सोमवार, 17 अप्रैल 2017

👉 विदाई वेला का मार्मिक प्रसंग

🔵 जून १९७१ का माह था मथुरा में पूज्यवर के विदाई समारोह का आयोजन था। यद्यपि उस वर्ष के अन्दर पूज्यवर ने प्रत्येक बच्चे को किसी न किसी शिविर के बहाने बुला कर भेंट मुलाकात की थी। फिर भी जिन्हें अपने सगे बच्चों से अधिक स्नेह दिया हो, ऐसे पिता को अपने बच्चों से जाते- जाते एक बार मिल लेने की व्याकुलता एवं छटपटाहट हुई और विदाई समारोह का आयोजन उसी की परिणति थी।

🔴 ऐसी ही लगन दूसरी ओर भी लगी थी, बालकों के मन में भी पिता से मिलने की व्याकुलता बढ़ी थी। किन्तु वे पिता के निर्देश के अनुशासन में बँधे थे। एक ओर निश्चल प्यार दूसरी ओर अपना सब कुछ न्यौछावर कर असीम सन्तोष पाने की व्याकुलता, यही था विदाई समारोह का सार।

🔵 विदाई समारोह का आमंत्रण पहुँचने पर बिलासपुर के सभी प्रमुख परिजन सर्व श्री रामाधार विश्वकर्मा, उमाशंकर चतुर्वेदी, बी. के. श्रीवास्तव, रामनाथ श्रीवत्स, हरिहर प्रसाद श्रीवास्तव आदि कार्यक्रम में शामिल हुए। अतिशय व्यस्तता के बावजूद गुरु देव कुशलक्षेम पूछ लेते थे। पहले दिन कलश यात्रा के बाद दूसरे दिन देव आह्वान में हल्की बूँदा- बाँदी हुई। लगा कि इन्द्रदेव ने भी पूज्यवर का विदाई निमंत्रण स्वीकार कर लिया हो। तीसरे दिन चालीस विवाहों का भव्य मण्डप लग रहा था।

🔴 विवाह समाप्त होते- होते इन्द्रदेव खुश होकर अपनी पूर्ण शक्ति से बरस जाना चाह रहे थे किन्तु स्वयं परमात्मा जिनके पुरोहित बने हों ऐसे उन चालीस जोड़ों के भाग्य से किसे ईर्ष्या न हो! पूरे समारोह भर पूज्यवर विभिन्न कर्मकाण्डों की व्याख्या कर सभी चालीस हजार से अधिक परिजनों को भी हँसाते- हँसाते लोट- पोट कर रहे थे। किसी को सुध भी नहीं रही कि कल के बाद हमारे पूज्यवर हमारे बीच से विदा होकर चले जाएँगे। जयमाल से लेकर पूर्णाहुति तक यज्ञ सम्पन्न कर अपने आवास पर लौटे। विवाह सम्पन्न होने के बाद रात ग्यारह बारह बजे मूसलाधार बारिश हुई। आँधी और पानी के बेग से सारे तम्बू की बल्लियाँ गिरने लगीं। कुछ साहसी कार्यकर्ता बल्लियों को पकड़े रहे ताकि तम्बू किसी तरह गिरने से बचें। पूरी रात सभी ने अँधेरे में गुजारी।

🔵 दूसरे दिन ब्रह्ममुहूर्त में अचानक गुरु देव आकर खड़े हो गए और हँसने लगे। मन में सोचा हमने रात भर कैसे गुजारी हम ही जानते हैं और गुरु देव हँस रहे हैं। एक क्षण में जाने क्या- क्या सोचने लगा। उसके बाद जब उन्होंने बड़े प्यार से पूछा बेटा ज्यादा परेशानी तो नहीं हुई? हम सभी ने एक स्वर में कहा- नहीं गुरू जी कोई परेशानी नहीं हुई। मन में यही सोचा कि अगर आँधी न आती तो गुरु देव प्रत्यक्ष एक- एक परिजन से मिलने न आते। हमें लगा कि शायद गुरुदेव ने इन्द्रदेव को न्योता देकर बुलाया हो कि तुम जाओ और बच्चों की परीक्षा लो, फिर सहलाने जाएँगे।

🔴 बरबस रामायण की चौपाइयाँ याद आ गईं। ‘‘छन महिं सबहिं मिले भगवाना। उमा मरम यह काहु न जाना।’’ गुरु देव सभी परिजनों से मिलने के बाद यज्ञशाला की ओर चल दिए। सभी परिजन यज्ञ हेतु तैयार होकर आए थे। गिरे हुए शामियाने चारों तरफ फैले हुए थे, किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे टेण्ट को व्यवस्थित किया जाए।

🔵 इसी बीच गुरु जी आए और बोले- सभी मिलकर प्रयास करो तो टेण्ट खड़ा हो सकता है। इतना कहने के बाद गुरुदेव ने स्वयं अपना हाथ आगे बढ़ाया। फिर क्या था हजारों हाथ उठ गए। गायत्री माता की जय, यज्ञ भगवान की जय के नारों से आसमान गूँज उठा और टेण्ट खड़ा हो गया। सभी आश्चर्यचकित थे कि इतना विशाल टेण्ट कैसे उठा। गुरु देव ने कहा, आप सबके सम्मिलित प्रयास से यह कार्य संभव हो सका। ऐसे थे हमारे गुरु देव।                    
  
🌹 माखन लाल ,बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 84)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 देखा गया है कि अपराध प्रायः आर्थिक प्रलोभनों या आवश्यकताओं के कारण होते हैं। इसलिए उनकी जड़ें काटने के लिए औसत भारतीय स्तर का जीवन-यापन अपनाने का व्रत लिया गया। अपनी निज की कमाई कितनी ही क्यों न हो, भले ही वह ईमानदारी या परिश्रम की क्यों न हो, पर उसमें से अपने लिए परिवार के लिए खर्च देशी हिसाब से किया जाए, जिससे कि औसत भारतीय गुजारा करना सम्भव हो। यह सादा जीवन-उच्च विचार का व्यावहारिक निर्धारण है। सिद्धान्ततः कई लोग इसे पसंद करते हैं और उसका समर्थन भी, पर अपने निज के जीवन में इसका प्रयोग करने का प्रश्न आता है तो उसे असम्भव कहने लगते हैं। ऐसा निर्वाह व्रतशील होकर ही निबाहा जा सकता है। साथ ही परिवार वालों को इसके लिए सिद्धान्ततः व्यवहारतः तैयार करना पड़ता है।

🔵  इस संदर्भ में सबसे बड़ी कठिनाई लोक प्रचलन की आती है। जब सभी लोग ईमानदारी-बेईमानी की कमाई से गुलछर्रे उड़ाते हैं, तो हम लोग ही अपने ऊपर ऐसा अंकुश क्यों लगाएँ? इस प्रश्न पर परिजनों और उनके पक्षधर रिश्तेदारों को सहमत करना बहुत कठिन पड़ता है। फिर भी यदि अपनी बात तर्क, तथ्य और परिणामों के सबूत देते हुए ठीक तरह प्रस्तुत की जा सके और अपने निज का मन दृढ़ हो तो फिर अपने समीपवर्ती लोगों पर कुछ भी असर न पड़े, ऐसा नहीं हो सकता। आर्थिक अनाचारों की जड़ काटनी है, तो वह कार्य इसी स्तर के लोक शिक्षण एवं प्रचलन से सम्भव होगा।

🔴 उस विश्वास के साथ अपनी बात पर दृढ़ रहा गया। घीया मण्डी मथुरा में अपना परिवार पाँच सदस्यों का था। तब उसका औसत खर्च १९७१ हरिद्वार जाने तक २०० रु. मासिक नियमित रूप से बनाए रखा गया। मिल-जुलकर, मितव्ययितापूर्वक लोगों से भिन्न अपना अलग स्तर बना लेने के कारण यह सब मजे से चलता रहा। यों आजीविका अधिक थी। पैतृक संपत्ति से पैसा आता था, पर उसका व्यय घर में अन्य सम्बन्धी परिजनों के बच्चे बुलाकर उन्हें पढ़ाते रहने का नया दायित्व ओढ़कर पूरा किया जाता रहा। दुर्गुणों-दुर्व्यसनों के पनपने लायक पैसा बचने ही नहीं दिया गया और जीवन साधना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष सरलतापूर्वक निभता रहा।

🔵 मोह परिवार को सजाने, सुसम्पन्न बनाने, उत्तराधिकार में सम्पदा छोड़कर मरने का होता है। लोग स्वयं विलासी जीवन जीते हैं और वैसी ही आदतें बच्चों को भी डालते हैं। फलतः अपव्यय का सिलसिला चल पड़ता है और अनीति की कमाई के लिए अनाचारों के विषय में सोचना और प्रयास करना होता है। दूसरों के पतन व अनुभवों से लाभ उठाया गया और उस चिंतन तथा प्रचलन का घर में प्रवेश नहीं होने दिया गया। इस प्रकार अपव्यय भी नहीं हुआ, दुर्गुण भी नहीं बढ़े, कुप्रचलन भी नहीं चला, सुसंस्कारी परिवार विकसित होता चला गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 85)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 पुण्य परोपकार की दृष्टि से कभी कुछ करते बन पड़ा हो सो याद नहीं आता। ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए कोई साधन बन पड़ा हो, ऐसा स्मरण नहीं। आत्मवत सर्व भूतेषु के आत्म- विस्तार ने सर्वत्र अपना ही आपा बिखरा दिखलाया तो वह मात्र दृष्टि दर्शन न रह गया। दूसरों की व्यथा वेदनाएँ भी देखी गयीं और वे इतनी अधिक चुभन, कसक पैदा करती रहीं कि उन पर मरहम लगाने के अतिरिक्त और कुछ सूझा ही को प्रसन्न करके स्वर्ग, मुक्ति का आनन्द लेना आया किसे ?? विश्व -मानव की तड़पन बन रही थी, सो पहले उसी से जूझना था। अन्य बातें तो ऐसी थीं जिनके लिए अवकाश और अवसर की प्रतीक्षा की जा सकती थी।            

🔵 हमारे जीवन के क्रिया- कलापों के पीछे उसके प्रयोजन को कभी कोई ढूँढ़ना चाहे, तो उसे इतना ही जान लेना पर्याप्त है कि सन्त और सज्जनों की सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों का जितने क्षण स्मरण दर्शन होता रहा उतने समय चैन की साँस ली और जब जन- मानव की व्यथा वेदनाओं को सामने खड़ा पाया, तो अपनी निज की पीड़ा से अधिक कष्ट अनुभव हुआ। लोक मंगल, परमार्थ, सुधार, सेवा आदि के प्रयास कुछ  यदि हमसे बन पड़े, तो उस सन्दर्भ में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि हमारी विवशता भर थी। दर्द और जलन ने क्षण भर चैन से न बैठने दिया, तो हम करते भी क्या ?? जो दर्द से ऐंठा जा रहा है वह हाथ- पैर न पटके तो क्या करे ?? हमारे अब तक के समस्त प्रयत्नों को लोग कुछ भी नाम दें, किसी रंग में रंगें, असलियत धारण यह है कि विश्व की आन्तरिक अनुभूति ने करूणा और सम्वेदना का रूप कर लिया और हम विश्ववेदना को आत्म वेदना मानकर उससे छुटकारा पाने के लिए बेचैन घायल की तरह प्रयत्न करते रहे।

🔴 भावनाएँ इतनी उग्र रहीं कि अपना आपा तो भूल ही गया। त्याग, संयम, सादगी अपरिग्रह आदि की दृष्टि से कोई हमारे कार्यों पर नजर डाले तो उसे उतना भर समझ लेना चाहिए कि जिस ढाँचे में अपना अन्त:करण ढल गया उसमें यह नितान्त स्वाभाविक था। अपनी समृद्धि, प्रगति, सुविंधा, वाहवाही हमें नापसन्द हो ऐसा कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, उन्हें हमने जानबूझ कर त्यागा, सो बात नहीं है। वस्तुत: विश्व- मानव की व्यथा अपनी वेदना बनकर इस बुरी तरह अन्त:करण पर छाई रही कि अपने बारे में कुछ सोचने करने की फुरसत ही न मिली। वह प्रसंग सर्वथा विस्मृत ही बना रहा। इस विस्मृति को कोई तपस्या, संयम कहे, तो उसकी मर्जी पर जब स्वपनों को अपनी जीवन पुस्तिका के सभी उपयोगी पृष्ठ खोलकर पढ़ा रहे हैं, तो वस्तु स्थिति बता ही देनी उचित है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन 17 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 April 2017


👉 गुरु नानक की ईश्वर निष्ठा

🔵 भौतिक अथवा आध्यात्मिक कोई भी क्षेत्र क्यों न हो, उसमें उन्नति करने के लिए लगन और एकाग्रता के साथ निष्ठा की आवश्यकता होती है। बिना सच्ची लगन और एकनिष्ठा के सिद्धि पा लेना संभव नही होता। गुरुनानक ने अपने लिये भक्ति का मार्ग चुना और अपनी निष्ठा के बल पर वे एक महान् संत बने और समाज में उनकी पूजा-प्रतिष्ठा हुई। उनके जीवन की तमाम घटनाएं उनकी इस निष्ठ की साक्षी हुई है।

🔴 नानक जब किशोरावस्था में थे, तभी से वे अपने उद्देश्य की पूर्ति में लग गये थे। यह आयु खेलने-खाने की होती है। नानक भी खेला करते थे, पर उनके खेल दूसरों से भिन्न होते थे। जहाँ और लडके गुल्लीडंडा, गेंद बल्ला, कबड्डी आदि का खेल खेला करते थे, वहाँ नानक भगवान् की पूजा, उपासना का खेल और साथियों को प्रसाद बाँटते थे।

🔵 एक बार वे इस प्रकार के खेल मे संलग्न थे। भोजन का समय हो गया था। कई बार बुलावा आया, लेकिन वे खेल अधूरा छोड्कर नहीं गए। अंत मे उनके पिता उन्हें जबरदस्ती उठा ले गए। भोग लगाकर प्रसाद बाँटने का खेल बाकी रह गया। नानक को खेल में विघ्न पड़ने का बडा दुःख हुआ, लेकिन उन्होंने न तो किसी से कुछ कहा और न रोए-धोए ही, तथापि वे गंभीरतापूर्वक मौन हो गये और भोजन न किया। बहुत कुछ मनाने, कहने और कारण पूछने पर भी जब नानक ने कुछ उत्तर नहीं दिया और खिलाने पर भी जब ग्रास नहीं निगला तो उनके पिता को चिंता हुई कि बालक को कहीं कोइ बीमारी तो नहीं हो गई।

🔴 वैद्य बुलाकर नानक को दिखलाया गया। वैद्य आया और उसने भी जब पूछताछ करने पर कोई उत्तर न पाया और खिलाने से ग्रास स्वीकार नहीं किया तो उसने उनके मुँह में उँगली डालकर यह परीक्षा करनी चाही कि लडके का गला तो कहीं बंद नहीं हो गया है। इस पर नानक से न रहा गया। वे बोले वैद्य जी, आप अपनी बीमारी का उपचार करिए। मेरी बीमारी तो यही ठीक करेगा जिसने लगाई है। नानक की गूढ़ बात सुनकर उनके पिता ने उनकी मानसिक स्थिति समझ ली और फिर उन्हें उनके प्रिय खेल से कभी नहीं उठाया।

🔵 इस प्रकार जब वे पाठशाला में पढ़ने के लिए भेजे गए, तब अध्यापक ने उन्हें तख्ती पर लिखकर वर्णमाला पढा़नी शुरू की। उन्होंने 'अ' लिखा और नानक से कहा-कहो 'अ'। नानक ने कहा 'अ'। उसके बाद अध्यापक ने 'अ' लिखा और कहा- कहो 'अ'। नानक ने कहा-'अ' नाम भगवान् का रूप। जब यही पढ़ लिया तो अब आगे पढ़कर क्या करूँगा?''

🔴 अध्यापक ने समझाया तुम मेरे पास पढ़ने और ज्ञान सीखने आए हो। बिना विद्या पढे ज्ञानी कैसे बनोगे ? नानक ने कहा कि आप तो मुझे समझ में आने वाली विद्या पढाइए, जिससे परमात्मा का ज्ञान हो, उसके दर्शन मिलें। आपकी यह शिक्षा मेरे लाभ की नहीं है। अध्यापक ने फिर कहा- यह विद्या यदि तुम नही पढो़गे तो संसार मै खा-कमा किस तरह सकोगे ? खाने कमाने के लिए तो यह विद्या पडनी जरूरी है।' नानक ने उत्तर दिया-'गुरुजी! आदमी को खाने के लिए चाहिए ही कितना "एक मुट्ठी अन्न। वह तो सभी आसानी से कमा सकते ही हैं, उसकी चिंता में भगवान् को पाने की विद्या छोडकर और विद्याएँ पढने की क्या आवश्यकता", "मुझे तो वह विद्या सिखाइए, जिससे मै मूल तत्व परमात्मा के पाकर सच्ची शांति पा सकूं।"

🔵 गुरु नानक की बातों में उनका हृदय, उनकी आत्मा और भगवान् के प्रति उनकी सच्ची निष्ठा बोल रही थी। उनकी बातों का प्रभाव अध्यापक पर पडा़ जिससे कि वे दुनियादारी से विरत होकर भगवान के सच्चे भक्त बन गए। ऐसी थी नानक की निष्ठा और परमात्मा को प्राप्त करने की लगन। इसी आधार पर उनकी उपासना और साधना सफल हुई। वे एक उच्चकोटि के महात्मा बने। उनकी वाणी बोलती थी और उनका हृदय उसका मंदिर बन गया था। वे दिन-रात भगवान् की भक्ति में तन्मय रहकर लोक-कल्याण के लिए उपदेश करते और लोगों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान् की भक्ति और संसार का कल्याण करने में लगा दिया। हजारों-लाखों लोग उनके शिष्य बने। आज जो सिक्ख संप्रदाय दिखलाई देता है, वह गुरुनानक के शिष्यो द्वारा ही बना है। निष्ठा और लगन में बडी शक्ति होती है। उसके बल पर सांसारिक उन्नति तो क्या भगवान् तक को पाया जा सकता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 137, 138

👉 जीवन एक कलाकार की तरह जीना सीखें

🔵 प्रतिकूलताएँ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में आती हैं। इस जीवन-समर में कोई भी व्यक्ति सदा अपने साथ अनुकूलताएँ बनी रहने का वरदान लेकर नहीं आया। बच्चा जब जन्म लेता है, माँ के गर्भ से बाहर आते ही उसे अनगिनत अवरोधों का सामना करना पड़ता है। जो सम्बन्ध गर्भ-रज्जु के माध्यम से विगत नौ माह के साथ बना हुआ था, वह एकाएक तोड़ दिया जाता है। गर्भ रज्जु के कटते ही बच्चे में अपने बलबूते जीवन जीने का, संघर्ष करने की स्थिति आ जाती है। वह छटपटाता है, चिल्लाता है व इसी क्रिया में उसके फेफड़े खुल जाते हैं, रक्त परिवहन सारे शरीर में सुनियोजित ढंग से होने लगता है। प्रकृति का यह पाठ बच्चे के लिए है कि, उसे स्वतन्त्र होकर कैसे जीना चाहिए? यह न कोई दण्ड है, न कोई कर्म का भाग्य-विधान।

🔴 इस धरती पर आने वाले हर व्यक्ति को एक नहीं, अनेकानेक अवरोधों से गुजरना पड़ता है। परब्रह्म की यह एक सुनियोजित व्यवस्था है और यह हर किसी के लिये है, कोई भी अपवाद नहीं। व्याधियाँ, मानसिक संताप, रोग, शोक, आर्थिक हानि, रिश्तेदारों का बिछोह, विभिन्न रूपों में असफलताएँ मनुष्य की परीक्षा लेने के लिए आने वाले अवरोध मात्र हैं। इन बाधाओं को हँसकर पार कर लेना, दुःखों-कष्टों को तप बना कर जीना ही मनुष्य के लिये उचित है। 

🔵 जो ऐसा करता है, वह जीवन समर को हँसते-हँसते पार कर जाता है। जो रोते-कलपते, देवी-देवताओं को दोष देते, अपने भाग्य को दोष देते, किसी तरह घिसट-घिसट कर अपनी जीवन-यात्रा पूरी करता है, वह न केवल एक असफल व्यक्ति सिद्ध होता है, वरन् वह मनोरोगों-मनोविकारों से ग्रस्त होकर अल्पकाल में ही इस सुरदुर्लभ मानव तन को गवाँ बैठता है। कई व्यक्ति तो निराश होकर आत्महत्या तक कर बैठते हैं। यह मानवीय काया रूपी देवालय की अवमानना है एवं उस स्रष्टा के अस्तित्व को नकारना भी।

🔴 अच्छा हो हम इस जीवन को एक कलाकार की तरह जियें। हँसती-हँसाती, हलकी-फुलकी जिन्दगी जीते हुए औरों को अधिकाधिक सुख बाँटते चलें। दुःखों, कष्टों को तप मानकर चलें और अपना एक सौभाग्य भी। यही है जीवन जीने की सही रीति-नीति।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 30

👉 Amrit Chintan 17 April

🔴 In our manifesto of Gayatri Pariwar “Yug Nirman Satsankalp”, it is mentioned that self interest must be sacrificed for the interest of masses. This ideality is essential for the holistic growth of the individual. If people live in harmony with others and with mutual co-operation and help, the process of sharing and caring of others will soon bring a new era of bright future, for which we are committed.  

🔵 Reading good books for self introspection is known as ‘Swadhyay’, which is penance and austerity. Concentration and contemplation also help to solve the problems of life. Our company with saints and sages also help us. These are the different ways that we develop our emotions for the spiritual growth in life. One have all these choices for his growth. 

🔴 The base for soul realization is shraddha i.e. devotion to ideality. It is this factor of Shraddha, which devotee achieves for success or failure in Sadhana. Initiation by a realized Guru, Shaktipat and different technique of penance and austerity is to develop Shraddha for realization of the power of soul. 

🌹 ~Pandit Shriram Sharma Acharya

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 10)

🌹 समय जो गुजर गया, फिर न मिलेगा

🔴 समर्थ स्वामी रामदास वक्त के सदुपयोग के बारे में बड़े महत्त्वपूर्ण शब्द कहा करते थे—
एक सदैव पणाचैं लक्षण।
रिकामा जाऊँ ने दो एक क्षण।।
(दासबोध—11—24)

🔵 अर्थात्— ‘‘जो मनुष्य वक्त का सदुपयोग करता है, एक क्षण भी बरबाद नहीं करता, वह बड़ा सौभाग्यवान् होता है।’’ धन और रुपये-पैसे के मामले में यह कहा जाता है कि जिसका खर्च व्यवस्थित और मितव्ययी होता है, वही जीवन पर्यन्त धन का सुख लाभ प्राप्त करता है, उसके खजाने में किसी प्रकार की कमी नहीं आती। ऐसे ही समय के प्रत्येक क्षण का उपयोग कर लेना भी मनुष्य की बुद्धिमत्ता का प्रतीक है उन्नति की इच्छा रखने वालों को अपना समय कभी भी व्यर्थ न गंवाना चाहिये। समय के सदुपयोग करने में सदैव सावधान रहना चाहिये। आज जो समय गुजर गया, कल वह फिर आने वाला नहीं।

🔴 कार्य चाहे व्यावहारिक हो अथवा पारमार्थिक, जो समय सम्बन्धी विवेक और सावधानी नहीं रखते उन्हें इसके दुष्परिणाम जन्म-जन्मान्तरों तक भुगतने पड़ते हैं। आज अपने पास सभी परिस्थितियां हैं, साधन हैं। मनुष्य शरीर मिला है, बुद्धि और विचार की बहुमूल्य विरासत जो हमें मिली है वह यह समझ लेने के लिये है कि आपका समय सीमाओं से प्रतिबन्धित है। सृष्टि के दूसरे जीवों में से कई तो लम्बी आयु वाले भी होते हैं किन्तु मनुष्य की अवस्था अधिक से अधिक सौ वर्ष है। उसमें भी कितना समय अवस्था के अनुरूप व्यर्थ चला जाना है फिर जो शेष बचता है उसका उपयोग यदि सांसारिक और आध्यात्मिक विकास के लिए नहीं कर पाये तो कौन जाने यह परिस्थितियां फिर कभी मिलेंगी या नहीं।

🔵 आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने वाले भी जब समय का ठीक ठीक उपयोग नहीं कर पाते, इस सम्बन्ध में जागरुक और विवेकशील नहीं होते तो बड़ा आश्चर्य होता है। इससे अच्छे तो वे लोग ही हैं जो बेचारे किसी प्रकार जीवन-निर्वाह के साधन और आजीविका जुटाने में ही लगे रहते हैं। उन्हें यह पछतावा तो नहीं होता कि जीवन के बहुमूल्य क्षणों का पूर्ण उपयोग नहीं कर सके। आजीविका भी अध्यात्म का एक अंग है अतएव सम्पूर्ण न सही, कुछ अंशों में तो उन्होंने मानव-जीवन का सदुपयोग किया। 

🔴 हाथ पर हाथ रखकर आलस्य में, समय गंवाने वाले सामाजिक जीवन में गड़बड़ी ही फैलाते हैं भले ही वे कितने ही बुद्धिमान, भजनोपदेशक, कथावाचक, पण्डित या सन्त-संन्यासी ही क्यों न हों। समय का सदुपयोग करने वाला घसियारा, बेकार बैठे रहने वाले पण्डित से बढ़कर है क्योंकि वह समाज को किसी न किसी रूप में समुन्नत बनाने का प्रयास करता ही है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 38)

🌹 इन दिनों की सर्वोपरि आवश्यकता 

🔵 करने को तो काम एक ही है, पर वह है इतना बड़ा और व्यापक, जिसकी तुलना हजार छोटे-बड़े कामों के समूह से की जा सकती है। बदलाव पदार्थों का सरल है-लोहे तक को गलाकर दूसरे साँचे में ढाला जा सकता है; वेश-विन्यास से कुरूप को भी रूपवानों की पंक्ति में बिठाया जा सकता है, पर विचारों का क्या किया जाए, जो चिरकाल से बन पड़ते रहे कुकर्मों के कारण स्वभाव का अंग बन गये हैं और आदतों की तरह बिना प्रयास के चरितार्थ होते रहते हैं। सभी जानते हैं कि नीचे गिराने में तो पृथ्वी की आकर्षण-शक्ति ही पूरा-पूरा जोर हर घड़ी लगाये रहती है, पर ऊँचा उठने या उठाने के लिए तो आवश्यकता के अनुरूप समर्थ साधना चाहिए।      

🔴 इस निमित्त सामर्थ्य भर जोर लगाना पड़ता है। श्रेष्ठ काम कर गुजरने वालो में-आततायी-वर्ग द्वारा प्रयुक्त होने वाली शक्ति की तुलना में-सैकड़ों गुनी अधिक सामर्थ्य चाहिए। किसी मकान को एक दिन में-नष्ट किया जा सकता है और इसके लिए एक फावड़ा ही पर्याप्त हो सकता है, पर यदि उसे नये सिरे से बनाना हो तो उसके लिये कितना समय व कितना कौशल लगाना पड़ेगा, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। श्रेय ध्वंस को नहीं, सृृजन को ही मिलता रहा है।                           

🔵 इन दिनों एक ही बड़ा काम सामने है कि जन-जन के मन-मस्तिष्क पर छाई हुई दुर्भावना के निराकरण के लिये कितना बड़ा, कितना कठिन और कितने शौर्य-पराक्रम की अपेक्षा रखने वाला पुरुषार्थ जुटाया जाना चाहिए? यह कार्य मात्र उपदेशों से नहीं होगा। इसके लिए तद्नुरूप वातावरण चाहिए। फिर उपदेष्टा का व्यक्तित्व ऐसा चाहिए जो अपने कथन व अपने व्यवहार में उतरने की कसौटी पर हर दृष्टि से खरा उतरता हो। बढ़िया बंदूक ही सहज निशाना लगाने में समर्थ होती है, टेढ़ी-मेढ़ी अनगढ़ नहीं, बालक का तमंचा प्राय: असफल निशाना ही लगाता रहता है। सदाशयता और सद्भावना का निजी जीवन में परिचय देने वाले ही दूसरों को ऊँचा चढ़ाने, आगे बढ़ाने और सृजनात्मक प्रयोजनों को पूरा कर पाने में समर्थ हो पाते हैं। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 16 अप्रैल 2017

👉 कर्ताऽहमिति मन्यते

🔵 सन् १९७८ ई.में मेरे होम टाउन हजारीबाग में एक पंचकुण्डीय गायत्री महायज्ञ हुआ था। वहीं सद्वाक्यों और पुस्तकों से आकृष्ट होकर मैं पहले पहल गायत्री परिवार से जुड़ा। शहर में गल्ले किराने की दुकान चलाता था। वहीं किताबें ले जाकर रखने लगा। आचार्यश्री की इन किताबों से जो प्रेरणा मिली उससे अपनी स्वार्थी सोच में कुछ हद तक बदलाव आया था कि केवल अपने पोषण तक ही सीमित न रहकर लोक मंगल का कार्य भी करना चाहिए।

🔴 मैं दुकान में आने वाले ग्राहकों को ये छोटी- छोटी किताबें पढ़ने के लिए देने लगा। गुरुदेव की इन किताबों में लिखे क्रांतिकारी और मूल्यवान विचारों को लोग इतना पसंद करने लगे कि बार- बार मेरी दुकान पर आने लगे। कहते हैं, भगवान का काम करनेवालों को यश, कीर्ति, सहयोग, धन इत्यादि की प्राप्ति स्वतः होती है। कुछ ऐसा ही मेरे साथ होने लगा। धीरे- धीरे ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी। अच्छे दुकानदार के रूप में पहचान बनने लगी तो आय भी बढ़ती गई। धीरे- धीरे गायत्री परिवार से मेरी संबद्धता अंतरंगता में बदलने लगी। दीक्षा ले ली और नियमित साधना भी करने लगा। गोष्ठियों- बैठकों में नियमित रूप से जाने लगा।

🔵 उसी वर्ष सितम्बर में राँची से मिशन के केन्द्रीय प्रतिनिधि के रूप में श्री जे.पी.शर्मा जी हजारीबाग आए। मिशन की गतिविधियों को अधिकाधिक प्रसारित किए जाने के विषय में चर्चा के लिए गोष्ठी बुलाई गई थी, जिसमें उन्होंने बताया कि जहाँ- जहाँ २४ कुण्डीय यज्ञ होगा, वहाँ- वहाँ युग निर्माण योजना की शाखा खोली जाएगी। मिशन का प्रचार- प्रसार अधिक से अधिक हो, यह मेरी दिली इच्छा थी। क्योंकि इस मिशन से जुड़कर जो आनन्द और आत्म- संतोष मुझे प्राप्त हुआ था, मैं चाहता था उसे और लोगों तक पहुँचा सकूँ। उसी समय से मन ही मन सोचने लगा कि हजारीबाग में यदि २४ कुण्डीय यज्ञ करा सकूँ, तो कितना अच्छा हो! इस क्षेत्र का कल्याण हो जाए। कई दिनों की यह विचार प्रक्रिया अंत में जब निर्णय में बदली, तो अगली बैठक में मैंने अपने क्षेत्र में २४ कुण्डीय यज्ञ आयोजित करने का प्रस्ताव रखा। जो सभी को पसंद आया।

🔴 इस बैठक में मौजूद केन्द्रीय प्रतिनिधि आदरणीय कपिल जी ने बताया कि २४ कुण्डीय यज्ञ के लिए संकल्प शान्तिकुंज जाकर लेना होगा। अब प्रश्न यह था कि शान्तिकुंज कौन- कौन जाए? उन दिनों गायत्री परिवार का यहाँ उतना प्रसार नहीं था, गिने- चुने सदस्य थे। ऊपर से यह भी एक बड़ी समस्या थी कि किसी के पास धन की कमी थी, तो किसी के पास समय की। कोई इतनी दूर जाने को तैयार नहीं था। अंत में दो परिजन जाने के लिए तैयार हुए, वह भी इस शर्त पर कि उनका यात्रा खर्च कोई और वहन करे। मैं व्यय भार उठाने के लिए तुरंत तैयार हो गया, क्योंकि इस कार्य के लिए मैं मन ही मन पहले से ही संकल्पित हो चुका था; लेकिन जैन समुदाय का होने के कारण खुलकर सामने नहीं आना चाहता था। खैर, यह चिन्ता तो दूर हो गई, लेकिन दूसरी बड़ी चिन्ता यह थी कि इतने बड़े यज्ञ के  लिए अपेक्षित धनराशि कहाँ से आएगी!

🔵 मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी। दुकान से ही आजीविका चलती थी। एक आटा चक्की थी, वह भी आदमी के अभाव में बन्द पड़ी थी। सोचा, किसी को साझेदारी में दे दूँ तो उससे जो आमदनी होगी, वह यज्ञ में लगा दूँगा। एक हमारे स्वजातीय व्यक्ति थे, काफी अनुभवी। मेरी दुकान का लेखा-जोखा वही रखते थे। साझेदारी के लिए मुझे वे उपयुक्त व्यक्ति लगे। आमदनी का नया रास्ता दिखने लगा था। अतः उन दोनों भाइयों को साथ लेकर शान्तिकुंज जाने की तैयारियाँ करने लगा। अब एक ही अड़चन सामने खड़ी थी- पिताजी से अनुमति कैसे मिले? दो माह पूर्व ही सत्र करने के लिए शान्तिकुंज गया था। उस समय १२ दिनों तक दुकान बंद रही और अब फिर वहीं जाने के लिए तैयार था, वह भी यज्ञ का संकल्प लेने। पिताजी ऐसी अनुमति कभी नहीं देंगे। यह सोचकर मैंने एक तरकीब निकाली। बहन को एक वर्ष के प्रशिक्षण के लिए शान्तिकुंज छोड़ आया था। मैंने पिताजी से कहा नियमानुसार दो माह बाद देख-भाल के लिए जाना होता है। यह सुनते ही उन्होंने कहा- मैं ही चला जाता हूँ, तुम्हारे जाने से दुकान बन्द हो जाएगी। बात बिगड़ती देख मैंने गुरुदेव का स्मरण किया- हे गुरुदेव, पिता के साथ प्रवंचना माफ करना। फिर मैंने उससे भी जोरदार बहाना बनाया। कहा- जो छोड़कर आया है, उसी को जाना होगा। इस तरह पिताजी को पट्टी पढ़ाकर शान्तिकुंज के लिए रवाना हुआ। 

🔴 वहाँ पहुँचकर गुरुदेव से भेंट करने गया, तो परिवार का हाल-चाल जानने के बाद उन्होंने पूछा- बेटे, कैसे आना हुआ? मैंने बताया कि २४ कुण्डीय यज्ञ का संकल्प लेने आया हूँ। एक नया उद्योग शुरू कर रहा हूँ। उससे जो आमदनी होगी उसे यज्ञ में लगाऊँगा। अभी पूरी बात भी नहीं हो पायी थी कि गुरुदेव ने जोर से डाँट लगायी-‘‘थोथी बात बोलता है, मतलब की बात नहीं बोलता है’’। मैं डाँट खाकर चुपचाप एक किनारे बैठ गया। गुरुदेव की एक-एक कर अन्य परिजनों से बातें होती रहीं। तब तक मैं सोचने लगा, गुरुजी ने पूरी बात सुनीं नहीं, इसलिए डाँट दिया। यज्ञ तो मुझे करना ही है, जब गुरुजी नाराज हो रहे हैं तो उद्योग की बात फिलहाल न ही करें।

🔵 थोड़ी देर बाद मुझे बोलने का मौका मिला, तो दुबारा हिम्मत करके मैंने कहा-ठीक है गुरुदेव उद्योग की बात जब होगी, तब होगी, मैं अभी केवल २४ कुण्डीय यज्ञ पर ही ध्यान दूँगा। वे प्रसन्न हुए। बोले-हाँ बेटा, अब तू २४ कुण्डीय कर लेगा। थोथी बात नहीं बोलनी चाहिए। संकल्प लेने के बाद तू चैन से नहीं बैठेगा। यज्ञ को लेकर गुरुदेव की रजामंदी पर मेरी साँस अटकी हुई थी, उनकी प्रसन्न मुद्रा से मेरा भी मन हल्का हो गया।

🔴 दो दिन बाद २४ कुण्डीय यज्ञ की उद्घोषणा मेरे नाम से हो गई। यह मेरे लिए एक नई मुसीबत थी। मैंने सोच रखा था कि साथ आये परिजन से ही संकल्प करवाऊँगा, क्योंकि जैन समुदाय का होने के कारण मैं जाहिरी तौर पर संकल्प लेकर अपनी बिरादरी वालों का कोपभाजन नहीं बनना चाहता था। जब बचने का कोई रास्ता नहीं दिखा, तो संकल्प के समय मैं सबसे नजर बचाकर पीछे जा बैठा। मुझे नहीं देखकर साथी परिजन चिरंजीव लालजी अग्रवाल संकल्प के लिए बैठ गए। उनके साथ वासुदेव महतो जी भी थे। खुद को छिपाने के प्रयास में मैं कार्यक्रम भी ठीक से नहीं देख पा रहा था। कुछ लोगों के संकल्प के बाद स्थान थोड़ा खाली हुआ, तो चिरंजीव जी की नजर मुझ पर पड़ गई। उन्होंने मुझे हाथ के इशारे से बुलाया। अब मेरे बचने के सारे रास्ते बन्द हो चुके थे। चोरी पकड़ा गई देख हकबकाया हुआ उनके पास पहुँचा। उन्होंने कहा- आप वहाँ क्यों जा बैठे? संकल्प तो आप ही के नाम से हुआ है। 

🔵 लाचार होकर मुझे आगे बढ़ना पड़ा। हाथ में अक्षत पुष्प लिया। जब मेरी बारी आई, तो गुरुजी ने तिलक लगाकर आशीर्वाद दिया, माताजी ने रक्षा सूत्र बाँधा। दूसरे ही पल मैंने अनुुभव किया कि मेरा वह डर, वह संकोच कहीं गायब हो गया था। एक अपूर्व उल्लास और उमंग से अन्तर्मन भर उठा। गुरुजी के तिलक-चंदन लगाने भर से यह आश्चर्यजनक परिवर्तन देख मैं समझ गया कि वे जिससे जो काम कराना चाहते हैं, वैसी परिस्थिति पैदा कर उससे करवा ही लेते हैं। 

🔴 मन का संशय दूर हो जाने के बाद अब मैंने अपनी पूरी शक्ति इस कार्य में झोंक देने का निर्णय ले लिया। वापस हजारीबाग लौटा तो एक चौंकानेवाली बात सामने आई। जिसे मैं इतना विश्वासपात्र समझ रहा था-जिसे लेन-देन की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी दे रखी थी- जिसके साथ साझा उद्योग शुरू करने जा रहा था, उसी ने मेरी अनुपस्थिति में पीठ पर छुरी घोंपने जैसा काम किया। मेरे व्यवसाय की जिन अन्दरूनी बारीकियों से वह अवगत था, उन्हें अन्यत्र पहुँचाकर मुझे नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया।

🔵 साझे उद्योग का मेरा निर्णय कितना गलत था इसका आभास होते ही बिजली की तरह गुरुजी की बातें दिमाग में कौंध गईं। नया उद्योग खड़ा करने की बात पर मिली उस डाँट के अन्दर मेरे लिए जो चेतावनी थी, वह पूरी तरह अब समझ में आई। मैं चारों तरफ से ध्यान हटाकर पूरी तरह यज्ञ की तैयारियों में जुट गया। मेरे सामने सबसे बड़ी समस्या धन की थी। लेकिन वास्तव में जब कार्य आरंभ हुआ तो मैंने देखा यह कोई समस्या ही नहीं थी। चारों ओर से धन की जैसे वर्षा होने लगी और सबसे अधिक आश्चर्यजनक बात यह रही कि समाज के जिन भाई-बन्धुओं के विरोध का मुझे डर था, उन लोगों ने अपने आप सहयोग के हाथ बढ़ा दिए। जब यज्ञ का पूरा कार्यक्रम इतनी आसानी से सम्पन्न हो गया, तो मैं उस सर्वद्रष्टा, सर्वकर्त्ता गुरुसत्ता के आगे नतमस्तक हो गया। मन बार-बार यही कहता रहा-हे गुरुदेव! तुम्हारा काम तो तुमने कर ही रखा था। मुझे तो सिर्फ  इसलिए माध्यम बनाया कि असम्भव से दिखने वाले इस महायज्ञ के आयोजन का श्रेय मुझ अकिंचन और मेरे जैसे अन्य स्वजनों को मिल सके।                     
    
🌹 डुंगरमल जैन, हजारीबाग (झारखण्ड) 
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से


http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/karta.1

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 83)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 यह दैवी उपलब्धि किस प्रकार सम्भव हुई। इसका एक ही उत्तर है पात्रता का अभिवर्धन। उसी का नाम जीवन साधना है। उपासना के साथ उसका अनन्य एवं घनिष्ठ सम्बन्ध है। बिजली धातु में दौड़ती है, लकड़ी में नहीं। आग सूखे को जलाती है, गीले को नहीं। माता बच्चे को गोदी तब लेती है, जब वह साफ-सुथरा हो। मल, मूत्र सना हो तो पहले उसे धोएगी, पोछेगी। इसके बाद ही गोदी में लेने और दूध पिलाने की बात करेगी। भगवान की समीपता के लिए शुद्ध चरित्र आवश्यक है। कई व्यक्ति पिछले जीवन में तो मलीन रहे हैं, पर जिस दिन से भक्ति की साधना अपनाई, उस दिन से अपना कायाकल्प कर लिया। बाल्मीकि, अंगुलिमाल, बिल्वमंगल, अजामिल आदि पिछले जीवन में कैसे ही क्यों न रहे हों, जिस दिन से भगवान की शरण में आए, उस दिन से सच्चे अर्थों में संत बन गए। हम लोग ‘‘राम-नाम जपना पराया माल अपना’’ की नीति अपनाते हैं। कुकर्म भी करते रहते हैं, पर साथ ही भजन-पूजन के सहारे उनके दण्ड से छूट मिल जाएगी, ऐसा सोचते रहते हैं, यह कैसी विडम्बना है?

🔵 कपड़े को रंगने से पूर्व धोना पड़ता है। बीज बोने से पूर्व जमीन जोतनी पड़ती है। भगवान का अनुग्रह अर्जित करने के लिए शुद्ध जीवन की आवश्यकता है। साधक ही सच्चे अर्थों में उपासक हो सकता है। जिससे जीवन साधना नहीं बन पड़ी, उसका चिंतन, चरित्र, आहार, विहार, मस्तिष्क अवांछनीयताओं से भरा रहेगा। फलतः मन लगेगा ही नहीं। लिप्साएँ और तृष्णाएँ जिनके मन को हर घड़ी उद्विग्न किए रहती हैं, उससे न एकाग्रता सधेगी और न चित्त की तन्मयता आएगी। कर्मकाण्ड की चिह्न पूजा भर से कुछ बात बनती नहीं। भजन का भावनाओं से सीधा सम्बन्ध है। जहाँ भावनाएँ होंगी, वहाँ मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव में सात्विकता का समावेश अवश्य करेगा।

🔴 सम्भ्रान्त मेहमान घर में आते हैं, कोई उत्सव होते हैं, तो घर की सफाई पुताई करनी पड़ती है। जिस हृदय में भगवान को स्थान देना है, उसे कषाय-कल्मषों से स्वच्छ किया जाना चाहिए। इसके लिए आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की चारों ही दिशा धाराओं में बढ़ना आवश्यक है। इन तथ्यों को हमें भली-भाँति समझाया गया। सच्चे मन से उसे हृदयंगम भी किया गया। सोचा गया कि आखिर गर्हित जीवन बनता क्यों है? निष्कर्ष निकाला कि इन सभी के उद्गम केंद्र तीन हैं-लोभ, मोह, अहंकार। जिसमें इनकी जितनी ज्यादा मात्रा होगी, वह उतना ही अवगति की ओर घिसटता चला जाएगा।

🔵 क्रियाएँ वृत्तियों से उत्पन्न होती है। शरीर मन के द्वारा संचालित होता है। मन में जैसी उमंगें उठती हैं, शरीर वैसी ही गतिविधियाँ अपनाने लगता है। इसलिए अवांछनीय कृत्यों-दुष्कृत्यों के लिए शरीर को नहीं मन को उत्तरदायी समझा जाना चाहिए। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए विष वृक्ष की जड़ काटना उपयुक्त समझा गया है और जीवन साधना को आधार भूत क्षेत्र मन से ही आरम्भ किया गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 84)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 सुना है कि आत्मज्ञानी सुखी रहते हैं और चैन की नींद सोते हैं। अपने लिए ऐसा आत्म- ज्ञान अभी तक दुर्लभ ही बना हुआ है। ऐसा आत्मज्ञान कभी मिल भी सकेगा या नहीं इसमें पूरा- पूरा सन्देह है। जब तक व्यथा वेदना का अस्तित्व इस जगती में बना रहे, जब तक प्राणियों को क्लेश और कष्ट की आग में जलना पड़े, तब तक हमें भी चैन से बैठने की इच्छा नहीं। जब भी प्रार्थना का समय आया, तब भगवान से निवेदन यही किया- हमें चैन नहीं, वह करूणा चाहिए, जो पीड़ितों की व्यथा वेदना अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सके। हमें समृद्धि नहीं, वह शक्ति चाहिए, जो आँखों से आँसू पोंछ सकने की अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके।             

🔵 बस इतना ही अनुदान वरदान भगवान से माँगा और लगा कि द्रौपदी को वस्त्र देकर उसकी लज्जा बचाने वाले भगवान हमें करूणा की अनन्त सम्वेदनाओं से ओत- प्रोत करते चले जाते हैं। अपने को क्या सुख साधन चाहिए इसका ध्यान ही कब आया ?? केवल पीड़ित मानवता की व्यथा -वेदना ही रोम- रोम में समाई रही यही सोचते रहे कि अपने विश्वव्यापी कलेवर परिवार को सुखी बनाने के लिए क्या किया जा सकता है। जो पाया उसका एक- एक कण हमने उसी प्रयोजन के लिए खर्च किया, जिससे शोक- सन्ताप की व्यापकता हटाने और सन्तोष की साँस ले सकने की स्थिति उत्पन्न करने में थोड़ा योगदान मिल सके।  

🔴 हमारी कितनी रातें सिसकते बीती हैं, कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख- बिलख कर, फूट- फूटकर रोये हैं। इसे कोई कहाँ जानता हैं ?? लोग हमें सन्त, सिद्ध, ज्ञाने मानते हैं कोई लेखक, विद्वान्, वक्ता, नेता    समझते हैं, पर किसने हमारा अन्त:करण खोलकर पढ़ा समझा है। कोई उसे देख सका होता, तो मानवीय व्यथा वेदना की अनुभूतियों से करूण, कराह से हा- हाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हडिडयों के ढाँचे में बैठी बिलखती ही दिखाई पड़ती। कहाँ तथाकथित आत्मज्ञान की निश्चिन्तता, एकाग्रता और समाधि सुख दिला सके। हमसे बहुत दूर है शायद वह कभी मिले भी नहीं, क्योंकि इस दर्द में जो भगवान की झाँकी होती है। पीड़ितों के आँसू पोंछने में ही जब चैन अनुभव होता हो, तो उस निष्क्रिय मोक्ष और समाधि को प्राप्त करने के लिए कभी मन चलेगा ऐसा लगता नही। जिसकी इच्छा ही नहीं, वह मिला भी किसे है ?? 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 37)

🌹 सद्बुद्धि का उभार कैसे हो?
🔵 निजी जीवन में आन-बान-शान पर मर मिटने वालों की लंबी कहानी है। जयचंद, मीरजाफर के उदाहरण ऐसे ही लोगों में सम्मिलित हैं। शत्रु से बदला चुकाने के नाम पर न जाने-क्या-क्या अनर्थ होते रहे हैं। ईर्ष्या ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को धूल चटाने में कमी नहीं रखी-ऐसे बहुत हैं, जो भयंकर अग्निकाण्ड रचने की ललक में अपने को भी घास-फूस की तरह जला बैठे। युद्धों की कथा-गाथाओं के पीछे भी इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों की भूमिका काम करती रही है। कहने को तो उन्हें भी दुस्साहस ही कह सकते हैं। अनाचारी, आतंकवादी और षड्यंत्रकारी ऐसा ही ताना-बाना बुनते रहते हैं।  

🔴 प्रश्न इन दिनों सर्वथा दूसरी प्रकार का है-सृजन और उन्नयन के लिए किसकी सद्भावना किस हद तक उभरती है? देखा जाना है-स्वार्थ के मुकाबले में परमार्थ सुहाता किसे है? ध्वंस करने वाले जिस प्रकार मूँछों पर ताव देेते हैं और शेखी बघारते हैं, वैसा सृजनकर्मियों को नहीं सुहाता है। निर्माणकर्ताओं की मंद गंध चंदन जैसी होती है, जो बहुत समीप से ही सूँघी जा सकती है, पर ध्वंस की दुर्गंध तो अपने समूचे क्षेत्र को ही कुरुचि से भर देती है और अपनी उपस्थिति का दूर-दूर तक परिचय देती है। दुष्टता भरी दुर्घटनाएँ दूर-दूर तक चर्चा का विषय बन जाती हैं, पर सेवा-सद्भावना भरे कार्य कुछेक लोगों की जानकारी में ही आते हैं। इतने पर भी उन्हें वैसा विज्ञापित होने की आवश्यकता नहीं होती है, जैसी कि दुष्ट-दुराचारी अपने नाम की चर्चा दूर-दूर तक होती सुन लेते हैं और अहंकार को फलितार्थ हुआ देखते हैं।                         

🔵 इन परिस्थितियों में सत्प्रवृत्ति-संवर्धन जैसे सत्प्रयोजनों के लिए किन्हीं दूरदर्शी और सद्भावना-संपन्नों के कदम ही उठते हैं। अनुकरण के प्रत्यक्ष उदाहरण सामने न होने पर अपना उत्साह भी ठण्डा होता रहता है। संचित कुसंस्कारों से लेकर वर्तमान प्रचलनों के अनेक अवरोध इस मार्ग में अड़ते हैं कि फूटे खंडहरों जैसी व्यवस्थाओं को किस प्रकार नये सिरे से भव्यभवन का विशाल रूप देने की योजना बनाई जाए तथा इसके लिये निरंतर कार्यरत और आवश्यक साधन जुटाने की हिम्मत कैसे जुटाई जाए?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 9)

🌹 समय का सदुपयोग करिये, यह अमूल्य है

🔴 स्वास्थ्य और धनोपार्जन के अतिरिक्त जो वक्त शेष रहता है उसका सदुपयोग समाज कल्याण के लिये करना चाहिये। वक्त का अभाव किसी के पास नहीं पर अधिकांश व्यक्ति उसे बेकार के कार्यों में व्यतीत किया करते हैं। ताश, चौपड़, शतरंज, मटरगस्ती आदि में वक्त बर्बाद करने से शरीर और मन की शक्ति का पतन होता है। इस वक्त का सदुपयोग सामाजिक उत्थान के कार्यों में करना हमारा धर्म है।

🔵 समय का महत्त्व अमूल्य है। उसके समुचित सदुपयोग की शिक्षा ग्रहण करें तो इस मनुष्य जीवन में स्वर्ग का-सा सुखोपभोग प्राप्त किया जा सकता है। आवश्यक है कि अपने वक्त को उचित प्रकार से दिन भर के कार्यों में बांट लें जिससे जीवन के सब काम सुचारु रूप से होते चले जायं। हमें इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिये कि वक्त ही जीवन है। यदि हमें अपने जीवन से प्रेम है तो अपने वक्त का सदुपयोग भी करना चाहिए।

🔴 हम अपना वक्त आलस्य और निरर्थक कार्यों में खर्च न करें। आलस्य दुनिया की सबसे भयंकर बीमारी है। आलस्य समस्त रोगों की जड़ है। उसे साक्षात् मृत्यु कहें तो इसमें अत्युक्ति न होगी। अन्य बीमारियों से तो शरीर सारे मनुष्य जीवन को ही खा डालता है। आलस्य में पड़कर मनुष्य की क्रिया शक्ति कुण्ठित होने लगती है जिससे न केवल शरीर शिथिल पड़ता है वरन् आर्थिक आय के साधन भी शिथिल पड़ जाते हैं।

🔵 हमारी जीवन व्यवस्था के लिए समय रूपी बहुमूल्य उपहार परमात्मा ने दिया। इसका एक-एक क्षण एक-एक मोती के समान कीमती है जो इन्हें बटोरकर रखता है सदुपयोग करता है वह यहां सुख प्राप्त करता है। गंवाने वाले व्यक्ति के लिए वक्त ही मृत्यु है। वक्त के दुरुपयोग से जीवनी शक्ति का दुरुपयोग होता है और मनुष्य जल्दी ही काल के गाल में समा जाता है। इसलिये हमें चाहिए कि समय का उपयोग सदैव सुन्दर कार्यों में करें और इस स्वर्ग तुल्य संसार में सौ वर्ष तक सुखपूर्वक जियें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भाग्य विधाता है मनुष्य अपने आपका

🔵 ‘‘मनुष्य अपने भाग्य का विधाता आप है।’’ यह उक्ति एक ही तथ्य को इंगित करती है कि मनुष्य चाहे तो कोई भी असम्भव से असम्भव कार्य इस दुनिया में किसी के भी द्वारा किया जा सकता है। वह उसके जीवट के बलबूते सम्भव है। प्रारब्ध, संचित, क्रियमाण के सिद्धान्त अपनी जगह सही होते हुए भी एक तथ्य अपनी जगह सुनिश्चित एवं अटल है कि मनुष्य अपनी संकल्प-शक्ति के सहारे अपने भाग्य को बदल पाने में समर्थ है। ऐसा बहुतों ने किया है, वर्तमान में भी अनेकानेक उसी दिशा में संलग्न है और भविष्य में भी ऐसा होता रहेगा।

🔴 मनुष्य को ईश्वर का श्रेष्ठतम एवं वरिष्ठ पुत्र युवराज कहकर सम्बोधित किया गया है। उससे यह भी अपेक्षा रखी गयी है कि वह अपने कर्मों के सहारे इस सृष्टि रूपी बगिया को सुरम्य, सुरुचिपूर्ण और अनुशासित बनाये रखे। यह मनुष्य का सौभाग्य है कि वह इस सुरदुर्लभ मानव तन को पाकर इस धरती पर आया है। उसे एक अवसर दिया गया है कि वह श्रेष्ठ कर्म करता हुआ भव-बन्धनों से मुक्त होता चले। जो अवसर किसी को भी प्राप्त नहीं है वह देवताओं को व अन्यान्य योनियों में रहने वाले प्राणियों को उस परम पिता परमात्मा ने मनुष्य को अपना युवराज होने के नाते प्रदान किया है। अब वह उस पर निर्भर है कि वह दिये गये दायित्व का निर्वाह कर रहा है अथवा अपने दुष्कर्मों द्वारा इस विश्व-वसुधा रूपी अपने कार्य-क्षेत्र में अव्यवस्था पैदा कर रहा है।

🔵 स्वर्ग-नरक जो कुछ भी हैं, सब इसी धरती पर मौजूद हैं। परिष्कृत उदात्त मनःस्थिति का नाम ही स्वर्ग है। यही ऐसा वातावरण विनिर्मित करती है कि चारों ओर स्वर्गोपम परिस्थितियाँ स्वतः बनने लगती हैं। मनुष्य यदि चाहे तो निषेधात्मक चिंतन, ईर्ष्या-द्वेष का भाव रखते हुए अथवा नर-पशु, नर-पिशाच का जीवन जीते हुए नारकीय मनःस्थिति में भी रह सकता है। इस धरती को स्वर्ग जैसा सुन्दर-ऐश्वर्ययुक्त बनाये रखना ही ईश्वर को मनुष्य से अभीष्ट है। इसीलिए उसे पूरी छूट दी गई है कि वह अपने मानव शरीर वाली इस योनि में जितना भी कुछ श्रेष्ठतम सम्भव हो सकता है, वह दी हुई अवधि में कर दिखाये। इसी को कहते हैं-‘‘अपने भाग्य का स्वयं निर्माण करना।’’

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 29
 
 
5th Convocation Ceremony 2017 | 5वां दीक्षान्त समारोह 2017 DSVV 15th April, 2017)

https://youtu.be/nN0Kt7Fiak0

5th Convocation 2017 with Dr. Chinmay Pandya @ DSVV Haridwar 15 April 2015

https://youtu.be/-N9qtRZKq-U
Inauguration of 5th Convocation Ceremony 2017 | DSVV 14th April, 2017

https://youtu.be/aeXj7Om-uQc

5th Convocation Ceremony 2017 | Culture Programme at  Dev Sanskriti Vishwavidyalaya, Haridwar 15 April 2015

https://youtu.be/I-dqq_yNESQ

5th Convocation Ceremony 2017 | Shri Kailash Satyarthi, Nobel Peace Prize winner Speech

https://youtu.be/KB3MYXStQKw
 

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 April 2017


👉 आज का सद्चिंतन 16 April 2017


शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 April 2017


👉 तुमहिं पाय कछु रहे न क्लेशा

🔵 बात सन् १९८० की है जब मेरा विवाह नहीं हुआ था। उस समय मैं माता- पिता के साथ मुंगेर, बिहार में रहती थी। मुंगेर जिले में अपने मिशन का एक विद्यालय चलता था। उस विद्यालय का नाम बाल भारती विद्या मंदिर था। मेरा छोटा भाई उसी विद्यालय में पढ़ता था। मैं प्रतिदिन उसे छोड़ने जाया करती थी। धीरे- धीरे मेरा सम्पर्क वहाँ के आचार्यगण से हो गया। सभी आचार्य बड़े ही शिष्ट एवं व्यवहारकुशल थे। वे सभी मुझसे प्रत्येक रविवार के यज्ञ में शामिल होने के लिए कहते।

🔴 मुझे स्कूल का वातावरण बहुत अच्छा लगता था। बिल्कुल शान्त स्वच्छ सुन्दर वातावरण। मुझे वहाँ जाने में शांति मिलती थी। जब आचार्य जी ने मुझसे यज्ञ में आने के लिए कहा तो मुझे लगा जैसे बिन माँगी मुराद पूरी हो गई। हम तीन भाई व दो बहन थे। लेकिन कोई यज्ञ में जाने को तैयार नहीं हुआ। मेरी माता जी धार्मिक स्वभाव की थीं। मैं उनके साथ रविवार के यज्ञ में जाने लगी।

🔵 एक दिन जब मैं रविवार को यज्ञ में गई तो वहाँ पर कुछ विशेष कार्यक्रम चल रहा था, उत्सव जैसा माहौल था। जब मैं आचार्य जी से कौतूहलवश पूछा तो उन्होंने बताया कि आज गुरुपूर्णिमा- व्यास पूर्णिमा का पर्व है। गुरु एवं शिष्य में संबंध जोड़ने का पर्व है। आज के दिन गुरु शिष्य को दीक्षा देता है। आचार्य जी की बातों ने मेरे अन्तःकरण में संजीवनी का काम किया।

🔴 कार्यक्रम शुरू हुआ। इसके बाद जब दीक्षा का क्रम आया तो मंच पर बैठे आचार्य जी ने कहा- ‘‘जिन्हें दीक्षा लेनी है वे इधर आकर बैठ जाएँ’’। ये शब्द मेरे कानों में पड़ते ही मेरे पैर अनायास ही दीक्षा के लिए बढ़ गए। मैंने अपनी माताजी से भी नहीं पूछा। जब माताजी ने मुझे दीक्षा की पंक्ति में बैठे देखा तो मुझे मना करने लगीं। कहने लगीं अभी शादी नहीं हुई है। पता नहीं कैसे घर में शादी हो। तुम्हें आगे नानवेज भी शायद खाना पड़े। अभी मंत्र दीक्षा न लो। बाद में तुम्हारे लिए परेशानी खड़ी हो सकती है। मैं उनकी बातों को अनसुना कर वहीं बैठी रही। दीक्षा शुरू हुई। मैंने दीक्षा का क्रम पूरा किया। उसके पश्चात् गायत्री साधना जैसे मेरी जीवन चर्या बन गई। मैंने शिक्षा के साथ साधना का क्रम बराबर जारी रखा। इस तरह करीब ६ महीने बीत गए।

🔵 अचानक मेरी शादी मुंगेर शहर में ठीक हो गई। मेरी माँ बहुत परेशान थीं। जाने कैसा परिवार होगा। मेरे पूजा पाठ को लेकर वे बहुत चिंतित थीं। जिस दिन ससुराल वाले मुझे देखने आए, उस दिन तो माँ का बुरा हाल था। कहीं खान- पान की वजह से ससुराल वाले मना न कर दें। मुझे तो किसी प्रकार की चिन्ता नहीं हो रही थी। मुझे अपने इष्ट पर पूरा भरोसा था कि मेरे लिए जो अच्छा होगा, वही होगा। जब जेठ जी मुझे देखने आए, तो उन्होंने मुझसे सिर्फ एक ही बात पूछी- बेटा गायत्री मन्त्र जानती हो? ये शब्द सुनते ही मुझे लगा मुझे सब कुछ मिल गया। मैंने गायत्री मन्त्र सुना दिया और इस तरह से मेरी शादी, गायत्री परिवार से जुड़े हुए बहुत पुराने देव परिवार में हो गई।

🔴 मुझे परिवार में बुलाना था, इसीलिए गुरुदेव ने मुझे पहले से ही संस्कारित करने की व्यवस्था बनाई, ताकि नया परिवेश मेरे लिए कष्टदाई न बने। गुरुदेव की कृपा से मुझे अच्छा एवं संस्कारित परिवार मिला, जिसके लिए मैं गुरुदेव की आजीवन ऋणी हूँ। गुरुदेव की कृपा से जो- जो हमने सोचा, सब कुछ मिला। आज भी मैं गुरुकार्य में सक्रिय हूँ, और इसे अपना सौभाग्य मानती हूँ।                     
    
🌹  चित्रा वर्मा आसनसोल (प.बंगाल) 
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से


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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...