बुधवार, 19 जुलाई 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 31)

🌹  समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।

🔴 दूरदर्शिता, विवेकशीलता, उस अनुभवी किसान की गतिविधियों जैसी हैं, जिनके अनुसार खेत जोतने, बीज बोने खाद- पानी देने, रखवाली करने में आरंभिक हानि उठाने और कष्ट सहने को शिरोधार्य किया जाता है। दूरदर्शिता उसे बताती है कि इसका प्रतिफल उसे समयानुसार मिलने ही वाला है। एक बीज के दाने के बदले सौ दाने उगने ही वाले हैं और समय पर उस प्रयास के प्रतिफल कोठे भरे धन धान्य के रूप में मिलने ही वाले हैं। संयम और सत्कार्य ऐसे ही बुद्धिमत्ता है। पुण्य परमार्थ में भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाली संभावनाएँ सन्निहित है।

🔵 संयम का प्रतिफल वैभव और पौरुष के रूप में दृष्टिगत होने वाली है। दूरबीन के सहारे दूर तक की वस्तुओं को देखा जा सकता है। और उस जानकारी के आधार पर अधिक बुद्धिमत्ता पूर्ण निर्णय लिया जा सकता है। अध्यात्म की भाषा में इसी को तृतीय नेत्र खुलना भी कहते हैं, जिसके आधार पर विपत्तियों से बचना और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं का सृजन संभव हो सकता है।

🔴 सुसंस्कारिता का दूसरा चिह्न है- ईमानदारी कथनी और करनी को एक- सा रखना ईमानदारी है। आदान- प्रदान में प्रामाणिकता को इसी सिद्धांत के सहारे अक्षुण्ण रखा जाता है। विश्वसनीयता इसी आधार पर बनती है। सहयोग और सद्भाव अर्जित करने के लिए ईमानदारी ही प्रमुख आधार है। इसे अपने व्यवसाय में अपनाकर कितनों ने छोटी स्थिति से उठकर बड़े बनने में सफलता पाई है। बड़े उत्तरदायित्वों को उपलब्ध करने और उसका निर्वाह करने में ईमानदार ही सफल होते हैं।

🔵 इस सद्गुण को सुसंस्कारिता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष माना गया है। उसे अपनाने वाले ईमानदारी और परिश्रम की कमाई से ही अपना काम चला लेते हैं। उनकी गरीबी भी ऐसी शानदार होती है, जिस पर अमीरी के भंडार को निछावर किया जा सके। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.43

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.7

👉 मैं नारी हूँ (भाग 1)

🔴 मैं नारी हूँ। मैं अपने पति की सहधर्मिणी हूँ और अपने पुत्र की जननी हूँ। मुझ सा श्रेष्ठ संसार में और कौन है, तमाम जगत् मेरा कर्मक्षेत्र है, मैं स्वाधीन हूँ, क्योंकि मैं अपनी इच्छानुरूप कार्य कर सकती हूँ। मैं जगत में किसी से नहीं डरती। मैं महाशक्ति की अंश हूँ। मेरी शक्ति पाकर ही मनुष्य शक्तिमान है।

🔵 मैं स्वतंत्र हूँ, परन्तु उच्छृंखल नहीं हूँ। मैं शक्ति का उद्गम स्थान हूँ, परंतु अत्याचार के द्वारा अपनी शक्ति को प्रकाशित नहीं करती। मैं केवल कहती ही नहीं करती भी हूँ। मैं काम न करूं, तो संसार अचल हो जाए। सब कुछ करके भी मैं अहंकार नहीं करती। जो कर्म करने का अभिमान करते हैं, उनके हाथ थक जाते हैं।

🔴 मेरा कर्मक्षेत्र बहुत बड़ा है। वह घर के बाहर है और घर के अन्दर भी। घर में मेरी बराबरी की समझ रखने वाला कोई है ही नहीं। मैं जिधर देखती हूँ, उधर ही अपना अप्रतिहत कर्तव्य पाती हूँ। मेरे कर्तव्य में बाधा देने वाला कोई नहीं है, क्योंकि मैं वैसा सुअवसर किसी को देती ही नहीं। पुरुष मेरी बात सुनने के लिए बाध्य है - आखिर मैं गृहस्वामिनी जो हूँ। मेरी बात से गृह संसार उन्नत होता है। इसलिए पति के सन्देह का तो कोई कारण ही नहीं है और पुत्र, वह तो मरा है ही, उसी के लिए तो हम दोनों व्यस्त हैं। इन दोनों को , पति को और पुत्र को अपने वश में करके मैं जगत् में अजेय हूँ। डर किसको कहते हैं, मैं नहीं जानती। मैं पाप से घृणा करती हूँ। अतएव डर मेरे पास नहीं आता। मैं भय को नहीं देखती इसी से कोई दिखाने की चेष्टा नहीं करता।

🔵 संसार में मुझसे बड़ा और कौन है ? मैं तो किसी को भी नहीं देखती और जगत में मुझसे बढ़कर छोटा भी कौन है ? उसको भी तो कहीं नहीं खोज पाती। पुरुष दम्भ करता है कि मैं जगत में प्रधान हूँ, बड़ा हूँ, मैं किसी की परवाह नहीं करता। वह अपने दम्भ और दर्प से देश को कंपाना चाहता है। वह कभी आकाश में उड़ता है, कभी सागर में डुबकी मारता है और कभी रणभेरी बजाकर आकाश वायु को कंपाकर दूर दूर तक दौड़ता है, परन्तु मेरे सामने तो वह सदा छोटा ही है, क्योंकि मैं उसकी माँ हूं। उसके रुद्र रूप को देखकर हजारों लाखों काँपते हैं, परन्तु मेरे अंगुली हिलाते ही वह चुप हो जाने के लिए बाध्य है। मैं उसकी माँ - केवल असहाय बचपन में ही नहीं सर्वदा और सर्वत्र हूँ। जिसके स्तनों का दूध पीकर उसकी देह पुष्ट हुई है, उसका मातृत्व के इशारे पर सिर झुकाकर चलने के लिए वह बाध्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1996 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1996/September/v1.8

👉 आत्मचिंतन के क्षण 19 July

🔴 अनेक प्रलोभन तेजी से हमें वश में कर लेते हैं, हम अपनी आमदनी को भूल कर उनके वशीभूत हो जाते हैं। बाद में रोते चिल्लाते हैं। जिह्वा के आनन्द, मनोरंजन आमोद प्रमोद के मजे हमें अपने वश में रखते हैं। हम सिनेमा का भड़कीला विज्ञापन देखते ही मन को हाथ से खो बैठते हैं और चाहे दिन भर भूखे रहें, अनाप-शनाप व्यय कर डालते हैं। इन सभी में हमें मनोनिग्रह की नितान्त आवश्यकता है। मन पर संयम रखिये। वासनाओं को नियंत्रण में बाँध लीजिये, पॉकेट में पैसा न रखिये। आप देखेंगे कि आप इन्द्रियों को वश में रख सकेंगे।

🔵 प्रलोभन एक तेज आँधी के समान है जो मजबूत चरित्र को भी यदि वह सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखती है। जो व्यक्ति सदैव जागरुक रहता है, वह ही संसार के नाना प्रलोभनों आकर्षणों, मिथ्या दंभ, दिखावा, टीपटाप से मुक्त रह सकता है। यदि एक बार आप प्रलोभन और वासना के शिकार हुए तो वर्षों उसका प्रायश्चित करने में लग जायेंगे।

🔴 सदा अपनी आमदनी पर दृष्टि रखिये। आमदनी से अधिक व्यय करना नितान्त मूर्खता और दिवालियापन की निशानी है। जैसे-2 आमदनी कम होती जाये, वैसे-2 व्यय भी उसी अनुपात में कम करते जाइये। व्यय में से विलासिता और आराम की वस्तुओं को क्रमशः हटाते चलिये, व्यसन छोड़ दीजिये, सस्ता खाइये, एक समय खाइये, सस्ता पहनिये। मामूली मकान में रह जाइये, नौकरों को छुड़ाकर स्वयं काम किया कीजिये, धोबी का काम खुद कर लीजिये, चाहे बर्तन तक खुद साफ कर लीजिये किन्तु आमदनी के बाहर पाँव न रखिये।।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 4)

🔵 भगवान शंकर के मस्तिष्क के ऊपर चन्द्रमा लगा हुआ है। चन्द्रमा शांति का प्रतीक है, जो बताता है कि हमारे मस्तिष्क को संतुलित होना चाहिए, ठंडा होना चाहिए, बलिष्ठ होना चाहिए। हम पर मुसीबतें आती हैं, संकट के, कठिनाई के दिन आते हैं। हर हालत में हमें अपनी हिम्मत बना करके रखनी चाहिए कि हम हर मुसीबत का सामना करेंगे। इनसानों ने बड़ी-बड़ी मुसीबतों का सामना किया है। जो घबरा जाते हैं, उनका मस्तिष्क संतुलित नहीं रहता, गर्म हो जाता है। जिस व्यक्ति का दिमाग ठंडा है, वही सही ढंग से सोच सकता है और सही काम कर सकता है पर जिसका दिमाग गरम हो जाता है, असंतुलित हो जाता है, तो वह काम करता है जो नहीं करना चाहिए और वह सोचता है कि जो नहीं सोचना चाहिए।

🔴 मुसीबत के वक्त आज जब घटाएँ चारों ओर से हमारी ओर घुमड़ती हुई आ रही हैं, तब सबसे जरूरी बात है हम शंकर भगवान के चरणों में जाएँ। आरती उतारने के बाद मस्तक झुकाएँ और यह कहें कि आपके मस्तक पर शांति का प्रतीक, संतुलन का प्रतीक, विभेद का प्रतीक चन्द्रमा लटक रहा है। क्या आप हमको धीरज देंगे नहीं? संतुलन देंगे नहीं? क्या शांति नहीं देंगे? हिम्मत नहीं देंगे? क्या आप इतनी भी कृपा नहीं कर सकते? अगर हमने यह प्रार्थना की होती तो मजा आ जाता, फिर हम शांति ले करके आते और शंकर जी के भक्तों के तरीके से रहते।

🔵 शंकर भगवान के गले में पड़े हुए हैं काले साँप और मुण्डों की माला। काले विषधरों का इस्तेमाल इस तरीके से किया है, उन्होंने कि उनके लिए ये फायदेमन्द हो गए, उपयोगी हो गए और काटने भी नहीं पाए। शंकर जी इस शिक्षा को हर शंकर-भक्त को अपनी फिलॉसफी में सम्मिलित करना ही चाहिए कि विषैले लोगों से किस तरीके से ‘डील’ करना चाहिए, किस तरीके से उन्हें गले से लगाना चाहिए और किस तरीके से उनसे फायदा उठाना चाहिए?

🔴 शंकर जी के गले पर पड़ी मुण्डों की माला भी यह कह रही है कि जिस चेहरे को हम बीस बार शीशे में देखते हैं, सजाने-सँवारने के लिए रंग-पावडर पोतते हैं, वह मुण्डों की हड्डियों का टुकड़ा मात्र है। चमड़ी, जिसे ऊपर से सुनहरी चीजों से रंग दिया गया है और जिस बाहरी टुकड़े के रंग को हम देखते हैं, उसे उघाड़कर देखें तो मिलेगा कि इनसान की जो खूबसूरती है, उसके पीछे सिर्फ हड्डी का टुकड़ा जमा हुआ पड़ा है। हड्डियों की मुण्डमाला की यह शिक्षा है, नसीहत है मित्रो! जो हमको शंकर भगवान के चरणों में बैठकर सीखनी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १९

🌹  पुरूषार्थ की शक्ति 

🔵 सुधारवादी तत्वों की स्थिति और भी उपहासास्पद है। धर्म, अध्यात्म, समाज एवं राजनीतिक क्षेत्रों में सुधार एवं उत्थान के नारे जोर- शोर से लगाये जाते हैं। पर उन क्षेत्रों में जो हो रहा है, जो लोग कर रहे हैं, उसमें कथनी और करनी के बीच जमीन आसमान जैसा अंतर देखा जा सकता है। एंसी दशा में उज्जवल भविष्य की आशा धूमिल ही होती चली जा रही है।

🔴 क्या हम सब ऐसे ही समय की प्रतिक्षा में,, ऐसे ही हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहें। अपने को असहाय,, असमर्थ अनुभव करते रहें और स्थिति बदलने के लिए किसी दूसरे पर आशा लगाये बैठे रहें। मानवी पुरुषार्थ कहता है ऐसा नहीं होना चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 19

🌹  The Power of Valor

🔵 Contemporary reformers are practically laughable. These false preachers shout down from rooftops that they will bring about religious, social, and political change. However, the differences between their words and actions are glaring. In these situations any sense of hope seems dimmed.

🔴 We do not need to wait quietly for a bright future, nor do we need to feel helpless and dependent on others to usher it in. We have the power to create it ourselves.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आज का सद्चिंतन 19 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 July 2017


मंगलवार, 18 जुलाई 2017

👉 Lose Not Your Heart Day 18

🌹  The Call of Time

🔵 Courage calls to us. The current era and its responsibilities call to us. We cannot ignore them. To uplift ourselves and our society, we will endure paths that are filled with thorns. We will not worry about what others say or do; we will be guided only by our own conscience.

🔴 Let those who wander aimlessly in the darkness do so, but we will take refuge in the light of our wisdom and move forward. We will not look for support from others. We will always be guided by our soul and our conscience, and we will have the courage to carry out our tasks as wise people should.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १८

🌹  पौरूष की पुकार 

🔵 साहस ने हमें पुकारा है। समय ने, युग ने,, कर्तव्य ने,, उत्तरदायित्व ने,, विवेक ने,, पौरूष ने हमें पुकारा है। यह पुकार अनसुनी न की जा सकेगी। आत्म निर्माण के लिए,, नव निर्माण के लिए हम काँटों से भरे रास्तों का स्वागत करेंगे और आगे बढ़ेंगे। लोग क्या कहते हैं और क्या करते हैं, इसकी चिंता कौन करे। अपनी आत्मा ही मार्गदर्शन के लिए पर्याप्त है। 

🔴 लोग अंधेरे में भटकते है, भटकते रहें । हम अपने विवेक के प्रकाश का अवलंबन कर स्वत: आगे बढ़ेंगे। कौन विरोध करता है, कौन समर्थन? इसकी गणना कौन करे । अपनी अंतरात्मा,, अपना साहस अपने साथ है और वही करेंगे, जो करना अपने जैसे सजग व्यक्तियों के लिए उचित और उपयुक्त है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 17 जुलाई 2017

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १७

🌹  बोलिए कम, करिए अधिक

🔵  ‘हमारी कोई सुनता नहीं, कहते कहते थक गए पर सुनने वाले कोई सुनते नहीं अर्थात् उन पर कुछ असर ही नहीं होता’- मेरी राय में इसमें सुनने वाले से अधिक दोष कहने वाले का है। कहने वाले करना नहीं चाहते। वे अपनी ओर देखें। आत्म निरीक्षण कार्य की शून्यता की साक्षी दे देगा। वचन की सफलता का सारा दारोमदार कर्मशीलता में है।

🔴 आप चाहे बोले नहीं, थोड़ा ही बोलें पर कार्य में जुट जाइये। आप थोड़े ही दिनों में देखेंगे कि लोग बिना कहे आपकी ओर खिंचे आ रहे हैं। अत: कहिए कम,, करिए अधिक। क्योंकि बोलने का प्रभाव तो क्षणिक होगा और कार्य का प्रभाव स्थाई होता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 17

🌹  Speak Less, Do More
🔵 Many people complain that no one listens to them. They say that their comments go unheeded and their thoughts unappreciated, and that they are tired of being ignored. The fault here lies in the speaker and not the listener. This is a demonstration of ignorance. Such people should first find their own faults by introspection. This will make their terrible lack of knowledge clear.

When you know how to carry out your work and lead by example, your instructions will be followed. Speak little, if at all, but above all involve yourself in your work, and your work will speak for you and call others to follow your example. Therefore speak less, do more: the effect pf speech is fleeting, whereas the effect of your work will be long-lasting.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 July

🔴 आकांक्षाओं के अनुरूप परिस्थितियाँ उपलब्ध कर लेना हर किसी के लिए संभव नहीं, ऐसे सुयोग तो किसी विरलों को ही मिलते हैं। आकाँक्षाओं पर कोई प्रतिबंध नहीं, एक गरीब आदमी बे रोक टोक राजा बनने के सपने देख सकता है। पर इसके लिए जिस योग्यता, परिस्थिति, एवं साधना सामग्री की जरूरत है उसे जुटा लेना कठिन है, हमारी आकाँक्षाएं बहुधा ऐसी होती हैं जिनका वर्तमान परिस्थितियों से मेल नहीं खाता इसलिए उनका पूरा होना प्रायः बहुत कठिन होता है। ऐसे बुद्धिमान लोग विरले ही होते हैं जो अपनी वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप आकाँक्षाएं करते हैं और उनके पूर्ण होने पर सफलता एवं प्रसन्नता का सुख अनुभव करते हैं।

🔵 दुख और क्लेशों की आग में जलने से बचने की जिन्हें इच्छा है उन्हें पहला काम यह करना चाहिए कि अपनी आकाँक्षाओं को सीमित रखें। अपनी वर्तमान परिस्थिति में प्रसन्न और संतुष्ट रहने की आदत डालें। गीता के अनासक्त कर्मयोग का तात्पर्य वही है कि महत्वाकांक्षायें वस्तुओं की न करके केवल कर्तव्य पालन की करें। यदि मनुष्य किसी वस्तु की आकाँक्षा करता है और उसे प्राप्त भी कर लेता है तो उस प्राप्ति के समय उसे बड़ी प्रसन्नता होती है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति सर्वांगीण आत्मोन्नति के प्रयत्न कर कर्तव्य पालन करने की आकाँक्षा करे तो उसे सफलता मिलते समय मिलने वाले आनन्द की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती, वरन् जिस क्षण में कर्तव्य पालन आरम्भ करता है उसी समय से आकाँक्षा की पूर्ति आरम्भ हो जाती है और साथ ही सफलता का आनन्द भी मिलता चलता है।

🔴 वही दुःखी है जिसकी तृष्णा विशाल है, जो नित्य नई-नई चीजों, विलास सामग्रियों की कामना किया करता है रुपये की प्राप्ति की दुर्दमनीय इच्छा की पूर्ति के लिए दिन रात कोल्हू के बैल की तरह जुता रहता है। तृष्णा दुःख का मूल है। गरीब वह नहीं है, जिसके पास कम है, बल्कि वह जो अधिक चाहता है। धनवान होते हुए भी जिसकी धनेच्छा दूर नहीं हुई, वह सबसे अधिक अभागा है। वह भी एक प्रकार के नर्क में निवास करता है। जिसने अपनी कामनाओं और वासनाओं का दमन करके मन को जीत लिया है, उसने स्वर्ग पाया है।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 लज्जा ही नारी का सच्चा आभूषण है

मगध की सौंदर्य साम्राज्ञी वासवदत्ता उपवन विहार के लिये निकली। आज का साज-शृंगार उस राज-वधू की तरह था जो पहली बार ससुराल जाती हैं।

एकाएक दृष्टि उपवन-ताल के किनारे स्फटिक शिला पर बैठे तरुण संन्यासी उपगुप्त पर गई। दीवारी ने बाह्य सौन्दर्य को अनिर्दिष्ट कर लिया था और उस आनन्द में कुछ ऐसा निमग्न हो गया कि उसे बाह्य जगत् की कोई सुध न रही थी।

हवा में पायल की स्वर झंकृति और सुगन्ध की लहरें पैदा करती वासवदत्ता समीप जा खड़ी हुई। भिक्षु के नेत्र खोले। वासवदत्ता ने चपल-भाव से पूछा-महामहिम बतायेंगे नारी का सर्वश्रेष्ठ आभूषण क्या है?”

“जो उसके सौंदर्य को सहज रूप से बड़ा दे-तपस्वी ने उत्तर दिया।

सहज का क्या अर्थ है? चंचल नेत्रों को उपगुप्त पर डालती वासवदत्ता ने फिर प्रश्न दोहराया।

उपगुप्त ने सौम्य मुस्कान के साथ कहा-देवि आत्मा जिन गुणों को बिना किसी बाह्य इच्छा, आकर्षण, भय, या छल के अभिव्यक्त करे, उसे ही सहज भाव कहते हैं, सौंदर्य को जो बिना किसी कृत्रिम साधन के बढ़ाता हो, नारी का वह भाव ही सच्चा आभूषण है।”

किन्तु वह भी वासवदत्ता समझ न सकी। उसने कहा-मैं स्पष्ट जानना चाहती हूँ, यों पहेलियों में आप मुझे न उलझायें।”

उपगुप्त अब कुछ गम्भीर हो गये और बोले-भद्रे यदि आप और स्पष्ट जानना चाहती हैं तो इन कृत्रिम सौंदर्य परिधान और आभूषणों को उतार फैकिये।”

पैरों की थिरकन के साथ वासव ने एक-एक आभूषण उतार दिये। संन्यासी निर्निमेष वह क्रीड़ा देख रहा था, निश्छल, मौन, विचार-मग्न वासवदत्ता ने अब परिधान उतारने भी प्रारम्भ कर दिये। साड़ी, चुनरी, लहंगा और कंचुकी सब उत्तर गये। शुभ्र निर्वसन देह के अतिरिक्त शरीर पर कोई पट-परिधान शेष नहीं रहा। तपस्वी ने कहा-देवि किंचित् मेरी ओर तो देखिये।” किन्तु इस बार वासवदत्ता लज्जा से आविर्भूत ऊपर को सिर न उठा सकी। तपस्वी ने कहा-देवि यही, लज्जा ही नारी का सच्चा आभूषण है।” और जब तक उसने वस्त्राभूषण पुनः धारण किये, उपगुप्त वहाँ से जा चुके थे।

अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1969 पृष्ठ 7

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👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 3)

🔵 भगवान शंकर का अंतरंग रूप क्या है? उसकी फिलॉसफी क्या है? भगवान शंकर का रूप गोल बना हुआ है। गोल क्या है—ग्लोब। यह सारा विश्व ही तो भगवान् है। अगर विश्व को इस रूप में मानें तो हम उस अध्यात्म के मूल में चले जाएँगे जो भगवान राम और कृष्ण ने अपने भक्तों को दिखाया था। गीता के अनुसार जब अर्जुन मोह में डुबा हुआ था, तब भगवान ने अपना विराट् रूप दिखाया और कहा—यह सारा विश्व-ब्रह्माण्ड जो कुछ भी है, मेरा ही रूप है। एक दिन यशोदा कृष्ण को धमका रही थी कि तैने मिट्टी खाई है। वे बोले—नहीं, मैंने मिट्टी नहीं खाई और उन्होंने मुँह खोलकर सारा विश्व-ब्रह्माण्ड दिखाया और कहा—यह मेरा असली रूप है।

🔴 भगवान राम ने भी यही कहा था। रामायण में वर्णन आता है कि माता-कौशल्या और काकभुशुण्डि जी को उन्होंने अपना विराट् रूप दिखाया था। इसका मतलब यह है कि हमें सारे विश्व को भगवान की विभूति, भगवान का स्वरूप मानकर चलना चाहिए। शंकर की गोल पिंडी उसी का छोटा-सा स्वरूप है जो बताता है कि यह विश्व-ब्रह्माण्ड गोल है, एटम गोल है, धरती माता-विश्वमाता गोल है। इसको हम भगवान का स्वरूप मानें और विश्व के साथ वह व्यवहार करें जो हम अपने लिए चाहते हैं दूसरों से, तो मजा आ जाए। फिर हमारी शक्ति, हमारा ज्ञान, हमारी क्षमता वह हो जाए जो शंकर भक्तों की होनी चाहिए।

🔵 भगवान शंकर के स्वरूप का कैसा-कैसा सुन्दर चित्रण मिलता है? शिवजी की जटाओं में से गंगा प्रवाहित हो रही है। गंगा का मतलब है—ज्ञान की गंगा। पानी बालों में से प्रवाहित नहीं होता, यदि होगा तो आदमी डूब जाएगा, पैदल नहीं चल सकेगा। इसका मतलब यह है कि शंकर-भक्त के मस्तिष्क में से ज्ञान की गंगा प्रवाहित होनी चाहिए, उसकी विचारधारा उच्चकोटि की और उच्चस्तरीय होनी चाहिए। घटिया किस्म के आदमी जिस तरीके से विचार करते हैं, जिनकी जिंदगी का मकसद केवल एक ही है कि किसी तरीके से पेट भरना चाहिए और औलाद पैदा करनी चाहिए, शंकर जी के भक्त को उस तरह के विचार करने वाला नहीं होना चाहिए।

🔴 जो कोई ऊँची बात सोच नहीं सकते, देश की, समाज की, धर्म की, लोक-परलोक की बात, कर्तव्य-फर्ज की बात जिनकी समझ में नहीं आती, उनको इनसान नहीं हैवान कहेंगे और ज्ञान की गंगा जिन लोगों के मस्तिष्क में से प्रवाहित होती है, उनका नाम शंकर का भक्त होता है। हमारे और आपके मस्तिष्क में से भी ज्ञान की गंगा बहनी चाहिए, जो हमारी आत्मा को शांति और शीतलता दे सकती है और पड़ोस के लोगों को, समीपवर्ती लोगों को उसमें स्नान कराकर पवित्र बना सकती है। यदि हमारा मस्तिष्क ऐसा व्यवहार करता हो तो जानना चाहिए कि शंकर जी की छवि आपने घरों में टाँग रखी है, उसके मतलब को, उसकी फिलॉसफी को जान लिया और समझ लिया है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 30)

🌹  समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।

🔴 सुसंस्कारिता के लिए चार आधारों को प्रमुख माना गया है— (1) समझदारी, (२) ईमानदारी, (३) जिम्मेदारी, (४) बहादुरी। इन्हें आध्यात्मिक- आंतरिक वरिष्ठता की दृष्टि में उतना ही महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए जितना कि शरीर के लिए अन्न, जल, वस्त्र और निवास को अनिवार्य समझा जाता है।

🔵 समझदारी का तात्पर्य है- दूरदर्शी विवेकशीलता का अपनाया जाना। आमतौर से लोग तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ मानते हैं और उसके लिए अनाचार भी अपना लेते हैं। इससे भविष्य अंधकारमय बनता है और व्यक्तित्व का स्तर एक प्रकार से हेय ही बन जाता है। अदूरदर्शिता तुर्त- फुर्त अधिक सुविधा सम्पादन के लिए लालायित रहती है और इस उतावली में ऐसे काम करने में भी नहीं झिझकती, जिनकी भावी परिणति बुरे किस्म की हो सकती है। मूर्ख चिड़ियाँ और मछलियाँ इसी दुर्बुद्धि के कारण तनिक से प्रलोभन में अपनी जिंदगी देती देखी गई हैं।

🔴 चटोरे व्यक्ति इसी ललक में अपनी स्वास्थ्य संपदा को तहस- नहस कर लेते हैं। यौनाचार में अतिवाद बरतने वाले लोग, जवानी में ही बूढ़े खोखले होकर अकाल मृत्यु के मुँह में चले जाते हैं। अपराधी तत्त्वों में से अधिकांश लोग इसी मनोवृत्ति के होते हैं। पढ़ने का समय आवारागर्दी में गुजार देने वाले व्यक्ति जवानी में ही दर- दर की ठोकरें खाते हैं। नशेबाजी भी इसी मूर्खता को अपना कर धीमी आत्म हत्या करने में बेधड़क लगे रहते हैं। ऐसी नासमझी के रहते आज का, अभी का लाभ ही सब कुछ दीख पड़ता है और भविष्य की संभावनाओं की संदर्भ में सोचने तक की फुर्सत नहीं मिलती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 125)

🌹  चौथा और अंतिम निर्देशन

🔵 चौथी बार गत वर्ष पुनः हमें एक सप्ताह के लिए हिमालय बुलाया गया। सन्देश पूर्ववत् सन्देश रूप में आया। आज्ञा के परिपालन में विलम्ब कहाँ होना था। हमारा शरीर सौंपे हुए कार्यक्रमों में खटता रहा है, किन्तु मन सदैव दुर्गम हिमालय में अपने गुरु के पास रहा है। कहने में संकोच होता है, पर प्रतीत ऐसा ही होता है कि गुरुदेव का शरीर हिमालय में रहता है और मन हमारे इर्द-गिर्द मँडराता रहता है। उनकी वाणी अन्तराल में प्रेरणा बनकर गूँजती रहती है। उसी चाबी के कसे जाने पर हृदय और मस्तिष्क का पेण्डुलम धड़कता और उछलता रहता है।

🔴 यात्रा पहली तीनों बार की ही तरह कठिन रही। इस बार साधक की परिपक्वता के कारण सूक्ष्म शरीर को आने का निर्देश मिला था। उसी काया को एक साथ तीन परीक्षाओं को पुनः देना था। साधना क्षेत्र में एक बार उत्तीर्ण हो जाने पर पिसे को पीसना भर रह जाता है। मार्ग देखा भाला था। दिनचर्या बनी बनाई थी। गोमुख से साथ मिल जाना और तपोवन तक सहज जा पहुँचना यही क्रम पुनः चला। उनका सूक्ष्म शरीर कहाँ रहता है, क्या करता है यह हमने कभी नहीं पूछा। हमें तो भेंट का स्थान मालूम है, मखमली गलीचा। ब्रह्मकमल की पहचान हो गई थी। उसी को ढूँढ़ लेते और उसी को प्रथम मिलन पर गुरुदेव के चरणों पर चढ़ा देते।

🔵 अभिवन्दन-आशीर्वाद के शिष्टाचार में तनिक भी देर न लगती और काम की बात तुरन्त आरम्भ हो जाती। यही प्रकरण इस बार भी दुहराया गया। रास्ते में मन सोचता आया कि जब भी जितनी बार भी बुलाया गया है तभी पुराना स्थान छोड़कर अन्यत्र छोड़कर अन्यत्र जाना पड़ा है। इस बार भी सम्भवतः वैसा ही होगा। शान्तिकुञ्ज छोड़ने के उपरान्त सम्भवतः अब इसी ऋषि प्रदेश में आने का आदेश मिलेगा और इस बार कोई काम पिछले अन्य कामों की तुलना में बड़े कदम के रूप में उठाना होगा। रास्ते के संकल्प विकल्प थे। अब तो प्रत्यक्ष भेंट हो रही थी।
  
🔴 अब तक के कार्यों पर उनने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। हमने इतना ही कहा-‘‘काम आप करते हैं और श्रेय मुझ वानर जैसे को देते हैं। समग्र समर्पण कर देने के उपरान्त यह शरीर और मन दीखने भर के लिए ही अलग हैं, वस्तुतः यह सब कुछ आपकी ही सम्पदा है। जब जैसा चाहते हैं, तब वैसा तोड़-मोड़कर आप ही उपयोग कर लेते हैं।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

रविवार, 16 जुलाई 2017

👉 आज का सद्चिंतन 17 July 2017


👉 मुठ्ठी खोलो बंधन मुक्त हो जाओ:-

🔴 एक बार एक संत अपनी कुटिया में शांत बैठे थे, तभी उन्हें कुछ शोर सुनाई दिया जा कर देखा तो एक बंदर ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था. उसका एक हाथ एक घड़े के अंदर था और वह बंदर अपना हाथ छुड़ाने के लिए चिल्ला रहा था।

🔵 संत को देख वह बंदर संत से आग्रह करने लगा के महाराज कृपया कर के मुझे इस बंधन से मुक्त करवाए संत ने बंदर को कहा के तुमने घड़े के अंदर हाथ डाला तो वह आसानी से उसमे चला गया....

🔴 परन्तु अब इसलिए बाहर नहीं निकल रहा है क्यूंकी तुमने अपने हाथ में लड्डू पकड़ा हुआ है जो की उस घड़े के अंदर है, अगर तुम वह लड्डू हाथ से छोड़ दो तो तुम आसानी से मुक्त हो सकते हो।

🔵 बंदर ने कहा के महाराज, लड्डू तो मैं नहीं छोड़ने वाला, अब आप मुझे बिना लड्डू छोड़े ही मुक्त होने की कोई युक्ति सुझाए।

🔴 संत मुस्कुराए और कहा के या तो लड्डू छोड़ दो अन्यथा तुम कभी भी मुक्त नही हो सकते।

🔵 हज़ार कोशिशों के बाद बंदर को इस बात का एहसास हुआ कि बिना लड्डू छोड़े मेरा हाथ इस घड़े से बाहर नही निकल सकता और मैं मुक्त नही हो सकता।

🔴 आख़िरकार बंदर ने वो लड्डू छोड़ा और सहजता से ही उस घड़े से मुक्त हो गया।

🔵 यह कहानी सिर्फ़ उस बंदर की ही नहीं बल्कि आज के हर उस इंसान की है जो की उस घड़े में (संसार में) फँसा बैठा है।

🔴 लड्डू (संसारिक वस्तुओं) को छोड़ना भी नहीं चाहता और उस घड़े (84 के फेरे से) से मुक्त भी होना चाहता है।

🔵 संत (सदगुरु) ने समझानें का कार्य कर दिया...... अब किसे कब समझ आए और वह कब मुक्त होगा यह उसकी समझ है।

👉 आपत्कालीन धर्म

 🔴 श्रावस्ती में भयंकर अकाल पड़ा। निर्धन लोग भूख मरने लगे। भगवान् बुद्ध ने संपन्न लोगों को बुलाकर कहा- भूख से पीड़ितों को बचाने के लिए कुछ उपाय करना चाहिये। संपन्न व्यक्तियों की कमी नहीं थी, पर कोई कह रहा था- मुझे तो घाटा हो गया, फसल पैदा ही नहीं हुई आदि।

🔵 उस समय सुप्रिया नामक लड़की खड़ी हुई और बोली- मैं दूँगी, सबको अन्न। लोगों ने कहा- लड़की तू! तू तो भीख माँगकर खाती है, दूसरों को क्या खिलाएगी? सुप्रिया ने कहा- हाँ मैं आज से इन पीड़ितों के लिए घर- घर जाकर भीख माँगकर लाऊँगी, पर किसी को मरने नहीं दूँगी। उसकी बात सुनकर दर्शक स्तब्ध रह गए और सबने उसे धन एवं अन्न देना प्रारंभ कर दिया।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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