शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 5 Feb 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 28) 5 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र-   
🔴 उपासना पक्ष के चार चरण पिछले पृष्ठों पर बताये जा चुके हैं- (१) प्रात:काल आँख खुलते ही नया जन्म, (२) रात्रि को सोते समय नित्य मरण, (३) नित्य कर्म से निवृत्त होने के बाद जप ध्यान वाला भजन, (४) मध्याह्न के बाद मनन के क्रम में अपनी स्थिति का विवेचन और उदात्तीकरण। कुछ दिन के अभ्यास से इन चारों को दिनचर्या का अविच्छिन्न अंग बना लेना सरल सम्भव हो जाता है।                   

🔵 इष्टदेव के साथ अनन्य आत्मीयता स्थापित कर लेना, उसके ढाँचे में ढलने का प्रयत्न करना, यही सच्ची भगवद्भक्ति है। द्वैत को अद्वैत में बदलना इसी आधार पर बन पड़ता है। सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय परमात्मा के साथ लिपटने की वास्तविकता को इसी आधार पर परखा जा सकता है। जीवन क्रम में शालीनता, सद्भाव, उदारता, सेवा-संवेदना जैसी उमंगें अन्तराल में उठती हैं या नहीं। आग के सम्पर्क में आकर ईंधन भी अग्नि बन जाता है। ईश्वर भक्त में अपने इष्टदेव की अनुरूपता उभरनी चाहिये।

🔴 इस कसौटी पर हर किसी की भक्ति भावना कितनी यथार्थता है- इसकी जाँच-परख की जा सकती है। भगवान का अनुग्रह भी इसी आधार पर जाँचा जाता है। जहाँ सूर्य की किरणें पड़ेंगी वहाँ गर्मी और रोशनी अवश्य दृष्टिगोचर होगी। ईश्वर का सान्निध्य निश्चित रूप से भक्तजनों में प्रामाणिकता और प्रखरता की विभूतियाँ अवतरित करता है। इस आधार पर उसका चिन्तन, चरित्र और व्यवहार उत्कृष्ट आदर्शवादिता की हर कसौटी पर खरा उतरता चला जाता है। सच्ची और झूठी भक्ति की परीक्षा हाथोंहाथ प्राप्त होती चलती है। यह प्रतीत होता रहता है कि समर्थ सत्ता का अनुग्रह हाथोंहाथ प्राप्त होने की मान्यता पर उपासना खरी उतरी या नहीं।      

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 निर्बुद्धि संत और विद्वान बुढ़िया

🔴 एक दिन संत कन्फ्यूशियस के पास उनके कुछ शिष्य जाकर बोले गुरुदेव सच्चा झानी कौन होता है ?''

🔵 कन्फ्यूशियस ने कहा सब लोग बैठ जाओ, अभी बताते हैं-यह कहकर उन्होंने अपनी शेष दिनचर्या पूरी की और कपडे पहने फिर सब शिष्यों को लेकर एक ओर चल पडे।

🔴 सब लोग एक गुफा के अंदर प्रविष्ट हुए। वहाँ एक महात्मा निवास करते थे। जप, तप और चिंतन में अपना समय बिताया करते थे। कन्फ्यूशियस ने उनके प्रणाम किया और एक ओर बैठ गये फिर शांत होकर पूछा-भगवन! हम लोग आपके पास ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करने आए है बताइए यह कौन है? क्या है? कहाँ रहता है ?

🔵 महात्मा बिगड उठे "तुम लोग यहां मेरी शांति भंग करने क्यों आ गये, भागो मेरे भजन में विघ्न पड़ता है।" कन्फ्यूशियस शिष्यों को लेकर बाहर निकल आए। उन्होंने कहा एक ज्ञानी तो यह है कि जिन्होंने संसार से आँखें मूँद ली है। संसार में सुख-दुःख की परिस्थितियों से अलग एकांत मे शांति का इच्छा रखने वाले यह संत छोटे दर्ज के ज्ञानी हुए।''

🔴 और अब वे गांव में पहुँचे जहाँ एक तेली कोल्हू चला रहा था। बैल की आँखें बँधी थीं, वह अपनी मस्त चाल में उतना दायरा न मालूम कब से नाप रहा था और तेली कोल्ह पर बैठा कोई गीत गुनगुना रहा था।

🔴 कन्फ्यूशियस ने कहा- "भाई मैंने सुना है कि तुम ब्रहाज्ञानी हो, हमें भी थोडा ब्रह्म का उपदेश कीजिए।" तेली ने हँसकर उत्तर दिया- "भाई यह बैल ही मेरा ब्रह्म, मेरा परमात्मा है। इसकी सेवा मैं करता हूँ, यह मेरी सेवा करता है। बस हम दोनों सुखी हैं, सुख ही ब्रह्म है।''

🔵 गुरुदेव बाहर निकले और शिष्यों को संबोधित कर कहा- 'मध्यम ज्ञानी प्रबुद्ध गृहस्थ के रूप में यह तेली है, जिसके मन में ज्ञान-प्राप्ति की आकांक्षा है, यह धीरे-धीरे अपने लक्ष्य की ओर बढ रहा है।''

🔴 अब वे फिर आगे बढे़। उन्होंने कहा- 'संसार की खुली परिस्थितियों का अध्ययन करने से स्थिति का उतना अच्छा ज्ञान हो सकता है जितना कि पुस्तको के पढ़ने अथवा महात्माओं के प्रवचन से नहीं हो सकता। पुस्तक तो एक व्यक्ति का दृष्टिकोण होती है, प्रवचन एक व्यक्ति की ज्ञान-साधना का निष्कर्ष इसलिये संसार को देखो और यह पता लगाओ कि स्पष्ट स्थिति कहाँ है और भ्रम कहाँ जो निर्विकार और सही हो उसे तुम्हारी बुद्धि आप स्वीकार करेगी, फिर उसे अपने जीवन में धारण करने से कल्याण हो सकता है।"

🔵 इस तरह बातचीत करते हुए वे एक बुढि़या के दरवाजे पर रुके। कई लड़के बुढ़ि़या के आस-पास शोरगुल कर रहे थे। बुढि़या चरखा कात रही थी। बीच-बीच में किसी बच्चे के माँगने पर पानी पिला देती, कभी किसी नटखट बालक को डांट भी देती। कभी किसी को हँसकर समझाती, फिर बच्चे खेलने लगते तो वह भी अपना चरखा कातने में मग्न हो जाती।

🔴 कन्फ्यूशियस जैसे ही वहाँ पहुँचे सब लड़के भाग गए। उन्होंने पूछा माता जी! आप कृपा कर यह बताइये क्या आपने ईश्वर देखा है ?

🔵 बुढिया मुस्कराई और बोली हाँ-हाँ बेटा। वह अभी यहीं खेल रहा था, आपको देखते ही भाग गया। वह निरर्थक शोरगुल, बच्चों का रूठना, मेरा मनाना फिर हँसी फिर विनोद यही तो ईश्वर था जो तुम्हारे यहाँ आते ही चला गया।"

🔴 कन्फ्यूशियस शिष्यों को साथ लेकर घर लौट पडे़ उन्होंने बताया- निष्काम ज्ञानी के रूप में यह बुढिया ही सच्ची ज्ञानी है जो ज्ञान का संबंध किसी उपयोग या लाभ से नही जोड़ती, उसे उन्मुक्त रखकर स्वयं भी मुक्त-भाव का अनुभव करती है।''

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 9, 10

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Feb 2017

🔵 परिवार में और समाज में नारी का महत्त्वपूर्ण, अडिग, अक्षय और अनिवार्य स्थान है। उसे यदि जीवन से हटा दिया गया तो विकास की सारी प्रक्रिया ही अवरुद्ध हो जाएगी। कृष्ण पत्नी रुक्मिणी, बुद्ध पत्नी यशोधरा, मोहम्मद की अर्धांगिनी, चंद्रगुप्त की धर्मपत्नी साम्राज्ञी विशाखा, अशोक की गृहिणी, महात्मा गाँधी की कस्तूरबा, नेहरूजी की कमला, लालबहादुर शास्त्री की ये ललिता जितने भी महापुरुष हुए हैं, उन्होंने अपनी योग्य और सुसंस्कारी गृहिणियाँ के सहयोग से अभीष्ट मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त की और टूटते साहस को पुनः स्थिर किया।

🔴 शिक्षित महिलाओं को अपने घरों के वातावरण में धार्मिकता का समावेश करना चाहिए। विलास, सज्जा, आपाधापी, आलस्य, अपव्यय, असहयोग, अहंकारिता का स्वेच्छाचार दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती रहे तो समझना चाहिए सुख-सुविधाओंके भरे-पूरे रहने पर भी उसमें पलने वालों का भविष्य अंधकारमय बनने जा रहा है। व्यक्तित्व घटिया रहा तो फिर मनःस्थिति और परिस्थिति सर्वथा असंतोषजनक ही रहेगी और विग्रहों का-संकटों का, समस्याओं का घटाटोप खड़ा ही रहेगा। इसलिए यह भी देखा जाय कि सुसंस्कारिता उभारने वाला प्रयास चल रहा है या नहीं।

🔵 दुष्ट प्रचलनों में सर्वनाशी है- विवाहोन्माद। खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। दहेज के लेन-देन में कितने घर-परिवार बर्बाद हुए और दर-छर के भिखारी बने हैं इसका बड़ा मर्मभेदी इतिहास है। बारात की धूमधाम, आतिशबाजी, गाजे-बाजे, दावतें, दिखावे, प्रदर्शन में इतना अपव्यय होता है कि एक सामान्य गृहस्थ की आर्थिक कमर ही टूट जाती है। लड़की का माँस बेचने वाला दहेज के व्यवसायी अपने मन में भले ही प्रसन्न होते और नाक ऊँची देखते हों, पर यदि विवेक से पूछा जाय तो इन अदूरदर्शियों के ऊपर दसों दिशाओं से धिक्कार ही बरसती दिखेगी। विवेकवान् युवकों का कर्त्तव्य है कि दहेज न लेने, धूमधाम की शादी स्वीकार न करने की प्रतिज्ञा आन्दोलन चलायें और उस व्रत को अभिभावकों की नाराजगी लेकर भी निभायें।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 1)

🌹 मानव जीवन विचारों का प्रतिविम्ब

🔴 मनुष्य का जीवन उसके विचारों का प्रतिविम्ब है। सफलता-असफलता, उन्नति-अवनति, तुच्छता-महानता, सुख-दुःख, शान्ति-अशान्ति आदि सभी पहले मनुष्य के विचारों पर निर्भर करते हैं। किसी भी व्यक्ति के विचार जानकर उसके जीवन का नक्शा सहज की मालूम किया जा सकता है। मनुष्य को कायर-वीर, स्वस्थ-अस्वस्थ, प्रसन्न-अप्रसन्न, कुछ भी बनाने में उसके विचारों का महत्वपूर्ण हाथ होता है। तात्पर्य यह है कि अपने विचारों के अनुरूप ही मनुष्य का जीवन बनता-बिगड़ता है। अच्छे विचार उसे उन्नत बनायेंगे तो हीन विचार मनुष्य को गिरायेंगे।

🔵 स्वामी रामतीर्थ ने कहा है— ‘‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही उसका जीवन बनता है।’’ स्वामी विवेकानन्द ने कहा था— ‘‘स्वर्ग और नरक कहीं अन्यत्र नहीं, इनका निवास हमारे विचारों में ही है।’’ भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए कहा था। ‘‘भिक्षुओ! वर्तमान में हम जो कुछ हैं अपने विचारों के ही कारण और भविष्य में जो कुछ भी बनेंगे वह भी अपने विचारों के कारण।’’ शेक्सपीयर ने लिखा है—‘‘कोई वस्तु अच्छी या बुरी नहीं है। अच्छाई-बुराई का आधार हमारे विचार ही हैं।’’

🔴 ईसामसीह ने कहा था—‘‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही बन जाता है।’’ प्रसिद्ध रोमन दार्शनिक मार्क्स आरीलियस ने कहा है—‘‘ हमारा जीवन जो कुछ भी है, हमारे अपने ही विचारों के फलस्वरूप है।’’ प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक डेल कार्नेगी ने अपने अनुभवों पर आधारित तथ्य प्रकट करते हुए लिखा है— ‘‘जीवन में मैंने सबसे महत्वपूर्ण कोई बात सीखी है तो वह है विचारों की अपूर्व शक्ति और महत्ता, विचारों की शक्ति सर्वोच्च तथा अपार है।’’

🔵 संसार के समस्त विचारकों ने एक स्वर से विचारों की शक्ति और उसके असाधारण महत्व को स्वीकार किया है। संक्षेप में जीवन की विभिन्न गतिविधियों का संचालन करने में हमारे विचारों का प्रमुख हाथ रहता है। हम जो भी करते हैं विचारों की प्रेरणा से ही करते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 8)

🌹 तीनों उद्यान फलेंगे और निहाल करेंगे  

🔵 शरीर के कण-कण में सम्पन्नता भरी पड़ी है। आमतौर से उसे खोद निकालने के लिए श्रम और समय का सुनियोजन भर बन पड़ना है। अभिरुचि, उत्कण्ठा, मनोयोग एवं उत्साह का भी यदि साथ में नियोजन हो, तो फिर समझना चाहिए कि श्रम का स्तर अनेक गुना ऊँचा उठ गया। आलस्य और उपेक्षापूर्वक जैसे-तैसे बेगार भुगतने की तरह काम करना तो ऐसा ही है, जिसे ‘‘न कुछ’’ की तुलना में ‘‘कुछ’’ कहा जा सके।

🔴 सुव्यवस्थित और सर्वांगपूर्ण काम करने से श्रम का मूल्य भी बढ़ता है और स्तर भी। मस्तिष्क में इससे सूझ-बूझ की क्षमता बढ़ती है, जिसके सहारे अभ्यस्त ढर्रे से आगे बढ़कर, कुछ अधिक उपयुक्त सोचा, किया और पाया जा सकता है। सुव्यवस्था एक उच्चस्तरीय कलाकौशल है, जो किसी भी काम को सर्वांगपूर्ण सुन्दर, सुसज्जित और कलात्मक बनाती है। संसार भर के प्रगतिशीलों को इसी आधार पर आश्चर्यजनक उन्नति करते देखा गया है।

🔵 छप्पर फाड़कर कदाचित ही किसी के घर में स्वर्ण वर्षा हुई हो? दूसरों के सहारे, पराश्रित रहकर कदाचित् ही किसी ने गौरव भरा जीवन जिया हो? उत्तराधिकार में भी किसी को वैभव मिल तो सकता है, पर हराम का माल हजम नहीं होता। जिसने परिश्रमपूर्वक कमाया नहीं है, वह उसका सदुपयोग भी कदाचित् ही कर सकेगा। उठाईगीर, लुच्चे-लफंगे छल-छद्मों के सहारे आए दिन बहुत कुछ कमाते रहते हैं, पर मुफ्त के माल का सदुपयोग कर सकना कदाचित् ही किसी से बन पड़ा हो? भोजन तभी हजम होता है, जब पचाने के लिये कड़ी मेहनत की जाये। मेहनत की, ईमानदारी की कमाई ही फलती-फूलती देखी गयी है। यदि शरीर को व्यस्त एवं उत्साह भरी श्रमशीलता के सहारे साध लिया जाये, तो न दरिद्रता से ही पाला पड़ेगा और न किसी का मुँह ताकने की अनीति पर उतारू होने की आवश्यकता पड़ेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 संकल्पवान्-व्रतशील बनें (भाग 1)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 आपको यहाँ से जाने के बाद में कई काम करने हैं, बड़े मजेदार काम करने हैं, बहुत अच्छे काम करने हैं। लेकिन ये चलेंगे नहीं, बस आपका मन बराबर ढीला होता चला जायेगा। मन की काट करने के लिये आप एक विचारों की सेना और विचारों की शृंखला बनाकर के तैयार रख लीजिए। विचारों से विचारों को काटते हैं, जहर को जहर से मारते हैं, काँटे को काँटे से निकालते हैं। कुविचार जो आपके मन में हर बार तंग करते रहते हैं, उसके सामने ऐसी सेना खड़ी कर लीजिए, जो आपके बुरे विचारों के सामने लड़ सकने में समर्थ हो। अच्छे विचारों की भी एक सेना होती है।

🔵 बुरे विचार आते हैं, लोभ के विचार आते हैं, लालच और बेईमानी के विचार आते हैं, आप ईमानदारों के समर्थन के लिये उनके इतिहास और वर्ण और स्वास्थ्य और आप्त-पुरुषों के  वचन उन सबको मिलाकर के रखिए। हम ईमानदारी की कमाई खायेंगे, बेईमानी की कमाई हम नहीं खायेंगे। काम-वासना के विचार आते हैं, व्यभिचार के विचार आते हैं। आप ऐसा किया कीजिए, कि उसके मुकाबले की एक और सेना खड़ी कर लिया कीजिए। अच्छे विचारों वाली सेना। जिसमें आपको यह विचार करना पड़े, हनुमान् कितने सामर्थ्यवान हो गये ब्रह्मचर्य की वजह से। भीष्म पितामह कितने समर्थ हो गये, ब्रह्मचर्य के कारण। आप शंकराचार्य से लेकर के और अनेक व्यक्तियों, संतों की बात याद कर सकते हैं। महापुरुषों की जिन्होंने अपने कुविचारों से लोहा लिया है।

🔴 कुविचारों से लोहा नहीं लिया होता तो विचारे संकल्पों की क्या बिसात थी, चलते ही नहीं, टूट जाते। कुविचार हावी हो जाते और जो विचार किया गया था, वो कोने पे रखा रह जाता। ऐसे समय में विचारों की एक सेना तैयार खड़ी कर लीजिये तो आपके लिये स्वर्ग होगा। जब बेईमानी के विचार आयें, काम-वासना के विचार आयें, ईर्ष्या के विचार आयें, अधःपतन के विचार आयें तो आप उनकी रोकथाम के लिये अपनी सेना को तैयार कर दें और उनके सामने फिर लड़ा दें। लड़े बिना काम कैसे चलेगा, बताइये न?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/sankalpvaan_vratsheel_bane

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 94)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 (5) प्रचार की आवश्यकता— आदर्श विवाहों की ख्याति दूर-दूर तक फैलानी चाहिए ताकि वैसा करने का उत्साह दूसरे लोगों में भी उत्पन्न हो। हमारे देश में अभी विवेकशीलता जागृत नहीं हुई है। हर बात ‘भेड़ियाधसान’ की तरह एक दूसरे की देखा-देखी होती है। लोग चाहते हुए भी किसी सुधार को साहस के अभाव में अपना नहीं पाते, पर जब उन्हें पता लगता है कि ऐसा तो अन्य कितने ही लोग कर रहे हैं तब उनकी हिम्मत बढ़ जाती है और वे भी वैसा ही करने उद्यत हो जाते हैं। इसलिए प्रत्येक शुभ कर्म का अधिकाधिक प्रचार होना चाहिए। विशेषतः आदर्श विवाहों की ख्याति को दूर-दूर तक अवश्य ही फैलाई जानी चाहिए।

🔵 समाचार पत्रों में ऐसे समाचार अवश्य भेजे जांय। युग-निर्माण योजना पत्रिका में ऐसे समाचार बहुत प्रेम और उत्साहपूर्वक छापे जाते हैं। जिन अभिभावकों या लड़की-लड़के के विशेष साहस से वह शुभ कार्य सम्पन्न हुआ हो उनके फोटो भी छापे जाते हैं। मथुरा केन्द्रीय कार्यालय से ऐसे समाचार भारत भर में अनेक भाषाओं में छपने वाले पत्रों में छपने भेज दिये जाते हैं।

🔴 जहां समाचार पत्र नहीं पहुंचते वहां पच, विज्ञप्ति आदि छाप कर वह समाचार घर-घर पहुंचाया जा सकता है और उनके पोस्टर दीवारों खम्भों आदि पर चिपकाये जा सकते हैं। और भी जो तरीके ऐसे समाचार दूर प्रदेशों तक अधिक जनता तक पहुंचाये जाने के लिए सम्भव हों वे सभी करने का प्रयत्न करना चाहिए। ताकि बढ़ती हुई सुधारात्मक प्रवृत्तियों का परिचय अधिकाधिक जनता को हो सके और सर्व साधारण के मन में उसी तरह के अनुकरण की आकांक्षा जागृत हो सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 42)

🌹 गुरुदेव का प्रथम बुलावा-पग-पग पर परीक्षा
🔴 किंतु यहाँ भी विवेक समेटना पड़ा, साहस सँजोना पड़ा। मौत बड़ी होती है, पर जीवन से बड़ी नहीं। अभय और मैत्री भीतर हो तो हिंसकों की हिंसा भी ठंडी पड़ जाती है और अपना स्वभाव बदल जाती है। पूरी यात्रा में प्रायः तीन चार सौ की संख्या में ऐसे डरावने मुकाबले हुए, पर गड़बड़ाने वाले साहस को हर बार सँभालना पड़ा। मैत्री और निश्चिंतता की मुद्रा बनानी पड़ी। मृत्यु के सम्बन्ध में सोचना पड़ा कि उसका भी एक समय होता है। यदि वहीं-इसी प्रकार जीवन की इतिश्री होनी है, तो फिर उसका डरते हुए क्यों? हँसते हुए ही सामना क्यों न किया जाए? यह विचार उठे तो नहीं, बल पूर्वक उठाने पड़े। पूरा रास्ता डरावना था। एकाकीपन, अँधेरे और मृत्यु के दूत मिल-जुलकर डराने का प्रयत्न करते रहे और वापस लौट चलने की सलाह देते रहे, पर संकल्प शक्ति साथ देती रही और यात्रा आगे बढ़ती रही।

🔵 परीक्षा का एक प्रश्न-पत्र यह था कि सुनसान का अकेलेपन का डर लगता है क्या? कुछ ही दिनों में दिल मजबूत हो गया और उस क्षेत्र में रहने वाले प्राणी अपने लगने लगे। डर न जाने कहाँ चला गया। सूनापन सुहाने लगा, मन ने कहा-प्रथम पत्र में उत्तीर्ण होने का सिलसिला चल पड़ा। आगे बढ़ने पर असमंजस होता है, वह भी अब न रहेगा।

🔴   दूसरा प्रश्न पत्र था, शीत ऋतु का। सोचा कि जब मुँह, नाक, आँखें, सिर, कान, हाथ खुले रहते हैं, अभ्यास से इन्हें शीत नहीं लगता, तो तुम्हें भी क्यों लगना चाहिए। उत्तरी ध्रुव, नार्वे, फिनलैंड में हमेशा शून्य से नीचे तापमान रहता है। वहाँ एस्किमो तथा दूसरी जाति के लोग रहते हैं, तो इधर तो दस बारह हजार फुट की ही ऊँचाई है। यहाँ ठंड से बचने के उपाय ढूँढ़े जा सकते हैं। वे उधर के निवासी से मालूम भी हो गए। पहाड़ ऊपर ठंडे रहते हैं, पर उनमें जो गुफाएँ पाई जाती हैं, वे अपेक्षाकृत गरम होती हैं। कुछ खास किस्म की झाड़ियाँ ऐसी होती हैं, जो हरी होने पर भी जल जाती हैं। लाँगड़ा, मार्चा आदि शाकों की पत्तियाँ जंगलों में उगी होती हैं, वे कच्ची खाई जा सकती हैं।

🔵 भोजपत्र के तने पर उठी हुई गाँठों को उबाल लिया जाए, तो ऐसी चाय बन जाती है कि जिनसे ठंड दूर हो सके। पेट में घुटने और सिर लगाकर उँकडू बैठ जाने पर भी ठंडक कम लगती है। मानने पर ठंड अधिक लगती है। बच्चे थोड़े से कपड़ों में कहीं भी भागे-भागे फिरते है। उन्हें कोई हैरानी नहीं होती। ठंड मानने भर की होती है। उसमें अनभ्यस्त बूढ़े बीमारों की तो नहीं कहते, अन्यथा जवान आदमी ठंडक से नहीं मर सकता है। बात यह भी समझ में आ गई और इन सब उपायों को अपना लेने पर ठंडक भी सहन होने लगी। फिर एक और बात है कि ठंडक-ठंडक रटने की अपेक्षा मन में कोई और उत्साह भरा चिंतन बिठा लिया जाए, तो भी काम चल जाता है। इतनी महत्त्वपूर्ण शिक्षाओं से उस क्षेत्र की समस्याओं का सामना करने के हल निकल आए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/gur.2

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 42)

🌞  हिमालय में प्रवेश (तपोवन का मुख्य दर्शन)

🔵 भगवती भागीरथी के मूल उद्गम गोमुख के दर्शन करके अपने को धन्य माना। यों देखने में एक विशाल चट्टान में फटी हुई दरार में से दूध जैसे स्वच्छ जल का उछलता हुआ झरना बस यही गोमुख है। पानी का प्रवाह अत्यन्त वेग वाला होने से बीच में पड़े हुए पत्थरों से टकरा कर वह ऐसा उछलता है कि बहुत ऊपर तक छींटें उड़ते हैं। इस जल कणों पर जब सूर्य की सुनहरी किरणें पड़ती हैं तो वे रंगीन इन्द्रधनुष जैसी बहुत ही सुन्दर दीखती हैं।

🔴 इस पुनीत निर्झर से निकली हुई माता गंगा लाखों वर्षों से मानव जाति को जो तरण-तारण का संदेश देती रही है, जिस महान् संस्कृति को प्रवाहित करती रही है उसके स्मरण मात्र से आत्मा पवित्र हो जाती है। इस दृश्य को आंखों में बसा लेने को जी चाहता है।

🔵 चलना इससे आगे था। गंगा वामक, नंदनवन, भागीरथ शिखर, शिवलिंग पर्वत से घिरा हुआ तपोवन यही हिमालय का हृदय है। इस हृदय में अज्ञात रूप में अवस्थित कितनी ऊंची आत्माएं संसार के तरण-तारण के लिए आवश्यक शक्ति भण्डार जमा करने में लगी हुई हैं इनकी चर्चा न तो उचित है न आवश्यक। वह असामयिक भी होगी इसलिए उस पर प्रकाश न डालना ही ठीक है।

🔴 यहां से हमारे मार्ग दर्शक ने आगे का पथ-प्रदर्शन किया। कई मील की विकट चढ़ाई को पार कर तपोवन के दर्शन हुए। चारों ओर हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाएं अपने सौन्दर्य की अलौकिक छटा बिखेरे हुए थीं। सामने वाला शिवलिंग पर्वत का दृश्य बिलकुल ऐसा था मानो कोई विशालकाय सर्प फन फैलाए बैठा हो। भावना की आंखें जिन्हें प्राप्त हों वह भुजंगधारी शिव का दर्शन अपने चर्म चक्षुओं से ही यहां कर सकता है। दाहिनी ओर लालिसा लिए हुए सुमेरु हिम पर्वत है। कई और नील आभा वाली चोटियां ब्रह्मपुरी कहलाती हैं। इससे थोड़ा और पीछे हटकर बांई तरफ भागीरथ पर्वत है। कहते हैं कि यहीं बैठकर भागीरथ जी ने तप किया था जिससे गंगावतरण सम्भव हुआ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Feb 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 27) 4 Feb

🌹 व्यावहारिक साधना के चार पक्ष 

🔴 चौथा संयम है- विचारसंयम मस्तिष्क में हर घड़ी विचार उठते रहते हैं, कल्पनायें चलती रहती हैं। ये अनर्गल, अस्त-व्यस्त एवं अनैतिक स्तर के न हों, इसके लिये विवेक को एक चौकीदार की तरह नियुक्त कर देना चाहिये। उसका काम हो कुविचारों को सद्विचारों की टक्कर मारकर परास्त करना। अनगढ़ विचारों के स्थान पर रचनात्मक चिन्तन का सिलसिला चलाना। विचार मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। वही कर्म के रूप में परिणत होती और परिस्थिति बनकर सामने आती है। जीवन को कल्पवृक्ष बनाने का श्रेय रचनात्मक विचारों का ही होता है। इस तथ्य को भली प्रकार समझते हुए चिन्तन को मात्र रचनात्मक एवं उच्चस्तरीय विचारों में ही संलग्न रखना चाहिये।                 

🔵 साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के चार पुरुषार्थों मेें जीवन की प्रगति एवं सफलता बन पड़ती है। इसलिये दिनचर्या में उन चारों के लिये समुचित स्थान रहे, उसकी जाँच-पड़ताल आत्मसमीक्षा के समय में निरन्तर करनी चाहिये। आत्मसमीक्षा, आत्मसुधार, आत्म-निर्माण और आत्मविकास की चतुर्दिक् प्रक्रिया को अग्रगामी बनाने के लिये मध्यान्तर काल की मनन साधना करनी चाहिये। इसे आत्मदर्शन समझा जाना चाहिये जो थोड़ी विकसित अवस्था में ईश्वर दर्शन के रूप में फलित होता है।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सबसे बड़ी पराजय का दिन

🔴 पेरिस संसार का सबसे खूबसूरत शहर माना जाता हैं-सौंदर्य या नग्न संस्कृति के लिए। और कुछ तो हम नहीं कह सकते, पर जिस दिन हम उस शहर की धरती पर उतरे थे, उससे मोहित हुए बिना न रह सके। जी भरकर उसे देखा। एक ही स्थान को कई बार देखा फिर भी आकर्षण कम न हुआ। हमारे अमेरिकन मित्र-टामसन रिचे जिनके साथ हम विशेष अध्ययन के लिए मिशगन जाते हुए यहाँ ठहरे थे, हमारे साथ ही थे। उन्होंने ही सारा शहर भली भॉति घुमाया। अंत मे उनका आभार मानते हुए कहना ही पडा-'मित्र! आखिर आपकी कृपा से विश्व के इस अद्वितीय सौंदय को समीप से देखने का सौभाग्य सफल हो गया।''

🔵 आशा की थी कि इस आभार-प्रदर्शन से मित्र महोदय प्रसन्न होंगे। हम इतने आदर्शवादी हो गये हैं कि बात-बात में प्रशंसा करने लगते हैं, इससे हमें झूठा आत्म-सतोष तो संभव है मिल जाए, पर अति आदर्शवाद का अर्थ है यथार्थता से विमुख होना। संसार में अनेक प्रकार की सुंदर से सुंदर वस्तुऐं है, पर हम किसी एक सौंदर्य पर ही इतना आसक्त हो जाते हैं कि सृष्टि की अन्य सुंदरताओं की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। हम समझते हैं आज का सपूर्ण भौतिकवादी समाज ज्ञान की इस संकीर्ण कोठरी मे बंद है। परमात्मा की सृष्टि कितनी विशाल! कितनी शोभायुक्त और दर्शनीय!!। उसका अवलोकन करने के लिए जिस बंधनमुक्त आत्मा की जरूरत है, उधर हमारा ध्यान ही नहीं जाता, क्योंकि हम आसक्त हैं, भौतिकता की चमक से चकाचौंध है।

🔴 हुआ प्रत्याशा से विरुद्ध। मित्र महोदय ने एक व्यंग भरी मुस्कान छोडते हुए कहा-''अनिल! काश तुम्हारे शब्दों का समर्थन कर पाता तो बडी प्रसन्नता होती, पर यह कहते हुए बडा दुख होता है जिन भारतीयों ने विश्व को अध्यात्म ज्ञान की गंगा से नहला कर स्वच्छ किया वही पाश्चात्य-दर्शन के गुण गाते हैं। वेद, गीता, रामायण, महाभारत का नाम भी अच्छी प्रकार नहीं जानते पर पैराडाइस लास्ट, हैमलेट या जूलियस सीजर पर अनेकों थीसिस लिख सकते हैं। भारतीय संगीत, कला की गंभीरता को भूलकर, पश्चिम की कला के पैर पूजते है। हिंदू होकर हिंदी नहीं जानते और अंग्रेजी का कोई क्षेत्र नहीं छोड़ते। भारतीयों को अपनी इस पराधीन स्थिति पर भले ही संकोच न होता हो, पर हम दुःख से नत हो जाते हैं कि यथार्थवादी सत्य-शिव-सुंदर का प्रतिपालक भारतीय तत्त्व-ज्ञान ही नष्ट हो गया तो इस विश्व का क्या होगा ?"

🔵 टामसन साहब उस समय साक्षात रुद्र की भाँति लग रहे थे। साँस लेकर पुन: बोले- 'मेरा मतव्य यही है कि सब अच्छी वस्तुएँ भारतवर्ष में ही है, वरन् जो विश्व में है वह भारत में अवश्य है। मैं १० वर्ष भारत में गाँव-गाँव घूमा हूँ। हिमालय का सा सौंदर्य इस तुच्छ पेरिस में कहाँ है। गंगोत्री, अमरनाथ, दार्जिलिंग, वृंदावन, मीनाक्षी, श्रीरंगपट्टम जैसा प्राकृतिक और आध्यात्मिक सौंदर्य दुनिया में कहाँ मिलेगा ? संस्कृत-सी देवभाषा की समता नादान अंग्रेजी कर सके, इतनी प्रौढ़ता उसमें कहाँ, मेरे मित्र! मुझे दुःख है कि आप श्रेष्ठता ढू़ँढने अमेरिका और पेरिस दौड़े आते हैं, धन्य है आपकी स्वतंत्रता और विचार-साधीनता!

🔴 सचमुच मेरी हिम्मत न हुई कि मैं टामसन रिचे के आगे मुँह उठा सकूँ लज्जा से धरती में गड़ा जा रहा था। भारतीय होकर भी अपनी अभारतीयता की स्थिति पर तब इतना क्षोभ हुआ, शायद उतना अपनी माँ की मृत्यु पर भी न हुआ हो। वास्तव मे वह मेरी सबसे बड़ी पराजय थी। उस दिन से मुझे भारतीय वेशभूषा पसंद है। वेद, गीता, रामायण आदि का स्वाध्याय कर लेता हूँ। इनमे जो भावनात्मक आनंद आता है, वह अंग्रेजी-उपन्यासों मैं कदापि नहीं मिला। अब विदेश घूमने की इच्छा कभी नहीं होती, वहाँ जाकर अपना आत्माभिमान क्यों बेचें ?

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (अंतिम भाग) 4 Feb

🌹 प्रातः सायं उपासना

🔴 इस प्रकार आत्म-कल्याण और आत्मोत्थान का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए की गई गायत्री साधना, अन्य साधनाओं की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली सिद्ध होती है। गायत्री साधना की विशेषता यह है कि उसके पीछे अगणित साधकों का तप बल छिपा हुआ है और साधक सूक्ष्म जगत के माध्यम से अनायास ही उनका सहयोग प्राप्त कर लेता है और सफलता की ओर अग्रसर होने लगता है। गायत्री साधना अपरा प्रकृति को पराप्रकृति में रूपांतरित करने के विज्ञान पर आधारित है। मनुष्य की पाशविक वृत्तियों के स्थान पर ईश्वरीय सत् शक्ति को प्रतिष्ठित करना ही अध्यात्म विज्ञान का कार्य है। तुच्छ को महान्, ससीम को असीम, अणु को विभु, बद्ध को मुक्त और पशु को देवत्व के स्तर तप पहुंचाना ही साधना का मुख्य उद्देश्य गायत्री के माध्यम से भली भांति निरापद ढंग से पूरा होता है।

🔵 पिछले जमाने में धार्मिक जगत में विकृतियों के बढ़ जाने तथा विज्ञान-जगत में नये-नये चमत्कार दृष्टिगोचर होने के कारण लोगों में अध्यात्म तथा ईश्वर पर अनास्था का भाव विशेष रूप से उत्पन्न हो गया था। कितने ही नव-शिक्षित व्यक्ति तो इसे मात्र अन्धविश्वास मानकर इसको देना बुद्धिहीनता का चिन्ह मानने लगे थे। पर अब विज्ञान के चरम सीमा पर पहुंच जाने के पश्चात् भी संसार की गतिविधियों में कोई आशाजनक कल्याणकारी लक्षण न देखकर उनकी विचारधारा बदलने लगी है। अब यह अनुमान किया जा रहा है कि संसार में केवल भौतिक-पक्ष ही सब कुछ नहीं है वरन् अध्यात्म-पक्ष को मान्यता मिलने से ही मनुष्य वास्तविक मानवता के समीप पहुंच सकेगा। गायत्री-साधना सर्वजनीन, सुगम, स्पष्ट और सरल है। इसका आश्रय लेकर हम अध्यात्म मार्ग में उल्लेखनीय प्रगति कर सकते हैं और मानवता के लक्ष्य को अपेक्षाकृत न्यून प्रयास से ही प्राप्त कर सकते हैं।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 7)

🌹 गरीबों द्वारा अमीरों का आडम्बर

🔵 अपव्ययों को रोकने पर, पेंदे में छेद वाले घड़े का सूराख बन्द कर देने की तरह पानी भरा रह सकता है और प्यासे मरने की शिकायत से बचा जा सकता है, किन्तु उस दुर्भाग्य को क्या कहा जाए, जो समय के साथ श्रम को जुड़ने ही नहीं देता? अमीरी प्रदर्शन के प्रेत पिशाच का उन्माद सिर से उतरने ही नहीं देता? इस मूर्छना के रहते उठने, आगे बढ़ने और उपलब्ध क्षमताओं के सदुपयोग का उत्साह उभर ही नहीं पाता। इस मानसिकता के रहते न दरिद्रता से पीछा छूटने वाला है, न अशिक्षा से। प्रगति के दूसरे भी अनेकानेक आधार हैं, पर वे हस्तगत कैसे हों, जबकि पिछड़ापन अपने गुण, कर्म, स्वभाव का अविच्छिन्न अंग बन गया हो?

🔴 अच्छा होता, हमें ऐसे उत्साहवर्धक प्रगतिशील वातावरण में रहने का अवसर मिला होता अथवा जहाँ ऐसी प्रेरणाएँ विद्यमान हैं, उनके साथ घनिष्ठता का सम्बन्ध स्थापित किया गया होता। इर्द-गिर्द ऐसा उत्साह उभरता दीख नहीं पड़ता, नहीं तो अन्यत्र अथवा भूतकाल में सम्पन्न हुए उन पुरुषार्थों से अवगत, प्रभावित होने का प्रयत्न किया ही जा सकता है, जो अभी भी प्रगतिशीलों की यशगाथा के रूप में कहीं-कहीं तो विद्यमान हैं ही। ऐसी साक्षियाँ, इतिहास के पृष्ठों पर कम परिमाण में नहीं हैं।  

🔵 जिसे विपन्नता से उबर कर, प्रगतिशील सम्पन्नता की दिशा में अग्रसर होना है, उसे उस अभ्यस्त मानसिकता को निरस्त करना पड़ेगा, जो हमें अमीरी के मुखौटा पहन कर वस्तुत: गई-गुजरी परिस्थितियों में रहने के लिए बाधित किए हुए हैं।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 विधि नहीं, विधा समझें (अंतिम भाग)


👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴 आप तो कर्मकाण्ड करते रहते हैं और ये विचार तक नहीं करते कि क्यों करते रहते हैं? वेदान्त का, फिलॉसफी का पहला वाला सूत्र है, क्या सूत्र है? ब्रह्म-जिज्ञासा। पहला काम ये है कि आप जानिए। ये क्या चक्कर है? गायत्री माता की मूर्ति हो, तो आप ये पूछिए कि क्या बात है साहब! हमने तो मूर्ति रख दी और दण्ड पेल रहे हैं। दण्ड पेलिये मत। पहला काम ये है कि समझो।

🔵 क्यों और क्या? पहले यहाँ से चल। भजन पीछे करना। ये क्या चक्कर है? पहले ये पूछना, फिर इसके बाद शुरू करना। ये आपकी क्या है? जिज्ञासा है। प्रत्येक कर्मकाण्ड देखने से खिलवाड़ मालूम पड़ते हैं। चावल चढ़ा दिया गणेश जी पर। काहे के लिए चढ़ा दिया गणेश जी पर। काटे के लिए चढ़ा दिया गणेश जी पर। गणेश जी चावल खाएँगे और ऐसा चावल खाएँगे, कच्चा चावल खाएँगे गणेश जी। आप भी खाइए कच्चा चावल। गणेश जी मरेंगे कि जिएँगे कच्चा चावल खाने से? कच्चा चावल खाएँगे। कच्चा चावल नहीं खा सकते गणेश जी। गणेश जी को चावल खिलाना है, तो पकाकर लाइए। पका कर लाए हैं? हाँ साहब! और चावल कितना चावल लाए हैं?

🔴 गणेश जी पर चढ़ा रहे थे—अक्षतान् समर्पयामि। दिखाइये चावल जरा। ये रहे छह दाने। छह दानों से क्या होगा? गणेश जी का पेट तो इतना बड़ा है? थैली भर चावल पकाकर लाइये। अगर आप यही मानते हैं कि चावल चढ़ाना है, तो मखौल मत कीजिए। मक्खनबाजी मत कीजिए। जो बात मुनासिब है, वो कीजिए। अगर हम आपके घर जाएँ और आप कहें—गुरु जी! लीजिए खाना खाइये। हाँ बेटे! हमने तो आज खाया भी नहीं है। ये लीजिए चावल खा लीजिए छह दाने। छह दाने चावल बेटे! कैसे खा लूँ? पकाए हैं ना? नहीं साहब! पकाने की क्या जरूरत है इसमें? थाली में रखकर ला। नहीं साहब! थाली में भी क्या करेंगे आप? क्या करेंगे?

🔵 यहीं पटक देंगे, ये छह चावल के दाने। बेटे! इसको हम क्या करें? खा लीजिए। ये तो मुश्किल है, छह चावल तो हमारी दाढ़ी में चिपके रह जाएँगे। पेट कैसे भरेगा? और गणेश जी का? गणेश जी को ‘अक्षतं समर्पयामि’, गणेश जी को अक्षत चढ़ाता ही जा रहा है। समझता नहीं कि क्या चक्कर है? समझता है कि नहीं? नहीं साहब! मुझे क्यों समझना है? अक्षत चढ़ाऊँगा। भाड़ चढ़ाएगा अक्षत। मित्रो! क्या करना पड़ेगा? आपको ये करना पड़ेगा कि क्रिया के साथ-साथ में शिक्षाएँ और प्रेरणाएँ आपको समझनी चाहिए और समझनी ही नहीं वरन् हृदयंगम भी करनी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutravidhi_nahi_vidhya_samjhe

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 93)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴  (4) आदर्श विवाहों का अभिनन्दन— सामाजिक कुरीतियों को कुचलते हुए, प्रतिक्रियावादियों का उपहास व्यंग एवं विरोध सहते हुए जिन लोगों ने इस प्रकार का साहस प्रदर्शित किया है, लोगों की परवा न करते हुए विवेक को महत्व दिया है, निस्सन्देह वे साहसी, शूर, आदर्शवादी और नेतृत्व कर सकने की क्षमता सम्पन्न व्यक्ति हैं। उनकी प्रशंसा और प्रतिष्ठा होनी चाहिए। जहां वीर पूजा नहीं होती वह भूमि वीरविहीन हो जाती है। इसलिए प्रयत्न यह किया जाना चाहिए कि इन आदर्शवादी विवाहों को, उनके संयोजकों को विवेकशील लोगों का समर्थन, सहयोग, सद्भाव एवं आशीर्वाद प्राप्त हो।

🔵 ऐसे विवाहों के अवसर पर सम्भ्रान्त लोगों के पास स्वयं व्यक्तिगत अनुरोध एवं निवेदन लेकर जाना चाहिए और उन्हें अधिकाधिक संख्या में एकत्रित करना चाहिए। जितने अधिक लोग इस प्रकार के आयोजन को देखेंगे उतनी ही चर्चा फैलेगी और अपने उद्देश्य की पूर्ति सम्भव हो सकेगी। इसलिए काफी दिन पहले से यह निमन्त्रण देने आरम्भ करने चाहिए।

🔴 ऐसे उत्सवों उपस्थित जो सज्जन आशीर्वाद एवं समर्थन देने आयें उनमें से जो भाषण कर सकते हों वे खड़े होकर अपने विचार भी व्यक्त करें। फूल माला लेकर सभी आगन्तुक आवें और उन्हें दोनों ओर के अभिभावकों को पहनावें जिन्होंने यह साहस प्रदर्शित किया। छपे अभिनन्दन पत्र भेट करने की व्यवस्था हो सके तो और भी उत्तम हैं। उस नगर में या आस-पास जो सार्वजनिक संस्थायें हों वे भी अपनी ओर से अभिनन्दन करें। युग-निर्माण शाखाओं को तो विशेष उत्साहपूर्वक ऐसे आयोजनों का अभिनन्दन करना चाहिए। जहां जुलूस सम्भव हों वहां वह भी निकालें जांय और लाउडस्पीकरों से उस विवाह की विशेषता जनता को बताई जाय। आशीर्वाद देने आने वाले व्यक्ति भोजन स्वीकार न करें। इलाइची जैसा छोटा सत्कार ही पर्याप्त माना जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 41)

🌹 गुरुदेव का प्रथम बुलावा-पग-पग पर परीक्षा

🔴 यात्रा में जहाँ भी रात्रि बितानी पड़ी, वहाँ काले साँप रेंगते और मोटे अजगर फुफकारते बराबर मिलते रहे। छोटी जाति का सिंह उस क्षेत्र में अधिक होता है। उसमें फुर्ती बबर शेर की तुलना में अधिक होती है। आकार के हिसाब से ताकत उसमें कम होती है। इसलिए छोटे जानवरों पर हाथ डालता है, शाकाहारियों में आक्रमणकारी पहाड़ी रीछ होता है। शिवालिक की पहाड़ियों एवं हिमालय के निचले इलाके में इर्द-गिर्द जंगली हाथी भी रहते हैं। उन सभी की प्रकृति यह होती है कि आँखों से आँखें न मिलें, उन्हें छेड़े जाने का भय न हो, तो अपने रास्ते ही चले जाते हैं। अन्यथा तनिक भी भय या क्रोध का भाव मन में आने पर वे आक्रमण कर बैठते हैं।

🔵 अजगर, सर्प, बड़ी छिपकली (गोह), रीछ, तेंदुए, चीते, हाथी इनसे आए दिन यात्रियों को कई-कई बार पाला पड़ता है। समूह को देखकर वे रास्ता बचाकर निकल जाते हैं, पर जब कोई मनुष्य या पशु अकेला सामने से आता है, तो वे बचते नहीं। सीधे रास्ते चलते जाते हैं। ऐसी दशा में मनुष्य को ही उनके लिए रास्ता छोड़ना पड़ता है। अन्यथा मुठभेड़ होने पर आक्रमण एक प्रकार से निश्चित ही समझना चाहिए।

🔴 ऐसा आमना-सामना दिन और रात में मिलाकर दस से बीस बार हो जाता था। अकेला आदमी देखकर वे निर्भय होकर चलते थे और रास्ता नहीं छोड़ते थे। उनके लिए हमें ही रास्ता छोड़ना पड़ता था। यह घटनाक्रम लिखने और पढ़ने में तो सरल है, पर व्यवहार में ऐसा वास्ता पड़ना अति कठिन है। कारण कि वे साक्षात् मृत्यु के रूप में सामने आते थे, कभी-कभी साथ चलते या पीछे-पीछे चलते थे। शरीर को मौत सबसे डरावनी लगती है। हिंस्र पशु अथवा जिनकी आक्रमणकारी प्रकृति होती है, ऐसे जंगली नर-नील गाय भी आक्रमणकारी होते हैं।

🔵 भले ही वे आक्रमण न करें, पर डर इतना लगता है कि साक्षात मौत की घड़ी ही आ गई। जब तब कोई वास्ता पड़े, तो एक बात भी है, पर प्रायः हर घंटे में एक बार मौत से भेंट और हर बार प्राण जाने का डर लगना, अत्यधिक कठिन परिस्थितियों का सामना करने की बात थी। दिल धड़कना आरम्भ होता। जब तक वह धड़कन बंद न हो पाती, तब तक दूसरी नई मुसीबत सामने आ जाती और फिर नए सिरे से दिल धड़कने लगता। वे लोग एकाकी नहीं होते थे। कई-कई के झुंड सामने आ जाते। यदि हमला करते तो एक-एक बोटी नोंच ले जाते एवं कुछ ही क्षणों में अपना अस्तित्व ही समाप्त हो जाता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/gur.2

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 41)

🌞 हिमालय में प्रवेश (गोमुख के दर्शन)

🔵 नदी नदों ने, झरने और सर सोतों ने भी अपना अलग अस्तित्व कायम न रखने की, अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और कीर्ति स्थापित करने की लालसा को दमन करने की जो दूरदर्शिता की है वह भी सर्वथा अभिनन्दनीय है। उनने अपने को खोकर गंगा की क्षमता, महत्ता और कीर्ति बढ़ाई। सामूहिकता का, एकत्रीकरण का, मिलजुल कर काम करने का महत्व समझा, इसके लिए उनकी जितनी प्रशंसा की जाय कम है। संगठन में ही शक्ति है यह उन्होंने वाणी से नहीं, मन से नहीं प्रत्यक्ष क्रिया से कर दिखाया, कर्मवीरता इसे ही कहते हैं, आत्म-त्याग के इस अनुपम आदर्श में जितनी महानता है उतनी ही दूरदर्शिता भी है। यदि वे अपना अलग अस्तित्व बनाये रहने पर अड़े रहते, सोचते जो मेरी क्षमता है उसका यश मुझे ही मिलना चाहिए और गंगा में मिलने से इनकार कर देते तो अवश्य ही उनका अपना अस्तित्व भी अलग रहता और नाम भी। पर वह होता इतना छोटा कि उसे उपेक्षणीय और नगण्य ही माना जाता। उस दशा में उस जल को गंगाजल कोई नहीं कहता और उसका चरणामृत सिर पर चढ़ाने को कोई लालायित न रहता।

🔴 गोमुख पर आज जिस पुनीत जल धारा में माता गंगा का दर्शन मज्जन मैंने किया, वह तो उद्गम मात्र था। पूरी गंगा का तो सहस्रों नदी नालों के संगठन से सामूहिकता का कार्य-क्रम लेकर चलने पर बनी है। गंगा सागर ने उसी का स्वागत किया है। सारी दुनिया उसी को पूजती है। गोमुख की तलाश में तो मुझ जैसे चन्द आदमी ही पहुंच पाते हैं।

🔵 गंगा और नदी नालों के सम्मिश्रण के महान् परिणाम को यदि सर्व साधारण की—नेता और अनुयायियों की समझ में आ जावे—लोग सामूहिक के, सामाजिकता के महत्व को हृदयंगम कर सकें—तो एक ऐसा ही पवित्र पापनाशिनी, लोकतारिणी संघ शक्ति का प्रादुर्भाव हो सकता है जैसा गंगा का हुआ है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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