शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

👉 उदार जीवन की गरिमा

🔵 संग्रह का मतलब है- स्वर्ग पर अविश्वास, ईश्वर पर अश्रद्धा और भविष्य की अवज्ञा। जब पिछले दिनों हम अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं का अर्जन करते रहें, तो कल नहीं कर सकेंगे, इसका कोई कारण नहीं। यदि जीवन सत्य है तो यह भी सत्य है कि जीवनोपयोगी पदार्थ ईश्वरीय कृपा से अन्तिम साँस तक मिलते रहेंगे। नियति ने उसकी समुचित व्यवस्था पहले से ही कर रखी है। तृष्णा तो ऐसी बुद्धिहीनता है, जो निर्वाह के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध रहने पर भी निरन्तर अतृप्तिजन्य उद्विग्नता में जलाती रहती है।

🔴 जिन्हें ईश्वर की उदारता पर विश्वास है, वे उदार बनकर जीते हैं। धरती अन्न उपजाती है- अन्न और वनस्पति उगाकर वह समस्त प्राणियों का पेट भरती है, पर यह नहीं सोचती कि मेरा भण्डार खाली हो जाएगा। उसकी यह उदारता सृष्टिक्रम के अनुसार लौटकर उसी के पास वापस आ जाती है, प्राणी पृथ्वी के अनुदान का उपयोग तो करते हैं, पर प्रकारान्तर से उसकी निधि उसी को वापस कर देते हैं। मल-मूत्र, खाद, कूड़ा, मृत शरीर यह सब लौटकर धरती के पास आते हैं और उसकी उर्वरता को सौ गुना बढ़ा देते हैं।
  
🔵 बादलों का कोष कभी नहीं चुका, वे बार-बार खाली होते रहते हैं, और फिर भर जाते हैं। नदियाँ उदारतापूर्वक देती हैं और यह विश्वास करती हैं कि उनका प्रवाह चलता रहेगा, अक्षय जलस्रोत उसकी पूर्ति करते रहेंगे। वृक्ष प्रसन्नतापूर्वक देते हैं और सोचते हैं कि वे ठूँठ नहीं होंगे। नियति का चक्र उन्हें हरा-भरा रखने की व्यवस्था करता ही रहेगा। कृपणता, संकीर्ण चिन्तन का ही नाम है। ऐसे व्यक्ति कुछ संग्रह तो कर सकते हैं, पर साथ ही बढ़ती हुई तृष्णा के कारण उस सुख से वंचित ही रहते हैं, जो उदार रहने पर उन्हें अनवरत रूप से मिलता रह सकता था।

🔴 पर्वत के उच्चशिखर पर निवास करने वाली चट्टान किसी को कुछ देती नहीं। वह अपनी सम्पदा अपने पास ही समेटे बैठी रहती है। अपनी विभूतियाँ किसी को क्यों दें? यह सोचकर रेतीली मिट्टी की अपेक्षा कहीं अधिक सुदृढ़, समर्थ चट्टान निष्ठुरता बरतती है और कृपण बनी रहती है, लेकिन जब वर्षा होती है, विपुल जलधार बरसती है तो रेतीली मिट्टी आर्द्र हो उठती है। उसकी तृष्णा तृप्त हो जाती है, पर चट्टान को उस लाभ से वंचित ही रहना पड़ता है। भीतर तो एक बूँद घुसती नहीं, बाहर जो नमी आती है उसे भी पवन एक झोंके में सुखा देता है, जबकि खेत की मिट्टी बाहर भी देर से सूखती है। भीतर तो सरसता का सुखद आनन्द चिरकाल तक लेती रहती है। मिट्टी ने कुछ खोया नहीं, चट्टान ने कुछ पाया नहीं। उदारता अपनाकर मिट्टी वरुण देव के स्नेह से अनायास ही सिक्त हो गयी और चट्टान को सूर्य का कोप सदा ही संतप्त करता रहा।

🔵 खिलते हुए पुष्प हमेशा ही हवा की झोली में अपना सौरभ भरते रहते हैं। अपने पराग से कीट, पतंगों, मधुमक्खियों की सतत उदरपूर्ति करते हैं। ईश्वरीय व्यवस्था उन्हें कभी सौरभ और पराग की कमी नहीं होने देती। बहता हुआ पानी स्वच्छ रहता है, उसे लोग पीते और उसी में नहाते हैं। गड्ढे में रुका हुआ पानी सड़ जाता है, पीने योग्य नहीं रहता। कृपणता रुके हुए गड्ढे की तरह है, उसका सञ्चय सड़कर दुर्गन्ध ही उत्पन्न करता है। गड्ढे की संकीर्णता में बँधकर जल देवता की भी दुर्गति होती है। ऐसी दुर्गति से बचें एवं उदार जीवन की गरिमा समझें, देते रहने का आनन्द पाएँ।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 45

👉 आज का सद्चिंतन 28 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 April 2017



गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

👉 हम ईश्वर के होकर रहें

🔵 प्रतिमाओं में देखे जाने वाले मनुहार करने पर भी नहीं बोलते हैं, लेकिन अन्तःकरण वाले भगवान जब दर्शन देते हैं तो बोलने के लिए, बातें करने के लिए व्याकुल दिखते हैं। यदि हम अपने को तनिक-सा अन्तर्मुखी कर सकें, तो उनके स्वरों की झंकृति स्पष्ट सुनाई देने लगेगी। न जाने कब से वे हमसे कह रहे हैं-‘‘मेरे इस अनुपम उपहार मनुष्य जीवन को इस तरह न बिताया जाना चाहिए, जैसे कि बिताया जा रहा है। ऐसे न बरबाद करना चाहिए, जैसे कि बरबाद किया जा रहा है। ऐसे न गवाँना चाहिए, जैसे कि गवाँया जा रहा है। यह महत्त्वपूर्ण प्रयोजन के लिए है। ओछी रीति-नीति अपनाकर मेरे इस अनोखे-अनूठे अनुदान का उपहास न बनाया जाना चाहिए।

🔴 जब और भी बारीकी से उनकी भाव-भंगिमा और मुखाकृति को देखेंगे, तो प्रतीत होगा कि वे विचार-विनिमय करना चाहते हैं और कहना चाहते हैं कि बताओ तो सही-इस जीवन-सम्पदा का इससे अच्छा उपयोग क्या और कुछ नहीं हो सकता जैसा कि किया जा रहा है? वे उत्तर चाहते हैं और सम्भाषण को जारी रखना चाहते हैं।
  
🔵 लेकिन उत्तर तो हम तभी दे सकते हैं, जब अपने को बारीकी से जानने की कोशिश करें, अपनी गहरी छान-बीन करें। स्वयं की रुचियों-प्रवृत्तियों की जाँच-पड़ताल करें? विचारों को ही नहीं, संस्कारों को भी परखें। आखिर कहाँ और कौन-सा वह तत्त्व है, जो हमें भगवान् से सम्भाषण नहीं करने दे रहा है, आखिर किस वजह से हम उन्हें उत्तर देने से कतरा रहे हैं, किस कारण हमारी जीवन-सम्पदा नष्ट होती चली जा रही है?

🔴 कारण कुछ भी हो, अवांछित तत्त्व जहाँ कहीं भी हों, उसे अपने से निकाल फेकें। परिष्कृत होते ही अहसास होगा, अन्तरंग में अवस्थित भगवान् की झाँकी दर्शन, सम्भाषण, परामर्श और पथ-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं है। उसमें गाय, बछड़े जैसा विह्वल वात्सल्य भी है। परमात्मा हमें अपना दुग्ध अमृत-अजस्र अनुदान के रूप में पिलाना चाहते हैं। पति और पत्नी की तरह भिन्नता को अभिन्नता में बदलना चाहते हैं। हमारी क्षुद्रता को अपनी अनन्तता में बदलना चाहते हैं। हमें अपनाने की, अपने में आत्मसात  कर लेने की उनकी उत्कंठा अति प्रबल है।

🔵 फिर देरी क्यों? विलम्ब किसलिए? हम ईश्वर के बनें, उसके होकर रहें, उसके लिए जिएँ। अपने को इच्छाओं और कामनाओं से खाली कर दें। उसकी इच्छा और प्रेरणा के आधार पर चलने के लिए आत्मसमर्पण कर सकें, तो परमेश्वर को अपने कण-कण में लिपटा हुआ, अनन्त आनन्द की वर्षा करता हुआ पाएँगे। आनन्द की यह वर्षा हमारे रोम-रोम को पुलकन-प्रफुल्लता, उल्लास और शक्ति से भर देगी, जीवन कृतार्थ और कृतकृत्य हो जाएगा।३

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 44

👉 आज का सद्चिंतन 27 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 April 2017



बुधवार, 26 अप्रैल 2017

👉 प्रभु! तुम्हारा विश्वास शक्ति बने, याचना नहीं

🔵 हे प्रभु! मेरी केवल यही कामना है कि मैं संकटों से घबराकर भागूँ नहीं, उनका सामना करूँ। इसलिए मेरी यह प्रार्थना नहीं है कि संकट के समय तुम मेरी रक्षा करो, बल्कि मैं तो इतना ही चाहता हूँ कि तुम उनसे जूझने का बल दो। मैं यह भी नहीं चाहता कि जब दुःख-सन्ताप से मेरा चित्त व्यथित हो जाय, तब तुम मुझे सांत्वना दो। मैं अपनी अञ्जली के भाव-सुमन तुम्हारे चरणों में अर्पित करते हुए इतना ही माँगता हूँ कि तुम मुझे अपने दुःखों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति दो।

🔴 जब किसी कष्टदायक संकट की घड़ी में मुझे कहीं से कोई सहायता न मिले तो मैं हिम्मत न हारूँ। किसी और स्रोत से सहायता की याचना न करूँ, न उन घड़ियों में मेरा मनोबल क्षीण होने पाए। हे अन्तर्यामिन्! मुझे ऐसी दृढ़ता और शक्ति देना जिससे कि मैं कठिन से कठिन घड़ियों में भी-संकटों और समस्याओं के सामने भी दृढ़ रह सकूँ और तुम्हें हर पल अपने साथ देखते हुए मुसीबतों, परेशानियों को हँसी-खेल समझकर अपने चित्त को हलका रख सकूँ। मैं बस यही चाहता हूँ।
  
🔵 मेरे आराध्य! तुम्हारा विश्वास हर-हमेशा मेरे हृदय-मन्दिर में दीप-शिखा की तरह अखण्ड, अविराम प्रच्वलित रहे। मेरे प्रारब्ध के प्रबल झंझावात, परिस्थितियों की भयावह प्रतिकूलताएँ स्वयं मेरी अपनी मनोग्रन्थियाँ इस ज्योति को बुझा तो क्या, कँपा भी न सकें। विश्वास की यह च्योति हर पल मेरे अस्तित्व में आत्मबल की ऊर्जा एवं तात्कालिक सूझ का प्रकाश उड़ेलती रहे। यह विश्वास मेरे लिए शक्ति बने-याचना नहीं, सम्बल बने-क्षीणता नहीं। कहीं ऐसा न हो कि स्वयं के तमोगुण से घिरकर, तुम्हारे  विश्वास का झूठा आडम्बर रखकर कर्म से विमुख हो जाऊँ, कर्त्तव्य से मुख मोड़ लूँ। चाहे जैसी भी प्रतिकूलाएँ हों, व्यवहार में मुझे कितनी ही हानि क्यों न उठानी पड़े, इसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं है, लेकिन प्रभु मुझे इतना कमजोर मत होने देना कि मैं आसन्न संकटों को देखकर हिम्मत हार बैठूँ और यह रोने बैठ जाऊँ कि अब क्या करूँ, मेरा सर्वस्व छिन गया।

🔴 मैं न अहंकारी बनूँ और न ही अकर्मण्य। स्वयं को तुम्हारे चरणों में समर्पित करते हुए मेरी इतनी ही चाहत है कि जीवन संग्राम में रणबाँकुरे योद्धा की तरह जुझारू बनूँ। तुम्हारे विश्वास की शक्ति से भयावह संकटों के चक्रव्यूहों का बेधन करूँ, उन्हें छिन्न-भिन्न करूँ।

🔵 प्रभु तुम्हारा और केवल तुम्हारा विश्वास ग्रहण कर लोगों ने अकिंचन अवस्था में रहते हुए भी इतिहास-पुरुष बनने का गौरव हासिल किया है। जीव और संसार की श्रेष्ठतम उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। मेरी बस यही कामना है कि तुम्हारा विश्वास मेरे लिए वीरता का पर्याय बने, आलस्य नहीं। वीरता का सम्बल बने, आतुरता का आकुलाहट नहीं। बस इतनी ही कृपा करना।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 42

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 April 2017


👉 आज का सद्चिंतन 26 April 2017


मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

👉 बहादुर हो तो सच्चाई की राह पर बढ़ो

🔴 सन् १९२२ में अमावस्या की एक काली रात और वामक नदी का किनारा। गुजरात के प्रष्ठि समाजसेवी रविशंकर महाराज नदी के किनारे पगडंडी पर आगे बढ़ते चले जा रहे थे। तभी उनके कधे पर पीछे से हाथ रखते हुए किसी ने कहा- महाराज! आप आगे कहाँ जा रहे है ? चलिए वाप॑स लौट चलिए।

🔵 महाराज ने स्वर पहचान लिया, "पूछा कौन है? पुंजा"
हाँ महाराज आगे मत जाइए। आगे खतरा है।''
"कैसा खतरा है ?"
"आगे रास्ते में बहारबटिया छिपे है।"
"कौन ?---  नाम दरिया है।"

🔴 हाँ वही है। मेरी राय है कि आप आगे न जाएँ। व्यर्थ में ही इज्जत देने से क्या लाभ होगा ?

🔵 महाराज हँसे। उन्होंने कहा- "भाई मेरी इज्जत इतनी छोटी नहीं है जो थोडी-सी बात में समाप्त हो जाए। मैं उन्हीं की तलाश में इधर आया था। चलो अब तुम्ही मुझे वहीं तक पहुंचा दो, क्योंकि तुम्हारा सारा रास्ता देखा है और वह ठिकाने भी तुम्हे मालूम है जहाँ यह लोग छिपे रहते है।

🔴 नहीं-नहीं महाराज मेरी हिम्मत वहाँ जाने की नहीं है। अगर उन्होंने कोई हमला किया तो मैं आपको बचा भी न पाऊँगा और मेरे प्राण बेकार में चले जायेंगे।'

🔵 इतना कह पुंजा ठिठक गया। "अच्छा तो तुम रुको। मैं आगे जाता हूँ।" इतना कहकर महाराज आगे बढ़ गए।

🔴 वह चलते-चलते एक खेत की मेड पर खडे हो गए। इतने में ही उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति साफा बाँधे बंदूक लिए उनकी ओर बढ़ता चला आ रहा है। जब दोनों के बीच की दूरी कम रह गई तो उसने सामने बंदूक तान दी।

🔵 महाराज खिलखिला कर हँस पडे। उन्हें वारदोली सत्याग्रह का स्मरण हो आया और उनका साहस दुगुना हो गया। वे बोले क्यो ? क्या आज अकेले ही हो ? तुम्हारे अन्य साथी कहाँ हैं ?

🔴 अब महाराज और बंदूकधारी दोनों ही पास की झोंपडी के निकट आ गए जहाँ अन्य डाकू छिपे थे। एक ने गरजकर कहा खबरदार! जो एक कदम भी आगे बढाया, और महाराज लापरवाही से उसी ओर बढ़ने लगे जिस ओर यह ललकार आई थी। सामने एक घुडसवार डकैत ने आकर पूछा- तुम कौन हो ?

🔵 मैं गाँधी की टोली का बहारबटिया हूँ। आओ हम लोग बैठकर बातचीत करें। मैं तुम सबको बुलाने ही तो आया हूँ।' इतना कहकर महाराज ने घोडे की लगाम पकडने के लिए हाथ बढा़ दिया।

🔴 सब लोग उसी झोंपडी के पास ही बैठ गये। महाराज ने समझाना शुरू किया 'भाइयो! यदि तुमको जौहर ही दिखाना है तो उन अंग्रेजों को क्यों नही दिखाते, जिन्होंने सारा देश ही तबाह कर दिया है। इन गरीबों को लूटकर मर्दानगी दिखाना तो लज्जा की बात है। अब गाँधी जी के नेतृत्व में शीघ्र ही आंदोलन शुरू होगा, यदि तुम में सचमुच पौरुष है, तो गोली खाने चलो। गाँधी जी ने तुम सबको आमंत्रित किया है। यह कहते-कहते महाराज के नेत्र सजल हो गये। गला रुँध-सा गया। डाकू इस अंतरग स्नेह से आविर्भूत हो उठे।

🔵 अपने हथियार डालते हुए उनके सरदार ने कहा-आप निश्चित होकर जाइए। आज हम आपके गॉव में डाका डालने को थे, पर अब नही डालेंगे। साथ में एक आदमी भेज देता हूँ।

🔴 महाराज ने कहा आप मेरी चिंता न करिए, मै अकेला ही आया था और अकेला ही चला जाऊँगा। साथ देना है तो उस काम में साथ दो जिसे गाँधी जी ने, भगवान् ने हम सबको सौंपा है।

🔵 डाकूओं में से कई ने कुकृत्य छोड़ दिये और कईयों ने सत्याग्रह आंदोलन में भारी सहयोग किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 143, 144

👉 सजल संवेदना से हुई निहाल

🔵 मेरी शादी १९८८ में हुई थी। मेरे अभिभावकों ने मेरे पति की पढ़ाई देखकर मेरी शादी तय कर दी थी। मेरे पति एग्रीकल्चर से एम० एससी० कर रहे थे। पिताजी ने सोचा कि लड़का अच्छी पढ़ाई कर रहा है, सर्विस कहीं न कहीं लग ही जाएगी। मेरे मायके में बिजनेस का काम होता था। शादी के बाद धीरे- धीरे परेशानी बढ़ती ही चली गई। मेरे पति इलाहाबाद में कम्पटीशन की तैयारी कर रहे थे। काफी मेहनत कर रहे थे। दिन रात तैयारी में लगे रहने के बावजूद कोई सफलता नहीं मिली। इससे मन बहुत दुखी रहने लगा। इधर दो बार मैं गर्भवती हुई, किन्तु दोनों बार बच्चे खराब हो गए। मैं इन सब बातों से बहुत टूट चुकी थी। मैं दिन रात रोया करती थी।

🔴 इन्हीं दिनों मैं अपने मायके गई हुई थी। मेरा वहाँ भी वही हाल था। मुझे दिन रात चिन्तित देखकर मेरे पिताजी बहुत परेशान रहते थे। शारदीय नवरात्रि नजदीक आ गई थी। तुलसीपुर के विधायक श्री कमलेश सिंह जी सपरिवार शान्तिकुञ्ज जाने के लिए तैयार थे। मेरे चाचा (गुलजारी लाल जी) चाची तथा उनकी लड़की भी साथ जा रहे थे। मेरे पिताजी से चाचाजी ने कहा कि एक सीट खाली है। अगर कोई चलना चाहे तो शान्तिकुञ्ज जा सकता है। चाचाजी की बातों को सुनकर मेरे पिताजी ने कहा कि किसी को क्यों, नीरू को ले जाओ। वह दामाद के सर्विस न मिलने और बच्चे की घटना से दिन- रात रोती रहती है। शायद वहाँ जाने से उसका भाग्य सँवर जाए। इस पर चाचाजी ने कहा कि क्या बात करते हो! सीट न भी खाली होती तो भी हम उसको ले जाते। आप उसको भेज दीजिए। माँ के आशीर्वाद से सब ठीक हो जाएगा। पिताजी ने मुझको यह बात बताई तो मेरे मन में आशा का संचार हुआ। मुझे विश्वास हो गया कि अब मेरे कष्ट ज्यादा दिन नहीं रहेंगे। मैं नवरात्रि में शान्तिकुञ्ज पहुँची। मैंने वहाँ नौ दिन के अनुष्ठान का संकल्प लिया। मेरा अनुष्ठान निर्विघ्न सम्पन्न हुआ।

🔵 इसके पश्चात् मेरे चाचाजी मुझे लेकर माताजी के दर्शन हेतु पहुँचे। उन्हें देखकर माताजी बोलीं- कहो बेटा कैसे हो? तो चाचाजी ने कहा- माताजी मैं क्या बताऊँ, अगर बच्चे दुखी हैं तो बाप कैसे सुखी रह सकता है। यह मेरे बड़े भइया की लड़की है, लेकिन उसे अपनी बेटी जैसा ही मानता हूँ। इसकी शादी के तीन साल हो गए। भाई साहब ने पढ़ाई देखकर बेटी की शादी कर दी थी। लेकिन दामाद को नौकरी आज तक नहीं मिली है। और इसके दो बच्चे भी खराब हो गए हैं। जिसके कारण यह बहुत परेशान रहती है। दामाद के लिए दुकान खुलवा दूँ। क्या यह ठीक रहेगा?

🔴 चाचाजी की बातें सुनकर मेरा सर सहलाते हुए माताजी कुछ क्षण शान्त हो गईं। उसके पश्चात् बोलीं- गुलजारी परेशान मत होओ, दामाद की बड़ी अच्छी सरकारी नौकरी लगेगी। और इसके दो तीन बच्चे भी होंगे। माताजी के मुख से उनकी वाणी सुनकर मेरी आँखों से आँसू आ गए। मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि माँ का आशीर्वाद अवश्य फलीभूत होगा।

🔵 कुछ दिन बाद मेरे पति की कृषि विभाग में नौकरी लगी। उसके पश्चात् उत्तरप्रदेश लोक सेवा आयोग से नायाब तहसीलदार के पद पर चयन हुआ। माँ के आशीर्वाद से मेरे तीन बच्चे भी हुए जो पूर्ण स्वस्थ हैं। इस घटना के बाद से मेरे ससुराल के लोगों को भी गुरुदेव- माताजी के प्रति अनन्य श्रद्धा हो गई। आज हम सभी लोग गुरुकार्य में संलग्न हैं। गुरुदेव- माताजी के आशीर्वाद से मुझे सब कुछ मिला है, जिसकी मुझे आवश्यकता थी। हम उनकी कृपा से अभिभूत हैं।              
  
🌹 श्रीमती नीरू बलरामपुर (उत्तरप्रदेश)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/sajal

👉 जीवन की मूल प्रेरणा है परमार्थ

🔵 संसार को आलोकित करने के लिए सूर्यदेव निरन्तर तपा करते हैं। अपने अविराम तप की च्वाला में हर-हमेशा जलते रहकर ही वे धरती के दोनों गोलार्द्धों में प्राण और ऊर्जा का संचार करते हैं। मेघों का अभाव कहीं जीवन ही न सुखा डाले, इसके लिए सागर सतत बड़वानल में जला करते हैं। अपने इस अनवरत अन्तर्दाह को सहकर वे उस सरंजाम को जुटाने में संलग्न रहते हैं, जो तपते-झुलसते जीवन को वर्षा की शीतल फुहार से शान्ति दे सके। सितारे हर रोज चमकते हैं, ताकि मनुष्य अपनी अहंता में ही न पड़ा रहकर विराट् ब्रह्म की प्रेरणाओं से पूरित बना रहे। अपनी हर श्वास के साथ संसार भर का जहर पीने और बदले में अमृत उँड़ेलने का पुण्य-पुरुषार्थ वृक्षों ने कभी बन्द नहीं किया। कर्म का परोपकार में अर्पण, सृष्टि की मूल प्रेरणा है। जिस दिन यह प्रक्रिया बन्द हो जाय, उस दिन विनाश ही विनाश, शून्य ही शून्य, अन्धकार ही अन्धकार के अलावा और कुछ भी नहीं रह जाएगा।

🔴 परोपकार की इस पुण्य-प्रक्रिया को जारी रखने के लिए ही नदियाँ राह में पड़ने वाले पत्थरों की ठोकरें सहकर भी सबको जलदान करती रहती हैं। पवन जमाने भर की दुर्गन्ध का बोझ सहकर भी नित्य चलता है और प्राण-दीपों को प्रज्वलित रखने का कर्त्तव्य पालन करता रहता है। फूल हँसते और मुसकराकर कहते हैं, काँटों की चुभन की परवाह न करके संसार में सुगन्ध भरने और सौन्दर्य बढ़ाते रहने में ही जीवन की शोभा है। कोयल कूकती है तो उसके पीछे जो आभा प्रतिध्वनित होती है, उसमें कोलाहलपूर्ण संसार में माधुर्य बनाए रखने का शान्त सरगम गूँजता प्रतीत होता है। अपने नन्हें से बच्चे की चोंच में दाना डालकर चिड़िया अपने वंश का पोषण ही नहीं करती, अपितु असमर्थ और अनाश्रितों को आश्रय देने की परम्परा पर भी प्रकाश डालती है।
  
🔵 जीवन की मूल प्रेरणा है, परमार्थ और लोक-कल्याण के लिए भावभरा आत्मार्पण। ठीक-ठीक आत्मार्पण किए बिना परमार्थ साधना पूरी नहीं होती। आत्माहुति जितनी सम्पूर्ण होगी, परमार्थ की च्वाला उतनी ऊँची उठेगी। दीप जितना अधिक अपने को जलाता है, ज्योति उतनी ही अधिक प्रखर होती है। जड़ें अपने को जितनी अधिक गहराई में दबाए रखती हैं, वृक्ष उतने ही अधिक मजबूत होते और ऊँचे उठते हैं। जीवन को आधार और ऊर्जा प्रदान करने वाला प्रत्येक घटक इसी पुण्य-परम्परा में संलग्न है। सृष्टि में सन्तुलन बनाए रखने के लिए इसके निर्जीव कण तक पुण्य-प्रक्रिया को जारी रखने में जुटे हैं। ऐसे में स्वयं को जीवित ही नहीं समझदार भी समझने वाला मनुष्य अपने समाज की उपेक्षा कर दे, परमार्थ से मुँह मोड़ ले, उसकी श्रीवृद्धि और सौन्दर्य निखारने का प्रयत्न न करे इससे बढ़कर लज्जा और आपत्ति की बात उसके लिए और क्या हो सकती है?

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 40

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 April 2017


👉 आज का सद्चिंतन 25 April 2017

रविवार, 23 अप्रैल 2017

👉 गुरु संरक्षण में किया गंगा स्नान

🔵 मेरी लड़की का विवाह सन् २००५ में १७ फरवरी को शांतिकुंज में होना निश्चित हुआ। शान्तिकुञ्ज में शादी होना मेरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ था। मेरे गाँव घर के लोगों एवं रिश्तेदारों को मिलाकर लगभग ७०- ८० लोग शांतिकुंज पहुँचे। बहुत से लोग ऐसे थे जिन्होंने शान्तिकुञ्ज पहली बार देखा था। सभी लोग बहुत उत्साहित थे। तीर्थ में विवाह संस्कार और शान्तिकुञ्ज का दिव्य दर्शन दोनों का लाभ एक साथ पाकर सभी के हृदय पुलकित थे।

🔴 विवाह संस्कार नियत तिथि को बड़े अच्छे ढंग से सम्पन्न हुआ। विवाह संस्कार सम्पन्न होने के बाद भोजन आदि के पश्चात् बिटिया की विदाई पाँच बजे शाम को हो गयी। मेरी इच्छा और संकल्प था कि अगर मेरी लड़की की शादी हो जाएगी तो मैं गंगा नहाऊँगी। शान्तिकुञ्ज में शादी होने से मेरे दोनों संकल्प आसानी से पूरे हो रहे थे। शादी तो हो ही चुकी थी। बाकी बचा गंगा स्नान। हमें बहुत सारे और भी काम करने थे। चूँकि शादी में कन्या पक्ष से काफी लोग थे। सभी हर चीज देखना सुनना चाह रहे थे और सभी लोगों को दीक्षा भी दिलवानी थी, इसलिए रात में मैंने अपनी चाची से कहा कि अगर गंगा स्नान की बात सभी को मालूम होगी तो सुबह हम लोग स्नान नहीं कर पाएँगे। सभी तैयार होंगे तो सारा कार्यक्रम लेट हो जाएगा। करीब पचास लोग दीक्षा संस्कार के लिए तैयार थे, इसलिए हमने योजना बनाई कि २.३०- ३.०० बजे के आसपास हम दोनों उठकर चुपचाप बिना किसी को बताए गंगा स्नान को जाएँगे। तुरन्त स्नान कर जल्दी वापस भी आ जाएँगे।

🔵 दूसरे दिन सुबह मैं और मेरी चाची चुपचाप उठकर गंगा स्नान के लिए चल दिए। शान्तिकुञ्ज में तो सब कुछ सामान्य था। लेकिन जब मैं गेट से बाहर सप्तऋषि आश्रम के पास पहुँची तो मुझे बहुत भय लगने लगा। जाड़े का दिन था। कुहरा भी छाया हुआ था। सड़क पर एक दो व्यक्ति चलते हुए दिखाई पड़ रहे थे। धीरे- धीरे आगे बढ़ने पर एकदम सुनसान रास्ता था। मैं अन्दर ही अन्दर बहुत डर रही थी। जाने कितने प्रकार के भाव आ रहे थे। मैं बहुत डरी हुई थी। लेकिन अपने डर को चाची पर प्रकट नहीं होने दिया। चाची ने कहा- रास्ता सुनसान है, तो मैंने कहा कोई बात नहीं, यहाँ कोई डर नहीं रहता। इधर शान्तिकुञ्ज का क्षेत्र है सुरक्षित रहता है। उनको सांत्वना दे रही थी किन्तु मैं अन्दर ही अन्दर गुरुदेव माताजी से प्रार्थना कर रही थी कि गुरुदेव इतनी जल्दी आकर बहुत बड़ी गलती की है। अगर कुछ हो जाता है तो कोई जान भी नहीं पाएगा कि हम लोग कहाँ हैं। गुरुदेव रक्षा करें। अब ऐसी गलती दुबारा नहीं होगी। उस समय मैं एकदम बीच रास्ते पर थी, शांतिकुंज की ओर का रास्ता भी सुनसान था। इस स्थिति में कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मैं जल्दी- जल्दी गुरुदेव का स्मरण कर आगे बढ़ रही थी। सोचा घाट पर कोई न कोई स्नान करते मिल ही जाएगा।

🔴 लेकिन मेरा सोचना एकदम गलत था। जब मैं घाट पर पहुँची तो वहाँ एकदम सुनसान था! गंगा की लहरें भी बिल्कुल शान्त थीं। मेरा हृदय भय के मारे काँप रहा था। इतना सब सोचने के बावजूद मैंने अपने भय को अन्दर ही छिपाए रखा। चाची को नहीं बताया। वह इससे और डर जाती। यही सब सोचकर गुरुदेव का नाम लेकर मैं सीढ़ियों के नीचे उतर गई। मन में आया अब आ ही गई हूँ तो स्नान के अलावा कोई रास्ता नहीं है। मैंने गंगा माँ को प्रणाम किया और स्नान करने लगी।

🔵 अचानक मेरी निगाह सीढ़ियों के ऊपर पड़ी। घाट पर घना कुहरा छाया हुआ था। उसी कुहरे में देखा एक वृद्ध पुरुष सफेद धोती- कुर्ता पहने दोनों हाथ पीछे किए एक छोर से दूसरे छोर तक टहल रहे हैं। मैंने सोचा पता नहीं कौन है? इनको दिखाई भी नहीं पड़ता कि औरतें नहा रही हैं। ये यहाँ पता नहीं क्या कर रहे हैं। चाची की भी निगाह पड़ी वह भी बोली कोई बाबा टहल रहें हैं तो मैंने कहा ठीक है टहलने दो। हम दो लोग हैं डरने की कोई बात नहीं। इस प्रकार हम लोग स्नान आदि करके गंगाजी का पूजन करने के बाद सीढ़ियों पर चढ़ते हुए घाट की ओर बढ़ने लगे।

🔴 लेकिन यह क्या! जैसे ही हम लोग घाट के पास पहुँचे वहाँ वह बाबा न जाने कहाँ गायब हो गए। हम लोग सोच में पड़ गए कि ये इतनी जल्दी कहाँ गायब हो गए। काफी देर सोचने के बाद हमने शान्तिकुञ्ज की ओर प्रस्थान किया। तब तक रास्ते में काफी चहल- पहल हो चुकी थी। मेरा डर न जाने कहाँ गायब हो चुका था। दिमाग पर बहुत जोर देने के बाद जब मैंने उस वृद्ध पुरुष का ध्यान किया तो लगा वे तो साक्षात् गुरुदेव ही थे। हम डरें नहीं, कोई दुर्घटना न हो इसलिए वह अपनी उपस्थिति का आभास देकर चले गए। इस घटना को आज भी याद करती हूँ तो अफसोस होता है कि वे आए और हम उन्हें पहचान भी न पाए। जाने कितनी बातें उस समय मैंने उनको कह डालीं। लेकिन भक्तवत्सल गुरुदेव हमेशा अपने बच्चों का ध्यान रखते हैं।                      
   
🌹 श्रीमती ममता सिंह बहराईच(उत्तरप्रदेश)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/bath

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 89)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 इतने पर भी वे सेवाएँ महत्त्वपूर्ण हैं। अब तक प्रज्ञा परिवार से प्रायः २४ लाख से भी अधिक व्यक्ति सम्बन्धित हैं। उनमें से जो मात्र सिद्धांतों, आदर्शों से प्रभावित होकर इस ओर आकर्षित हुए हैं, वे कम हैं। संख्या उनकी ज्यादा है, जिनने व्यक्तिगत जीवन में प्रकाश, दुलार, सहयोग, परामर्श एवं अनुदान प्राप्त किया है। ऐसे प्रसंग मनुष्य के अंतराल में स्थान बनाते हैं। विशेषतया तब जब सहायता करने वाला अपनी प्रामाणिकता एवं निस्वार्थता की दृष्टि से हर कसौटी पर खरा उतरता हो। संपर्क परिकर में मुश्किल से आधे तिहाई ऐसे होंगे, जिन्हें मिशन के आदर्शों और हमारे प्रतिपादनों का गंभीरतापूर्वक बोध है।

🔵 शेष तो हैरानियों में दौड़ते और जलती परिस्थितियों में शान्तिदायक अनुभूतियाँ लेकर वापस लौटते रहे हैं। यही कारण है जिससे इतना बड़ा परिकर बनकर खड़ा हो गया। अन्यथा मात्र सिद्धांत पर ही सब कुछ हो रहा होता, तो आर्यसमाज, सर्वोदय की तरह सीमित सदस्य होते और व्यक्तिगत आत्मीयता, घनिष्ठता का जो वातावरण दीखता है, वह न दीखता। आगंतुकों की संख्या अधिक, समय-कुसमय आगमन, ठहरने-भोजन कराने जैसी व्यवस्थाओं का अभाव जैसे कारणों से इस दबाव का सर्वाधिक भार माताजी को सहन करना पड़ा है, पर उस असुविधा के बदले जितनों की जितनी आत्मीयता अर्जित की है, उसे देखते हुए हम लोग धन्य हो गए हैं। लगता है, जो किया गया वह ब्याज समेत वसूल हो रहा है। पैसे की दृष्टि से न सही भावना की दृष्टि से भी यदि कोई कुछ कम ले, तो उसके लिए घाटे का सौदा नहीं समझा जाना चाहिए।

🔴 आराधना के लिए, लोकमंगल साधना के लिए, गिरह की पूँजी चाहिए। उसके बिना भूखा क्या खाए? क्या बाँटे? यह पूँजी कहाँ से आई? कहाँ से जुटाई? इसके लिए मार्गदर्शक ने पहले ही दिन कहा था-जो पास में है, उसे बीज की तरह भगवान के खेत में बोना सीखो? उसे जितनी बार बोया गया, सौ गुना होता चला गया अभीष्ट प्रयोजन में कभी किसी बात की कमी न पड़ेगी। उन्होंने बाबा जलाराम का उदाहरण दिया था, जो किसान थे, अपने पेट से बचने वाली सारी आमदनी जरूरतमन्दों को खिलाते थे।

🔵 भगवान इस सच्ची साधना से अतिशय प्रसन्न हुए और एक ऐसी अक्षय झोली दे गए, जिसका अन्न कभी निपटा ही नहीं और अभी भी वीरपुर (गुजरात) में उनका अन्न सत्र चलता रहता है, जिसमें हजारों भक्तजन प्रतिदिन भोजन करते हैं। जो अपना लगा देता है, उसे बाहर का सहयोग बिना माँगे मिलता है, पर जो अपनी पूँजी सुरक्षित रखता है, दूसरों से माँगता फिरता है, उस चंदा उगाहने वाले पर लोग व्यंग्य ही करते हैं और यत्किंचित् देकर पल्ला छुड़ाते रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.4

👉 आज का सद्चिंतन 24 April 2017


👉 CHINTAN (Last Part)

(studying the past-period of self-being): its Significance & Mechanics
🔴 Self-Refinement comes just next to Self-Inspection or Self-Review. How to refine? What is to be done to refine? There is prevention in second leg called Self-Refinement. For example if you consume liquor, just stop taking it. No sir, I shall not take wine. If you smoke, you hurt your heart then just review that. Now we shall not allow our hearts to be damaged. Self-Refinement is the name of very this action. Just wage a war against mistakes done by you so far and poise to remove that. Use your willpower in such a way that mistakes done by now must not be repeated in future. Prepare a scheme/blueprint to this effect.

🔵 What is the way of not allowing the mistakes to take place? What will we do, if rawness of our temperament compels us to continue with previous routine? The moment your mind begins partiality & favoring with what is convenient to you, be sure that is the right time to discourage and take a stand against it. Just wage a war against it. Very this war/task is called ‘Self-Refinement’. The process of ‘CHINTAN’ (also known as the very first leg towards personality-building/transformation ) comprises of two stages of SELF-INSPECTION/REVIEW and ‘SELF-REFINEMENT’ taken together. It was all that was to be told to you. 

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya
http://awgpskj.blogspot.in/2017/04/chintan-part-2.html

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 April 2017


👉 वह व्यक्तित्व-जिसने सबका हृदय जीता

🔴 महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व में एक विशेषता यह थी कि वह हर स्तर के व्यक्ति को प्रभावित कर लेते थे। बडे लोगों के प्रति लोगों में सम्मान एवं श्रद्धा का भाव तो होता है, किंतु आत्मीयता नहीं होती। इसी प्रकार छोटों की विशेषताओं की प्रशंसा तो करते हैं किंतु उनके प्रति समानता का व्यवहार नहीं कर पाते। गाँधी जी में वह गुण था जिसके कारण वह समाज के हर वर्ग के साथ आत्मीयता का भाव स्थापित कर लेते थे तथा स्नेह एवं सम्मान दोनों समान रूप से प्राप्त कर लेते थे। वह वास्तव में जन नेता कहे जा सकते थे और उनका जादू सर चढ़कर बोलता था। प्रस्तुत घटना से उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष पर प्रकाश पड़ता है।

🔵 घटना दिसंबर सन् १९४५ की है। भारत को राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त होना लगभग निश्चित हो गया था। किसी परामर्श वार्ता के सिलसिले में बंगाल के गवर्नर श्री आर० जी० केसी ने गाँधीजी को राजभवन में बुलाया था। श्री केसी प्रतिष्ठित आस्ट्रेलियायी राजनीतिज्ञ थे।

🔴 गाँधी जी के वार्तालाप में उन्हें इतना रस आया कि वे भोजन का समय भी भूल गये। वार्ता के मध्य किसी का जाना मना था, अत: कोई याद दिलाने भी न जा सका। वार्ता समाप्त हुई तो बापू उठकर चल दिए। उन्हें पहुंचाने पीछे-पीछे गवर्नर महोदय भी चल रहे थे। सामान्य शिष्टाचार के नाते भी तथा व्यक्तिगत रूप से गाँधी जी से प्रभावित होने के कारण भी उनका ऐसा करना स्वाभाविक था।

🔵 बाहर जाने के मार्ग में जब वह दोनों बडे़ हाल मे छँचे तो गवर्नर चौंक पडे़। उन्होंने देखा कि हाल में राजभवन के सारे के सारे कर्मचारी उपस्थित है। धोबी से रसोइए तक चौकीदार व अन्य कर्मचारियों से लेकर माली तक, सब मिलाकर लगभग जिनकी संख्या २०० थी, सबके सब उपस्थित थे। सभी शांति के साथ दो लंबी कतारों में खडे़ थे, मानो किसी को गार्ड ऑफ आनर देने की तैयारी है। निश्चित रूप से उन्हें किसी ने एकत्र होने को नही कहा था। वह तो बापू के प्रति सहज इच्छा के कारण उनके दर्शनार्थ एकत्र हो गये थे। उनमें से अनेक तो काम करते-करते वैसे ही भागकर आ गये थे। ऐसी पोशाक में थे कि उस अवस्था मे गवर्नर के सामने आना अनुशासनहीनता के रूप मे दंडनीय था, किंतु यहाँ वह गवर्नर के लिये नहीं, अपने प्यारे बापू के लिये आए थे। बापू यहाँ से गुजरे तो सबने श्रद्धा के साथ अभिवादन किया। उनका अभिवादन स्वीकार करते हुए बापू अपनी मुस्कान से सबको संतोष देते हुए आगे बड गए।

🔴 श्री केसी खोये-खोये से साथ थे। उन्हें कुछ कहते न बन पड़ रहा था। विचित्र वेशभूषा में कर्मचारियों को देख संकुचित भी थे तथा गाँधी जी के प्रति अनुराग देखकर चकित भी। बोले गाँधीजी! यकीन रखिये, मैंनै उन्हें एकत्र होने के लिए नहीं कहा था। बापू उत्तर न देते हुए, केवल मुस्कुराकर विदा माँगकर चल दिए। श्री केसी को उस समय तक इस विषय में शंका थी कि भारत में विभिन्न संप्रदायों को एक सूत्र में बिना भय के बॉधा जा सकता है, किंतु गाँधी जी का वह अनोखा गार्ड ऑफ आनर देखकर उनकी मान्यता बदल गई। उनके कर्मचारियों में अधिकांश मुसलमान व कुछ इसाई भी थे। उन्होंने स्वीकार किया कि देश के हर वर्ग के हृदय में गाँधी ने इतना गहरा स्थान बना लिया है इसकी उन्हें कल्पना भी नहीं थी।

🔵 जन-जन के अंतःकरण मे गाँधी जी ने इतना महत्वपूर्ण स्थान कैसे पा किया था यह अध्ययन का विषय है। उन्होंने जी जान से सबके हित का प्रयास किया था। अपना सब कुछ जनता को देकर ही उन्होने वह स्थान बनाया था, जो किसी भी जन नेता कहलाने वाले के लिए शोभनीय है। बिना उसके थोथी वाह-वाही भले ही कोई पा ले, न तो सही अर्थों में सबका स्नेह पा सकता है और न ही सफल नेतृत्व कर सकता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 141, 142

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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