शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

👉 सफाई तो स्वाभाविक धर्म

🔴 सफाई को वे गाँधी जी की तरह अत्यावश्यक धर्म मानते थे और उनकी भी यह धारणा व्यावहारिक थी कि सफाई, जैसी आवश्यक वस्तु के लिये न तो दूसरों पर निर्भर रहना चाहिए और न ही उसे छोटा और घृणित कार्य मानना चाहिए। सफाई ऐसी व्यवस्था है, जिससे स्वास्थ्य और मानसिक प्रसन्नता चरितार्थ होती है, उससे दैनिक जीवन पर बडा़ सुंदर प्रभाव पड़ता है। इसलिए छोटा हो या बडा़ सफाई का कार्य सबके लिए एक जैसा है।

🔵 आफिसों के लोग, साधारण पदवी वाले कर्मचारी और घरों में भी जो लोग थोडा बहुत पढ-लिख जाते हैं, वे अपने आपको साफ-सुथरा रख सकते हैं। पर अपने आवास और पास-पडोस को साफ रखने से शान घटने की ओछी धारणा लोगों में पाई जाती है, किंतु उनको यह बात बिल्कुल भी छू तक न गई थी।

🔴 बात पहुत पहले की नहीं, तब की है जब वे प्रधानमंत्री थे, पार्लियामैंट से दोपहर का भोजन करने वे  अपने आवास जाया करते थे एक दिन की बात है घर के बच्चों ने तमाम् कागज के टुकडे फाड फाड कर चारों तरफ फैला दिये थे। खेल-खेल में और भी तमाम गंदगी इकट्ठी हो गई थी घर के लोग दूसरे कामों मे व्यस्त रहे, किसी का ध्यान इस तरफ नहीं गया कि घर साफ नहीं है और उनका भोजन करने का वक्त हो गया है।

🔵 प्रधान मंत्री नियमानुसार दोपहर के भोजन के लिए घर पहुँचे घर में पाँव रखते ही उनकी निगाह सर्वप्रथम घर की अस्त-व्यस्तता और गंदगी पर गई। दूसरा कोई होता तो नौकर को बुलाता घर बालों को डॉटता। पर उनका कहना था ऐसा करना मनुष्य का छोटापन व्यक्त करता है। सामने आया हुआ छोटा काम भी यदि भावनापूर्वक किया जाता है, तो उस छोटे काम का भी मूल्य बड़ जाता है, और सच पूछो तो छोटे छोटे कामों को भी लगन और भवनापूर्वक करने की इन्हीं सुंदर आदतों और सिद्धंतों ने उन्हें एक साधारण किसान के बेटे से विशाल गणराज्य का प्रधानमंत्री प्रतिष्ठित किया था।

🔴 उन्होंने न किसी को बुलाया, न डॉट-फटकार लगाई चुपचाप झाडू उठाया और कमरे में सफाई शुरु कर दी, तब दूसरे लोगों का भी ध्यान उधर गया पहरे के सिपाही, घर के नौकर उनकी धर्मपत्नि सब जहाँ थे, वही निर्वाक खडे देखते रहे और वे चुपचाप झाडू लगाते रहे। किसी को बीच में टोकने का साहस न पड़ा, क्योकि उनकी कडी़ चेतावनी थी काम करने के बीच में कोई भी छेडना अच्छा नहीं होता।

🔵 सफाई हो गई तो ये लोग मुस्कराते हुए रसोइ पहुँचे। ऐसा जान पडता था कि इनके मन मे झाडू लगाने से कोइ कष्ट नहीं पहुँचा वरन मानसिक प्रसन्नता बढ़ गई है।

🔴 धर्मपत्नी ने विनीत भाव से हाथ धोने के पानी देते हुए कहा- हम लोगों की लापरवाही से आपको इतना कष्ट उठाना पडा़ तो वे हँसकर बोले- हाँ लापरवाही तो हुई पर मुझे सफाई से कोई कष्ट नहीं हुआ। यह तो हर मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है कि यह अपनी और अपने पडो़सी की बेझिझक सफाई रखा करे।

🔵 सब कुछ जहाँ का तहाँ व्यवस्थित हुआ, वे भोजन समाप्त कर फिर अपने नियत समय पर पार्लियामेंट लौट आए। अब जानना चाहेंगे अपने ऐसे आदर्शों के बल पर साधारण व्यक्ति से प्रधानमंत्री बनने वाले कौन थे ? वह और कोई नहीं लाल बहादुर शास्त्री थे। उन्होंने साबित कर दिया कि मनुष्य जन्मजात न तो बडा होता है, न प्रतिष्ठा का पात्र। उसको बडा़ उसका काम, उसकी सच्चाई और ईमानदारी बनाती है। उनका सपूर्ण जीवन ही ऐसे उद्धरणों से परिपूर्ण है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 50, 51

👉 छोटे सद्गुणों ने आगे बढ़ाया

🔵 बालक अब्राहम लिंकन में महापुरुषों के जीवन चरित्र पढ़ने का बड़ा शौक था। घर की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी इसलिए वे खरीद तो न सकते पर इधर-उधर से माँग कर अपना शौक पूरा करते।

🔴 एक सुशिक्षित सज्जन से वे एक पुस्तक माँग कर पढ़ने लाये। उनने बालक की उत्कंठा देख कर पुस्तक दे तो दी पर कड़े शब्दों में हिदायत कर दी कि पुस्तक खराब न होने पावे और जल्दी से जल्दी लौटा दी जाय।

🔵 घर में दीपक न था। ठंड दूर करने के लिए अंगीठी में आग जला कर सारा घर उसी पर आग तापता था। लिंकन उसी के प्रकाश में पुस्तक पढ़ते थे। सारा घर सो गया, पर वे न सोये और पुस्तक में खोये रहे। अधिक रात गए जब नींद आने लगी तो जंगले में पुस्तक रख कर सो गया। संयोगवश रात को वर्षा हुई। बौछारें जंगले में हो कर आईं और पुस्तक भीग गई।

🔴 बालक सवेरे उठा तो उसे बड़ा दुख हुआ। बिना मैली कुचैली किये ठीक समय पर पुस्तक लौटा देने का वचन वह पूरा न कर सकेगा, इस पर उसे बड़ा दुःख हुआ। आँखों में आँसू भरे वह पुस्तक उधार देने वाले सज्जन के पास पहुँचा और ‘रुद्ध’ कण्ठ से भारी परिस्थिति कह सुनाई।

🔵 वे मैली पुस्तक वापिस लेने को तैयार न हुए। कीमत चुकाने को पैसे न थे। अंत में उनने यह उपाय बताया कि तीन दिन तक वह उस सज्जन के खेत में धान काटे और उस मजदूरी से पुस्तक की मूल्य भरपाई करे। बालक ने खुशी-खुशी यह स्वीकार कर लिया। तीन दिन धान काटे और वचन पूरा न करने के संकोच से छुटकारा पा लिया।

🔴 बालक लिंकन के ऐसे-ऐसे छोटे सद्गुणों ने उसे आगे बढ़ाया और बड़ा हो कर वह अमेरिका का लोक-प्रिय राष्ट्रपति चुना गया।
 
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1964

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 21)

🌹 विचारों का व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रभाव
🔴 डा. एफ. ई. बिल्स, डा. लेलाड काडल रावर्ट मैक कैरिसन आदि अनेक स्वास्थ्य शास्त्रियों ने दीर्घायु के रहस्य ढूंढ़े। प्राकृतिक जीवन, सन्तुलित और शाकाहार, परिश्रमशील जीवन, संयमित जीवन—शतायुष्य के लिए यही सब नियम माने गये हैं, लेकिन कई बार ऐसे व्यक्ति देखने में आये जो इन नियमों की अवहेलना करके, रोगी और बीमार रहकर भी सौ वर्ष की आयु से अधिक जिये। इससे इन वैज्ञानिकों को भी भ्रम बना रहा कि दीर्घायुष्य का रहस्य कहीं और छिपा हुआ है। इनके लिए उसकी खोज निरन्तर जारी रही।

🔵 अमेरिका के दो वैज्ञानिक डा. ग्रानिक और डा. बिरेन बहुत दिनों तक खोज करने के बाद इस निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचे कि दीर्घ जीवन का संबंध मनुष्य के मस्तिष्क एवं ज्ञान से है। उनका कहना है कि अनुसंधान के समय 92 और इस आयु के ऊपर के जितने भी लोग मिले वह सब अधिकतर पढ़ने वाले थे। आयु बढ़ने के साथ-साथ जिनकी ज्ञान वृद्धि भी होती है वे दीर्घजीवी होते हैं पर पचास की आयु पार करने के बाद जो पढ़ना बन्द कर देते हैं—जिनका ज्ञान नष्ट होने लगता है, जल्दी ही मृत्यु के ग्रास हो जाते हैं।

🔴 दोनों स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मत है कि मस्तिष्क जितना पढ़ता है उतना ही उसमें चिन्तन करने की शक्ति आती है। व्यक्ति जितना सोचता विचारता रहता है उसका नाड़ी मण्डल उतना ही तीव्र रहता है। हम यह सोचते हैं कि देखने का काम हमारी आंखें करती हैं, सुनने का काम कान, सांस लेने का काम फेफड़े, पेट भोजन पचाने और हृदय रक्त परिभ्रमण का काम करता है। विभिन्न अंग अपना-अपना काम करके शरीर की गतिविधि चलाते हैं। पर यह हमारी भूल है।

🔵 सही बात यह है कि नाड़ी मण्डल की सक्रियता से ही शरीर के सब अवयव क्रियाशील होते हैं, इसलिए मस्तिष्क जितना क्रियाशील होगा शरीर उतना ही क्रियाशील होगा। मस्तिष्क के मंद पड़ने का अर्थ है शरीर के अंग-प्रत्यंगों की शिथिलता और तब मनुष्य की मृत्यु शीघ्र ही हो जावेगी इससे जीवित रहने के लिए पढ़ना बहुत आवश्यक है। ज्ञान की धारायें जितनी तीव्र होंगी उतनी ही लम्बी होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 29)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  

🔵 बिच्छू के बारे में सुना जाता है कि उसके बच्चे माँ का पेट खा पीकर तब बाहर निकलते हैं। लगता है मनुष्य ने कहीं बिच्छू की रीति-नीति तो नहीं अपना ली हैं, जिससे वह उस प्रकृति का सर्वनाश करके रहे, जो उसके जीवन धारणा करने का प्रमुख आधार है। खीझी हुई प्रकृति क्या बदला ले सकती है? अणु उपकरणों के बदले क्या प्रकृति ही सर्वनाश, महाप्रलय सामने लाकर खड़ी कर सकती है? यह सब सोचने की मानो किसी को फुरसत ही नहीं हैं।      

🔴 मनुष्य का मनुष्य के प्रति व्यवहार निराशाजनक स्तर तक नीचे गिर गया है। उसने अपनी सत्ता और महत्ता को किस प्रकार फुलझड़ी की तरह जलाने का कौतुक अपना लिया है, उससे प्रतीत होता है कि इस सुहावनी धरती पर रहते हुए भी हम सब प्रेत-पिशाचों की तरह एक दूसरे को काटने, गलाने, जलाने पर उतारू हैं। इसके प्रतिफल स्वरूप परस्पर सहयोग की बात बनना तो दूर, हम अविश्वास के ऐसे वातावरण में रह रहे हैं, जिससे अपनी छाया तक से डर लगता है।

🔵 विश्वास और विश्वासघात दोनों परस्पर हमजोली बनकर चल रहे हैं। असंयम के अतिवाद ने शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक दूरदर्शिता को मटियामेट करके रख दिया है। धन की इतनी बड़ी भूमिका बताई है कि उसे पाने के लिए कोई किसी के साथ कितनी ही बढ़ी-चढ़ी दुष्टता कर बैठे, तो उसे कम ही समझना चाहिए। ऐसे अभ्यस्त अनाचार के बीच कोई शरीर मस्तिष्क, परिवार, समाज, स्वयं समुन्नत रह सकेगा, इसकी आशा ही छोड़ देनी चाहिए, छूट भी गई है।      

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 3)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 मानव जीवन की विशेषताओं का और भगवान् के द्वारा विशेष विभूतियाँ मनुष्य को देने का एक और भी उद्देश्य है। जब मनुष्य इस जिम्मेदारी को समझ ले और ये समझ ले कि मैं क्यों पैदा हुआ हूँ, और यदि मैं पैदा हुआ हूँ? तो मुझे अब क्या करना चाहिए?  यह बात अगर समझ में आ जाए, तो समझना चाहिए कि इस आदमी का नाम मनुष्य है और इसके भीतर मनुष्यता का उदय हुआ और इसके अंदर भगवान् का उदय हो गया और भगवान् की वाणी उदय हो गयी, भगवान् की विचारणाएँ उदय हो गयीं।

🔵 यदि इतना न हो, तो उसको क्या कहा जाए? उसके लिए सिर्फ एक ही शब्द काम में लाया जा सकता है, उसका नाम है नर- पशु। नर- पशु कई तरह के हैं और नर- पशु भी दुनिया में बहुत सारे हैं। अधिकांश आदमी नर- पशु हैं। नर- पशु हो करके नर- नारायण होकर और पुरुष- पुरुषोत्तम और मानव को महामानव होकर के जीना चाहिए, आदर्शवादी और सिद्धान्तवादी होकर जीना चाहिए। यह दो उद्देश्य ही तो मनुष्य के हैं। 

🔴 जहाँ दूसरे लोग, दूसरे प्राणी इन्द्रियों की प्रेरणाओं से प्रभावित होते हैं, अपने अन्तःमन की प्रेरणा से प्रभावित होते हैं, जन्म- जन्मान्तरों के कुसंस्कारों से प्रभावित होते हैं, समीपवर्ती वातावरण से प्रभावित होते हैं और उसी के अनुसार अपनी गतिविधियों का निर्धारण करते हैं, वहीं मनुष्य वह है, जो किसी बाहर की परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता है,  बल्कि अन्तरंग की प्रेरणा और भगवान्  की पुकार और जीवन के उद्देश्य से ही प्रभावित होता है और सारी दुनिया की बातों को, सारी दुनिया के लोभ और आकर्षणों को उठाकर एक कोने पर रख देता है। उसी का नाम मनुष्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/11

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 61)

🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण

🔴 प्रथम परीक्षा देने के लिए हिमालय बुलाए जाने के आमंत्रण को प्रायः दस वर्ष बीत गए। फिर बुलाए जाने की आवश्यकता नहीं समझी गई। उनके दर्शन उसी मुद्रा में होते रहे जैसे कि पहली बार हुए थे। ‘‘सब ठीक है’’ इतने ही शब्द कहकर प्रत्यक्ष सम्पर्क होता रहा। अन्तरात्मा में उसका समावेश निरन्तर होता रहा कभी अनुभव नहीं हुआ कि हम अकेले हैं। सदा दो साथ रहने जैसी अनुभूति होती रही। इस प्रकार दस वर्ष बीत गए।

🔵 प्रथम परीक्षा देने के लिए हिमालय बुलाए जाने के आमंत्रण को प्रायः दस वर्ष बीत गए। फिर बुलाए जाने की आवश्यकता नहीं समझी गई। उनके दर्शन उसी मुद्रा में होते रहे जैसे कि पहली बार हुए थे। ‘‘सब ठीक है’’ इतने ही शब्द कहकर प्रत्यक्ष सम्पर्क होता रहा। अन्तरात्मा में उसका समावेश निरन्तर होता रहा कभी अनुभव नहीं हुआ कि हम अकेले हैं। सदा दो साथ रहने जैसी अनुभूति होती रही। इस प्रकार दस वर्ष बीत गए।

🔴 रास्ता अपना देखा हुआ था। ऋतु उतनी ठण्डी नहीं थी जितनी कि पिछली बार थी। रास्ते पर आने-जाने वाले मिलते रहे। चट्टियाँ (ठहरने की छोटी धर्मशालाएँ) भी सर्वथा खाली नहीं थीं। इस बार कोई कठिनाई नहीं हुई। सामान भी अपेक्षाकृत साथ में ज्यादा नहीं था। घर जैसी सुविधा तो कहाँ, किन्तु जिन परिस्थितियों में यात्रा करनी पड़ी, वह असह्य नहीं अनभ्यस्त भर थी। क्रम यथावत चलता रहा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/prav

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 62)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔵 आत्मकथा लिखने के आग्रह को केवल इस अंश तक पूरा कर सकते हैं कि हमारा साधना क्रम कैसे चला। वस्तुत: हमारी सारी उपलब्धियाँ प्रभु समर्पित साधनात्मक जीवन प्रक्रिया पर ही अवलम्बित है। उसे जान लेने से इस विषय में रूचि रखने वाले हर व्यक्ति को वह रास्ता मिल सकता है, जिस पर चल कर कि आत्मिक प्रगति और उससे जुड़ी विभूतियों का आनंद लिया जा सकता है। पाठकों को अभी इतनी ही जानकारी हमारी कलम से मिल सकेगी, सो उतने से ही इन दिनों सन्तोष करना पड़ेगा।

🔴 ६० वर्ष के जीवन में से १५ वर्ष का आरम्भिक बाल जीवन कुछ विशेष महत्त्व का नहीं है। शेष पाँच वर्ष हमने आध्यात्मिकता के प्रसंगों को अपने जीवन- क्रम में सम्मिलित करके बिताये हैं, पूजा- उपासना का उस प्रयोग में बहुत छोटा अंश रहा है। २४ वर्ष तक ६ घंटे रोज की गायत्री उपासना को उतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए, जितना कि मानसिक और भावनात्मक उत्कृष्टता के अभिवर्धन के प्रयत्नों को। यह माना जाना चाहिए कि यदि विचारणा और कार्यपद्धति को परिष्कृत न किया गया होता, तो उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते, जिस तरह कि अनेक पूजा- पत्री तक सीमित मन्त्र- तन्त्रों का ताना- बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली रहना पड़ता है।

🔵 हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाए और उसमें दीखने वाली अलौकिकता को खोजा जाए तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाए। पूजा उपासना को गौण समझा जाए। आत्मकथा के एक अंश को लिखने का दुस्साहस करते हुए हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्म- शोधन में लगा है। उपासना जो बन पड़ी है, उसे भी हमने भाव परिष्कार के प्रयत्नों के साथ पूरी तरह जोड़ रखा है। अब आत्मोद्घाटन के साधनात्मक प्रकरण पर प्रकाश डालने वाली कुछ चर्चाएँ पाठकों की जानकारी के लिए करते हैं_

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 25 Feb 2017


👉 ..और आखिर गुरुदेव ने सुनी उनकी बात

🔴 नवयुग के निर्माण के लिये युग शिल्पियों की जो विशाल सेना युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने खड़ी की है, उसके एक सजग और समर्पित सेनानी हैं श्री  विजय शर्मा। वे गया में उप कृषि निदेशक के पद पर कार्यरत हैं। जुलाई, २०१० के तीसरे सप्ताह में श्री शर्मा की तबीयत अचानक खराब हो गई। वह भी इस हद तक कि घर में कोहराम मच गया। उन्हें तुरन्त ही शहर के एक बड़े क्लीनिक में ले जाया गया। सघन जाँच हुई और ई.सी.जी. तथा टीएमटी की रिपोर्ट से इसके स्पष्ट संकेत प्राप्त हुए कि श्री शर्मा कॉरोनरी आर्टरी डिजीज़ के मरीज हैं। स्थिति इसलिए भी खतरनाक मानी गई कि यह उच्च रक्तचाप तथा मधुमेह के पुराने रोगी हैं।

🔵 दिनांक २३ जुलाई को श्री शर्मा जी का एन्जियोग्राफी मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट, फरीदाबाद में डॉ. नीरज जैन, डी.एम., कॉर्डियोलॉजिस्ट के द्वारा किया गया। श्री शर्मा एन्जियोग्राफी के तीन- चार दिन पहले से ही इस बात को लेकर चिंतित थे कि यदि एन्जियोप्लास्टी अथवा बाईपास सर्जरी कराना पड़ा, तो इसका व्यय भार वहन करना उनके लिए कहीं से भी सम्भव नहीं हो पायेगा। दूसरा संकट यह भी था कि इतनी लम्बी छुट्टी विभाग से कैसे मिलेगी। चिन्ता जब चरम पर पहुँच गई, तो उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव की सुपुत्री स्नेहसलिला शैलबाला पण्ड्या से फोन पर सम्पर्क करके अपनी परेशानी बताई, तो आदरणीया शैल जीजी ने कहा- आप चिन्ता मत करिए। गुरुजी सब सम्हाल लेंगे। सब कुछ नॉर्मल होगा।

🔴 उसी रात सोने से पहले ध्यान लगाकर उन्होंने पूज्य गुरुदेव से द्रवित मन से प्रार्थना की। उन्होंने कहा - गुरुदेव! इतने महँगे इलाज के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं, दफ्तर से छुट्टी भी नहीं मिलेगी। मैं बहुत मुश्किल में हूँ। कुछ ऐसा कीजिए, गुरुदेव! कि  सिर्फ  एक ही दिन में मेरी चिकित्सा पूरी हो जाय और इलाज में अधिक से अधिक ३०,००० रुपये खर्च हों।

🔵 .... और सचमुच परम पूज्य गुरुदेव ने उनकी बात सुन ली। इलाज एक ही दिन में हो गया और खर्च हुए मात्र २३,००० रुपये। २३ जुलाई, २०१० को जब शर्मा भाई साहब ने एन्जियोग्राफी करवाया, तो रिपोर्ट में सब कुछ सामान्य निकला। मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट शत- प्रतिशत सामान्य पाई गई। दिनांक ७ सितम्बर को श्री शर्मा जी ने जब आदरणीया जीजी से हरिद्वार आकर मुलाकात की, तो जीजी ने आतुरता से उनकी कुशल- क्षेम पूछी। जाँच की रिपोर्ट के बारे में जानने के बाद उन्होंने गहरी साँस लेते हुए सिर्फ इतना कहा कि यह सब गुरुदेव की लीला है, पर उनकी आँखें साफ बोल रही थीं कि गुरुदेव अपने अंग अवयवों की रक्षा में संसार की सीमाओं को भी लांघ जाते हैं।

🌹 नीरज तिवारी पूर्वजोन, शांतिकुंज, हरिद्वार(उत्तराखण्ड)   
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 4)

🌹 सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा    
🔴 प्रतिभाशाली लोगों को असाधारण कहते हैं। विशिष्ट और वरिष्ठ भी कहा जाता है। साधारण जनों को तो जिन्दगी के दिन पूरे करने में ही जो दौड़-धूप करनी पड़ती है, झंझटों से निपटना और जीवनयापन के साधन जुटाना आवश्यक होता है, उसे ही किसी प्रकार पूरा कर पाते हैं। पशु-पक्षियों और पतंगों से भी इतना ही पुरुषार्थ हो पाता है और इतना ही सुयोग जुट पाता है; किन्तु प्रतिभावानों की बात ही दूसरी है, वे तारागणों के बीच चन्द्रमा की तरह चमकते हैं। उनकी चाँदनी सर्वत्र शान्ति और शीतलता बिखेरती है। वह स्वयं सुन्दर और अपनी छत्र-छाया के सम्पर्क में आने वालों को शोभा-सुन्दरता से जगमगा देते हैं।        

🔵 प्रतिभावानों को उदीयमान सूर्य भी कह सकते हैं, जिसके दर्शन होते ही सर्वत्र चेतना का एक नया माहौल उमड़ पड़ता है। वे ऊर्जा और आभा के स्वयं तो उद्गम होते ही हैं, अपनी किरणों का प्रभाव जहाँ तक पहुँचा पाते हैं, वहाँ भी बहुत कुछ उभारते-बिखेरते रहते हैं। सच तो यह है कि नर-वानर को शक्ति-पुञ्ज बनाने का श्रेय प्रतिभा को ही है। प्रतिभा ही शरीर में ओजस्विता, मानस में तेजस्विता और अन्त:करण में विभूति भरी वर्चस्विता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। मनुष्य की अपनी निजी विशेषता का परम पुरुषार्थ यही है। जो इससे वञ्चित रह गया, उसे मार्ग ढूँढ़ने का अवसर नहीं मिलता। मात्र अन्धी भेड़ों की तरह जिस-तिस के पीछे चलकर, जहाँ भाग्य ले पहुँचाता है, वहाँ जाकर, ऐसा व्यक्ति अशक्त परावलम्बियों जैसा जीवन जीता है। कठिनाइयों के समय यह मात्र घुटन अनुभव करता और आँसू भर बहाकर रह जाता है।

🔴 संसार असंख्य पिछड़े लोगों से भरा पड़ा है। वे गई-गुजरी जिन्दगी जीते और भूखे-नंगे तिरस्कृत-उपेक्षित रहकर किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं। निजी समर्थता का अभाव देखकर उन पर विपन्नता और प्रतिगामिता के अनेक उद्भिज चढ़ दौड़ते हैं। दुर्व्यसन दुर्बल मनोभूमि वालों पर ही सवार होते हैं और उन्हें जिधर-तिधर खींचते-घसीटते फिरते हैं। ऐसे भारभूत लोग अपने लिए, साथी-सहयोगियों के लिए और समूचे समाज के लिए एक समस्या ही बने रहते हैं। इन्हीं का बाहुल्य देखकर अनाचारी अपने पञ्जे फैलाते, दाँत गड़ाते और शिकञ्जे कसते हैं। प्रतिभारहित समुदाय का धरती पर लदे भार जैसा आँकलन ही होता है। वे किसी की कुछ सहायता तो क्या कर सकेंगे, अपने को अर्धमृतक की तरह किन्हीं के कन्धों पर लादकर चलने का आश्रय ताकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विनयात् याति पात्रवाम्

🔴 विनयशीलता, नम्रता, सौम्यता व्यक्तित्व को उच्च स्थिति प्रदान करते है। लोगों के अंतःकरण जीतने का सबसे सरल मंत्र है कि हमारा जीवन, हमारा व्यवहार अत्यंत विनम्र हो।

🔵 यह धारणा डॉ० राजेंद्र प्रसाद की थी। जो अपनी विनम्रता के बल पर ही कम शिक्षा, अत्यंत सादगी, वहुत सरल विचारों के होते हुए भी, इस देश के सर्वप्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित हुए और जब तक रहे उसी आदर भावना से उच्च पद पर प्रतिष्ठित रखे गए।

🔴 सामान्य लोगों में बडे़ और जिनसे स्वार्थ सधता हो उन्हीं तक विनम्र होने का संकीर्ण स्वभाव रहता है। आफिस में अफसर के सामने बहुत उदार हो जाते हैं, पर घर में पत्नी, बच्चे, नौकर के सामने ऐसे अकड़ भरते है जैसे वह कोई सेनापति हो, और वैसा करना आवश्यक हो, जिसने विनम्रता-सौम्यता त्यागी, उसने अपना जीवन जटिल बनाया प्रेम, स्नेह, आत्मीयता और सद्भाव का आनंद गँवाया। यदि इस जीवन को सफल, सार्थक और आनंदयुक्त रखना है तो स्वभाव उदार होना चाहिए। यह मनुष्यता की दृष्टि से भी आवश्यक है कि दूसरों से व्यवहार करते समय शब्दों और भाव-भंगिमाओं से कटुता प्रदर्शित न की जाए।

🔵 राजेंद्र बाबू के राष्ट्रपति जीवन की एक घटना है। उनकी हजामत के लिये जो नाई आया करता था, उसके हाथ-मुँह साफ नही रहते थे। गंदगी किसी को भी अच्छी नहीं लगती, तो फिर वह क्यों पसंद करते 'उन्होंने नाई से कहा आप हाथ-मुँह साफ करके आया करे। यह कहते हुए उन्होंने शब्दो में पूर्ण सतर्कता रखी। जोर न देकर शिष्ट भाव अधिक था, तो भी उन सज्जन पर इन शब्दों का कोई प्रभाव न पडा। वे अपने पूर्व क्रमानुसार ही आते रहे।

🔴 राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति थे। अपने अधिकारियों से वे कठोर शब्दों में कहला सकते थे। यह भी संभव था कि नाई बदलवाकर किसी स्वच्छ साफ-सुथरे नाई की व्यवस्था कर लेते, पर मानवीयता की दृष्टि से उन्होंने इनमें से किसी की आवश्यकता नहीं समझी। एक व्यक्ति को सुधार लेना अच्छा, उसे बलात् मानसिक कष्ट देना या बहिष्कार करना अच्छा नहीं होता। मृदुता और नम्र व्यवहार से पराए अपने हो जाते हैं तो फिर अपनों को अपना क्यों नही बनाया जा सकता।

🔵 पर अब उन्हें इस बात का संकोच था कि दुबारा कहने से उस व्यक्ति को कहीं मानसिक कष्ट न हो। कई दिन उनका मस्तिष्क इन्हीं विचारों में घूमता रहा। यह भी उनका बडप्पन ही था कि साधारण-सी बात को भी उन्होंने विनम्रतापूर्वक सुलझाने में ही ठीक समझा।

🔴 दूसरे दिन नाई के आने पर बडी़ विनम्रता से बोले- आपको बहुत परिश्रम करना पड़ता होगा, उससे शायद वहाँ समय न मिलता होगा, इसलिए यहाँ आकर हाथ-मुँह धो लिया करे।

🔵 नाई को अपनी गलती पर बडा दुःख हुआ, साथ ही वह राजेंद्र बाबू की सहृदयता से बहुत प्रभावित हुआ। उसने अनुभव किया कि छोटी-छोटी बातों की उपेक्षा करने से ही डॉट-फटकार सुननी पडती है, पर विनम्रता से तो उसे भी ठीक किया जा सकता है। उसने उस दिन से हाथ-मुँह धोकर आने का नियम बना लिया। फिर कोई शिकायत नहीं हुई और न कोई कटुता ही पैदा हुई।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 48, 49

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 20)

🌹 विचारों का व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रभाव

🔴 इसके विपरीत जो स्वास्थ्य सम्बन्धी सद्विचारों की साधना करते हैं, वे रोगी होने पर भी शीघ्र चंगे हो जाया करते हैं। रोगी इस प्रकार सोचने के अभ्यस्त होते हैं। वे उपचार के अभाव में भी स्वास्थ्य लाभकर लेते हैं— मेरा रोग साधारण है, मेरा उपचार ठीक-ठीक पर्याप्त ढंग से हो रहा है, दिन-दिन मेरा रोग घटता जाता है और मैं अपने अन्दर एक स्फूर्ति, चेतना और आरोग्य की तरंग अनुभव करता हूं। मेरे पूरी तरह स्वस्थ हो जाने में अब ज्यादा देर नहीं है। इसी प्रकार जो निरोग व्यक्ति भूलकर भी रोगों की शंका नहीं करता और अपने स्वास्थ्य से प्रसन्न रहता है। जो कुछ खाने को मिलता है, खाता और ईश्वर को धन्यवाद देता है, वह न केवल आजीवन निरोग ही रहता है, बल्कि दिन-दिन उसकी शक्ति और सामर्थ्य भी बढ़ती जाती है।

🔵 जीवन की उन्नति और विकास के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है। जो व्यक्ति दिन रात यही सोचता रहता है कि उसके पास साधनों का अभाव है। उसकी शक्ति सामर्थ्य और योग्यता कम है, उसे अपने पर विश्वास नहीं है। संसार में उसका साथ देने वाला कोई नहीं है। विपरीत परिस्थितियां सदैव ही उसे घेरे रहती हैं। वह निराशावादी व्यक्ति जीवन में जरा भी उन्नति नहीं कर सकता। फिर चाहे उसे कुबेर का कोष ही क्यों न दे दिया जाय और संसार के सारे अवसर ही क्यों न उसके लिए सुरक्षित कर दिये जाय।

🔴 इसके विपरीत जो आत्म-विश्वास, उत्साह, साहस और पुरुषार्थ भावना से भरे विचार रखता है। सोचता है कि उसकी शक्ति सब कुछ कर सकने में समर्थ है। उसकी योग्यता इस योग्य है कि वह अपने लायक हर काम कर सकता है। उसमें परिश्रम और पुरुषार्थ के प्रति लगन है। उसे संसार में किसी की सहायता के लिए बैठे नहीं रहना है। वह स्वयं ही अपना मार्ग बनायेगा और स्वयं ही अपने आधार पर, उस पर अग्रसर होगा—ऐसा आत्मविश्वासी और आशावादी व्यक्ति अभाव और प्रतिकूलताओं में भी आगे बढ़ जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 हमारी सरकार भगवान् है और मनुष्य के पास जो कुछ भी विभूतियाँ, अक्ल और विशेषताएँ हैं, वे अपनी व्यक्तिगत ऐय्याशी और व्यक्तिगत सुविधा और व्यक्तिगत शौक- मौज के लिए नहीं हैं और व्यक्तिगत अहंकार की तृप्ति के लिए नहीं है। इसलिए जो कुछ भी उसको विशेषता दी गई है। उसको उतना बड़ा जिम्मेदार आदमी समझा जाए और जिम्मेदारी उस रूप में निभाए कि सारे के सारे विश्व को सुंदर बनाने में, सुव्यवस्थित बनाने में, समुन्नत बनाने में उसका महान् योगदान संभव हो।

🔵 भगवान् का बस एक ही उद्देश्य है- निःस्वार्थ प्रेम। इसके आधार पर भगवान् ने मनुष्य को इतना ज्यादा प्यार किया। मनुष्य को उस तरह का मस्तिष्क दिया है, जितना कीमती कम्प्यूटर दुनिया में आज तक नहीं बना। करोड़ों रुपये की कीमत का है, मानवीय मस्तिष्क। मनुष्य की आँखें, मनुष्य के कान, नाक, आँख, वाणी एक से एक चीज ऐसी हैं, जिनकी रुपयों में कीमत नहीं आँकी जाती है। मनुष्य के सोचने का तरीका इतना बेहतरीन है, जिसके ऊपर सारी दुनिया की दौलत न्यौछावर की जा सकती है।

🔴 ऐसा कीमती मनुष्य और ऐसा समर्थ मनुष्य- जिस भगवान् ने बनाया है, उस भगवान् की जरूर ये आकांक्षा रही है कि मेरी इस दुनिया को समुन्नत और सुखी बनाने में यह प्राणी मेरे सहायक के रूप में, और मेरे कर्मचारी के रूप में, मेरे असिस्टेण्ट के रूप में मेरे राजकुमार के रूप में काम करेगा और मेरी सृष्टि को समुन्नत रखेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/11

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 28)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए

🔵 हेय स्तर में गिने जाने वाले पशु-पक्षियों को कोई नीति मर्यादा मान्य नहीं होती। गिद्ध, कौए और सियार कुछ भी पशुओं को न तो पत्नी और भगिनी-पुत्री के बीच अन्तर करना आता है, और न बीच चौराहे पर यौनाचार करने में कुछ अनुपयुक्त लगता है। इन प्राणियों का कहीं मल-मूत्र त्यागने में भी हिचक नहीं लगती। वे किसी का भी खेत खा सकते हैं। छोटे जल जन्तुओं को बगुले बिना कोई दया भाव दर्शाए नि:संकोच भाव से निगलते रहते हैं। यह एक निराली दुनिया है और उसकी अपनी सीमाएँ हैं, पर मनुष्य तो कुछ विशेष उपलब्धियाँ लेकर जन्मा है। उसकी गरिमा को सृष्टि में सर्वोच्च ठहराया गया है। ऐसी दशा में उसके कन्धों पर कुछ विशेष जिम्मेदारियाँ भी आती हैं और कड़ी मर्यादाओं का परिपालन एवं वर्जनाओं का अनुशासन भी आवश्यक हो जाता है।     

🔴 किसी के पास तलवार होने का तात्पर्य यह तो नहीं कि वह कहीं भी कत्लेआम कर डाले? अतिरिक्त बुद्धिमत्ता का तात्पर्य यह तो नहीं हो सकता कि इसके सहारे संसार की सुव्यवस्था को बर्बाद करके रख दें? अनीति बरतने के लिए उसे स्वेच्छाचार का लाइसेंस मिला हुआ नहीं है। इस स्तर की चतुरता अपना लेने का प्रतिफल यह तो नहीं होना चाहिए कि वह आत्मा और परमात्मा की आँखों में धूल झोंककर, अहंकार से उन्मत्त होकर, अपने क्रिया-कलापों से वातावरण को उद्वेगों और अनाचारों से भर दे?      

🔵 दृष्टि पसार कर जिस ओर भी देखा जाये, उसी ओर समस्याओं, उलझनों, विडम्बनाओं, विपत्तियों, विग्रहों, विद्रोहों और संकटों के घटाटोप उमड़ते-उभरते दिखाई देते हैं। जिस प्रकृति का पयपान करके, जिसकी गोद में हम सब क्रीड़ा कल्लोल कर रहे थे। आश्चर्य है कि हम उसी की गर्दन घोंट डालने के लिए उतारू हो गये? जहाँ से हम अन्न-जल और वनस्पति प्राप्त करके जीवन धारण किये रहा करते थे, वह सम्पदा जिसके साथ हमारा सम्बन्ध सहोदर भाई जैसा है, यदि उसे इसी प्रकार नष्ट करते चले गए तो अर्धांग पक्षाघात पीड़ित की तरह हमारा जीवन भी स्थिर न रह सकेगा।

🔴 भूगर्भ का असीम उत्खनन उसे बाँझ बनाकर छोड़ेगा। जलाशयों की सम्पदा को मारक तत्त्वों से भरते कारखाने, पीने योग्य पानी छोड़ेंगे भी या नहीं? आकाश-वायुमण्डल जिस प्रकार प्रदूषण से, विकिरण से, कोलाहल से निरन्तर भरता चला जा रहा है, उससे पृथ्वी का रक्षा कवच फट रहा है और बाढ़ हुआ तापमान हिम क्षेत्रों को पिघलाकर समुद्र में ऐसी बाढ़ लाने का ताना-बाना बुन रहा है, जिससे जितना थल भाग अभी भी बचा है, उसका अधिकांश भाग उस बाढ़ में समा जायेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 24 Feb 2017


👉 फलित हुआ माँ का आश्वासन

🔴 बात उन दिनों की है जब अश्वमेध यज्ञों की श्रृंखला चल रही थी। इस श्रृंखला में पटना का अश्वमेध यज्ञ भी था। फरवरी, १९९४ का महीना था। चारों तरफ केवल यज्ञ की ही चर्चा हो रही थी। यज्ञ के बारे में लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। कोई कहता कि भगवान राम ने जिस प्रकार से अश्वमेध यज्ञ किया था और पहले घोड़ा छोड़ा था उसी प्रकार से इस यज्ञ में भी घोड़ा छोड़ा जाएगा।
  
🔵 प्रत्येक परिजन में भारी उत्साह था। मैं भी यज्ञ में जाने के लिए उत्साहित था। घर में पत्नी से यज्ञ की चर्चा की और मन बना लिया। यज्ञ की महिमा और उसका प्रभाव मैं जानता था, इसलिए यह अवसर मैं गँवाना नहीं चाहता था। मेरे छोटे बहनोई थे विश्वनाथ जी। छोटी कमाई, बड़ा परिवार। घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चलता था। ऊपर से उन्हें शराब की लत लगी हुई थी। सारा का सारा पैसा शराब पीने में चला जाता था। कई बार उनने कसम खाई लेकिन हर बार कसम तोड़ देते थे। मन में आया कि उनको भी यज्ञ में ले चलूँ, शायद कल्याण हो जाए।                                                                                      
  
🔴 मैं इसके पहले शानितकुञ्ज एवं मिशन के  बारे में कुछ नहीं जानता था, केवल यज्ञ हवन से प्रभावित था कि इतना बड़ा यज्ञ हो रहा है तो इसमें शामिल होना चाहिए, यही भावना थी; और यह भी कि यदि बहनोई की शराब की आदत छूट जाय तो बच्चों का भविष्य बन जाएगा। यज्ञ में जाने की खबर सुनकर मेरा भतीजा अनिल, जिसकी उम्र केवल ७ वर्ष की थी, वह भी आ गया। अब मैं, मेरी, पत्नी बहनोई और भतीजा चारों लोग पटना के लिए गंगा-दामोदर एक्सप्रेस ट्रेन पर बैठे। साथ में और भी सैकड़ों परिजन थे। ट्रेन में भारी भीड़ थी। लगभग ८० प्रतिशत लोग यज्ञ में जाने वालों में से  ही थे।
  
🔵 उन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद यादव जी थे। चर्चा का विषय बना था कि उन्होंने सभी ट्रेनें यज्ञ में जाने वालों के लिए निःशुल्क करा दी हैं। वे यज्ञ में पूरा सहयोग कर रहे हैं। यज्ञ स्थल के लिए भूमि की व्यवस्था भी लालू जी ने स्वयं करवाई थी।
  
🔴 यज्ञ में पहुँचे तो वहाँ की भीड़ देखकर हम दंग रह गए। यज्ञ की व्यवस्था बहुत ही अच्छी थी। सुरक्षा व्यवस्था के लिए बनी कार्यकर्ता टोली में मुझे भी शामिल कर लिया गया था। इस दायित्व को पाकर मैं फूला नहीं समा रहा था। यज्ञ के दौरान दिए गए सारगर्भित प्रवचनों को सुनकर आत्मा तृप्त हो गई। लालू जी ने भी मंच से लोगों को संबोधित किया। वे अपने अंदाज में कह रहे थे- यह वही स्थान है जहाँ हम भैंसे चराते थे और माँड़-भात खाते थे। आज बिहार में गायत्री परिवार जैसे मिशन की आवश्यकता है, जो अपने साथ-साथ सभी को लेकर चलते हैं।       
  
🔵 माता जी से मिला, तो लगा हमें असली माँ मिल गई है। सभी परिजन उनकी बातों को सुनकर प्रसन्न हो रहे थे। माता जी का प्रवचन सुना। वे बोल रही थीं  ‘‘बेटे हम तुम्हारी रक्षा वैसे ही करेंगे, जिस तरह से चिड़िया अपने अंडों को सेती है। हमारे डैने बहुत विशाल है। इन शब्दों को सुनकर मैं सोच रहा था कि ऐसा आश्वासन तो कोई बहुत बड़े ऋषि या भगवान ही दे सकते हैं। माता जी के इन शब्दों ने जैसे वहॉँ उपस्थित सभी लोगों में नवचेतना का संचार कर दिया था। मैं अपने-आपको बहुत सौभाग्यशाली मान रहा था कि ऐसी अवतारी सत्ता का सान्निध्य पा सका। यज्ञ में करीब ६०-६५ लाख व्यक्ति मौजूद थे। लेकिन व्यवस्था में कहीं कोई गड़बड़ी नहीं। यही सोच-सोच कर मैं हैरान था।
  
🔴 यज्ञ समाप्त हुआ। हम सभी अपने-अपने घर जाने को तैयार हुए। फुलवारी शरीफ मेन रोड पर आकर देखा, सड़क पर भारी भीड़ थी। हमें सड़क पार कर उस तरफ जाना था। मेरे बहनोई सड़क पार कर गए, तो अनिल भी पीछे दौड़ पड़ा। इधर हम कुछ समझ पाते उससे पहले ही तेज गति से आ रही एक एम्बेसडर कार उसके ऊपर से गुजर गई। एकबारगी अन्तरात्मा काँप गई। अन्दर से एक विकल पुकार उठी-माता जी यह क्या हो गया? अब मैं किसको क्या मुँह दिखलाऊँगा? कई बातें मस्तिष्क में कौंध गईं। बच्चे को खोने का डर तो था ही, अन्तर को मथते हुए एक शंका यह भी उठ रही थी-लोग तरह-तरह की बातें करेंगे। माताजी के आश्वासन पर से सभी का विश्वास उठ जाएगा।
  
🔵 गाड़ी जाने के बाद हम लोग सहमते हुए आगे बढ़े। देखा बच्चा बेहोश पड़ा था। चारों ओर से सहानुभूति के स्वर सुनाई पड़ रहे थे; पर उधर ध्यान देने का वक्त नहीं था। बच्चे को गोद में उठाकर जल्दी से किनारे ले आया। बच्चे के शरीर पर एक खरोंच तक नहीं लगी थी। किसी ने इस तरफ ध्यान दिलाया तो हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। सहसा यकीन ही नहीं हुआ। क्या ऐसा भी संभव है? फिर एक उम्मीद जगी शायद माताजी की कृपा से बच ही जाए। वहाँ उपस्थित एक भाई ने बताया कि पास ही डॉक्टर का क्लीनिक है, वहाँ ले जाइए। उन्होंने हाथ से इशारा करके दिखाया। करीब दस कदम की दूरी पर एक डॉक्टर की क्लीनिक थी। वहाँ ले जाकर बच्चे को बेंच पर बैठाया तो वह बैठ गया। डॉ० ने बच्चे को जाँच कर बताया- घबड़ाने की कोई बात नहीं। बच्चा डर गया है। इसे कुछ नहीं हुआ है। १५ मिनट बाद इसे आप ले जा सकते हैं। कोई १०-१५ मिनट बाद बच्चे ने आँखें खोल दीं और घबड़ाई नजरों से इधर-उधर देखने लगा। हमें देखकर आश्वस्त हुआ। हम सबकी आँखों में आँसू छलक आए। याद आ रहा था माताजी का आश्वासन ‘‘... हमारे डैने बहुत बड़े हैं।’’ तत्क्षण हमने अनुभव किया उनके डैनों का अमृततुल्य प्रभाव।

🌹 भरत प्रसाद सिन्दरी, धनबाद (झारखण्ड)   
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 3)

🌹 सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा    

🔴 अपने पुरुषार्थ को इस स्तर पर सिद्ध करे कि यह मात्र दैवी अनुदानों के आधार पर ही समुन्नत बनकर नहीं रह रहा है, वरन् उसका निज का पुरुषार्थ भी समुचित मात्रा में सम्मिलित रहा है। यह प्रतिभा ही है जिसके बल पर वह अन्यायों की तुलना में अधिक सुसंस्कृत और समुन्नत बनता है। गोताखोर गहरी डुबकी लगाकर मोती बीनते हैं। हीरे खोजने वाले खदान का चप्पा-चप्पा ढूँढ़ डालते हैं। प्रतिभा को उपलब्ध करने के लिए भी इससे कम प्रयास से काम नहीं चलता।       

🔵 प्रतिभा एक दैवी स्तर की विद्युत चेतना है, जो मनुष्य के व्यक्तित्व और कर्तृत्त्व में असाधारण स्तर की उत्कृष्टता भर देती है। उसी के आधार पर अतिरिक्त सफलताएँ आश्चर्यजनक मात्रा में उपलब्ध की जाती है। साथ ही इतना और जुड़ता है कि अपने लिए असाधारण श्रेय, सम्मान और दूसरों के लिए अभ्युदय के मार्ग पर घसीट ले चलने वाला मार्ग-दर्शन वह कर सके। माँझी की तरह अपनी नाव को खेकर स्वयं पार उतरे और उस पर बिठाकर अन्यान्यों को भी पार उतारने का श्रेय प्राप्त कर सके। गिरों को उठाने, डूबतों को उबारने और किसी तरह समय गुजारने वालों को उत्कर्ष की ऊँचाई तक उछालने में समर्थ हो सके।

🔴 प्रतिभाशाली लोगों को असाधारण कहते हैं। विशिष्ट और वरिष्ठ भी कहा जाता है। साधारण जनों को तो जिन्दगी के दिन पूरे करने में ही जो दौड़-धूप करनी पड़ती है, झंझटों से निपटना और जीवनयापन के साधन जुटाना आवश्यक होता है, उसे ही किसी प्रकार पूरा कर पाते हैं। पशु-पक्षियों और पतंगों से भी इतना ही पुरुषार्थ हो पाता है और इतना ही सुयोग जुट पाता है; किन्तु प्रतिभावानों की बात ही दूसरी है, वे तारागणों के बीच चन्द्रमा की तरह चमकते हैं। उनकी चाँदनी सर्वत्र शान्ति और शीतलता बिखेरती है। वह स्वयं सुन्दर और अपनी छत्र-छाया के सम्पर्क में आने वालों को शोभा-सुन्दरता से जगमगा देते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दुर्जनों से मान जाऊँ हार, यह संभव नही है

🔴 वाराणसी हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण का जो स्वरूप महामना मालवीय ने स्थिर किया था, उनके लिये बहुत धन की आवश्यकता थी। भीख माँगना अच्छा नहीं पर यदि नेक कार्य के लिये भीख भी माँगनी पडे तो मैं यह भी करुँगा, यह कहकर मालवीय जी ने विश्वविद्यालय के लिए दान माँगने का अभियान चलाया।

🔵 सत्संकल्प कभी अधूरे नही रहते। यदि ईमानदारी और निष्काम भावना से केवल लोक-कल्याणार्थ कोई काम संपन्न करना हो तो भावनाशील योगदानियों की कमी नहीं रहती। क्या धनी, क्या निर्धन विश्वविद्यालय के लिये दान देने की होड लग गई। सबने सोचा यह विद्यालय राष्ट्र की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए खुल रहा है। इसमे पढ़ने वाले छात्र चिरकाल तक प्रकाश पायेगे।

🔴 भारतीय संस्कृति के आदर्शों की रक्षा होगी इसलिये जो कुछ भी बन पडे देना चाहिये। उस समय दान के एक नये पैसे का भी वही मूल्य और महत्व हो गया, जो हजार दस हजार का होता है।

🔵 इकट्ठी और बडी रकम न मिले न सही, बहुत बडी शक्ति प्रतिभा योग्यता का एक व्यक्ति न मिले-न सही, कम योग्यता के कम साधनों के काफी व्यक्ति इकट्ठे हो जाएँ तो भी वह प्रयोजन आसानी से पूरे हो जाते है। इसलिये ५ रुपये का सहयोग भी उतना ही महत्त्व रखता है, जितना कि हजार का दान। दान में केवल व्यक्ति की भावना और लेने वाले का उद्देश्य पवित्र बना रहना चाहिए।

🔴 बिहार प्रांत का दौरा करते हुए मालवीय जी मुजफ्फरपुर पहुँचे। वहाँ एक भिखारिन ने दिन भर भीख मांगने के बाद जो पाँच पैसे मिले थे, सब मालवीय जी की झोली मे डाल दिए। पास ही एक और निर्धन व्यक्ति था उसने अपनी फटी कमीज दे दी उस कमीज को १०० रु. में नीलाम किया गया। किसी ने १०० कुर्सियों की जिम्मेदारी ली किसी ने एक कमरा बनवाने का संकल्प लिया, किसी ने पंखो के लिये रुपये दिए, किसी ने और कोई दान।

🔵 एक बंगाली सज्जन ने पाँच हजार रुपया नकद दान दिया। तो उनकी धर्मपत्नि ने बहुमूल्य कंगन दान दे दिया। पति ने दुगना दाम देकर खरीद लिया। पर भावना ही तो थी पत्नी ने उसे फिर दान दे दिया। यह क्रम इतनी देर चला कि रात हो गई। बिजली का प्रबंध था नहीं इसलिए लैंप की रोशनी में ही आई हुई धनराशि की गिनती की जाने लगी।

🔴 धन सग्रह एवं नीलामी का कार्य एक ओर चल रहा था, टिमटिमाते प्रकाश में दूसरी ओर कोठरी में रुपये गिने जा रहे थे, तभी कोइ बदमाश व्यक्ति उधर पहुँचा और बत्ती बुझाकर रूपयों से भरी तीनो थैलियां छीनकर ले भागा। कुछ लोगो ने पीछा ना किया पर अँधेरे मे वह कहाँ गायब हो गया, पता न चल पाया।

🔵 सब लोग इस घटना को लेकर दुःखी बैठे थे। एक सज्जन ने मालवीय जी से कहा- पंडित जी, इस पवित्र कार्य में भी जब लोग धूर्तता करने से बाज नहीं आते तो आप ही क्यों व्यर्थ परेशानियों का बोझ सर पर लेते है। जो कुछ मिला है किसी विद्यालय को देकर शांत हो जाइए। कोई बडा काम किया जाए, यह देश इस योग्य नहीं।

🔴 मालवीय जी गंभीर मुद्रा में बैठे थे, थोडा़ मुस्कराये और कहने लगे- भाई बदमाश एक ही तो था। मैं तो देखता हूँ कि भले आदमियों की संख्या सैकडो़ में तो यहीं खडी है। सौ भलों के बीच एक बुरे से घबराना क्या ? दुर्जनों से मान जाऊँ हार, यह मेरे लिये संभव नही। इस तरह यदि सतवृत्तियाँ रुक जाया करे, तो संसार नरक बन जायेगा। हम वह स्थिति नहीं लाने देना चाहते इसलिए अपने प्रयत्न बराबर जारी रखेगे।

🔵 मालवीय जी की तरह दुष्वृतियों से न डरने वाले लोग ही हिंदू विश्वविद्यालय जैसे बडे काम संपन्न कर पाते है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 42, 43

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...