पंडित जी ने सोचा कि थोड़ी देर बाद कंडक्टर को रुपये वापस कर दूंगा। कुछ देर बाद मन में विचार आया कि बेवजह दस रुपये जैसी मामूली रकम को लेकर परेशान हो रहे है, आखिर ये बस कंपनी वाले भी तो लाखों कमाते हैं, बेहतर है इन रूपयों को भगवान की भेंट समझकर अपने पास ही रख लिया जाए। वह इनका सदुपयोग ही करेंगे।

🔵 मन में चल रहे विचारों के बीच उनका गंतव्य स्थल आ गया. बस से उतरते ही उनके कदम अचानक ठिठके, उन्होंने जेब मे हाथ डाला और दस का नोट निकाल कर कंडक्टर को देते हुए कहा, भाई तुमने मुझे किराया काटने के बाद भी दस रुपये ज्यादा दे दिए थे। कंडक्टर मुस्कराते हुए बोला, क्या आप ही गाँव के मंदिर के नए पुजारी है?

🔴 पंडित जी के हामी भरने पर कंडक्टर बोला, मेरे मन में कई दिनों से आपके प्रवचन सुनने की इच्छा थी, आपको बस में देखा तो ख्याल आया कि चलो देखते है कि मैं अगर ज्यादा पैसे दूँ तो आप क्या करते हो..!

🔵 अब मुझे विश्वास हो गया कि आपके प्रवचन जैसा ही आपका आचरण है। जिससे सभी को सीख लेनी चाहिए" बोलते हुए, कंडक्टर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी। पंडितजी बस से उतरकर पसीना-पसीना थे।

🔴 उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान का आभार व्यक्त किया कि हे प्रभु आपका लाख-लाख शुक्र है जो आपने मुझे बचा लिया, मैने तो दस रुपये के लालच में आपकी शिक्षाओं की बोली लगा दी थी। पर आपने सही समय पर मुझे सम्हलने का अवसर दे दिया। कभी कभी हम भी तुच्छ से प्रलोभन में, अपने जीवन भर की चरित्र पूँजी दाँव पर लगा देते हैं।

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

👉 क्रोध पर अक्रोध की विजय

🔴 एक बार सन्त तुकाराम अपने खेत से गन्ने का गट्ठा लेकर घर आ रहे थे। रास्ते में उनकी उदारता से परिचित बच्चे उनसे गन्ने माँगते तो उन्हें एक-एक बाँटते घर पहुँचे। तब केवल एक ही गन्ना उनके हाथ में था। उनकी स्त्री बड़ी क्रोधी स्वभाव की थी। उसने पूछा शेष गट्ठा कहाँ गया? उत्तर मिला बच्चों को बाँट दिया। इस पर वह और भी क्रुद्ध हुई और उस गन्ने को तुकाराम की पीठ पर जोर से दे मारा। गन्ने के दो टुकड़े हो गये।

🔵 बहुत चोट लगी। फिर भी वे क्रुद्ध न हुए और हँसते हुए बड़े स्नेह से बोले- तुमने अच्छा किया, टुकड़े करने का मेरा श्रम बचा दिया। लो एक टुकड़ा तुम खाओ, एक मैं लिये लेता हूँ। उनकी इस सहनशीलता को देखकर स्त्री पानी-पानी हो गई और चरणों पर गिर कर अपने अपराध के लिए क्षमा माँगने लगी।

🔴 ईश्वर भक्त सब में अपनी ही आत्मा देखते है, इसलिये वे किसी पर क्रोध नहीं करते अपनी सज्जनता के प्रभाव से दूसरों के हृदय परिवर्तन का कार्य करते रहते है।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 1)

देवियो! भाइयो!!

🔴 आप में से अधिकांश व्यक्ति सोच रहे होंगे कि मैं यहाँ था, परन्तु व्याख्यान क्यों नहीं दिया? विशेष कारणवश व्याख्यान न दे सका। बेटे! मैं अपने जीवन भर प्रयोग करता रहा हूँ। कौन-कौन से प्रयोग किये हैं?
      
🔵 पहले ब्राह्मण बनने का प्रयोग किया कि ब्राह्मणत्व के क्या-क्या चमत्कार हो सकते हैं? मैंने उसे अपने जीवन में धारण करके देखा है और पाया है कि इसमें सफलताएँ भी हैं तथा चमत्कार भी हैं। ब्राह्मण जीवन किसे कहते हैं? किफायतसारी जीवन को कहते हैं। ब्राह्मण उसे कहते हैं जो अपना खर्च कम से कम में चला सकता हो तथा अधिक से अधिक अपना धन, अक्ल, मेहनत, समाज में लगा सकता है, जिससे उसके जीवन का लक्ष्य, समाज का लक्ष्य पूरा होता हो। जिस आदमी के पास कुछ बचता ही नहीं है, वह समाज को क्या देगा?

🔴 हमें यह कहना होगा कि अध्यात्मवादी बनने के लिए किफायतसारी बनना होगा, ब्राह्मण बनना होगा। हमने इसका प्रयोग किया है तथा लाभ पाया है। हमने अपना खाने-पीने तथा रहने का ढंग ब्राह्मण का रखा है। अपने जमीन के बाबत जो कुछ हमें मिला था, उसे गायत्री तपोभूमि के लिए दान कर दिया। मैंने अपनी पत्नी से पेशवा ब्राह्मणों की उपमा देते हुए कहा कि आपको भी यह जीवन जीना चाहिए। पेशवा के राम टांक ने अपने गुरु की पत्नी के आदेश पर सब कुछ दे दिया था। इन्होंने भी अपने सारे गहने गायत्री तपोभूमि के लिए लगा दिये। पैसों की दृष्टि से हम खाली हाथ हो गये, परन्तु शक्ति बहुत मिल गई।

🔵 मित्रो! धन की और बल की शक्ति नहीं होती है। वह ब्राह्मणत्व की शक्ति होती है। यह मैं आपको यकीन दिला सकता हूँ। मैं ब्राह्मण था और अब भी ब्राह्मण हूँ। जो कुछ भी आप देख रहे हैं यह ब्राह्मणत्व का चमत्कार है। इस दुनिया में मित्रों, एक ही बिरादरी रह गई है जिसका नाम बनिया है। बाकी सारी बिरादरी मर गई हैं-एक ही जिन्दा है वह है बनिया। सारे के सारे क्षेत्र में बनिया ही बनिया छाया है। ब्राह्मण कहीं नहीं। परन्तु हम ब्राह्मण हैं, इस पर हमें गर्व है तथा सन्तोष है। अगर कोई अपने को ब्राह्मण बना सकता हो, अपने खर्च और लागत को कम कर सकता हो तथा नीयत में ब्राह्मणत्व है तो हमें प्रसन्नता होगी परन्तु आपकी नीयत में तो चाण्डाल बसा हुआ है। आदमी को गरीब भी होना पड़ेगा, यह हमने ब्राह्मण का प्रयोग करके देखा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 146)

🌹  इन दिनों हम यह करने में जुट रहे है
🔵 इन दिनों हमारी जो सावित्री साधना चल रही है, उसके माध्यम से जो अदृश्य महाबली उत्पन्न किए जा रहे हैं, वे चुपके-चुपके असंख्य अंतःकरणों में घुसेंगे, उनकी अनीति को छुड़ाकर मानेंगे और ऐसे मणि-माणिक्य छोड़कर आएँगे, जिससे वे स्वयं धन्य बन सकें और ‘‘युग परिवर्तन’’ जो अभी कठिन दीखता है, कल सरल बना सकें।

🔴 मनुष्य अपनी अंतःशक्ति के सहारे प्रसुप्त के प्रकटीकरण द्वारा ऊँचा उठता है, यह जितना सही है, उतना ही यह भी मिथ्या नहीं कि तप-तितिक्षा से प्रखर बनाया गया वातावरण, शिक्षा, सान्निध्य-सत्संग, परामर्श-अनुकरण भी अपनी उतनी सशक्त भूमिका निभाता है। देखा जाता है कि किसी समुदाय में नितांत साधारण श्रेणी के सीमित सामर्थ्य सम्पन्न व्यक्ति एक प्रचण्ड प्रवाह के सहारे असम्भव पुरुषार्थ भी सम्भव कर दिखाते हैं। प्राचीन काल में मनीषी-मुनिगण यही भूमिका निभाते थे। वे युग साधना में निरत रहे। लेखनी-वाणी के सशक्त तंत्र के माध्यम से जन-मानस के चिंतन को उभारते थे। ऐसी साधना अनेक उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों को जन्म देती थी, उनकी प्रसुप्त सामर्थ्य को उजागर कर उन्हें सही दिशा देकर समाज में वाँछित परिवर्तन लाती थी। शरीर की दृष्टि से सामान्य दृष्टिगोचर होने वाले व्यक्ति भी प्रतिभा-कुशल, चिंतन की श्रेष्ठता से अभिपूरित देखे जाते थे।

🔵 सर्वविदित है कि मुनि एवं ऋषि ये दो श्रेणियाँ अध्यात्म क्षेत्र की प्रतिभाओं में गिनी जाती रही हैं। ऋषि वह जो तपश्चर्या द्वारा काया का चेतनात्मक अनुसंधान कर उन निष्कर्षों से जन-समुदाय को लाभ पहुँचाए तथा मुनिगण वे कहलाते हैं, जो चिंतन-मनन स्वाध्याय द्वारा जन-मानस के परिष्कार की अहम् भूमिका निभाते हैं। एक पवित्रता का प्रतीक है, तो दूसरा प्रखरता का। दोनों को ही तप साधना में निरत हो सूक्ष्मतम बनना पड़ता है ताकि अपना स्वरूप और विराट् व्यापक बनाकर स्वयं को आत्मबल सम्पन्न कर वे युग चिंतन के प्रवाह को मरोड़-बदल सकें। मुनि जहाँ प्रत्यक्ष साधनों का प्रयोग करने की स्वतंत्रता रखते हैं, वहाँ ऋषियों के लिए यह अनिवार्य नहीं। वे अपने सूक्ष्म रूप में भी वातावरण को आंदोलित करके, सुसंस्कारित बनाए रख सकते हैं।

🔴 लोक व्यवहार में मनीषी शब्द का प्रायः अर्थ उस महाप्राज्ञ से लिया जाता है जिसका मन उसके वश में हो।  जो मन से नहीं संचालित होता, अपितु अपने विचारों द्वारा मन को चलाता है, उसे मनीषी एवं ऐसी प्रज्ञा को मनीषा कहा जाता है। शास्त्रकार का कथन है-‘‘मनीषा अस्ति येषां ते मनीषा नः’’ लेकिन साथ ही यह भी कहा है-मनीषी नस्तु भवन्ति, पानानि न भवन्ति, अर्थात्-मनीषी तो कई होते हैं, बड़े-बड़े बुद्धिमान होना अलग बात है एवं पवित्र शुद्ध अंतःकरण रखते हुए सही है। आज सम्पादक, बुद्धिजीवी, लेखक, अन्वेषक, प्रतिभाशाली वैज्ञानिक तो अनेकानेक हैं, देश-देशांतरों में फैले पड़े हैं, लेकिन वे मनीषी नहीं हैं। क्यों? क्योंकि तपःशक्ति द्वारा अंतःशोधन द्वारा उन्होंने पवित्रता नहीं अर्जित की।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.164
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.21

👉 Boat in a Jug

🔴 Once upon a time, a saint was sitting on the bank of the river Ganga and preaching about the oneness of creatures with God. "A creature is just a small part of God Himself!" said the saint. "All the magnificent qualities of God are present in every creature", he added. Hearing this, one of the listeners raised his doubt and asked, "Sir, God has perfect knowledge and is Almighty, while the creatures have imperfect knowledge and are weak. Then how do you claim that both are the same?"

🔵 Turning to the questioner the saint said, "Will you please fill my jug with the water from the river Ganga?" So, he went down and fetched the water in the jug. Now, the saint asked him, "Is the water in this jug, and that flowing in Ganga the same?" "Yes, indeed", was the reply. Then the saint smiled and said, "There are several boats sailing on the river, why don't you try to sail one boat in the jug too?" To this the man replied, "Sir, the jug is so small, it contains only a little water, how can a real boat sail in this jug?"

🔴 Now the saint said grimly, "My dear friend, creature is confined within a small limit, and hence, like the Ganga water in the jug it is limited. If you go and pour the water in the jug back in the river, then boats can sail on it too. Similarly, if we break our bonds of meanness and attain greatness, each one of us can easily acquire the strength and knowledge equal to God."

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 Oct 2017

🔵 धनवान् वही उत्तम है जो कृपण न होकर दानी हो, उदार हो, जिसके द्वारा धर्मपूर्वक न्याययुक्त व्यापार हो, जिसके द्वार पर अतिथि का समुचित सत्कार हो, दीन दुखियों का सदा उपकार हो, जिसके यहाँ विद्वानों एवं साधु-महात्माओं का सम्मान हो, जो स्वयं अति सरल और मतिमान् हो। बुद्धिमान् वही उत्तम है, जिसमें अपने माने हुए ज्ञान से निराशा हो, यथार्थ सत्य को जानने की सच्ची जिज्ञासा हो, सद्गुरुदेव के प्रति पूर्ण निर्भरता हो और उन्हीं की आज्ञा पालन में सतत् तत्परता हो।

🔴 इस क्षणभंगुर विश्व को जब हम आवश्यकता से अधिक प्रेम करने लग जाते हैं तब हमारा मधुर जीवन दुखों के अग्निकुण्ड में स्वाहा होने लगता है। नहीं-नहीं कहते हुए भी अपना पैर बराबर क्लेशों की कीचड़ में फंसा लेते हैं। क्या आपने सोचा कि इसका कारण क्या है? अनावश्यक अभिलाषा इसका कारण है। अभिलाषा से एकाँगी सम्बन्ध रखने वाले व्यक्तियों का जीवन सदैव न बुझने वाली अग्नि में धाँय धांय जलता रहता है उनके मुख पर न तो मृदुल हास्य होता है और न प्रसन्नता अठखेलियाँ करती दिखाई देती है।

🔵 महान् आत्मविश्वास, भविष्य के प्रति सुन्दर आकाँक्षायें लेकर जीवन पथ पर अग्रसर होने मात्र से ही काम न चलेगा। जीवन कोई रेल का इंजिन नहीं है जो लोहे की समतल पटरियों पर बिना किसी रुकावट के अगले स्टेशन पर पहुँच जाएगा। नदी को अपने लक्ष्य समुद्र की ओर बढ़ने में कितने पहाड़ों, वन-उपवनों, मैदान, धरती को पार करना पड़ता है। कहीं रुकावट पड़ती है तो अपना मार्ग स्वयं बनाती है, कहीं मुड़ती है, पता नहीं कितने विघ्नों, अवरोधों, रुकावटों को सहन कर वह अपने लक्ष्य पर पहुँचती है। ठीक इसी प्रकार जीवन का मार्ग, आदि से अंत तक कठिनाइयों का मार्ग है। उसमें पद-पद पर विघ्नों का सामना करना पढ़ता है। उसमें प्रतिक्षण विरोधी शक्तियों से प्रतियोगिता होती रहती है यही जीवन संघर्ष है। संसार में ऐसा कोई मार्ग नहीं है जो पूर्णरूपेण आपदाशून्य हो। हर यात्री को जीवन पथ में विघ्न, बाधाओं, विरोधों का सामना करना ही पड़ेगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 महान कर्मयोगी स्वामी विवेकानन्द (भाग 2)

🔴 परमहंस देव के इहलीला संवरण करने के पश्चात् जब परिव्राजक बनकर उन्होंने देश भ्रमण किया तो मार्ग में अलवर, खेतड़ी, लिम्बडी, मैसूर, रामनद आदि अनेक राज्यों के शासक उनके भक्त बन गये और उन सबने उनसे अपने यहाँ सुख पूर्वक रहकर साधन भजन करने का अनुरोध किया। पर उन्होंने उत्तर में सदैव यही कहा कि “मैं नहीं मानता कि इस प्रकार एकान्त में बैठकर साधन करने से मनुष्य की मुक्ति हो सकती है। इस प्रकार के लाखों साधु संन्यासी लोगों के लिये क्या कर रहे है? तत्वज्ञान का उपदेश? पर यह तो पागलपन या ढोंग है। भगवान रामकृष्ण का यह कथन पूर्णतः सत्य है कि ‘भूखे मरते को धर्म का उपदेश व्यर्थ है। जहाँ लाखों लोगों को खाने को नहीं मिलता। वहाँ वे धार्मिक कैसे बन सकते है? इस लिये सबसे पहले देश वासियों को पेट की समस्या हो हल करने लायक उपयोगी शिक्षा देनी चाहिये।
 
🔵 इस कार्य के लिये पहले तो कार्यकर्ता चाहिये। इस कार्य के लिये पहले तो कार्यकर्ता चाहिये। फिर धन की आवश्यकता है। यह कार्य मेरे जैसे भिखारी संन्यासी के लिये कठिन अवश्य है, पर गुरू की कृपा से मैं इस कार्य को पूर्ण करके रहूँगा। भारत के एक एक शहर से ऐसे व्यक्ति इकट्ठे होंगे। जिनका हृदय देशबन्धुओं की दशा सुधारने के लिये जल रहा है और जो इस कार्य के लिये जीवन अर्पण करने को तैयार है। पर पैसा! मैं देश भर में रंक से लेकर राजाओं के पास तक घूम चुका हूँ, इस लिये मैं कंगाल हिन्दुस्तान में किसी का सहारा न लेकर समुद्र पार करके पश्चिम के देशों में जाऊँगा, वहाँ से अपनी बुद्धि के प्रभाव से धन प्राप्त करके देशोद्धार की योजना को पूर्ण करूँगा या इसी प्रयत्न में प्राण उत्सर्ग कर दूँगा।”

🔴 यह है एक सच्चे कर्म योगी की भावना। इसका अर्थ यह नहीं कि स्वामी विवेकानन्द को भगवान का ध्यान नहीं था अथवा वे ज्ञान और मुक्ति के मार्ग से अनजान थे। नहीं वे तो पहले ही श्रीरामकृष्ण की कृपा से भगवान का साक्षात्कार प्राप्त कर चुके थे और अब भगवान के आदेश से ही उन्होंने भारतवर्ष की दुर्दशा को मिटाने का प्राण किया था। वे जानते थे कि निस्वार्थ भाव से सेवा करना ही आत्मा को अपने लक्ष तक पहुँचाने का सर्वोत्तम मार्ग है। जो व्यक्ति अन्य प्राणियों को कष्टों और आवश्यकताओं के प्रति उपेक्षा का भाव रखता है, वह अध्यात्मिक मार्ग में कभी उन्नति नहीं कर सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 श्री भारतीय योगी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1945 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.27

👉 आज का सद्चिंतन 23 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Oct 2017


👉 मित्रता की परिभाषा

🔵 एक बेटे के अनेक मित्र थे जिसका उसे बहुत घमंड था। पिता का एक ही मित्र था लेकिन था सच्चा ।एक दिन पिता ने बेटे को बोला कि तेरे बहुत सारे दोस्त है उनमें से आज रात तेरे सबसे अच्छे दोस्त की परीक्षा लेते है। बेटा सहर्ष तैयार हो गया।

🔴 रात को 2 बजे दोनों बेटे के सबसे घनिष्ठ मित्र के घर पहुंचे, बेटे ने दरवाजा खटखटाया, दरवाजा नहीं खुला, बार-बार दरवाजा ठोकने के बाद अंदर से बेटे का दोस्त उसकी माताजी को कह रहा था माँ कह दे मैं घर पर नहीं हूँ। यह सुनकर बेटा उदास हो गया, अतः निराश होकर दोनों लौट आए।

🔵 फिर पिता ने कहा कि बेटे आज तुझे मेरे दोस्त से मिलवाता हूँ। दोनों पिता के दोस्त के घर पहुंचे। पिता ने अपने मित्र को आवाज लगाई। उधर से जवाब आया कि ठहरना मित्र, दो मिनट में दरवाजा खोलता हूँ। जब दरवाजा खुला तो पिता के दोस्त के एक हाथ में रुपये की थैली और दूसरे हाथ में तलवार थी।

🔴 पिता ने पूछा, यह क्या है मित्र। तब मित्र बोला....अगर मेरे मित्र ने दो बजे रात्रि को मेरा दरवाजा खटखटाया है, तो जरूर वह मुसीबत में होगा और अक्सर मुसीबत दो प्रकार की होती है, या तो रुपये पैसे की या किसी से विवाद हो गया हो। अगर तुम्हें रुपये की आवश्यकता हो तो ये रुपये की थैली ले जाओ और किसी से झगड़ा हो गया हो तो ये तलवार लेकर मैं तुम्हारें साथ चलता हूँ। तब पिता की आँखे भर आई और उन्होंने अपने मित्र से कहा कि, मित्र मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं, मैं तो बस मेरे बेटे को मित्रता की परिभाषा समझ रहा था।

🔵 अतः मित्र, एक चुनें लेकिन नेक चुनें।

रविवार, 22 अक्टूबर 2017

👉 Sowing and Reaping (Investment & its Returns) (Last Part)

🔵 Don’t forget to visit my KACHCHA house, if you go to my village sometime in future. All the houses that time in village were KACCHCHE, so was mine also. With passage of time it was leveled on ground out of wear and tear. But here we live in houses made of bricks, the grand houses.
 
🔴 I have constructed GAYATRI TAPOBHUMI; just see how grand this is. It required millions of rupees. Also have a look at my house, the office of AKHAND-JYOTI and the press. Why to stop there, just visit SHANTIKUNJ to see its grandness. GAYATRI NAGAR, BRAMHVARCHAS and 2400 GAYATRI power seats (SHAKTIPEETH) are other additions to my progress I made after having invested all my resources made available to me by BHAGWAN in the form of labour, mind and feeling as also the ancestral money and property.  This is all about buildings only. But there are about 200 persons each in TAPOBHUMI and SHANTIKUNJ also living in these buildings on permanent basis. Where from comes the money to meet their requirements of food and maintenance? I do not know from where.                        
 
🔵 I never feel short of money. When the need be, I just hint to BHAGWAN and he in no time sends to me all that is required. For BHAGWAN every man is on equal footing. Applies to other also what applies to me. BHAGWAN is not bothered about having a soft corner for me and any enmity with you. Mechanism, but is the same as was told to me. My GURUDEV told me a method only to be adopted by me in letter and spirit and for this I am thankful to my GURUDEV. I tell you the same, teach you the same and hint you the same to proceed on the same way as I have proceeded on. You too will be obliged and delighted.

What else I should tell you? Finished, Today’s session.

🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (अन्तिम भाग)

🔴 आज और कुछ नहीं कहना है, केवल इतना ही कहना है कि जो हमारे बच्चे हैं, जिनको हमने पैदा किया है, पाला है, वे हमारी छाती से अलग न होने पावें। आप हमारी छाती से अलग हो जाएँगे तो हमें बहुत दुःख होगा, कष्ट होगा। किसी और बात से हमें दुःख नहीं होगा, पर जब ये छोटे-छोटे बच्चे जिनसे हमने बड़ी उम्मीदें लगाकर रखी हैं, वे अगर बागी होते दीखेंगे, विरोधी होते दीखेंगे तो हमें बेहद कष्ट होगा। कालनेमि से तो कहना ही क्या है वह तो भगवान ने ही बनाया है। अगर वह न होते तो लंका का सत्यानाश न होता। रावण सीताजी को नहीं चुराता, यह कालनेमि की माया ही थी अन्यथा किसकी हिम्मत थी जो रावण सहित लंका का सफाया करता।
      
🔵 जहाँ कहीं भी कालनेमि गया वहीं हाहाकार पैदा किया। बस चौथी बात यही कहनी है कि हमारा कोई चोर, कोई बाबाजी इन्हें अपनी झोली में डालकर ले जाएगा तो हमको दुःख होगा कि हमारा प्यारा बच्चा हमसे दूर हो गया। कितना कष्ट होगा आप नहीं समझते? आपने तो नेतागिरी देखी। पार्टियों की फजीहत देखी है कि किस तरीके से फूट डाली जाती है और कैसे अलग किया जाता है? आपने तो यही किस्से देखे हैं, वे किस्से नहीं देखे हैं कि मिल-जुलकर कैसे रहते हैं? एक होकर कैसे रहते हैं?

🔴 चार बातें हो गईं बेटा, अच्छा ध्यान रखना। हमने एक बात तो यह कही है कि आप रीछ-वानर के रूप में देवता हैं। दूसरी यह कि तुम्हें श्रेय देने के लिए दुश्मनों को मारकर रख दिया है और तुम्हारे लिए राजसिंहासन बनाकर रख दिया है। तुम उसको ग्रहण करना। तीसरी बात यह कि तुम अपनी व्यक्तिगत कठिनाइयों के बारे में परेशान मत होना। तुम्हारी व्यक्तिगत कठिनाइयाँ कौन हल करेगा? हमारा पुण्य, हमारा तप करेगा। हमारा पुण्य जो पिछले समय से आया है, वह हर एक के काम आयेगा और किसी के काम नहीं आयेगा। हमारा काम रुकने वाला नहीं है, वह बढ़ाता ही जाएगा। बस आप तो अपने आपको कालनेमि से बचाए रखना।

🔵 बहक जाएँगे तो हमें दुःख होगा कि हमारा कैसा प्यारा बच्चा था? कितने प्यार और मोहब्बत से इसको हमने पाला था और देखो आज यह कहाँ फिर रहा है? चोरों के यहाँ फिर रहा है, भिखारियों के यहाँ फिर रहा है। कहाँ-कहाँ धक्के खा रहा है। ऐसा आप लोग मत करना। यह चार बातें कहनी थीं आपसे। बसन्त पंचमी के बाद अब व्याख्यान दिया है। आज इतना ही बहुत है। इन्हीं बातों पर बार-बार विचार करना। आपके काम की देख−भाल हम करेंगे। आप देवता हैं, ध्यान रखना। आपको श्रेय लेना है, सिंहासन लेना है। आपको नेता बनना है और किसी झोली वाले बाबाजी से होशियार रहना है कि वह झोली में डालकर भाग खड़ा नहीं हो।
बस आपसे विदा लेते हैं।
ॐ शान्ति।
 
🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 22 Oct 2017

🔵 टालने की आदत से मुक्त होने के लिए मनुष्य को मन की सबल भावना से काम लेना चाहिए। आप मन में यह दृढ़ विचार कीजिये कि आप में पूरी योग्यताएं हैं, बुद्धि अत्यन्त कुशाग्र है, योग्यता भरी पड़ी है, आप प्रत्येक कार्य करने के लिए प्रस्तुत रहते हैं, आलस्य में आप संभव का अपव्यय नहीं करते वरन् तुरन्त काम को पूरा करने में जुट जाते है। आप आलस्य में डालकर अपने मस्तिष्क के जीवाणुओं को मृतप्राय नहीं करना चाहते वरन् उनका अधिकाधिक उपयोग कर उन्हें और सशक्त बनाते हैं।

🔴 हमारे अन्तःकरण में सत्य, प्रेम, न्याय, त्याग, उदारता, संयम, परमार्थ आदि की उच्च भावनाओं का होना आवश्यक है, उनकी जितनी अधिक मात्रा हो उतना ही उत्तम है, पर संसार के उन व्यक्तियों के साथ जो अभी अज्ञान या पाप के ज्वर से बेतरह पीड़ित हो रहे हैं, काफी सावधानी बरतने की आवश्यकता है। उनकी आत्मा का कल्याण हो, वे अनीति से छूटें, इस भावना के साथ यदि उन्हें भय या लोभ से प्रभावित करके सन्मार्ग पर लाया जा सके तो उसमें डरने की कोई बात नहीं है।

🔵 यदि अपने को श्रेष्ठ बनाना है तो सदा श्रेष्ठ मनुष्यों के संपर्क में रहना, श्रेष्ठ पुस्तकें पढ़ना, श्रेष्ठ बातें सोचना, श्रेष्ठ घटनायें देखना, श्रेष्ठ कार्य करना आवश्यक है। दूसरों में जो श्रेष्ठताएं उनकी कद्र करना और उन्हें अपनाना, श्रेष्ठता में श्रद्धा रखना यह सब बातें उन लोगों के लिए बहुत आवश्यक हैं जो अपने को श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं।

🔴 चाहे दूसरों का दुख कोई सन्त सहे चाहे पापी स्वयं सहे। हर हालत में दुखों का कारण पाप ही है। इसलिए जिन्हें दुख का भय है और सुख की इच्छा है उन्हें चाहिए कि पापों से बचे, दूसरों को बचावें और भूतकाल के पापों के लिए प्रायश्चित करें।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 महान कर्मयोगी स्वामी विवेकानन्द (भाग 1)

🔴 हिन्दू धर्म में अनेक प्रकार की साधन-प्रणालियाँ प्रचलित है, जिनका उद्देश्य आत्मा की उन्नति के पथ पर अग्रसर होते हुए जीवनमुक्ति की स्थिति को प्राप्त करना बतलाया गया है। अगर विभिन्न सम्प्रदायों और पंथों की दृष्टि से विचार किया जाय तो इन प्रणालियों की संख्या सैंकड़ों तक गिनी जा सकती है, पर जिन प्रणालियों को सब प्रकार के विचारों के विद्वानों ने सर्व सम्मति से श्रेष्ठ और प्रभावशाली स्वीकार किया है वे तीन है- कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग। कर्म योग का अर्थ है निष्काम भाव से परोपकार और सेवा के कार्य करना। परमात्मा के प्रति एकान्त भाव से भक्तिभाव रखते हुये परमार्थ करना भक्तियोग है।

🔵 ज्ञान मूलक कर्म द्वारा भगवान प्राप्ति का प्रयत्न करना ज्ञान योग हे। इस प्रकार बाह्य दृष्टि ये तीन पृथक् पृथक् मार्ग है, पर वास्तव में सबका उद्देश्य लोक सेवा और परपीडा निवारण ही माना गया है। अब तक के उदाहरणों पर विचार करने से हमको तो यही दिखलाई देता है कि जिन साम्प्रदायिक विद्वानों अथवा आचार्यों ने इन तीनों की विभिन्नता और किसी एक मार्ग की श्रेष्ठता का आग्रह किया है, उन्होंने विवाद के अतिरिक्त वास्तव में लोकोपकार का कोई कार्य नहीं किया, जब कि वास्तविक कार्य करने वाले महापुरुषों ने कभी इस बात पर विचार ही नहीं किया कि इनमें से कौन मार्ग श्रेष्ठ और कौन साधारण है, अथवा हम किसका अनुसरण करें?

🔴 स्वामी विवेकानन्द एक ऐसे ही महापुरुष थे। उनका जीवन आरम्भ से ही आध्यात्मिक नहीं था और एक समय था जब कि वे ईश्वर के अस्तित्व में भी संदेह प्रकट किया करते थे, पर तब भी उनमें निष्कामभाव से सेवाकार्य की भावना मौजूद थी। स्कूल और कालेज में पढ़ते समय से ही वे आवश्यकता पड़ने पर अपने सभी साथियों की हर प्रकार से सहायता करने में दत्तचित्त रहते थे। इसके पश्चात् जब श्रीरामकृष्ण परमहंस के सम्पर्क में आये तब भी उन्होंने अपने समस्त गुरुभाइयों की सेवा करनी और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये स्वयं अधिक से अधिक परिश्रम और प्रयत्न करना ही अपना लक्ष्य रखा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 श्री भारतीय योगी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1945 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.27

👉 आज का सद्चिंतन 22 Oct 2017


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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