बुधवार, 4 जनवरी 2023

👉 साधना ऐसी जो प्रत्यक्ष सिद्धि दात्री हो

व्यावहारिक जीवन में शालीनता, सज्जनता, सुव्यवस्था, संयमशीलता आदि सत्प्रवृत्तियों का प्रतिष्ठïापन और संवर्धन करने के उपरांत ही पूजा विधानों के सफल होने की आशा करनी चाहिए। गंदगी से सना बच्चा यदि माता की गोद में बैठने के लिए मचले, तो वह उसकी इच्छा पूरी नहीं करती, प्यारा लगते हुए भी उसके रोने की परवाह नहीं करती। पहला काम करती है- उसे धोना, नहलाना, गंदे कपड़े उतारकर नये स्वच्छ वस्त्र पहनाना। इतना कर चुकने के उपरांत वह उसे गोद में लेती, दुलार करती, खिलाती और दूध पिलाती है। बच्चों की उतावली सफल नहीं होती, माता की व्यवस्था बुद्धि ही कार्यान्वित होती है।
  
अध्यात्म क्षेत्र में इन दिनों एक भारी भ्रांति फैली हुई है कि पूजा परक कर्मकाण्डों के सहारे जादूगरों जैसे चमत्कारी प्रतिफल मिलने चाहिए। देवता को स्तवन पूजन के मनुहार, उपहार पर फुसलाया जाना चाहिए और उससे अपनी उचित-अनुचित मनोकामनाओं को पूरा कराया जाना चाहिए। यह स्थापना अनैतिक है, असंगत भी। यदि इतने सस्ते में मनोकामनाएँ पूरी होने लगे, तो सफलता के लिए कोई क्यों परिश्रम करेगा और क्यों पात्रता विकसित करेगा? फिर सभी उद्योग परायण व्यक्ति मूर्ख समझे जाएंगे और देवता की जेब काटकर उल्लू सीधा करने वाले चतुर। यह मान्यता यदि सही रही होती, तो देव पूजा में अधिकांश समय बिताने वाले पंडित, पुजारी, साधु, बाबाजी अब तक उच्चकोटि की उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने की स्थिति में पहुँच गये होते। जबकि उनमें से अधिकांश सामान्य जनों से भी गई गुजरी स्थिति में देखे जाते हैं। इसी प्रकार तंत्र-मंत्र के फेर में पड़े रहने वाले आतुर और भावुक व्यक्ति बड़ी-बड़ी आशा अभिलाषाएं संजोएँ रहते हैं। समय बीतता जाता है और सफलता के दर्शन नहीं होते, तो फिर वे निराश होने लगते हैं। प्रयास बंद कर देते हैं। अध्यात्म अवलम्बन का उलाहना देते हैं और लगभग नास्तिक स्तर के बन जाते हैं।
  
यह दु:खद परिस्थिति इसलिए उत्पन्न होती है कि उन्होंने आत्म-विज्ञान का तत्त्वदर्शन समझने से पूर्व आतुरता वश मात्र कर्मकाण्ड आरंभ कर दिये और बालू के महल बनाने लगे। जबकि होना यह चाहिए था कि बीज से वृक्ष उत्पन्न होने के सिद्धांत के साथ जुड़े हुए अन्य तथ्यों को भी समझते और उन पर समुचित ध्यान देते। बीज से वृक्ष बनने की बात सच है। साधना से सिद्धि मिलने की भी, परन्तु आदि और अंत को अपना लेना एवं बीच का विस्तार उपेक्षित कर देना सही नीति नहीं है। बीज को ऊर्वर भूमि, खाद और पानी तीनों का सुयोग मिलना चाहिए, वह अंकुरित होगा, बढ़ेगा और फूलेगा-फलेगा।

इतना किये बिना बीज से वृक्ष बना देने की जादूगरी कोई बाजीगर ही कर सकता है, यह उसी का काम है। हथेली पर सरसों जमाना। किसान वैसा नहीं करते। जादूगर रुपये बरसाकर दर्शकों को चकित कर सकते हैं, पर व्यवसायी जानते हैं कि यदि ऐसा संभव रहा होता, तो यह बाजीगर करोडग़ति हो गये होते और किसी को परिश्रम करके व्यवसाय संलग्ïन रहने की आवश्यकता न पड़ती। चलने पर ही रास्ता पूरा होता है। आत्मिक प्रगति, जिसे कोई चाहे तो देव अनुग्रह भी कह सकता है, जीवन को परिष्कृत करने की प्राथमिक आवश्यकता को पूरा किए बिना पकड़ में नहीं आ सकती।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 जीवन के गरिमामय बोध तो हो

एक मजदूर बड़े परिश्रम से कुछ चावल कमाकर लाया था। उन्हें खुशी-खुशी सिर पर रखकर घर लिये जा रहा था। अचानक उस बोरी में छेद  हो गया और धीरे-धीरे उसकी गैर जानकारी में वे चावल पीछे की ओर गिरते गये । यहाँ तक कि कुछ आगे जाने पर उसकी बोरी  ही खाली हो गई। जब पीछे देखा तो उसे होश आया।   फर्लांगों से धीरे-धीरे वह चावल फैल रहे थे और धूल में मिलकर दृष्टिï से ओझल हो गए थे। उसने एक हसरतभरी निगाह उन दानों पर डाली और कहा- काश! मैं इन दानों को फिर  से पा सका होता। पर  वे तो पूरी तरह धूल में गढ़ चुके थे, वे मिल नहीं सकते थे। बेचारा खाली हाथ घर लौटा, दिन भर का परिश्रम, चावलों का बिखर जाना, पेट की जलती हुई ज्वाला इन तीनों की स्मृति उसे बेचैन बनाये दे रही थी।
    
हमारे जीवन का अमूल्य हार कितना सुन्दर है; हम इसे कितना प्यार करते हैं। माता खुद भूखी रहकर अपने नन्हे से बालक को मिठाई खरीदकर खिलाती है, बालक के मल मूत्रों में खुद पड़ी रहकर उसे सूखे बिछौने पर सुलाती है। वह बड़े से बड़ा नुकसान कर दे, एक कहुआ शब्द तक नहीं कहती।
  
हमारी आत्मा हमारे जीवन से इतना ही नहीं, बल्कि इससे भी अधिक प्यार करती है। जीवन सुखी बीते, उसे आनन्द और प्रसन्नता प्राप्त हो, इसके लिए आत्मा पाप भी करती है। खुद नरकों की यातना सहती है- खुद मलमूत्रों में पड़ी रहकर उसे सूखे बिछौन पर सुलाती है। यह प्यार माता के प्यार से किसी प्रकार कम नहीं है। जीवन को वह जितना प्यार करती हैं, उतना क्या कोई किसी को कर सकता है?
  
पर हाय! इसकी एक-एक मणि चुपके-चुपके मजदूर के चावलों की तरह बिखरती जा रही है। और हम मदहोश होकर मस्ती के गीत गाते हुए झूम-झूमकर आगे बढ़ते जा रहे हैं। जीवन-लड़ी के अनमोल मोती घड़ी, घंटे, दिन, सप्ताह, पक्ष, मास और वर्षों के रूप में धीरे-धीरे व्यतीत होते जा रहे हैं। एक ओर माता कहती है कि मेरा पूत बड़ा हो रहा है, दूसरी ओर मौत कहती है कि मेरा ग्रास निकट आ रहा है। बूँद-बूँद करके जीवन रस टपक रहा है और घड़ा खाली होता जा रहा है। कौन जानता है कि हमारी थैली में थोड़ा-बहुत कुछ बचा भी है! फिर भी क्या हम इस समस्या पर विचार करते हैं? कभी सोचते हैं कि समय क्या वस्तु है? उसका क्या मूल्य है?  यदि हम नहीं सोचते और अपनी पीनक को ही स्वर्ग-सुख मानते हैं तो सचमुच बीते वर्ष को गँवाना और नवीन वर्ष का आना कोई विशेष महत्व नहीं रखता।
  
क्या आप कभी इस पर भी विचार करते हैं कि आपके जीवन का इतना बड़ा भाग, सर्वोत्तम अंश किस प्रकार बर्बाद हो गया? क्या इसे इसी प्रकार नष्टï करना चाहिए था? क्या आत्मा को इन्हीं कर्मों की पूर्ति के लिये ईश्वर ने भेजा था, जिन को अब तक तुमने पूरा किया है? याद रखना, वह दिन दूर नहीं है जब तुम्हें यही प्रश्र शूल की तरह दुख देंगे। जब जीवन रस की अन्तिम बूँद टपक जायेगी और तुम मृत्यु के कंधे पर लटक रहे होगे, तब तुम्हारी तेज निगाह बुढ़ापा, अधेड़ावस्था, यौवन, किशोरावस्था, बचपन और गर्भावस्था तक दौड़ेगी। अपने अमूल्य हार की एक-एक मणि धूलि में लोटती हुई दिखाई देगी। तब अपनी मदहोशी पर तिलमिला उठोगे।।  आज तो समय काटने के लिये ताश या फलाश खेलने की तरकीब सोचनी पड़ती है। पर परसों पछतायेगा इन अमूल्य क्षणों के लिए! और शिर धुन-धुनकर रोयेगा अपने इस पाजीपन पर।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 साधक की दो विपत्तियाँ

तमोगुण की प्रधानता रखने वाला व्यक्ति दो प्रकार की विपत्तियों में फँस सकता है। पहली विपत्ति है अपने को हीन समझना- मैं दुर्बल हूँ, घृणित हूँ, अकर्मण्य हूँ, आदि भावनायें उठने से वह समझने लगता है कि मैं सबसे नीच हूँ भगवान मुझ जैसे नीच का कैसे उद्धार कर सकते हैं। ऐसा मालूम होता है कि सोचने वाला भगवान की शक्ति का सीमित मानता है और भगवान गूँगे को बोलने की शक्ति तथा लंगड़े को चलने की शक्ति दे देते हैं यह बात असत्य समझता है। दूसरी विपत्ति है जरा सी सिद्धि पा जाने पर साधना से मुँह मोड़ लेना और प्राप्त सिद्धि को सब कुछ समझ कर उसी के भोग में लग जाना। साधना की ये दोनों ही विपत्तियाँ विघ्न हैं।

इसलिए साधक को सदा इस बात का ध्यान रखने की आवश्यकता है कि वह भी भगवान का अंश है और भगवती महा माया आदि शक्ति उसके अन्तराल में बैठी हुई उसका संचालन कर रहीं हैं। सर्व शक्तिमान भगवान की लीला के अधीन होकर चुपचाप बैठे रहना साधक के लिए उचित नहीं है। यह तो उसके अहंकार की विद्यमानता का फल है जब तक अहंकार रहता है तब तक वास्तविक धारणा का उत्पन्न होना ही सम्भव नहीं है इस लिए अहंकार को निर्मूल कर देने पर ही साधक उन विपत्तियों से बच सकता है।

श्री अरविन्द
अखण्ड ज्योति 1948  नवम्बर पृष्ठ 5

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👉 गायत्री की अमोघ शक्ति

गायत्री सद्बुद्धि का मंत्र है। इस महामंत्र में कुछ ऐसी विलक्षण शक्ति है कि उपासना करने वाले के मस्तिष्क और हृदय पर बहुत जल्दी आश्चर्यजनक  प्रभाव परिलक्षित होता है। मनुष्य के मन:क्षेत्र में समाए हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिंता, ईर्ष्या, कुविचार आदि चाहे कितनी ही गहरी जड़ जमाए बैठे हों, मन में तुरंत ही हलचल आरंभ होती है और उनका उखडऩा, घटना तथा मिटना प्रत्यक्ष दिखाई  पडऩे लगता है।
  
संसार में समस्त दु:खों की जननी कुबुद्धि ही है। जितने भी दु:खी मनुष्य इस विश्व में दीख पड़ते हैं, उनके दु:खों का एकमात्र कारण उनके कुविचार ही हैं। परमात्मा का युवराज मनुष्य दु:ख के निमित्त नहीं, अपने पिता के इस पुण्य उपवन-संसार में आनंद की क्रीड़ा करने के लिए आता है। इस स्वर्गादपि गरीयसी धरती माता पर वस्तुत: दु:ख का अस्तित्व ही नहीं है।
  
संसार में जितने दु:ख हैं, सब कुबुद्धि के कारण हैं। लड़ाई, झगड़ा, आलस्य, अत्याचार आदि के पीछे मनुष्य की दुर्बुद्धि ही काम करती है। इन्हीं कारणों से रोग, अभाव, चिन्ता आदि का प्रादुर्भाव होता है और नाना प्रकार की पीड़ाएँ सहनी पड़ती हैं। कुबुद्धि से बुरे विचार बनते हैं। इसीलिए कुबुद्धि को पापों की जननी कहा गया है। गायत्री मंत्र का प्रधान कार्य इस कुबुद्धि को हटाना है। गायत्री उपासना से मस्तिष्क में सद्ïविचार और हृदय में सद्ïभाव उत्पन्न होते हैं।
  
जिनकी स्मरण शक्ति मंद है, मस्तिष्क जल्दी थक जाता है, उन्हें गायत्री उपासना करके थोड़े ही समय में इस महान्ï शक्ति के चमत्कार देखने को मिलते हैं। सिर में दर्द, चक्कर आना आदि रोगों की शिकायतें जिन्हें बनी रहती हैं, उन्हें गायत्री उपासना करनी चाहिए। इससे मस्तिष्क के सभी कल पुर्जे बलवान्ï और निरोग बनते हैं। जिनके घर में कुबुद्धि का साम्राज्य छाया रहता है, आपस में द्वेष, असहयोग, मनमुटाव, कलह, दुराव एवं दुर्भाव रहता है, आये दिन झगड़े होते रहते हैं, आपाधापी और स्वार्थपरता में प्रवृत्ति रहती है, गृह-व्यवस्था को ठीक रखने, समय का सदुपयोग करने, योग्यताएँ बढ़ाने, कुसंग से बचने, श्रमपूर्वक आजीविका कमाने, मन लगाकर विद्या-अध्ययन करने में प्रवृत्ति न होना आदि दुर्गुण कुबुद्धि के प्रतीक हैं। जहाँ यह बुराइयाँ भरी रहती हैं, वे परिवार कभी भी उन्नति नहीं कर सकते, अपनी  को कायम नहीं रख सकते। इसके विपरीत, उनका पतन होना आरंभ हो जाता है। बिखरी हुई बुहारी की सीकों की तरह छिन्न-भिन्न होने पर वर्तमान स्थिति भी स्थिर नहीं रहती। दरिद्रता, हानि, घाटा, शत्रुओं का प्रकोप, मानसिक अशांति की अभिवृद्धि आदि बातें दिन-दिन बढ़ती हैं और वे घर कुछ ही समय में अपना सब कुछ खो बैठते हैं। कुबुद्धि ऐसी अग्रि है, जहाँ भी वह रहती है, वहीं की वस्तुओं को जलाने और नष्ट करने का कार्य निरन्तर करती रहती है।
  
जहाँ उपरोक्त प्रकार की स्थिति हो, वहाँ गायत्री उपासना का आरम्भ होना एक अमोघ अस्त्र है। अँगीठी जलाकर रख देने से जिस प्रकार कमरे की सारी हवा गरम हो जाती है और उसमें बैठे हुए सभी मनुष्य सर्दी से छूट जाते हैं, उसी प्रकार घर के थोड़े से व्यक्ति भी यदि सच्चे मन से माता की शरण लेते हैं, तो उन्हें स्वयं तो शान्ति मिलती ही है, साथ ही उनकी साधना का सूक्ष्म प्रभाव घर भर पर पड़ता है और चिन्ता-जनक मनोविकारों का शमन होने तथा सुमति, एकता, प्रेम, अनुशासन तथा सद्भाव की परिवार में बढ़ोत्तरी होती हुई, स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। साधना निर्बल हो, तो प्रगति धीरे-धीरे होती है, पर होती अवश्य है। सद्बुद्धि एक शक्ति है, जो जीवन-क्रम को बदलती है। उस परिवर्तन के साथ-साथ मनुष्य की परिस्थितियाँ भी बदलती हैं। गायत्री माता की ओर उन्मुख होने वाला व्यक्ति सद्बुद्धि तथा सुख-शान्ति का वरदान प्राप्त करता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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सोमवार, 2 जनवरी 2023

👉 ब्रह्म साक्षात्कार क्यों नहीं होता?

👉 ब्रह्म साक्षात्कार क्यों नहीं होता?

आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर होने के इच्छुक साधक के लिये अपने आपको नियम पर दृढ़ रखने तथा नियमित जप, तप, उपासना साधना करते रहना ब्रह्म प्राप्ति के लिए आवश्यक ही नहीं प्रथम शर्त भी है। बिना साधना कि सिद्धि नहीं मिलती है। एक परीक्षा में सफल होने के लिए विद्यार्थी को कितना श्रम करना पड़ता है। एक मोती को समुद्र तल से निकालने के लिए किस प्रकार जान को हथेली पर रखकर समुद्र की गहराई में उतरना पड़ता है, किसी मंजिल तक पहुँचने में राही को कितना श्रम करना पड़ता है। साध्य तक पहुँचने के लिए साधना आवश्यक है। उसी प्रकार ब्रह्म साक्षात्कार के लिए पूज, उपासना, दैनिक कृत्य भी अनिवार्य है। इस प्राथमिक सोपान पर चलकर ही आगे बढ़ना सम्भव है।

किन्तु बहुधा साधना उपासना करते हुए भी लक्ष्य की प्राप्ति क्यों नहीं होती? समस्त जीवन चला जाता है, इतना ही नहीं अनेकों जन्म इसमें लग जाते है फिर भी उस परब्रह्म की अनुभूति प्राप्त नहीं होती? अशान्तियों और उद्वेगों से छुटकारा भी नहीं मिलता। इस असफलता का कारण क्या है यह प्रश्न विचारणीय है।

साधना के दो अंग हैं- चेष्टा और दूसरा त्याग। किसी की प्राप्ति के लिए चेष्टा करनी पड़ती है साथ ही उसके लिए त्याग भी? नदी अपनी सम्पूर्ण चेष्टा से विराट सागर की ओर धावमान होती है उसमें एकरस एक्य की प्राप्ति के लिए। किन्तु उसकी चेष्टा में वह सम्पूर्ण भाव भी परिलक्षित होता है जिसमें वह अपने आप को पद-पद पर विराट के लिए निवेदन करती हुई आगे बढ़ती है। अपनी वर्तमान स्थिति को उसी के लिए क्षण-क्षण में उत्सर्ग करती हैं।

आध्यात्मिक साधना का पथ भी ठीक इसी प्रकार है। जिस प्रकार पूजा, उपासना, साधना, स्वाध्याय आदि से अपने ज्ञान को विशुद्ध एवं शक्ति को सचेष्ट रखना पड़ता है दूसरी ओर सम्पूर्ण भाव से अपने आपको ईश्वर की इच्छा पर उसी के लिए से निवेदित करना पड़ता है। जब साँसारिक तुच्छ लाभों के लिए कुछ न कुछ उत्सर्ग करना पड़ता है तो उस समग्र-अखण्ड, विश्वात्मा, ब्रह्म के साक्षात्कार के लिए अपने आपको सम्पूर्ण रूपेण निवेदन करना ही पड़ेगा पतंगा अपने आपको सम्पूर्ण भाव से दीपक को अर्पण कर देता है और तभी वह लौ में मिल जाता है? अपने प्रियतम के मिलन के लिए उसे समग्र भाव से अपने आपको अर्पण करना पड़ता है।

पूजा, उपासना, नियम, साधना के पथ पर दृढ़ता रखकर बढ़ने वाले अनेकों साधक मिला जायेंगे जो कठोरतम चेष्टाएँ जारी रखते है किन्तु अपने आपका समर्पण करने वाले साधक बहुत ही कम दिखाई देते है। यह ही ब्रह्म साक्षात्कार के पथ का रहस्य है। अक्सर मनुष्य उस प्रियतम, परमात्मा के मिलन पथ में भी कृपणता करता है और अपने आपको स्वयं के हाथों में ही रखना चाहता है। दूसरों के-उस विराट के हाथों में नहीं देना चाहता? कठोर साधनाओं और व्रत पालन में वह प्राण पण चेष्टा जारी रखता है अपनी साधना का हिसाब लगाकर एक विशेष अभिमान पूर्ण आनन्द के साथ ब्रह्म साक्षात्कार का मूल्यांकन करता है।

तुच्छ मनुष्य केवल अपनी शक्ति, सामर्थ्य साधना के बल पर उस विश्वात्मा के साथ व्यापार नहीं कर सकता। उस अनन्त अखण्ड, सर्वव्यापक को नहीं जान सकता और न उसकी अनुभूति हो प्राप्त कर सकता हैं इनके साथ-साथ उसे अपने आपको सम्पूर्ण भाव से उसके लिए निवेदित, उत्सर्ग करना ही पड़ेगा। बिना इसके सिद्धि प्राप्त नहीं होगी और तभी प्रभु मिलन का पथ सहज सुगम और लघु बन जायेगा। उसकी दिव्य अनुभूति, हमारे हृदय में उसी तरह आलोकित हो उठेगी जैसे प्रातः होते ही सूर्य की प्रकाश किरणों से विश्व भुवन प्रकाशित हो उठता है। उसके लिए तब कोई कठिन साधना नहीं करनी पड़ती है।

ब्रह्म प्राप्ति के लिए हमें अपने आपको देना होगा। उन्होंने तो अपने आपको दे डाला। सर्वव्यापी प्रभु सर्वदा सर्वत्र ही हमारे भीतर बाहर व्याप्त है। हमारे अन्दर अभाव है, हम संकीर्णता का बना पहने हुए है, मैं और ममत्व की रंगीन ऐनक लगाये हुए हैं इसी लिए उनके पुण्य मिलन से हम दूर है। हमने नाना प्रकार के स्वार्थ अहंकार, क्षुद्रता के कठिनतम घेरों में अपने आपको आबद्ध कर लिया है जहाँ अपनी स्वतन्त्र सत्त को देखते है, किन्तु प्रभु मिलन के मार्ग को यही तो कठिन बनाये हुए है और हमें उस की अनुभूति से वंचित रखते है। इसी कमी के कारण हम कठिन साधनाएँ करते हुए भी देर तक विश्वात्मा, ब्रह्म की झलक नहीं पाते।

उपासना, साधना पूजा, आदि का वास्तविक उद्देश्य ईश्वर को प्राप्त करना ही नहीं है वरन अपने आपको उनके लिए समर्पित करने के लिए भी है। दिन प्रतिदिन भक्ति द्वारा, पूजा उपासना सेवादि द्वारा अपने आपको उस ब्रह्म में बाधा हीन रूप से व्याप्त कर देना ही उपासना आदि का सच्चा रूप है और ऐसी ही पूजा से प्रभु को प्राप्त करने की चिर इच्छापूर्ण होती हैं।

उपनिषद् में कहा है कि ‘ब्रह्म तल्लक्षमुच्यते” ब्रह्म ही उसका लक्ष है। तो फिर लक्ष को अपनी ओर नहीं खींचा जा सकता, अपने आपको ही लक्ष्य तक पहुँचाना होता है। जिस प्रकार निशाना लगाकर तीर चलाने पर वह सम्पूर्ण रूपेण अपने लक्ष्य के प्रति अपने आपको अर्पण करता है उसी प्रकार ब्रह्म प्राप्ति के लिए उसी में सर्वस्व अर्पण करके तन्मय हो जाना पड़ेगा। सकल अवस्थाओं में सकल कार्यों उपलब्धि एवं स्थितियों में वही एक मात्र भाव बनाये रखना पड़ेगा।

प्रभु से हमारी दूरी, दुःख, वेदना, क्लान्ति आदि इसलिए है कि हम अपने अहं को मिटा नहीं पात। यह अहं ही हमारे और उनके बीच में दीवार बन बैठा हे जो अपनी स्वतंत्र सत्ता शक्ति सामर्थ्य से उस अखण्ड, सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान को पाने की मिथ्या कल्पना करता है और हमें उनसे दूर रखता हैं इसलिए अहंकार को उसके उच्च शिखर से उतार कर निम्न स्थिति में ले जाना होगा। सकल विश्व के साथ समानता एवं एकता रखकर अपने आपको सब के पीछे ले जाकर खड़ा करना होगा सबसे नीचे बैठना होगा। हम अकिंचनता और दीनता में प्रभु की कृपा दृष्टि पाकर सदा के लिए उनके बन जायेगा। जब हम सब प्राणिमात्र के साथ बैठे है एकता स्थापित करते हैं अपने अहंकार को कम करके परमात्मा के हाथों में अपना समर्पण करते हैं तभी हम उस ब्रह्म की गोद में बैठने के अधिकारी बनते है।

ब्रह्म साक्षात्कार के लिए अपने ज्ञान की विशुद्धि शक्ति के सचेष्टता के साथ-साथ अपना आत्म संपर्क उस परम सत्ता में करना होगा। अहंकार को मारना होगा। अपने को उस प्रभु के हृदय देश में स्थापित कर उसी की इच्छा से सर्व क्रिया कलाप जारी रखना होगा। अपने आपको सम्पूर्ण भाव से उसमें निवेदित करना होगा। अहंकार, स्वार्थ, तुच्छता संकीर्णता को त्याग नम्रताशील, सामंजस्य, उदारता की साधना करनी होगी। अकिंचन भाव से परमात्मा सत्ता को सर्वत्र स्वीकार करते हुए भेद, विविधता ऊंच-नीच की दृष्टि का त्याग करना होगा।

श्री स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज
अखण्ड ज्योति अप्रैल 1961 पृष्ठ 12

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बुधवार, 28 दिसंबर 2022

👉 कण-कण में भगवान

“मीरा की आदत सी बन गई थी। जब वह मंदिर में बैठती, तो कभी मूर्ति की ओर पीठ कर लेती, तो कभी पैर। एक बार वह प्रतिमा की ओर पैर करके बैठी थी, इतने में एक व्यक्ति ने मंदिर में प्रवेश किया। मीरा को इस स्थिति में बैठी देख उसे क्रोध आ गया। उसे भगवान का यह अपमान बर्दाश्त न हो सका। वह आगबबूला हो उठा और मन में जो आया बक डाला।

अब मीरा को वस्तुस्थिति का बोध हुआ। नाराजगी का कारण समझ में आया, तो मुस्कुरा दिया, कहा- बेटा। गालियाँ क्यों दे रहा है? भला तू ही बता, जिस ओर भगवान नहीं है, मैं उसी ओर पैर कर लूँगी। मुझे तो हर ओर, हर दिशा में, कण-कण में भगवान दिखते हैं।

व्यक्ति का अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने पैरों में गिरकर क्षमा माँगी और चलता बना।

संकीर्ण दृष्टि वालों को सर्वत्र बुराई ही दिखती है।

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👉 आध्यात्म पथ की ओर

जीवन वृक्ष की जड़ मन के अन्दर है। अक्सर बाहर की परिस्थितियाँ जीवन से मेल नहीं रखतीं, तब बड़ा दुख होता है। पिता की मृत्यु हो गई, हम बालकों की तरह फट-फट कर रोते हैं। धन चोरी चला गया, हम दुख से व्याकुल हो जाते हैं। शरीर अस्वस्थ हो गया, हमें चारों ओर मृत्यु ही नाचती नजर आती है। कार्य में सफलता नहीं मिली, हम चिन्ता की चिता में जल उठते हैं। दूसरे लोग कहना नहीं मानते, हम क्रोध से क्षुब्ध हो जाते हैं। इनमें से एक ही परिस्थिति जीवन को दुखमय बना देने के लिये पर्याप्त है, फिर यदि कई घटनायें एक साथ मिलें तो कहना ही क्या, जीवन में दुख शोकों की भट्टी जलने लगती है।
  
कई बार ऐसी कोई परिस्थिति नहीं आती, फिर भी हम उनकी कल्पना करके अपने को दुखी बनाते रहते हैं। मेरे एक ही पुत्र है, वह मर गया तो? घर में अकेला कमाने वाला हूँ, मेरी मृत्यु हो गई तो? पशुओं को कोई चुरा ले गया तो? कोई झूठा मुकदमा लग गया तो? इस प्रकार की आशंकाएं कल्पित होती हैं। जितना भय होता है, वास्तव उसका चौथाई भी नहीं आता। हम देखते हैं कि कई धनवान और बलवान अपने घर में डाका पड़ जाने, अपने कत्ल हो जाने की आशंका से रात भर चैन की नींद नहीं लेते। हर घड़ी भय उन्हें सताता रहता है, यद्यपि जैसा वे सोचते हैं, वैसी घटना जीवन भर नहीं होती और अपनी इन्द्रियों का तो कहना ही क्या ? वे यदि काबू में न हों तो हिरन की तरह चौकड़ी मारती हैं। तृप्ति उन्हें होती ही नहीं। अपने भोगों के लिये उनकी सदा ‘और लाओ और लाओ’ की रट लगी रहती है।

दैनिक जीवन की यह अवस्थाएं मनुष्य को एक बड़ी उलझन में डाल देती हैं। दुख, शोक, तृष्णा, चिन्ता, भय, क्रोध, लोभ, द्वेष की भावनाएं उसके मस्तिष्क पर अधिकार जमा कर उसे बड़ी दयनीय दशा में असहाय छोड़ देती हैं। वह शान्ति के लिये प्यासे मृग की तरह चारों ओर दौड़ता है परन्तु दृष्टि दोष के कारण सफेद भूमि ही जल दिखाई पड़ती है, दौड़ कर वहाँ तक पहुँचता है, परन्तु वहाँ धरा ही क्या था? दौड़ने के श्रम से पहले की अपेक्षा भी अधिक अशान्ति हो जाती है। धन कमाने के लिए अधर्म करते हैं, इन्द्रिय तृप्ति के लिये पाप करते हैं, सुख के लिये मायाचार करते हैं परन्तु हाथ कुछ नहीं आता।

जितना चाहते हैं जितनी तृष्णा होती है, उसका शताँश भी प्राप्त नहीं हुआ तो ओस चाटने पर तृप्ति कैसे हो सकती है। एक कामी पुरुष रात दिन सैकड़ों सुन्दरियों का चिन्तन करता रहता है, कितना ही प्रयत्न करने पर भी उसे उतनी स्त्रियाँ भोग के लिये नहीं मिल सकती। यदि नहीं मिलीं तो शान्ति कहाँ? संसार के निर्बाधित क्रम के अनुसार जो घटनाएं घटित होती रहती हैं, उनसे हम बच नहीं सकते। हम कितना हो प्रयत्न क्यों न करें, प्रियजनों की मृत्यु होगी ही, दान, भोग के बाद बचा हुआ धन नष्ट होगा ही। बेशक मनुष्य बहुत शक्तिशाली है, प्रयत्न करने पर परिस्थितियों को बहुत कुछ अपने अनुकूल कर सकता है, परन्तु यह न भूलना चाहिये कि मनुष्य-मनुष्य ही है। आज की परिस्थिति में वह ईश्वर नहीं है। घटनाएं संसार के क्रम के साथ है वह होती है और होंगी। उनके प्रवाह से भगवान् राम और योगिराज कृष्ण भी नहीं बच सके। परिस्थितियों से कोई नहीं बच सकता।

परिस्थितियों का मुकाबला मनुष्य कर सकता है। वह अपना पथ खुद निर्माण कर सकता है। दुख में से सुख खोज सकता है और अपने जीवन में नरक तुल्य दिखाई देने वाली वेदनाओं से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। तीन चौथाई दुख तो उसके अपने पैदा किये हुए होते है। अपने को ठीक जगह पर खड़ा कर दिया जाय तो अधिकाँश दुखों से अपने आप छुटकारा मिल जाता है। कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी होती हैं, जो संसार क्रम के साथ सम्बन्धित हैं, उनको सहन करने की शक्ति विवेक द्वारा प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार अपने को विवेकपूर्वक ठीक स्थिति पर रख कर हम संसार के समस्त दुखों से छुटकारा पा सकते हैं। यही आध्यात्म पथ है। बाहरी परिस्थितियाँ आदमी को सुख या दुख नहीं दे सकतीं। यदि ऐसा होता तो समस्त धनी सुखी और सब गरीब दुखी हुए होते, परन्तु वास्तव में बात इससे उलटी है। निकट से परीक्षा करने पर अधिकाँश गरीब सुखी और अधिकाँश धनी दुखी मिलेंगे।
  
मनुष्य स्वभावतः आनन्द प्रिय है, उसे हर घड़ी आनन्द की तलाश रहती है और जो कुछ सोचता विचारता या करता धरता है वह इसीलिये कि सुख मिले। परन्तु वह अज्ञान में भटक जाता है, ऊंट को घड़े में तलाश करता है। धन और भोगों के पीछे दुनिया पागल है। दाद को खुजलाने में लोग बुरी तरह लगे हुए हैं कि शायद यही सुख है। परन्तु यह कैसा सुख जिसकी खुजली बढ़ती ही जाती है और अन्त में चमड़ी छील जाने पर दुखदायी घाव उत्पन्न हो जाते हैं। दाद के घावों में भी खुजली उठती है। उन घावों को खुजाने में जैसा सुख दुख मिलता है वैसा ही आम तौर पर सब भोगते हैं। खुजली का सुख लूटने के लिये प्रयत्न करते हैं, पर घाव दूना बढ़ कर असह्य वेदना उत्पन्न कर देता है।

इस अज्ञान से छुटकारा पाने के लिये आध्यात्म पथ पर अग्रसर होना ही एक मात्र उपाय है। अज्ञान के अन्धकार से छुटकारा पाने के लिये प्रकाश की ओर चलना चाहिये। माया से बच कर ईश्वर की ओर मुँह करना चाहिये। तभी वास्तविकता का ज्ञान होगा और तभी सब वस्तुओं का यथार्थ स्वरूप समझ में आवेगा। अँधेरे में पानी के धोखे दवात की स्याही पी जाने से कडुआ मुँह हो जाता है, इस कडुए पन को दूर करने का उपाय नहीं है, कि उस स्याही को मीठा मिला कर पीने का प्रयत्न करो, वरन् उचित यह है कि प्रकाश जलाओ और देखो कि जिन वस्तुओं से हम उलझे हुए थे, वे वास्तव में क्या हैं?

इसी प्रकाश द्वारा तुम्हें पता चलेगा कि पानी कहाँ रखा हुआ है। शीतल जल पीने से ही प्यास बुझेगी। यह अन्धकार में नहीं, प्रकाश में ही हो सकता है। आध्यात्म पथ प्रकाश का मार्ग है। वास्तविकता प्रकाश में ही मालूम हो सकती है। प्रकाश की जड़ें आत्मा में हैं। आत्मस्वरूप का दर्शन करके ही सारे दुख शोकों को जाना और त्यागा जा सकता है। आत्मा सुखों का मूल है। जीवन का वास्तविक आनन्द उसी से प्राप्त हो सकता है। श्रुति कहती है-तमसो मा ज्योतिर्गमय, अन्धकार से प्रकाश की ओर चलो। पाठको, आध्यात्म पथ की ओर चलो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1941पृष्ठ 4

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1941/February/v1.4

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मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

👉 क्या-क्या प्राप्त करना शेष??

🔷 अभी हमारे लिए क्या-क्या प्राप्त करना शेष रहा है, जानते हो? देखो :-

प्रथम तो प्रेम- क्योंकि अभी तक हमने केवल द्वेष और आत्मसंतोष की ही साधना की है।

ज्ञान? क्योंकि अभी तक हम केवल स्खलन अवलोकन और विचारशक्ति को ही प्राप्त कर सके हैं।

आनन्द? क्योंकि अभी तक हम केवल दुःख सुख तथा उदासीनता को ही प्राप्त कर सके हैं।

शक्ति? क्योंकि अभी तक निर्बलता, प्रयत्न और विजय पराजय तक ही हम पहुँच सके हैं।

जीवन? अर्थात् प्राण। अभी तक मानव केवल जन्म, मृत्यु और वृद्धि ही देख सका है।

अद्वैत? क्योंकि अभी तक मानवजाति को युद्ध और स्वार्थ साधन करने की विद्या ही आती है।

🌹 एक शब्द में कहें तो अभी हमें भगवान को प्राप्त करना है। हमें अपने को उसके दिव्य स्वरूप को प्रतिमा बनाकर आत्मा का पुनर्निर्माण करना है।

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👉 ‘बुरे’ भी ‘भले’ बन सकते हैं (भाग 2)

कोई मनुष्य अपने पिछले जीवन का अधिकाँश भाग कुमार्ग में व्यतीत कर चुका है या बहुत सा समय निरर्थक बिता चुका है तो इसके लिए केवल दुख मानने पछताने या निराशा होने से कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। जीवन का जो भाग शेष रहा है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। राजा परीक्षित को मृत्यु से पूर्व एक सप्ताह आत्म कल्याण को मिला था, उस ने इस छोटे समय का सदुपयोग किया और अभीष्ट लाभ प्राप्त कर लिया। बाल्मीकि के जीवन का एक बड़ा भाग, लूट, हत्या, डकैती आदि करने में व्यतीत हुआ था वे संभले तो वर्तमान जीवन में ही महान ऋषि हो गये। गणिका जीवन भर वेश्या वृत्ति करती रही, सदन कसाई, अजामिल, आदि ने कौन से दुष्कर्म नहीं किये थे। सूरदास को अपनी जन्म भर की व्यभिचारी आदतों से छुटकारा मिलते न देखकर अन्त में आंखें फोड़ लेनी पड़ी थी, तुलसीदास का कामातुर होकर रातों रात ससुराल पहुँचना और परनाले में लटका हुआ साँप पकड़ कर स्त्री के पास जा पहुँचना प्रसिद्ध है। इस प्रकार के असंख्यों व्यक्ति अपने जीवन का अधिकाँश भाग बुरे कार्यों में व्यतीत करने के उपरान्त सत्पथ गामी हुए हैं और थोड़े से ही समय में योगी और महात्माओं को प्राप्त होने वाली सद्गति के अधिकारी हुए हैं।

यह एक रहस्यमय तथ्य है कि मंद बुद्धि, मूर्ख, डरपोक, कमजोर तबियत के ‘सीधे’ कहलाने वालों की अपेक्षा वे लोग अधिक जल्दी आत्मोन्नति कर सकते हैं जो अब तक सक्रिय, जागरुक, चैतन्य, पराक्रमी, पुरुषार्थी एवं बदमाश रहे हैं। कारण यह है कि मंद चेतना वालों में शक्ति का स्त्रोत बहुत ही न्यून होता है वे पूरे रचनाकारी और भक्त रहें तो भी मंद शक्ति के कारण उनकी प्रगति अत्यंत मंदाग्नि से होती है। पर जो लोग शक्तिशाली हैं, जिनके अन्दर चैतन्यता और पराक्रम का निर्झर तूफानी गति से प्रवाहित होता है वे जब भी, जिस दिशा में भी लगेंगे उधर ही सफलता का ढेर लगा देंगे। अब तक जिन्होंने बदमाशी में अपना झंडा बुलन्द रखा है वे निश्चय ही शक्ति सम्पन्न तो हैं पर उनकी शक्ति कुमार्ग गामी रही है यदि वही शक्ति सत्पथ पर लग जाय तो उस दिशा में भी आश्चर्य जनक सफलता उपस्थित कर सकती है। गधा दस वर्ष में जितना बोझा ढोता है, हाथी उतना बोझा एक दिन में ढो सकता है। आत्मोन्नति भी एक पुरुषार्थ है। इस मंजिल पर भी वे ही लोग शीघ्र पहुँच सकते हैं जो पुरुषार्थी हैं, जिनके स्नायुओं में बल और मन में अदम्य साहस तथा उत्साह है।

मंद मति तम की स्थिति में हैं, उनकी क्रिया किसी भी दिशा में क्यों न हो। पुरुषार्थी, चतुर, संवेदनशील व्यक्ति रज की स्थिति में हैं चाहे वह अनुपयुक्त दिशा में ही क्यों न लगा हो। तम नीचे की सीढ़ी है, रज बीच की, और सत सबसे ऊपर की सीढ़ी है। जो रज की स्थिति में है उसके लिए सत में जा पहुँचना केवल एक ही कदम बढ़ाने की मंजिल है, जिस पर वह आसानी से पहुँच सकता है। स्वामी विवेकानन्द से एक मूढ़मति ने पूछा- मुझे मुक्ति का मार्ग बताइए। स्वामी जी ने उसकी सर्वतोमुखी मूढ़ता को देख कर कहा तुम चोरी, व्यभिचार, छल, असत्य भाषण, कलह आदि में अपनी प्रवृत्ति बढ़ाओं। इस पर वहाँ बैठे हुए लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा स्वामी जी आप यह क्या अनीति का उपदेश करते हैं? उन्होंने विस्तार पूर्वक समझाया कि तम में पड़े हुए लोगों के लिए पहले रज में जागृत होना पड़ता है तब वे सत में पहुँच सकते हैं। भोग और ऐश्वर्य को अर्निद्य मार्ग से प्राप्त करना निर्दोष और निद्य मार्ग से प्राप्त करना, सदोष रजोगुणी अवस्था है। दरिद्र को पहले सुसम्पन्न बनना होता है तब यह महात्मा बन सकता है। दरिद्र और नीच मनोवृत्ति का मनुष्य उदारता और महानता की सतोगुणी भावनाओं को धारण करने में समर्थ नहीं होता।

एक बार स्वामी विवेकानन्द अमेरिका में अध्यात्म पर भाषण दे रहे थे। अमेरिकनों ने सभा में ही पूछा स्वामी जी! क्या भारतवासी पूर्ण अध्यात्मवादी हो गये हैं, जिससे उन्हें उपदेश न देकर आपको अमेरिका आने की आवश्यकता अनुभव हुई? स्वामी जी ने इस प्रश्न का बड़ा अच्छा उत्तर दिया। उन्होंने कहा- आप अमेरिका निवासी रजोगुणी स्थिति में है, धनी और विद्या सम्पन्न है इसलिए आप ही सतोगुण स्थिति में चलने के, अध्यात्म का अवलम्बन करने के अधिकारी हैं। मैं अधिकारी पात्रों को ढूँढ़ता हुआ आपके पास अमेरिका आया हूँ। मेरे देश वासी इस समय, दरिद्रता, अविद्या और पराधीनता में जकड़े पड़े हैं, उनकी स्थिति तम की है। मैं उनसे कहा करता हूँ कि- तुम उद्योगी बनो, अधिक कमाओ, अच्छा खाओ और सम्मान पूर्वक जीना सीखो यही उनके लिए आत्मोन्नति का मार्ग है। तम की स्थिति को पार कर रजोगुण में जागृत होना और तदुपरान्त सतोगुण में पदार्पण करना आत्मोन्नति का यह सीधा सा मार्ग है।

जो लोग पिछले जीवन में कुमार्ग गामी रहे हैं, बड़ी ऊटपटाँग गड़बड़ करते रहे हैं वे भूले हुए, पथभ्रष्ट तो अवश्य हैं पर इस गणन प्रक्रिया द्वारा भी उन्होंने अपनी चैतन्यता बुद्धिमत्ता, जागरुकता और क्रियाशीलता को बढ़ाया है। यह बढ़ोतरी एक अच्छी पूँजी है। पथ भ्रष्टता के कारण जो पाप उनसे बन पड़े हैं वे पश्चाताप और दुःख के हेतु अवश्य हैं पर संतोष की बात इतनी है कि इस कँटीले, पथरीले, लहू-लुहान करने वाले, ऊबड़-खाबड़ दुखदायी मार्ग में भटकते हुए भी मंजिल की दिशा में ही यात्रा की है। यदि अब संभल जाया जाय और सीधे राजमार्ग से, सतोगुणी आधार से आगे बढ़ा जाय तो पिछला ऊल-जलूल कार्यक्रम भी सहायक ही सिद्ध होगा।

पिछले पाप नष्ट हो सकते हैं, कुमार्ग पर चलने से जो घाव हो गये हैं वे थोड़ा दुख देकर शीघ्र अच्छे हो सकते हैं। उनके लिए चिंता एवं निराशा की कोई बात नहीं। केवल अपनी रुचि और क्रिया को बदल देना है। यह परिवर्तन होते ही बड़ी तेजी से सीधे मार्ग पर प्रगति होने लगेगी। दूरदर्शी तत्वज्ञों का मत है कि जब बुरे आचरणों वाले व्यक्ति बदलते हैं तो आश्चर्य जनक गति से सन्मार्ग में प्रगति करते हैं और स्वल्प काल में ही सच्चे महात्मा बन जाते हैं। जिन विशेषताओं के कारण वे सफल बदमाश थे वे ही विशेषताएं उन्हें सफल संत बना देती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)
📖 अखण्ड ज्योति, सितम्बर 1949, पृष्ठ 7

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/September/v1.7

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रविवार, 25 दिसंबर 2022

👉 आत्मदेव को साधें

परोक्ष देवता अगणित हैं और उनकी साधना उपासना के हमात्म्य तथा विधा भी बहुतेरे; किन्तु इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि वे अभीष्ट अनुग्रह करेंगे ही- इच्छित वरदान देंगे ही। यह भी हो सकता है कि निराशा हाथ लगे। मान्यता को अघात पहुँचे और परिश्रम निरर्थक चला जाय।   

इस बुद्धिवादी युग में देव मान्यता के सम्बन्ध में सन्देह भी प्रकट किया जाता है। यहाँ तक कि अविश्वास एवं उपहास भरी चर्चायें भी होती हैं। ऐसी दशा में हमें सार्वजनीन  ऐसे देवता का आश्रय लेना चाहिए,जो साम्प्रदायिक अन्धविश्वासों से ऊपर उठा एवं सर्वमान्य हो। साथ ही जिसके अनुग्रह और वरदान के सम्बन्ध में भी अँगुली न उठे। 

ऐसे देवता एक और हैं और वह हैं- आत्मदेव। अपना सुसंस्कृत आपा एवं परिष्कृत व्यक्तित्व। इसका आश्रय रहने पर कोई न अभावग्रस्त रह सकता है और न निराशतिरस्कृत

अन्य सभी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कष्टसाध्य साधनायें करनी पड़ती हैं। आत्मदेव की सत्ता सबके भीतर समान रूप से रहते हूए भी उसे उत्कृष्ट बनाने के लिए निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है। अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को ऊँचे स्तर का बनाने के लिए आत्म विकास का आश्रय लेना पड़ता है। यही है सुनिश्चित फलदायिनी आत्मदेव की साधना।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 भावनाएँ भक्तिमार्ग में नियोजित की जायें

भावनाओं की शक्ति भाप की तरह हैं यदि उसका सदुपयोग कर लिया जाय तो विशालकाय इंजन चल सकते हैं पर यदि उसे ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाय तो वह बर्बाद ही होगी किसी के काम न आ सकेगी। भावनाओं में भक्ति का स्थान बहुत ऊँचा है। उसका सहारा लेकर मनुष्य नर से नारायण बन सकता है। किन्तु यदि उसे एक कल्पना-आवेश मात्र मन बहलाव रहने दिया जाय तो उससे किसी का कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। रविशंकर महाराज ने आज के भक्तों की तीन रोगों से ग्रसित गिनाया है (गाना) (2) रोना (3) दिखावा।

भजन कीर्तन के नाम पर दिन-रात झाँझ बजती और हल्ला होता है। गाना वही सार्थक है जो विवेक पूर्वक गाया जाय जिसमें प्रेरणा हो और उसे हृदयंगम करने का लक्ष्य सामने रखा गया हो। जहाँ केवल कोलाहल कही उद्देश्य हो वहाँ, भक्ति का प्रकाश कैसे उत्पन्न होगा।

रोना-अर्थात् संसार को शोक-संताप से भरा भव सागर मानना। इस दुनिया से छुटकारा पाकर-किसी अन्य लोक में जा बसने की कल्पना, अपने आपसे भागने के बराबर है। भगवान के सुरम्य उद्यान का सौंदर्य निहार कर आनंद विभोर होने की भक्ति-भावना यदि विश्व के कण-कण में संव्याप्त भगवान को देखने की अपेक्षा सर्वत्र दुःख और पाप ही देखें तो इसे बुद्धि विपर्यय ही कहा जायेगा। भक्ति भाव नहीं। पलायन नहीं-भक्ति का तात्पर्य दुखों का निराकरण एवं दुखियों की सहायता करना है। जहाँ। केवल घृणा का विषाद छाया रहे वहाँ भक्ति की आत्मा जीवित कैसे रहेगी। अपने को आर्त और दुखी के रूप में प्रस्तुत करने वाला इस कुरूप चित्रण से अपने सृष्टा को ही अपमानित करता है।

धर्म का आडम्बर अब इतना अधिक बढ़ता चला जा रहा है कि कई बार तो यह भ्रम होने लगता है कि हम धर्मयुग में रह रहे हैं। कथा, कीर्तन, प्रवचन, सत्संग, पारायण, लीला, सम्मेलन आदि के माध्यम से जगह-जगह विशालकाय आयोजन होते हैं और उनमें एकत्रित विशाल भीड़ को देखने से प्रतीत होता है कि धर्म रुचि आकाश छूने जा रही है, पर जब गहराई में उतर कर देखते हैं तो लगता है कि यह धर्म दिखावा बहुत से लोग अपनी आंतरिक अधार्मिकता को झुठला कर आत्म प्रवंचना करने के लिए अथवा लोगों की दृष्टि में धार्मिक बनने के लिए रच कर खड़ा करते हैं। यह आवरण इसलिए खड़े किये जाते हैं ताकि उनकी यथार्थता पर पर्दा पड़ा रहे और लोग उन्हें उस ऊँचे स्तर का समझते रहे जिस पर कि वे वस्तुतः नहीं हैं।
                  
कुछ लोग वस्तुतः इन आयोजनों को सद्भावना के साथ सदृश्य के लिए भी करते हैं पर वे यह भूल जाते हैं कि धर्म आवरण का आरंभिक प्रयाग भक्ति-भावना लाभ तो मिलेगा जब आस्थाओं और क्रिया-कलापों में उच्च स्तरीय परिवर्तन संभव हो। इस कार्य के लिए उपयुक्त पथ प्रदर्शक वे हो सकते हैं जिनने अपने को मन, वचन, कर्म से सच्चा भक्त बनने में सफलता प्राप्त की हो और इस श्रेय पथ में प्रगति का प्रकाश वे ही पा सकते हैं जिन्होंने आवरण से आगे बढ़कर अपने आपको सुधारने सँभालने के लिए उत्कट प्रयास किया हो।
    
भावनाओं की शक्ति की भक्ति मार्ग में यदि नियोजन किया जा सके तो मनुष्य इतनी प्रगति कर सकता है जिससे उसकी अपूर्णता, चरम पूर्णता में परिणत हो सके।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 2
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.2

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👉 विपत्ति में अधीर मत हूजिए।

जिस बात को हम नहीं चाहते हैं और देवगति से वह हो जाती है, उसके होने पर भी जो दुखी नहीं होते किन्तु उसे देवेच्छा समझ कर सह लेते हैं, वही धैर्यवान पुरुष कहलाते हैं। दुःख और सुख में चित्त की वृत्ति को समान रखना धैर्य कहलाता है। जिसने शरीर धारण किया है उसे सुख-दुःख दोनों का ही अनुभव करना होगा। शरीर धारियों को केवल सुख ही सुख या केवल दुःख ही दुःख कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता। जब यही बात है, शरीर धारण करने पर सुख-दुःख दोनों का ही भीग करना है, तो फिर दुःख में अधिक उद्विग्न क्यों हो जायँ ? दुख-सुख तो शरीर के साथ लगे ही रहते हैं। 

हम धैर्य धारण करके उनकी प्रगति को ही क्यों न देखते रहें जिन्होंने इस रहस्य को समझ कर धैर्य का आश्रय ग्रहण किया है, संसार में वे ही सुखी समझे जाते हैं। धैर्य की परीक्षा सुख की अपेक्षा दुःख में ही अधिक होती है। दुःखों की भयंकरता को देखकर विचलित होना प्राणियों का स्वभाव है। किन्तु जो ऐसे समय में भी विचलित नहीं होता वही ‘पुरुषसिंह’ धैर्यवान् कहलाता है। आखिर हम अधीर होते क्यों है? इसका कारण हमारे हृदय की कमजोरी के सिवा और कुछ भी नहीं है। इस बात को सब कोई जानते हैं कि आज तक संसार में ब्रह्मा से लेकर कृमिकीट पर्यन्त सम्पूर्ण रूप से सुखी कोई भी नहीं हुआ। सभी को कुछ न कुछ दुःख अवश्य हुए हैं। फिर भी मनुष्य दुःखों के आगमन से व्याकुल होता है, तो यह उसकी कमजोरी ही कही जा सकती है। 

महापुरुषों के सिर पर सींग नहीं होते, वे भी हमारी तरह दो हाथ और दो पैर वाले साढ़े तीन हाथ के मनुष्यकार जीव होते हैं। किन्तु उनमें यही विशेषता होती है कि दुःखों के आने पर वे हमारी तरह अधीर नहीं हो जाते। उन्हें प्रारब्ध कर्मों का भोग समझ कर वे प्रसन्नता पूर्वक सहन करते हैं। पाँडव दुःखों से कातर होकर अपने भाइयों के दास बन गये होते, मोरध्वज पुत्र शोक से दुःखी होकर मर गये होते, हरिश्चन्द्र राज्यलोभ से अपने वचनों से फिर गये होते, श्री रामचन्द्र वन के दुःखों की भयंकरता से घबरा कर अयोध्यापुरी में रहे गये होते, शिवि राजा ने यदि शरीर के कटने के दुःख से कातर होकर कबूतर को बाज के लिये दे दिया होता, तो इनको अब तक कौन जानता? ये भी असंख्य नरपतियों की भाँति काल के गाल में चले गये होते, किन्तु इनका नाम अभी तक ज्यों का त्यों ही जीवित है। इसका एक मात्र कारण उनका धैर्य ही है।

अपने प्रियजन के वियोग से हम अधीर हो जाते हैं। क्योंकि हमें छोड़कर चल दिया। इस विषय में अधीर होने से क्या काम चलेगा? वह हमारे अधीर होने का कोई समुचित कारण भी तो नहीं। क्योंकि जिसने जन्म धारण किया है, उसे मरना तो एक दिन है ही। जो जन्मा वह मरेगा भी। सम्पूर्ण सृष्टि के पितामह ब्रह्मा है चराचर सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न हुई है। अपनी आयु समाप्त होने पर वे भी नहीं रहते। क्योंकि वे भी भगवान विष्णु के नाभिकमल से उत्पन्न हुए हैं। अतः महाप्रलय में वे भी विष्णु के शरीर में अन्तर्हित हो जाते हैं। जब यह अटल सिद्धान्त हैं कि जायमान वस्तु का नाश होगा ही, तो फिर तुम उस अपने प्रियजन का शोक क्यों करते हो? उसे तो मरना ही था, आज नहीं तो कल और कल नहीं तो परसों। सदा कोई जीवित रहा भी है जो वह रहता? जहाँ से आया था, चला गया। एक दिन तुम्हें भी जाना है। जो दिन शेष है, उन्हें धैर्य के साथ गुणागार के गुणों के चिन्तन में बिताओ।

शरीर में व्याधि होते ही हम विकल हो जाते हैं। विकल होने से आज तक कोई रोग-विमुक्त हुआ है? यह शरीर व्याधियों का घर है। जाति, आयु, भोग को साथ लेकर ही तो यह शरीर उत्पन्न हुआ है। पूर्व जन्म के जो भोग हैं, वे तो भोगने पड़ेंगे।

दान पुण्य, जप, तप, और औषधि-उपचार करो अवश्य, किन्तु उनसे लाभ न होने पर अधीर मत हो जाओ। क्योंकि भोग की समाप्ति में ही, दान, पुण्य और औषधि कारक बन जाते है। बिना कारण के कार्य नहीं होता तुम्हें क्या पता कि तुम्हारी व्याधि के नाश में क्या कारण बनेगा? इसलिये प्राप्त पुरुषों ने शास्त्र में जो उपाय बताये हैं उन्हें ही करो। साथ ही धैर्य भी धारण किये रहो। धैर्य से तुम व्याधियों के चक्कर से सुखपूर्वक छूट सकोगे।

जीवन की आवश्यक वस्तुएं जब नहीं प्राप्त होती है तो हम अधीर हो जाते हैं। घर में कल को खाने के लिए मुट्ठी भर अन्न नहीं है। स्त्री की साड़ी बिलकुल चिथड़ा बन गई है। बच्चा भयंकर बीमारी में पड़ा हुआ है, उसकी दवा-दारु का कुछ भी प्रबन्ध नहीं। क्या करूं? कहाँ जाऊँ? इन्हीं विचारों में विकल हुए हम रात रात भर रोया करते हैं और हमारी आँखें सूज जाती है। ऐसा करने से न तो अन्न ही आ जाता है और न स्त्री की साड़ी ही नई हो जाती है। बच्चे की भी दशा नहीं बदलती। सोचना चाहिये हमारे ही ऊपर ऐसी विपत्तियाँ हैं सो नहीं। विपत्तियों का शिकार किसे नहीं बनना पड़ा? त्रिलोकेश इन्द्र ब्रह्म हत्या के भय से वर्षों घोर अन्धकार में पड़े रहे। चक्रवर्ती महाराज हरिश्चन्द्र डोम के घर जाकर नौकरी करते रहे। उनकी स्त्री अपने मृत बच्चे को जलाने के लिये कफ न तक नहीं प्राप्त कर सकी। जगत के आदि कारण, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी को चौदह वर्षों तक घोर जंगलों में रहना पड़ा। वे अपने पिता चक्रवर्ती महाराज दशरथ को पावभर आटे के पिंड भी न दे सके। जंगल के इंगुदी फलों के पिंडों से ही उन्होंने चक्रवर्ती राजा की तृप्ति की।

शरीरधारी कोई भी ऐसा नहीं है जिसने विपत्तियों के कड़वे फलों का स्वाद न चखा हो। सभी उन अवश्य प्राप्त होने वाले कर्मों के स्वाद से परिचित हैं। फिर हम अधीर क्यों हों हमारे अधीर होने से हमारे आश्रित भी दुःखी होंगे, इसलिये हम धैर्य धारण करके क्यों नहीं उन्हें समझावें? जो होना होगा। बस, विवेकी और अविवेकी में यही अन्तर है। जरा, मृत्यु और व्याधियाँ दोनों को ही होती हैं किन्तु विवेकी उन्हें अवश्यंभावी समझ कर धैर्य के साथ सहन करता है और अज्ञानी व्याकुल होकर विपत्ति से विफल होकर विपत्तियों को और बढ़ा लेता है- महात्मा कबीर ने इस विषय पर क्या ही रोचक पद्य रचना की है यथा-

ज्ञानी काटे ज्ञान से, अज्ञानी काटे रोय।
मौत, बुढ़ापा, आपदा, सब काहु को होय॥

जो धैर्य का आश्रय नहीं लेते, वे दीन हो जाते हैं, परमुखापेक्षी बन जाते हैं। इससे वे और भी दुःखी होते हैं। संसार में परमुखापेक्षी बनना दूसरे के सामने जाकर गिड़गिड़ाना, दूसरे से किसी प्रकार की आशा करना, इससे बढ़कर दूसरा कष्ट और कोई नहीं है। इसलिए विपत्ति आने पर धैर्य धारण किये रहिए और विपत्ति के कारणों को दूर करने एवं सुविधा प्राप्त करने के प्रयत्न में लग जाइए। जितनी शक्ति अधीर होकर दुखी होने में खर्च होती है उससे आधी शक्ति भी प्रयत्न में लगा दी जाय तो हमारी अधिकांश कठिनाइयों का निवारण हो सकता है।

📖 अखंड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 9

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...