अपने आप में, अपने अंत:करण में एक जबरदस्त लोक मौजूद है। उस लोक की स्थिति इतनी महत्त्वपूर्ण है कि उसके सामने भूगोल और भुव: लोक तुच्छ हैं। नि:संदेह बाहर की परिस्थितियाँ मनुष्य को आंदोलित, तरंगित तथा विचलित करती हैं, परंतु संसार के समस्त पदार्थों द्वारा जितना भला या बुरा प्रभाव होता है, उससे अनेक गुना प्रभाव अपने निजि के विचारों तथा विश्वासों द्वारा होता है।
गीता में कहा गया है कि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु है। कोई मित्र इतनी सहायता नहीं कर सकता, जितनी कि मनुष्य स्वयं अपनी सहायता कर सकता है। इसी प्रकार कोई दूसरा उतनी शत्रुता नहीं कर सकता, जितनी कि मनुष्य खुद अपने आप अपने से शत्रुता करता है। अपनी कल्पना शक्ति, विचार और विश्वास के आधार पर मनुष्य अपनी एक दुनिया निर्माण करता है। वही दुनिया उसे वास्तविक सुख-दु:ख दिलाया करती है।
मनुष्य के मन में प्रचंड शक्ति भरी हुई है। वह इस शक्ति द्वारा अपने लिए अत्यंत अनिष्टकर अथवा अत्यंत उपयोगी तथ्य निर्मित कर सकता है। हर मनुष्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। भीतरी मन की दुनिया जैसी होती है, बाहर की दुनिया भी उसी के अनुरूप दिखाई देने लगती है। अंदर की दुनिया सुन्दर बनाओ।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-सितं. 1947 पृष्ठ 5
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