गुरुवार, 24 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 25 Nov 2016


👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 27)

🌹 जन-मानस को धर्म-दीक्षित करने की योजना
🔵 32. स्वाध्याय की साधना— जीवन-निर्माण की आवश्यक प्रेरणा देने वाला सत्साहित्य नित्य नियमपूर्वक पढ़ना ही चाहिये। स्वाध्याय को भी साधना का ही एक अंग माना जाय और कुछ समय इसके लिए नियत रखा जाय। कुविचारों को शमन करने के लिए नित्य सद्विचारों का सत्संग करना आवश्यक है। व्यक्ति का सत्संग तो कठिन पड़ता है पर साहित्य के माध्यम से संसार भर के जीवित या मृत सत्पुरुषों के साथ सत्संग किया जा सकता है। यह जीवन का महत्वपूर्ण लाभ है, जिससे किसी को भी वंचित नहीं रहना चाहिये। जो पढ़े लिखे नहीं हैं उन्हें दूसरों से सत्साहित्य पढ़ा कर सुनने की व्यवस्था करनी चाहिये।

🔴 33. संस्कारित जीवन— जीवन को समय-समय पर संस्कारित करने के लिये हिन्दू धर्म में षोडश संस्कारों का महत्वपूर्ण विधान है। पारिवारिक समारोह के उत्साहपूर्ण वातावरण में सुव्यवस्थित जीवन की शिक्षा इन अवसरों पर मनीषियों द्वारा दी जाती है और अग्निदेव तथा देवताओं की साक्षी में इन नियमों पर चलने के लिये प्रतिज्ञा कराई जाती है तो उसका ठोस प्रभाव पड़ता है। पुंसवन, सीमन्त, नामकरण, मुण्डन, अन्न प्राशन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत, विवाह, वानप्रस्थ, अन्त्येष्टि आदि संस्कारों का कर्मकाण्ड बहुत ही शिक्षा और प्रेरणा से भरा हुआ है। यदि उन्हें ठीक तरह किया जाय तो हर व्यक्ति पर गहरा प्रभाव पड़े।

🔵 खेद है कि संस्कारों के कर्मकाण्ड अब केवल चिन्हपूजा मात्र रह गये हैं। उनमें खर्च तो बहुत होता है पर प्रेरणा कुछ नहीं मिलती। हमें संस्कारों का महत्व जानना चाहिए और कराने की विधि तथा शिक्षा को सीखना समझना चाहिए। संस्कारों का पुनः प्रसार किया जाय और उनके कर्मकाण्ड इस प्रकार किये जांय कि कम-से-कम खर्च में अधिक से अधिक प्रेरणा प्राप्त कर सकना सर्वसुलभ हो सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 *गृहस्थ-योग (भाग 14) 25 Nov*

🌹 *गृहस्थ धर्म तुच्छ नहीं है*

🔵  किसी स्रोत में से पानी का प्रवाह जारी हो किन्तु उसके बहाव के मार्ग को रोक दिया जाय तो वह पानी जमा होकर दूसरे मार्ग से फूट निकलेगा। मन से विषय और चिन्तन और बाहर से ब्रह्मचर्य यह भी इसी प्रकार का कार्य है। मन में वासना उत्पन्न होने से जो उत्तेजना पैदा होती है वह फूट निकलने के लिए कोई न कोई मार्ग ढूंढ़ती है। साधारण मार्ग बन्द होता है तो कोई और मार्ग बनाकर वह निकलती है। यह नया मार्ग अपेक्षाकृत बहुत खतरनाक और हानिकारक साबित होता है।

🔴  संसार भर की जनगणना की रिपोर्टों का अवलोकन करने से यह सच्चाई और भी अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट हो जाती है। विवाहित स्त्री-पुरुषों की प्रतिशत जितनी मृत्यु होती है विधवा या विधुरों की मृत्यु का अनुपात प्रायः उससे ड्यौढ़ा रहता है। मोटी दृष्टि से देखने पर विवाहितों की जीवनी-शक्ति अधिक और अविवाहितों की कम खर्च होती है इससे विवाहितों की अल्पायु और रोगी रहने की सम्भावना प्रतीत होती है परन्तु होता इसका ठीक उलटा है।

🔵  विवाहित लोग सम्भोगजन्य क्षय, बालकों का भरण-पोषण, अधिक चिन्ता तथा जिम्मेदारी आदि के भार को खींचते हुए भी जितनी आयु और निरोगता प्राप्त करते हैं अविवाहित लोग उतने नहीं कर पाते। इसका एक मात्र कारण वासना की अतृप्ति से उत्पन्न हुआ मानसिक उद्वेग है, जो बड़ा घातक होता है, उसकी विषाक्त ज्वाला से सारे जीवन तत्व भीतर ही भीतर जल-भुन जाते हैं। चित्त की अस्थिरता और अशान्ति के कारण कोई कहने लायक महान कार्य भी उनसे सम्पादित नहीं हो पाता कोई बड़ी सफलता भी नहीं मिल पाती। इस प्रकार विवाहितों  की अपेक्षा यह अविवाहित अधिक घाटे में रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 14) 25 Nov

🌹 विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक

🔵  यह संसार जड़ और चेतन के, सत् और असत् के सम्मिश्रण से बना है। देव और दानव दोनों यहां रहते हैं। देवत्व और असुरता के बीच सदा सत्ता-संघर्ष चलता रहता है। भगवान का प्रतिद्वन्दी शैतान भी अनादिकाल से अपना अस्तित्व बनाये हुए है। परस्पर विरोधी रात और दिन का, अन्धकार और प्रकाश का जोड़ा न जाने कब से जुड़ा चला आ रहा है। कपड़ा ताने और बाने से मिलकर बना है, यद्यपि दोनों की दिशा परस्पर विरोधी है। यहां जलाने वाली गर्मी भी बहुत है। शीतलता देने वाली बर्फ से भी पूरे ध्रुव प्रदेश और पर्वत शिखर लदे पड़े हैं।

🔴  यहां न सन्त-सज्जनों की कमी है और न दुष्ट-दुर्जनों की। पतन के गर्त में गिराने वाले तत्व अपनी पूरी साज-सज्जा बनाये बैठे और अपने आकर्षण जाल में सारे संसार को जकड़ने के प्रयास में संलग्न हैं। दूसरी ओर उत्थान की प्रेरणा देने वाली उत्कृष्टता भी मर नहीं गई है, उसकी प्रकाश किरणों का आलोक भी सदा ही दीप्तिमान रहता है और असंख्यों को श्रेष्ठता की दिशा में चलने के लिए बलिष्ठ सहयोग प्रदान करता है। परस्पर विरोधी सत्-असत् तत्वों का मिश्रण ही यह संसार है। भाप में जल की शीतलता और अग्नि की ऊष्मा का विचित्र संयोग हुआ है, यह संसार भाप से बने बादलों की तरह अपनी सत्ता बनाये बैठा है।

🔵 इस हाट में से क्या खरीदा जाय, क्या नहीं? यह निर्णय करना हर मनुष्य का अपना काम है। पतन या उत्थान में से किस मार्ग पर चलना है? यह फैसला करना पूरी तरह अपनी इच्छा एवं रुचि पर निर्भर है। ईश्वर ने मनुष्य पर विश्वास किया है और इतनी स्वतन्त्रता दी है कि वह अपनी इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति किसी भी दिशा में किसी भी प्रयोजन के लिए उपयोग करे। इसमें किसी दूसरे का, यहां तक कि परमेश्वर तक का कोई हस्तक्षेप नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 38)

🌞  तीसरा अध्याय

🔴  इस महान तत्त्व की व्याख्या में हमारे यह विचार और शब्दावली हीन, शिथिल और सस्ते प्रतीत होते होंगे। यह विषय अनिर्वचनीय है। वाणी की गति वहाँ तक नहीं है। गुड़ का मिठास जबानी जमा खर्च द्वारा नहीं समझाया जा सकता। हमारा प्रयत्न केवल इतना ही है कि तुम ध्यान और दिलचस्पी की तरफ झुक पड़ो और इन कुछ मानसिक कसरतों को करने के अभ्यास में लग जाओ। ऐसा करने से मन वास्तविकता का प्रमाण पाता जायेगा और आत्म-स्वरूप में दृढ़ता होती जायेगी। जब तक स्वयं अनुभव न हो जाए, तब तक ज्ञान, ज्ञान नहीं है। एक बार जब तुम्हें उस सत्य के दर्शन हो जायेंगे तो वह फिर दृष्टि से ओझल नहीं हो सकेगा और कोई वाद-विवाद उस पर अविश्वास नहीं करा सकेगा।

🔵  अब तुम्हें अपने को दास नहीं, स्वामी मानना पड़ेगा। तुम शासक हो और मन आज्ञा-पालक। मन द्वारा जो अत्याचार अब तक तुम्हारे ऊपर हो रहे थे, उन सबको फड़फड़ाकर फेंक दो और अपने को उनसे मुक्त हुआ समझो। तुम्हें आज राज्य सिंहासन सौंपा जा रहा है, अपने को राजा अनुभव करो। दृढ़तापूर्वक आज्ञा दो कि स्वभाव, विचार, संकल्प, बुद्धि, कामनाएँ समस्त कर्मचारी शासन को स्वीकर करें और नये सन्धि-पत्र पर दस्तखत करें कि हम वफादार नौकर की तरह अपने राजा की आज्ञा मानेंगे और राज्य-प्रबन्ध को सर्वोच्च एवं सुन्दरतम बनाने में रत्ती भर भी प्रमाद न करेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part3.4

👉 गृहस्थ-योग (भाग 13) 24 Nov

🌹 गृहस्थ धर्म तुच्छ नहीं है
🔵  ब्रह्मचर्य व्रत का पालन बहुत ही उत्तम, उपयोगी एवं लाभदायक साधना है। यह शारीरिक और मानसिक दोनों की दृष्टियों से हितकर है। जो जितने अधिक समय तक ब्रह्मचारी रह सके उसके लिए उतना ही अच्छा है। साधारणतः लड़कों को कम से कम 20 वर्ष तक और लड़कियों को 16 वर्ष तक तो ब्रह्मचारी अवश्य ही रहना चाहिए। जो अपने मन को वश में रख सकें वे अधिक समय तक रहें।

🔴  ब्रह्मचर्य में मानसिक संयम प्रधान है। यदि मन वासनाओं में भटकता रहे और शरीर को हठ पूर्वक संयम में रखा जाय तो उससे लाभ की जगह पर हानि ही है। शारीरिक काम सेवन से जितनी हानि है उससे कई गुनी हानि मानसिक असंयम से है। वीर्यपात की क्षति आसानी से पूरी हो जाती है परन्तु मानसिक विषय चिन्तन से जो उत्तेजना पैदा होती है वह यदि तृप्त न हो तो कुचले हुए सर्प की तरह क्रुद्ध होकर अपने छेड़ने वालों के ऊपर आक्रमण करती है।

🔵  मनोविज्ञान शास्त्र के यशस्वी आचार्य डॉक्टर फ्राइड, डॉक्टर ब्राईन, डॉक्टर बने प्रभृति विद्वानों का मत है कि वासनाएं कुचली जाने पर सुप्त मन से किसी कोने में एक बड़ा घाव लेकर पड़ी रहती हैं और जब अवसर पाती हैं तभी भयानक, शारीरिक या मानसिक रोगों को उत्पन्न करती हैं। उनका कहना है कि पागलपन, मूर्छा, मृगी, उन्माद, नाड़ी संस्थान का विक्षेप, अनिद्रा, कायरता आदि अनेक रोग वासनाओं के अनुचित रीति से कुचले जाने के कारण उत्पन्न होते हैं। इसलिए ब्रह्मचर्य की पहली शर्त ‘मन की स्थिरता’ मानी गई है। जिनका मन किन्हीं उत्तम विचारों में निमग्न रहता है, विषय वृत्तियों की ओर जिनका ध्यान ही नहीं जाता या जाता है तो तुरन्त ही अरुचि और घृणापूर्वक वहां से हट जाता है वे ही ब्रह्मचारी हैं। जिनका मन वासना में भटकता है, चित्त पर जो काबू रख नहीं पाते, उनके शारीरिक ब्रह्मचर्य को विडम्बना ही कहा जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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बुधवार, 23 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 24 Nov 2016


👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 13) 24 Nov

🌹 *प्रगति की महत्वपूर्ण कुंजी : नियमितता*

🔵  भारत के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नाभिकीय भौतिक विज्ञानी डा. मेघनाद साहा ने अपने जीवन क्रम का सुनियोजन इसी ढंग से किया। ढाका से 75 किलोमीटर दूर सियोराताली गांव में एक दुकानदार के घर जन्मे बालक साहा अपने पिता की आठ सन्तानों में से एक थे। घर की आर्थिक समस्या के कारण उन्हें पिता का सहयोग करना पड़ता था। घर के अन्यान्य कार्यों को करते हुए अध्ययन की नियमितता में उन्होंने कोई कमी नहीं की। अध्ययन की व्यस्तता के साथ-साथ उन्होंने देश सेवा का भी समय निर्वाह किया।

🔴  आर.एस. एण्डरसन ने अपनी पुस्तक ‘‘बिल्डिंग आफ साइन्टिफिक इन्स्टीट्यूशन्स इन इण्डिया’’ में उनके बारे में लिखते हुए बताया कि डा. साहा का प्रत्येक कार्य योजनाबद्ध रीति से सुनियोजित क्रम से होता है। किसी भी कार्य को हाथ में लेकर वे उसे नियमित रूप से करते और भली प्रकार सम्पन्न करते हैं। इसी के कारण उन्होंने अपने जीवन में विविध सफलतायें पायीं और उस समय के मूर्धन्य भौतिक विदों आइन्स्टीन, सोमरफील्ड, मैक्स फ्लेक आदि के द्वारा सम्मानित हुए। उन्हें रायल सोसायटी का सभासद भी मनोनीत किया गया।

🔵 नियमितता ही वह महामंत्र है, जिसको अपनाकर कोई भी अपने जीवन को समग्र रूप से विकसित करने, प्रगति-समृद्धि के उच्च शिखर पर आरूढ़ होने का सुयोग-सौभाग्य प्राप्त कर सकता है। यह गुण दीखने में भले ही छोटा लगे, पर प्रभाव और परिणाम की दृष्टि से इसका महत्व सर्वाधिक है। इसे अपनाने और व्यावहारिक जीवन में क्रियान्वित करने में ही सही माने में जीवन की सार्थकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 37)

🌞 तीसरा अध्याय

🔴 हे साधक! अपनी आत्मा का अनुभव प्राप्त करने में सफल होओ और समझो कि तुम सोते हुए देवता हो। अपने भीतर प्रकृति की महान सत्ता धारण किए हुए हो, जो कार्यरूप में परिणत होने के लिए हाथ बाँधकर खड़ी हुई आज्ञा माँग रही है। इस स्थान तक पहुँचने में बहुत कुछ समय लगेगा। पहली मंजिल तक पहुँचने में भी कुछ देर लगेगी, परन्तु आध्यात्मिक विकास की चेतना में प्रवेश करते ही आँखें खुल जायेंगी। आगे का प्रत्येक कदम साफ होता जायेगा और प्रकाश प्रकट होता जायेगा।

🔵 इस पुस्तक के अगले अध्याय में हम यह बताएँगे कि आपकी विशुद्घ आत्मा भी स्वतंत्र नहीं, वरन् परमात्मा का ही एक अंश है और उसी में किस प्रकार ओत-प्रोत रही है? परन्तु उस ज्ञान को ग्रहण करने से पूर्व तुम्हें अपने भीतर 'अहम्' की चेतना जगा लेनी पड़ेगी। हमारी इस शिक्षा को शब्द-शब्द और केवल शब्द समझकर उपेक्षित मत करो, इस निर्बल व्याख्या को तुच्छ समझकर तिरस्कृत मत करो, यह एक बहुत सच्ची बात बताई जा रही है। तुम्हारी आत्मा इन पंक्तियों को पढ़ते समय आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होने की अभिलाषा कर रही है। उसका नेतृत्व ग्रहण करो और आगे को कदम उठाओ।

🔴 अब तक बताई हुई मानसिक कसरतों का अभ्यास कर लेने के बाद 'अहम्' से भिन्न पदार्थों का तुम्हें पूरा निश्चय हो जाएगा। इस सत्य को ग्रहण कर लेने के बाद अपने को मन और वृत्तियों का स्वामी अनुभव करोगे और तब उन सब चीजों को पूरे बल और प्रभाव के साथ काम में लाने की सामर्थ्य प्राप्त कर लोगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part3.3

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 23 Nov 2016


👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 26)

🌹 जन-मानस को धर्म-दीक्षित करने की योजना

🔵 ज्ञान को उपनिषदों में अमृत कहा गया है। जीवन को ठीक प्रकार जीने और सही दृष्टिकोण अपनाये रहने के लिए प्रेरणा देते रहना और श्रद्धा स्थिर रखना यही ज्ञान का उद्देश्य है। जिन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया उनका मनुष्य जन्म धन्य हो जाता है। शिक्षा का उद्देश्य भी ज्ञान की प्राप्ति ही है। सद्ज्ञान को ही विद्या या दीक्षा कहते हैं। जिसे यह सम्पत्ति प्राप्त हो गई उसे और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता।

जीवन में ज्ञान को कैसे धारण किया जाय और उसे व्यापक कैसे बनाया जाय, इस सम्बन्ध में कुछ कार्यक्रम नीचे प्रस्तुत हैं—

🔴 31. आस्तिकता की आस्था—
आस्तिकता पर गहरी निष्ठा-भावना मन में जमी रहने से मनुष्य अनेक दुष्कर्मों से बच जाता है और उसी आन्तरिक प्रगति सन्मार्ग की ओर होती रहती है। परमात्मा को सर्व-व्यापक और न्यायकारी मानने से छुपकर पाप करना भी कठिन हो जाता है। राजदण्ड से बचा जा सकता है पर सर्वज्ञ ईश्वर के दण्ड से चतुरता करने वाले भी नहीं बच सकते। यह विश्वास जिनमें स्थिर रहेगा वे कुमार्ग से बचेंगे और सत्कर्मों द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करने और उसकी कृपा प्राप्त करने का प्रयत्न करते रहेंगे। आस्तिकता व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के सुख शान्तिमय बनाये रहने का अचूक साधन है। उसे हर व्यक्ति अपने अन्तःकरण में गहराई तक प्रतिष्ठित रखे यह प्रयत्न करना चाहिये।

🔵 चाहे कितना ही व्यस्त कार्यक्रम क्यों न हो प्रातः सोकर उठते और रात को सोते समय कम से कम 15-15 मिनट सर्वशक्तिमान, न्यायकारी परमात्मा का ध्यान करना चाहिये और उससे सद्विचारों एवं सत्कर्मों की प्रेरणा के लिए प्रार्थना करनी चाहिये। इतनी उपासना तो प्रत्येक व्यक्ति करने ही लगे। जिन्हें कुछ सुविधा और श्रद्धा अधिक हो वे नित्य नियमपूर्वक स्नान करके उपासना स्थल पर गायत्री महामन्त्र का जप किया करें। अन्य देवताओं या विधानों से उपासना करने वाले भी कुछ गायत्री मन्त्र अवश्य जप कर लिया करें। इससे आत्मिक प्रगति में बड़ी सहायता मिलती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 *गृहस्थ-योग (भाग 12) 23 Nov*

🌹 *गृहस्थ में वैराग्य*

🔵  गृहस्थाश्रम का बोझ पड़ने पर मनुष्य जिम्मेदारी की ओर कदम बढ़ाता है। अपना और अपने परिवार का बोझ पीठ पर लाद कर उसे चलना पड़ता है इसलिये उच्छृंखलता को छोड़कर वह जिम्मेदारी अनुभव करता है। यह जिम्मेदारी ही आगे चलकर विवेकशीलता में परिणत हो जाती है। राजा को एक साम्राज्य के संचालन की बागडोर हाथ में लेकर जैसे संभल-संभलकर चलना पड़ता है वैसे ही एक सद्गृहस्थ को पूरी दूरदर्शिता, विचारशीलता, धैर्य, सहनशीलता और आत्मसंयम के साथ अपना हर एक कदम उठाना पड़ता है।

🔴  चाबुक सवार जैसे घोड़े को अच्छी चाल चलना सिखाकर उसे हमेशा के लिये बढ़िया घोड़ा बना देता है वैसे ही गृहस्थ धर्म भी ठोक-पीटकर कड़ुवे-मीठे अनुभव कराकर एक मनुष्य को आत्म-संयमी, दूरदर्शी गम्भीर एवं स्थिर चित्त बना देता है। यह सब योग के लक्षण हैं। जैसे फल पक कर समयानुसार डाली से स्वयं अलग हो जाता है वैसे ही गृहस्थ की डाल से चिपका हुआ मनुष्य धीरे धीरे आत्म निग्रह और आत्म त्याग को शिक्षा पाता रहता है और अन्ततः एक प्रकार का योगी हो जाता है।

🔵  लिप्सा, लालसा, तृष्णा, लोलुपता, मदान्धता, अविवेक आदि बातें त्याज्य हैं, यह बुरी बातें गृहस्थ आश्रम में भी हो सकती हैं और आश्रमों में भी। इसीलिये गृहस्थ आश्रम त्यागने योग्य नहीं वरन् अपनी कुवासनाएं ही त्यागने योग्य हैं।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 12) 23 Nov

🌹 *प्रगति की महत्वपूर्ण कुंजी : नियमितता*

🔵  सुविख्यात गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजम् न तो उच्च शिक्षित थे, न ही उनके पास साधन सुविधाओं की विपुलता थी। पर्याप्त समय भी उनके पास नहीं था। मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के कार्यालय में साधारण से क्लर्क के पद पर नौकरी करते हुए घर-परिवार, माता-पिता की देख-भाल आदि नाना विधि कार्यों को करते हुए अपने अध्ययन हेतु थोड़ा समय दे पाते थे, पर यह समय नियमित था। इस नियमबद्धता और निरन्तरता को आधार बनाकर ही वह गणित विषय में अनेकानेक शोध कर सकने में सक्षम हो सके।

🔴  प्रो. जी.एच. हार्डी तो उनके इस कार्य को देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि यह व्यक्ति इतना व्यस्त जीवनयापन करते हुए शोध-अन्वेषण का समय साध्य कार्य कैसे कर पाता है। जिज्ञासा करने पर रामानुजम् ने बताया कि नियमितता ही मेरे शोध प्रयास में सफलता की रीढ़-रज्जु है। कालान्तर में उन्हें रायल सोसायटी का सभासद बनाया गया। जो इस क्षेत्र में अद्वितीय सम्मान है।

🔵  निःसंदेह जिन्होंने जीवन चर्या को सुनियोजित किया है वे एक सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी पर चढ़ते हुए वहां जा पहुंचे जहां उनके अन्यान्य साथियों के साथ तुलना करने पर प्रतीत होता है कि कदाचित किसी देव-दानव ने ही ऐसा विलक्षण चमत्कार प्रस्तुत किया है, पर वास्तविकता यह है कि उन्होंने नियमितता अपनाई। अपने समय, श्रम एवं चिन्तन को एक दिशा विशेष में संकल्पपूर्वक सुनियोजित किया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 36)

🌞 तीसरा अध्याय

🔴 इस चेतना में ले जाने का इतना ही अभिप्राय है कि 'अहम्' की सर्वोच्च भावना में जागकर तुम एक समुन्नत आत्मा बन जाओ और अपने उपकरणों का ठीक उपयोग करने लगो। जो पुराने, अनावश्यक, रद्दी और हानिकर परिधान हैं, उन्हें उताकर फेंक सको और नवीन एवं अद्भुत क्रियाशील औजारों को उठाकर उनके द्वारा अपने सामने के कार्यों को सुन्दरता और सुगमता के साथ पूरा कर सको, अपने को सफल एवं विजयी घोषित कर सको।

🔵 इतना अभ्यास और अनुभव कर लेने के बाद तुम पूछोगे कि अब क्या बचा, जिसे 'अहम्' से भिन्न न गिनें? इसके उत्तर में हमें कहना है कि 'विशुद्घ आत्मा।' इसका प्रमाण यह है कि अपने अहम् को शरीर, मन आदि अपनी सब वस्तुओं से पृथक करने का प्रयत्न करो। छोटी चीजों से लेकर उससे सूक्ष्म, उससे सूक्ष्म, उससे परे से परे वस्तुओं को छोड़ते-छोड़ते विशुद्घ आत्मा तक पहुँच जाओगे। क्या अब इससे भी परे कुछ हो सकता है? कुछ नहीं। विचार करने वाला-परीक्षा करने वाला और परीक्षा की वस्तु, दोनों एक वस्तु नहीं हो सकते।

🔴 सूर्य अपनी किरणों द्वारा अपने ही ऊपर नहीं चमक सकता। तुम विचार और जाँच की वस्तु नहीं हो। फिर भी तुम्हारी चेतना कहती है 'मैं' हूँ। यही आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण है। अपनी कल्पना शक्ति, स्वतन्त्रता शक्ति लेकर इस 'अहम्' को पृथक करने का प्रयत्न कर लीजिए, परन्तु फिर भी हार जाओगे और उससे आगे नहीं बढ़ सकोगे। अपने को मरा हुआ नहीं मान सकते। यही विशुद्घ आत्मा अविनाशी, अविकारी, ईश्वरीय समुद्र की बिन्दु परमात्मा की किरण है।


🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part3.3

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 25)

🌹 अशिक्षा का अन्धकार दूर किया जाय

🔵 29. पुस्तकालय और वाचनालय— पुस्तकालयों और वाचनालयों की स्थापना की जाय। उनमें केवल ऐसी चुनी हुई पुस्तकें या पत्र पत्रिकाएं ही मंगाई जावें जो जीवन निर्माण की सही दिशा में प्रेरणा दे सकें। अश्लील, जासूसी, भद्दी भौंड़ी विचारधारा देने वाली या मनोरंजन मात्र का उद्देश्य पूरा करके समय नष्ट करने वाली, भ्रम उत्पन्न करने वाली चीजें संख्या की अधिकता के मोह में भूलकर भी इन पुस्तकालयों में जमा न की जांय। भोजन में जो स्थान विषाक्त खाद्य पदार्थों का है वही पुस्तकालयों में गन्दे साहित्य का है। इस शुद्धि का पूरा-पूरा ध्यान रखते हुए चुनी हुई पुस्तकों के वाचनालय, पुस्तकालय स्थापित किये जांय। उनका खर्च पढ़ने वालों से कुछ शुल्क लेकर या चन्दा से पूरा किया जाय। जिनके यहां अच्छी पुस्तकें जमा हैं या पत्र-पत्रिकाएं आती हैं उनसे वह वस्तुएं उधार भी मांगी जा सकती हैं और इस प्रकार प्रयत्न करने से भी पुस्तकालय वाचनालय चल सकते हैं। लोक शिक्षण के लिए इनकी भी बड़ी आवश्यकता है।

🔴 30. अध्ययन की रुचि जगावें—
पढ़ने की अभिरुचि उत्पन्न करना, युग-निर्माण की दृष्टि से एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। आमतौर से स्कूली शिक्षा समाप्त करने के बाद लोग पुस्तकों को नमस्कार कर लेते हैं और अपने काम धन्धे को ही महत्व देते हैं। उनकी दृष्टि में पुस्तकें पत्रिकाएं आदि पढ़ना ताश खेलने की तरह समय को व्यर्थ गंवाने वाला मनोरंजन मात्र होता है। इस मान्यता को हटाया ही जाना चाहिये और निरक्षरता की भांति ‘‘ज्ञान-वृद्धि की उपेक्षा’’ से भी प्रबल संघर्ष आरम्भ करना चाहिये। जन-मानस में यह बात गहराई तक प्रवेश कराई जानी चाहिये कि पेट को रोटी देने की भांति बुद्धि को ज्ञान-वर्धक साहित्य की आवश्यकता है। उसकी उपेक्षा करने पर आन्तरिक विकास की समस्या हल नहीं हो सकती।

🔵 घर-घर जाकर पढ़ने में अभिरुचि उत्पन्न कराना, पुस्तकें पढ़ने का महत्व बताना और फिर उन्हीं से निवास स्थानों पर उपयोगी पुस्तकें पहुंचाना एक बहुत बड़ा काम है। चलते-फिरते पुस्तकालयों का यही रूप रहे कि ज्ञान प्रचारक लोग अपने झोले में कुछ पुस्तकें रखकर घर से निकला करें और जन-सम्पर्क बढ़ाकर जिनमें अभिरुचि उत्पन्न हो जाय उन्हें पुस्तकें पढ़ने देने तथा वापिस लेने जाया करें। चाय का प्रचार इसी प्रकार घर-घर जाकर मुफ्त में चाय पिलाकर प्रारम्भिक प्रचारकों ने किया था। अब तो चाय की आदत इतनी बढ़ गई है कि पीने वाले हड़बड़ाते फिरा करते हैं। इसी प्रकार की अभिरुचि सद्ज्ञान साहित्य पढ़ने और स्वाध्याय को नित्य नियमित रूप से करते रहने के लिए उत्पन्न हो सके ऐसा प्रयत्न किया जाना चाहिये। इस प्रवृत्ति की अभिवृद्धि पर युग-निर्माण योजना की सफलता बहुत कुछ निर्भर रहेगी।

🔴 शिक्षा प्रसार आवश्यक है। मानसिक उत्कर्ष के लिए यह एक अनिवार्य कार्य है। इसके बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता। विचार क्रान्ति के उद्देश्य की पूर्ति लोक शिक्षण पर ही निर्भर है और वह कार्य शिक्षा प्रसार से ही होगा। हमें इसके लिए जी जान से जुटना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

सोमवार, 21 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 22 Nov 2016


👉 गृहस्थ-योग (भाग 11) 22 Nov

🌹 *गृहस्थ में वैराग्य*

🔵 वीरता भागने में नहीं, वरन् लड़ने में है। यदि गृहस्थाश्रम में अधिक कठिनाइयां हैं तो उनसे डर कर दूर रहना रचित नहीं। पानी में घुसे बिना तैरना कैसे सीखा जायेगा? कोई व्यक्ति यह कहे कि मैं अखाड़े में जाकर व्यायाम करने की कठिनाई में पड़ना नहीं चाहता, परन्तु पहलवान बनना चाहता हूं, तो उसकी यह बात बालकों जैसी अनगढ़ होगी। काम, क्रोध, लोभ, मोह के दावघातों को देखना, उनसे परिचित होना, उनसे लड़कर विजय प्राप्त करना इन्हीं सब अभ्यासों के लिए वर्णाश्रम धर्म तत्वदर्शी आचार्य गृहस्थाश्रम को सर्वश्रेष्ठ सर्वोपरि आश्रम बताते हैं।

🔴 सम्पूर्ण देवर्षि इसी महान् गुफा में से उत्पन्न और विकसित हुए हैं। जरा कल्पना तो कीजिये- यदि गृहस्थ धर्म- जिसे निर्बुद्धि लोग माया या बन्धन तक कह बैठते हैं न होता तो राम, कृष्ण, बुद्धि, ईसा, मुहम्मद, गांधी कहां से आते? सीता, सावित्री, अनुसूया, मदालसा, दमयन्ती, पार्वती, आदि सतियों का चरित्र कहां से सुन पड़ता? इतिहास के पृष्ठों पर जगमगाते हुए उज्ज्वल हीरे किस प्रकार दिखाई देते? अन्य तीनों आश्रम बच्चे हैं गृहस्थ उनका पिता है। पिता को बन्धन कहना, नरक बताना त्याज्य ठहराना एक प्रकार की विवेक हीनता है।

🔵 उत्तर दायित्व का भार पड़े बिना कोई व्यक्ति वास्तविक, गम्भीर, जिम्मेदार और भारी भरकम नहीं होता। अल्हड़ बछड़े बहुत कूदते फांदते और दुलत्तियां उड़ाते हैं परंतु जब कन्धे पर भार पड़ता है तो बड़ी सावधानी से एक एक कदम रखना पड़ता है। हाथी जब गहरे पानी में धंसता है तो अपना एक पैर भली प्रकार जमा लेता है तब दूसरे को आगे रखता है। उसकी सारी सावधानी और होशियारी उस समय एक स्थान पर केन्द्रीभूत हो जाती है। जिस चित्तवृत्ति निरोध को, एकाग्रता को पातंजलि ने योग बताया है वह एकाग्रता कोरी बातूनी जमावन्दी से नहीं आती, उसके लिये एक प्रेरणा जिम्मेदारी चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 11) 21 Nov

🌹 प्रगति की महत्वपूर्ण कुंजी : नियमितता

🔵  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का व्यक्तित्व भी इस गुण से पूरी तरह ओत-प्रोत था। उनके समय और कार्य की सुनियोजित पद्धति सुनियोजित क्रम अनुकरणीय था। जिस समय उन्होंने गीता का शब्दकोश तैयार किया जो गीता-माता नामक ग्रन्थ में संग्रहीत है, तो सहयोगियों ने जिज्ञासावश प्रश्न किया कि वह इतने व्यस्त जीवन में यह समय साध्य, चिन्तनपरक कार्य कैसे कर सके। बापू का जवाब था—मेरा जीवन व्यस्त तो है पर अस्त-व्यस्त नहीं। मैं इस कार्य में नियमित 20 मिनट का समय नियोजित करता था। उसी नियमबद्धता, सुनियोजित कार्य-पद्धति का प्रतिफल है कि यह कार्य सफलतापूर्वक कम समय में सम्पन्न हो सका।

🔴  निश्चित ही जिन लोगों का जीवनक्रम अस्त-व्यस्त और अनियमित रहता है, वे न तो अपने जीवन का सही उपयोग कर पाते हैं और न ही समुचित विकास। ऐसे व्यक्ति प्रायः असफल ही देखे जाते हैं। मानवी प्रगति में इस गुण का अभाव एक बड़ी बाधा है। अनियमित व्यक्ति हवा में उड़ते रहने वाले पत्तों की तरह कभी इधर-उधर कुदकते-फुदकते रहते हैं। निश्चित दिशा-धारा नियोजित क्रम के अभाव में उनका परिश्रम और समय बेतरह बरबाद होता रहता है।

🔵  धीमी चाल से चलने वाले स्वल्प क्षमताशील प्राणी कछुए ने सतत् प्रयत्न व नियमबद्धता को अपनाकर बाजी जीती थी। जब कि बेतरतीब इधर-उधर भटकने वाला खरगोश अधिक क्षमतावान होते हुए भी पराजित और अपमानित हुआ। सामर्थ्य प्रतिभा का जितना महत्व है, उससे अधिक महत्वपूर्ण और आवश्यक यह है कि जो कुछ उपलब्ध है उसी को योजनाबद्ध रूप से नियमित व्यवस्था क्रम अपनाकर सदुद्देश्य के लिए प्रयुक्त किया जाय। जो ऐसा कर पाते हैं, वे ही क्रम-विकास के सुप्रशस्त राजपथ पर चलते हुए उन्नति के शिखर पर आरूढ़ होते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 शहर से दूर एक घने ...

🔵 शहर से दूर एक घने जंगल में एक आम का पेङ था और एक लंबा और घना नीम का पेङ था।

🔴 नीम का पेङ अपने पडोसी पेङ से बात तक नहीं करता था। उसको अपने बङे होने पर घमंड था।

🔵 एक बार एक रानी मधुमख्खी नीम के पेड़ के पास पहुची और उसने कहाँ “नीम भाई में आपके यहाँ पर आपने शहद का छत्ता बना लू ” तब नीम के पेड़ ने कहाँ “नहीं जा जाकर कही और अपना छत्ता बना”।

🔴 इतना सुनकर आम के पेड़ ने कहाँ “भाई छत्ता क्यों नहीं बना लेने देते यह तुम्हारे पेड़ पर सुरक्षित रह सकेंगी।” इतने पर नीम के पेड़ ने आम के पेड़ को जवाब दिया कि मुझे तुम्हारी सलाह कि आवश्यकता नहीं हें।

🔵 रानी मधुमख्खी ने फिर से आग्रह किया तो भी नीम के पेड़ ने मना कर दिया।

🔴 रानी मधुमख्खी आम के पेड़ के पास गई और कहने लगी क्या मै आपकी शाखा पर अपना छत्ता बना लूँ। इस पर आम के पेड़ ने उसे सहमति दे दी रानी मधुमख्खी ने छत्ता बना लिया और सुखपूर्वक रहने लगी।

🔵 अभी कुछ दिनों बाद कुछ व्यक्ति वहाँ पर आये और कहने लगे कि इस आम के पेड़ को काटते हें तभी एक व्यक्ति कि नजर मधुमख्खी के छत्ते पर पड़ी और उसने कहाँ यदि हम इस पेड़ को काटते हें तो यह मधुमख्खी हमें नहीं छोडेगी। अतः हम नीम के पेड़ को काटते हें | इससे हमको कोई खतरा नहीं हें। और लकडियां भी हमे अधिक मात्रा में मिल जाएँगी।

🔴 यह सब बाते सुनकर नीम डर गया अब वह कर भी क्या सकता था।

🔵 दूसरे दिन सभी व्यक्ति आये और पेड़ काटने लगे तो नीम ने कहाँ “ मुझे बचाओ – मुझे बचाओ नही तो ये लोग मुझको काट डालेंगे”।

🔴 तब मधुमख्खियो ने उन लोगों पर हमला कर दिया और उन्हें वहाँ से भगा दिया।

🔵 नीम के पेड़ ने मधुमख्खियो को धन्यवाद दिया तो इस पर मधुमख्खियो ने कहाँ “धन्यवाद हमें नही आम भाई को दो यदि वह हमसे नहीं कहते तो हम आपको नहीं बचाते”।

🔴 सीख…“कभी कभी बड़े और महान होने का एहसास हमें घमंडी और क्रूर बना देता हें | जिससे हम अपने सच्चे साथियों से दूर हो जाते हें।”

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 35)

🌞 तीसरा अध्याय

🔴 उच्च आध्यात्मिक मन से आई प्रेरणा भी इसी प्रकार अध्ययन की जा सकती है। इसलिए उन्हें भी अहम् से भिन्न माना जाएगा। आप शंका करेंगे कि उच्च आध्यात्मिक प्रेरणा का उपयोग उस प्रकार नहीं किया जा सकता, इसलिए सम्भव है वे प्रेरणाएँ 'अहम्' वस्तुएँ हों? आज हमें तुमसे इस विषय पर कोई विवाद नहीं करना है, क्योंकि तुम आध्यात्मिक मन की थोड़ी बहुत जानकारी को छोड़कर अभी इसके सम्बन्ध में और कुछ नहीं जानते। साधारण मन के मुकाबिले में वह मन ईश्वरीय भूमिका के समान है।

🔵 जिन तत्त्वदर्शियों ने अहम् ज्योति का साक्षात्कार किया है और जो विकास ही उच्च, अत्युच्च सीमा तक पहुँच गये हैं, वे योगी बतलाते हैं कि अहम् आध्यात्मिक मन से ऊपर रहता है और उसको अपनी ज्योति से प्रकाशित करता है, जैसे पानी पर पड़ता हुआ सूर्य का प्रतिबिम्ब सूर्य जैसा ही मालूम पड़ता है। परन्तु सिद्घों का अनुभव है कि वह केवल धुँधली तस्वीर मात्र है। चमकता हुआ आध्यात्मिक मन यदि प्रकाशबिम्ब है, तो 'अहम्' अखण्ड ज्योति है, (जो) उस उच्च मन में होता हुआ आत्मिक प्रकाश पाता (देता) है, इसी से वह (आध्यात्मिक मन) इतना प्रकाशमय प्रतीत होता है।

🔴 ऐसी दशा में उसे (आध्यात्मिक मन को) ही 'अहम्' मान लेने का भ्रम हो जाता है। असल में वह भी 'अहम्' है नहीं। 'अहम्' उस प्रकाश मणि के समान है, जो स्वयं सदैव समान रूप से प्रकाशित रहती है, किन्तु कपड़ों से ढकी रहने के कारण अपना प्रकाश बाहर लाने में असमर्थ होती है। ये कपड़े जैसे-जैसे हटते जाते हैं, वैसे ही वैसे प्रकाश अधिक स्पष्ट होता जाता है। फिर भी कपड़ों के हटने या उनके और अधिक मात्रा में पड़ जाने के कारण मणि के स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं होता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part3.3

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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