सोमवार, 15 मई 2017

👉 संजीवनी ने किया नवचेतना का संचार

🌹 (पग- पग पर गुरुदेव ने सिखाया, बचाया और सँवारा)

🔵 गुरु की चमत्कारिक कृपा को जीवन के क्षण- क्षण में अनुभव किया है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि गुरुतत्व की अदृश्य चैतन्यशक्ति सतत मार्गदर्शन, संरक्षण, मंगलमय जीवन, हर प्रगति और हर कर्म के कुशल- क्षेम वहाम्यहम् का वचन निभाती रही है। पूर्वजन्मों के संस्कारवश योग, आसन, उपवास, आदि में अभिरुचि रही। कई एक अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ भी हुईं, लेकिन आगे के लिए गुरु की खोज रही। कई आश्रमों, मठों और चर्चित महापुरुषों के सम्पर्क में आया। अनायास ‘कादम्बिनी’ नामक पत्रिका के तंत्र- विशेषांक में आचार्य श्रीराम शर्माजी के तंत्र महाविज्ञान पर एक लेख में शान्तिकुञ्ज और ब्रह्मवर्चस् शोध- संस्थान के बारे में पढ़ने को मिला।

🔴 पत्र- व्यवहार के बाद आने की अनुमति मिली। लेकिन परिवार से जाने की अनुमति नहीं मिली। शान्तिकुञ्ज से फिर वंदनीया माताजी का पत्र पहुँचा- आयुष्यमान आए नहीं, प्रतीक्षा होती रही। यह राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए यज्ञ के राष्ट्रव्यापी अभियान का वर्ष था! दूसरी बार अकेले ही जमालपुर से हरिद्वार बगैर रिजर्वेशन के रेल यात्रा से पहुँचा। लगा, रास्ते भर कोई दिव्य शक्ति संरक्षित करती रही। पहुँचने पर शान्तिकुञ्ज का वातावरण अपूर्व, मनोरम और अलौकिक प्रतीत हुआ। वंदनीया माताजी से भेंट और परामर्श का अवसर मिला। यहाँ हालांकि प्रवचनों में गायत्री और यज्ञ की महिमा को सुना लेकिन वैज्ञानिक तर्क के स्तर पर सहमत नहीं हो पा रहा था।

🔵 क्योंकि ऐसी महिमाएँ पहले भी सुनता रहा था, किसी प्रकार का अनुभव हुआ नहीं था। कई असमंजस के साथ जब ट्रेन से लौट रहा था, सोए रहने की वजह से ट्रेन आगे बढ़ गई थी। टी.टी. किसी न किसी बहाने सबसे कुछ रकम ऐंठ रहा था। उसने मुझसे भी कुछ रकम माँगी। प्रयोग के तौर पर मैंने मन ही मन गायत्री मंत्र जपना आरंभ किया। मेरे हाथ में गुरुदेव की लिखी कोई पुस्तक थी। टीटी ने पुस्तक मेरे हाथ से लेकर पूछा- ‘कहाँ से आ रहे हैं?
 
🔴 मैंने कहा- ‘शांतिकुंज हरिद्वार से।’ टी. टी. ने कहा- ‘हाँ, मेरे एक चाचाजी भी यहाँ से जुड़े हैं, मेरी श्रद्धा है इस संस्था से।’ फिर टी. टी. ने मुझे ससम्मान सही ट्रेन में बैठाया। यह तो गायत्री मंत्र की शक्ति की एक झलक मात्र थी। आचार्य जी के उपलब्ध साहित्य को पढ़ते हुए एक जगह भावना ठहर गई। एक पुस्तक में उन्होंने लिखा था कि जिन्हें विश्वास न हो वे गायत्री मंत्र का जप करके तो देखें। गायत्री मंत्र जप कर रहा था। इसी बीच राज्य स्तर के प्रतिष्ठित विद्वान प्राध्यापक के पुत्र जिनसे मेरी मैत्री थी, अपने पिता के ब्रेन हैमरेज के आघात के बाद एक दिन राय- मशवरे के लिये अपने घर ले गए। मेरे जैसे अदना व्यक्ति के साथ नामी- गिरामी बुद्धिजीवी का आध्यात्मिक विषय पर चर्चा- परिचर्चा मेरे लिये अप्रत्याशित रोमांच था।
    
🔵 मैं लगातार सुन और पढ़ रहा था कि बिना गुरुदीक्षा के साधना फलती नहीं, मंत्र में प्राण नहीं आता। लेकिन तार्किक मन गुरुदीक्षा का अर्थ अधीनता समझ रहा था। कई बार नौ दिवसीय सत्र में दीक्षा के अवसर को टालता रहा। एक बार इसी तरह टालते हुए आश्रम की कैंटीन में बैठा। एक गुजराती महिला ने अनायास पूछा- ‘आप कितनी बार शान्तिकुञ्ज आ चुके हैं?’ मैंने कहा- ‘पाँच बार’ महिला- ‘आपने दीक्षा ली’ - ‘नहीं।’ महिला- ‘इतनी बार शान्तिकुञ्ज आ चुके हैं, दीक्षा नहीं ली?’ यह बात जैसे दिल को छू गई।
 
🔴 एक बार माँ और बहनों को लेकर शान्तिकुञ्ज आया। माँ पहली बार में ही दीक्षित हो गई। दूसरी बार माँ के साथ शान्तिकुञ्ज आया। माँ ने कहा इस बार अवश्य ही दीक्षा ले लो। मैंने दीक्षा तो ली लेकिन अभी भी बेशर्त समर्पण का भाव था नहीं। अभी भी बौद्धिक भूख के रूप में विभिन्न साधना, ध्यान मार्ग की पद्धतियों में भटक रहा था। कई बार ऐसा लगा कि स्वयं गुरुदेव ही मुझे ये सब जानने समझने की सुविधा और अवसर उपलब्ध करा रहे हैं। एक बार आँवलखेड़ा के युगसंधि महापुरश्चरण की अर्द्धपूर्णाहुति के अवसर पर टूंडला किसी धार्मिक सत्संग स्थल पर गया। आगरा आते हुए बस से उतरते वक्त बुरी तरह सड़क पर गिर गया।

🔵 वहाँ के लोगों ने उठाकर सड़क के किनारे लिटाया। सामने एक बड़े पोस्टर में गुरुदेव व माताजी की आशीषमय मुद्रा में बड़ी तस्वीर थी। इस स्थिति में प्रबल आत्मविश्वास से भरी प्रार्थना के साथ इन्हें संरक्षक के रूप में स्वीकारा। अद्भुत! वहाँ के बड़े परोपकारी लोग चैरिटेबिल अस्पताल ले गए। वहाँ अस्थिरोग विशेषज्ञ, चिकित्सकों ने पूरा ख्याल किया। वहाँ सहायक सज्जनों ने बड़ी सद्भावपूर्ण भावना से कांधे पर बिठाकर ट्रेन आदि के सहारे घर पहुँचाया। गायत्री परिवार के लोगों की सामूहिक प्रार्थना के बलबूते मैं स्वस्थ हुआ। कुछ लोग मिशन के कार्य से बुलाने आते। टाल- मटोल करता रहा। एक दिन आधी रात को माँ को गंभीर रूप से बीमार होने के कारण अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। ऑक्सीजन सिलेंडर लगाना पड़ा। मुझे यह गुरुकार्य की अवहेलना का दण्ड लगा।

🔴 अस्पताल के पीछे चबूतरे पर बैठकर गुरुदेव से प्रार्थना की कि अब आपकी सेवा में पूरे तौर पर तत्पर रहूँगा। आश्चर्य! माँ ठीक होने लगी। फिर गायत्री मिशन में बेशर्त पूर्णतः सक्रिय हुआ हूँ। हमारी तीनों बहिनें मिशनरी गतिविधि में अपनी गायन- वादन प्रतिभा से सक्रिय हैं। गुरु के अनुदान स्वरूप उन्हें अच्छी शिक्षा, उत्तम वैवाहिक जीवन प्राप्त हुआ।
एक और घटना जिसने चेतना को उन्नत बनाया और शारीरिक चिकित्सा के स्तर पर अद्भुत अनुभव दे गया। हुआ यूँ, पूरबसराय शक्तिपीठ (मुंगेर) से युवा सम्मेलन के कार्यक्रम से लौटते हुए गेट के पास पथरीले रास्ते से फिसल कर इतनी बुरी तरह गिरा कि बाँये पैर के घुटने में जबरदस्त चोट आई। लाख प्रयास के बावजूद न तो पैर मुड़ पा रहा था और न ही मैं उठ पा रहा था।
  
🔵 बेहद लाचार और असहाय विवशता की स्थिति! वहाँ उपस्थित गायत्री परिजन कई सलाह- मशवरे के बाद मुंगेर के पोलो मैदान के पास एक व्यक्ति के पास ले गए। उसने गहरी चोट कहकर पट्टी बाँध दी, तीन सौ रुपये लिये, फिर मुझे घर लाया गया। भ्रम, भय, आशंका और नासमझी में कुछ दर्द निवारक गोलियों और अन्य उपचारों से मन को बहला रहा था। करवट बदल नहीं पाता था।
 
🔴 करीब पन्द्रह या बीस दिनों के बाद जब स्वतः पट्टी खोली तो मेरा घुटना मुड़ता ही नहीं था। फिर एक्स- रे से जो रिपोर्ट आई उसमें घुटने की चक्री दो टुकड़े में टूटी थी। घुटना बुरी तरह फूला हुआ था। डॉक्टर की सलाह मिली कि स्टील की चक्री प्रत्यारोपित की जाए या हड्डी काटी जाए। बेहद खर्च, सहायक लोगों की कमी, स्वयं विस्तर से भी उठ नहीं पाने की असमर्थता। उस वक्त नगर में विराट गायत्री महायज्ञ का आयोजन होने को था। अत्यंत किंकर्तव्यविमूढ़ सी अवस्था में गुरुदेव से आर्त्त स्वर में रुदन से भरी प्रार्थना ने अंधेरे में पग- पग पर रोशनी बनकर चमत्कारिक कृपाएँ बरसायीं।
  
🔵 स्टिक के साथ चलने के प्रयास में किसी झटके में असहनीय दर्द बढ़ गया। उस रात बहुत रो- रोकर गुरुदेव से प्रार्थना की। रात्रि स्वप्र में एक दिव्य पुरुष ने घुटने को हाथ से छूते हुए कहा कि आप मेरे बताए हुए प्राणायामों को थोड़ी लंबी अवधि तक और गहरे प्रार्थना भाव से करें। पहले भी प्राणायाम के अभ्यास से पेट की बीमारी से राहत पाए थी।
एक उदाहरण द्वारा तत्कालीन गायत्री शक्तिपीठ के उपजोन समन्वयक श्री त्रिवेणी प्रसाद अग्रवाल ने अपनी पत्नी के टूटी हड्डी का केस बताया जो प्राकृतिक ढंग से ठीक हो गया था। एक धार्मिक चेनल पर एक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रख्यात अस्थि रोग विशेषज्ञ के १०० लोगों पर प्राणायाम के शिविर द्वारा सकारात्मक परिणाम को देखा। दोनों उदाहरणों से आए विश्वास और बिल्कुल सकारात्मक सोच के साथ प्रातः ३.३० बजे, संध्या ४.०० बजे में पर्याप्त समय तक प्रार्थना पूर्ण भाव से प्राणायम की आध्यात्मिक चिकित्सा का अभ्यास आरंभ किया। प्राणायाम- ध्यान के वक्त मैं मिलने वाले लोगों से कम मिलता था। आश्चर्य! पैर धीरे- धीरे मुड़ने लगा।
 
🔴 ढाई महिने में पैर के सहारे बैठने लगा। एक रात्रि स्वप्र में डॉ० प्रणव पण्ड्या ने निर्दिष्ट किया कि प्राणायाम के साथ- साथ रोम- रोम में, हर कोशिका में सविता संचार और सोऽहम का भाव करें। प्राणायाम करते हुए भाव रहता कि अंतरिक्ष से सर्वश्रेष्ठ ईश्वरीय चिकित्सा, औषधि की आशीषमय चेतना का प्रवाह घुटने में हो रहा है। प्रबल विश्वास के साथ हाथ के स्पर्श से ईश्वरीय चेतना को घुटनों में प्रवाहित होने का ध्यान करता। स्टिक के सहारे अब धीरे- धीरे टहलना आरंभ किया।
 
🔵 गायत्री जयंती के दिन सन् २००७ में रक्त- दान शिविर के कार्यक्रम में किसी तरह गया था। इस बीच आन्तरिक जगत में अद्भुत दिव्य अनुभूति, अलौकिक स्वप्रनों का क्रम बना रहा। स्टिक के सहारे ही यज्ञों की टोलियों में जाने, स्वाध्याय- मंडल चलाने जैसी कई गतिविधियों में सक्रियता बढ़ी। पहले तो स्थिति इतनी बुरी थी कि ह्वील चेयर ओर बैशाखी के सहारे चलने की अवसादजन्य सोच थी। लेकिन प्रार्थनामय प्राणायाम से टूटी हड्डी जुड़ने की अद्भुत चिकित्सा हुई। मिशन के लिय महत्वपूर्ण दायित्व निभाने के अवसर मिले। एकांत की साधना से संचित प्रारब्ध कटे। शांति, दिव्यता की अलौकिक अनुभूति और गुरुदेव के आशीषमय कृपाओं के प्रति अन्तरतम से चिर कृतज्ञ हूँ।

🌹 मनोज मिश्र जमालपुर (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/sang.1

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 102)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 इसे परीक्षा का एक घटनाक्रम ही कहना चाहिए कि पाँच बोर का लोडेड रिवाल्वर शातिर हाथों में भी काम न कर सका। जानवर काटने के छुरे के बारह प्रहार मात्र प्रमाण के निशान छोड़कर अच्छे हो गए। आक्रमणकारी अपने बम से स्वयं घायल होकर जेल जा बैठा। जिसके आदेश से उसने यह किया था, उसे फाँसी की सजा घोषित हुई। असुरता के आक्रमण असफल हुए। एक उच्चस्तरीय दैवी प्रयास को निष्फल कर देना सम्भव न हो सका। मारने वाले से बचाने वाला बड़ा सिद्धि हुआ।

🔵 इन दिनों एक से पाँच करने की सूक्ष्मीकरण विधा चल रही है। इस लिए क्षीणता तो आई है, तो भी बाहर से काया ऐसी है, जिसे जितने दिन चाहे जीवित रखा जा सके, पर हम जान-बूझकर इसे इस स्थिति में रखेंगे नहीं। कारण कि सूक्ष्म शरीर से अधिक काम लिया जा सकता है और स्थूल शरीर उसमें किसी कदर बाधा ही डालता है।

🔴 शरीर की जीवनीशक्ति, असाधारण रही है। उसके द्वारा दस गुना काम लिया गया है। शंकराचार्य, विवेकानन्द बत्तीस-पैंतीस वर्ष जिए, पर ३५० वर्ष के बराबर काम कर सके। हमने ७५ वर्षों में विभिन्न स्तर के इतने काम किए हैं कि उनका लेखा-जोखा लेने पर वे ७५० वर्ष से कम में होने वाले सम्भव प्रतीत नहीं होते। यह सारा समय नवसृजन की एक से एक अधिक सफल भूमिकाएँ बनाने में लगा है। निष्क्रिय-निष्प्रयोजन और खाली कभी नहीं रहा है।

🔵 बुद्धि को भगवान् के खेत में बोया और वह असाधारण प्रतिभा बनकर प्रकटी। अभी तक लिखा हुआ साहित्य इतना है कि जिसे शरीर के वजन से तोला जा सके। यह सभी उच्च कोटि का है। आर्षग्रंथों के अनुवाद से लेकर प्रज्ञा युग की भावी पृष्ठभूमि बनाने वाला ही सब कुछ लिखा गया है। आगे का सन् २००० तक का हमने अभी से लिखकर रख दिया है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.6

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 16 May 2017


👉 हम प्रगतिशील बनें

🔵 प्रगतिशीलता का अर्थ है-एक नवचेतना, एक जागरूक विवेक, जिसके आधार पर कोई अपना हित-अहित ठीक तरह से देख-समझ सके। जो राष्ट्र गुण-दोष, हानि-लाभ के दृष्टिकोण से किसी बात का निर्णय करके अपने लिए मार्ग निर्धारित करते हैं, वे राष्ट्र प्रगतिशील ही कहे जाएँगे। जो अपनी अहितकर कुरीतियों, प्रथाओं एवं परम्पराओं को छोड़ने के लिए और उनके स्थान पर नई, उपयोगी एवं समयानुसार प्रथा-परम्पराएँ प्रचलित करने के लिए खुशी-खुशी तैयार रहते हैं, वे समाज ही जाग्रत् चेतना के पुंज कहे जाएँगे।

🔴 इसके विपरीत जो समाज अथवा राष्ट्र अपने पुराने संस्कारों और पिछड़ेपन को कसकर पकड़े हुए किसी गलत रास्ते पर इसलिए चलते हैं कि उस पर वे बहुत समय से चले आ रहे हैं, प्रगतिशील समाज नहीं कहे जाते। अहितकर प्रथा-परम्पराओं को गले लगाए रहना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि अमुक समाज पिछड़ा हुआ समाज है।
  
🔵 बहुत कुछ प्राचीन होने पर भी प्रगतिशीलता की दृष्टि से हमारे भारतीय राष्ट्र की गणना अभी नवोदित राष्ट्रों में ही है। उसने अभी केवल राजनैतिक स्वतंत्रता ही उपलब्ध की है। उन्नति एवं विकास के नाम पर अभी उसे कुछ खास उपलब्धियाँ नहीं प्राप्त हो सकी हैं। यह बात ठीक है कि देश की उन्नति के प्रयत्न चल रहे हैं, किन्तु उन सब प्रयत्नों की पृष्ठभूमि केवल आर्थिक ही है। मात्र आर्थिक उन्नति से ही कोई राष्ट्र समुन्नत राष्ट्र नहीं बन सकता। किसी राष्ट्र की वास्तविक उन्नति तो उसकी सामाजिक उन्नति में ही निहित रहती है।

🔴 इस कटु सत्य को स्वीकार करने पर किसे आपत्ति हो सकती है कि हमारा समाज प्रगतिशीलता के नाम पर बिलकुल निकम्मा बना हुआ है। इसका अस्तित्व अभी भी जातीय द्वेष, साम्प्रदायिक बैर के पंक में डूबा है। अब तक उसमें स्वतंत्र चिंतन और नवचेतना नहीं आ सकी है, किन्तु यदि अपने भारतीय राष्ट्र को शक्तिशाली बनना है, अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना है, तो उसे अपनी उन आंतरिक दुर्बलताओं को दूर करना ही होगा, जो उसकी वास्तविक प्रगति के पथ में अवरोध बनी हुई हैं।

🔵 सारा संसार जानता है कि भारतीय समाज के पास न तो बुद्धि की कमी है, न विद्या की और न वीरता की न बलिदान की। यदि उसमें कोई कमी है, तो केवल उस प्रगतिशीलता की, जिसकी आज के युग में बहुत आवश्यकता है। आज जब अपने समाज, अपने राष्ट्र को अग्रगामी बनाने के लिए संसार के सारे लोग प्रयत्नशील हो रहे हैं, तब क्या कारण है कि हम भारतीय ही अपने पिछड़ेपन से पीछा छुड़ाकर प्रतिशीलता के पथ पर आगे न बढ़ें?

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 71

👉 नारी को समुचित सम्मान एवं उत्थान दीजिए। (भाग 2)

🔵 नारी जन्मदात्री है। समाज का प्रत्येक भावी सदस्य उसकी गोद में पल कर संसार में खड़ा होता है। उसके स्तन का अमृत पीकर पुष्ट होता है। उसकी हँसी से हँसना और उसकी वाणी से बोलना सीखता है। उसकी कृपा से ही जीकर और उसके ही अच्छे-बुरे संस्कार लेकर अपने जीवन क्षेत्र में उतरता है। तात्पर्य यह कि जैसी माँ होगी, सन्तान अधिकाँशतः उसी प्रकार की होगी।

🔴 भारत के अतीत-कालीन गौरव में नारियों का बहुत कुछ अंश-दान रहा है। उस समय संतान की अच्छाई-बुराई का सम्बन्ध माँ की मर्यादा के साथ जुड़ा था। वह अपनी मान-मर्यादा की प्रतिष्ठा के लिये सन्तान को बड़े उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से पालती थी। देश, काल और समाज की आवश्यकता के अनुरूप सन्तान देना अपना परम-पावन कर्तव्य समझती थी। यही कारण है कि जब-जब युगानुसार सन्त, महात्मा, त्यागी, दानी योद्धा, वीर और बलिदानियों की आवश्यकता पड़ी, उसने अपनी गोद में पाल-पाल कर दिये।

🔵 किन्तु वह अपने इस दायित्व को निभा तब ही सकी है। जब उसको स्वयं अपना विकास करने का अवसर दिया गया है। जिस माँ का स्वयं अपना विकास न हुआ हो, वह भला विकासशील संतान दे भी कैसे सकती है। जिसको देश-काल की आवश्यकता और समाज की स्थिति और संसार की गतिविधि का ज्ञान ही न हो, वह उसके अनुसार अपनी सन्तान को किस प्रकार बना सकती है? अपने इस दायित्व को ठीक प्रकार से निभा सकने के लिये आवश्यक है कि नारी को सारे शैक्षणिक एवं सामाजिक अधिकार समुचित रूप से दिये जायें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1966 पृष्ठ 27

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 3)

🌹  हमारा युग निर्माण सत्संकल्प

🔵 हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे।

🔴 शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्म-संयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।

🔵 मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाए रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रख रहेंगे।

🔴 इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यास करेंगे।

🔵 अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।

🔴 मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔵 समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।

🔴 चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।

🔵 अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।

🔴 मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे।

🔵 दूसरों के साथ वह व्यवहार न करेंगे, जो हमें अपने लिए पसंद नहीं।

🔴 नर-नारी परस्पर पवित्र दृष्टि रखेंगे।

🔵 संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।

🔴 परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे।

🔵 सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नव-सृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।

🔴 राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान् रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतेंगे।

🔵 मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनाएँगे, तो युग अवश्य बदलेगा।

🔴 ‘‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’’, ‘‘हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’’ इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 14 मई 2017

👉 अन्जान रास्ते में मिले आत्मीय बंधु

🔵 घटना उस समय की है जब मैं पटन्डा ब्लाँक के देहात बोडाम में को- ऑपरेटिव एक्सटेन्शन अफसर था। मैं टाटानगर से रोज आना- जाना करता था। उस दिन शाम चार बजे बोडाम से अपनी राजदूत मोटर साइकिल से टाटा जा रहा था।

🔴 रास्ते में पहाड़ी है, सड़क काफी टूटी हुई थी। सड़क की मरम्मत का कार्य चल रहा था। मैं किसी तरह से रोड क्रास कर रहा था फिर भी करीब आधा फर्लांग रह गया जिसे मैं पार नहीं कर सका। मैंने देखा कि दूर से सामने साईड से एक जीप भी आ रही थी। उसे भी वही अड़चन थी। रास्ता क्रास करने के प्रयास में वे लोग भी थे। कुछ देर बाद मैंने देखा कि उसने अपनी जीप वहीं से वापस मोड़ ली। मैं सोच में पड़ गया कि क्या करूँ? जाना तो था ही। साहस नहीं हो रहा था कि आगे रास्ता मिल पाएगा कि नहीं। मैं घर कैसे पहुँचूँगा। चिन्ता की रेखाएँ मन मस्तिष्क पर छा गईं। अतः मैंने भी मन ही मन गुरुदेव को याद करते हुए अपनी बाइक खेतों के रास्ते की ओर बढ़ा दी।

🔵 खेतों की मेढ़ों के ऊपर चल रहा था। मुझे बहुत घबराहट हो रही थी। दिमाग कुछ सोचने करने की स्थिति में नहीं था। उसी हड़बड़ाहट की स्थिति में मेरा दिमाग से कण्ट्रोल हट गया। गेयर लगाना चाहिए था, पर गलती से न्यूट्रल लग गया। नीचे गहरी खाई थी। मैं खाई में गिर गया। उसके पश्चात् मेरे ऊपर मोटर साइकिल गिर गई। उस समय वहाँ पर कोई नहीं था। मैंने पूरी तरह सोच लिया कि आज मेरा अन्त निश्चित है। जब व्यक्ति चारों तरफ से हताश एवं निराश होता है इस समय केवल भगवान को याद करता है। मैं मन ही मन अपने आराध्य गुरुदेव से प्रार्थना करने लगा।

🔴 इतने में मेरा ध्यान टूटा। मुझे जीप की आवाज सुनाई दी। मुझे लगा गुरुदेव ने मेरी प्रार्थना सुन ली। जीप में बैठे सारे लोग बाहर निकल आए और मुझे देखा। वे खाई में उतरे और पूछा ‘आपको निकाल दें खाई से?’ मेरे लिए उनके ये शब्द किसी वरदान से कम न थे। मैंने बिना समय गँवाये झट से हाँ कर दी। वे चार लोग थे, चारों ने मिलकर पहले मोटर साइकिल उठाई और किनारे कर दी फिर मुझे सहारा देकर उठा कर ऊपर लाए। मैं अपने आप उठ गया, लगा कि मुझे अधिक चोट नहीं आई है। मैंने देखा कि मैं ठीक हूँ। मैंने उन लोगों को धन्यवाद दिया।

🔵 उन लोगों ने कहा- कोई बात नहीं भाई साहब। हम लोग भी आपकी तरह रास्ता ढूँढ़ते इधर आए हैं। चलिए, आपको घर तक छोड़ देते हैं। मुझे लगा गुरुदेव ने इन लोगों को हमारे लिए ही भेजा है नहीं तो आजकल सहायता माँगने पर लोग अनसुना करके चले जाते हैं, ये लोग बिना कहे- सुने इस वीरान सुनसान स्थान पर मेरी रक्षा करने आ पहुँचे।

🔴 मैंने कहा ‘मैं खुद ही चला जाऊँगा’ तब उन लोगों ने कहा ‘पहले गाड़ी स्टार्ट करके तो देखिए’। मुझे भी लगा शायद ये लोग सही कह रहे हैं। मैंने गाड़ी स्टार्ट किया तो गाड़ी स्टार्ट हो गई। उन लोगों ने फिर कहा कि भाई साहब आपको चोट लगी होगी, जीप में चलिए। मैंने धन्यवाद करते हुए स्वयं चले जाने की बात कही। उसके बावजूद उन लोगों ने कहा- अच्छा आप बाइक से चलिए हम आपके पीछे चलते हैं।

🔵 इस प्रकार उन लोगों ने मुझे समीप के एक गाँव बहादुर- डीह तक पहुँचाया। जब उन्होंने देख लिया मैं ठीक तरीके से जा रहा हूँ, वे अपनी दिशा में वापस लौट गए। मैं गुरुसत्ता की असीम कृपा से अन्दर ही अन्दर प्रफुल्लित हो रहा था कि अनजान व्यक्तियों ने परिवार से अधिक आत्मीयता दिखाई एवं खाई से निकालकर एक गाँव तक सकुशल पहुँचाया। आज के समय में यह शायद संभव नहीं। मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि गुरुदेव ने दूत भेजकर मेरे जीवन को संकट से मुक्त कराया। अगर गुरुदेव की कृपा नहीं होती तो मेरी जीवन रक्षा न हो पाती। यह सोचकर आज भी मैं रोमांचित हो उठता हूँ।

🌹 सिद्धेश्वर प्रसाद राँची (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/najan

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 101)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 इस विराट् को ही हमने अपना भगवान् माना। अर्जुन के दिव्य चक्षु ने इसी विराट् के दर्शन किए थे। यशोदा ने कृष्ण के मुख में स्रष्टा का यही स्वरूप देखा था। राम ने पालने में पड़े-पड़े माता कौशल्या को अपना यही रूप दिखाया था और काकभुशुण्डि इसी स्वरूप की झाँकी करके धन्य हुए थे।

🔵 हमने भी अपने पास जो कुछ था, उसी विराट ब्रह्म को-विश्व मानव को सौंप दिया। बोने के लिए इससे उर्वर खेत दूसरा कोई हो नहीं सकता था। वह समयानुसार फला-फूला। हमारे कोठे भर दिए, सौंपे गए दो कामों के लिए जितने साधनों की जरूरत थी, वे उसी में जुट गए।

🔴 शरीर जन्मजात दुर्बल था। शारीरिक बनावट की दृष्टि से उसे दुर्बल कह सकते हैं, जीवन शक्ति तो प्रचंड थी ही। जवानी में बिना शाक, घी, दूध के २४ वर्ष तक जौ की रोटी और छाछ लेते रहने से वह और कृश हो गया था, पर जब बोने-काटने की विधा अपनाई तो पिचहत्तर वर्ष की इस उम्र में वह इतना सुदृढ़ है कि कुछ ही दिन पूर्व उसने एक बिगड़ैल साँड़ को कंधे का सहारा देकर चित्त पटक दिया और उससे भागते ही बना।

🔵 सर्वविदित है कि अनीति एवं आतंक के पक्षधर किराए के हत्यारे ने एक वर्ष पूर्व पाँच बोर की रिवाल्वर से लगातार हम पर फायर किए और उसकी सभी गोलियाँ नलियों में उलझी रह गईं। रिवाल्वर उससे भय के मारे वहीं गिर गई। अब की बार वह छुरेबाजी पर उतर आया। छुरे चलते रहे। खून बहता रहा, पर भोंके गए सारे प्रहार शरीर में सीधे न घुसकर तिरछे फिसलकर निकल गए। डाक्टरों ने जख्म सी दिए और कुछ ही सप्ताह में शरीर ज्यों का त्यों हो गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 15 May 2017


👉 पंडित जी और नाविक

 🔵 आज गंगा पार होनेके लिए कई लोग एक नौकामें बैठे, धीरे-धीरे नौका सवारियों के साथ सामने वाले किनारे की ओर बढ़ रही थी, एक पंडित जी भी उसमें सवार थे। पंडित जी ने नाविक से पूछा “क्या तुमने भूगोल पढ़ी है?”

🔴 भोला- भाला नाविक बोला “भूगोल क्या है इसका मुझे कुछ पता नहीं।”

🔵 पंडितजी ने पंडिताई का प्रदर्शन करते कहा, “तुम्हारी पाव भर जिंदगी पानी में गई।”

🔴 फिर पंडित जी ने दूसरा प्रश्न किया, “क्या इतिहास जानते हो? महारानी लक्ष्मीबाई कब और कहाँ हुई तथा उन्होंने कैसे लडाई की ?”

🔵 नाविक ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की तो  पंडित जी ने विजयीमुद्रा में कहा “ ये भी नहीं जानते तुम्हारी तो आधी जिंदगी पानी में गई।”

🔴 फिर विद्या के मद में पंडित जी ने तीसरा प्रश्न पूछा “महाभारत का भीष्म-नाविक संवाद या रामायण का केवट और भगवान श्रीराम का संवाद जानते हो?”

🔵 अनपढ़ नाविक क्या कहे, उसने इशारे में ना कहा, तब पंडित जी मुस्कुराते हुए बोले “तुम्हारी तो पौनी जिंदगी पानी में गई।”

🔴 तभी अचानक गंगा में प्रवाह तीव्र होने लगा। नाविक ने सभी को तूफान की चेतावनी दी, और पंडितजी से पूछा “नौका तो तूफान में डूब सकती है, क्या आपको तैरना आता है?”

🔵 पंडित जी गभराहट में बोले “मुझे तो तैरना-वैरना नहीं आता है ?”

🔴 नाविक ने स्थिति भांपते हुए कहा ,“तब तो समझो आपकी पूरी जिंदगी पानी में गयी।”

🔵 कुछ ही देर में नौका पलट गई। और पंडित जी बह गए।

🔴 मित्रों, विद्या वाद-विवाद के लिए नहीं है और ना ही दूसरों को नीचा दिखाने के लिए है। लेकिन कभी-कभी ज्ञान के अभिमान में कुछ लोग इस बात को भूल जाते हैं और दूसरों का अपमान कर बैठते हैं। याद रखिये शाश्त्रों का ज्ञान समस्याओं के समाधान में प्रयोग होना चाहिए शश्त्र बना कर हिंसा करने के लिए नहीं।

🔵 कहा भी गया है, जो पेड़ फलों से लदा होता है उसकी डालियाँ झुक जाती हैं। धन प्राप्ति होने पर सज्जनों में शालीनता आ जाती है। इसी तरह, विद्या जब विनयी के पास आती है तो वह शोभित हो जाती है। इसीलिए संस्कृत में कहा गया है, ‘विद्या विनयेन शोभते।’

👉 गीत तो बहुत गा लिए - अब गीता गाएँ

🔵 गीत हमें अच्छे लगते हैं। अपनी मनःस्थिति के अनुकूल गीत गाते रहते हैं। कहते हैं गीत गाने से मन हलका होता है। चित्त शान्त होता है, उत्साह बढ़ता है। लेकिन गीत तो बहुत गा लिए। गीतों के साथ संगति देने वाले, स्वर में स्वर मिलाने वाले भी मिल गए, पर कुछ हुआ नहीं। मन भारी का भारी, चित्त चंचल-अशान्त, उत्साह शिथिल और इन सबके कारण वही दुर्गति....न ऊपर उठे, न आगे बढ़े। संतुलन की स्थिति चित्त को न मिली, उत्साह न आ सका। किसी ने कहा, प्रभु को पुकारो, अपनी शक्ति काम नहीं करती, तो उसे बुलाओ। प्रभु हमारी पुकार सुनेंगे, तो उबार लेंगे। हम भक्ति के गीत गाने लगे-पर विश्वास हिल उठा, गला बैठने लगा, लेकिन स्थिति बदली नहीं। आखिर क्यों? क्या वह सुनता नहीं....?

🔴 अरे नहीं, वह सुनता है और देखता भी है। हम ही हैं अभागे, जो देखते भी नहीं और सुनते भी नहीं। अपने गीत गाने में इतने खो गए हैं कि उसकी गीता के स्वर सुनाई ही नहीं देते। कानों पर से हाथ हटाएँ, कोलाहल के बीच उभरती हुई उसकी वाणी सुनें.....। वह तो उद्बोधन के लिए सदा तैयार है.. ही ‘‘करिष्ये वचनं तव’’ का भाव नहीं उभरता।
  
🔵 अब अपनी अलापना बन्द करें, उसकी सुनें। गाना है तो हम भी गीता ही गाएँ। लेकिन गीता भला कैसे गाएँ, वह तो भगवान् गाते हैं। हम तो उसकी सुनें। गीता के स्वर वही जानता है, पर स्वर-में-स्वर हम भी मिला सकते हैं। गीता वह अपने लिए थोड़े ही गाता है? हम सबमें प्राण संचार के लिए गाता है, गति देने के लिए गाता है। उन स्वरों को सुनें, अंतर में झंकृत होने दें। फिर अपने आप एक सिहरन उठेगी, होंठ फड़केंगे, पाँव थिरकेंगे। यह कोई सामान्य गीत नहीं, यह तो अभियान गीत है। उस पर तबले की नहीं, कदमों की ताल दी जाती है। संगति के लिए अलाप नहीं, क्रियाकलाप सँभालने पड़ते हैं।

🔴 गीता वह अकेले नहीं गाता, बहुतों को साथ लेकर गाता है। उसका साथ देना, जो सीख ले, वही संगति दे पाता है। उसका ढंग ही कुछ निराला है। अर्जुन ने संगति दी-तानपूरे का तार चढ़ाकर नहीं-गाण्डीव की प्रत्यंचा से, गुरुगोविंदसिंह ने मँजीरे नहीं तलवारें खनखनायी। उसकी संगति में विवेकानन्द ने स्वर अलापा और विनोबा के पग थिरके। हर युग में उसकी गति के अलग ढंग बनते हैं। ‘‘करिष्ये वचनं तव’’ का संकल्प जगते ही उसका ढंग अपने आप समझ में आ जाता है।

🔵 पर हम गीता गाना कहाँ चाहते हैं? वह गीता कहाँ सुनना चाहते हैं, जिससे जीवन फड़क उठे और धन्य हो जाए। लेकिन जिस आनन्द की लहरें उठाने के लिए हम गीत गाने का असफल प्रयोग करते रहे हैं, वह तो गीता गाने से मिलेगा। आओ इसी क्षण अपने गीत की सीमा से आगे बढ़ें, उसकी गीता गाएँ।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 69

👉 नारी को समुचित सम्मान एवं उत्थान दीजिए।

🔵 कोई भी समाज नारी-पुरुष के युग्म से बनता है, समाज ही क्यों, सच्ची बात तो यह है कि सृष्टि के क्रम का मूलभूत कारण ही यह जोड़ा है। इसमें भी नारी का स्थान प्रमुख है। क्योंकि संसार एवं सृष्टि क्रम में पुरुष एक साधारण-सा हेतु है, बाकी सारा काम एक मात्र नारी को ही करना पड़ता है।

🔴 सन्तान धारण करने का काम से लेकर उसको जन्म देने और पालन करने का सारा दायित्व एक मात्र नारी ही उठाया करती है। सन्तान का प्रजनन एवं पालन मात्र नारी की कृपा पर ही निर्भर है। घर बसाना, उसे चलाना और उसकी व्यवस्था रखना नारी के हाथ में ही है। यदि वह अपने इस दायित्व से विमुख हो जाये अथवा इसमें उपेक्षा बरतने लगे तो कुछ ही समय में यह व्यवस्थित दिखलाई देने वाला समाज अस्त-व्यस्त और ऊबड़-खाबड़ दिखाई देने लगे। इस प्रकार यदि ध्यान से विचार किया जाये तो पता चलेगा, सृष्टि से लेकर समाज तक का संचालन क्रम मुख्यतः नारी पर निर्भर है। पुरुष तो इसके एक सहायक हेतु है। तब ऐसी नारी निर्मात्री, धात्री और व्यवस्थापिका जैसी पूजा-पत्री का तिरस्कार, अपमान, उपेक्षा अथवा अवहेलना करना कहाँ तक उचित है?

🔵 जो धारिका, धात्री और निर्मात्री है, यदि वह अपने तन-मन से प्रसन्न और प्रफुल्ल रहेगी तो उसकी सृष्टि भी उसी प्रकार की प्रसन्न एवं प्रफुल्ल होगी और यदि वह मलीन रहती है, तो उसका सृजन भी उतना ही मलीन और अयोग्य होगा। इसीलिये बुद्धिमान व्यक्ति , नारी का समुचित आदर करते हुए उसे प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते हैं।

🔴 जब-जब जिन समाजों में नारी का समुचित स्थान रहा है, उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक विकास की व्यवस्था रक्खी गई है, तब तब वे समाज, संसार में समुन्नत होकर आगे बढ़े हैं और जब-जब इसके प्रतिकूल आचरण किया गया है, तब-तब समाजों का पतन होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1966 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/April/v1.27

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 2)

🌹 युग निर्माण मिशन का घोषणा-पत्र

🔵 आज प्रत्येक विचारशील व्यक्ति यह अनुभव करता है कि मानवीय चेतना में वे दुर्गुण पर्याप्त मात्रा में बढ़ चले हैं, जिनके कारण अशान्ति और अव्यवस्था छाई रहती है। इस स्थिति में परिवर्तन की आवश्यकता अनिवार्य रूप से प्रतीत होती है, पर यह कार्य केवल आकांक्षा मात्र से पूर्ण न हो सकेगा, इसके लिए एक सुनिश्चित दिशा निर्धारित करनी होगी और उसके लिए सक्रिय रूप से संगठित कदम बढ़ाने होंगे। इसके बिना हमारी चाहना एक कल्पना मात्र बनी रहेगी।

🔴 युग निर्माण सत्संकल्प उसी दिशा में एक सुनिश्चित कदम है। इस घोषणापत्र में सभी भावनाएँ धर्म और शास्त्र की आदर्श परंपरा के अनुरूप एक व्यवस्थित ढंग से सरल भाषा में संक्षिप्त शब्दों में रख दी गई और चिंतन करें तथा यह निश्चय करें कि हमें अपना जीवन इसी ढाँचे में ढालना है। दूसरों को उपदेश करने की अपेक्षा इस संकल्प पत्र में आत्म-निर्माण पर सारा ध्यान केंद्रित किया गया है। दूसरों को कुछ करने के लिए कहने का सबसे प्रभावशाली तरीका एक ही है कि हम वैसा करने लगें। अपना निर्माण ही युग निर्माण का अत्यंत महत्त्वपूर्ण कदम हो सकता है। बूँद-बूँद जल के मिलने से ही समुद्र बना है। एक-एक अच्छा मनुष्य मिलकर ही अच्छा समाज बनेगा। व्यक्ति निर्माण का व्यापक स्वरूप ही युग निर्माण के रूप में परिलक्षित होगा।

🔵 प्रस्तुत युग निर्माण सत्संकल्प की भावनाओं का स्पष्टीकरण और विवेचन पाठक इसी पुस्तक के अगले लेखों में पढ़ेंगे। इस भावनाओं को गहराई से अपने अंतःकरणों में जब हम जान लेंगे, तो उसका सामूहिक स्वरूप एक युग आकांक्षा के रूप में प्रस्तुत होगा और उसकी पूर्ति के लिए अनेक देवता, अनेक महामानव, नर तन में नारायण रूप धारण करके प्रगट हो पड़ेंगे। युग परिवर्तन के लिए जिस अवतार की आवश्यकता है, वह पहले आकांक्षा के रूप में ही अवतरित होगा। इसी अवतार का सूक्ष्म स्वरूप यह युग निर्माण सत्संकल्प है, इसके महत्त्व का मूल्यांकन हमें गंभीरतापूर्वक ही करना चाहिए। युग निर्माण सत्संकल्प का प्रारूप निम्न प्रकार है—

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.4
 

शनिवार, 13 मई 2017

👉 चौथे ऑपरेशन में सूक्ष्म सत्ता का संरक्षण

🔵 मैं गुजरात प्रान्त के बलसाड़ जिले के डुंगरी ग्राम में रहता हूँ। सन् १९६२ से १९६५ तक स्थानीय हाई स्कूल में नॉन टीचिंग स्टाफ के रूप में कार्यरत रहा। इसी दौरान मेरा संपर्क पास के गाँव के गायत्री परिजनों से हुआ। उनकी युग निर्माण योजना की बातें मेरे मन- मस्तिष्क को प्रभावित कर गईं।

🔴 मैं मिशन के काम में रुचि लेने लगा। कुछ ही दिनों बाद मुझे पूज्य गुरुदेव से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनसे मुलाकात क्या हुई कि मैं उन्हीं का होकर रह गया। तब से लेकर आज तक मुझे गुरुवर के अनेक अनुदान- वरदान मिले हैं।

🔵 यह संस्मरण मेरे जीवन के ७१वें वर्ष का है। सन् २००६ में मैं हर समय सिर दर्द से परेशान रहा करता था। यह परेशानी जब बहुत अधिक बढ़ गई, तो मैं डॉक्टर से मिला।

🔴 डॉक्टर ने कई तरह की मशीनों से मेरे सिर की जाँच की। जाँच के बाद वह इस नतीजे पर पहुँचे कि हृदय की कुछ नाड़ियों के ब्लाक हो जाने के कारण ही हमेशा सिर दर्द बना रहता है। उन्होंने कहा कि बाईपास सर्जरी से ही इस रोग का निदान हो सकता है।

🔵 बाईपास सर्जरी की तैयारियाँ शुरू हुईं और २ अगस्त २००६ को नाडियाद, महागुजरात हास्पिटल में ऑपरेशन हुआ। पहले पसलियों को बीचो- बीच काटकर दो हिस्से में बॉँट दिया गया, फिर दिल को पसलियों से बाहर निकालकर उसका ऑपरेशन किया गया।

🔴 ऑपरेशन के बाद कटी हुई पसलियों को तार से जोड़कर पहले जैसा बनाया गया- इसे डॉक्टरों की भाषा में ‘कॉटन बाडी’ बोलते हैं। लेकिन मेरे शरीर ने इस कॉटन बाडी को स्वीकार नहीं किया। फलतः शरीर के अन्दर से रिस- रिसकर मवाद बाहर आने लगा।

🔵 डॉक्टर को दिखाने पर उन्होंने कहा कि कॉटन बाडी के कारण प्रायः ऐसा होता है। चिन्ता की कोई बात नहीं है। कुछ दिनों में अपने- आप ठीक हो जाएगा।

🔴 लेकिन छः महीने बीत जाने के बाद भी मवाद निकलना बन्द नहीं हुआ, तो डॉक्टर ने कहा कि पसली की हड्डियों को तार से बाँधने के कारण इन्फेक्शन हो गया है। अब दुबारा ऑपरेशन करके तार बाहर निकालना पड़ेगा।

🔵 २ अप्रैल २००७ को दूसरी बार ऑपरेशन हुआ। फिर से छाती खोलकर तार निकाला गया। लेकिन इतने दिनों में इन्फेक्शन हड्डियों को प्रभावित कर चुका था, इसलिए मवाद का निकलना बंद नहीं हुआ। थक हार कर अहमदाबाद के बड़े अस्पताल में पहुँचा। वहाँ के डॉक्टरों ने २० जून को तीसरा ऑपरेशन किया। वह भी असफल रहा।
      
🔴 सीनियर डॉक्टर ने मेरे बेटे को बताया कि मेरी मौत अब किसी भी क्षण हो सकती है, फिर भी अन्तिम प्रयास के रूप में एक और ऑपरेशन किया जाना चाहिए।
निराश होकर मैंने सीनियर डॉक्टर से कहा कि आप लोग अपना काम कीजिए, मैं अपना काम करूँगा। एक जूनियर डॉक्टर ने जिज्ञासावश पूछा कि आप क्या करेंगे। मैंने कहा- मैं गुरुदेव का स्मरण करूँगा और उन्होंने जो मंत्र दिया है, उसके जप की संख्या बढ़ा दूँगा। अब मैं अध्यात्म की ताकत को आजमाऊँगा।
      
🔵 ......और मैंने वैसा ही किया। सुबह से शाम तक गायत्री मंत्र का जप और रात में सोते समय गुरुदेव का ध्यान। इसी प्रकार तीन सप्ताह और बीत गए। चौथे सप्ताह में चौथे ऑपरेशन की तारीख तय हुई- १८ जुलाई। सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। मुझे ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया।
      
🔴 ऑपरेशन शुरू होने से पहले मैंने डॉक्टरों से अनुरोध किया कि वे मुझे पाँच मिनट प्रार्थना करने दें। मैंने गुरुदेव का फोटो अपने साथ रखा था। फोटो सामने रखकर उन्हें प्रणाम किया और आँखें बन्द कर मन ही मन उनसे प्रार्थना करने लगा- परम पूज्य गुरुदेव! ये डॉक्टर पता नहीं क्या- कैसे करेंगे। आप सूक्ष्म रूप से आकर इनका मार्गदर्शन कीजिए, जिससे ये सही तरीके से ऑपरेशन कर सकें और इनके सत्प्रयास से मेरी जीवन- रक्षा हो सके फिर मैं जल्दी से स्वस्थ होकर वापस घर पहुँच सकूँ।
      
🔵 तीन- चार दिन पहले श्रद्धेय डॉक्टर साहब (डॉ. प्रणव पण्ड्या)और आदरणीया जीजी (शैलबाला पण्ड्या) को चार पेज का पत्र लिखा था। उनका जवाब आया- ‘‘आपके उत्तम स्वास्थ्य के लिए हम सब प्रार्थना कर रहे हैं। आप चिन्ता मत करिए। पूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद से सब कुछ ठीक हो जाएगा।’’
      
🔴 ऑपरेशन ५ घंटे तक चला। चौथी बार हर्ट का ऑपरेशन हो रहा था, इसलिए डॉक्टर्स ने प्लास्टिक सर्जरी की भी पूरी तैयारी कर रखी थी। टीम में प्लास्टिक सर्जरी के दो विशेषज्ञ डॉक्टर भी तैयार खड़े थे। लेकिन गुरुदेव की कृपा से प्लास्टिक सर्जरी करने की नौबत ही नहीं आई।
      
🔵 अगली सुबह जब बड़े डॉक्टर्स मुझे देखने आए, तो उन्होंने कहा- आपका ऑपरेशन बहुत अच्छा हुआ। सच तो यह है कि केस हिस्ट्री और आपकी हालत देखकर मैं अन्दर से घबराया हुआ था, लेकिन लगता है कि ऑपरेशन से पूर्व आपके द्वारा की गई प्रार्थना आपके इष्टदेव ने सुन ली। ऑपरेशन के दौरान मुझे लगा कि कोई बाहरी शक्ति कदम- कदम पर मेरा मार्ग- दर्शन कर रही है, हिम्मत बढ़ा रही है।
      
🔴 इतने बड़े ऑपरेशन के बाद इतनी तेजी से रिकवरी हुई कि १५ दिनों के बाद ही मुझे हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई और मैं पूरी तरह से स्वस्थ होकर खुशी- खुशी घर लौट आया। तब से लेकर आज तक गुरुकृपा से मेरा स्वास्थ्य पास- पड़ोस के लोगों के लिए एक उदाहरण बना हुआ है।

🌹  दौलत भाई जीवन जी देसाई, बलसाड़ (गुजरात)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/appa

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 100)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण
🔴 जिन साधनों की नव सृजन के लिए आवश्यकता थी, वे कहाँ से मिले, कहाँ से आएँ? इस प्रश्न के उत्तर में मार्गदर्शक ने हमें हमेशा एक ही तरीका बताया था कि बोओ ओर काटो, मक्का और बाजरा का एक बीज जब पौधा बनकर फलता है तो एक के बदले सौ नहीं वरन् उससे भी अधिक मिलता है। द्रौपदी ने किसी संत को अपनी साड़ी फाड़कर दी थी, जिससे उन्होंने लंगोटी बनाकर अपना काम चलाया था। वही आड़े समय में इतनी बनी कि उन साड़ियों के गट्ठे को सिर पर रखकर भगवान् को स्वयं भाग कर आना पड़ा। ‘‘जो तुझे पाना है, उसे बोना आरम्भ कर दे।’’ यही बीज मंत्र हमें बताया और अपनाया गया, प्रतिफल ठीक वैसा ही निकला जैसा कि संकेत किया गया।

🔵 शरीर, बुद्धि और भावनाएँ स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के साथ भगवान् सबको देते हैं। धन स्व उपार्जित होता है। कोई हाथों-हाथ कमाता है, तो कोई पूर्व संचित सम्पदा को उत्तराधिकार में पाते हैं। हमने कमाया तो नहीं था, पर उत्तराधिकार में अवश्य समुचित मात्रा में पाया। इन सबको बो देने और समय पर काट लेने के लायक गुंजायश थी, सो बिना समय गँवाए उस प्रयोजन में अपने को लगा दिया।

🔴 रात में भगवान् का भजन कर लेना और दिन भर विराट् ब्रह्म के लिए, विश्व मानव के लिए समय और श्रम नियोजित रखना, यह शरीर साधना के रूप में निर्धारित किया गया।

🔵 बुद्धि दिन भर जागने में ही नहीं, रात्रि के सपने में भी लोक मंगल की विधाएँ विनिर्मित करने में लगी रही। अपने निज के लिए सुविधा सम्पदा कमाने का ताना-बाना बुनने की कभी भी इच्छा ही नहीं हुई। अपनी भावनाएँ सदा विराट के लिए लगी रहीं। प्रेम, किसी वस्तु या व्यक्ति से नहीं आदर्शों से किया। गिरों को उठाने और पिछड़ों को बढ़ाने की ही भावनाएँ सतत उमड़ती रहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.6

👉 आज का सद्चिंतन 14 May 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 May 2017


👉 Intercession & its Significance. (Part 3)

🔴 Friends! Ignorance prevails all around in the country in the name of PUJA-PATH as also in the name of spirituality? Spirituality however was meant exclusively for bringing people, out of trap of ignorance. What has happened now? From where, has come this botheration? Ignorance on the contrary! In sharp contrast to its objective, spirituality has given undue space to ignorance. This should not have happened. Then what should be done now?
                                 
🔵 Friends! Everything becomes soft & wet when rain falls then I ask whether a rock too becomes wet or not? No sir, it does not and whether a rock can grow even a leave? No sir, it does not. It means a rock cannot grow even a leave over it simply because it cannot absorb water. That means the rock has to make it favorable to draw any advantage out of water. Things can proceed only when you understand this theory but you are of the view that you do not need to be changed and you should be the same as you are, rather BHAGWAN should change itself, BHAGWAN should change its rules, BHAGWAN should change its system and BHAGWAN should change his conditions. Why? Because what we do is—to order.

🔴 An order means a wish to be fulfilled.  A wish means an order.  You order? Are you a boss of BHAGWAN? Do you intend to order BHAGWAN? Do you wish BHAGWAN to follow you, simply because you recite hanuman-CHALISA daily and daily show incense-stick to hanuman? That is why you want that BHAGWAN should follow your guidelines. It is not possible at all. What is spirituality? Spirituality literally means that we should mould ourselves as per BHAGWAN’s wishes. We should develop such eligibility within us that we become competent enough to receive the grace & mercy of BHAGWAN which keeps raining unabatedly on us like rain from sky but we cannot take its advantage like that rock simply because of absence of eligibility.

 ====== OM SHANTI======

🌹  Finish
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 2 Sep 2026

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