सोमवार, 23 जनवरी 2017
👉 सोशल मीडिया पर उल्लू बनने से ऐसे बचें (भाग 2)
🔴 मनी ट्रैपआपको वक्त-बेवक्त मेसेज आता है 'सस्ती दर पर लोन चाहिए'... 'क्या आप घर खरीदना चाहते हैं?'... 'क्या आपको इन्वेस्ट करना है?' आदि आदि। 'ट्राई करने में क्या जाता है, कौन-सा अपना पैसा जा रहा है' यह सोचकर लोग ऐसे मेसेज आगे बढ़ा देते हैं। आजकल हर किसी को वट्सऐप पर एक जैसे मेसेज कोई-न-कोई रिश्तेदार या दोस्त भेजता रहता है। सस्ता पाने के लालच में हम ऐसे मेसेज को बढ़ावा देते हैं। ऐसे ही कुछ मेसेज हैं:
- Amazon पर सिर्फ 1 रुपये में पेन ड्राइव
- Flipkart पर सिर्फ 1 रुपये में मोबाइल
- LED बल्ब फ्री में
- या कुछ भी जिसकी ज्यादा बातें हो रही हैं या टीवी/पेपर पर विज्ञापन आ रहे हैं।
दरअसल, ठग सिर्फ 150-200 रुपये में पॉप्युलर साइट के नाम से एक वेबसाइट का नाम (कुछ बदलाव के साथ) बुक करा लेते हैं। यह पेज बिलकुल Flipkart, Amazon या दूसरी पॉप्युलर वेबसाइट जैसा दिखता है। इस पर आपको जो बताया गया होता है, उसका फोटो होता है। फिर आपकी डिटेल्स मांगी जाती हैं। आप डिटेल्स शेयर करते हैं तो वह सारी जानकारी उनके डेटाबेस में जाती है। बस हो गया उनका काम! अब मुफ्त या बेहद सस्ता लेने के चक्कर में लग गया न आपको चूना और हो गई ठगों की चांदी। दरअसल, हर वॉट्सऐप ग्रुप में कम-से-कम 25 लोग होते हैं। आपने अगर 8 ग्रुप में मेसेज शेयर किया तो 200 लोगों के मन में लालच पैदा हुआ। 25 लोगों में से कम-से-कम 5 तो करेंगे, फिर वे और उनके 8 ग्रुप में तो सोचिए सिर्फ एक दिन में यह मेसेज लाखों लोगों तक पहुंच जाएगा। किसी बड़ी कंपनी को टेली-मार्केटिंग करनी होती है तो वह किसी बड़ी मोबाइल कंपनी से लाखों रुपये देकर हमारे नंबरों का डेटाबेस खरीदते हैं, पर यहां तो सिर्फ 150 रु लगाकर ये लोग बहुत कम में (करीब 2-4 लाख) में छोटी कंपनियों को बेच देते हैं। तो यह तो लॉटरी हो गई! 150-200 रुपये का टिकट और लाखों की कमाई, वह भी सिर्फ चंद दिनों में और बिना कोई मेहनत। फंस जाते हैं आप। इसके बाद कुछ-न-कुछ बेचने के लिए भर-भर के SMS और फोन कॉल आने लगते हैं। इसका असली फायदा किसी और को होता है और आप ठगे जाते हैं।
🔴 कैसे बचें
- वेबसाइट का नाम और उसकी स्पेलिंग ध्यान से देखें।
- यह भी गौर करें कि क्या उस मेसेज को 5-10 वट्सऐप ग्रुप्स में शेयर करने को कहा गया है?
दरअसल, हम सोचते हैं कि ऐमजॉन या फ्लिपकार्ट जैसी बड़ी कंपनी की तरफ से आया है तो घपला नहीं होगा। वेबसाइट के नाम और पेज पर कंपनी का नाम भी दिख रहा होता है। लेकिन नकली वेबसाइट का नाम लंबा और चिन्हों से बना होता है, कोई भी सिंपल और ऑरिजिनल (www.Amazon.com, www.flipkart.com आदि) नहीं होता। ऐसे मेसेज में आपका नाम, मोबाइल नंबर और अड्रेस की मांग की जाती है।
- ऐसे किसी भी मेसेज को आगे शेयर न करें, जहां जरूरत से ज्यादा सस्ता सामान मिलने का दावा किया जा रहा है।
- अगर किसी अनजान नंबर से ऐसा मेसेज आया हो तो उस नंबर को ब्लॉक कर दें।
- अगर आपका कोई जानकार ऐसे मेसेज शेयर करे तो उसे भी इससे परहेज करने को कहें।
- ऐसे किसी भी मेसेज में दिए URL पर क्लिक करने से बचें और मेसेज को दूसरों के साथ शेयर भी न करें।
- दूसरों को भी ऐसा करने से रोकें और बताएं कि यह फेक मेसेज है।
🔴 पॉलिटिकल ट्रैप
राजनीतिक मकसद के लिए सबसे ज्यादा झूठ बोला जाता है और सोशल मीडिया का भी इसमें जमकर इस्तेमाल हो रहा है। सोशल मीडिया के जरिए राजनीतिक झूठ फैलाने के कई फायदे और मकसद हैं जैसे कि पार्टी या नेता के लिए लोगों के दिल में इज्जत बढ़ाना, किसी दूसरे के खिलाफ नफरत बढ़ाना, किसी पार्टी के अजेंडे को आगे बढ़ाना आदि।
- कोई पॉलिसी या जनता के लिए कोई काम कभी किसी पूर्व मंत्री ने किया हो, उसे भी नया बता कर फैलाया जाता है। या तो उस पॉलिसी के बारे में लोगों को पता ही नहीं होता या फिर लोग उसके बारे में भूल जाते हैं और उस खबर को सही समझने लगते हैं।
- फोन नंबर 104 से आप जरूरत होने पर अपने घर या कहीं भी ब्लड बैंक से खून मंगा सकते हैं। यह नंबर चालू तो बरसों पहले हुआ था, लेकिन अब इसे प्रधानमंत्री मोदी की सौगात के रूप में फैलाया जा रहा है।
- फोन नंबर 1098 को यह कहकर पेश किया जा रहा है कि इस पर फोन करने पर लोग आपका बचा हुआ खाना उठाने आएंगे ताकि जरूरतमंदों के बीच बांटा जा सके। हकीकत यह है कि यह नंबर बरसों पहले एक एनजीओ ने चालू किया था। यह एनजीओ बच्चों की देखरेख करता है। यह नंबर इसलिए शेयर किया गया था कि कहीं कोई गुम हुआ बच्चा मिले तो एनजीओ को फोन करें। लेकिन अब बचे खाने के नाम पर इस नंबर पर इतने फोन आने लगे हैं कि एनजीओ को अपना असली काम करने में दिक्कतें आने लगी हैं।
- फोटो में कंप्यूटर से एडिटिंग करके चेहरा या कुछ और बदल देते हैं, जिससे उसका मतलब बदल जाता है। एक फोटो में प्रधानमंत्री मोदी को सोनिया गांधी और एक शेख के पैर छूते दिखाया गया था जबकि असल फोटो में वह अडवाणी जी के पैर छू रहे थे।
- एक और फोटो में महात्मा गांधी को बाबा साहेब आंबेडकर के पैर छूते दिखाया था जबकि वे दो अलग-अलग फोटो थे। एक आंबेडकर का फैमिली फोटो था, दूसरे में गांधी जी दांडी मार्च में जमीन पर से नमक उठा रहे थे। दोनों को मिक्स करके नया फोटो तैयार किया गया था।
- ट्विटर पर बहुत-से सिलेब्रिटी/नेता हैं जो अपनी मर्जी से कुछ भी लिखते हैं। लोग चाव से उन्हें पढ़ते हैं और जवाब देते हैं। अब यहां दो बातें होती हैं:
1. किसी सिलेब्रिटी या नेता का ट्वीट लेकर कंप्यूटर से उसे बदल कर झूठ फैलाने वाले लोग अपनी मर्जी से कुछ भी लिख देते हैं। यह देखने में असली लगता है, पर होता नहीं है।
2. लोग किसी एक शख्सियत के नाम से छोटे-मोटे बदलाव (कोई निशान या स्पेलिंग बदलकर) के साथ दूसरे हैंडल बना लेते हैं। फिर इनके स्क्रीनशॉट लेकर वट्सऐप या फेसबुक पर हजारों की संख्या में कुछ भी शेयर करते हैं जिससे लोगों पर प्रभाव पड़ता है।
- झूठ के बल पर दंगे भड़काने की कोशिश भी की जाती है। कुछ महीने पहले कश्मीर में काफी तनाव था। लोग परेशान थे पर सोशल मीडिया पर लोग दंगे भड़काने के लिए बरसों पुराने या दूसरे देशों के फोटो नई कह कर शेयर कर रहे थे। इन फोटो के जरिए आपकी देशभक्ति की भावनाओं का फायदा उठाने की कोशिश की जा रही थी। सब फोटो पर एक लाइन होती थी : 'बिका हुआ मीडिया आपको यह सचाई नहीं दिखाएगा। अगर आप सच्चे भारतीय हो तो हर ग्रुप में जरूर फॉरवर्ड करो।' ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है।
🔴 कैसे बचें
- किसी भी फोटो या मेसेज पर आंख मूंदकर भरोसे करने से बचें। अगर आप गौर से देखेंगे और सोचेंगे तो कई तरह के झूठ खुद ही पकड़ लेंगे।
- किसी भी नंबर को आगे फॉरवर्ड करने से पहले एक बार खुद मिलाकर जांच लें।
- किसी के नाम से फैल रहे मेसेज की सचाई खुद भी इंटरनेट पर जाकर जरूर चेक कर लें।
- ट्विट को चेक करने के लिए सामने वाले का अकाउंट वेरिफाइड या है नहीं, यह जरूर चेक करें। वेरिफाइड अकाउंट के सामने एक नीले गोले में सफेद टिकमार्क होता है जिससे पता चलता है कि वह असली है। जिनके हैंडल पर ऐसा नहीं होता तो देखें कि उनके कितने फॉलोअर्स हैं और वह कैसा ट्वीट करते हैं? जैसे कि किसी हीरो के नाम (थोड़ी स्पेलिंग बदल कर) का हैंडल होगा, पर उसके सिर्फ 1000-2000 ही फॉलोअर्स होंगे और करीबन सारे ट्वीट राजनीति से भरे होंगे। साथ ही, फिल्म/अवॉर्ड फंक्शन आदि के बारे में कुछ खास नहीं होगा। ऐसे में मान लें कि वह फेक हैंडल है।
🌹 अगले अंक में समाप्त
👉 सोशल मीडिया पर उल्लू बनने से ऐसे बचें (भाग 1)
http://awgpskj.blogspot.in/2017/01/1_22.html
👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 17) 24 Jan
🌹 त्रिविध भवबन्धन एवं उनसे मुक्ति
🔴 लोभ, मोह और अहंकार के तीन भारी पत्थर जिन्होंने सिर पर लाद रखे हैं, उनके लिये जीवन साधना की लम्बी और ऊँची मंजिल पर चल सकना, चल पड़ना असम्भव हो जाता है। भले ही कोई कितना पूजा-पाठ क्यों न करता रहे! जिन्हें तथ्यान्वेषी बनना है, उन्हें इन तीन शत्रुओं से अपना पीछा छुड़ाना ही चाहिये।
🔵 हलकी वस्तुएँ पानी पर तैरती हैं, किन्तु भारी होने पर वे डूब जाती हैं। जो लोभ, मोह और अहंकार रूपी भारी पत्थर अपनी पीठ पर लादे हुए हैं, उन्हें भवसागर में डूबना ही पड़ेगा। जिन्हें तरना, तैरना है, उन्हें इन तीनों भारों को उतारने का प्रयत्न करना चाहिये।
🔴 अनेकानेक दोष-दुर्गुणों कषाय-कल्मषों का वर्गीकरण विभाजन करने पर उनकी संख्या हजारों हो सकती है, पर उनके मूल उद्गम यही तीन लोभ, मोह और अहंकार हैं। इन्हीं भव बन्धनों से मनुष्य के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर जकड़े पड़े हैं। इनका उन्मूलन किये बिना आत्मा को उस स्वतन्त्रता का लाभ नहीं मिल सकता जिसे मोक्ष कहते हैं। इन तीनों पर कड़ी नजर रखी जाय। इन्हें अपना संयुक्त शत्रु माना जाये। इनसे पीछा छुड़ाने के लिये हर दिन नियमित रूप से प्रयास जारी रखा जाये। एकदम तो सब कुछ सही हो जाना कठिन है, पर उन्हें नित्यप्रति यथासम्भव घटाते-हटाते चलने की प्रक्रिया जारी रखने पर सुधार क्रम में सफलता मिलती ही चलती है और एक दिन ऐसा भी आता है, जब इनसे पूरी तरह छुटकारा पाकर बन्धन मुक्त हुआ जा सके।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 लोभ, मोह और अहंकार के तीन भारी पत्थर जिन्होंने सिर पर लाद रखे हैं, उनके लिये जीवन साधना की लम्बी और ऊँची मंजिल पर चल सकना, चल पड़ना असम्भव हो जाता है। भले ही कोई कितना पूजा-पाठ क्यों न करता रहे! जिन्हें तथ्यान्वेषी बनना है, उन्हें इन तीन शत्रुओं से अपना पीछा छुड़ाना ही चाहिये।
🔵 हलकी वस्तुएँ पानी पर तैरती हैं, किन्तु भारी होने पर वे डूब जाती हैं। जो लोभ, मोह और अहंकार रूपी भारी पत्थर अपनी पीठ पर लादे हुए हैं, उन्हें भवसागर में डूबना ही पड़ेगा। जिन्हें तरना, तैरना है, उन्हें इन तीनों भारों को उतारने का प्रयत्न करना चाहिये।
🔴 अनेकानेक दोष-दुर्गुणों कषाय-कल्मषों का वर्गीकरण विभाजन करने पर उनकी संख्या हजारों हो सकती है, पर उनके मूल उद्गम यही तीन लोभ, मोह और अहंकार हैं। इन्हीं भव बन्धनों से मनुष्य के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर जकड़े पड़े हैं। इनका उन्मूलन किये बिना आत्मा को उस स्वतन्त्रता का लाभ नहीं मिल सकता जिसे मोक्ष कहते हैं। इन तीनों पर कड़ी नजर रखी जाय। इन्हें अपना संयुक्त शत्रु माना जाये। इनसे पीछा छुड़ाने के लिये हर दिन नियमित रूप से प्रयास जारी रखा जाये। एकदम तो सब कुछ सही हो जाना कठिन है, पर उन्हें नित्यप्रति यथासम्भव घटाते-हटाते चलने की प्रक्रिया जारी रखने पर सुधार क्रम में सफलता मिलती ही चलती है और एक दिन ऐसा भी आता है, जब इनसे पूरी तरह छुटकारा पाकर बन्धन मुक्त हुआ जा सके।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा
🔴 नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। बोस के पिता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वक़ील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। नेताजी ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। तत्पश्चात् उनकी शिक्षा कलकत्ता के प्रेज़िडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई, और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। अँग्रेज़ी शासन काल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था किंतु उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया। 1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए।
🔴 नेताजी' के नाम से प्रसिद्ध सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को 'आज़ाद हिन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था। नेताजी अपनी आजाद हिंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुँचे। यहीं पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध नारा, "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" दिया।
🔵 18 अगस्त 1945 को टोक्यो (जापान) जाते समय ताइवान के पास नेताजी का एक हवाई दुर्घटना में निधन हुआ बताया जाता है, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया। नेताजी की मौत के कारणों पर आज भी विवाद बना हुआ है।
🔵 18 अगस्त 1945 को टोक्यो (जापान) जाते समय ताइवान के पास नेताजी का एक हवाई दुर्घटना में निधन हुआ बताया जाता है, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया। नेताजी की मौत के कारणों पर आज भी विवाद बना हुआ है।
🔴 याद रखिये – सबसे बड़ा अपराध, अन्याय को सहना और गलत व्यक्ति के साथ समझौता करना हैं।
🔵 यह हमारा फर्ज हैं कि हम अपनी आजादी की कीमत अपने खून से चुकाएं। हमें अपने त्याग और बलिदान से जो आजादी मिले, उसकी रक्षा करनी की ताकत हमारे अन्दर होनी चाहिए।
🔵 यह हमारा फर्ज हैं कि हम अपनी आजादी की कीमत अपने खून से चुकाएं। हमें अपने त्याग और बलिदान से जो आजादी मिले, उसकी रक्षा करनी की ताकत हमारे अन्दर होनी चाहिए।
रविवार, 22 जनवरी 2017
👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 16) 23 Jan
🌹 त्रिविध भवबन्धन एवं उनसे मुक्ति
🔴 पारिवारिक उत्तरदायित्वों को निभाया जाना चाहिये, पर उस कीचड़ में इतनी गहराई तक नहीं फँसना चाहिये कि उबर सकना सम्भव न हो सके। मोह को भव बन्धनों में से प्रमुख माना गया है। उसी संकीर्ण दायरे में जकड़े हुए लोग, लोकमंगल का कर्तव्य पालन कर ही नहीं पाते। जिन्हें सभी के प्रति पारिवारिकता का भाव अपनाने का अवसर मिलता है, उनके लिये हर किसी को आत्मा मानने का, सभी की सेवा-सहायता करने का आनन्द मिलता है।
🔵 अहंकार मोटे अर्थों में घमण्ड समझा जाता है। अकड़ना, उद्धत-अशिष्ट व्यवहार करना, क्रोधग्रस्त रहना अहंकार की निशानी है। पर वस्तुत: वह और भी अधिक सूक्ष्म और व्यापक है। फैशन, सजधज, श्रृंगार, ठाठ-बाट अपव्यय, सस्ता बड़प्पन आदि अहंकार परिवार के ही सदस्य हैं। लोग शेखीखोरी के लिये ढेरों समय, श्रम और पैसा खर्च करते देखे जाते हैं। यह भी एक प्रकार का नशा है, जिसमें अपने को भले ही मजा आता हो, पर हर विचारशील को इसमें क्षुद्रता की, बचकानेपन की ही गन्ध आती है।
🔴 इस विडम्बना के लिये चित्र-विचित्र प्रवंचनायें रचनी पड़ती हैं। ईर्ष्या, द्वेष उत्पन्न करने में भी अहंता की ही प्रमुख भूमिका रहती है। कलह और विग्रह प्राय: उसी कारण उत्पन्न होते हैं। आदमी की विशिष्टता अपनी विनयशीलता एवं दूसरों के सम्मान में निहित है। उसी कसौटी पर किसी की सज्जनता परखी जाती है। अहंकारी से उन सद्गुणों में से एक भी नहीं निभ पाता। अहंभाव को आत्मघाती शत्रु माना गया है। ऐसे लोगों से आत्मसाधना तो बन ही नहीं पाती। उन पर उद्दण्डता व दूसरों को नीचा दिखाने का भूत सदैव चढ़ा रहता है और दूसरों को गिराने एवं नीचा दिखाने की ही ललक उठती रहती है। ऐसे लोग अपनी प्रशंसा और दूसरों की निन्दा करने में ही लगे रहते हैं। इन परिस्थितियों में आत्मोत्कर्ष और आत्मपरिष्कार कैसे बन पड़े?
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 पारिवारिक उत्तरदायित्वों को निभाया जाना चाहिये, पर उस कीचड़ में इतनी गहराई तक नहीं फँसना चाहिये कि उबर सकना सम्भव न हो सके। मोह को भव बन्धनों में से प्रमुख माना गया है। उसी संकीर्ण दायरे में जकड़े हुए लोग, लोकमंगल का कर्तव्य पालन कर ही नहीं पाते। जिन्हें सभी के प्रति पारिवारिकता का भाव अपनाने का अवसर मिलता है, उनके लिये हर किसी को आत्मा मानने का, सभी की सेवा-सहायता करने का आनन्द मिलता है।
🔵 अहंकार मोटे अर्थों में घमण्ड समझा जाता है। अकड़ना, उद्धत-अशिष्ट व्यवहार करना, क्रोधग्रस्त रहना अहंकार की निशानी है। पर वस्तुत: वह और भी अधिक सूक्ष्म और व्यापक है। फैशन, सजधज, श्रृंगार, ठाठ-बाट अपव्यय, सस्ता बड़प्पन आदि अहंकार परिवार के ही सदस्य हैं। लोग शेखीखोरी के लिये ढेरों समय, श्रम और पैसा खर्च करते देखे जाते हैं। यह भी एक प्रकार का नशा है, जिसमें अपने को भले ही मजा आता हो, पर हर विचारशील को इसमें क्षुद्रता की, बचकानेपन की ही गन्ध आती है।
🔴 इस विडम्बना के लिये चित्र-विचित्र प्रवंचनायें रचनी पड़ती हैं। ईर्ष्या, द्वेष उत्पन्न करने में भी अहंता की ही प्रमुख भूमिका रहती है। कलह और विग्रह प्राय: उसी कारण उत्पन्न होते हैं। आदमी की विशिष्टता अपनी विनयशीलता एवं दूसरों के सम्मान में निहित है। उसी कसौटी पर किसी की सज्जनता परखी जाती है। अहंकारी से उन सद्गुणों में से एक भी नहीं निभ पाता। अहंभाव को आत्मघाती शत्रु माना गया है। ऐसे लोगों से आत्मसाधना तो बन ही नहीं पाती। उन पर उद्दण्डता व दूसरों को नीचा दिखाने का भूत सदैव चढ़ा रहता है और दूसरों को गिराने एवं नीचा दिखाने की ही ललक उठती रहती है। ऐसे लोग अपनी प्रशंसा और दूसरों की निन्दा करने में ही लगे रहते हैं। इन परिस्थितियों में आत्मोत्कर्ष और आत्मपरिष्कार कैसे बन पड़े?
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 सोशल मीडिया पर उल्लू बनने से ऐसे बचें (भाग 1)
सोशल मीडिया का क्रेज ऐसा है कि बच्चे-बड़े कोई इससे बचा नहीं है। यह कई मायनों में मददगार भी है लेकिन सावधानी न बरती जाए तो सोशल मीडिया कई खतरों का सबब भी बन सकता है। जानते हैं सोशल मीडिया पर शेयर होनेवाला नकली मेसेज और दूसरे खतरों से बचाव के बारे में सोशल मीडिया किसी मसले पर क्रांति ला सकता है तो मनोरंजन भी कर सकता है। हर जानकारी मुहैया कराता है तो भूले-बिसरे दोस्तों से भी मिलाता है, लेकिन गुस्सा, घृणा, नाराजगी को भी बढ़ाता है। यहां लोग ठगे भी जाते हैं और रत्ती भर गलती से जान भी जा सकती है। वैसे तो तकरीबन हर सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर अफवाह फैलाकर या बेवकूफ बनाकर पैसे कमाता हुआ कोई-न-कोई मिल जाता है, लेकिन फेसबुक, वट्सऐप और ट्विटर पर यह खतरा ज्यादा होता है। जानते हैं, सोशल मीडिया पर कैसे-कैसे जाल में फंसते हैं लोग और कैसे आप बच सकते हैं:-
🔴 इमोशनल ट्रैप
बात 2014 की है। राधा (काल्पनिक नाम) ने सिर्फ एक 'लाइक' की वजह से आत्महत्या कर ली। स्कूल स्टूडेंट राधा ने एक पोस्ट लाइक किया। पोस्ट में शनि भगवान की फोटो थी और लिखा था 'आज शनिवार है तो शनि भगवान की फोटो को लाइक करना तो बनता है'। राधा ने लाइक कर दिया। दो ही दिन बाद क्लास के लड़कों ने उसका रेट पूछना चालू कर दिया। फिर उसकी एक दोस्त ने बताया कि लड़कों ने किसी अश्लील साइट पर उसकी फोटो देखी है। बस तंग आकर उसने आत्महत्या कर ली। दरअसल, जैसे ही राधा ने पोस्ट लाइक किया, पोस्ट करने वाले को फेसबुक नोटिफिकेशन मिला। राधा के नाम पर क्लिक करते ही उसका प्रोफाइल खुल गया। फोटो सेक्शन में जाकर उसने राधा के कुछ अच्छी फोटो सेव कर अश्लील साइट पर अपलोड कर दी इस टाइटल के साथ: आपको अगर मुझसे गरमा गरम बातें करनी हैं तो इस नंबर पर फोन करें। जाहिर है, उसकी क्लास के लड़कों ने जब उसकी फोटो अश्लील साइट पर देखी तो उसे छेड़ना शुरू कर दिया। परेशान होकर राधा ने खुदकुशी कर ली।
यहां तो फिर भी असली फोटो इस्तेमाल हुई, फ्रॉड लोग तो किसी अश्लील फोटो पर किसी भी लड़की का चेहरा मॉर्फ कर लगा देते हैं। ऐसे में याद रखिए अपनी प्राइवेसी बदल कर 'पब्लिक' के बजाय 'फ्रेंड्स' कर लीजिए।
दरअसल, हम भारतीय काफी इमोशनल होते हैं। अक्सर चीजों को दिल पर ले लेते हैं, फिर चाहे धर्म से जुड़ी बात हो, सैनिकों की बात हो या फिर कोई और मसला। जब आप फेसबुक पर एक फोटो देखते हैं जिसमें एक प्यारा-सा बच्चा हो और लिखा हो कि उसे ब्रेन ट्यूमर है, आपके पोस्ट को लाइक या शेयर करने से उस बच्चे के इलाज के लिए फेसबुक या वॉट्सऐप पैसे देगा या फोटो को आपके 'लाइक' करने से या 'आमीन' लिखने से बच्चा बच सकता है तो अक्सर आप लाइक पर क्लिक कर देते हैं या आमीन लिख देते हैं। क्यों? क्योंकि आपको बच्चे पर दया आती है और लगता है कि शायद आपके लाइक पर क्लिक करने का फायदा उस बच्चे को मिल जाएगा। आपको क्या लगता है कि भगवान भी इस पोस्ट पर आंखें गड़ाए बैठे हैं और 'लाइक' गिन रहे हैं? अगर लाख हुए तो बच्चे को जीने देंगे, लेकिन 99999 हुए तो मार देंगे! भगवान तो नहीं, पर इन लाइक्स पर कोई और जरूर नजरें गड़ाए बैठा है। ऐसी फोटो आपकी भावनाओं का फायदा उठाने के लिए पोस्ट किए जाते हैं।
आप तो एक लाइक करके भूल जाएंगे, लेकिन पोस्ट करने वाला अपने मकसद में लगा होता है कि लाखों लाइक उसकी बात का वजन बढ़ाएंगे। वैसे तो दुनिया के किसी दूसरे कोने में बैठा इंसान आपके बारे में, आपका नाम आदि नहीं जानता, पर जब आप ऐसे पोस्ट को लाइक करते हैं तो उसे आपका प्रोफाइल मिल जाता है जिससे वे आपकी फोटो उठा लेते हैं। मतलब यह तो 'आ बैल मुझे मार' वाली बात हो गई! महिलाओं के लिए यह खतरा ज्यादा होता है।
🔴 क्या हो सकता है आपकी फोटो का
1. लड़की/महिलाओं की फोटो किसी अश्लील वेबसाइट पर पोस्ट कर दी जाती है और ऐसे मेसेज लिखे होते हैं: अगर मुझसे गरमागरम बातें करनी हों तो इस नंबर पर कॉल करें। उसके साथ नंबर विदेश का होगा जिस पर बात करने के लिए प्रति मिनट 100 रुपये तक लगते हैं।
2. आपकी फोटो किसी वेबसाइट की मार्केटिंग के लिए इस्तेमाल की जा सकती है। ऐसी वेबसाइट्स पर कॉन्टेंट तो कुछ खास नहीं होता, लेकिन विज्ञापनों की भरमार होती है जिससे वे कमाई करते हैं।
3. यह भी संभव है कि उस पोस्ट पर जो लिखा है उसे बदल कर कुछ और लिख दें, मसलन आपकी पसंद के उलट कोई धार्मिक या राजनीतिक बात।
🔴 कैसे बचें
- अनजान फोटो (भगवान, सैनिक, बीमार आदि) पर लाइक/शेयर/कमेंट बिल्कुल न करें।
- ऐसे पोस्ट को इग्नोर करें और अपने जानकारों को सही जानकारी दें।
- हमेशा अपनी फोटो/जानकारी वगैरह को पोस्ट करते वक्त 'फ्रेंड्स' सिलेक्ट करें, 'पब्लिक' कतई नहीं।
- पहले की भी पोस्ट्स पर जाकर उनकी शेयरिंग में 'फ्रेंड्स' कर दें।
- प्राइवेट सेटिंग्स रखें। खासकर लड़कियां/महिलाएं अपने पोस्ट्स/फोटो आदि सिर्फ दोस्तों तक ही सीमित रखें।
- फैमिली और पर्सनल फोटोज़ को सिर्फ कस्टमाइज्ड ग्रुप में ही शेयर करें। इसके लिए Settings में जाकर Who can see my stuff में जाएं। यहां More Options में जाकर आप फैमिली, क्लोज्ड फ्रेंड्स या किसी और ग्रुप को चुन सकते हैं, जैसे कि कॉलेज के फोटो सिर्फ कॉलेज के दोस्तों के साथ, घर के, किसी शादी-त्योहार के सिर्फ रिश्तेदारों के साथ शेयर करें। अब सवाल उठता है कि भई, हमें तो फेसबुक पर बरसों हो गए, हजारों पोस्ट हो गए, अब सबकी प्राइवेसी कैसे बदली जाए? इसके लिए फेसबुक ने एक रामबाण इलाज दिया है। आप उसे आजमा लीजिए, खास कर वे लड़कियां जो दिन में 4 सेल्फी डालती हैं।
ऐसे करें सेटिंग्स चेंज: Account Settings - Privacy - Limit the audience for posts (तीसरे नंबर पर) - Limit Old Posts - Confirm
इसके बाद आपकी पुरानी सभी पोस्ट भी प्राइवेट हो जाएंगी।
🌹 क्रमशः जारी
🔴 इमोशनल ट्रैप
बात 2014 की है। राधा (काल्पनिक नाम) ने सिर्फ एक 'लाइक' की वजह से आत्महत्या कर ली। स्कूल स्टूडेंट राधा ने एक पोस्ट लाइक किया। पोस्ट में शनि भगवान की फोटो थी और लिखा था 'आज शनिवार है तो शनि भगवान की फोटो को लाइक करना तो बनता है'। राधा ने लाइक कर दिया। दो ही दिन बाद क्लास के लड़कों ने उसका रेट पूछना चालू कर दिया। फिर उसकी एक दोस्त ने बताया कि लड़कों ने किसी अश्लील साइट पर उसकी फोटो देखी है। बस तंग आकर उसने आत्महत्या कर ली। दरअसल, जैसे ही राधा ने पोस्ट लाइक किया, पोस्ट करने वाले को फेसबुक नोटिफिकेशन मिला। राधा के नाम पर क्लिक करते ही उसका प्रोफाइल खुल गया। फोटो सेक्शन में जाकर उसने राधा के कुछ अच्छी फोटो सेव कर अश्लील साइट पर अपलोड कर दी इस टाइटल के साथ: आपको अगर मुझसे गरमा गरम बातें करनी हैं तो इस नंबर पर फोन करें। जाहिर है, उसकी क्लास के लड़कों ने जब उसकी फोटो अश्लील साइट पर देखी तो उसे छेड़ना शुरू कर दिया। परेशान होकर राधा ने खुदकुशी कर ली।
यहां तो फिर भी असली फोटो इस्तेमाल हुई, फ्रॉड लोग तो किसी अश्लील फोटो पर किसी भी लड़की का चेहरा मॉर्फ कर लगा देते हैं। ऐसे में याद रखिए अपनी प्राइवेसी बदल कर 'पब्लिक' के बजाय 'फ्रेंड्स' कर लीजिए।
दरअसल, हम भारतीय काफी इमोशनल होते हैं। अक्सर चीजों को दिल पर ले लेते हैं, फिर चाहे धर्म से जुड़ी बात हो, सैनिकों की बात हो या फिर कोई और मसला। जब आप फेसबुक पर एक फोटो देखते हैं जिसमें एक प्यारा-सा बच्चा हो और लिखा हो कि उसे ब्रेन ट्यूमर है, आपके पोस्ट को लाइक या शेयर करने से उस बच्चे के इलाज के लिए फेसबुक या वॉट्सऐप पैसे देगा या फोटो को आपके 'लाइक' करने से या 'आमीन' लिखने से बच्चा बच सकता है तो अक्सर आप लाइक पर क्लिक कर देते हैं या आमीन लिख देते हैं। क्यों? क्योंकि आपको बच्चे पर दया आती है और लगता है कि शायद आपके लाइक पर क्लिक करने का फायदा उस बच्चे को मिल जाएगा। आपको क्या लगता है कि भगवान भी इस पोस्ट पर आंखें गड़ाए बैठे हैं और 'लाइक' गिन रहे हैं? अगर लाख हुए तो बच्चे को जीने देंगे, लेकिन 99999 हुए तो मार देंगे! भगवान तो नहीं, पर इन लाइक्स पर कोई और जरूर नजरें गड़ाए बैठा है। ऐसी फोटो आपकी भावनाओं का फायदा उठाने के लिए पोस्ट किए जाते हैं।
आप तो एक लाइक करके भूल जाएंगे, लेकिन पोस्ट करने वाला अपने मकसद में लगा होता है कि लाखों लाइक उसकी बात का वजन बढ़ाएंगे। वैसे तो दुनिया के किसी दूसरे कोने में बैठा इंसान आपके बारे में, आपका नाम आदि नहीं जानता, पर जब आप ऐसे पोस्ट को लाइक करते हैं तो उसे आपका प्रोफाइल मिल जाता है जिससे वे आपकी फोटो उठा लेते हैं। मतलब यह तो 'आ बैल मुझे मार' वाली बात हो गई! महिलाओं के लिए यह खतरा ज्यादा होता है।
🔴 क्या हो सकता है आपकी फोटो का
1. लड़की/महिलाओं की फोटो किसी अश्लील वेबसाइट पर पोस्ट कर दी जाती है और ऐसे मेसेज लिखे होते हैं: अगर मुझसे गरमागरम बातें करनी हों तो इस नंबर पर कॉल करें। उसके साथ नंबर विदेश का होगा जिस पर बात करने के लिए प्रति मिनट 100 रुपये तक लगते हैं।
2. आपकी फोटो किसी वेबसाइट की मार्केटिंग के लिए इस्तेमाल की जा सकती है। ऐसी वेबसाइट्स पर कॉन्टेंट तो कुछ खास नहीं होता, लेकिन विज्ञापनों की भरमार होती है जिससे वे कमाई करते हैं।
3. यह भी संभव है कि उस पोस्ट पर जो लिखा है उसे बदल कर कुछ और लिख दें, मसलन आपकी पसंद के उलट कोई धार्मिक या राजनीतिक बात।
🔴 कैसे बचें
- अनजान फोटो (भगवान, सैनिक, बीमार आदि) पर लाइक/शेयर/कमेंट बिल्कुल न करें।
- ऐसे पोस्ट को इग्नोर करें और अपने जानकारों को सही जानकारी दें।
- हमेशा अपनी फोटो/जानकारी वगैरह को पोस्ट करते वक्त 'फ्रेंड्स' सिलेक्ट करें, 'पब्लिक' कतई नहीं।
- पहले की भी पोस्ट्स पर जाकर उनकी शेयरिंग में 'फ्रेंड्स' कर दें।
- प्राइवेट सेटिंग्स रखें। खासकर लड़कियां/महिलाएं अपने पोस्ट्स/फोटो आदि सिर्फ दोस्तों तक ही सीमित रखें।
- फैमिली और पर्सनल फोटोज़ को सिर्फ कस्टमाइज्ड ग्रुप में ही शेयर करें। इसके लिए Settings में जाकर Who can see my stuff में जाएं। यहां More Options में जाकर आप फैमिली, क्लोज्ड फ्रेंड्स या किसी और ग्रुप को चुन सकते हैं, जैसे कि कॉलेज के फोटो सिर्फ कॉलेज के दोस्तों के साथ, घर के, किसी शादी-त्योहार के सिर्फ रिश्तेदारों के साथ शेयर करें। अब सवाल उठता है कि भई, हमें तो फेसबुक पर बरसों हो गए, हजारों पोस्ट हो गए, अब सबकी प्राइवेसी कैसे बदली जाए? इसके लिए फेसबुक ने एक रामबाण इलाज दिया है। आप उसे आजमा लीजिए, खास कर वे लड़कियां जो दिन में 4 सेल्फी डालती हैं।
ऐसे करें सेटिंग्स चेंज: Account Settings - Privacy - Limit the audience for posts (तीसरे नंबर पर) - Limit Old Posts - Confirm
इसके बाद आपकी पुरानी सभी पोस्ट भी प्राइवेट हो जाएंगी।
🌹 क्रमशः जारी
👉 हिसाब चार आने का
🔴 बहुत समय पहले की बात है, चंदनपुर का राजा बड़ा प्रतापी था, दूर-दूर तक उसकी समृद्धि की चर्चाएं होती थी, उसके महल में हर एक सुख-सुविधा की वस्तु उपलब्ध थी पर फिर भी अंदर से उसका मन अशांत रहता था। उसने कई ज्योतिषियों और पंडितों से इसका कारण जानना चाहा, बहुत से विद्वानो से मिला, किसी ने कोई अंगूठी पहनाई तो किसी ने यज्ञ कराए, पर फिर भी राजा का दुःख दूर नहीं हुआ, उसे शांति नहीं मिली।
🔵 एक दिन भेष बदल कर राजा अपने राज्य की सैर पर निकला। घूमते- घूमते वह एक खेत के निकट से गुजरा , तभी उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी, किसान ने फटे-पुराने वस्त्र धारण कर रखे थे और वह पेड़ की छाँव में बैठ कर भोजन कर रहा था।
🔴 किसान के वस्त्र देख राजा के मन में आया कि वह किसान को कुछ स्वर्ण मुद्राएं दे दे ताकि उसके जीवन मे कुछ खुशियां आ पाये।
🔵 राजा किसान के सम्मुख जा कर बोला – मैं एक राहगीर हूँ, मुझे तुम्हारे खेत पर ये चार स्वर्ण मुद्राएँ गिरी मिलीं, चूँकि यह खेत तुम्हारा है इसलिए ये मुद्राएं तुम ही रख लो।
🔴 किसान – ना – ना सेठ जी, ये मुद्राएं मेरी नहीं हैं, इसे आप ही रखें या किसी और को दान कर दें, मुझे इनकी कोई आवश्यकता नहीं।
🔵 किसान की यह प्रतिक्रिया राजा को बड़ी अजीब लगी, वह बोला, धन की आवश्यकता किसे नहीं होती भला आप लक्ष्मी को ना कैसे कर सकते हैं?”
🔴 सेठ जी, मैं रोज चार आने कमा लेता हूँ, और उतने में ही प्रसन्न रहता हूँ…, किसान बोला।
🔵 क्या? आप सिर्फ चार आने की कमाई करते हैं, और उतने में ही प्रसन्न रहते हैं, यह कैसे संभव है! राजा ने अचरज से पुछा।
🔴 सेठ जी, किसान बोला, प्रसन्नता इस बात पर निर्भर नहीं करती की आप कितना कमाते हैं या आपके पास कितना धन है…. प्रसन्नता उस धन के प्रयोग पर निर्भर करती है।
🔵 तो तुम इन चार आने का क्या-क्या कर लेते हो?, राजा ने उपहास के लहजे में प्रश्न किया।
🔴 किसान भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहता था उसने आगे बढ़ते हुए उत्तर दिया, इन चार आनो में से एक मैं कुएं में डाल देता हूँ, दुसरे से कर्ज चुका देता हूँ, तीसरा उधार में दे देता हूँ और चौथा मिटटी में गाड़ देता हूँ….
🔵 राजा सोचने लगा, उसे यह उत्तर समझ नहीं आया। वह किसान से इसका अर्थ पूछना चाहता था, पर वो जा चुका था।
🔴 राजा ने अगले दिन ही सभा बुलाई और पूरे दरबार में कल की घटना कह सुनाई और सबसे किसान के उस कथन का अर्थ पूछने लगा।
🔵 दरबारियों ने अपने-अपने तर्क पेश किये पर कोई भी राजा को संतुष्ट नहीं कर पाया, अंत में किसान को ही दरबार में बुलाने का निर्णय लिया गया।
🔴 बहुत खोज-बीन के बाद किसान मिला और उसे कल की सभा में प्रस्तुत होने का निर्देश दिया गया।
🔵 राजा ने किसान को उस दिन अपने भेष बदल कर भ्रमण करने के बारे में बताया और सम्मान पूर्वक दरबार में बैठाया।
🔴 मैं तुम्हारे उत्तर से प्रभावित हूँ, और तुम्हारे चार आने का हिसाब जानना चाहता हूँ; बताओ, तुम अपने कमाए चार आने किस तरह खर्च करते हो जो तुम इतना प्रसन्न और संतुष्ट रह पाते हो ? राजा ने प्रश्न किया।
🔵 किसान बोला, हुजूर, जैसा की मैंने बताया था, मैं एक आना कुएं में डाल देता हूँ, यानि अपने परिवार के भरण-पोषण में लगा देता हूँ, दुसरे से मैं कर्ज चुकता हूँ, यानि इसे मैं अपने वृद्ध माँ-बाप की सेवा में लगा देता हूँ, तीसरा मैं उधार दे देता हूँ, यानि अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में लगा देता हूँ, और चौथा मैं मिटटी में गाड़ देता हूँ, यानि मैं एक पैसे की बचत कर लेता हूँ ताकि समय आने पर मुझे किसी से माँगना ना पड़े और मैं इसे धार्मिक, सामजिक या अन्य आवश्यक कार्यों में लगा सकूँ।
🔴 राजा को अब किसान की बात समझ आ चुकी थी। राजा की समस्या का समाधान हो चुका था, वह जान चुका था की यदि उसे प्रसन्न एवं संतुष्ट रहना है तो उसे भी अपने अर्जित किये धन का सही-सही उपयोग करना होगा।
🔵 मित्रों, देखा जाए तो पहले की अपेक्षा लोगों की आमदनी बढ़ी है पर क्या उसी अनुपात में हमारी प्रसन्नता भी बढ़ी है? पैसों के मामलों में हम कहीं न कहीं गलती कर रहे हैं, जिन्दगी को संतुलित बनाना ज़रूरी है और इसके लिए हमें अपनी आमदनी और उसके इस्तेमाल पर ज़रूर गौर करना चाहिए, नहीं तो भले हम लाखों रूपये कमा लें पर फिर भी प्रसन्न एवं संतुष्ट नहीं रह पाएंगे!
🔵 एक दिन भेष बदल कर राजा अपने राज्य की सैर पर निकला। घूमते- घूमते वह एक खेत के निकट से गुजरा , तभी उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी, किसान ने फटे-पुराने वस्त्र धारण कर रखे थे और वह पेड़ की छाँव में बैठ कर भोजन कर रहा था।
🔴 किसान के वस्त्र देख राजा के मन में आया कि वह किसान को कुछ स्वर्ण मुद्राएं दे दे ताकि उसके जीवन मे कुछ खुशियां आ पाये।
🔵 राजा किसान के सम्मुख जा कर बोला – मैं एक राहगीर हूँ, मुझे तुम्हारे खेत पर ये चार स्वर्ण मुद्राएँ गिरी मिलीं, चूँकि यह खेत तुम्हारा है इसलिए ये मुद्राएं तुम ही रख लो।
🔴 किसान – ना – ना सेठ जी, ये मुद्राएं मेरी नहीं हैं, इसे आप ही रखें या किसी और को दान कर दें, मुझे इनकी कोई आवश्यकता नहीं।
🔵 किसान की यह प्रतिक्रिया राजा को बड़ी अजीब लगी, वह बोला, धन की आवश्यकता किसे नहीं होती भला आप लक्ष्मी को ना कैसे कर सकते हैं?”
🔴 सेठ जी, मैं रोज चार आने कमा लेता हूँ, और उतने में ही प्रसन्न रहता हूँ…, किसान बोला।
🔵 क्या? आप सिर्फ चार आने की कमाई करते हैं, और उतने में ही प्रसन्न रहते हैं, यह कैसे संभव है! राजा ने अचरज से पुछा।
🔴 सेठ जी, किसान बोला, प्रसन्नता इस बात पर निर्भर नहीं करती की आप कितना कमाते हैं या आपके पास कितना धन है…. प्रसन्नता उस धन के प्रयोग पर निर्भर करती है।
🔵 तो तुम इन चार आने का क्या-क्या कर लेते हो?, राजा ने उपहास के लहजे में प्रश्न किया।
🔴 किसान भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहता था उसने आगे बढ़ते हुए उत्तर दिया, इन चार आनो में से एक मैं कुएं में डाल देता हूँ, दुसरे से कर्ज चुका देता हूँ, तीसरा उधार में दे देता हूँ और चौथा मिटटी में गाड़ देता हूँ….
🔵 राजा सोचने लगा, उसे यह उत्तर समझ नहीं आया। वह किसान से इसका अर्थ पूछना चाहता था, पर वो जा चुका था।
🔴 राजा ने अगले दिन ही सभा बुलाई और पूरे दरबार में कल की घटना कह सुनाई और सबसे किसान के उस कथन का अर्थ पूछने लगा।
🔵 दरबारियों ने अपने-अपने तर्क पेश किये पर कोई भी राजा को संतुष्ट नहीं कर पाया, अंत में किसान को ही दरबार में बुलाने का निर्णय लिया गया।
🔴 बहुत खोज-बीन के बाद किसान मिला और उसे कल की सभा में प्रस्तुत होने का निर्देश दिया गया।
🔵 राजा ने किसान को उस दिन अपने भेष बदल कर भ्रमण करने के बारे में बताया और सम्मान पूर्वक दरबार में बैठाया।
🔴 मैं तुम्हारे उत्तर से प्रभावित हूँ, और तुम्हारे चार आने का हिसाब जानना चाहता हूँ; बताओ, तुम अपने कमाए चार आने किस तरह खर्च करते हो जो तुम इतना प्रसन्न और संतुष्ट रह पाते हो ? राजा ने प्रश्न किया।
🔵 किसान बोला, हुजूर, जैसा की मैंने बताया था, मैं एक आना कुएं में डाल देता हूँ, यानि अपने परिवार के भरण-पोषण में लगा देता हूँ, दुसरे से मैं कर्ज चुकता हूँ, यानि इसे मैं अपने वृद्ध माँ-बाप की सेवा में लगा देता हूँ, तीसरा मैं उधार दे देता हूँ, यानि अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में लगा देता हूँ, और चौथा मैं मिटटी में गाड़ देता हूँ, यानि मैं एक पैसे की बचत कर लेता हूँ ताकि समय आने पर मुझे किसी से माँगना ना पड़े और मैं इसे धार्मिक, सामजिक या अन्य आवश्यक कार्यों में लगा सकूँ।
🔴 राजा को अब किसान की बात समझ आ चुकी थी। राजा की समस्या का समाधान हो चुका था, वह जान चुका था की यदि उसे प्रसन्न एवं संतुष्ट रहना है तो उसे भी अपने अर्जित किये धन का सही-सही उपयोग करना होगा।
🔵 मित्रों, देखा जाए तो पहले की अपेक्षा लोगों की आमदनी बढ़ी है पर क्या उसी अनुपात में हमारी प्रसन्नता भी बढ़ी है? पैसों के मामलों में हम कहीं न कहीं गलती कर रहे हैं, जिन्दगी को संतुलित बनाना ज़रूरी है और इसके लिए हमें अपनी आमदनी और उसके इस्तेमाल पर ज़रूर गौर करना चाहिए, नहीं तो भले हम लाखों रूपये कमा लें पर फिर भी प्रसन्न एवं संतुष्ट नहीं रह पाएंगे!
👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 4)
👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴 जब लक्ष्मण जी को रामचंद्र जी के साथ भेजने के लिए सुमित्रा ने कहा जाओ बेटा रामचंद्र के साथ साथ जाओ और उनकी धर्मपत्नी ने कहा कि तुम जाओ रामचंद्र जी के साथ साथ जाओ। रामचंद्र जी को वनवास हुआ था लक्ष्मण जी को कहाँ हुआ था लेकिन लक्ष्मण जी भी चले गये कैसे चले गये। सुमित्रा ने कह दिया था और उनकी पत्नी उर्मिला ने कह दिया था। अरे बड़ी खराब थी उनकी धर्मपत्नी और बड़ी खराब थी उनकी माँ अपने बेटे को भेज दिया और राक्षसों की लड़ाई में मारे जाते तो रामचंद्र जी मारे जाते सीता जी को जाना है वनवास तो पिताजी की आज्ञा उनके लिए हुई है लक्ष्मण जी के लिए थोड़े हुई है। लेकिन नहीं लक्ष्मण जी गये। नफा हुआ कि नुकसान हुआ। बताइये। उस समय तो नुकसान हुआ अरे भाई तुमको भेजा नहीं गया तुम बेकार राक्षसों के बीच जा रहे हो जंगल में जा रहे हो भूखे मरने के लिये जा रहे हो नुकसान की बात बताई थी उन्हें हाँ नुकसान की बात थी। पर वास्तव में नुकसान हुआ नहीं वास्तव में नुकसान नहीं हुआ।
🔵 हमारे बारे में भी यही हुआ। हमारे बारे में जब हमारे गुरुजी का साक्षात्कार हुआ। उन्होंने यह कहा कि तुमको हमारे कहने पर चलना चाहिये। सब जितने भी हमारे मिलने वाले थे घर वाले थे जितने भी कुटुम्बी थे सब नाराज हो गये सबने कहा बड़ा बेअकल आदमी है बेवकूफ आदमी है किसने कहा है हमने कहा हमारे पूर्व जन्मों के गुरु आये हैं उन्होंने कहा है। अरे कोई सपना देखा है, पागल हो गया है, इसका दिमाग खराब हो गया है ताले में बंद कर दिया पर जिस आदमी ने हमसे कहा था हमारे फायदे के लिये कहा था कि नुकसान के लिए कहा था। फायदे के लिए कहा था। जब आये थे वह साठ वर्ष पहले की घटना को जब मैं याद करता हूँ और इस समय जब अंदाज लगाता हूँ तो मालूम पड़ता है कि नुकसान की बात नहीं कही थी उन्होंने फायदे की बात कही थी।
🔴 जहाँ इस समय हम आज है उसका और जब १५ वर्ष की उमर क्रम थे उस बच्चे का और इस समय का हमारा स्तर को आप मिलाकर देख लीजिये हमको सलाह मुनासिब दी गई थी कि गलत दी गई थी। नहीं गलत नहीं दी गई थी सलाह बहुत मुनासिब दी गई थी उस सलाह से हमारा फायदा हुआ उस समय मालूम पड़ता था कि नुकसान हो रहा है। २४ वर्ष तक खाना नहीं खाना पड़ेगा जौ की रोटी पर रहना पड़ेगा। यह करना पड़ेगा पढ़ाई लिखाई बंद करनी पड़ेगी यह करना पड़ेगा यह करना पड़ेगा। कितनी बातें बता दी लेकिन उस समय लोगों को मालूम पड़ता था कि नुकसान की बात बताई जा रही है लेकिन वास्तव में वह नुकसान की बात नहीं थी नफे की बात थी।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31.2
👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 32) 23 Jan
🌹 जप-यज्ञ के समय के वस्त्र
🔴 जप तथा यज्ञ में ऐसे वस्त्र धारण किये जाते हैं जो शरीर से अधिक चिपके नहीं। प्राण तत्व को भीतर खींचने और कल्मषों को बाहर निकालने की उस समय की प्रक्रिया में बाधा न पहुंचायें। प्राचीन काल में धोती और दुपट्टा—दो ही वस्त्र इन प्रयोजनों में काम आते थे। शरीर पर न्यूनतम वस्त्र रहें, जो रहें वे ढीले हों, वायु के आवागमन में बाधक न होते हों, वही उपासना के समय धारण करने योग्य माने गये हैं। यज्ञ में यह बात विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य है, क्योंकि अग्निहोत्र की उपयोगी ऊर्जा रोम छिद्रों के द्वारा भीतर प्रवेश करती है, त्वचा पर प्रभाव डालती है। उस गर्मी के भीतर प्रवेश करने पर भीतर से भाप, पसीना और साथ ही अनेक प्रकार की अशुद्धियां बाहर निकलती हैं। यदि कपड़े भारी, मोटे या कसे हुए रहेंगे तो उपरोक्त दोनों ही उद्देश्यों की पूर्ति में कठिनाई पड़ेगी और साधक घाटे में रहेगा।
🔵 धोती सबसे ढीला वस्त्र है। उससे लज्जा आच्छादन ठीक प्रकार होता है। कटि प्रदेश और जंघाएं लज्जा के अवयव माने गये हैं। वे पैजामे में भी उतनी अच्छी तरह नहीं ढकते जितना कि भारतीय संस्कृति के अनुसार आवश्यक है। इसी प्रकार पैजामे का कमरबन्द—नीचे की मुहरी, शरीर के साथ उसका चिपका रहना, यज्ञ के लाभों में बाधा उत्पन्न करता है। अधिक खुली हवा के आवागमन के अधिक अनुकूल होने के कारण धोती ही अधिक उपयुक्त है। भारतीय संस्कृति का यही प्रतीक परिधान भी है। जिसका अन्य समय में न सही धार्मिक कृत्यों में तो स्थान बना ही रहना चाहिए।
🔴 शरीर पर धारण किये जाने वाले वस्त्रों में कुर्ता सीधा, सरल, सादगी का प्रतीक एवं सस्ता है। वायु का आगमन निर्वाध रूप से होता रहे ऐसी ही उसकी बनावट है। भारत की सांस्कृतिक पोशाक की दृष्टि से भी कुर्ता ऐसा परिधान है जिसे धार्मिकता एवं सांस्कृतिक एकता के प्रतीक रूप में मान्यता मिल सकती है। वह आसानी से नित्य धोया जा सकने योग्य है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 जप तथा यज्ञ में ऐसे वस्त्र धारण किये जाते हैं जो शरीर से अधिक चिपके नहीं। प्राण तत्व को भीतर खींचने और कल्मषों को बाहर निकालने की उस समय की प्रक्रिया में बाधा न पहुंचायें। प्राचीन काल में धोती और दुपट्टा—दो ही वस्त्र इन प्रयोजनों में काम आते थे। शरीर पर न्यूनतम वस्त्र रहें, जो रहें वे ढीले हों, वायु के आवागमन में बाधक न होते हों, वही उपासना के समय धारण करने योग्य माने गये हैं। यज्ञ में यह बात विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य है, क्योंकि अग्निहोत्र की उपयोगी ऊर्जा रोम छिद्रों के द्वारा भीतर प्रवेश करती है, त्वचा पर प्रभाव डालती है। उस गर्मी के भीतर प्रवेश करने पर भीतर से भाप, पसीना और साथ ही अनेक प्रकार की अशुद्धियां बाहर निकलती हैं। यदि कपड़े भारी, मोटे या कसे हुए रहेंगे तो उपरोक्त दोनों ही उद्देश्यों की पूर्ति में कठिनाई पड़ेगी और साधक घाटे में रहेगा।
🔵 धोती सबसे ढीला वस्त्र है। उससे लज्जा आच्छादन ठीक प्रकार होता है। कटि प्रदेश और जंघाएं लज्जा के अवयव माने गये हैं। वे पैजामे में भी उतनी अच्छी तरह नहीं ढकते जितना कि भारतीय संस्कृति के अनुसार आवश्यक है। इसी प्रकार पैजामे का कमरबन्द—नीचे की मुहरी, शरीर के साथ उसका चिपका रहना, यज्ञ के लाभों में बाधा उत्पन्न करता है। अधिक खुली हवा के आवागमन के अधिक अनुकूल होने के कारण धोती ही अधिक उपयुक्त है। भारतीय संस्कृति का यही प्रतीक परिधान भी है। जिसका अन्य समय में न सही धार्मिक कृत्यों में तो स्थान बना ही रहना चाहिए।
🔴 शरीर पर धारण किये जाने वाले वस्त्रों में कुर्ता सीधा, सरल, सादगी का प्रतीक एवं सस्ता है। वायु का आगमन निर्वाध रूप से होता रहे ऐसी ही उसकी बनावट है। भारत की सांस्कृतिक पोशाक की दृष्टि से भी कुर्ता ऐसा परिधान है जिसे धार्मिकता एवं सांस्कृतिक एकता के प्रतीक रूप में मान्यता मिल सकती है। वह आसानी से नित्य धोया जा सकने योग्य है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 26) 23 Jan
🌹 उत्साह एवं सक्रियता चिरयौवन के मूल आधार
🔵 होमरूल लीग बनाते समय श्रीमती एनीबीसेण्ट की आयु 70 वर्ष की थी। उन्होंने 40 वर्ष की आयु के बाद ही सार्वजनिक क्षेत्र में पदार्पण किया था। इसी प्रकार 45 वर्ष की आयु के बाद राजनैतिक जीवन में प्रवेश करने वाले पं. मोतीलाल नेहरू 58 वर्ष की आयु में कांग्रेस के सभापति बने। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का प्रखर और सक्रिय जीवन 41 वर्ष की आयु के बाद ही आरम्भ हुआ।
🔴 यह तो खैर राजनैतिक जीवन से सम्बन्धित उदाहरण हैं और सामान्यतः समझा जाता है कि राजनीति बूढ़ों का खेल है। इस क्षेत्र में व्यक्ति युवावस्था में प्रवेश करे, तभी वृद्धावस्था तक पहुंचने तक सफलता मिलती है, ऐसी धारणा है। किन्तु और क्षेत्रों में भी ऐसे उदाहरण हैं जिनसे सिद्ध होता है कि प्रगति या सफलता का आयु से कोई सम्बन्ध नहीं है। वह किसी भी उम्र में पाई जा सकती है और वृद्धावस्था में अपने क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित करने वालों के तो ढेरों उदाहरण हैं। यूनानी नाटककार सोफोप्लीज ने 99 वर्ष की आयु में अपना प्रसिद्ध नाटक ‘आडीपस’ लिखा था। यद्यपि उन्होंने इसके पहले भी कई रचनायें लिखी थीं, पर जिन रचनाओं ने उन्हें साहित्यक जगत में प्रतिष्ठित किया वे सभी अस्सी वर्ष की आयु के बाद लिखी गई थीं।
🔵 अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध कवि मिल्टन 44 वर्ष की आयु में अन्धे हो गये थे। अन्धे होने के बाद उन्होंने सारा ध्यान साहित्य रचना पर केन्द्रित किया और पचास वर्ष की आयु में अपनी प्रसिद्ध कृति ‘पैराडाइज लास्ट’ लिखी। 62 वर्ष की आयु में उनकी एक और प्रसिद्ध कृति ‘पैराडाइज रीगेड’ प्रकाशित हुई। जर्मन कवि गेटे ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘‘फास्ट’’ 70 वर्ष की आयु में लिखी थी। 92 वर्ष का अमेरिकी दार्शनिक जॉनडेवी अपने क्षेत्र में अन्य सभी विद्वानों से अग्रणी था, उन्होंने दर्शन के क्षेत्र में 60 वर्ष की अवस्था में ही प्रवेश किया था।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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🔵 होमरूल लीग बनाते समय श्रीमती एनीबीसेण्ट की आयु 70 वर्ष की थी। उन्होंने 40 वर्ष की आयु के बाद ही सार्वजनिक क्षेत्र में पदार्पण किया था। इसी प्रकार 45 वर्ष की आयु के बाद राजनैतिक जीवन में प्रवेश करने वाले पं. मोतीलाल नेहरू 58 वर्ष की आयु में कांग्रेस के सभापति बने। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का प्रखर और सक्रिय जीवन 41 वर्ष की आयु के बाद ही आरम्भ हुआ।
🔴 यह तो खैर राजनैतिक जीवन से सम्बन्धित उदाहरण हैं और सामान्यतः समझा जाता है कि राजनीति बूढ़ों का खेल है। इस क्षेत्र में व्यक्ति युवावस्था में प्रवेश करे, तभी वृद्धावस्था तक पहुंचने तक सफलता मिलती है, ऐसी धारणा है। किन्तु और क्षेत्रों में भी ऐसे उदाहरण हैं जिनसे सिद्ध होता है कि प्रगति या सफलता का आयु से कोई सम्बन्ध नहीं है। वह किसी भी उम्र में पाई जा सकती है और वृद्धावस्था में अपने क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित करने वालों के तो ढेरों उदाहरण हैं। यूनानी नाटककार सोफोप्लीज ने 99 वर्ष की आयु में अपना प्रसिद्ध नाटक ‘आडीपस’ लिखा था। यद्यपि उन्होंने इसके पहले भी कई रचनायें लिखी थीं, पर जिन रचनाओं ने उन्हें साहित्यक जगत में प्रतिष्ठित किया वे सभी अस्सी वर्ष की आयु के बाद लिखी गई थीं।
🔵 अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध कवि मिल्टन 44 वर्ष की आयु में अन्धे हो गये थे। अन्धे होने के बाद उन्होंने सारा ध्यान साहित्य रचना पर केन्द्रित किया और पचास वर्ष की आयु में अपनी प्रसिद्ध कृति ‘पैराडाइज लास्ट’ लिखी। 62 वर्ष की आयु में उनकी एक और प्रसिद्ध कृति ‘पैराडाइज रीगेड’ प्रकाशित हुई। जर्मन कवि गेटे ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘‘फास्ट’’ 70 वर्ष की आयु में लिखी थी। 92 वर्ष का अमेरिकी दार्शनिक जॉनडेवी अपने क्षेत्र में अन्य सभी विद्वानों से अग्रणी था, उन्होंने दर्शन के क्षेत्र में 60 वर्ष की अवस्था में ही प्रवेश किया था।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 80)
🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना
🔴 9.बेटी को विदाई उपहार:- कन्या के माता-पिता अपनी बच्ची की विदाई के समय उसे कुछ कपड़ा, जेवर, बर्तन, फर्नीचर, मिठाई पैसा आदि दें तो वह लड़की का विशुद्ध रूप से ‘‘स्त्री-धन’’ माना जाय। उसका न तो कोई प्रदर्शन हो और न लेखा-जोखा।
🔵 बाप-बेटी के व्यक्तिगत स्नेह सौजन्य एवं विदाई उपहार से ससुराल वालों को जरा भी दिलचस्पी नहीं लेनी चाहिए। यह विशुद्ध रूप से बाप-बेटी के बीच का मामला है। उसमें औरों के दखल देने या नुक्ताचीनी करने की कोई आवश्यकता नहीं है। साधारणतया रस्म के रूप में नाक और कान के छोटे दो जेवर ही लड़की को उसके अभिभावकों के द्वारा विवाह समय पर दिए जाने चाहिए। ताकि नकदी के रूप से हटकर जेवर के रूप में दहेज का पिशाच फिर नया रूप बना कर सामने न आ खड़ा हो। बाप यदि अपनी बेटी को कुछ अधिक देना चाहता है तो वह विवाह संस्कार के एक-दो महीने बाद दें और ससुराल वाले स्त्री-धन के रूप में उसे लड़की के पास ही रहने दें। उसे बहू से मांगना, बच्चों के पैसे छीनने जैसा निष्ठुर कृत्य माना जायगा।
🔴 10. लड़की का स्त्री-धन:- पिता के यहां से जो कन्या को दिया गया है तथा ससुराल आने पर प्रत्येक सम्बन्धियों ने तथा सास-ससुर ने जो उपहार दिए हों वे वधू की सुरक्षित पूंजी माने जांय। उसे ससुराल वाले छीनने का लालच न करें।
🔵 ‘स्त्री-धन’ की एक छोटी पूंजी वधू के पास रहनी चाहिए जो किसी विशेष आपत्ति के समय काम आ सके या उसके बुढ़ापे तक बनी रहे सके। इस पावन पूंजी का स्वामित्व लड़की का ही हो और उसी के संरक्षण में ही रहे। अच्छा हो उसे लम्बे समय के सार्टीफिकेटों में लगा दिया जाय जिससे ब्याज भी बढ़ती रहे। जेवर कपड़ों का उपहार देने की अपेक्षा दोनों पक्ष के लोग नव वधू को कुछ धन दें और उसे उसकी सुरक्षित पूंजी बना दें। विवाह के समय मिला हुआ यह उपहार लड़की के उत्साह बढ़ाने का एक अच्छा माध्यम हो सकता है। यथा शक्ति हर विवाह में यह किया जाय। पर इसका कोई दिखावा या शर्त न हो। वरना यह भी दहेज का ही एक दूसरा रूप बन जायगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔴 9.बेटी को विदाई उपहार:- कन्या के माता-पिता अपनी बच्ची की विदाई के समय उसे कुछ कपड़ा, जेवर, बर्तन, फर्नीचर, मिठाई पैसा आदि दें तो वह लड़की का विशुद्ध रूप से ‘‘स्त्री-धन’’ माना जाय। उसका न तो कोई प्रदर्शन हो और न लेखा-जोखा।
🔵 बाप-बेटी के व्यक्तिगत स्नेह सौजन्य एवं विदाई उपहार से ससुराल वालों को जरा भी दिलचस्पी नहीं लेनी चाहिए। यह विशुद्ध रूप से बाप-बेटी के बीच का मामला है। उसमें औरों के दखल देने या नुक्ताचीनी करने की कोई आवश्यकता नहीं है। साधारणतया रस्म के रूप में नाक और कान के छोटे दो जेवर ही लड़की को उसके अभिभावकों के द्वारा विवाह समय पर दिए जाने चाहिए। ताकि नकदी के रूप से हटकर जेवर के रूप में दहेज का पिशाच फिर नया रूप बना कर सामने न आ खड़ा हो। बाप यदि अपनी बेटी को कुछ अधिक देना चाहता है तो वह विवाह संस्कार के एक-दो महीने बाद दें और ससुराल वाले स्त्री-धन के रूप में उसे लड़की के पास ही रहने दें। उसे बहू से मांगना, बच्चों के पैसे छीनने जैसा निष्ठुर कृत्य माना जायगा।
🔴 10. लड़की का स्त्री-धन:- पिता के यहां से जो कन्या को दिया गया है तथा ससुराल आने पर प्रत्येक सम्बन्धियों ने तथा सास-ससुर ने जो उपहार दिए हों वे वधू की सुरक्षित पूंजी माने जांय। उसे ससुराल वाले छीनने का लालच न करें।
🔵 ‘स्त्री-धन’ की एक छोटी पूंजी वधू के पास रहनी चाहिए जो किसी विशेष आपत्ति के समय काम आ सके या उसके बुढ़ापे तक बनी रहे सके। इस पावन पूंजी का स्वामित्व लड़की का ही हो और उसी के संरक्षण में ही रहे। अच्छा हो उसे लम्बे समय के सार्टीफिकेटों में लगा दिया जाय जिससे ब्याज भी बढ़ती रहे। जेवर कपड़ों का उपहार देने की अपेक्षा दोनों पक्ष के लोग नव वधू को कुछ धन दें और उसे उसकी सुरक्षित पूंजी बना दें। विवाह के समय मिला हुआ यह उपहार लड़की के उत्साह बढ़ाने का एक अच्छा माध्यम हो सकता है। यथा शक्ति हर विवाह में यह किया जाय। पर इसका कोई दिखावा या शर्त न हो। वरना यह भी दहेज का ही एक दूसरा रूप बन जायगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 31)
🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह
🔴 मनोरंजन के लिए एक पन्ना भी नहीं पढ़ा है। अपने विषय में मानों प्रवीणता की उपाधि प्राप्त करनी हो-ऐसी तन्मयता से पढ़ा है। इसलिए पढ़े हुए विषय मस्तिष्क में एकीभूत हो गए। जब भी कोई लेख लिखते थे, या पूर्व वार्तालाप में किसी गंभीर विषय पर चर्चा करते थे, तो पढ़े हुए विषय अनायास ही स्मरण हो आते थे। लोग पीठ पीछे कहते हैं- ‘‘यह तो चलता फिरता एनसाइक्लोपीडिया है।’’ अखण्ड ज्योति पत्रिका के लेख पढ़ने वाले उसमें इतने संदर्भ पाते हैं कि लोग आश्चर्यचकित होकर रह जाते हैं और सोचते हैं कि एक लेख के लिए न जाने कितनी पुस्तकों और पत्रिकाओं से सामग्री इकट्ठी करके लिखा गया है। यही बात युग निर्माण योजना, युग शक्ति पत्रिका के बारे में है, पर सच बात इतनी ही है कि हमने जो भी पढ़ा है, उपयोगी पढ़ा है और पूरा मन लगाकर पढ़ा है। इसलिए समय पर सारे संदर्भ अनायास ही स्मृति पटल पर उठ आते हैं। यह वस्तुतः हमारी तन्मयता से की गई साधना का चमत्कार है।
🔵 जन्मभूमि के गाँव में प्राथमिक पाठशाला थी। सरकारी स्कूल की दृष्टि से इतना ही पढ़ा है। संस्कृत हमारी वंश परम्परा में घुसी हुई है। पिताजी संस्कृत के असाधारण प्रकाण्ड विद्वान थे। भाई भी। सबकी रुचि भी उसी ओर थी। फिर हमारा पैतृक व्यवसाय पुराणों की कथा कहना तथा पौरोहित्य रहा है, सो उस कारण उसका भी समुचित ज्ञान हो गया। आचार्य तक के विद्यार्थियों को हमने पढ़ाया है, जबकि हमारी स्वयं की डिग्रीधारी योग्यता नहीं थी।
🔴 इसके बाद अन्य भाषाओं के पढ़ने की कहानी मनोरंजक है। जेल में लोहे के तसले पर कंकड़ की पेंसिल से अँग्रेजी लिखना प्रारंभ किया। एक दैनिक अंक ‘‘लीडर’’ अख़बार का जेल में हाथ लग गया था। उसी से पढ़ना शुरू किया। साथियों से पूछताछ कर लेते, इस प्रकार एक वर्ष बाद जब जेल से छूटे जो अँग्रेजी की अच्छी-खासी योग्यता उपलब्ध हो गई। आपसी चर्चा से हर बार की जेलयात्रा में अँग्रेजी का शब्दकोश हमारा बढ़ता ही चला गया एवं क्रमशः व्याकरण भी सीख ली। बदले में हमने उन्हें संस्कृत एवं मुहावरों वाली हिंदुस्तानी भाषा सिखा दी। अन्य भाषाओं की पत्रिकाएँ तथा शब्दकोश अपने आधार रहे हैं और ऐसे ही रास्ता चलते अन्यान्य भाषाएँ पढ़ ली हैं। गायत्री को बुद्धि की देवी कहा जाता है। दूसरों को वैसा लाभ मिला या नहीं, पर हमारे लिए यह चमत्कारी लाभ प्रत्यक्ष है। अखण्ड-ज्योति की संस्कृतनिष्ठ हिंदी ने हिंदी प्राध्यापकों तक का मार्गदर्शन किया है। यह हम जब देखते हैं, तो उस महाप्रज्ञा को ही इसका श्रेय देते हैं। अति व्यस्तता रहने पर भी विज्ञ की ज्ञान की विभूति इतनी मात्रा में हस्तगत हो गई, जिसमें हमें परिपूर्ण संतोष होता है और दूसरों को आश्चर्य।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/diye.3
🔴 मनोरंजन के लिए एक पन्ना भी नहीं पढ़ा है। अपने विषय में मानों प्रवीणता की उपाधि प्राप्त करनी हो-ऐसी तन्मयता से पढ़ा है। इसलिए पढ़े हुए विषय मस्तिष्क में एकीभूत हो गए। जब भी कोई लेख लिखते थे, या पूर्व वार्तालाप में किसी गंभीर विषय पर चर्चा करते थे, तो पढ़े हुए विषय अनायास ही स्मरण हो आते थे। लोग पीठ पीछे कहते हैं- ‘‘यह तो चलता फिरता एनसाइक्लोपीडिया है।’’ अखण्ड ज्योति पत्रिका के लेख पढ़ने वाले उसमें इतने संदर्भ पाते हैं कि लोग आश्चर्यचकित होकर रह जाते हैं और सोचते हैं कि एक लेख के लिए न जाने कितनी पुस्तकों और पत्रिकाओं से सामग्री इकट्ठी करके लिखा गया है। यही बात युग निर्माण योजना, युग शक्ति पत्रिका के बारे में है, पर सच बात इतनी ही है कि हमने जो भी पढ़ा है, उपयोगी पढ़ा है और पूरा मन लगाकर पढ़ा है। इसलिए समय पर सारे संदर्भ अनायास ही स्मृति पटल पर उठ आते हैं। यह वस्तुतः हमारी तन्मयता से की गई साधना का चमत्कार है।
🔵 जन्मभूमि के गाँव में प्राथमिक पाठशाला थी। सरकारी स्कूल की दृष्टि से इतना ही पढ़ा है। संस्कृत हमारी वंश परम्परा में घुसी हुई है। पिताजी संस्कृत के असाधारण प्रकाण्ड विद्वान थे। भाई भी। सबकी रुचि भी उसी ओर थी। फिर हमारा पैतृक व्यवसाय पुराणों की कथा कहना तथा पौरोहित्य रहा है, सो उस कारण उसका भी समुचित ज्ञान हो गया। आचार्य तक के विद्यार्थियों को हमने पढ़ाया है, जबकि हमारी स्वयं की डिग्रीधारी योग्यता नहीं थी।
🔴 इसके बाद अन्य भाषाओं के पढ़ने की कहानी मनोरंजक है। जेल में लोहे के तसले पर कंकड़ की पेंसिल से अँग्रेजी लिखना प्रारंभ किया। एक दैनिक अंक ‘‘लीडर’’ अख़बार का जेल में हाथ लग गया था। उसी से पढ़ना शुरू किया। साथियों से पूछताछ कर लेते, इस प्रकार एक वर्ष बाद जब जेल से छूटे जो अँग्रेजी की अच्छी-खासी योग्यता उपलब्ध हो गई। आपसी चर्चा से हर बार की जेलयात्रा में अँग्रेजी का शब्दकोश हमारा बढ़ता ही चला गया एवं क्रमशः व्याकरण भी सीख ली। बदले में हमने उन्हें संस्कृत एवं मुहावरों वाली हिंदुस्तानी भाषा सिखा दी। अन्य भाषाओं की पत्रिकाएँ तथा शब्दकोश अपने आधार रहे हैं और ऐसे ही रास्ता चलते अन्यान्य भाषाएँ पढ़ ली हैं। गायत्री को बुद्धि की देवी कहा जाता है। दूसरों को वैसा लाभ मिला या नहीं, पर हमारे लिए यह चमत्कारी लाभ प्रत्यक्ष है। अखण्ड-ज्योति की संस्कृतनिष्ठ हिंदी ने हिंदी प्राध्यापकों तक का मार्गदर्शन किया है। यह हम जब देखते हैं, तो उस महाप्रज्ञा को ही इसका श्रेय देते हैं। अति व्यस्तता रहने पर भी विज्ञ की ज्ञान की विभूति इतनी मात्रा में हस्तगत हो गई, जिसमें हमें परिपूर्ण संतोष होता है और दूसरों को आश्चर्य।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/diye.3
👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 31)
🌞 हिमालय में प्रवेश
सीधे और टेड़े पेड़
🔵 रास्ते भर चीड़ और देवदारु के पेड़ों का सघन वन पार किया। यह पेड़ कितने सीधे और ऊंचाई तक बढ़ते चले गये हैं उन्हें देखकर प्रसन्नता होती है। कोई-कोई पेड़ पचास फुट तक ऊंचे होंगे। सीधे ऐसे चले गये हैं मानो ढाल कर लट्ठे गाढ़ दिये हैं। मोटाई और मजबूती भी काफी है।
🔴 इनके अतिरिक्त तेवार, दादरा, पिनखू आदि के टेढ़े-मेढ़े पेड़ भी बहुत हैं जो चारों ओर छितराये हुए हैं इनकी बहुत डालियां फूटती हैं और सभी पतली रहती हैं। इनमें से कुछ को छोड़कर शेष ईंधन के काम आते हैं। ठेकेदार लोग इन्हें जलाकर कोयला भी बना ले जाते हैं यह पेड़ जगह तो बहुत घेरते हैं पर उपयोग इनका साधारण है। चीड़ और देवदारु से जिस प्रकार इमारती और फर्नीचर का काम होता है वैसा इन टेड़े तिरछे पेड़ों से बिलकुल भी नहीं होता। इसलिये इनकी कोई पूछ भी नहीं करता, मूल्य भी इनका बहुत सस्ता होता है।
🔵 देखता हूं जो पेड़ लम्बे गये हैं उनने इधर-उधर शाखायें नहीं फोड़ी हैं, ऊपर को एक ही दिशा में सीधे बढ़ते गये हैं। इधर-उधर मुड़ना इनने नहीं सीखा। शक्ति को एक ही दिशा में लगाये रहने से ऊंचे उठते रहना स्वाभाविक भी है। चीड़ और देवदारु के पेड़ों ने यही नीति अपनाई है, वे अपनी इस नीति की सफलता का गर्वोन्नत मस्तक से घोषणा कर रहे हैं। दूसरी ओर वे टेड़े तिरछे पेड़ हैं जिनका मन अस्थिर चित्त चंचल रहा। एक ओर टिका ही नहीं, विभिन्न दिशाओं का स्वाद चखना चाहा और यह देखना चाहा कि देखें किस दिशा में ज्यादा मजा है, किधर जल्दी सफलता मिलती है। इस चंचलता में उन्होंने अनेक दिशाओं में अपने को बांटा, अनेक अनेक शाखायें फोड़ी। छोटी-छोटी टहनियों से उनका कलेवर फूल गया, वे प्रसन्न भी हुए कि हमारी इतनी शाखायें हैं इतना फैलाव-फुलाव है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
सीधे और टेड़े पेड़
🔵 रास्ते भर चीड़ और देवदारु के पेड़ों का सघन वन पार किया। यह पेड़ कितने सीधे और ऊंचाई तक बढ़ते चले गये हैं उन्हें देखकर प्रसन्नता होती है। कोई-कोई पेड़ पचास फुट तक ऊंचे होंगे। सीधे ऐसे चले गये हैं मानो ढाल कर लट्ठे गाढ़ दिये हैं। मोटाई और मजबूती भी काफी है।
🔴 इनके अतिरिक्त तेवार, दादरा, पिनखू आदि के टेढ़े-मेढ़े पेड़ भी बहुत हैं जो चारों ओर छितराये हुए हैं इनकी बहुत डालियां फूटती हैं और सभी पतली रहती हैं। इनमें से कुछ को छोड़कर शेष ईंधन के काम आते हैं। ठेकेदार लोग इन्हें जलाकर कोयला भी बना ले जाते हैं यह पेड़ जगह तो बहुत घेरते हैं पर उपयोग इनका साधारण है। चीड़ और देवदारु से जिस प्रकार इमारती और फर्नीचर का काम होता है वैसा इन टेड़े तिरछे पेड़ों से बिलकुल भी नहीं होता। इसलिये इनकी कोई पूछ भी नहीं करता, मूल्य भी इनका बहुत सस्ता होता है।
🔵 देखता हूं जो पेड़ लम्बे गये हैं उनने इधर-उधर शाखायें नहीं फोड़ी हैं, ऊपर को एक ही दिशा में सीधे बढ़ते गये हैं। इधर-उधर मुड़ना इनने नहीं सीखा। शक्ति को एक ही दिशा में लगाये रहने से ऊंचे उठते रहना स्वाभाविक भी है। चीड़ और देवदारु के पेड़ों ने यही नीति अपनाई है, वे अपनी इस नीति की सफलता का गर्वोन्नत मस्तक से घोषणा कर रहे हैं। दूसरी ओर वे टेड़े तिरछे पेड़ हैं जिनका मन अस्थिर चित्त चंचल रहा। एक ओर टिका ही नहीं, विभिन्न दिशाओं का स्वाद चखना चाहा और यह देखना चाहा कि देखें किस दिशा में ज्यादा मजा है, किधर जल्दी सफलता मिलती है। इस चंचलता में उन्होंने अनेक दिशाओं में अपने को बांटा, अनेक अनेक शाखायें फोड़ी। छोटी-छोटी टहनियों से उनका कलेवर फूल गया, वे प्रसन्न भी हुए कि हमारी इतनी शाखायें हैं इतना फैलाव-फुलाव है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
शनिवार, 21 जनवरी 2017
👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 15) 22 Jan
🌹 त्रिविध भवबन्धन एवं उनसे मुक्ति
🔴 अधिक कमाया जा सकता है, पर उसमें से निजी निर्वाह में सीमित व्यय करके शेष बचत को गिरों को उठाने, उठों को उछालने और सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन में लगाया जाना चाहिये। राजा जनक जैसे उदाहरणों की कमी नहीं। मितव्ययी अनेक दुर्व्यसनों और अनाचारों से बचता है। ऐसी हविश उसे सताती नहीं जिसके लिये अनाचार पर उतारू होना पड़े। साधु-ब्राह्मणों की यही परम्परा रही है। सज्जनों की शालीनता भी उसी आधार पर फलती-फूलती रही है। जीवन साधना के उस प्रथम अवरोध ‘लोभ’ को नियन्त्रित कराने वाला दृष्टिकोण हर जीवन साधना के साधक को अपनाना ही चाहिये।
🔵 मोह वस्तुओं से भी होता है और व्यक्तियों से भी। छोटे दायरे में आत्मीयता सीमाबद्ध करना ही मोह है। उसके रहते हृदय की विशालता चरितार्थ ही नहीं होती। अपना शरीर और परिवार ही सब कुछ दिखाई पड़ता है। उन्हीं के लिये मरने-खपने के कुचक्र में फँसे रहना पड़ता है। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के दो आत्मवादी सिद्धान्त हैं। इनमें से एक को भी ‘मोहग्रस्त’ कार्यान्वित नहीं कर सकता। इसलिये अपने में सबको और सबमें अपने को देखने की दृष्टि विकसित करना जीवन साधना के लिये आवश्यक माना गया है।
🔴 परिवार छोटे से छोटा रखा जाय। पूर्ववर्ती अभिभावकों, बड़ों और आश्रितों के ऋणों को चुकाने की ही व्यवस्था नहीं बन पाती तो नये अतिथियों को क्यों न्यौत बुलाया जाय? समय की विषमता को देखते हुए अनावश्यक बच्चे उत्पन्न कर परिवार का भार बढ़ाना परले सिरे की भूल है। समान विचारों का साथी-सहयोगी मिले तो विवाह करने में हर्ज नहीं, पर वह एक दूसरे की सहायता सेवा करते हुए प्रगतिपथ पर अग्रसर होने के लिये ही किया जाना चाहिये। जिन्हें सन्तान की बहुत ललक हो, वे निर्धनों के बच्चे पालने के लिये ले सकते हैं। परिवार को स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाना पर्याप्त है। औलाद के लिये विपुल सम्पदा उत्तराधिकार में छोड़ मरने की भूल किसी को नहीं करनी चाहिये। मुफ्त का माल किसी को भी हजम नहीं होता। वह दुर्बुद्धि और दुर्गुण ही उत्पन्न करता है। सन्तान पर यह भार लदेगा तो उसका अपकार ही होगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 बोले हुए शब्द वापस नहीं आते
🔴 एक बार एक किसान ने अपने पडोसी को भला बुरा कह दिया, पर जब बाद में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह एक संत के पास गया. उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा।
🔵 संत ने किसान से कहा, तुम खूब सारे पंख इकठ्ठा कर लो, और उन्हें शहर के बीचो-बीच जाकर रख दो किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुंच गया।
🔴 तब संत ने कहा, अब जाओ और उन पंखों को इकठ्ठा कर के वापस ले आओ।
🔵 किसान वापस गया पर तब तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे. और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा. तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है, तुम आसानी से इन्हें अपने मुख से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते।
🔴 कुछ कड़वा बोलने से पहले ये याद रखें कि भला-बुरा कहने के बाद कुछ भी कर के अपने शब्द वापस नहीं लिए जा सकते. हाँ, आप उस व्यक्ति से जाकर क्षमा ज़रूर मांग सकते हैं, और मांगनी भी चाहिए, पर मानवीय स्वभाव कुछ ऐसा होता है की कुछ भी कर लीजिये इंसान कहीं ना कहीं दुखी हो ही जाता है।
🔵 मित्रों जब आप किसी को बुरा कहते हैं तो वह उसे कष्ट पहुंचाने के लिए होता है पर बाद में वो आप ही को अधिक कष्ट देता है. खुद को कष्ट देने से क्या लाभ, इससे अच्छा तो है की चुप रहा जाए।
🔵 संत ने किसान से कहा, तुम खूब सारे पंख इकठ्ठा कर लो, और उन्हें शहर के बीचो-बीच जाकर रख दो किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुंच गया।
🔴 तब संत ने कहा, अब जाओ और उन पंखों को इकठ्ठा कर के वापस ले आओ।
🔵 किसान वापस गया पर तब तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे. और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा. तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है, तुम आसानी से इन्हें अपने मुख से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते।
🔴 कुछ कड़वा बोलने से पहले ये याद रखें कि भला-बुरा कहने के बाद कुछ भी कर के अपने शब्द वापस नहीं लिए जा सकते. हाँ, आप उस व्यक्ति से जाकर क्षमा ज़रूर मांग सकते हैं, और मांगनी भी चाहिए, पर मानवीय स्वभाव कुछ ऐसा होता है की कुछ भी कर लीजिये इंसान कहीं ना कहीं दुखी हो ही जाता है।
🔵 मित्रों जब आप किसी को बुरा कहते हैं तो वह उसे कष्ट पहुंचाने के लिए होता है पर बाद में वो आप ही को अधिक कष्ट देता है. खुद को कष्ट देने से क्या लाभ, इससे अच्छा तो है की चुप रहा जाए।
👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 31) 22 Jan
🌹 अखण्ड जप करें—अखण्ड यज्ञ नहीं
🔴 वस्तुतः तांत्रिक ‘मख’ रात्रि के सुनसान वातावरण में श्मशान, खण्डहर जैसे वीभत्स स्थानों में करने की विधि-व्यवस्था है। यज्ञ वैदिक होते हैं और ‘मख’ तांत्रिक। मख कृत्यों में अभक्ष और अस्पर्श्य जैसे पदार्थ भी होमे जाते हैं। उनका दृश्य कुरुचिपूर्ण होता है। इसलिए उन्हें अविज्ञात, एकान्त एवं निस्तब्ध वातावरण में सम्पन्न किया जाता है। निशाचरी कृत्य तमोगुणी प्रधान एवं अनैतिक होते हैं। उन्हें गुह्य ही रखा जाता है। प्रकट होने पर विरोध-विग्रह का ही डर रहता है। हिंसा-अहिंसा का भी उसमें ध्यान नहीं रखा जाता है। अतएव होलिका दहन, चिता प्रज्वलन जैसे मख-कृत्यों को छोड़कर रात्रि के समय देव-यज्ञ नहीं किये जाते। प्रचलन फैल जाने के कारण विवाह संस्कार ही इसका अपवाद है। यों उनमें भी गोधुलि बेला का मुहूर्त उत्तम माना गया है।
🔵 अखण्ड-जप रखना ही पर्याप्त है। अखण्ड यज्ञ का अत्युत्साह न दिखाया जाय। घृतदीप और अगरबत्ती जलाते रहने से हवन की संक्षिप्त प्रक्रिया पूरी होती रह सकती है। अखण्ड जप के साथ ही चौबीस घण्टे घृतदीप जलाने और धूपबत्ती प्रज्वलित करने की व्यवस्था बना दी जाय तो प्रकारान्तर से ही अखण्ड यज्ञ की विधि भी भाव दृष्टि से पूरी हो सकती है। यज्ञ दिन में ही किये जायें।
🔴 अखण्ड जप की एक पद्धति 24 घण्टा जप की है। दूसरी सूर्योदय से सूर्यास्त तक जप जारी रखने की भी है। उसे भी अखण्ड संज्ञा दी जानी चाहिए। सविता की उपस्थिति में वाचिक और व्यवस्थित जप ही यदि अभीष्ट हों तो 24 घण्टे के स्थान पर सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक भी सामूहिक जप किया जा सकता है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 25) 22 Jan
🌹 उत्साह एवं सक्रियता चिरयौवन के मूल आधार
🔵 प्रगति की आकांक्षा किसे नहीं होती? प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्थिति से असन्तुष्ट रहता है और उससे आगे बढ़कर उन्नत स्थिति को प्राप्त करना चाहता है। बहुत से इसके लिए प्रयास भी करते हैं और अनेकों सफल भी होते हैं। कारण संकल्प का अभाव, प्रयत्नों में प्रखरता की कमी और तत्परता का न होना। बहुत से व्यक्ति युवावस्था में बड़े जोश-खरोश के साथ अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते हैं, किन्तु थोड़े से प्रयत्न करने के बाद ही निराश हो जाते हैं। बहुतों की स्थिति ऐसी होती है, प्रयत्न और संघर्ष करते-करते युवावस्था बीत जाती है और वे अपने आपको वृद्ध समझकर हार थककर बैठ जाते।
🔴 वृद्धावस्था क्या सचमुच जीवन की सन्ध्या बेला है? इस प्रश्न का उत्तर उनके लिए ‘‘हां’’ में ही होता है किन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। बहुत से व्यक्तियों ने जिसे वृद्धावस्था कहते हैं। इस उम्र तक सामान्य जीवन बिताया और उसके बाद उनमें प्रगति के लिए ऐसी उदात्त आकांक्षा उत्पन्न हुई कि उसके बाद अपने प्रखर प्रयत्नों से उन्नति के उच्च शिखर पर पहुंचे। संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान श्रीपाद दामोदर सातवलेकर 60 वर्ष की आयु तक एक पाठशाला में ड्रॉइंग पढ़ाते थे। रिटायर होने के बाद उन्होंने संस्कृत सीखी और संस्कृत भाषा के क्षेत्र में इतना काम किया कि देखने वाले दंग रह गये। वेदों का शुद्ध पाठ तैयार करने से लेकर भारतीय संस्कृति का प्रगतिशील स्वरूप प्रतिपादित करने तक के क्षेत्र में उन्होंने इतनी सफलता अर्जित की कि आज भी जहां संस्कृत के सम्बन्ध में कहीं कोई मतभेद उठता है तो उसके समाधान और निराकरण के लिए सातवलेकर के ग्रन्थों को ही आधार माना जाता है।
🔵 महात्मा गांधी ने 45 वर्ष की अवस्था तक सामान्य जीवन जिया और इसके बाद वे एक क्रान्तिकारी सन्त के स्वरूप में उभरकर सामने आये। दादा भाई नौरोजी ने 50 वर्ष की आयु में अपना राजनैतिक जीवन आरम्भ किया तथा 60 वर्ष की आयु में पहली बार बम्बई कौंशिल के सदस्य चुने गये। 61 वर्ष की अवस्था में वे कांग्रेस के सभापति बने। गोपालकृष्ण गोखले ने 40 वर्ष की आयु में ‘भारत सेवक समाज’ की स्थापना की थी। लोकमान्य तिलक ने यद्यपि 33 वर्ष की आयु में अपना राजनैतिक जीवन आरम्भ किया था किन्तु उनकी गतिविधियां 1905 में ही अधिक सक्रिय हुई तब उनकी आयु 50 वर्ष थी। उसी समय उन्होंने गरम दल की स्थापना की थी।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞 🌿🌞 🌿🌞
👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 3)
🔴 अच्छा हनुमान् जी की बात मालूम है आपको कि नहीं मालूम हनुमान् जी को रामचंद्र जी ने कहा कि हमारे साथ- साथ चलो हमारा कुछ काम करो हनुमान् जी को फायदा हुआ कि नुकसान हुआ। क्या हुआ रामचंद्र जी की सीता जी से क्या रिश्ता रामचंद्र जी से क्या रिश्ता और उनके साथ जाने में जहाँ नौकरी का सवाल नहीं और सारी जिंदगी भर जब वह सयाने हो गये थे बड़े हो गये थे ब्याह होने दिया न शादी होने दी न अच्छे कपड़े पहनने दिये और रामचंद्र जी उनको ले गये। नुकसान किया कि नफा किया। नुकसान किया।
🔵 किसी से पूछा रीछ बंदरों से क्यों भाई कहाँ जा रहे हो वहाँ जा रहे हैं रामचंद्र जी के यहाँ जा रहे हैं क्यों। क्या बात है रामचंद्र जी के यहाँ रामचंद्र जी स्त्री धर्मपत्नी को चोरी हो गई है और उनको हम तलाश करेंगे रावण से लड़ेंगे। अरे मरेगा क्या बेवकूफ किसने पट्टी पढ़ा दी है मालूम यह पड़ता है कि नुकसान की बात बताई जा रही है लेकिन क्या वास्तव में नुकसान की बात थी नहीं नुकसान की बात नहीं थी अगर नुकसान की बात रही होती तो हनुमान् जी ने समुद्र को छलांग कैसे लिया और पहाड़ उखाड़कर के कैसे ले आये और रामचंद्र जी को और लक्ष्मण जी को कंधे पर रखकर कैसे फिरे। लंका जलाने में समर्थ कैसे हुए।
🔴 नुकसान था नुकसान नहीं था हनुमान् जी बहुत बड़े हो गये नहीं तो बंदर होते बंदर देखे हैं न आपने मदारियों के यहाँ नाचते रहते हैं बंदर आ जाते हैं तो कहते हैं मारो बंदर को भगाओ बंदर को। बंदर रह जाते लेकिन दूर की बात उनको दिखाई पड़ी कि नई इसमें मेरा लाभ है रामचंद्र जी के कहने में। उन्होंने देखा रामचंद्र जी वजनदार आदमी हैं। समझदार आदमी है। विश्वामित्र जी के बारे मे यही सोचा गया कि विश्वामित्र समझदार आदमी हैं बेअकल नहीं है बेवकूफ नहीं है हमारे बच्चों को ले जा रहे हैं तो मारने के लिए नहीं ले जा रहे हैं किसी बड़े काम के लिए ले जा रहे हैं। इस तरीके से ले गये लेकिन उस समय उनको नुकसान मालूम पड़ा था। बहुतों को मालूम पड़ा होगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026
शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...


















