बुधवार, 9 नवंबर 2016

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 24)

🌞 दूसरा अध्याय

🔴 अपने को प्रकाश केन्द्र अनुभव करने के लिए तर्कों से काम न चलेगा, क्योंकि हमारे तर्क बहुत ही लंगड़े और अन्धे हैं। तर्कों के सहारे यह नहीं सिद्घ हो सकता कि वास्तव में वही हमारा पिता है, जिसे पिताजी कहकर सम्बोधन करते हैं। इसलिए योगाभ्यास के दैवी अनुष्ठान में इस अपाहिज तर्क का बहिष्कार करना पड़ता है और धारणा, ध्यान एवं समाधि को अपनाना पड़ता है। आत्म-स्वरूप के अनुभव में यह तर्क-वितर्क बाधक न बनें इसलिए कुछ देर के लिए इन्हें विदा कर दो।

🔵  विश्वास रखो, इन पंक्तियों का लेखक तुम्हें भ्रम में फँसाने या कोई गलत हानिकारक साधन बताने नहीं जा रहा है। उसका निश्चित विश्वास है और वह शपथपूर्वक तुमसे कहता है कि हे मेरे ऊपर विश्वास रखने वाले साधक! यह ठीक रास्ता है। मेरा देखा हुआ है। आओ, पीछे-पीछे चले आओ, तुम्हें कहीं धकेला नहीं जायेगा, वरन् एक ठीक स्थान पर पहुँचा दिया जाएगा। साधन की विधि- बार-बार ध्यानावस्थित होकर मानस-लोक में प्रवेश करो। अपने को सूर्य समान प्रकाशवान सत्ता के रूप में देखो और अपना संसार अपने आप-पास घूमता हुआ अनुभव करो। इस अभ्यास को लगातार जारी रखो और इसे हृदय पट पर गहरा अंकित कर लो तथा इस श्रेणी पर पहुँच जाओ कि जब तुम कहो कि 'मैं' तब उसके साथ ही चित्त में चेतना, विचार, शक्ति और प्रतिभा सहित केन्द्र स्वरूप चित्र भी जाग उठे। संसार पर जब दृष्टि डालो, तो वह आत्म-सूर्य की परिक्रमा करता नजर आवे।

🔴 उपरोक्त आत्म-स्वरूप दर्शन के साधन में शीध्रता होने के लिए तुम्हें हम एक और विधि बताते हैं। ध्यान की दशा में होकर अपने ही नाम को बार-बार, धीरे-धीरे, गम्भीरता और इच्छापूर्वक जपते जाओ। इस अभ्यास से मन आत्म-स्वरूप पर एकाग्र होने लगता है। लार्ड टेनिसन ने अपनी आत्म-शक्ति को इसी उपाय से जगाया था। वे लिखते हैं-''इसी उपाय से हमने कुछ आत्म-ज्ञान प्राप्त किया है। अपनी वास्तविकता और अमरता को जाना है एवं अपनी चेतना के मूल स्रोत का अनुभव कर लिया है।''

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/Main_Kya_Hun/v4.2

👉 *हमारी युग निर्माण योजना (भाग 13)

🌹 युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री कार्यक्रम

🔵 4. स्वाद की आदत छोड़ी जाय— अचार, मुरब्बे, सिरका, मिर्च, मसाले, खटाई, मीठा की अधिकता पेट खराब होने और रक्त को दूषित करने का कारण होती है। इन्हें छोड़ा जाय। हल्का-सा नमक और जरूरत हो तो थोड़ा धनिया, जीरा सुगन्ध के लिये लिया जा सकता है, पर अन्य मसाले तो छोड़ ही देने चाहिए। शरीर के लिये जितना नमक, शकर आवश्यक है उतना अन्न शाक आदि में पहले से ही मौजूद है।

🔴 बाहर से जो मिलावट की जाती है वह तो स्वाद के लिए है। हमें स्वाद छोड़ना चाहिये। अभ्यास के लिये कुछ दिन तो नमक मीठा बिलकुल ही छोड़ देना चाहिये और अस्वाद व्रत पालन करना चाहिये। आदत सुधर जाने पर हलका-सा नमक, नीबू, आंवला, अदरक, हरा धनिया, पोदीना आदि को भोजन में मिलाकर उसे स्वादिष्ट बनाया जा सकता है। सूखे मसाले स्वास्थ्य के शत्रु ही माने जाने चाहिये। मीठा कम से कम लें। आवश्यकतानुसार गुड़ या शहद से काम चलायें।

🔵 5. शाक और फलों का अधिक प्रयोग— शाकाहार को भोजन में प्रमुख स्थान रहे। आधा या तिहाई अन्न पर्याप्त है। शेष भाग शाक, फल, दूध, छाछ आदि रहे। ऋतु-फल सस्ते भी होते हैं और अच्छे भी रहते हैं। आम, अमरूद, बेर, जामुन, शहतूत, पपीता, केला, ककड़ी, खीरा, तरबूजा आदि-आदि अपनी-अपनी फसलों पर काफी सस्ते रहते हैं। लौकी तोरई, परवल, टमाटर, पालक, मेथी आदि सुपाच्य शाकों की मात्रा सदा अधिक ही रखनी चाहिये।

🔴 गेहूं, चना आदि को अंकुरित करके खाया जाय तो उनसे बादाम जितना पोषक तत्व मिलेगा। उन्हें कच्चा हजम न किया जा सके तो उबाला, पकाया भी जा सकता है। अन्न, शाक और फलों के छिलकों में जीवन तत्व (विटामिन) बहुत रहता है, इसलिये आम, केला, पपीता आदि जिनका छिलका आवश्यक रूप से हटाना पड़े उन्हें छोड़कर शेष के छिलके खाये जाने ही ठीक हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

घबराए नहीं, ये हैं उपाय :: 500, 1000 के नोट बंद:

काले धन पर लगाम लगाने के लिए ऐतिहासिक फैसला लेते हुए सरकार ने 500 और 1000 रुपये के मौजूदा नोटों को अमान्य करार दे दिया है। अब इन नोटों के जरिए लेन-देन नहीं किया जा सकता है। काले धन वालों को झटका लेने के लिए सरकार की तरफ से अचानक इस तरह का फैसला लिया जाना जरूरी था, लेकिन इससे फौरी तौर पर आम लोगों की भी परेशानी बढ़ गई है। घबराने की जरूरत नहीं है, आम लोगों के लिए ये हैं उपाय:

1. शांत रहें, आपके पास पुराने नोटों को बैंक या पोस्ट ऑफिस में बदलने या जमा करने के लिए 50 दिन हैं। बाकी नोट और सिक्के पहले की तरह चलते रहेंगे।


2. इमरजेंसी की जरूरतों के लिए ये उपाय हो सकते हैं-

सरकार की तरफ से मेडिकल इमरजेंसी जैसी स्थितियों के लिए कुछ छूट दी गई है। 8 नवंबर की आधी रात से अगले 72 घंटों तक यानी 11 नवंबर की आधी रात तक सरकारी अस्पतालों में 500 और 1000 के पुराने नोट स्वीकार किए जाएंगे। इस दौरान सरकारी अस्पतालों के दवाखानों में डॉक्टरों की पर्ची पर दवा खरीदने में पुराने नोटों का इस्तेमाल हो सकता है।

रेल टिकट बुकिंग और एयर ट्रेवल बुकिंग लिए पहले 72 घंटों तक पुराने नोटों का इस्तेमाल हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर विदेश से आने या विदेश जाने वाले यात्रियों के लिए 5 हजार रुपये मूल्य के पुराने नोटों को बदले जाने की सुविधा उपलब्ध रहेगी।

शुरुआती 72 घंटों के लिए सरकारी कंपनियों के अधिकृत पेट्रोल, डीजल और सीएनजी स्टेशनों, दूध के बूथों, सरकारी को-ऑपरेटिव स्टोर्स पर पुराने नोट चलेंगे।

इलेक्ट्रॉनिक फंड पेमेंट, क्रेडिट और डेबिट कार्ड से लेन-देन पर कोई रोक नहीं

3. वॉलिट्स, घर की आलमारी, ड्रावर्य, बैंक के लॉकर्स समेत उन सभी जगहों पर जहां-जहां आपने करंसी रखी हो वहां से नोट इकट्ठा कर लें।

4. इन नोटों में से 500 और 1000 के नोटों को छांट लें और अच्छे से गिन लें।

5. जाहिर है, बैंकों और डाक घरों में 10 नवंबर से लंबी कतारें रहेंगी, इसलिए इसके लिए तैयार रहें। 10 नवंबर से 24 नवंबर तक 4 हजार रुपये मूल्य तक के पुराने नोट बदले जा सकेंगे। 25 नवंबर के बाद यह सीमा बढ़ाई जाएगी। अपने साथ आईडी कार्ड ले जाना न भूलें।

6. शुरुआत में हर दिन सिर्फ 10 हजार रुपये और हर सप्ताह 20 हजार रुपये ही निकाले जा सकेंगे, इसलिए जहां तक संभव हो, खरीदारी के लिए क्रेडिट/डेबिट कार्ड का इस्तेमाल करें।

7. अगर 30 दिसंबर तक आप अपने सभी पुराने नोट नहीं जमा कर पाते हैं तो कोई बात नहीं। तब भी आपके पास एक रास्ता होगा। आप आरबीआई के अधिकृत कार्यालयों पर अपना आईडी कार्ड दिखाकर एक घोषणा पत्र भरकर 31 मार्च 2017 तक इन पुराने नोटों को जमा कर सकेंगे।

8. जहां तक संभव हो, जो भी नोट जमा करें या बदलें उसके सीरियल नंबर की सूची तैयार रखें। आरबीआई पहले ही ऐलान कर चुका है कि बैंक या डाक घरों में जमा या एक्सचेंज किए जा रहे नोटों पर नजर रखी जाएगी। बहुत मुमकिन है कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट भी इस पर नजर रखेगी कि कौन कितना धन जमा या एक्सचेंज कर रहा है, इसलिए उतना ही नोट बदलें जितने के बारे में आप टैक्स डिपार्टमेंट को एक्सप्लेन करना चाह रहे हैं।

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 23)

🌞 दूसरा अध्याय

🔴 हमसे भी जिन परमाणुओं का काम पड़ेगा वह स्वभावतः हमारी परिक्रमा करेंगे क्योंकि हम चेतना के केन्द्र हैं। इस बिल्कुल स्वाभाविक चेतना को भलीभाँति हृदयंगम कर लेने से तुम्हें अपने अन्दर एक विचित्र परिवर्तन मालूम पड़ेगा। ऐसा अनुभव होता हुआ प्रतीत होगा कि मैं चेतना का केन्द्र हूँ और मेरा संसार, मुझसे सम्बन्धित समस्त भौतिक पदार्थ मेरे इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। मकान, कपड़े, जेवर-धन, दौलत आदि मुझसे सम्बन्धित हैं, पर वह मुझमें व्याप्त नहीं, बिल्कुल अलग है। अपने को चेतना का केन्द्र समझने वाला, अपने को माया से सम्बन्धित मानता है, पर पानी में पड़े हुए कमल के पत्ते की तरह कुछ ऊँचा उठा रहता है, उसमें डूब नहीं जाता।

🔵  जब वह अपने को तुच्छ, अशक्त और बँधे हुए जीव की अपेक्षा चेतन-सत्ता और प्रकाश-केन्द्र स्वीकार करता है, तो उसे उसी के अनुसार परिधान भी मिलते हैं। बच्चा जब बड़ा हो जाता है तो उसके छोटे कपड़े उतार दिये जाते हैं। अपने को हीन, नीच और शरीराभिमानी तुच्छ जीव जब तक समझोगे, तब तक उसी के लायक कपड़े मिलेंगे। लालच, भोगेच्छा, कामेच्छा, चाटुकारिता, स्वार्थपरता आदि गुण तुम्हें पहनने पड़ेंगे, पर जब अपने स्वरूप को महानतम अनुभव करोगे, तब यह कपड़े निरर्थक हो जायेंगे। छोटा बच्चा कपड़े पर टट्टी कर कर देने में कुछ बुराई नहीं समझता, किन्तु बड़ा होने पर वह ऐसा करने से घृणा करता है।

🔴 कदाचित बीमारी की दशा में वह ऐसा कर भी बैठे, तो अपने को बड़ा धिक्कारता है और शर्मिन्दा होता है। नीच विचार, हीन भावनाएँ, पाशविक इच्छाएँ और क्षुद्र स्वार्थपरता ऐसे ही गुण हैं, जिन्हें देखकर आत्म-चेतना में विकसित हुआ मनुष्य घृणा करता है। उसे अपने आप वह गुण मिल गये होते हैं, जो उसके इस शरीर के लिए उपयुक्त हैं। उदारता, विशाल हृदयता, दया, सहानूभूति, सच्चाई प्रभृति गुण ही तब उसके लायक ठीक वस्त्र होते हैं। बड़ा होते ही मेढक की लम्बी पूँछ जैसे स्वयमेव झड़ पड़ती है, वैसे ही दुर्गुण उससे विदा होने लगते हैं और वयोवृद्घ हाथी के दाँत की तरह सद्गुण क्रमशः बढ़ते रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/Main_Kya_Hun/v4.2

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 12)

🌹युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री कार्यक्रम

🔵 यदि अपना दृष्टिकोण बदल दिया जाय, संयम और नियमितता की नीति अपना ली जाय तो फिर न बीमारी रहे और न कमजोरी। अपनी आदतें ही संयमशीलता और आहार-विहार में व्यवस्था रखने की बनानी होंगी। इस निर्माण में जिसे जितनी सफलता मिलेगी वह उतना आरोग्य लाभ का आनन्द भोग सकेगा। इस संदर्भ में पालन करने योग्य 10 नियम नीचे दिए जा रहे हैं।

🔴 1. दो बार का भोजनभोजन, दोपहर और शाम को दो बार ही किया जाय। प्रातः दूध आदि हल्का पेय पदार्थ लेना पर्याप्त है। बार-बार खाते रहने की आदत बिलकुल छोड़ देनी चाहिए।

🔵 2. भोजन को ठीक तरह चबाया जाय —भोजन उतना चबाना कि वह सहज ही गले से नीचे उतर जाय। इसकी आदत ऐसे डाली जा सकती है कि रोटी अकेली, बिना साग के खावे और साग को अलग से खावें। साग के साथ गीली होने पर रोटी कम चबाने पर भी गले के नीचे उतर जाती है। पर यदि उसे बिना शाक के खाया जा रहा है तो उसे बहुत देर चबाने पर ही गले से नीचे उतारा जा सकेगा। यह बात अभ्यास के लिये है। जब आदत ठीक हो जाय तो शाक मिलाकर भी खा सकते हैं।

🔴 3. भोजन अधिक मात्रा में न हो आधा पेट भोजन, एक चौथाई जल, एक चौथाई सांस आने-जाने के लिये खाली रखना चाहिए। अर्थात् भोजन आधे पेट किया जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞     🌿🌞     🌿🌞

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (अन्तिम भाग )

🔵 और उसके पश्चात् ध्यान की घड़ियों में मैं सदा बहार तथा भीतर एक प्राणवन्त उपस्थिति का अनुभव करता रहा एवं आनन्द में विभोर हो कर मैंने महामंत्र सुना तथा उसे दुहराता रहा।
ओम्! सदैव! सदैव! के लिये आपकी आत्मा मैं हूँ। आपकी शक्ति अनंत है।
उठो जागो और जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाय बढ़ते चलो। तुम ब्रह्म हो! तुम ब्रह्म हो!!

ओम्! ओम्!! ओम!!!


🔴 अगर आप भारत को समझना चाहते हैं, तो विवेकानन्द का अध्ययन कीजिए। उनमें सब सकारात्मक है, नकारात्मक कुछ भी नहीं है।…….
🌹 -विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर

🔵 निस्सन्देह किसी से स्वामी विवेकानन्द के लेखों के लिए भूमिका की अपेक्षा नहीं है। वे स्वयं ही अप्रतिहत आकर्षण हैं।….
🌹 - महात्मा गाँधी

🔴 उनके शब्द महान संगीत हैं, बोथोवन-शैली के टुकड़े हैं, हैंडेल के समवेत गान के छन्द- प्रवाह की भाँति उद्दीपक लय हैं। शरीर में विद्युत्स्पर्श के-से आघात की सिहरन का अनुभव किये बिना मैं उनके इन वचनों का स्पर्श नहीं कर सकता जो तीस वर्ष की दूरी पर पुस्तकों के पृष्ठों में बिखरे पड़े हैं। और जब वे नायक के मुख से ज्वलन्त शब्दों में निकले होंगे तब तो न आघात एवं आवेग पैदा हुए होंगे!
🌹 -रोमाँ रोलाँ

🌹 समाप्त
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

सोमवार, 7 नवंबर 2016

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 22)

🌞 दूसरा अध्याय

🔴 हाँ, तो उपरोक्त ध्यानावस्था में होकर अपने सम्पूर्ण विचारों को 'मैं' के ऊपर इकट्ठा करो। किसी बाहरी वस्तु या किसी आदमी के सम्बन्ध में बिलकुल विचार मत करो। भावना करनी चाहिए कि मेरी आत्मा यथार्थ में एक स्वतंत्र पदार्थ है। वह अनन्त बल वाला अविनाशी और अखण्ड है। वह एक सूर्य है, जिसके इर्द-गिर्द हमारा संसार बराबर घूम रहा है, जैसे सूर्य के चारों ओर नक्षत्र आदि घूमते हैं। अपने को केन्द्र मानना चाहिए और सूर्य जैसा प्रकाशवान। इस भावना को बराबर लगातार अपने मानस लोक में प्रयत्न की कल्पना और रचना शक्ति के सहारे स्थिर करो।

🔵 मानस लोक के आकाश में अपनी आत्मा को सूर्य रूप मानते हुए केन्द्र की तरह स्थित हो जाओ और आत्मा से अतिरिक्त अन्य सब चीजों को नक्षत्र तुल्य घूमती हुई देखो। वे मुझसे बँधी हुई हैं, मैं उनसे बँधा नहीं हूँ। अपनी शक्ति से मैं उनका संचालन कर रहा हूँ। फिर भी वे वस्तुएँ मेरी या मैं नहीं हूँ, लगातार परिश्रम के बाद कुछ दिनों में यह चेतना दृढ़ हो जाएगी।

🔴 वह भावना झूँठी या काल्पनिक नहीं है। विश्व का हर एक जड़-चेतन परमाणु बराबर घूम रहा है। सूर्य के आस-पास पृथ्वी आदि ग्रह घूमते हैं और समस्त मण्डल एक अदृश्य चेतना की परिक्रमा करता रहता है। हृदयगत चेतना के कारण रक्त हमारे शरीर की परिक्रमा करता रहता है। शब्द, शक्ति, विचार या अन्य प्रकार के भौतिक परमाणुओं का धर्म परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ना है। हमारे आस-पास की प्रकृति का यह स्वाभाविक धर्म अपना काम कर रहा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 11)

🌹 युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री कार्यक्रम

🔵 युग-निर्माण के लिये आवश्यक विचार-क्रान्ति का उपयोग यदि शरीर-क्षेत्र में किया जा सके तो हमारा बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य सुधर सकता है। बीमारियों से सहज ही पिण्ड छूट सकता है। आज अपने शरीर की जो स्थिति है कल से ही उसमें आशाजनक परिवर्तन आरम्भ हो सकता है। अस्वस्थता का कारण असंयम एवं अनियमितता ही है। प्रकृति के आदेशों का उल्लंघन करने के दण्ड स्वरूप ही हमें बीमारी और कमजोरी का कष्ट भुगतना पड़ता है। सरकारी कानूनों की तरह प्रकृति के भी कानून हैं।

🔴 जिस प्रकार राज्य के कानूनों को तोड़ने वाले अपराधी जेल की यातना भोगते हैं वैसे ही प्रकृति के कानूनों की अवज्ञा कर स्वेच्छाचार बरतने वाले व्यक्ति बीमारियों का कष्ट सहते हैं और अशक्त, दुर्बल बने रहते हैं। पूर्व जन्मों के प्रारब्ध दण्ड स्वरूप मिलने वाले तथा प्रकृति प्रकोप, महामारी, सामूहिक अव्यवस्था, दुर्घटना एवं विशेष परिस्थिति वश कभी-कभी संयमी लोगों को भी शारीरिक कष्ट भोगने पड़ते हैं, पर 90 प्रतिशत शारीरिक कष्टों में हमारी बुरी आदतें और अनियमितता ही प्रधान कारण होती हैं।

🔵 सृष्टि के सभी जीव-जन्तु निरोग रहते हैं। अन्य पशु और उन्मुक्त आकाश में विचरण करने वाले पक्षी यहां तक कि छोटे-छोटे कीट-पतंग भी समय आने पर मरते तो हैं, पर बीमारी और कमजोरी का कष्ट नहीं भोगते। जिन पशुओं को मनुष्य ने अपने बन्धन में बांधकर अप्राकृतिक रहन-सहन के लिए जितना विवश किया है उतनी अस्वस्थता का त्रास उन्हें भोगना पड़ता, अन्यथा रोग और दुर्बलता नाम की कोई वस्तु इस संसार में नहीं है। उसे तो हम स्वेच्छाचार बरत कर स्वयं ही बुलाया करते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 10

 🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 यह सोचना उचित नहीं कि इतने बड़े संसार में 25 लाख व्यक्ति नगण्य हैं, उनके सुधरने से क्या बनने वाला है? परिवार के प्रत्येक सदस्य को यह विचारधारा दस अन्य व्यक्तियों तक प्रसारित करते रहने की शपथपूर्वक प्रतिज्ञा लेनी पड़ती है। उसके पास जो ‘अखण्ड ज्योति’ मासिक एवं ‘युग-निर्माण’ पात्रिक पत्रिकाएं पहुंचती हैं, उन्हें स्वयं ही पढ़ना पर्याप्त नहीं होता, वरन् कम से कम दूसरे दस को उन्हें पढ़ाने या सुनाने की भी व्यवस्था करनी पड़ती है।

🔴 इस प्रकार अपने 25 लाख व्यक्ति दस-दस से सम्बन्धित रहने के कारण 25 करोड़ व्यक्तियों तक यह प्रकाश पहुंचाते रहते हैं। इनमें से निश्चित रूप से कुछ योजना के विधिवत् सदस्य बढ़ेंगे ही—अखण्ड-ज्योति परिवार में सम्मिलित होंगे ही। फिर उन्हें भी दस नये व्यक्तियों तक यह प्रकाश पहुंचाने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होना पड़ेगा। इस तरह प्रचार परम्परा की यह पीढ़ी—एक से दस—एक से दस में गुणित होती हुई पांच-छह छलांगों में सारे विश्व में अपना प्रभाव प्रस्तुत कर सकेगी और जो अभियान आरम्भ किया गया है, उस स्वप्न को साकार रूप में प्रस्तुत कर सकेगी।

🔵 ‘युग-निर्माण योजना’ इसी अभाव की पूर्ति का एक विनम्र प्रयास है। इसका प्रारम्भ बहुत ही छोटे रूप में किया जा रहा है और आशा यह की जा रही है कि जिस तरह एक छोटा बीज अपने आपको गला कर विशाल वृक्ष के रूप में परिणत होता है और उस वृक्ष पर लगने वाले फलों में रहने वाले बीज सहस्रों अन्य बीजों की उत्पत्ति का कारण बन जाते हैं। उसी प्रकार यह शुभारम्भ बहुत छोटे रूप में किया जा रहा है, पर विश्वास यह किया जा रहा है कि यह तेजी से बढ़ेगा और इसका प्रकाश समस्त विश्व को—समस्त मानव जाति का—समस्त प्राणियों को प्राप्त होगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 6 नवंबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 71)

🔵 आपका प्रेम और आशीर्वाद जो कि आपने इतनी कृपापूर्वक मेरे प्रति प्रदर्शित किया उस पर मैंने अपनी बेईमानी से आघात किया। मैं आपके लिये अति अयोग्य था। अपने अंहकार में मैं आपको भूल गया तथा आपके स्थान पर स्वयं को मैंने मनुष्य के नेता के स्थान में बिठा दिया जिससे कि लोग मुझे महान कहें। किन्तु हे प्रभु अब मैंने समझ लिया है। मैंने अपने अशुद्ध हाथों से आपके उपदेशों को दूषित कर दिया तथा आपके उपदेशों को अपवित्र कर दिया। किन्तु आपकी कृपा असीम रही है। मेरे प्रति आपका प्रेम अनिर्वचनीय रहा है। वस्तुत: आपका स्वभाव दिव्य है। माँ का अपने बच्चे के प्रति जो प्रेम है, आपका अपने शिष्य के प्रति प्रेम उससे भी अधिक है।

🔴 हे प्रभु! आपने अपनी शक्ति से मुझपर तब तक आघात किया जब तक कि मैं पूर्ण नहीं हो गया तथा आपने मुझे उसी प्रकार गढ़ा जैसा कि एक कुम्हार मिट्टी के लोंदे को जैसा रूप चाहे वैसा रूप दे देता है। आपकी कृपा, आपका धैर्य, आपकी मधुरता, असीम है। मैं आपकी पूजा करता हूँ। मेरे हाथ, पैर, जीभ, आँखें, कान, मेरा संपूर्ण शरीर, मन इच्छा, भावनायें, मेरा संपूर्ण व्यक्तित्व पूर्णाहुति के रूप में समर्पित हो तथा आपके प्रति मेरी भक्ति की ज्वाला में सब कुछ पवित्र हो जाये। मेरा शुभ, अशुभ, वह सब जो मैं था, हूँ या कभी होऊँगा, जन्म- जन्मान्तर में होऊँगा, वह सब आपके प्रति समर्पित है। आप ही मेरे ईश्वर और मुक्ति हैं। आपही मेरी महान आत्मा हैं। मैं कुछ भी संग्रह न करूँ। आपके हृदय के अतिरिक्त मेरा और कोई घर न हो। अभी इसी क्षण तथा सदैव के लिये मेरा जीवन पवित्रता की प्रभा हो।

हरि: ओम् तत् सत्

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 21)

🌞 दूसरा अध्याय

🔴 अच्छा चलो, अब साधना की ओर चलें। किसी एकान्त स्थान की तलाश करो। जहाँ किसी प्रकार के भय या आकर्षण की वस्तुएँ न हों, यह स्थान उत्तम है! यद्यपि पूर्ण एकान्त के आदर्श स्थान सदैव प्राप्त नहीं होते तथापि जहाँ तक हो सके निर्जन और कोलाहल रहित स्थान तलाश करना चाहिए। इस कार्य के लिए नित नये स्थान बदलने की अपेक्षा एक जगह नियत कर लेना अच्छा है। वन, पर्वत, नदी तट आदि की सुविधा न हो, तो एक छोटा-सा कमरा इसके लिए चुन लो, जहाँ तुम्हारा मन जुट जाये। इस तरह मत बैठो जिससे नाड़ियों पर तनाव पड़े। अकड़कर, छाती या गरदन फुलाकर, हाथों को मरोड़कर या पाँवों को ऐंठकर एक-दूसरे के ऊपर चढ़ाते हुए बैठने के लिए हम नहीं कहेंगे, क्योंकि इन अवस्थाओं में शरीर को कष्ट होगा और वह अपनी पीड़ा की पुकार बार-बार मन तक पहुँचाकर उसे उचटने के लिए विवश करेगा।

🔵 शरीर को बिल्कुल ढीला शिथिल कर देना चाहिए, जिससे समस्त माँस पेशियाँ ढीली हो जावें और देह का प्रत्येक कण शिथिलता, शान्ति और विश्राम का अनुभव करे। इस प्रकार बैठने के लिए आराम कुर्सी बहुत अच्छी चीज है। चारपाई पर लेट जाने से भी काम चल जाता है, पर सिर को कुछ ऊँचा रखना जरूरी है। मसनद, कपड़ों की गठरी या दीवार का सहारा लेकर भी बैठा जा सकता है। बैठने का कोई तरीका क्यों न हो, उसमें यही बात ध्यान रखने की है शरीर रुई की गठरी जैसा ढीला पड़ जावे, उसे अपनी साज सँभाल में जरा-सा भी प्रयत्न न करना पड़े। उस दशा में यदि समाधि चेतना आने लागे, तब शरीर के इधर-उधर लुढ़क पड़ने का भय न रहे। इस प्रकार बैठकर कुछ शरीर को विश्राम और मन को शान्ति का अनुभव करने दो।

🔴 प्रारम्भिक समय में यह अभ्यास विशेष प्रयत्न के साथ करना पड़ता है। पीछे अभ्यास बढ़ जाने पर तो साधक जब चाहे तब शान्ति का अनुभव कर लेता है, चाहे वह कहीं भी और कैसी भी दशा में क्यों न हो। सावधान रहिए कि यह दशा तुमने स्वप्न देखने या कल्पना जगत में चाहे जहाँ उड़ जाने के लिए पैदा नहीं की है और न इसलिए कि इन्द्रिय विकार इस एकान्त वन में कबड्डी खेलने लगें। ध्यान रखिए अपनी इस ध्यानावस्था को भी काबू में रखना और इच्छानुवर्ती बनाना है। यह अवस्था इच्छापूर्वक किसी निश्चित कार्य पर लगाने के लिए पैदा की गई है। आगे चलकर यह ध्यानावस्था चेतना का एक अंग बन जाती है और फिर सदैव स्वयमेव बनी रहती है। तब उसे ध्यान द्वारा उत्पन्न नहीं करना पड़ता, वरन् भय, दुःख, क्लेश, आशंका, चिन्ता आदि के समय में बिना यत्न के ही वह जाग पड़ती हैं और साधक अनायास ही उन दुःख क्लेशों से बच जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 5 नवंबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 70)

🔵 गुरुदेव के इन शब्दों को दिन पर दिन ध्यान की घड़ियों में हुये गुरु शिष्य के वास्तविक संबंध के विषय में मैं सचेत हो सका। एक अविचल और शाश्वत अनुभूति मेरी अपनी हो गई तथा मैंने यह जान लिया कि दूर या पास, जीवन या मृत्यु सभी में एक महान जीवन्त अस्तित्व सदैव मेरे निकट है। एक अस्तित्व जिसमें अलगाव नहीं है। और गुरुदेव के पास मैं रो पड़ा। तथा उस समय एक महान ज्योति ने मुझे आवृत कर लिया।

🔴 ''अपनी कृपा से आपने मुझे अंधकार से बहार निकाला है। मैं कुछ भी नहीं था किन्तु आपने मुझे उसी रूप में स्वीकार किया और एक ऐसा भक्त बना दिया जो कि अपने अन्तर्निहित असीम शक्ति के संबंध में सजग है। जबसे मैंने आपकी वाणी सुनी और ऐसे सुनी जैसे कभी न सुने हुए तीव्र संगीत को सुन कर कोई व्यक्ति नशे में धुत हो जाय। किन्तु मेरी स्वयं की प्रतिक्रिया कोलाहलपूर्ण और उबलनेवाली थी तथा जो मैंने सुना उसे समझा नहीं। सामने आपके मुख पर आपकी ज्योति इतनी प्रचण्ड थी कि मैं आपको उस रूप में न देख सका, जैसे कि आप हैं। अत: अज्ञानपूर्वक मैंने उस खजाने को जो आपने मुझे इतनी उदारतापूर्वक दिया था अमर्यादित रूप से नष्ट कर दिया तथा मैंने जघन्य पापी के समान आपकी उपस्थिति में पाप किया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 20)

🌞 दूसरा अध्याय

🔴 अब हमारा प्रयत्न यह होगा कि मानसिक लोक में प्रवेश कर चलो और वहाँ बुद्घि के दिव्य चक्षुओं द्वारा आत्मा का दर्शन और अनुभव करो। यही एक मार्ग दुनियाँ के सम्पूर्ण साधकों का है। तत्त्व दर्शन मानस लोक में प्रवेश करके बुद्घि की सहायता द्वारा ही होता है। इसके अतिरिक्त आज तक किसी ने कोई और मार्ग अभी तक नहीं खोज पाया है। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ही योग की उच्च सीढ़ियाँ हैं। आध्यात्मिक साधक, योगी, यम, नियम, आसन, प्राणायाम अनेक प्रकार की क्रियाएँ करते हें। हठ योगी नेति, धोति, वस्ति, वज्रोली आदि करते हैं। अन्य मतावलम्बियों की साधनाएँ अन्य प्रकार की हैं। यह सब शारीरिक कठिनाइयों को दूर करने के लिए हैं।

🔵 शरीर को स्वस्थ रखना इसलिए जरूरी समझा जाता है कि मानसिक अभ्यासों में गड़बड़ न पड़े। हम अपने साधकों को स्वस्थ शरीर रखने का उपदेश करते हैं। आज की परिस्थितियों में उन उग्र शारीरिक व्यायामों की नकल करने में हमें कोई विशेष लाभ प्रतीत नहीं होता। धुएँ से भरे हुए शहरी वायुमण्डल में रहने वाले व्यक्ति को उग्र प्राणायाम करने की शिक्षा देना उसके साथ अन्याय करना है।

🔴 फल और मेवे खाकर पर्वत प्रदेशीय नदियों का अमृत जल पीने वाले और इन्द्रिय भोगों से दूर रहने वाले स्वस्थ साधक हठ योग के जिन कठोर व्यायामों को करते हैं, उनकी नकल करने के लिए यदि तुमसे कहें, तो हम एक प्रकार का पाप करेंगे और बिना वास्तविकता को जाने उन शारीरिक तपों में उलझने वाले साधक उस मेढकी का उदाहरण बनेंगे जो घोड़ों को नाल ठुकवाते देखकर आपे से बाहर हो गई थी और अपने पैरों में भी वैसी ही कील ठुकवा कर मर गई थी।

🔵 स्वस्थ रहने के साधारण नियमों को सब लोग जानते हैं। उन्हें ही कठोरतापूर्वक पालन करना चाहिए। यदि कोई रोग हो तो किसी कुशल चिकित्सक से इलाज कराना चाहिए। इस सम्बन्ध में एक स्वतंत्र पुस्तक हम भी प्रकाशित करेंगे। पर इस साधन के लिए किसी ऐसी शारीरिक योग्यता की आवश्यकता नहीं है, जिसका साधन चिरकाल में पूरा हो सकता हो। स्वस्थ रहो, प्रसन्न रहो, बस इतना ही काफी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 9


🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 तब हम 30 हजार व्यक्ति एक जुट होकर इस शत-सूत्री कार्यक्रम में संलग्न हुए थे। गुरु-पूर्णिमा, (आषाढ़ सुदी 15) जून सन् 62 को इस महान् अभियान का विधिवत् उद्घाटन हुआ था। इन सभी को हर सदस्य कार्यान्वित करे—यह आवश्यक नहीं, पर जिससे जितना संभव हो सके, जिन कार्यक्रमों को अपनाया जा सके, उन्हें अपनाना चाहिए। वैसा ही परिजन कर भी रहे हैं। जैसे-जैसे एवं मनोबल बढ़ता चलेगा, अधिक तेजी से कदम आगे बढ़ेंगे।

🔴 अखण्ड-ज्योति के दस सदस्य या उससे थोड़े न्यूनाधिक सदस्य जहां कहीं हैं, वहां उनका एक संगठन बनाया जा रहा है। एक शाखा-संचालक तथा पांच अन्य व्यक्तियों की कार्य समिति चुन ली जाती है। इस शाखा का कार्यालय जहां रहता है, उसे युग-निर्माण केन्द्र कहते हैं। यह केन्द्र सदस्यों के परस्पर मिलने-जुलने का एक मिलन-मन्दिर बन कर योजना की रचनात्मक प्रवृत्तियों के संचालन का उद्गम बन जाता है।

🔵 इस स्थान पर अनिवार्य रूप से एक युग-निर्माण पुस्तकालय रहता है, जहां से जनता में घर-घर जीवन निर्माण का सत्साहित्य पहुंचाने पढ़ाने वापिस लाने एवं अभिरुचि उत्पन्न करने की प्रक्रिया चलती रहती है। परस्पर विचार विनिमय द्वारा सुविधानुसार जो कुछ जहां किया जाना सम्भव होता है, वह वहां किया जाता रहता है। इन कार्यों की सूचना ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक पत्रिका में छपती रहती है जिससे सभी शाखाओं को देशभर में चलने वाली इस महान् प्रक्रिया की प्रगति का पता चलता रहता है और समय-समय पर आवश्यक प्रकाश एवं मार्गदर्शन भी प्राप्त होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 69)

🔵 तुम्हें किसी रूप की आवश्यकता नहीं है। संन्यास वृत्ति का ही महत्त्व है, वेश का नहीं। विद्वत् संन्यास ही असल संन्यास है जो कि अन्तर्ज्ञान का पर्यायवाची है। तुम्हारा नाम लक्ष्य के लिये आप्राण चेष्टा करनेवालों में हो। साधु जीवन में अनन्त विकास है। वेश कुछ नहीं जीवन ही सब कुछ है।

🔴 शक्ति में इन्द्र के समान बनो। स्थिरता में हिमालय के समान बनो। सर्वोपरि निस्वार्थी बनो तथा अपनी आत्मा से संपर्क करो। मेरे नाम को तुम्हारा मंत्र बन जाने दो। मेरी आत्मा से तुम्हारी आत्मा के मिलन को तुम्हारा योग बन जाने दो वस्तुओं की अन्तरात्मा में मैं और तुम एक हैं इस सचेत ज्ञान को तुम्हारी अनुभूति बनने दो। भेद ही मृत्यु है। एकत्व ही जीवन है।

🔵 तुमने मेरी वाणी सुनी है; तुमने मेरा उपदेश ग्रहण किया है, अब नि:शंक हो कर उनका पालन करो। असीम प्रेम करो। निःस्वार्थ कार्य करो। मेरे उपकरण बन जाओ। तुम्हारे व्यक्तित्व को ही मेरा बन जाने दो। कहो, शिवोऽहम्!!

🔴 यह समस्त ब्रह्माण्ड ही ब्रह्म है। तुममें और मुझमें जो समान रूप से ब्रह्म है उसे खोजो। उस ब्रह्म को स्वयं में तथा सभी में एकम् अद्वितीयम् सच्चिदानन्द के रूप में अनुभव करो और मुक्त हो जाओ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 19)

🌞 दूसरा अध्याय

🔴 मानसिक लोक भी स्थूल लोक की तरह ही है। उसमें इसी बाहरी दुनियाँ की ही अधिकांश छाया है। अभी हम कलकत्ते का विचार कर रहे हैं, अभी हिमालय पहाड़ की सैर करने लगे। अभी जिनका विचार किया था, वह स्थूल कलकत्ता और हिमालय नहीं थे, वरन् मानस लोक में स्थित उनकी छाया थी, यह छाया असत्य नहीं होती। पदार्थों का सच्चा अस्तित्व हुए बिना कोई कल्पना नहीं हो सकती। इस मानस लोक को भ्रम नहीं समझना चाहिए। यही वह सूक्ष्म चेतना है, जिसकी सहायता से दुनियाँ के सारे काम चल रहे हैं।

🔵 एक दुकानदार जिसे परदेश से माल खरीदने जाना है, वह पहले उस परदेश की यात्रा मानसलोक में करता है और मार्ग की कठिनाइयों को देख लेता है, तदनुसार उन्हें दूर करने का प्रबन्ध करता है। उच्च आध्यात्मिक चेतनाएँ मानसलोक से आती हैं। किसी के मन में क्या भाव उपज रहे हैं, कौन हमारे प्रति क्या सोचता है, कौन सम्बन्धी कैसी दशा में है आदि बातों को मानसलोक में प्रवेश करके हम अस्सी फीसदी ठीक-ठीक जान लेते हैं।

🔴  यह तो साधारण लोगों के काम-काज की मोटी-मोटी बातें हुईं। लोग भविष्य को जान लेते हैं, भूतकाल का हाल बताते हैं, परोक्ष ज्ञान रखते हैं। ईश्वरीय सब चेतनाएँ मानस लोक में ही आती हैं। उन्हें ग्रहण करके जीभ द्वारा प्रगट कर दिया जाता है। यदि यह मानसिक इन्द्रियाँ न हुई होतीं तो मनुष्य बिल्कुल वैसा ही चलता-फिरता हुआ पुतला होता जैसे यांत्रिक मनुष्य विज्ञान की सहायता से योरोप और अमेरिका में बनाये गये हैं। दस सेर मिट्टी और बीस सेर पानी के बने हुए इस पुतले की आत्मा और सूक्ष्म जगत से सम्बन्ध जोड़ने वाली चेतना यह मानस-लोक ही समझनी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 8

🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 जिस प्रकार सर्वसाधारण को अपने रक्त सम्बन्धित परिवार को सुविकसित करने की जिम्मेदारी उठाने पड़ती है, उसी प्रकार हम अपने, इन तीस हजार कुटुम्बियों को लेकर जीवन-निर्माण कार्य में अवतीर्ण हो रहे हैं। उन्हें सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा तो बहुत पहले से दे रहे थे पर अब उनके सामने शत-सूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत करके आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता को जीवन व्यवहार में समन्वित करने का अभ्यास करा रहे हैं। यों इन कार्यक्रमों को लाखों व्यक्तियों द्वारा अपनाये जाने पर इनका प्रभाव समाज के नव-निर्माण की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण दूरवर्ती एवं चिरस्थायी होगा।

🔴 बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति की महान आवश्यकता की वह चिनगारी जलेगी जो आगे चलकर पाप-तापों का भस्मसात करने में दावानल का रूप धारण कर सके। साथ ही इसमें आत्म-कल्याण एवं जीवन-मुक्ति का उद्देश्य भी सन्निहित है। यह योजना व्यक्ति को निकृष्ट स्तर का जीवनयापन करने की दुर्दशा से ऊंचा उठा कर उत्कृष्टता अपनाने की आध्यात्मिक साधना का अवसर उपस्थित करती है। इसलिए उसे एक प्रकार की योग साधना, तपश्चर्या, नर-नारायण की भक्ति तथा भावोपासना भी कह सकते हैं।

🔵 इस मार्ग पर चलते हुए—शत-सूत्री कार्यक्रमों में से जिसे जितने अनुकूल पड़े, उन्हें अपनाते हुए निश्चित रूप से साहस एवं मनस्विता का परिचय देना पड़ेगा। कई व्यक्ति उपहास एवं विरोध करेंगे। स्वार्थों को भी सीमित एवं संयमित करना पड़ेगा। आर्थिक दृष्टि से थोड़ा घाटा भी रह सकता है और अपने पूर्व संचित कुसंस्कारों से लड़ने में कठिनाई भी दृष्टिगोचर हो सकती है।

🔴 जो इतना साहस कर सकेगा उसे सच्चे अर्थों में साधना समर का शूरवीर योद्धा कहा जा सकेगा। यह साहस ही इस बात की कसौटी मानी जायगी कि किसी व्यक्ति ने आध्यात्मिक विचारों को हृदयंगम किया है, या केवल सुना समझा भर है। योजना एक विशुद्ध साधना है जो युग-निर्माण का—समाज की अभिनव रचना का उद्देश्य पूरा करते हुए व्यक्ति को उसका जीवन लक्ष्य पूरा कराने में किसी भी अन्य जप-तप वाली साधना की अपेक्षा अधिक सरलता से पूर्णता के लक्ष्य तक पहुंचा सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 68)

🔵 मेरा वास्तविक स्वरूप तो वह है जिसने वहा मेरे उपदेशों को प्रेरित किया। जैसा मैं हूँ उस रूप में मुझे जानो, जैसा था उसमें नहीं। आत्मानुभूत्यात्मक रूपमें मुझे अपनी आत्मा में जानो और तब तुम सभी में आत्मा के दर्शन करोगे तथा सीमाओं एवं विविधता का तुम पर कोई प्रभाव न होगा। मैं बाह्य नहीं हूँ। मंक अन्तःकरण में निवास करता हूँ। तुम्हारी प्रेरणा में मैं तुम्हारे साथ हूँ। देश काल संबंधों का आत्मा पर कोई अधिकार नहीं है तथा वे आध्यात्मिक संबंध के बीच में नहीं आ सकते।

🔴 मैं तुम्हारा अन्तर्यामी हूँ। मुझे उस रूप में जानो और फिर तुम्हारा जन्म चाहे मुझसे दस हजार वर्ष पश्चात् भी हुआ हो, चाहे मृत्यु के समय भी हमें अलग करने वाले परदे नष्ट न हुए हों, उससे कुछ आता जाता नहीं है। प्रेम तथा अनुभूति में कोई सीमायें नहीं हैं। मैं इसकी भी आवश्यकता अनुभव कर सकता हूँ कि दृश्य रूप तुम्हारा मुझसे भिन्न रहे तथा तुम परिश्रम करो। यद्यपि तुम नहीं देख पाते किन्तु मैं आवरणों के आर- पार देखता हूँ। मैं सर्वदा तुम्हारे साथ हूँ भले ही तुम इसे जानो या न जानो। फिर भी वह समय आयेगा जब तुम इस सत्य के संबंध में सचेत होओगे। जिस प्रकार हाथी के दाँत एक बार निकल जाने पर फिर वापस नहीं जाते उसी प्रकार गुरु का प्रेम एक बार प्रदान करने पर अनंत काल तक रहता है।

🔵 मेरे सेवक हो कर तुमने स्वयं को मुक्त कर लिया है। तुम्हारी मुक्ति उसी अनुपात में है जिस अनुपात में तुम मेरी सेवा करते हो। और यह जान लो कि तुम यद्यपि मेरे लिये परिश्रम करते हो किन्तु मेरी दृष्टि में मेरे कार्य के लिये परिश्रम करने की अपेक्षा मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम और विश्वास  अधिक मूल्यवान है। ब्रह्माण्ड असीम है तथा समय शाश्वत किन्तु मैं सदैव तुम्हारी पुकार पर आने को सन्नद्ध हूँ।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 18)

🌞 दूसरा अध्याय

🔴 मूढ़ मनुष्य भद्दे भोगों से तृप्त हो जाते हैं, तो बुद्घिमान कहलाने वाले उनमें सुन्दरता लाने की कोशिश करते हैं। मजदूर को बैलगाड़ी में बैठकर जाना सौभाग्य प्रतीत होता हैं तो धनवान मोटर में बैठकर अपनी बुद्घिमानी पर प्रसन्न होता है। बात एक ही है। बुद्घि का जो विकास हुआ है, वह भोग सामग्री को उन्नत बनाने में हुआ है। समाज के अधिकांश सभ्य नागरिकों के लिए वास्तव में शरीर ही आत्म-स्वरूप है।

🔵 धार्मिक रूढ़ियों का पालन मन-सन्तोष के लिए वे करते रहते हैं, पर उससे आत्म-ज्ञान का कोई सम्बन्ध नहीं। लड़की के विवाह में दहेज देना पुण्य कर्म समझा जाता है। पर ऐसे पुण्य कर्मों से ही, कौन मनुष्य अपने उद्देश्य तक पहुँच सकता है? यज्ञ, तप, ज्ञान, सांसारिक धर्म में लोक-जीवन और समाज-व्यवस्था के लिए उन्हें करते रहना धर्म है,। पर इससे आत्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती। आत्मा इतनी सूक्ष्म है कि रूपया, पैसा, पूजा-पत्री, दान, मान आदि बाहरी वस्तुएँ उस तक नहीं पहुँच पातीं। फिर इनके द्वारा उसकी प्राप्ति कैसे हो सकती है?

🔴 आत्मा के पास तक पहुँचने के साधन जो हमारे पास मौजूद हैं, वह चित्त, अन्तःकरण, मन, बुद्घि आदि ही हैं। आत्म दर्शन की साधना इन्हीं के द्वारा हो सकती है। शरीर में सर्वत्र आत्मा व्याप्त है। कोई विशेष स्थान इसके लिए नियुक्त नहीं है, जिस पर किसी साधन विशेष का उपयोग किया जाए। जिस प्रकार आत्मा की आराधना करने में मन, बुद्घि आदि ही समर्थ हो सकते हैं, उसी प्रकार उसके स्थान और स्वरूप का दर्शन मानस लोक में प्रवेश करने से हो सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 7

🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 युग-निर्माण योजना का आरम्भ किसी संस्था के आधार पर नहीं, वरन् एक वैयक्तिक प्रयत्न के रूप में आरम्भ कर रहे हैं। समयानुसार उसका कोई संगठित रूप बन जाय, यह आगे की बात है, पर आज तो अपनी स्वल्प सामर्थ्य को देखते हुए ही उस कार्य का श्रीगणेश किया जा रहा है। आत्म-निर्माण की दृष्टि से—इन पंक्तियों का लेखक, इस अभियान का प्रस्तुतकर्ता अधिक आत्मिक पवित्रता के लिए जो कुछ सम्भव है, प्रयास करता रहा है। उसके पिछले 64 वर्ष इसी प्रयत्न में बीते हैं। अब जीवन के जो दिन शेष रहे हैं, उन्हें वह और भी अधिक जागरूकता एवं सतर्कता से आत्म-शोधन, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के लिए लगाने का प्रयत्न करेगा।

🔴 योजना के कार्यक्रमों में दूसरा चरण परिवार निर्माण का है। यों हमारा पांच व्यक्तियों का छोटा-सा परिवार मथुरा के घीया मण्डी मुहल्ले में किराये के मकान में रहता और गुजर करता है। पर दूसरा अपना एक बड़ा परिवार और भी है। वह है—अखण्ड-ज्योति पत्रिका के सदस्यों का जिसे हम सच्चे अर्थों में ‘अपना परिवार’ मानते हैं। गत 62 वर्षों से जिन लोगों के साथ निरन्तर वैसा ही व्यक्तिगत सम्पर्क रखा है वैसा ही उनके सुख-दुःख में भाग लिया है—जैसा कि कोई अंश-वंश के लोगों के साथ रखता या रख सकता है। 62 वर्ष के लम्बे सम्पर्क से हम अपने इसी विचार-परिवार के अत्यधिक निकट आये हैं और एक तरह से उन्हीं में घुल मिल गये हैं। हमने अपनी आत्मा में जलने वाली आग की गर्मी और रोशनी उन्हें दी है, तदनुसार वे विचार ही नहीं, कार्यों की दृष्टि से भी हमारे निकटतम व्यक्ति बन गये हैं।

🔵 अखण्ड-ज्योति परिवार श्रेय-पथ पर चलने वाले 25 लाख व्यक्तियों को एक आध्यात्मिक श्रृंखला में पिरोये रहने वाला सूत्र है। लेखों के आधार पर नहीं, भावना और आत्मीयता के सुदृढ़ संबंधों की मजबूत रस्सी से बंधा हुआ यह एक ऐसा संगठन है, जिसे कौटुम्बिक परिजनों से किसी भी प्रकार कम महत्व नहीं दिया जा सकता। व्यक्तिगत एकता और आत्मीयता के बन्धन हम लोगों के बीच इतनी मजबूती से बंधे हुए हैं कि इस समूह को हमें अपना व्यक्तिगत परिवार कहने में तनिक भी अत्युक्ति दिखाई नहीं पड़ती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...