सोमवार, 7 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 38)

🌹  चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी और सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।  

🔴 देहातों में तो और भी बुरी दशा का वातावरण, गंदगी, दुर्गंध और अस्वास्थ्यकर, घृणास्पद दृश्यों से भरा रहता है। कूड़े और गोबर के ढेर जहाँ-तहाँ लगे रहते हैं और उसकी सड़न सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए संकट उत्पन्न करती रहती है। इस दिशा में विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। सोखता पेशाब घर, सोखता नालियाँ तथा गड्ढे खोद कर लकड़ी के शौचालय बहुत सस्ते में तथा बड़ी आसानी से बनाए जा सकते हैं। गाँव में पानी का लोटा साथ ले जाने की तरह यदि खुरपी भी लोग साथ ले जाया करें और छोटा गड्ढा खोदकर उसमें शौच जाने के उपरांत गड्ढे को ढक दिया करें, तो जमीन को खाद भी मिले और गंदगी के कारण उत्पन्न होने वाली शारीरिक, मानसिक और सामाजिक अवांछनीयता भी उत्पन्न न हो।

🔵 स्वच्छता मानव जीवन की सुरुचि का प्रथम गुण है। हमें अपने शरीर, वस्त्र, उपकरण एवं निवास की स्वच्छता को ऐसा प्रबंध करना चाहिए जिससे अपने को संतोष और दूसरों को आनंद मिले। निर्मलता, निरोगिता, निश्चिंतता और निर्लिप्तता के आधार पर उत्पन्न की गई आत्मा की पवित्रता हमें ईश्वर से मिलाने का पथ प्रशस्त करती है। स्वच्छता को हम अनिवार्य मानें और अस्वच्छता का निष्कासन निरंतर करते रहें, यही हमारे लिए उचित है।
  
🔴 अच्छा हो हम समझदारी और सज्जनता से भरा हुआ, सादगी का जीवन जिएँ। अपनी बाह्य सुसज्जा वाले परिवार की तथा समाज की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरा करने में लगाने लगें। सादगी सज्जनता का प्रतिनिधित्व करती है। जिसका वेश-विन्यास सादगीपूर्ण है, उसे अधिक प्रामाणिक एवं विश्वस्त माना जा सकता है। जो जितना ही उद्धतपन दिखाएगा, समझदारों की दृष्टि में उतनी ही इज्जत गिरा लेगा। इसलिए उचित यही है कि हम अपने वस्त्र सादा रखें, उनकी सिलाई भले-मानसों जैसी कराएँ, जेवर न लटकाए नाखून और होठ न रंगे, बालों को इस तरह से न सजाए जिससे दूसरों को दिखाने का उपक्रम करना पड़े। नर-नारी के बीच मानसिक व्यभिचार का बहुत कुछ सृजन इस फैशन-परस्ती में होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.52

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.8

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 126)

🌹  चौथा और अंतिम निर्देशन

🔵 गुरुदेव ने कहा-‘‘अब तक जो बताया और कराया गया है, वह नितांत स्थानीय था और सामान्य भी। ऐसा वरिष्ठ मानव कर सकते हैं, भूतकाल में करते भी रहे हैं। तुम अगला काम सँभालोगे, तो यह सारे कार्य दूसरे तुम्हारे अनुवर्ती लोग आसानी से करते रहेंगे। जो प्रथम कदम बढ़ाता है, उसे अग्रणी होने का श्रेय मिलता है। पीछे तो ग्रह-नक्षत्र भी सौर मण्डल के सदस्य भी अपनी-अपनी कक्षा पर बिना किसी कठिनाई के ढर्रा चला ही रहे हैं। अगला काम इससे भी बड़ा है। स्थूल वायु मण्डल और सूक्ष्म वातावरण इन दिनों विषाक्त हो गए हैं, जिससे मानवी गरिमा ही नहीं, दैवीय सत्ता भी संकट में पड़ गई है। भविष्य बहुत भयानक दीखता है। इससे परोक्षतः लड़ने के लिए हमें-तुम्हें वह सब कुछ करना पड़ेगा, जिसे अद्भुत एवं अलौकिक कहा जा सके।’’

🔴 धरती का घेरा-वायु, जल और जमीन तीनों ही विषाक्त हो रहे हैं, वैज्ञानिक कुशलता के साथ अर्थ लोलुपता के मिल जाने से चल पड़े यंत्रीकरण ने सर्वत्र विष बिखेर दिया है और ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जिसमें दुर्बलता, रुग्णता और अकाल मृत्यु का जोखिम हर किसी के सिर पर मँडराने लगा है। अणु आयुधों के अनाड़ियों के हाथों प्रयोगों का खतरा इतना बड़ा है कि उसके तनिक से व्यतिक्रम पर सब कुछ भस्मसात् हो सकता है। प्रजा की उत्पत्ति बरसाती घास-पत्ती की तरह हो रही है। यह खाएँगे क्या? रहेंगे कहाँ? इन दिनों सब विपत्तियों-विभीषिकाओं से विषाक्त वायुमण्डल धरती को नरक बना देगा।

🔵 जिस हवा में लोग साँस ले रहे हैं, उसमें जो भी साँस लेता है, वह अचिंत्य चिन्तन अपनाता और दुष्कर्म करता है। दुर्गति हाथों-हाथ सामने आती जाती है। यह अदृश्य लोक में भर गए विकृत वातावरण का प्रतिफल है। इस स्थिति में जो भी रहेगा, नर पशु और नर-पिशाच जैसे क्रिया-कृत्य करेगा। भगवान् की इस सर्वोत्तम कृति धरती और मानव सत्ता को इस प्रकार नरक बनते देखने में व्यथा होती है। महाविनाश की सम्भावना से कष्ट होता है। इस स्थिति को बदलने, इस समस्या का समाधान करने के लिए भारी गोवर्धन पर्वत उठाना पड़ेगा, लम्बा समुद्र लाँघना पड़ेगा। इसके लिए वामन जैसे बड़े कदम उठाने को ही तुम्हें बुलाया गया है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

👉 सबसे बड़ी भूल

🔴 सबसे बड़ी भूल ‘मैं’ का होना है। ‘मैं’ से बड़ी भूल और कोई भी नहीं। परमात्मा के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा है। साधना पथ का यही महा अवरोध है। जो इस अवरोध को पार नहीं करते, सत्य के मार्ग पर उनकी कोई गति नहीं होती।

🔵 सूफी फकीर बायज़ीद एक गाँव से होकर गुजर रहे थे। उनके एक मित्र साधु भी उन दिनों उसी गाँव में रह रहे थे। उन्होंने सोचा जब यहाँ से गुजर रहा हूँ, तो अपने मित्र से भी मुलाकात करता चलूँ। चलते-चलते पथ की थकान भी हो आयी थी। रात भी आधी हो चली थी। थकान भी मिटेगी, रात्रि विश्राम भी हो जाएगा और साथ ही मित्र से मुलाकात भी।

🔴 इसी चाहत में उन्होंने एक बन्द खिड़की से प्रकाश को आते देख द्वार खटखटाया। भीतर से आवाज आयी-‘‘कौन है?’’ उन्होंने यह सोचा कि उन्हें तो अपनी आवाज से ही पहचान लिया जाएगा। कहा-‘मैं’। लेकिन भीतर से कोई भी उत्तर नहीं आया। फकीर बायज़ीद ने बार-बार द्वार पर दस्तक दी, पर कोई उत्तर न आया।

🔵 अब तो ऐसा लगने लगा कि जैसे यह घर बिलकुल निर्जन है। उन्होंने जोर से कहा-‘‘मित्र, तुम मेरे लिए द्वार क्यों नहीं खोल रहे हो और चुप क्यों हो गए?’’ भीतर से कहा गया-‘‘भला यह कौन नासमझ है, जो स्वयं को ‘मैं’ कहता है; क्योंकि ‘मैं’ कहने का अधिकार सिवाय परमात्मा के और किसी को भी नहीं है।’’

🔴 सूफी फकीर बायज़ीद को अपनी भूल का अहसास हो गया। उन्होंने तत्क्षण यह सत्य अन्तरतम की गहराइयों में अनुभव कर लिया कि जीवन की सबसे बड़ी भूल ‘मैं’ के सिवा और कुछ भी नहीं। प्रभु के द्वार पर हमारे ‘मैं’ का ही ताला है। जो उसे तोड़ देते हैं, वे ही पाते हैं, द्वार तो सदा से ही खुले थे। ‘मैं’ मिटा, कि प्रभु प्रकट हुए। ‘मैं’ की क्षुद्रता विलीन हुई कि परमात्मा की महानता आप ही अपनी सम्पदा बन गयी। इस सबसे बड़ी ‘मैं’ पन की भूल को जो सुधार लेता है, वह जीवन के सत्य को पा जाता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 96

👉 आज का सद्चिंतन 7 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Aug 2017


रविवार, 6 अगस्त 2017

👉ईश्वर को खोंजे नहीं, स्वयं में खोजे

🔴 ईश्वर को जो किसी वस्तु की भाँति खोजते हैं, वे नासमझ हैं। वह तो वस्तु है ही नहीं। वह तो आलोक, आनंद और अमृत के परम अनुभव का नाम है। ईश्वर न तो विषय है, न वस्तु और न ही व्यक्ति, कि जिसे कहीं बाहर खोजा या पाया जा सके। वह तो अपनी ही चेतना का आत्यंतिक परिष्कार है।

🔵 सूफी फकीर जुन्नैद से किसी ने पूछा, ‘‘ईश्वर है तो दिखाई क्यों नहीं देता?’’ जुन्नैद ने कहा, ‘‘ईश्वर कोई वस्तु तो है नहीं, वह तो अनुभूति है। उसे देखने का कोई उपाय नहीं। हाँ, अनुभव करने का अवश्य है।’’ फकीर जुन्नैद की ये बातें प्रश्नकर्त्ता को संतुष्ट न कर सकीं। तब उन्होंने पास में ही पड़ा एक पत्थर उठाया और अपने पाँव पर पटक लिया उनके पाँव को गहरी चोट आई और उससे खून की धारा बहने लगी। प्रश्नकर्त्ता व्यक्ति इसे देखकर हैरान हो गया और बोला, ‘‘यह क्या किया आपने? इससे क्या आपको पीड़ा नहीं होगी?’’ फकीर जुन्नैद हँसते हुए बोले, ‘‘पीड़ा दिखती नहीं, फिर भी है। ऐसे ही ईश्वर भी है।’’

🔴 वन में जो दिखाई पड़ता है, उसकी ही नहीं, उसकी भी सत्ता है, जो नहीं दिखाई पड़ता। दृश्य से उस अदृश्य की सत्ता बहुत गहरी है, क्योंकि उसे अनुभव करने के लिए स्वयं के अस्तित्व की गहराई में उतरना जरूरी होता है। तभी वह पात्रता उपलब्ध होती है, जो उसे छू सके, देख सके और जान सके। साधारण इंद्रियाँ नहीं, उसे पाने के लिए तो अनुभूति की गहरी संवेदनशीलता अर्जित करनी पड़ती है। तभी उसका साक्षात्कार होता है और तभी मालूम पड़ता है कि वह कहीं बाहर नहीं, जो उसे देखा जा सके, वह तो भीतर है, वह तो देखने वाले में ही छिपा है।

🔵 सच तो यह है कि ईश्वर को खोजना नहीं, खोदना होता है। जो स्वयं में ही उसे खोदते चले जाते हैं, अंत में वे अपने अस्तित्व के मूल स्रोत और चरम विकास के रूप में अनुभव करते हैं। तो बस सार यही है कि ईश्वर को बाहर नहीं खोजें, स्वयं में खोदें।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 95

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Aug 2017


👉 आज का सद्चिंतन 6 Aug 2017


शनिवार, 5 अगस्त 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Aug 2017


👉 आज का सद्चिंतन 5 Aug 2017


👉मानव की मौलिक स्वतंत्रता

    🔴मानव मौलिक रूप से स्वतंत्र है। प्रकृति ने तो उसे मात्र संभावनाएँ दी है। उसका स्वरूप निर्णीत नहीं है। वह स्वयं का स्वयं ही सृजन करता है। उसकी श्रेष्ठता अथवा निकृष्टता स्वयं उसी के हाथों में है। मानव की यह मौलिक स्वतंत्रता गरिमामय एवं महिमापूर्ण है, किन्तु वह चाहे तो इसे दुर्भाग्य भी बना सकता है और दुःख की बात यही है कि ज्यादातर लोगों के लिए यह मौलिक स्वतंत्रता दुर्भाग्य ही सिद्ध होती है, क्योंकि सृजन की क्षमता में विनाश की क्षमता और स्वतंत्रता भी तो छिपी है। ज्यादातर लोग इसी दूसरे विकल्प का ही उपयोग कर बैठते हैं।

    🔵निर्माण से विनाश हमेशा ही आसान होता है। भला स्वयं को मिटाने से आसान और क्या हो सकता है? स्व-विनाश के लिए आत्मसृजन में न लगना ही काफी है। उसके लिए अलग से और कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती। जो जीवन में ऊपर की ओर नहीं उठ रहा है, वह अनजाने और अनचाहे ही पीछे और नीचे गिरता चला जाता है।

    🔴एक बार ऐसी ही चर्चा महर्षि रमण की सत्संग सभा में चली थी। इस सत्संग सभा में कुछ लोग कह रहे थे कि मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठ है, किंतु कुछ का विचार था कि मनुष्य तो पशुओं से भी गया-गुजरा है, क्योंकि पशुओं का भी संयम एवं बर्ताव कई बार मनुष्य से अनेकों गुना श्रेष्ठ होता है। सत्संग सभा में महर्षि स्वयं भी उपस्थित थे। दोनों पक्ष वालों ने उनसे अपना निर्णायक मत देने को कहा। महर्षि कहने लगे, ‘‘देखो, सच यही है कि मनुष्य मृण्मय और चिन्मय का जोड़ है। जो देह का और उसकी वासनाओं का अनुकरण करता है, एवं नीचे-से-नीचे अँधेरे में उतरता जाता है और जो चिन्मय के अनुसंधान में रत होता है, वह अंततः सच्चिदानंद को पाता और स्वयं भी वही हो जाता है।’’


🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 94

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

👉 आज का सद्चिंतन 4 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Aug 2017


👉क्षण में शाश्वत की पहचान

  🔴क्षण में शाश्वत छुपा है और अणु में विराट्। अणु को जो अणु मानकर छोड़ दे, वह विराट् को ही खो देता है। इसी तरह जिसने क्षण का तिरस्कार किया, वह शाश्वत से अपना नाता तुड़ा लेता है। क्षुद्र को तुच्छ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यही द्वार है परम का। इसी में गहरे-गहन अवगाहन करने से परम की उपलब्धि होती है।

  🔵जीवन का प्रत्येक क्षण महत्त्वपूर्ण है। किसी भी क्षण का मूल्य, किसी दूसरे क्षण से न तो ज्यादा है और न ही कम है। आनंद को पाने के लिए किसी विशेष समय की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है। जो जानते हैं, वे प्रत्येक क्षण को ही आनंद बना लेते हैं और जो विशेष समय की, किसी खास अवसर की प्रतीक्षा करते रहते हैं, वे समूचे जीवन के समय और अवसर को ही गँवा देते हैं।

  🔴जीवन की कृतार्थता इकट्ठी और राशिभूत नहीं मिलती। उसे तो बिंदु-बिंदु और क्षण-क्षण में ही पाना होता है। प्रत्येक बिंदु सच्चिदानंद सागर का ही अमृत अंश है और प्रत्येक क्षण अपरिमेय शाश्वत का सनातन अंश। इन्हें जो गहराइयों से अपना सका, वही अमरत्व का स्वाद चख पाता है।

  🔵एक फकीर के महानिर्वाण पर जब उनके शिष्यों से पूछा गया कि आपके सद्गुरु अपने जीवन में सबसे श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण बात कौन-सी मानते थे? इसके उत्तर में उन्होंने कहा था, ‘‘वही जिसमें किसी भी क्षण वे संलग्न होते थे।’’

  🔴बूँद-बूँद से सागर बनता है और क्षण-क्षण से जीवन। बूँद को जो पहचान ले, वह सागर को जान लेता है और क्षण को जो पा ले, वह जीवन को पा लेता है। क्षण में शाश्वत की   पहचान ही जीवन का आध्यात्मिक रहस्य है।




🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 93

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

👉सत्य केवल एक है

  🔴सत्य केवल एक है, अनेक नहीं। हाँ, उस तक पहुँचने के द्वार जरूर अनेक हो सकते हैं। लेकिन जो द्वार के आकर्षण में उलझकर उसी के मोह में पड़ जाता है, वह द्वार पर ही ठहर जाता है। ऐसे में सत्य की समीपता उसके लिए कभी भी सुलभ नहीं होती है।

  🔵हालाँकि सत्य हर कहीं है। जो कुछ भी है सभी कुछ सत्य है। उसकी अभिव्यक्तियाँ अनंत हैं। वह तो सौंदर्य की ही भाँति है। सौंदर्य अगणित रूपों में प्रकट होता है, पर इससे क्या वह भिन्न-भिन्न हो जाता है। जो रात्रि में तारों में झलकता है, जो सूर्य में प्रकाश बन चमकता है, जो फूलों में सुगंध बनकर महकता है, जो हरे-भरे पहाड़ों से झरनों के रूप में झरता है, जो हृदय में भाव बन उमगता है और जो आँखों में प्रेम बनकर प्रकट होता है, वह भला क्या अलग-अलग है? हाँ, इनके रूप अलग-अलग हो सकते हैं। पर इन सभी में जो एकता स्थापित है, जो सबका सार है, वह तो एक ही है।

  🔴किंतु जो रूप पर मोहित हो जाता है, जो गंध और दृश्य की मादकता में स्वयं को भुला देता है वह तो बस रूप पर ही ठहर जाता है। वह उसके सारतत्त्व, उसकी आत्मा को नहीं जान पाता। ठीक भी है, भला जो सुंदर पर रुक गया हो, वह सौंदर्य तक पहुँचेगा भी कैसे?

  🔵ऐसे ही, जो शब्दों से बँध जाते हैं, उन्हें तो सत्य से वंचित रहना ही पड़ेगा। अब ये शब्द संस्कृत के हों या फिर अरबी के, हिब्रू के हों या फिर लैटिन के, शब्द तो शब्द ही हैं। सत्य उनकी लिखावट में नहीं, उनमें निहित भावों में है। जो भावों में पैठते हैं और गहराई से पैठते हैं, वे सत्य पा ही लेते हैं। वे जान लेते हैं कि अपने साररूप में हर कहीं एक ही सत्य विद्यमान है। जो इस सचाई को जानते हैं, वे राह के अवरोधों को भी सीढ़ियाँ बना लेते हैं और जो नहीं जानते, उनके लिए सीढ़ियाँ भी अवरोध बन जाती हैं।


🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 92

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Aug 2017


👉 आज का सद्चिंतन 3 Aug 2017


बुधवार, 2 अगस्त 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Aug 2017


👉 आज का सद्चिंतन 2 Aug 2017


👉महत्त्वाकांक्षा के ज्वर से मुक्ति

  🔴 महत्त्वाकांक्षा की धुरी पर घूमने वाला जीवनवृत्त ही नरक है। महत्त्वाकांक्षाओं का ज्वर जीवन को विषाक्त कर देता है, जो इस ज्वर की हवाओं से उद्वेलित हैं, शांति का संगीत और आत्मा का आनंद भला उनके भाग्य में कहाँ? वे तो स्वयं में ही नहीं होते हैं और शांति का संगीत एवं आत्मा का आनंद तो स्वयं में होने के ही फल हैं।

  🔵बड़ी सहज जिज्ञासा है, इस महत्त्वकांक्षा का मूल क्या है? इसका उत्तर भी उतना ही सहज है, ‘‘हीनता का भाव। अभाव का बोध।’’ हालाँकि ऊपर से दिखने में हीनता का भाव और महत्त्वाकांक्षी चेतना परस्पर विरोधी दिखाई देते हैं, लेकिन वस्तुतः वे एक ही भावदशा के दो छोर हैं। एक छोर से जो हीनता है, वही दूसरे छोर से महत्त्वाकांक्षा। हीनता ही स्वयं को ढकने-छिपाने के प्रयास में महत्त्वाकांक्षा बन जाती है। अपनी इस कोशिश में वह स्वयं को ढक तो लेती है, पर मिटती नहीं और ध्यान रखने की बात तो यह है कि किसी भी रोग को ढकने भर से कभी भी कोई छुटकारा नहीं है। इस भाँति रोग मिटते नहीं, वरन् पुष्ट ही होते हैं।

   
  🔴 व्यक्ति जब स्वयं की वास्तविकता से दूर भागता है, तब तक वह किसी-न-किसी रूप में महत्त्वाकांक्षा के ज्वर में ग्रसित होता रहता है। स्वयं से दूर भागने की आकांक्षा में वह स्वयं जैसा है, उसे ढकता है और भूलता है, लेकिन क्या हीनता की विस्मृति और उसका विजर्सन एक ही बात है? नहीं। हीनता की विस्मृति हीनता से मुक्ति नहीं है। इससे मुक्ति तो स्वयं को जानकर ही है, क्योंकि स्वयं से भागना ही वह मूल और केन्द्रीय भाव है, जिससे सारी हीनताओं का निर्माण होता है।

  🔵आत्मज्ञान के अतिरिक्त इस आंतरिक अभाव से और महत्त्वाकांक्षा के ज्वर से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है। जो अपने आप को जानने, उसमें जीने और जागने का साहस करते हैं, उनके लिए शून्य ही पूर्ण बन जाता है। फिर न हीन भाव रहता है और न उससे उपजने वाला महत्त्वाकांक्षा का ज्वर।
 

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 91

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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