उन्नति, विकास एवं प्रगति करना प्रत्येक व्यक्ति का परम पावन कर्त्तव्य है। यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो उसके जीवन में जड़ताजन्य अनेक दोष आ जायेंगे, जो इस प्रसन्न मानव जीवन को एक यातना में बदल देंगे। निराशा, चिंता, क्षोभ, ईर्ष्या, द्वेष आदि अवगुण प्रगति शून्य जड़ जीवन के ही फल हुआ करते हैं।
जहाँ वाचालता एक दुर्गुण है, वहां मौन एक रहना दैवी गुण है जिसका अपने में विकास करना ही चाहिए, किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि मनुष्य बिलकुल बात ही न करे। मौन रहने का मूल मन्तव्य यह है कि जितना आवश्यक हो उतना ही बोला जाये। अनावश्यक वार्तालाप न करना अथवा यों ही निरर्थक दिन भर हा-हा, हू-हू न करते रहना भी मौन ही है।
जीवन विकास के लिए यह जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशिष्टता को बढ़ाकर ऐसा विकास करे कि वह अपना, आश्रित परिजनों का जीवन उत्कृष्ट श्रेणी का बनाता हुआ मानवीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अग्रसर होता चले। इस जीवन की शान्ति ही पारलौकिक शान्ति है, इस जीवन का संतोष ही पारलौकिक संतोष है। इस जीवन का सुख ही पारलौकिक सुख है। इसलिए स्वर्ग पाना है तो इसी जीवन को स्वर्ग बना लो।
जहाँ वाचालता एक दुर्गुण है, वहां मौन एक रहना दैवी गुण है जिसका अपने में विकास करना ही चाहिए, किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि मनुष्य बिलकुल बात ही न करे। मौन रहने का मूल मन्तव्य यह है कि जितना आवश्यक हो उतना ही बोला जाये। अनावश्यक वार्तालाप न करना अथवा यों ही निरर्थक दिन भर हा-हा, हू-हू न करते रहना भी मौन ही है।
जीवन विकास के लिए यह जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशिष्टता को बढ़ाकर ऐसा विकास करे कि वह अपना, आश्रित परिजनों का जीवन उत्कृष्ट श्रेणी का बनाता हुआ मानवीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अग्रसर होता चले। इस जीवन की शान्ति ही पारलौकिक शान्ति है, इस जीवन का संतोष ही पारलौकिक संतोष है। इस जीवन का सुख ही पारलौकिक सुख है। इसलिए स्वर्ग पाना है तो इसी जीवन को स्वर्ग बना लो।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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