शनिवार, 20 मई 2017

👉 शांतिकुंज का वातावरण -- अमृत, पारस और कल्पवृक्ष

🔴 आप कैसे सौभाग्यशाली हैं? आपको तो सहारा भी मिल गया। आमतौर से लोग अकेले ही मंजिल पार करते हैं, अकेले ही चलते हैं; पर आपको तो अकेले चलने के साथ लाठी का सहारा भी है, आप उस सहारे का क्यों नहीं लाभ उठाते? आप लोग पैदल सफर करते हैं, आपके लिए तो यहाँ सवारी भी तैयार खड़ी है, फिर आप लाभ क्यों नहीं उठाते? शान्तिकुञ्ज के वातावरण को केवल यह आप मत मानिये कि यहाँ दीवारें ही खड़ी हुईं हैं, आप यह मत सोचिये कि यहाँ शिक्षण का कुछ क्रम ही चलता रहता है, यह मत सोचिये कि यहाँ कुछ व्यक्ति विशेष ही रहते हैं।

🔵 आप यह भी मानकर चलिये कि यहाँ एक ऐसा वातावरण आपके पीछे-पीछे लगा हुआ है, जो आपकी बेहद सहायता कर सकता है। उस वातावरण से निकली प्राण की कुछ धाराओं को, जिसने खींचकर आपको यहाँ बुलाया है और आप जिसके सहारे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, उस वातावरण, प्रेरणा और प्रकाश को चाहें तो आप एक नाम यह भी दे सकते हैं—पारस।

🔴 पारस उस चीज का नाम है, जिसको छू करके लोहा भी सोना बन जाता है। आप लोहा रहे हों, पहले से; आपके पास एक पारस है, जिसको आप छुएँ, तो देख सकते हैं किस तरीके से काया बदलती है? आप अभावग्रस्त दुनिया में भले ही रहे हों पहले से, आपको सारी जिंदगी यह कहते रहना पड़ा हो कि हमारे पास कमियाँ बहुत हैं, अभाव बहुत हैं, कठिनाइयाँ बहुत हैं; लेकिन यहाँ एक ऐसा कल्पवृक्ष विद्यमान है कि जिसका आप सच्चे अर्थों में सहारा लें, तो आपकी कमियाँ, अभावों और कठिनाइयों में से एक भी जिंदा रहने वाला नहीं हैं, उसका नाम कल्पवृक्ष है। कल्पवृक्ष कोई पेड़ होता है कि नहीं, मैं नहीं जानता।

🔵 न मैंने कल्पवृक्ष देखा है और न मैं आपको कल्पवृक्ष के सपने दिखाना चाहता हूँ; लेकिन अध्यात्म के बारे में मैं यकीनन कह सकता हूँ कि वह एक कल्पवृक्ष है। अध्यात्म कर्मकाण्डों को नहीं, दर्शन को कहते हैं, चिंतन को कहते हैं। जीवन में हेर-फेर कर सके, ऐसी प्रेरणा और ऐसे प्रकाश का नाम अध्यात्म है। ऐसा अध्यात्म अगर आपको मिल रहा हो तो यहाँ मिल जाए या मिलने की जो संभावनाएँ हैं, उससे आप लाभ उठा लें, तो आप यह कह सकेंगे कि हमको कल्पवृक्ष के नीचे बैठने का मौका मिल गया है। यहाँ का वातावरण कल्पवृक्ष भी है, यहाँ का वातावरण-पारस भी है और यहाँ का वातावरण अमृत भी है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 वांग्मय न. 68 पृष्ट 3.12  

शुक्रवार, 19 मई 2017

👉 सिद्ध हुआ माँ का आशीर्वाद

🔵 वंदनीया माताजी के आशीर्वाद से ३ दिसम्बर १९९२ को मेरे छोटे भाई बैजनाथ की शादी कलकत्ता आवास पर निश्चित हुई। शादी की तैयारी बड़े जोर- शोर से चल रही थी। घर में हँसी- खुशी का माहौल था। विवाह के १८ दिन पहले १५ नवम्बर ९२ को सबसे छोटे भाई रामनाथ को चिरकुण्डा स्थित फैक्ट्री के अन्दर दिन में २ बजे किसी अज्ञात व्यक्ति ने गोली मार दी। गोली लगने के बावजूद रामनाथ स्वयं पेट में गमछा बाँधकर स्कूटर चलाकर १ किलोमीटर पर स्थित एक प्राइवेट नर्सिंग होम पहुँचे थे लेकिन वहाँ उपचार की समुचित सुविधा न होने पर भाइयों द्वारा उन्हें अस्पताल धनबाद ले जाया गया। माताजी गुरुदेव की कृपा थी, जिसके कारण रविवार अवकाश होने पर भी सभी डॉक्टर अस्पताल में मौजूद थे। डॉक्टरों ने केस की गम्भीरता से हमारे पिताजी श्री राम प्रसाद जायसवाल को अवगत कराया तथा न बचने की बात कही।

🔴 डॉक्टर की बात सुनकर सभी लोग बहुत परेशान हो उठे। लेकिन मेरे पिताजी को वंदनीया माताजी के आशीर्वाद पर पूरा भरोसा था। इसलिए डॉक्टर से ऑपरेशन करने को कह दिया। डॉक्टरों ने ऑपरेशन शुरू किया। इधर हम सभी लोग बैठकर माताजी से प्रार्थना करने लगे। मन में बार- बार भाव उठता, कुछ भी हो जाए माताजी ने घर में मांगलिक कार्यक्रम के लिए आशीर्वाद दिया है तो अमंगल कैसे हो सकता है? हम सभी के मन में यही भाव थे कि माताजी अवश्य ही अपना आशीर्वाद फलीभूत करेंगी।

🔵 हम सभी बैठकर माताजी का ध्यान कर मन ही मन गायत्री मंत्र जप कर रहे थे। करीब ४ घंटे के अथक प्रयास के बाद गोली निकाली जा सकी। सभी डॉक्टर बहुत अचंभित थे। डॉक्टरों ने मेरे पिताजी को बधाई देते हुए कहा कि इस ऑपरेशन में किसी अदृश्य शक्ति का संरक्षण मिल रहा था। इतने दुरूह ऑपरेशन के लिए काफी अधिक दक्षता की जरूरत थी। डॉक्टर साहब ने कहा कि गोली पेट को चीरते हुए किडनी के रास्ते रीढ़ की हड्डी में जा घुसी थी, जिसे निकालना आसानी से संभव नहीं था, लेकिन किसी अदृश्य शक्ति ने उस काम को बहुत आसानी से सम्पन्न करा दिया। इसके पश्चात् शक्तिपीठ से वन्दनीया माताजी द्वारा अभिमंत्रित जल की एक बूँद मुँह में डालने के ठीक दो घंटे बाद रामनाथ को होश आ गया। गुरु कृपा से मात्र १८ दिन में ही सारे उपचार हो गए। विवाह में उसे देखकर लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था कि जो लड़का विवाह की सारी व्यवस्था देख रहा है, उसे ही गोली लगी थी।
 
🔴 इस प्रकार माताजी के आशीर्वाद से घर में अमंगल भी मांगलिक कार्य में विघ्न नहीं डाल सका।
 
🌹 विश्वासनाथ प्रसाद जायसवाल चिरकुंडा, धनबाद (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/aad

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 105)

🌹  ब्राह्मण मन और ऋषि कर्म
🔵 अन्तरंग में ब्राह्मण वृत्ति जगते ही बहिरंग में साधु प्रवृत्ति का उभरना स्वाभाविक है। ब्राह्मण अर्थात् लिप्सा से जूझ सकने योग्य मनोबल का धनी। प्रलोभनों और दबावों का सामना करने में समर्थ। औसत भारतीय स्तर के निर्वाह के काम चलाने से सन्तुष्ट। इन परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने के लिए आरम्भिक जीवन में मार्गदर्शक का समर्थ प्रशिक्षण मिला। वही ब्राह्मण जन्म था, माता-पिता तो एक मांस पिण्ड को जन्म इससे पहले ही दे चुके थे।

🔴 ऐसे नर पशुओं का कलेवर न जाने कितनी बार पाप के पोटले, कमाने, लादने, ढोने और भुगतने पड़े होंगे। पर सन्तोष और गर्व इसी जन्म पर है। जिसे ब्राह्मण जन्म कहा जा सकता है। एक शरीर नर-पशु का दूसरा नर-नारायण का प्राप्त करने का सुयोग इसी बार मिला है।

🔵 ब्राह्मण के पास सामर्थ्य का भण्डार बच रहता है क्योंकि शरीर यात्रा का गुजारा तो बहुत थोड़े में निबट जाता है। हाथी, ऊंट, भैंसे आदि के पेट बड़े होते हैं, उन्हें उसे भरने के लिए पूरा समय लगे तो बात समझ में आती है। पर मनुष्य के सामने वैसी कठिनाई नहीं है। बीस उंगली वाले दो हाथ- कमाने की हजार तरकीबें ढूंढ़ निकालने वाला मस्तिष्क- सर्वत्र उपलब्ध विपुल साधन- परिवार सहकार का अभ्यास इतनी सुविधाओं के रहते किसी को भी गुजारे में न कमी पड़नी चाहिए न असुविधा।

🔴 फिर पेट की लम्बाई-चौड़ाई भी तो मात्र छः इन्च की है। इतना तो मोर कबूतर भी कमा लेते हैं। मनुष्य के सामने निर्वाह की कोई समस्या नहीं। वह कुछ ही घण्टे के परिश्रम में पूरी हो जाती है। फिर सारा समय खाली ही खाली बचता है। जिनके अन्तराल में सन्त जाग पड़ता है, वह एक ही बात सोचता है कि समय, श्रम, मनोयोग की जो प्रखरता, प्रतिभा हस्तगत हुई है, उसका सदुपयोग कहां किया जाय? कैसे किया जाय?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/brahman

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 20 May 2017


👉 कठिनाइयों से डरो मत, प्रयासरत रहो

🔵 यदि तुम कोई दोष सुधारना चाहते हो या कोई कठिनाई दूर करना चाहते हो, तो बस एक ही प्रक्रिया है-स्वयं को पूर्णतः चैतन्य बनाए रखो, पूर्णरूप से जाग्रत् रहो। सबसे पहले तुम्हें अपने लक्ष्य को साफ-साफ देखना होगा; परंतु इसके लिए अपने मन पर निर्भर न रहो, क्योंकि वह बार-बार इतस्ततः करता है। संदेह, भ्रम एवं हिचकिचाहटों के अंबार पैदा करता है। इसलिए एकदम आरंभ में ही तुम्हें यह ठीक-ठीक जानना चाहिए कि तुम क्या चाहते हो? मन से नहीं जानना चाहिए, बल्कि एकाग्रता के द्वारा, अभीप्सा के द्वारा और पूर्णतः संकल्पशक्ति के द्वारा जानना चाहिए। यह बहुत ही आवश्यक बात है।

🔴 दूसरे, धीरे-धीरे निरीक्षण के द्वारा, सतत और स्थायी जागरूकता के द्वारा, तुम्हें एक पद्धति ढूँढ़ निकालनी चाहिए, जो तुम्हारे अपने लिए व्यक्तिगत हो, केवल तुम्हारे लिए ही उपयुक्त हो। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी निजी प्रक्रिया ढूँढ़ निकालनी चाहिए, जो व्यवहार में लाने पर धीरे-धीरे अधिकाधिक स्पष्ट और सुनिश्चित होती जाए। तुम एक विषय को सुधारते हो, दूसरे को एकदम सरल बना देते हो और क्रमशः इस तरह आगे बढ़ते रहते हो। इस प्रकार कुछ समय तक सब ठीक-ठीक चलता रहता है।
  
🔵 परंतु एक सुहावने प्रातःकाल में तुम्हारे सामने कठिनाई आ उपस्थित होगी, एकदम अकल्पनीय और तुम निराश होकर सोचोगे कि सब कुछ व्यर्थ हो गया। पर बात ऐसी बिलकुल नहीं है, यह तुम निश्चित रूप से जान लो कि जब तुम अपने सामने इस तरह की कोई दीवाल देखते हो तो यह किसी नई चीज का प्रारंभ होता है। इस तरह बार-बार होगा और कुछ समय बाद तुम्हें इसकी आदत पड़ जाएगी। निरुत्साहित होने और प्रयास छोड़ देने की बात तो दूर, तुम प्रत्येक बार अपनी एकाग्रता, अपनी अभीप्सा एवं अपने विश्वास को बढ़ाते जाओगे और जो नई सहायता तुम्हें प्राप्त होगी, उसके सहारे तुम दूसरे साधनों को विकसित करोगे और जिन साधनों को तुम पार कर चुके हो, उनके स्थान पर उन्हें बैठाओगे।

🔴 सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि जो कुछ तुम जानो उसे व्यवहार में ले आओ और यदि तुम सतत प्रयास करते रहोगे, तो अवश्य सफल होगे। कठिनाई बार-बार आएगी। जब तुम अपने लक्ष्य पर पहुँच जाओगे तत्क्षण सभी कठिनाइयाँ केवल एक ही बार में सदा के लिए विलीन हो जाएँगी।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 76

👉 नर और नारी के मध्यवर्ती अनुदान प्रतिदान (भाग 1)

🔵 स्त्री के व्यक्तित्व की बनावट ऐसी है, कि अपने पति, बच्चे एवं परिवार के साथ घुल-मिल जाती है। पुरुष के लिए इसमें जितनी कठिनाई पड़ती है, स्त्री को उतनी नहीं। इसका अर्थ है, आत्मीयता का विस्तार। जिस घर में बचपन, किशोरावस्था पार कर यौवन की देहली पर पहुँचती है, जिन सहेलियों के साथ खेलती और जिन कुटुम्बियों के साथ इतनी आयु बिताती है, उसे छोड़कर सर्वथा नये परिवार में जा पहुँचना और सर्वथा अपरिचित लोगों को अपना बना लेना, सर्वथा अपने को उनमें घुला देना, असाधारण बात है। पति का एक दिन का परिचय दूसरे दिन इतनी घनिष्ठता में बदल जाना, मानो उसी के साथ पालन-पोषण हुआ हो, वस्तुतः आश्चर्य की बात है। पुरुष को उस सीमा तक इतनी जल्दी जा पहुँचना कठिनाई की बात है। आत्मीयता के क्षेत्र में इतनी जल्दी इतनी प्रगति करना पुरुष के लिए कठिन है।

🔴 यदि परिचय न हो और पिछले दिनों से घनिष्ठता न चल रही हो, तो स्त्री के प्रति पुरुष के मन में कौतूहल आश्चर्य अजनबीपन और अविश्वास बना रहता है। उसे दूर करने में देर लगती है।

🔵 नारी का निर्माण कुछ ऐसे तत्वों से हुआ है कि वह समर्थ और सुयोग्य होते हुए भी समर्पण कर सकती है। यह समर्पण परावलम्बन नहीं है। बच्चों को वह प्राणप्रिय मानने लगती है। इसका अर्थ यह नहीं, कि वह उनके आश्रित है या उनसे कोई प्रतिदान प्राप्त करती है। यही बात पति या समूचे परिवार के प्रति है। उसका श्रम, समर्पण इतना बहुमूल्य है कि उसका मूल्याँकन पैसों में नहीं किया जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 46
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/November/v1.46

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 7)

🌹  शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।  

🔵 आस्तिकता और कर्तव्य परायणता की सत्प्रवृत्ति का प्रभाव पहले अपने सबसे समीपवर्ती स्वजन पर पड़ना चाहिए। हमारा सबसे निकटवर्ती संबंधी हमारा शरीर है। उसके साथ सद्व्यवहार करना, उसे स्वस्थ और सुरक्षित रखना अत्यावश्यक है। शरीर को नश्वर कहकर उसकी उपेक्षा करना अथवा उसे ही संजोने-सँवारने में सारी शक्ति खर्च कर देना, दोनों ही ढंग अकल्याणकारी हैं। हमें संतुलन का मार्ग अपनाना चाहिए।

🔴 हमारा सदा सहायक सेवक शरीर है। वह चौबीसों घंटे सोते-जागते हमारे लिए काम करता रहता है। वह जिस भी स्थिति में हो, अपनी सामर्थ्य भर आज्ञा पालन के लिए तत्पर रहता है। सुविधा-साधनों के उपार्जन में उसी का पुरुषार्थ काम देता है। इतना ही नहीं, वरन् समय-समय पर अपने-अपने ढंग से अनेक प्रकार के रसास्वादन भी कराती रहती हैं। नेत्र, कान, नाक, जिह्वा ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ज्ञान तंतु अपने-अपने ढंग के रसास्वादन कराते रहते हैं। इन विशेषताओं के कारण ही आत्मा उसकी सेवा-साधना का मुग्ध हो जाती है और अपने सुख ही नहीं अस्तित्व तक को भूल कर उसी में पूरी तरह रम जाती है। उसका सुख-दुःख मानापमान आदि अपनी निज की भाव-संवेदना में सम्मिलित कर लेती है। यह घनिष्ठता इतनी अधिक सघन हो जाती है कि व्यक्ति, आत्मा की सत्ता, आवश्यकता तक को भूल जाता है और शरीर को अपना ही आपा मानने लगता है। उसका अंत हो जाने पर तो जीवन की इतिश्री ही मान ली जाती है। 

🔵 ऐसे वफादार सेवक को समर्थ, निरोग एवं दीर्घजीवी बनाए रखना प्रत्येक विचारशील का कर्तव्य है। चाहते तो सभी ऐसा ही हैं, पर जो रहन-सहन आहार-विहार अपनाते हैं, वह विधा ऐसी उल्टी पड़ जाती है कि उसके कारण अपने प्रिय पात्र को अपार हानि उठानी पड़ती है, इतना अत्याचार सहना पड़ता है कि उसका कचूमर तक निकल जाता है और रोता-कलपता दुर्बलता और रुग्णता से ग्रसित होकर व्यक्ति असमय में ही दम तोड़ देता है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/body

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.13

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 19 May 2017


👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 6)

🌹  हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे।

🔵 भगवान् को हम सर्वव्यापक एवं न्यायकारी समझकर गुप्त या प्रकट रूप से अनीति अपनाने का कभी भी, कहीं भी साहस न करें। ईश्वर के दंड से डरें। उसका भक्तवत्सल ही नहीं भयानक रौद्र रूप भी है। उसका रौद्र रूप ईश्वरीय दंड से दंडित असंख्यों रुग्ण, अशक्त, मूक, बधिर, अंध, अपंग, कारावास एवं अस्पतालों में पड़े हुए कष्टों से कराहते हुए लोगों की दयनीय दशा को देखकर सहज ही समझा जा सकता है। केवल वंशी बजाने वाले और रास रचाने वाले ईश्वर का ही ध्यान न रखें, उसका त्रिशूलधारी भी एक रूप है, जो असुरता और निमग्न दुरात्माओं का नृशंस दमन, मर्दन भी करता है।

🔴 न्यायनिष्ठ जज को जिस प्रकार अपने सगे संबंधियों, प्रशंसक मित्रों तक को कठोर दंड देना पड़ता है, फाँसी एवं कोड़े लगाने की सजा देने को विवश होना पड़ता है, वैसे ही ईश्वर को भी अपने भक्त-अभक्त का, प्रशंसक-निंदक का भेद किए बिना उसके शुभ-अशुभ कर्मों का दंड पुरस्कार देना होता है। ईश्वर हमारे साथ पक्षपात करेगा। सत्कर्म न करते हुए भी विविध-विध सफलताएँ देगा या दुष्कर्मों के करते रहने पर भी दंड से बचे रहने की व्यवस्था कर देगा, ऐसा सोचना नितांत भूल है। उपासना का उद्देश्य इस प्रकार ईश्वर से अनुचित पक्षपात कराना नहीं होना चाहिए, वरन, यह होना चाहिए कि वह हमें अपनी प्रसन्नता के प्रमाणस्वरूप सद्भावनाओं से ओत-प्रोत रहने, सत्प्रवृत्तियों में संलग्न रहने की प्रेरणा, क्षमता एवं हिम्मत प्रदान करें, भय एवं प्रलोभन के अवसर आने पर वे भी सत्पथ से विचलित न होने की दृढ़ता प्रदान करें यही ईश्वर की कृपा का सर्वश्रेष्ठ चिह्न है। पापों से डर और पुण्य से प्रेम, यही तो भगवद्-भक्त के प्रधान चिह्न हैं।

🔵 कोई व्यक्ति आस्तिक है या नास्तिक, इसकी पहचान किसी तिलक, जनेऊ, कंठी, माला, पूजा-पाठ स्नान, दर्शन आदि के आधार पर नहीं वरन् भावनात्मक एवं क्रियात्मक गतिविधियों को देखकर ही की जा सकती है। आस्तिक की मान्यता प्राणिमात्र में ईश्वर की उपस्थिति देखती है। इसलिए उसे हर प्राणी के साथ उदारता, आत्मीयता एवं सेवा सहायता से भरा मधुर व्यवहार करना पड़ता है। भक्ति का अर्थ है-प्रेम जो प्रेमी है, वह भक्त है। भक्ति भावना का उदय जिसके अंतःकरण में होगा, उसके व्यवहार में प्रेम की अजस्र निर्झरिणी बहने लगेगी। वह अपने प्रियतम को सर्वव्यापक देखेगा और सभी से अत्यंत सौम्यता पूर्ण व्यवहार करके अपनी भक्ति भावना का परिचय देगा। ईश्वर दर्शन का यही रूप है। हर चर-अचर में छिपे हुए परमात्मा को जो अपनी ज्ञान दृष्टि से देख सका और तदनुरूप अपने कर्तव्य का निर्धारण कर सका, मानना चाहिए कि उसे ईश्वर दर्शन का लाभ मिल गया। अपने में परमेश्वर को और परमेश्वर में अपने को देखने की दिव्य दृष्टि जिसे प्राप्त हो गई, समझना चाहिए कि उसने पूर्णता का जीवन लक्ष्य प्राप्त कर लिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/hum
 

👉 नारी को समुचित सम्मान एवं उत्थान दीजिए। (अन्तिम भाग)

🔵 यदि मनुष्य सच्ची सुख-शान्ति चाहता है और चाहता है कि उसकी उसकी नारी अन्नपूर्णा बनकर उसकी कमाई में प्रकाण्डता भरे, उसके मन को माधुर्य और प्राणों को प्रसन्नता दे! उसके परिश्रान्त जीवन में श्री बनकर हँसे और संसार-समर में शक्ति बनकर साहस दे, तो उसे पैरों से उठाकर अर्धांग में सम्मान देना ही होगा। अन्यथा टूटे पहिये की गाड़ी के समान उसकी जिन्दगी धचके खाती हुई ही घिसटेगी। घरबार उसे बेकार का बोझ बनकर त्रस्त करता रहेगा। अयोग्य एवं अनाचारी बच्चों की भीड़ दुश्मन की तरह उसके पीछे पड़ी रहेगी।

🔴 इस प्रकार देश, समाज, घर-गृहस्थी तथा वैयक्तिक विकास तथा सुख-शान्ति के लिये नारी की इस आवश्यकता जानकर भी जो उसे अधिकारहीन करके पैर की जूती बनाये रखने की सोचता है, वह उसे समाज का ही नहीं, अपनी आत्मा का भी हितैषी नहीं कहा जा सकता।

🔵 अपने राष्ट्र का मंगल, समाज का कल्याण और अपना वैयक्तिक हित ध्यान में रखते हुए नारी को अज्ञान के अन्धकार से निकाल कर प्रकाश में लाना होगा। चेतना देने के लिये उसे शिक्षित करना होगा। सामाजिक एवं नागरिक प्रबोध के लिये उसके प्रतिबंध हटाने होंगे और भारत की भावी सन्तान के लिये उसे ठीक-ठीक जननी का आदर देना ही होगा। समाज के सर्वांगीण विकास और राष्ट्र की समुन्नति के लिए यह एक सबसे सरल, सुलभ और समुचित उपाय है जिसे घर-घर में प्रत्येक भारतवासी को काम में लाकर अपना कर्त्तव्य पूर्ण करना चाहिये। यही आज की सबसे बड़ी सभ्यता सामाजिकता, नागरिकता और मानवता है। वैसे घर में नारी के प्रति संकीर्ण होकर यदि कोई बाहर समाज में उदारता और मानवता का प्रदर्शन करता है तो वह दम्भी है, आडम्बरी और मिथ्याचारी है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1966 पृष्ठ 28
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/April/v1.28

👉 साधना की गहराइयों से आता संदेश

🔵 मौन साधना की गहराइयों में एक अनुभूति मुखर हो उठी। ईश्वर से प्रतिध्वनित होकर आवाज आई। उसने कहा, ‘‘अहो! एक ऐसा प्रेम है, जो सभी को अपने में समा लेता है, जो जीवन से भी महान है, मृत्यु से भी महान है, जो सीमा नहीं जानता, जो सर्वत्र है, जो मृत्यु की उपस्थिति में है तथा जो केवल भावसंवेदना है। मैं वही प्रेम हूँ। वह प्रेम जो अनिर्वचनीय मधुरता है, जो सभी वेदनाओं का, सभी भयों का स्वागत करता है, जो सभी प्रकार की उदासीनता को दूर करता है। मैं वही प्रेम हूँ।’’

🔴 ‘‘अहो! यह एक सर्वग्राही सौंदर्य है। यह सौंदर्य सुगंधित ऊषा तथा अरुणिम संध्या में प्रस्फुटित होता है। पक्षी के कलरव तथा बाघ की गर्जना में भी यही विद्यमान है। तूफान और शांति में यही सौंदर्य विद्यमान है; किंतु यह इन सबसे अतीत है। ये सब इसके पहलू हैं। मैं सौंदर्य हूँ, एक ऐसा सौंदर्य, जो सुख तथा दुःख से अधिक गहन गंभीर है। यह आत्मा का सौंदर्य है। मैं ही वह सौंदर्य हूँ। मैं ही वह आकर्षण हूँ तथा आनंद ही मेरा स्वरूप है।’’
  
🔵 ‘‘अहो! एक जीवन है, जो प्रेम है, आनंद है! मैं वही जीवन हूँ। उस जीवन को कोई सीमित नहीं कर सकता, परिमित नहीं कर सकता। वही अनंत जीवन है, वही शाश्वत जीवन है और वह जीवन मैं ही हूँ। उसका स्वभाव शांति है और मैं स्वयं शांति हूँ-मौन की गहन गहराइयों से उपजी शांति। उसकी समग्रता में कहीं कलह नहीं है त्वरित आवागमन नहीं है। मैं वही जीवन हूँ। सूर्य और तारे इसे धारण नहीं कर सकते। इस ज्योति से अधिक प्रकाशवान और कोई ज्योति नहीं है। यह स्वयं प्रकाशित है। मैं ही वह जीवन हूँ तथा तुम मुझमें और मैं तुममें हूँ।’’

🔴 ‘‘मैं सभी भ्रांतियों के मध्य में एक ही सत्य देखता हूँ। यह दृश्य सत्य मैं ही हूँ। काल के गर्भ से उत्पन्न होकर सभी रूपधारियों में मैं ही रूप धारण करता हूँ। मैं काल का भी जन्मस्थान हूँ। इसलिए शाश्वत हूँ तथा जीव तू वही है जो मुझमें है-वही अंतरात्मा। इसलिए उठो, जागो और सभी बंधनों को छिन्न-भिन्न कर दो, तुम ही जाग्रत आत्मा हो। उठो! उठो! और जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए, रुको मत। लक्ष्य जो कि प्रेम है, जो मुक्त आत्मा का आनंद है, शाश्वत ज्ञान है।’’

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 76

गुरुवार, 18 मई 2017

👉 ...और मुझे दर्शन हो गये

🔵 जब मैं घुटनों के बल चला करती थी, तभी से घर में होने वाले पूजन, हवन तथा मंत्रोच्चार के प्रति मेरे मन में एक जिज्ञासा का भाव था। कुछ और बड़ी होने पर मेरी माँ ने मुझे गायत्री मंत्र का अभ्यास करा दिया था और मैं भी घर के अन्य सदस्यों के साथ हवन में शामिल होने लग गई थी।

🔴 घर के लोग प्रायः शान्तिकुञ्ज तथा पूज्य गुरुदेव के बारे में बातें किया करते थे। मैं जब भी माँ से पूछती कि पूज्य गुरुदेव कौन हैं, तो उनकी तस्वीर की ओर इशारा करके वह हमेशा यही कहती- उनके बारे में मैं तुम्हें क्या बताऊँ? वे कोई आदमी थोड़े ही हैं। वे तो भगवान हैं, भगवान! 

🔵 माँ की ऐसी बातें सुन- सुन कर मेरा मन पूज्य गुरुदेव से मिलने के लिए बेचैन होने लगा। मैं बार- बार शान्तिकुञ्ज आने की जिद करने लगी।
 
🔴 यह उन दिनों की बात है जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ती थी। बहुत जिद करने पर भी घर से अनुमति नहीं मिली और लाख चाहने पर भी मैं गुरुदेव के दर्शन नहीं कर सकी। आठवीं कक्षा में आते- आते मैंने पहली दूसरी कक्षा के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था।
 
🔵 सन् १९९०ई. में अचानक एक दिन पता चला कि बोकारो शक्तिपीठ से कुछ परिजन शान्तिकुञ्ज जा रहे हैं। गुरुदेव से मिलने की मेरी उत्कंठा अब तक चरम पर पहुँच चुकी थी। मैंने तत्काल शान्तिकुञ्ज जाने का मन बना लिया और वहाँ जाने वाले एक परिजन से मिलकर उनके साथ चलने का कार्यक्रम तय कर लिया। इस बात की मैंने घर में किसी को भनक तक नहीं लगने दी, डर था कि वे सभी फिर मना कर देंगे।
 
🔴 परिजनों की टोली के साथ मैं शान्तिकुञ्ज पहुँची। अगले दिन सुबह से ही मैं यह सोचकर खुशी से पागल हुई जा रही थी कि आज गुरुदेव के दर्शन होंगे। ऊपर के कक्ष में जाकर पहले मैंने माताजी को प्रणाम किया, तो उन्होंने सिर सहलाते हुए आशीर्वाद दिया। इसके बाद गुरुदेव को प्रणाम करने पर उन्होंने मुझे आधा पुष्प देकर आधा स्वयं रख लिया। आधा फूल देने का अर्थ मेरी समझ में नहीं आया। वापसी में सीढ़ियों से उतरती हुई मैं इसी बात पर सोचती जा रही थी कि एक अद्भुत् अनुभूति हुई। ऐसा लगा कि मेरे कानों में कोई कुछ कह रहा है।
 
🔵 मैंने आवाज पहचानने की कोशिश की तो बड़ा आश्चर्य हुआ, वह गुरुदेव की ही आवाज थी। वे मुझसे कह रहे थे- तुम्हें मेरे बहुत सारे काम करने हैं। तुम जब किसी काम के लिए आगे बढ़ोगी तो मैं कदम- कदम पर तुम्हारा काम आसान करता चलूँगा।
पूज्य गुरुदेव द्वारा आधा फूल देकर आधा अपने पास रख लेने का अर्थ अब कुछ- कुछ मेरी समझ में आने लगा था।
 
🔴 अगले ही दिन वसंत पंचमी पर मैंने गुरुदीक्षा ले ली। जब विदाई का समय आया तो वंदनीया माता जी से मिलने गई। सोचकर तो चली थी कि मैं उनसे बहुत कुछ कहूँगी लेकिन कुछ भी नहीं कह सकी। एक ही साथ मन में इतनी बातें आ रही थीं कि कुछ कहते नहीं बना।   इस ऊहापोह में आँखों से आँसू बहने लगे। मेरी सबसे बड़ी चिन्ता तो यह थी कि मैं किसी को बताये बिना घर से चली आई थी। साथ की महिलाओं ने भी मुझे पूरी तरह से डरा रखा था। मन कह रहा था कि अगर माताजी आशीर्वाद दे दें, तो घर पहुँचने पर मुझे कोई कुछ नहीं कहेगा।

🔵 माताजी ने मेरे मन का भाव बिना कुछ कहे समझ लिया। उन्होंने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा- बेटा चिन्ता मत कर, सब कुछ ठीक हो जाएगा, घर के लोग तुम्हें कुछ भी नहीं कहेंगे। .....और आश्चर्य! घर पहुँचते ही डाँट- फटकार और पिटाई की आशंकाएँ निर्मूल सिद्ध हुईं। घर में सबको पहले ही पता चल चुका था कि मैं शान्तिकुञ्ज गई हूँ। माँ- पिताजी ने एक शब्द भी नहीं कहा। उल्टे सभी इस बात को लेकर खुश हो रहे थे कि मैं वन्दनीया माताजी और पूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद लेकर लौटी हूँ।
 
🔴 उसी वर्ष जब २ जून को गुरुदेव ने शरीर छोड़ दिया तो हम सभी शोकाकुल हो गए। मेरे माता- पिता दुःखी मन से आपस में बातें कर रहे थे। माँ कह रही थी- हम दोनों से अच्छी किस्मत लेकर तो हमारी अन्जु ही आई है। हम कई सालों तक सोचते ही रह गए और यह लड़की अकेली जाकर भगवान के दर्शन कर आई। पिताजी ने कहा- तुम सच कह रही हो। अन्जु अपनी मर्जी से थोड़े ही गई थी। उसे तो पूज्य गुरुदेव ने शान्तिकुञ्ज बुलाकर स्वयं दर्शन दिए थे। पर, हमारा ऐसा भाग्य कहाँ!

🌹 अंजू उपाध्याय डी. एस. पी. (अरुणांचल प्रदेश
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/aur

बुधवार, 17 मई 2017

👉 सब कुछ करता तू ही...

🔵 एक बार मेरी धर्मपत्नी बहुत गम्भीर रूप से बीमार हो गईं। उन्हें दमा की बीमारी थी। हालत इतनी खराब थी कि पानी में हाथ डालना भी मुश्किल था। कोई भी काम अपने हाथ से नहीं कर पातीं। केवल हम दो व्यक्तियों के परिवार में घर के काम- काज के लिए दो लड़कियों को रखना पड़ा। अपनी दोनों बेटियों का विवाह हो चुका था। वे अपने परिवार की जिम्मेदारियों को छोड़कर हमारे पास आकर मॉँ की सेवा नहीं कर सकतीं थी। इधर यह बीमारी थी जो छूटती ही नहीं थी। पाँच साल तक इलाज चलता रहा। मगर हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती ही चली गई।

🔴 मैं स्वयं एक होमियोपैथ चिकित्सक हूँ। होमियोपैथिक,एलोपैथी,आयु़र्वेद सब तरह का इलाज कराकर थक चुका था। हर रात किसी न किसी डॉक्टर को बुलाकर लाना पड़ता था। हुगली जिले में ऐसे कोई प्रतिष्ठित डॉक्टर नहीं बचे थे जिन्हें न दिखाया गया हो, लेकिन यह सिलसिला कभी समाप्त होता नहीं दिखता था। रात- रात भर पत्नी के बिस्तर के पास बैठकर बीतता। कभी रोते- रोते गुरु देव से प्रार्थना करता- हे गुरु देव! उनकी यह असह्य पीड़ा हमसे नहीं सही जाती। या तो ठीक ही कर दीजिए या जीवन ही समाप्त कर दीजिए।

🔵 दिन पर दिन बीतते गए। हमारे आँसुओं का कोई अंत नहीं दिखता था। एक दिन आधी रात को इसी उधेड़बुन में बैठा था कि किस नए डॉक्टर को दिखाया जाए। दिखाने से कोई लाभ है भी या नहीं। अचानक किसी की आवाज आई- इतनी चिन्ता क्यों करते हो? एक अंतिम प्रयास खुद भी तो करके देखो। मैंने चौंककर इधर- उधर देखा। यह अन्तरात्मा की आवाज थी। जैसे गुरु देव ही इलाज की नई दिशा की ओर इंगित कर रहे हों। मैंने तत्काल निर्णय कर लिया, अब जो कुछ हो उन्हीं के निर्देश पर इलाज करूँगा। किसी डॉक्टर को नहीं बुलाऊँगा।
 
🔴 यह निर्णय लेते ही मन में उत्साह की लहर आई। मन की सारी दुश्चिंताए मिट गईं। भोर होते- होते मैंने धर्मपत्नी को भी यह बात बता दी कि अब मेरे घर कोई डॉक्टर नहीं आएँगे। मैं ही इलाज करूँगा। उन्होंने भी सहमति जताई। कहा- ‘मर तो जाऊँगी ही, यह मरण अगर आपके ही हाथों लिखा हो, तो कौन टाल सकता है? पत्नी की इन निराशा भरी बातों से भी मेरा उत्साह कम नहीं हुआ। बल्कि अन्दर से जोरदार कोई प्रेरणा उठी और मैं होमियोपैथी की किताब लेकर बैठ गया।
 
🔵 गहन अध्ययन कर सारे लक्षणों को मिलाकर सटीक दवा खोजने का प्रयास करता। इसी तरह एक के बाद एक कई दवाएँ चलाईं; लेकिन स्थिति दिन- पर बुरी होती गई। बेटियाँ मुझ पर लांछन लगाने लगीं। आस- पड़ोस के लोग भी कंजूस कहकर ताने देने लगे। बेटियों ने तो यहाँ तक कह दिया कि यदि हमारी माँ को कुछ हो गया, तो हम आपको जेल भी पहुँचाने में नहीं चूकेंगी। फिर भी इस काम में गुरु देव का निर्देश समझकर मैं जुटा रहा।
 
🔴 गुरु देव को स्मरण कर एक पर एक दवा मिला- मिलाकर प्रयोग परीक्षण करता रहा। कुछ लाभ न होता देख जब मन विचलित हो उठा, हिम्मत जवाब देने लगी, तब फिर एक बार वही आवाज सुनाई पड़ी- चिन्ता मत कर, कल तू जरूर सही दवा खोज निकालेगा। मैं चारों ओर से ध्यान हटाकर किताब लेकर बैठा। सारे लक्षणों को सूचीबद्ध किया। पहले दी गई दवाओं के परिणामों को देखते हुए दुबारा अच्छी तरह अध्ययन कर दवा चुनी। गुरु देव का स्मरण कर दवा देते समय मन ही मन कहा- गुरुदेव! यह दवा मैं नहीं दे रहा। यह आपकी दी हुई दवा है। अब आप जानिए और आपका काम जाने।
 
🔵 गुरु देव की बात सच हुई। दवा सही निकली। इसी दवा से धीरे- धीरे मेरी पत्नी स्वस्थ होने लगी। हमारे घर में फिर से खुशियाँ लौट आईं। इसके बाद से पूज्य गुरु देव को स्मरण कर जब- जब रोगियों को दवा दी है, रोगी को अवश्य ही आराम पहुँचा है। गुरुदेव की बड़ी कृपा रही है मुझ पर।

🌹 डॉ.टी० के० घोष हुगली (पं.बंगाल)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/sfg

👉 आइए! आत्म शक्ति द्वारा अपने अभावों की पूर्ति करें

🔴 आपको अपने जीवन में अनेक प्रकार की आवश्यकताएँ अनुभव होती हैं, अनेक अभाव प्रतीत होते हैं और अनेक इच्छाएँ अतृप्त दशा में अन्तःकरण में कोलाहल कर रही हैं। इस प्रकार का अशान्त एवं उद्विग्न जीवन जीने से क्या लाभ? विचार कीजिए कि इनमें कितनी इच्छाएँ वास्तविक हैं और कितनी अवास्तविक? जो तृष्णाएँ मोह ममता और भ्रम अज्ञान के कारण उठ खड़ी हुई हैं उनका विवेक द्वारा शयन कीजिए। क्योंकि इन अनियंत्रित वासनाओं की पूर्ति, तृप्ति और शान्ति संभव नहीं। एक को पूरा किया जायेगा कि दस नई उपज पड़ेंगीं।

🔵 जो आवश्यकताएँ वास्तविक हैं। उनको प्राप्त करने के लिए अपने पुरुषार्थ को एकत्रित करके इसे उचित उपयोग कीजिए। पुरुष का पौरुष इतना शक्तिशाली तत्व है कि उसके द्वारा जीवन की सभी वास्तविक आवश्यकताएँ आसानी से पूरी हो सकती हैं। इसमें से अधिकाँश का पौरुष सोया हुआ रहता है। क्योंकि उसे प्रेरणा देने वाली अग्नि आत्म शक्ति- मंद पड़ी रहती है। उस चिंगारी को जगाकर अपने शक्ति भण्डार को चैतन्य किया जा सकता है। यह सचेत पौरुष हमारी प्रत्येक सच्ची आवश्यकता को पूरी करने में पूर्णतया द्वारा समर्थ है। आइए, अभावग्रस्त चिन्तातुर स्थिति से छुटकारा पाने के लिए तृष्णाओं का विवेक द्वारा शमन करें और आवश्यकता को पूर्ण करने वाले पौरुष को जगाने के लिए आत्मशक्ति की चिंगारी को जगावें।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/August/v1.1

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 103)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 अध्यात्म को विज्ञान से मिलाने की योजना-कल्पना में तो कइयों के मन में थी, पर उसे कोई कार्यान्वित न कर सका इस असम्भव को सम्भव होते देखना हो तो ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में आकर अपनी आँखों से स्वयं देखना चाहिए। जो सम्भावनाएँ सामने हैं, उन्हें देखते हुए कहा जा सकता है कि अगले दिनों अध्यात्म की रूपरेखा विशुद्ध विज्ञान पर बनकर रहेगी।

🔵 छोटे-छोटे देश अपनी पंच वर्षीय योजनाएँ बनाने के लिए आकाश-पाताल के कुलावे मिलाते हैं, पर समस्त विश्व की कायाकल्प योजना का चिंतन और क्रियान्वयन जिस प्रकार शान्तिकुञ्ज के तत्त्वावधान में चल रहा है, उसे एक शब्द में अद्भुत एवं अनुपम ही कहा जा सकता है।

🔴 भावनाएँ हमने पिछड़ों के लिए समर्पित की हैं। शिव ने भी यही किया था। उनके साथ चित्र-विचित्र समुदाय रहता था और सर्पों तक को वे गले लगाते थे। उसी राह पर हमें भी चलते रहना पड़ा है। हम पर छुरा रिवाल्वर चलाने वालों को पकड़ने वाले जब दौड़ रहे थे पुलिस भी लगी हुई थी। सभी को हमने वापस बुला लिया और घातक को जल्दी ही भाग जाने का अवसर दिया। जीवन में ऐसे अनेक प्रसंग आए हैं, प्रतिपक्षी अपनी ओर से कुछ कमी न रहने देने पर भी मात्र हँसने और हँसाने के रूप में प्रतिदान पाते रहे हैं।

🔵 हमने जितना प्यार लोगों से किया है, उससे सौ गुनी संख्या और मात्रा में लोग हमारे ऊपर प्यार लुटाते रहे हैं। निर्देशों पर चलते रहे हैं और घाटा उठाने तथा कष्ट सहने में पीछे नहीं रहे हैं। कुछ दिन पूर्व प्रज्ञा संस्थान बनाने का स्वजनों को आदेश किया, तो दो वर्ष के भीतर २४०० गायत्री शक्ति पीठों की भव्य इमारतें बनकर खड़ी हो गईं और उसमें लाखों रुपयों की राशि खप गई। बिना इमारत के १२ हजार प्रज्ञा संस्थान बने सो अलग। छुरा लगा तो सहानुभूति में इतनी बड़ी संख्या स्वजनों की उमड़ी, मानों मनुष्यों का आँधी-तूफान आया हो। इनमें से हर एक बदला लेने के लिए आतुरता व्यक्त कर रहा था। हमने तथा माताजी ने सभी को दुलार कर दूसरी दिशा में मोड़ा। यह हमारे प्रति प्यार की-सघन आत्मीयता की ही अभिव्यक्ति तो है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.7

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 18 May 2017


👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 5)

🌹  हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे।

🔵 हम में से अनेक दुर्बल व्यक्ति शैतान के प्रलोभन में फँसते और गला कटाते हैं। विवेक कुंठित हो जाता है। भगवान् पहचानने में नहीं आता, सन्मार्ग पर चलना नहीं बन पड़ता और हम चौकड़ी चूक कर मानव जीवन में उपलब्ध हो सकने वाले स्वर्णिम सौभाग्य से वंचित रह जाते हैं। ईश्वर पर अटूट विश्वास और उसकी अविच्छिन्न समीपता का अनुभव, इसी स्थिति को आस्तिकता कहते हैं। उसका नाम ‘उपासना’ है। परमेश्वर सर्वत्र व्याप्त है, कोई गुप्त, प्रकट स्थान उसकी उपस्थिति से रहित नहीं, वह सर्वांतर्यामी घट-घट की जानता है। सत्कर्म ही उसे प्रिय है। धर्म मार्ग पर चलने वाले को ही वह प्यार करता है। इतना ही मान्यता तो ईश्वर भक्त में विकसित होनी ही चाहिए। इस प्रकार की निष्ठा जिसमें होगी वह न शरीर से दुष्कर्म करेगा और न मान में दुर्भावों को स्थान देगा। इसी प्रकार जिसको ईश्वर के सर्वव्यापक और न्यायकारी होने का विश्वास है, वह कुमार्ग पर पैर कैसे रखेगा? आस्तिक कुकर्मी नहीं हो सकता। जो कुकर्मी है उसकी आस्तिकता को एक विडंबना या प्रवंचना ही कहना चाहिए।

🔴 ईश्वर का दंड एवं उपहार ही असाधारण हैं। इसलिए आस्तिक को इस बात का सदा ध्यान रहेगा कि दंड से बचा जाए और उपहार प्राप्त किया जाए। यह प्रयोजन छुट-पुट पूजा-अर्चना जप-ध्यान से पूरा नहीं हो सकता। भावनाओं और क्रियाओं को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने से ही यह प्रयोजन पूरा होता है। न्यायनिष्ठ जज की तरह ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। स्तन, अर्चन करके उसे उसके नियम विधान से विचलित नहीं किया जा सकता है। अपना पूजन स्मरण या गुणगान करने वाले के साथ यदि वह पक्षपात करने लगे, तब उसकी न्याय-व्यवस्था का कोई मूल्य न रहेगा, सृष्टि की सारी व्यवस्था ही गड़बड़ा जाएगी। सबको अनुशासन में रखने वाला परमेश्वर स्वयं भी नियम व्यवस्था में बँधा है। यदि कुछ उच्छृंखलता एवं अव्यवस्था बरतेगा तो फिर उसकी सृष्टि में पूरी तरह अंधेर खाता फैल जाएगा। फिर कोई उसे न तो न्यायकारी कहेगा और न समदर्शी। तब उसे खुशामदी या रिश्वतखोर नाम से पुकारा जाने लगेगा, जो चापलूस स्तुति कर दे, उससे प्रसन्न, जो पुष्प-नैवेद्य भेंट करें, उससे प्रसन्न।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/hum
 

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...