रविवार, 8 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 2) 9 Jan

🌹 अध्यात्म तत्त्वज्ञान का मर्म जीवन साधना

🔴 अति निकट और अति दूर की उपेक्षा करना मानव का सहज स्वभाव है। यह उक्ति जीवन सम्पदा के हर क्षेत्र में लागू होती है। जीवन हम हर घड़ी जीते हैं, पर न तो उसकी गरिमा समझते और न यह सोच पाते हैं कि इसके सदुपयोग से क्या-क्या सिद्धियाँ उपलब्ध हो सकती हैं। प्राणी जन्म लेता और पेट प्रजनन की, प्राकृतिक उत्तेजनाओं से विक्षुब्ध होकर, निर्वाह की जरूरतें पूरी करते हुए दम तोड़ देता है। ऐसे क्षण कदाचित ही कभी आते हैं, जब यह सोचा जाता हो कि स्रष्टा की तिजोरी का सर्वोपरि उपहार मनुष्य जीवन है। जिसे अनुग्रहपूर्वक यह जीवन दिया गया है, उससे यह आशा की गई है कि वह उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करेगा।          

🔵 अपनी अपूर्णता पूरी करके तुच्छ से महान बनेगा, साथ ही विश्व उद्यान को कुशल माली की तरह सींचते-सँजोते यह सिद्ध करेगा कि उसे स्वार्थ और परमार्थ के सही रूप का ज्ञान है। स्वार्थ इसमें है कि पशु प्रवृत्तियों की कुसंस्कारिता से पीछा छुड़ायें और सत्प्रवृत्तियों की आवश्यक मात्रा में अवधारणा करते हुए उस परीक्षा में उत्तीर्ण हों, जो धरोहर का सदुपयोग कर सकने के रूप में सामने प्रस्तुत हुई है। जो उसमें उत्तीर्ण होता है, वह देवमानव की कक्षा में प्रवेश करता है। अपना ही भला नहीं करता, असंख्यों को अपनी नाव में बिठाकर पार करता है। ऐसों को ही अभिनन्दनीय, अनुकरणीय महामानव कहा जाता है। तृप्ति, तुष्टि, शान्ति के त्रिविध आनन्द ऐसों को ही मिलते हैं।  

🔴 मनुष्य जीवन दिव्य सत्ता की एक बहुमूल्य धरोहर है, जिसे सौंपते समय उसकी सत्पात्रता पर विश्वास किया जाता है। मनुष्य के साथ यह पक्षपात नहीं है, वरन् ऊँचे अनुदान देने के लिये यह प्रयोग-परीक्षण है। अन्य जीवधारी शरीर भर की बात सोचते और क्रिया करते हैं, किन्तु मनुष्य को स्रष्टा का उत्तराधिकारी युवराज होने के नाते अनेकानेक कर्तव्य और उत्तरदायित्व निभाने पड़ते हैं। उसी में उसकी गरिमा और सार्थकता है। यदि पेट प्रजनन तक, लोभ-मोह तक उसकी गतिविधियाँ सीमित रहें तो उसे नरपशु के अतिरिक्त और क्या कहा जायेगा?

🔵 लोभ-मोह के साथ अहंकार और जुड़ जाने पर तो बात और भी अधिक बिगड़ती है। महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिये उभरी अहंमन्यता अनेक प्रकार के कुचक्र रचती और पतन-पराभव के गर्त में गिरती है। अहन्ता से प्रेरित व्यक्ति अनाचारी बनता है और आक्रामक भी। ऐसी दशा में उसका स्वरूप और भी भयंकर हो जाता है। दुष्ट दुरात्मा एवं नर-पिशाच स्तर की आसुरी गतिविधियाँ अपनाता है। इस प्रकार मनुष्य जीवन जहाँ श्रेष्ठ सौभाग्य का प्रतीक था, वहाँ वह दुर्भाग्य और दुर्गति का कारण ही बनता है। इसी को कहते हैं-वरदान को अभिशाप बना लेना। दोनों ही दिशायें हर किसी के लिये खुली हैं। जो इनमें से जिसे चाहता है, उसे चुन लेता है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप जो है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 18) 9 Jan

🌹 गायत्री मंत्र कीलित है?

🔴 गायत्री उपासना के दो मार्ग हैं एक देव-मार्ग, दूसरा दैत्य-मार्ग। एक को वैदिक, दूसरे को तांत्रिक कहते हैं। तंत्र-शास्त्र का हर मंत्र कीलित है—अर्थात् प्रतिबंधित है। इस प्रतिबन्ध को हटाये बिना वे मंत्र काम नहीं करते। बन्दूक का घोड़ा जाम कर दिया जाता है, तो उसे दबाने पर भी कारतूस नहीं चलता। मोटर की खिड़की ‘लौक’ कर देने पर वह तब तक नहीं खुलती जब तक उसका ‘लौक’ न हटा दिया जाय। तांत्रिक मंत्रों में विद्यातक शक्ति भी होती है। उसका दुरुपयोग करने पर प्रयोक्ता को तथा अन्यान्यों को हानि उठानी पड़ सकती है। अनधिकारी कुपात्र व्यक्तियों के हाथ में यदि महत्वपूर्ण क्षमता आ जाय तो वे आग के साथ खेलने वाले बालकों की तरह उसे नाश का निमित्त बना सकते हैं।

🔵 इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए भगवान शंकर ने समस्त तांत्रिक मंत्रों को कीलित कर दिया है। उत्कीलन होने पर ही वे अपना प्रभाव दिखा सकते हैं। तांत्रिक सिद्धि-साधनाओं में उत्कीलन आवश्यक है। यह कृत्य अनुभवी गुरु द्वारा सम्पन्न होता है। किसी रोगी को—क्या औषधि—किस मात्रा में देनी चाहिए उसका निर्धारण कुशल चिकित्सक रोगी की स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन करने के उपरान्त ही करते हैं। यही बात मंत्र-साधना के सम्बन्ध में भी है। किस साधक को—किस मंत्र का उपयोग—किस कार्य के लिए—किस प्रकार करना चाहिए, इसका निर्धारण ही उत्कीलन है।

🔴 यों प्रत्येक तंत्र-विधान का एक उत्कीलन प्रयोग भी है। ‘दुर्गा सप्तशती’ का पाठ आरम्भ करने से पूर्व कवच, कीलन, अर्गल अध्यायों का अतिरिक्त पाठ करना होता है। साधना के समय होने वाले आक्रमणों से सुरक्षा के लिए कवच, मंत्र सुषुप्त शक्ति को प्रखर करने के लिए कीलक एवं सिद्धि के द्वार पर चढ़ी हुई अर्गला—सांकल—को खोलने के लिए ‘अर्गल’ की प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है। ‘दुर्गा सप्तशती’ पाठ की तरह अन्यान्य तंत्र-प्रयोगों में भी अपने-अपने ढंग से कवच, कीलक, अर्गल करने होते हैं। इनमें से कीलक का विशेष महत्व है। वही प्रख्यात भी है। इसलिए उत्कीलन उपचार के लिए अनुभवी मार्गदर्शक की सहायता प्राप्त करने के उपरान्त ही अपने पथ पर अग्रसर होते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 66)

🌹 बौद्धिक क्रान्ति की तैयारी

🔴 मनुष्य शरीर में विचार ही प्रधान हैं। भावनाओं के अनुरूप ही मनुष्य का व्यक्तित्व उठता-गिरता है। वैयक्तिक जीवन की समस्त असुविधाओं और कुण्ठाओं का प्रधान कारण विचारणा का दोषयुक्त होना ही होता है। सामाजिक समस्याएं और कठिनाइयां भी जन-मानस के नीचे-ऊंचे होने पर ही उलझती-सुलझती हैं। नव-निर्माण का आधार भी विचार स्तर को ऊंचा उठाया जाना ही हो सकता है। ज्ञान से ही मुक्ति मिलती है। विवेक से ही कल्याण होता है। भावना से ही यह जड़, जगत, चेतन, ब्रह्म का मंगलमय स्वरूप परिलक्षित होने लगता है।

🔵 धरती पर स्वर्ग का अवतरण— नव-युग का आगमन बौद्धिक क्रान्ति के द्वारा ही सम्भव होगा। जन-समाज की विचारधारा को आकांक्षाओं और आदर्शों को बदल देने से युग परिवर्तन स्वयमेव उपस्थित हो जाता है। भौतिकवाद से मुंह मोड़कर यदि हम आध्यात्मिक आदर्शों को अपनालें तो मनुष्य की स्थिति देवताओं जैसी दिव्य बन सकती है और वह हर घड़ी स्वर्गीय सुख का आनंद लेता रह सकता है।

🔴 बौद्धिक क्रान्ति के लिए (1) लेखनी (2) वाणी और (3) प्रक्रिया के तीन ही माध्यम होते हैं। युग-निर्माण योजना अपने साधनों के अनुरूप इन तीनों ही माध्यमों को कार्यान्वित कर रही है। ‘‘अखण्ड-ज्योति’’ मासिक पत्रिका विचार क्रान्ति के सारे ढांचे प्रस्तुत करती रहती है और ‘‘युग-निर्माण योजना’’ पाक्षिक के द्वारा उन विचारों को कार्यान्वित किये जाने का व्यवहारिक मार्ग दर्शन होता रहता है। सिद्धान्त और कार्यक्रम—थ्योरी और प्रेक्टिस—का प्रयोजन यह दोनों पत्रिकाएं जिस सुन्दर ढंग से पूर्ण कर रही हैं उससे लाखों व्यक्ति चमत्कृत, प्रभावित, उत्साहित और कर्मरत हुए हैं।

🔵 इन्हें नियमित रूप से पढ़ने वाले ही योजना के सदस्य होते हैं। इन दो उपकरणों के माध्यम से उनका व्यक्तित्व एवं मानसिक स्तर इतना ऊंचा उठा है कि उसे देखते हुए हमें प्रस्तुत योजना बना डालने और उसे उसकी सफलता पर पूर्ण विश्वास करने का साहस हो सकता है। नव-निर्माण की दिशा में यह दो माध्यम ऐतिहासिक भूमिका उपस्थित कर रहे हैं। एक शब्द में यों भी कहा जा सकता है कि योजना शरीर के अन्तर्गत श्वास प्रश्वास की क्रिया इन्हीं दो नासारंध्रों से होती है। इन्हें ही उसका जीवन प्राण एवं मेरुदण्ड कहना चाहिये। इन्हीं से पाठकों का यह परिवार बना है। उन्हीं को सदस्य मानकर शाखा संगठनों के आगे बढ़ाया जा रहा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 12) 9 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये

🔵 प्रतिकूलताओं के इस अन्धकार से निकलने के बाद जीवन का जो अनुभव होता है, उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए किसी शायर ने लिखा है—
 ‘‘गर्दिशे अय्याम तेरा शुक्रिया,हमने हर पहलू से दुनिया देख ली।’’

🔴 जीवन में एक रास्ता न आये, अनेक अनुभव प्राप्त हों इसके लिए परिस्थितियों का अदलना-बदलना आवश्यक है। यदि सदा अनुकूलता ही बनी रहे तो फिर ढर्रे का जीवन जीने वाले लोग गुणों की दृष्टि से पिछड़े ही पड़े रहेंगे और उन्हें विकास की, परिश्रम पुरुषार्थ की आवश्यकता ही अनुभव नहीं होगी। इस प्रकार के अगणित तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सृष्टा ने इस दुनिया में अनुकूलता और प्रतिकूलता उत्पन्न की है। अनुकूल स्थिति से लाभ उठाकर हम अपने सुविधा साधनों को बढ़ायें और प्रतिकूलता के पत्थर से घिसकर अपनी प्रतिभा पैनी करें, यही उचित है और उपयुक्त भी।

🔵 कई व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों में अपना सन्तुलन खो बैठते हैं और वे बेहिसाब दुखी रहने लगते हैं। एक बार प्रयत्न करने पर भी कष्ट दूर नहीं हुआ या सफलता नहीं मिली तो वे निराश होकर बैठ जाते हैं। कई व्यक्ति इससे भी आगे बढ़े-चढ़े होते हैं और बैठे-ठाले भविष्य में विपत्ति आने की शंका करते रहते हैं। यही नहीं होता कि प्रस्तुत असुविधा या प्रतिकूलताओं के समाधान का पुरुषार्थ करें या उपाय सोचें। उल्टे इसके विपरीत वे चिन्ता, भय, निराशा, आशंका और उद्विग्नता जैसी उलझनें खड़ी करके अपने को उसमें फंसा लेते हैं और खुद ही नई विपत्ति गढ़कर खड़ी कर लेते हैं। इस वैभव के अवसाद प्रभावों और हानियों को समय रहते समझ लेना चाहिए ताकि इस दलदल में फंसने की विपत्ति से बचा जा सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 18)


🌞 जीवन के सौभाग्य का सूर्योदय
🔴 उस दिन मैंने एक और नई बात समझी कि सिद्ध पुरुषों की अनुकम्पा मात्र लोक-हित के लिए, सत्प्रवृत्ति-संवर्धन के निमित्त होती है। उनका न कोई सगा सम्बन्धी होता है न उदासीन विरोधी। किसी को ख्याति, सम्पदा या कीर्ति दिलाने के लिए उनकी कृपा नहीं बरसती। विराट ब्रह्म-विश्व मानव ही उनका आराध्य होता है। उसी के निमित्त अपने स्वजनों को वे लगाते हैं, अपनी इस नवोदित मान्यता के पीछे रामकृष्ण-विवेकानन्द का, समर्थ रामदास-शिवाजी का, चाणक्य-चंद्रगुप्त का, गाँधी-बिनोवा का, बुद्ध-अशोक का गुरु-शिष्य सम्बन्ध स्मरण हो आया।

🔵 जिनकी आत्मीयता में ऐसा कुछ न हो, सिद्धि-चमत्कार, कौतुक-कौतूहल, दिखाने या सिखाने का क्रिया-कलाप चलता रहा हो, समझना चाहिए कि वहाँ गुरु और शिष्य की क्षुद्र प्रवृत्ति है और जादूगर-बाजीगर जैसा कोई खेल-खिलवाड़ चल रहा है। गंध-बाबा चाहे जिसे सुगंधित फूल सुँघा देते थे। बाघ बाबा-अपनी कुटी में बाघ को बुलाकर बिठा लेते थे। समाधि बाबा कई दिन तक जमीन में गड़े रहते थे। सिद्ध बाबा-आगंतुकों की मनोकामना पूरी करते थे। ऐसी-ऐसी जनश्रुतियाँ भी दिमाग में घूम गईं और समझ में आया कि यदि इन घटनाओं के पीछे मेस्मेरिज्म स्तर की जादूगरी थी, तो महान् कैसे हो सकते हैं? ठण्डे प्रदेश में गुफा में रहना जैसी घटनाएँ भी कौतूहल वर्धक ही है।  स्वयं सेवक की तरह काम करते रहने के लिए कहा।

🔴 जो काम साधारण आदमी न कर सके, उसे कोई एक करामात की तरह कर दिखाए तो इसमें कहने भर की सिद्धाई है। मौन रहना, हाथ पर रखकर भोजन करना, एक हाथ ऊपर रखना, झूले पर पड़े-पड़े समय गुजारना जैसे असाधारण करतब दिखाने वाले बाजीगर सिद्ध हो सकते हैं, पर यदि कोई वास्तविक सिद्ध या शिष्य होगा, तो उसे पुरातन काल के, लोक मंगल के लिए जीवन उत्सर्ग करने वाले ऋषियों के राजमार्ग पर चलना पड़ा होगा। आधुनिक काल में भी विवेकानन्द, दयानन्द, कबीर, चैतन्य, समर्थ की तरह उस मार्ग पर चलना पड़ा होगा। भगवान् अपना नाम जपने मात्र से प्रसन्न नहीं होते, न उन्हें पूजा-प्रसाद आदि की आवश्यकता है।

🔵 जो उनके इस विश्व उद्यान को सुरम्य, सुविकसित करने में लगते हैं, उन्हीं का नाम-जप सार्थक है। यह विचार मेरे मन में उसी वसंत पर्व के दिन, दिन-भर उठते रहे, क्योंकि उनने स्पष्ट कहा था कि ‘‘पात्रता में जो कमी है, उसे पूरा करने के साथ-साथ लोकमंगल का कार्य भी साथ-साथ करना है। एक के बाद दूसरा नहीं दोनों साथ-साथ।’’ चौबीस वर्ष पालन करने योग्य नियम बताए, साथ ही स्वतंत्रता संग्राम में एक सच्चे स्वयं सेवक की तरह काम करते रहने के लिए कहा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 18)

🌞  हिमालय में प्रवेश

ठण्डे पहाड़ के गर्म सोते

🔵 जो पर्वत अपनी शीतलता को अक्षुण्य बनाए रहना चाहते हैं उन्हें इस प्रकार की गन्धक जैसी विषैली पर्तो को बाहर निकाल फेंकना चाहिए। एक दूसरा कारण इन तप्त कुण्डों का और भी हो सकता है कि शीतल पर्वत अपने भीतर के इस विकार को निकाल- निकाल कर बाहर फेंक रहा हो और अपनी दुर्बलता को छिपाने की अपेक्षा सबके सामने प्रकट कर रहा हो- जिससे उसे कपटी और ढोंगी न कहा जा सके। दुर्गुणों का होना बुरी बात है, पर उन्हें छिपाना उससे भी बुरा हैं- इस तथ्य को यह पर्वत जानते हैं यदि मनुष्य भी इसे जान लेता तो कितना अच्छा होता।

🔴 यह समझ में आता है वि हमारे जैसे ठंडे स्नान से खिन्न व्यक्तियों की गरम जल से स्नान कराने की सुविधा और आवश्यकता का ध्यान रखते हुए पर्वत ने अपने भीतर बची थोड़ी गर्मी को बाहर निकालकर रख दिया हो। बाहर से तो वह भी ठण्डा हो चला, फिर भीतर कुछ गर्मी बच गई होगी। पर्वत सोचता होगा जब सारा ही ठण्डा हो चला तो इस थोडी- सी गमीं को बचाकर ही क्या करूँगा, इसे भी क्यों न जरूरतमन्दों को दे डालूँ। उस आत्मदानी पर्वत की तरह कोई व्यक्ति भी ऐसे हो सकतें हैं जो स्वयं अभावग्रस्त, कष्टसाध्य जीवन व्यतीत करते हों और इतने पर भी जो शक्ति बची हो उसे भी जनहित में लगाकर इन तप्त कुण्डों का आदर्श उपस्थित करें।

🔵 इस शीतप्रदेश का वह तप्त कुण्ड भुलाये नहीं भूलेगा। मेरे जैसे हजारों यात्री उसका गुणगान करते रहेंगे, उसमे त्याग भी तो असाधारण है। स्वयं ठण्डे रहकर दूसरों के लिए गर्मी प्रदान करना भूखे रहकर दूसरों की रोटी जुटाने के समान है। सोचता हूँ बुद्धिहीन जड़- पर्वत जब इतना कर सकता है तो क्या बुद्धिमान् बनने वाले मनुष्य को केवल स्वाथीं ही रहना चाहिए?    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 17)

🌞  हिमालय में प्रवेश

ठण्डे पहाड़ के गर्म सोते

🔵 कई दिन से शरीर को सुन्न कर देने वाले बर्फीले ठण्डे पानी से स्नान करते आ रहे थे। किसी प्रकार हिम्मत बाँधकर एक- दो डुबकी तो लगा लेते थे, पर जाड़े के मारे शरीर को ठीक तरह रगड़ना और उस तरह स्नान करना नहीं बन पड़ रहा था जैसा देह की सफाई की दृष्टि से आवश्यक हैं। आगे जगननी चट्टी पर पहुँचे, तो पहाड़ के ऊपर वाले तीन तप्त कुण्डों का पता चला जहाँ से गरम पानी निकलता है। ऐसा सुयोग पाकर मल- मलकर स्नान करने की इच्छा प्रबल हो गई। गंगा का पुल पार कर ऊँची चढ़ाई की टेकरी को कई जगह बैठ- बैठकर हाँफते- हाँफते पार किया और तप्त कुण्डों पर जा पहुँचे।

🔴 बराबर- बराबर तीन कुण्ड थे, एक का पानी इतना गरम था कि उसमें नहाना तो दूर, हाथ दे सकना भी कठिन था। बताया गया कि यदि चावल दाल की पोटली बाँधकर इस कुण्ड में डाल दी जाय तो वह खिचड़ी कुछ देर में पक जाती है। यह प्रयोग तो हम न कर सके पर पास वालें दूसरे कुण्ड में जिसका पानी सदा गरम रहता है, खूब मल- मलकर स्नान किया और हफ्तों की अधूरी आकांक्षा पूरी की, कपड़े भी गरम पानी से खूब धुले, अच्छे साफ हुए।    

🔵 सोचता हूँ कि पहाडो़ं पर बर्फ गिरती रहती है और छाती में से झरने वाले झरने सदा बर्फ सा ठण्डा जल प्रवाहित ही करते हैं उनमें कही- कहीं ऐसे उष्ण सोते क्यों फूट पड़ते हैं? मालूम होता है कि पर्वत के भीतर कोई गन्धक की परत है वही अपने समीप से गजरने वाली जलधारा को असह्य उष्णता दे देती है। इसी तरह किसी सज्जन में अनेक शीतल शांतिदायक गुण होने से उसका व्यवहार ठण्डे सोतों की तरह शीतल हो सकता है, पर यदि दुर्बुद्धि की एक भी परत छिपी हो, तो उसकी गर्मी गरम स्रोतों की तरह बाहर फूट पड़ती है और वह छिपती नही।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 17)

🌞 जीवन के सौभाग्य का सूर्योदय

🔴 तुम्हारा विवाह हो गया सो ठीक हुआ। यह समय ऐसा है, जिसमें एकाकी रहने से लाभ कम और जोखिम अधिक है। प्राचीन काल में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य, गणेश, इन्द्र आदि सभी सपत्नीक थे। सातों ऋषियों की पत्नियाँ थीं, कारण कि गुरुकुल आरण्यक स्तर के आश्रम चलाने में माता की भी आवश्यकता पड़ती है और पिता की भी। भोजन, निवास, वस्त्र, दुलार आदि के लिए भी माता चाहिए और अनुशासन, अध्यापन, अनुदान पिता की ओर से ही मिलता है। गुरु ही पिता है और गुरु की पत्नी ही माता है, उसी ऋषि परम्परा के निर्वाह के लिए यह उचित भी है, आवश्यक भी।

🔵 आजकल भजन के नाम पर जिस प्रकार आलसी लोग संत का बाना पहनते और भ्रम जंजाल फैलाते हैं, तुम्हारे विवाहित होने से मैं प्रसन्न हूँ। इसमें बीच में व्यवधान तो आ सकता है, पर पुनः तुम्हें पूर्व जन्म में तुम्हारे साथ रही सहयोगिनी पत्नी के रूप में मिलेगी, जो आजीवन तुम्हारे साथ रहकर महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाहेगी। पिछले दो जन्मों में तुम्हें सपत्नीक रहना पड़ा है। यह न सोचना कि इससे कार्य में बाधा पड़ेगी। वस्तुतः इससे आज, परिस्थितियों में सुविधा ही रहेगी एवं युगपरिवर्तन के प्रयोजन में भी सहायता मिलेगी।’’

🔴 वह पावन दिन वसंत पर्व का दिन था। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त था। नित्य की तरह संध्या वंदन का नियम निर्वाह चल रहा था। प्रकाश पुंज के रूप में देवात्मा का दिव्य-दर्शन, उसी कौतूहल से मन में उठी जिज्ञासा और उसके समाधान का यह उपक्रम चल रहा था। नया भाव जगा उस प्रकाश पुंज से घनिष्ठ आत्मीयता का। उनकी महानता, अनुकम्पा और साथ ही अपनी कृतज्ञता का। इस स्थिति ने मन का कायाकल्प कर दिया था। कल तक जो परिवार अपना लगता था, वह पराया होने लगा और जो प्रकाश पुंज अभी-अभी सामने आया था, वह प्रतीत होने लगा कि मानों यही हमारी आत्मा है।

🔵 इसी के साथ हमारा भूतकाल बँधा हुआ था और अब जितने दिन जीना है, वह अधिक अवधि भी इसी के साथ जुड़ी रहेगी। अपनी ओर से कुछ कहना नहीं। कुछ चाहना नहीं, किंतु दूसरे का जो आदेश हो उसे प्राण-प्रण से पालन करना। इसी का नाम समर्पण है। समर्पण मैंने उसी दिन प्रकाश पुँज देवात्मा को किया और उन्हीं को न केवल मार्गदर्शक वरन् भगवान् के समतुल्य माना। उस सम्बन्ध निर्वाह को प्रायः साठ वर्ष से अधिक होने को आते हैं। बिना कोई तर्क बुद्धि लड़ाए, बिना कुछ नननुच किए, उनके इशारे पर एक ही मार्ग पर गतिशीलता होती रही है। सम्भव है या नहीं अपने बूते यह हो सकेगा या नहीं, इसके परिणाम क्या होंगे? इन प्रश्नों में से एक भी प्रश्न आज तक मन में उठा नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शनिवार, 7 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 1) 8 Jan

🌹 भूमिका

🔴 ईश्वर छोटी- मोटी भेंट- पूजाओं या गुणगान से प्रसन्न नहीं होता। ऐसी प्रकृति तो क्षुद्र लोगों की होती है। ईश्वर तो न्यायनिष्ठ और विवेकवान है। व्यक्तित्त्व में आदर्शवादिता का समावेश होने पर जो गरिमा उभरती है, उसी के आधार पर वह प्रसन्न होता और अनुग्रह बरसाता है।          

🔵 प्रतीक पूजा की अनेक विधियाँ हैं, उन सभी का उद्देश्य एक ही है, मनुष्य के विकारों को हटाकर, संस्कारों को उभारकर, दैवी अनुग्रह के अनुकूल बनाना।   

🔴 साधना से सिद्धि का सिद्धान्त सर्वमान्य है। प्रश्न है- साधना किसकी की जाय? उत्तर है- जीवन को ही देवता मानकर चला जाय। यह इस हाथ दे, उस हाथ ले का क्रम है। इसी आधार पर आत्मसन्तोष, लोक सम्मान और देव अनुग्रह जैसे अमूल्य अनुदान प्राप्त होते हैं। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Krantidharmi_shahitya/Jivan_Devata_Ki_Sadhana_Aaradhana

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 17) 8 Jan

🌹 साधना में त्रुटि

🔴 गायत्री उपासना के क्रिया-कृत्यों में कोई त्रुटि रहने पर किसी प्रकार के अनिष्ट की आशंका तो नहीं है? इस आशंका को मन से पूरी तरह निकाल देना चाहिए। सौम्य उपासना में ऐसा कोई खतरा नहीं है। गायत्री उपासना सौम्य स्तर की है। उसे मातृभक्ति के समतुल्य समझना चाहिए। माता से भी शिष्टाचार बरतना चाहिए, यह उचित है। पर किसी लोकाचार में कमी रह जाने पर भी संतान के मन में मातृभक्ति रहती है और माता के मन में वात्सल्य बना रहने पर किसी अप्रिय घटना की कोई सम्भावना नहीं है। माता के मन में बच्चों के प्रति जो असीम वात्सल्य रहता है उसे देखते हुए कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वे मात्र क्रिया-कृत्य में कोई भूल या कमी रहने पर अपने उपासक का कुछ अहित करने की बात सोचेंगी भी। त्रुटि रहने पर इतना ही हो सकता है कि सत्परिणाम में कुछ कमी रह जाय।

🔵 गीता के अनुसार सौम्य उपासना में ‘प्रत्यवाय’ अर्थात् उल्टा परिणाम कभी नहीं हो सकता। उसका थोड़ा-सा अवलम्बन भी ‘त्रायते महतो भयात्’ अर्थात् अनिष्ट से रक्षा करता है। भगवान का नाम रुग्ण अवस्था में, विस्तर पर, अशुद्ध स्थिति में पड़े हुए भी लेते रहते हैं। भगवान इतना निष्ठुर नहीं है कि भक्त की भावना का ध्यान न रखे और विधि-विधान में कोई कमी रह जाने से रुष्ट होकर अपने भक्तजनों की ही हानि करने पर उतारू हो जाय। ऐसा तो कोई सर्प, बिच्छु, सिंह, व्याघ्र ही कर सकता है—भक्त वत्सल भगवान नहीं।

🔴 यह आशंका तांत्रिक विधानों में गलती करने पर उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों की बात के आधार पर की गई है। तांत्रिक विधानों में भावना का उपयोग नहीं होता। वे भौतिक उद्देश्यों के लिए किये जाते हैं। उनमें शरीर की हठ-साधना और प्रयोग सामग्री के उपचार ही प्रधान होते हैं। एक प्रकार से उन्हें भौतिक क्रिया-कृत्य कह सकते हैं। तांत्रिक देवी-देवताओं की उपासना इसी स्तर की है। तेजाब के रख-रखाव में बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है, तनिक भी भूल होने से खतरे का डर रहता है। आग या बिजली के उपयोग में भी सावधानी न बरतने पर हानि हो सकती है। किन्तु गौदुग्ध के प्रयोग में कोई खतरा नहीं है। इसमें पूरे लाभ की सम्भावना है। किन्तु किसी को भी यह आशंका नहीं करनी चाहिए कि त्रुटि रहने पर माता के कोप का—प्रयोग के दुष्परिणाम का कोई संकट हो सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 11) 8 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये
 
🔵 यदि एक ही प्रकार की परिस्थितियां सदा बनी रहें तो यहां सभी कुछ रूखा और नीरस लगने लगेगा। सदा दिन ही रहे रात कभी न हो, सदा मिठाई ही खाने को मिले, नमकीन के दर्शन ही न हों, सबकी उम्र एक सी ही रहे, न कोई छोटा और न बड़ा हो, सर्दी या गर्मी की एक ऋतु रहे, दूसरी बदले ही नहीं तो फिर इस संसार की क्या सुन्दरता रह जायेगी? सारी शोभा-सुषमा ही नष्ट हो जायेगी। सदा प्रिय अनुकूल और सुखद परिस्थितियां ही बनी रहें, कभी अप्रिय और प्रतिकूल स्थिति न आये तो कुशलता, कर्मठता और सहकारिता की जरूरत ही न पड़ेगी। लोग आलसी, निकम्मा और नीरस जीवन जीते हुए किसी प्रकार मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहेंगे।

🔴 अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण सुविधायें उत्पन्न होना स्वाभाविक है। प्रश्न यह नहीं है कि उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है। महत्व पूर्ण तो यह है कि प्रतिकूलताओं और अनुकूलताओं के चढ़ाव-उतार से मनुष्य में कई ऐसे गुण उत्पन्न होते हैं जो उसके व्यक्तित्व की गरिमा को बढ़ाते हैं। प्रतिकूलताओं में पुरुषार्थ, साहस, धैर्य, सन्तुलन, दूरदर्शिता जैसे सद्गुणों का विकास होता है। बल्कि कहा जाना चाहिए कि इन्हीं परिस्थितियों में ये सद्गुण उत्पन्न होते हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि इन प्रतिकूलताओं में अपना सन्तुलन न खोया जाये। यदि सन्तुलन बना रहे तो जीवन के ऐसे विविध और उपयोगी अनुभव होते हैं जो व्यक्तित्व की शोभा-सुषमा में चार-चांद लगाते हैं। वे अनुभव व्यक्तित्व को गुण सम्पन्न-समृद्ध बनाते हैं।

🔵 प्रतिकूलताओं के सम्बन्ध में विधेयात्मक दृष्टि अपनाने की आवश्यकता और उपयोगिता बताते हुए किसी विचारक ने लिखा है, अगर कोई व्यक्ति अपने आपको अन्धेरे कमरे में बन्द करके यह सोचे कि प्रकाश का कोई अस्तित्व ही नहीं है तो यह उसकी भूल है। अन्धकार तो सिर्फ उसके छोटे कमरे में बन्द है बाहर उजाला ही उजाला है। बेहतर यह है कि आपने अपने इर्द-गिर्द भ्रम भ्रान्तियों की जो दीवारें खड़ी कर ली हैं, उन्हें गिराकर अंधेरे बन्द कमरे से बाहर निकलें और सर्वव्यापी प्रकाश से साक्षात्कार करें।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 65)

🌹 युग-निर्माण की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

🔴 99. अविच्छिन्न दान परम्परा— नित्य कुछ समय और कुछ धन परमार्थ कार्यों के लिये देते रहने का कार्यक्रम बनाना चाहिए। दान हमारे जीवन की एक अविच्छिन्न आध्यात्मिक परम्परा के रूप में चलता रहे। इस प्रकार अपनी आजीविका का एक अंश नियमित रूप से परमार्थ के लिये लगाया जाता रहे। इसके लिये कोई धर्मपेटी या धर्मघट में अन्न या पैसा डालते रहा जाय। यह धन केवल सद्भावना प्रसार के यज्ञ में ही खर्च हो, युग-निर्माण का आधार यही तो है।

इसी प्रकार धर्म प्रचार के लिये, जन सम्पर्क के लिये कुछ समय भी नित्य दिया जाय। नित्य न बन पड़े तो साप्ताहिक अवकाश के दिन अधिक समय दे करके दैनिक क्रम की पूर्ति की जाय। सद्भावनाओं के प्रसार और जागरण के लिए जन सम्पर्क ही प्रधान उपाय है। इसमें झिझक या संकोच करने की, अपमान अनुभव करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।

🔵 100. सत्याग्रही स्वयंसेवक सेना— सामाजिक कुरीतियों एवं नैतिक बुराइयों को मिटाने के लिये राग-द्वेष से रहित, संयमी, मधुर व्यवहार वाले और दृढ़ चरित्र व्यक्तियों की एक ऐसी सत्याग्रही सेना गठित की जानी है, जो दूसरों को बिना कष्ट पहुंचाये अपने ही त्याग, तप से बुराइयां छुड़ाने के लिये कष्ट सहने को तैयार हों। सत्याग्रह कहां, किस प्रकार किया जाय यह एक बहुत ही दूरदर्शिता का प्रश्न है। अन्यथा सुधार के स्थान पर द्वेष फैल सकता है। इन सब बातों का ध्यान रखते हुए सत्याग्रही स्वयंसेवक सेना का गठन और उसके द्वारा बुराइयों के उन्मूलन की व्यवस्था भी करनी ही पड़ेगी। इसके लिये उपयुक्त व्यक्तियों को अपना नाम स्वयं सेवकों की श्रेणी में लिखाना चाहिये। शक्ति को देखते हुये वैसे ही कार्यक्रम आरम्भ किये जावेंगे और पहले उन्हें प्रशिक्षित भी करना पड़ेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 10) 7 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये

🔵 जेम्स ऐलेन ने अपनी पुस्तक ‘फ्रॉम प्रॉपर्टी टू प्रॉस्पर्टी’ की शुरुआत इन पंक्तियों से की है, ‘वेदना दुख और अपवाद जीवन की परछाइयां हैं। संसार में एक भी हृदय ऐसा नहीं मिलेगा, जिसे दुःख ने स्पर्श न किया हो। एक भी मन ऐसा नहीं होगा जिस पर कोई न कोई घाव न लगा हो, एक भी आंख ऐसी नहीं होगी, जिसने कभी न कभी खून के आंसू न टपके हों। संसार में एक भी परिवार ऐसा नहीं है, जिसमें मृत्यु ने प्रवेश न किया हो और जो रोग और मृत्यु से त्रस्त न रहा हो, जिसने सगे-सम्बन्धियों का विछोह न देखा हो। बिल्ली जिस प्रकार चूहे को दबोचती है, दुख का मजबूत पंजा मनुष्य को उसी प्रकार अचानक आ दबोचता है। तो क्या दुःख और विषाद से बचने का कोई मार्ग नहीं?

🔴 क्या विपदा की जंजीरों को तोड़ फेंकने का कोई उपाय नहीं? क्या स्थाई समृद्धि शक्ति और आनन्द के स्वप्न देखना मूढ़ता पूर्ण है? नहीं मुझे यह कहते हुए हर्ष होता है कि विपदा को समाप्त कर देना सम्भव है। ऐसा एक उपाय, ऐसी एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा रोग दरिद्रता अथवा विपरीत परिस्थितियों को हमेशा के लिए समाप्त करके स्थाई समृद्धि लाई जा सकती है और मनुष्य विपदा तथा दरिद्रता के दोबारा लौट आने के भय से मुक्ति प्राप्त करके स्थाई आनन्द और शान्तिमय जीवन जी सकता है। ऐसे सुख और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करने का एक मात्र उपाय यह है कि मनुष्य दुःख के वास्तविक स्वरूप को भलीभांति समझ ले।

🔵 क्या है दुःख का वास्तविक स्वरूप? दुख और कुछ नहीं सुख के अभाव का ही नाम है। प्रकाश के अभाव का नाम अन्धकार है। प्रिय परिस्थितियां नहीं होतीं तो अप्रिय की अनुभूति होती है। अनुकूलता के अभाव में प्रतिकूलता भासती है। इन दोनों स्थितियों में सामंजस्य स्थापित किया जा सके तो प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्न और प्रफुल्ल रहा जा सकता है। प्रश्न उठता है कि यह सामंजस्य किस प्रकार स्थापित किया जाये? उत्तर एक ही है, तथ्यों के प्रति सन्तुलित और समझ पूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाय। यह मान्यता बनाकर चला जाये कि दिन और रात की तरह मनुष्य के जीवन में प्रिय और अप्रिय घटनाक्रम आते-जाते रहते हैं। इन उभयपक्षी अनुभूतियों से ही जीवन की सार्थकता और शोभा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 64)


🌹 युग-निर्माण की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

🔴 99. अविच्छिन्न दान परम्परा— नित्य कुछ समय और कुछ धन परमार्थ कार्यों के लिये देते रहने का कार्यक्रम बनाना चाहिए। दान हमारे जीवन की एक अविच्छिन्न आध्यात्मिक परम्परा के रूप में चलता रहे। इस प्रकार अपनी आजीविका का एक अंश नियमित रूप से परमार्थ के लिये लगाया जाता रहे। इसके लिये कोई धर्मपेटी या धर्मघट में अन्न या पैसा डालते रहा जाय। यह धन केवल सद्भावना प्रसार के यज्ञ में ही खर्च हो, युग-निर्माण का आधार यही तो है।

इसी प्रकार धर्म प्रचार के लिये, जन सम्पर्क के लिये कुछ समय भी नित्य दिया जाय। नित्य न बन पड़े तो साप्ताहिक अवकाश के दिन अधिक समय दे करके दैनिक क्रम की पूर्ति की जाय। सद्भावनाओं के प्रसार और जागरण के लिए जन सम्पर्क ही प्रधान उपाय है। इसमें झिझक या संकोच करने की, अपमान अनुभव करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।

🔵 100. सत्याग्रही स्वयंसेवक सेना— सामाजिक कुरीतियों एवं नैतिक बुराइयों को मिटाने के लिये राग-द्वेष से रहित, संयमी, मधुर व्यवहार वाले और दृढ़ चरित्र व्यक्तियों की एक ऐसी सत्याग्रही सेना गठित की जानी है, जो दूसरों को बिना कष्ट पहुंचाये अपने ही त्याग, तप से बुराइयां छुड़ाने के लिये कष्ट सहने को तैयार हों। सत्याग्रह कहां, किस प्रकार किया जाय यह एक बहुत ही दूरदर्शिता का प्रश्न है। अन्यथा सुधार के स्थान पर द्वेष फैल सकता है। इन सब बातों का ध्यान रखते हुए सत्याग्रही स्वयंसेवक सेना का गठन और उसके द्वारा बुराइयों के उन्मूलन की व्यवस्था भी करनी ही पड़ेगी। इसके लिये उपयुक्त व्यक्तियों को अपना नाम स्वयं सेवकों की श्रेणी में लिखाना चाहिये। शक्ति को देखते हुये वैसे ही कार्यक्रम आरम्भ किये जावेंगे और पहले उन्हें प्रशिक्षित भी करना पड़ेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 16)

🌞 जीवन के सौभाग्य का सूर्योदय
🔴 पूजा की कोठरी में प्रकाश-पुंज उस मानव ने कहा-‘‘तुम्हारा सोचना सही है। देवात्माएँ जिनके साथ सम्बन्ध जोड़ती हैं, उन्हें परखती हैं। अपनी शक्ति और समय खर्च करने से पूर्व कुछ जाँच-पड़ताल भी करती हैं। जो भी चाहे उसके आगे प्रकट होने लगे और उसका इच्छित प्रयोजन पूरा करने लगें, ऐसा नहीं होता। पात्र-कुपात्र का अंतर किए बिना चाहे जिसके साथ सम्बन्ध जोड़ना किसी बुद्धिमान और सामर्थ्यवान के लिए कभी कहीं सम्भव नहीं होता। कई लोग ऐसा सोचते तो हैं कि किसी सम्पन्न महामानव के साथ सम्बन्ध जोड़ने में लाभ है, पर यह भूल जाते हैं कि दूसरा पक्ष अपनी सामर्थ्य किसी निरर्थक व्यक्ति के निमित्त क्यों गँवाएँगे?’’

🔵 ‘‘हम सूक्ष्म दृष्टि से ऐसे सत्पात्र की तलाश करते रहे, जिसे सामयिक लोक-कल्याण का निमित्त कारण बनाने के लिए प्रत्यक्ष कारण बताएँ। हमारा यह सूक्ष्म शरीर है। सूक्ष्म शरीर से स्थूल कार्य नहीं बन पड़ते। इसके लिए किसी स्थूल शरीर धारी को ही माध्यम और शस्त्र की तरह प्रयुक्त करना पड़ता है। यह विषम समय है। इसमें मनुष्य का अहित होने की अधिक सम्भावनाएँ हैं। उन्हीं का समाधान करने के निमित्त तुम्हें माध्यम बनाना है। जो कमी है, उसे दूर करना है। अपना मार्गदर्शन और सहयोग देना है। इसी निमित्त तुम्हारे पास आना हुआ है। अब तक तुम अपने सामान्य जीवन से ही परिचित थे। अपने को साधारण व्यक्ति ही देखते थे। असमंजस का एक कारण यह भी है। तुम्हारी पात्रता का वर्णन करें, तो भी कदाचित तुम्हारा संदेह निवारण न हो। कोई किसी बात पर अनायास ही विश्वास करे, ऐसा समय भी कहाँ है? इसीलिए तुम्हें पिछले तीन जन्मों की जानकारी दी गई।’’

🔴 सभी पूर्व जन्मों का विस्तृत विवरण जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत तक का दर्शाने के बाद उन्होंने बताया कि किस प्रकार वे इन सभी में हमारे साथ रहे और सहायक बने।

🔵 वे बोले-‘‘यह तुम्हारा दिव्य जन्म है। तुम्हारे इस जन्म में भी सहायक रहेंगे और इस शरीर से वह कराएँगे, जो समय की दृष्टि से आवश्यक है, सूक्ष्म शरीरधारी प्रत्यक्ष जन-संपर्क नहीं कर सकते और न घटनाक्रम स्थूल शरीरधारियों द्वारा ही सम्पन्न होते हैं, इसलिए योगियों को उन्हीं का सहारा लेना पड़ता है।।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivana.2

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 16)

🌞  हिमालय में प्रवेश

पीली मक्खियाँ

🔵 पर इन बेचारी मक्खियों को ही क्यों कोसा जाये? उन्हीं को मूर्ख क्यों कहा जाये? जबकि आज हम मनुष्य भी इसी रास्ते पर चल रहे हैं। इस सृष्टि में जो विपुल उपभोग सामग्री परमात्मा ने पैदा की है, वह उसके सभी पुत्रों के लिए मिलकर- बाँटकर खाने और लाभ उठाने के लिए है पर हममें से हर कोई जितना हड़प सके, उतने पर कब्जा जमाने के लिए उतावला हो रहा है। यह भी नहीं सोचा जाता कि शरीर की कुटुम्ब की आवश्यकता थोड़ी ही है उतने तक सीमित रहें, आवश्यकता से अधिक वस्तुओं पर कब्जा जमाकर दूसरों को क्यों कठिनाई में डालें और क्यों मालिकी का व्यर्थ बोझ सिर पर लादे, जबकि उस मालिकी को देर तक अपने कब्जे में रख नहीं सकते। 

🔴 पीली मक्खियों की तरह मनुष्य भी अधिकार लिप्सा के स्वार्थ और संग्रह में अन्धा हो रहा है। मिल- बाँटकर खाने की नीति उसकी समझ में ही नहीं आती, जो कोई उसे अपने स्वार्थ में बाधक होते दीखता है, उसी पर आँखें दिखाता है, अपनी शक्ति प्रदर्शित करता है और पीली मक्खियों की तरह टूट पड़ता है, इससे उनके इस व्यवहार से कितना कष्ट होता है इसकी चिन्ता किसे है?  

🔵 पीली मक्खियाँ नन्हें- नन्हें डर मारकर आधा मील पीछा करके वापिस लौट गई, पर मनुष्य की अधिकार लिप्सा, स्वार्थपरता और अहंकार से उद्धत होकर किये जाने वाले आक्रमणों की भयंकरता को जब सोचता हूँ  तो बेचारी पीली मक्खियों को ही बुरा- भला कहने में जीभ सकुचाने लगती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/himalaya%20_me_pravesh/pili_makhiya

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 16) 7 Jan

🌹 गुरु की आवश्यकता

🔴 गायत्री को गुरु-मंत्र कहा गया है। इसका एक अर्थ यह भी है कि इसकी उच्च स्तरीय उपासना के लिए अनुभवी मार्गदर्शक एवं संरक्षक आवश्यक है। कुछ शिक्षाएं ऐसी होती हैं, जो पुस्तकों के सहारे एकाकी भी प्राप्त की जा सकती हैं। पर कुछ ऐसी होती हैं जिनमें अनुभवी व्यक्ति के सान्निध्य सहयोग एवं मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। संगीत, शिल्पकर्म, अक्षरारम्भ, उच्चारण जैसे कार्यों में दूसरों का प्रत्यक्ष सहयोग आवश्यक है। गायत्री-उपासना की नित्यकर्म विधि तो सरल है, किन्तु उच्चस्तरीय साधना में व्यक्ति की विशेष स्थिति के अनुरूप अनेकों उतार-चढ़ाव आते हैं और उसमें अनुभवी मार्गदर्शक की वैसी ही आवश्यकता रहती है जैसी कि रोग उपचार में चिकित्सक की। रोगी का अपने सम्बन्ध में लिया गया निर्णय प्रायः सही नहीं होता। इसलिए चिकित्सक का परामर्श एवं अनुशासन आवश्यक होता है। वही बात उपासना की उच्चस्तरीय प्रगति के सम्बन्ध में भी है।

🔵 गुरु की नियुक्ति अनिवार्य तो नहीं पर आवश्यक अवश्य है। इस आवश्यकता की पूर्ति मात्र उच्च चरित्र, साधन-विधान में निष्णान्त व्यक्ति ही कर सकते हैं। जब तक वैसा मार्गदर्शन न मिले तब तक प्रतीक्षा ही करनी चाहिए। उतावली में जिस-तिस को गुरु बना लेने से लाभ के स्थान पर हानि ही होती है। एक कक्षा पूरी करके दूसरी में प्रवेश करने पर नये अधिक अनुभवी अध्यापक के सम्पर्क में जाना पड़ता है।

🔴 इसी प्रकार सामान्य मंत्र दीक्षा लेते समय यदि सामान्य स्तर के गुरु का वरण किया गया हो तो उच्चस्तरीय साधना में अधिक योग्य गुरु का वरण भी हो सकता है। एक व्यक्ति के कई गुरु हो सकते हैं। संगीत, व्यापार शिल्प, शिक्षा आदि के लिए जिस प्रकार एक ही समय में कई गुरुओं की सहायता लेनी पड़ती है, उसी प्रकार एक व्यक्ति के कई गुरु भी हो सकते हैं। भगवान राम के वशिष्ठ और विश्वामित्र दो गुरु थे, दत्तात्रय के चौबीस थे।

🔵 शिक्षा प्राप्त करने में नर-नारी दोनों को ही अध्यापक की सहायता आवश्यक होती है। उसी प्रकार अध्यात्म क्षेत्र के प्रगति प्रशिक्षण में भी बिना लिंग भेद के हर साधक को मार्गदर्शक का सहयोग लेना होता है। व्यवहार-व्यवस्था में स्त्रियों का गुरु पति-सास आदि भी हो सकते हैं, पर आत्मिक प्रगति में सहायता तो वही करेगा जो स्वयं उस विषय का निष्णान्त पारंगत हो। ऐसा व्यक्ति पति आदि भी हो सकता है, बाहरी भी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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