सोमवार, 10 अक्टूबर 2022

👉 रोते क्यों हो?

तुम उदास क्यों हो? इसलिए कि तुम गरीब हो। तुम्हारे पास रुपया नहीं है।

इसलिए कि तुम्हारी ख्वाहिशें दिल ही दिल में घुटकर रह जाती हैं।

इसलिए कि दिली हसरतों को पूरा करने के लिए तुम्हारे पास दौलत नहीं है।

मगर क्या तुम नहीं देखते कि गुलाब का फूल कैसा मुस्करा रहा है।

🔷 तुम क्यों रोते हो?
इसलिए कि तुम दुनिया में अकेले हो, मगर क्या तुम नहीं देखते कि घास का सर सब्ज तिनका मैदान में अकेला खड़ा है लेकिन वह कभी सर्द आहें नहीं भरता-किसी से शिकायत नहीं करता, बल्कि जिस उद्देश्य को पूरा करने के लिए परमात्मा ने उसे पैदा किया है। वह उसी को पूरा करने में लगा है।

क्या तुम इसलिए रोते हो कि तुम्हारा अजीज बेटा या प्यारी बीबी तुमसे जुदा हो गयी? मगर क्या तुमने इस बात पर भी कभी गौर किया है कि तुम्हारी जिन्दगी का सुतहला हिस्सा वह था जब कि तुम ‘बच्चे’ थे। न तुम्हारे कोई चाँद सा बेटा था और न अप्सराओं को मात करने वाली कोई बीबी ही थी, उस वक्त तुम स्वयं बादशाह थे।

क्या तुमने नहीं पढ़ा कि बुद्ध देव के जब पुत्र हुआ, तो उन्होंने एक ठंडी साँस ली और कहा- ‘आज एक बंधन और बढ़ गया।’ वे उसी रात अपनी बीबी और बच्चे को छोड़कर जंगल की ओर चल दिये।

याद रखो जिस चीज के आने पर खुशी होती है, उस चीज के जाने पर तुम्हें जरूर रंज होगा। अगर तुम अपनी ऐसी जिन्दगी बना लो कि न तुमको किसी के आने पर खुशी हो, तो तुमको किसी के जाने पर रंज भी न होगा। यही खुशी हासिल करने की कुँजी है। विद्वानों का कथन है-

जो मनुष्य अपने आपको सब में और सबको अपने आप में देखता है, उसको न आने की खुशी, न जाने का रंज होता है। अगर तुम घास के तिनके की तरह केवल अपना कर्त्तव्य पूरा करते रहो- माने तूफान में हवा के साथ मिलकर झोंके खाओ, माने वक्त मुसीबत भी खुशी से झूमते रहो। बरसात के वक्त अपने बाजू फैलाकर आसमान को दुआएं दो। गरीब घसियारे के लिए अपने नाजुक बदन को कलम कराने के लिए तैयार रहो।

बेजुबान जानवरों को- भूख से तड़पते हुए गरीब पशुओं को अपनी जात से खाना पहुँचाओ तो मैं यकीन दिलाता हूँ कि तुम्हें कभी रंज न होगा कभी तकलीफ न होगी। सुबह उठने पर शबनम (ओंस) तुम्हारा मुँह धुलायेगी। जमीन तुम्हारे लिए खाने का प्रबन्ध कर देगी। तुम हमेशा हरे-भरे रहोगे। जमाना तुम्हें देखकर खुश होगा, बल्कि तुम्हारे न रहने पर या मुरझा जाने पर दुनिया तुम्हारे लिए मातम करेगी।

वह बेवकूफ है। जो दुनिया और दुनिया की चीजों के लिए रोता है हालाँकि वह जानता है कि इन दोनों में से न मैं किसी चीज को अपने साथ लाया था और न किसी चीज को अपने साथ ले जाऊँगा।

📖 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 12


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👉 खबरदार! अन्याय मत करना!

उन कार्यों को क्यों करते हो जिनके करने से न तो कीर्ति प्राप्त होती है और न लाभ मिलता है। जो मनुष्य इससे पाना चाहते हैं, ऊर्ध्व गति के इच्छुक है उन्हें ऐसे कार्यों से दूर रहना चाहिए जिससे कीर्ति में बट्टा लगने की आशंका हो। श्रेष्ठ पुरुषों की मैत्री सफलता दे सकती है, किन्तु आचरण की अपेक्षा तो मनोकामनाओं को ही पूर्ण कर सकने की क्षमता रखती है। खबरदार! कोई ऐसा काम मत करना जिसे सभी मनुष्य बुरा बताते और जिनके करने से माता-पिता को भी कलंकित होना पड़े। सूरत से कोई आदमी बुरा नहीं है। काला-पीला रंग भले बुरे की पहचान नहीं है। श्रेष्ठ पुरुष तो वह है जिसके आचरण श्रेष्ठ है।

 अधर्म से धन कमा कर सम्पत्तिशाली बनने की अपेक्षा यही अच्छा है कि मनुष्य श्रेष्ठ आचरण करता हुआ गरीब बना रहे। जो पैसा दूसरों को रुला कर इकट्ठा किया जाता है। वह क्रन्दन कराता हुआ विदा होता है। निष्पाप नीति से जो धन प्राप्त किया जाता है। अन्त में वही सच्चा आनंद देगा। इसलिये भले आदमियों ! दया और न्याय से रहित पैसे को कभी छूने की कोशिश मत करना और खबरदार! किसी पर अन्याय का हाथ मत उठाना।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1942

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/July/v1.1

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रविवार, 9 अक्टूबर 2022

👉 सबसे बड़ी सेवा

दूसरों के संकल्प और विचार जान लेना बहुत कठिन है। किन्तु अपने मन की भावनाओं को बहुत स्पष्ट समझा, सुना और परखा जा सकता है, यदि औरों की सेवा करना चाहते हैं तो पहले अपनी सेवा की योजना बनाओ, अपना सुधार सबसे सरल है। साथियो! तुम जितना अपने अन्तःकरण का परिमार्जन और सुधार कर लोगे, यह संसार तुम्हें उतना ही सुधरा हुआ परिलक्षित होगा।

जब तुम दर्पण में अपना मुख देखते हो तो, चेहरे की सुन्दरता के साथ उसके धब्बे और मलिनता भी प्रकट होती है, तब तुम उसे प्रयत्नपूर्वक साफ कर डालते हो। मुख उज्ज्वल साफ और सुन्दर निकल आता है। प्रसन्नता बढ़ जाती है, बहुत अच्छा लगने लगता है।

अन्तःकरण भी एक मुख है। उसे चेतना के दर्पण में देखने और परखने से उसकी महानतायें भी दिखाई देने लगती हैं और सौंदर्य भी। आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता इसलिये पड़ी कि उन छोटी-छोटी मलीनताओं को दूर करें, जो एक पर्त की तरह आत्मा के अनन्त सौंदर्य को प्रभावित और आच्छादित किये रहते हैं। जब वह महानतायें मिट जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वल, साफ और सुन्दर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है और संसार का सब कुछ अच्छा और प्रिय मालूम होने लगता है।

मन से प्रश्न करना चाहिये- क्या तुम भयभीत हो? क्या तुम्हें इन्द्रिय-जन्य वासनाओं में मोह है? क्या तुम्हारे विचार गन्दे हैं? यदि हाँ तो सुधार के प्रयत्न में तत्काल जुट जाओ। अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ मिलने लगेगा, उस दिन से तुम संसार में सबसे सुखी व्यक्ति होंगे।

महात्मा बुद्ध

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बुधवार, 5 अक्टूबर 2022

👉 शांति और सौन्दर्य अपने ही अन्दर निहित

उनसे प्यार करो, जिन्हें लोग पतित, गर्हित और हेय समझते हैं। जिन्हें केवल निन्दा और भर्त्सना ही मिलती है। जो अपने ऊपर लदे हुए पिछड़ेपन के कारण न किसी के मित्र बन पाते हैं और न जिन्हें कोई प्यार करता है। प्यार करने योग्य वही लोग हैं, जिन्हें स्नेह- सद्भाव देकर तुम अपने को गौरवान्वित करोगे। मांगो मत, चाहो मत, देकर ही अपने को गौरवान्वित अनुभव करो। 

उन्हें देखने के लिए मत दौड़ो, जिनकी त्वचा चमकीली और गठन में सुन्दरता भरी है। ऐसा तो तितलियाँ और भौंरे भी कर सकते हैं। तुम उन्हें निहारो जो दरिद्रता और रुग्णता की चक्की में पिसकर कुरूप लगने लगे हैं। अभावों के कारण जिनकी अस्थियाँ उभर रही हैं और आँखों की चमक छिन गयी है। निराश दिलों में आशा का संचार करके तुम अपने को धन्य अनुभव करोगे।

कोलाहल और क्रंदन के साथ जुड़ी हुई विपन्नताओं को देखकर न डरो और न भागो। वरन् वह करो, जिससे अशान्ति को निरस्त और शान्ति को प्रशस्त कर सको। शांति पाने के लिए न एकान्त ढूँढ़ो और न उद्यानों में भटको। वह तो तुम्हारे अन्दर है और तब प्रकट होती है जब तुम कोई ऐसा काम करते हो, जिससे अनीतियों और भ्रांतियों का  निराकरण हो सके। सत्प्रयत्नों के साथ ही शांति जुड़ी हुई है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 मौनं सर्वार्थ साधनम

मौन साधना की अध्यात्म-दर्शन में बड़ी महत्ता बतायी गयी है। कहा गया है “मौनं सर्वार्थ साधनम्।” मौन रहने से सभी कार्य पूर्ण होते हैं। महात्मा गाँधी कहते थे- मौन में अन्तर्शक्ति को जगाने की प्रभावशाली सामर्थ्य होती है। उनके अनुसार वह व्यक्ति, जो अपने जीवन में निरन्तर अनवरत सत्य की शोध कर रहा हो, मौन साधना का ही पथ पकड़ता है। लांगफेलो के अनुसार मौन और एकान्त, आत्मा के सर्वोत्तम मित्र हैं। दार्शनिक बेकन का मत है कि मौन निद्रा के समान है जो विवेक को ताजगी प्रदान करती है।
 
वस्तुतः मौन एक तितीक्षा है, तप साधना है जो समय-समय पर महामानवों द्वारा अपने साधना पुरुषार्थ के क्रम में अपनायी जाती है। मौनावस्था एक योगी के लिये सर्वाधिक मूल्यवान निधि एवं धरोहर है। इस अवस्था में प्रवेश कर वह परमसत्ता के और समीप जा पहुँचता है। बहिरंग से नाता तोड़ कर अंतःक्षेत्र की गुफा प्रवेश साधना उसके लिये फलदायी सिद्ध होती है। मौनावस्था में की गयी प्रार्थना-तप साधना कभी निष्फल नहीं होती ऐसा विद्वत्जनों का मत है। किसी विद्वान ने कहा है- भय से उत्पन्न मौन जड़ता का प्रतीक है किन्तु संयमजन्य मौन साधुता है, तपस्वी का भूषण है।

इन्द्रिय संयम हेतु सबसे अच्छा प्रतीक मौन को माना गया है। जो मौन साध लेता है, वह सारी इन्द्रियों को वश में कर जितेन्द्रिय कहलाता है। महर्षि व्यास के मुख से निकले वचनों को लिपिबद्ध कर पुराण रचने का पुरुषार्थ गणेश जी द्वारा मौन साधना के बलबूते ही सम्भव हो पाया। यदि इतनी लम्बी अवधि तक यह साधना पुरुषार्थ न निभाया गया होता तो साहित्य सृजन भी सम्भव न हो पाता।

चिन्तक-मनीषी फ्रेंकलिन ने कहा है- “चींटी से अच्छा कोई उपदेश नहीं देता क्योंकि वह मौन रहती है।” मौन का अर्थ है ऊर्जा के बिखराव को समेटना एवं इसे संग्रहित कर उच्चस्तरीय पुरुषार्थ में नियोजित करना। मौन साधना के साधक अपनी आध्यात्मिक उपलब्धियों के समक्ष संसार के सभी प्रकार के वैभवों को तुच्छ मानते हैं। मौन साधक अतीत के अनुभवों से अर्जित ज्ञान सम्पदा को मौन स्थिति के क्षणों में पुनः नियोजित कर एक नवीन विचारधारा को एक कलाकार की तरह मूर्त रूप देता है, ऐसी विचारधारा जो युगानुकूल होती है, सर्वकल्याण कारी होती है। युग प्रवर्तक दृष्टा ऋषिगण इसी कारण मौन का महात्म्य बताते रहे हैं।

वाक् शक्ति की ऊर्जा का सर्वाधिक सुनियोजन मौन साधना में होता है। संग्रहित शक्ति द्वारा ऐसे साधक स्वयं को पूर्णता की दिशा में ले जाते हैं, जीवनमुक्त कहलाते हैं एवं अपनी इस शक्ति द्वारा बहिरंग जगत को भी प्रभावित करते हैं।

‘मैं’ को मिटाने की सर्वश्रेष्ठ स्थिति मौनावस्था है। जब ‘मैं’ (अहं) का ही लोप हो गया तो कौन सोचेगा व कौन बोलेगा ? इस साधना को समर्पण योग की साधना कहा जा सकता है। जो जितना गहरा होता है वह उतना ही मौन होता है। स्थिर जल गहरा होता है, यह उक्ति मौन के सम्बन्ध में सही सिद्ध होती है। जो वाचाल होते हैं, वे उतने ही उथले-बहिर्मुखी होते व तिरस्कार के भाजन बनते हैं। मौन बुद्धिमानी का ही दूसरा नाम है जो मनुष्य का सर्वोत्तम आभूषण है।

घोंसला सोती हुई चिड़िया को आश्रय देता है, गुफा में हिम समाधि प्राणियों में नयी ऊर्जा का संचार करती है, मौन मनुष्य की वाणी को शक्ति से ओत-प्रोत कर देता है।

मौन अवस्था एक ऐसी स्थिति है जिसमें भगवद् सत्ता व्यष्टि सत्ता के ओर समीप आ जाती है। मनुष्य देव-स्वरूप होता व भगवत् सत्ता से एकाकार होता है। मौन एक विराम की स्थिति है जो मनुष्य को भावी तप पुरुषार्थ हेतु पर्याप्त बल देती, ऊर्जा से ओत-प्रोत कर देती है। हर ऋषि स्तर के साधक को मौन का अवलम्बन लेना चाहिए ताकि समष्टि हित साधन सम्भव हो सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1984 पृष्ठ 2


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शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

👉 लक्ष्य विहीन-जीवन।

हम हर समय चिन्ताशील व क्रियाशील नजर आते हैं। फिर भी हमारा लक्ष्य क्या है? इसका हमें पता तक नहीं, वही आश्चर्य का विषय है। सभी लोग धन बटोरते हैं पर उसका हेतु क्या है? उसका उत्तर विरले ही ठीक से दे सकेंगे। सभी करते हैं तो हम भी करें, सभी खाते हैं तो हम भी खाएं, सभी कमाते हैं तो हम भी कमाएं, इस प्रकार अन्धानुकरण वृत्ति ही हमारे विचारों और क्रियाओं की आधार शिला प्रतीत होती है। अन्यथा जिनके पास खाने को नहीं वे खाद्य-सामग्री संग्रह करें तो बुद्धिगम्य बात है पर जिनके घर लाखों रुपये पड़े हैं वे भी बिना पैसे-वाले जरूरतमंद व्यक्ति की भाँति पैसा पैदा करने में ही व्यस्त नजर आते हैं।

आखिर कमाई-संग्रह क्यों और कहाँ तक? इसका भी तो विचार होना चाहिये। पर हम चैतन्य शून्य लक्ष्य-विहीन एवं यन्त्रवत जड़ से हो रहे हैं। क्रिया कर रहे हैं पर हमें विचार का अवकाश कहाँ? जिस प्रकार कहाँ जाना है यह जाने बिना कोई चलता ही रहे तो इस चलते रहने का क्या अर्थ होगा? लक्ष्य का निर्णय किये बिना हमारी क्रिया निरर्थक होगी, जहाँ पहुँचना चाहिए वहाँ पहुंचने पर भी हमारी गति समाप्त नहीं होगी। कहीं के कही पहुँच जायेंगे परिश्रम पूरा करने पर भी फल तदनुरूप नहीं मिल सकेगा।

खाना, पीना, चलना, सोना यही तो जीवन का लक्ष्य नहीं है पर इनसे अतिरिक्त जो जीवन की गुत्थियाँ हैं उसको सुलझाने वाले बुद्धिशील व्यक्ति कितने मिलेंगे? जन्म लेते हैं, इधर उधर थोड़ी हलचल मचाते हैं और चले जाते हैं। यही क्रम अनादिकाल से चला आ रहा है। पर आखिर यह जन्म धारण क्यों? और यह मृत्यु भी क्यों? क्या इनसे मुक्त होने का भी कोई उपाय है?

है तो कौन सा? और उसकी साधना कैसे की जाय? विचार करना परमावश्यक है। यह तो निश्चित है कि मरना अवश्यंभावी है, पर वह मृत्यु होगी कब? यह अनिश्चित है, इसीलिए लक्ष्य को निर्धारित कर उसी तक पहुँचने के लिये प्रगतिशील बना जाए, समय को व्यर्थ न खोकर प्राप्त साधनों को लाभ के अनुकूल बनाया जाए और लक्ष्य पर पहुँचकर ही विश्राम लिया जाय। यही हमारा परम कर्त्तव्य है।

📖 अखण्ड ज्योति 1948 नवम्बर पृष्ठ 15
 
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/November/v1.15
 
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बुधवार, 28 सितंबर 2022

👉 आमदनी खर्च करने का उद्देश्य क्या हो?

आप यह उद्देश्य सामने रखिये कि परिवार के प्रत्येक सदस्य को जीवनरक्षक पदार्थ और निपुणता दायक वस्तुएँ पर्याप्त परिणाम में प्राप्त होती रहें। जब तक ये चीजें न आ जावें, तब तक किसी प्रकार की आराम या विलासिता की वस्तुओं से बचे रहिये। यदि किसी का स्वास्थ्य खराब है, तो पहले उसकी चिकित्सा होनी चाहिए। यदि किसी विद्यार्थी का अध्ययन चल रहा है, तो उसके लिए सभी को थोड़ा बहुत त्याग करना चाहिए। कृत्रिम आवश्यकताओं को दूर करने का सब को प्रयत्न करना चाहिए। शिक्षा, त्याग और पारस्परिक सद्भाव से सभी सामूहिक परिवार के लिए प्रयत्नशील हो।

प्रत्येक व्यक्ति की अपने खर्च पर गंभीरता से विचार कर कृत्रिम आवश्यकताओं, व्यसनों, फैशन, मिथ्या प्रदर्शन, फिजूल खर्ची कम करनी चाहिए। आदतों को सुधारना ही श्रेष्ठ और स्थायी है। ऐश आराम और विलासिता के खर्चो को कम करके बचे हुए रुपये को जीवन रक्षक अथवा निपुणता दायक या किसी टिकाऊ खर्च पर व्यय करना चाहिए। बचत का रुपया बैंक में भविष्य के आकस्मिक खर्चों, विवाह शादियों, मकान, या बीमारियों के लिए रखना चाहिए। प्रत्येक पैसा समझदारी से जागरुक रह कर भविष्य पर विश्वास न करते हुए खर्च करने से प्रत्येक व्यक्ति को अधिकतम संतोष और सुख होगा।

कमाई और आमदनी से नहीं, आपकी आर्थिक स्थिति आपके खर्च से नापी जाती है। यदि खर्च आमदनी से अधिक हुआ तो बड़ी आय से क्या लाभ?

हम एक प्रिंसिपल महोदय को जानते हैं जिन्हें 800 रु. मासिक आमदनी होती थी। किन्तु वे 200 रु. माह बार घर से और खर्चे के लिए मंगवाते थे। सदैव हाथ तंग रखते और वेतन के कम होने का रोना रोया करते थे।

दूरदर्शी व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और खर्चों का पहले से ही बजट तैयार करता है। उसकी आय वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति में ही व्यय नहीं होती प्रत्युत वह भविष्य के लिए, बच्चों की शिक्षा, विवाह, बुढ़ापे के लिए धन एकत्रित रखता है। अपनी परिस्थिति के अनुसार कुछ न कुछ अवश्य बचाता है।



किसी कवि ने कहा है-
कौडी कौडी जोड़ि कै, निधन होत धनवान।
अक्षर अक्षर के पढ़े, मूरख होत सुजान॥


आप बचत कर सकते हैं?

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 12

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👉 अध्यात्म एक प्रकार का समर (अमृतवाणी) भाग 1

🌞 गायत्री मंत्र हमारे साथ- साथ-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

मित्रो! कर्म के आधार पर प्रत्येक अध्यात्मवादी को क्षत्रिय होना चाहिए, क्योंकि "सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्" अर्थात इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय ही लड़ते हैं। बेटे, अध्यात्म एक प्रकार की लड़ाई है। स्वामी नित्यानन्द जी की बंगला की किताब है 'साधना समर'। 'साधना समर' को हमने पढा, बड़े गजब की किताब है। मेरे ख्याल से हिंदी में इसका अनुवाद शायद नहीं हुआ है। उन्होंने इसमें दुर्गा का, चंडी का और गीता का मुकाबला किया है। दुर्गा सप्तशती में सात सौ श्लोक हैं और गीता में भी सात सौ श्लोक हैं। दुर्गा सप्तशती में अठारह अध्याय हैं, गीता के भी अठारह अध्याय हैं। उन्होंने ज्यों का त्यों सारे के सारे दुर्गा पाठ को गीता से मिला दिया है और कहा है कि साधना वास्तव में समर है। समर मतलब लड़ाई, महाभारत। यह महाभारत है, यह लंकाकाण्ड है। इसमें क्या करना पड़ता है? अपने आप से लड़ाई करनी पड़ती है, अपने आप की पिटाई करनी पड़ती है, अपने आप की धुलाई करनी पड़ती है और अपने आप की सफाई करनी पड़ती हैं। अपने आप से सख्ती से पेश आना पड़ता है।

हम बाहर वालों के साथ जितनी भी नरमी कर सकते हैं वह करें। दूसरों की सहायता कर सकते हैं, उन्हें क्षमा कर सकते हैं, दान दे सकते हैं, उदार हो सकते हैं, दूसरों को सुखी बनाने के लिए जितना भी, जो कुछ भी कर सकते हो, करें। लेकिन अपने साथ, अपने साथ हमको हर तरह से कड़क रहना चाहिए, अपनी शारीरिक वृत्तियों और मानसिक वृत्तियों के विरुद्ध हम जल्लाद के तरीके से, कसाई के तरीके से इस तरह से खड़े हो जाएँ कि हम तुमको पीटकर रहेंगे, तुमको मसलकर रहेंगे, तुमको कुचलकर रहेंगे। अपनी इंद्रियों के प्रति हमारी बगावत इस तरह की होनी चाहिए और अपनी मनःस्थिति के विरुद्ध बगावत इस स्तर की होनी चाहिए।

हम अपनी मानसिक कमजोरियों को समझें, न केवल समझें, न केवल क्षमा माँगे, वरन उनको उखाड़ फेंके। गुरुजी, क्षमा कर दीजिए। बेटे, क्षमा का यहाँ कोई लाभ नहीं, अँग्रेजों के जमाने में जब कांग्रेस वह आंदोलन शुरू हुआ था, तब यह प्रचलन था कि माफी माँगिए, फिर छुट्टी पाइए। जब अँग्रेजों ने देखा कि ये तो माफी माँगकर छुट्टी ले जाते हैं, फिर दोबारा आ जाते हैं। उन्होंने कहा ऐसा ठीक नहीं है, जमानत लाइए पाँच हजार रुपए की। जो जमानत लाएगा, उसी को हम छोड़ेंगे, नहीं तो नहीं छोड़ेंगे। माफी ऐसे नहीं मिल सकती। फिर पाँच- पाँच हजार की जमानतें शुरू हुईं। जिनको जरूरी काम थे, उन्हें इस तरह की जमानत पर छोड़ देते थे। फिर पाँच हजार की इन्क्वायरी शुरू हुई। उन्हें सी०आई०डी० ने रिपोर्ट दी कि साहब, ये जमानत पर चले जाते हैं और पाँच हजार से ज्यादा का आपका नुकसान कर देते है। फिर उन्होंने जमानतें भी बंद कर दी।

अपने साथ कड़ाई करिए

मित्रो! भगवान ने भी ऐसा किया है कि माफी देने का रोड रास्ता बंद कर दिया है। किसी को माफी दीजिए गुरुजी! माफी कहाँ है यहाँ, दंड भोग। इसलिए क्या करना पड़ेगा? अपने साथ में कड़ाई करने की जिस दिन आप कसम खाते हैं, जिस दिन आप प्रतिज्ञा करते है कि हम अपनी कमजोरियों के प्रति कड़क बनेंगे। अपनी शारीरिक कमजोरियों के प्रति और अपनी मानसिक कमजोरियों के प्रति कड़क बनेंगे। बेटे, दोनों क्षेत्रों में इतनी कमजोरियों भरी पड़ी हैं कि इन्होंने हमारा भविष्य चौपट कर डाला, व्यक्तित्व का सत्यानाश कर दिया। अध्यात्म यहाँ से शुरू होता है। यहाँ से ही भगवान को मानने वाली बात शुरू होती है, भगवान का दर्शन शुरू होता है। अंगार के ऊपर चढ़ी हुई परत को जिस तरह हम साफ कर देते हैं और वह चमकने लगता है, उसी तरह हमारी आत्मा पर मलीनताओं की जो परत चढ़ी हुई हैं। मलीनताओं की इन परतों को हम धोते हुए चले जाएँ तो भीतर बैठे हुए भगवान का, आत्मा का साक्षात्कार हो सकता है।

मंत्र नहीं, मर्म से जानें

क्यों साहब लक्स साबुन से हम कपड़ा धोए कि हमाम से धोएँ या सके से धोएँ। बेटे, मेरा दिमाग मत खा। तू चाहे तो सर्फ से धो सकता है, लक्स से- सम्राट से धो सकता है, हमाम से धो सकता है, नमक से, रीठा से धो सकता है। महाराज जी! क्या गायत्री मंत्र से मेरा उद्धार हो जाएगा? चंडी के मंत्र से उद्धार हो जाएगा या हनुमान जी के मंत्र से उद्धार होगा? बेटे, इसमें बस इतना फर्क है जितना कि सर्फ और सनलाइट में फर्क होता है और कोई खास बात नहीं है। हनुमान जी के मंत्र से भी साफ हो सकता है। तू हिंदू है या मुसलमान है तो भी साफ हो सकता है। बस तू ठीक तरीके से इस्तेमाल कर। गुरुजी! गायत्री मंत्र से मुक्ति मिल जाती है या 'राम रामाय नमः '' से। बेटे, अब मैं इससे कहीं आगे चला गया हूँ। अब मैं यह बहस नहीं करता कि गायत्री मंत्र का जप करेंगे तो आपकी मुक्ति होगी और हनुमान जी का जप करेंगे, तो मुक्ति नहीं होगी। बेटे, सब भगवान के नाम हैं। साबुन में केवल लेबल का फर्क है, असल में उनका उद्देश्य एक है।

मित्रो! साधना का उद्देश्य एक है कि हमारी भीतर वाली मनःस्थिति की सफाई होनी चाहिए, जो हमारी शरीर को विकृतियों और मानसिक विकृतियों के लिए जिम्मेदार है। हमारी मानसिक और शारीरिक विकृतियों ही हैं, जिन्होंने हमारे और भगवान के बीच में एक दीवार खड़ी की है। अगर हम इस दीवार को नहीं हटा सकते, तो हमारे पड़ोस में बैठा हुआ भगवान हमें साक्षात्कार नहीं दे सकता। बेटे, भगवान में और हम में दीवार का फर्क है, जिससे भगवान हमसे कितनी दूरी पर है? गुरुजी! भगवान तो लाखों- करोड़ों कि०मी० दूर रहता है? नहीं बेटे, करोड़ों कि०मी० दूर नहीं रहता। वह हमारे हृदय की धड़कन में रहता है, लपडप के रूप में हमारी साँसों में प्रवेश करता है। हमारी नसों में गंगा- जमुना की तरह से उसी का जीवन प्रवाहित होता है। हमारा प्राण भगवान है और हमारे रोम- रोम में समाया हुआ है। तो दूर कैसे हुआ? दूर ऐसे हो गया कि हमारे और भगवान के बीच में एक दीवार खड़ी हो गई। उस दीवार को गिराने के लिए जिस छेनी- हथौड़े का इस्तेमाल करना पड़ता है, उसका नाम है पूजा और पाठ।

क्रमशः जारी
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

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👉 कर्म ही सर्वोपरि

नमस्याओ देवान्नतु हतविधेस्तेऽपि वशगाः, विधिर्वन्द्यः सोऽपि प्रतिनियत कर्मैकफलदः।
फलं कर्मायतं किममरणैं किं च विधिना नमस्तत्कर्मेभ्यो विधिरपि न येभ्यः प्रभवित॥

(भतृहरिकृत नीति शतक 75 वाँ श्लोक)
 
हम सब जिन देव शक्तियों को अर्चना-आराधना के उपायों और विधानों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं, वे देव-सत्ताएँ भी विधि-व्यवस्था से ही बँधी दीखती है । दैवी विधानों की अवहेलना वे भी नहीं करतीं । तो क्या उस सृष्टि-संचालक विधान की और उसके विधाता की ही वन्दना की जाय ? पर हमारे भाग्य का निर्धारण तो वह विधि-व्यवस्था हमारे ही कर्मो के अनुसार करती है । यही उसका सुनिश्चित नियम है । हमारे अपने ही कर्मो का फल प्रदान करने की प्रक्रिया वह चलाता रहता है ।

इस प्रकार हमारे भोगों, उपलब्धियों और प्रवृत्तियों के एकमात्र सूत्र संचालक हमारे स्वयं के कर्म ही हैं । तब फिर देवताओं और विधाता को प्रसन्न करने की चिन्ता करते रहना कहाँ की बुद्धिमत्ता है ? हमारा साध्य और असाध्य तो कर्म ही है । वही वन्दनीय है-अभिनन्दनीय है, वही वरण और आचरण के योग्य है । दैवी विधान भी उससे भिन्न और उसके विरुद्ध कुछ कभी नहीं करता । कर्म ही सर्वोपरि है । परिस्थितियों और मनःस्थितियों का वही निर्माता है । उसी की साधना से अभीष्ट की उपलब्धि सम्भव है ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1980 पृष्ठ 1


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सोमवार, 26 सितंबर 2022

👉 हमारी अपनी जिम्मेदारी

दुनियाँ को चलाने और सुधारने की हमारी जिम्मेदारी नहीं है। पर अपने लिए जो कर्तव्य सामने आते हैं उन्हें पूरा करने में सच्चे मन से लगना और उन्हें बढ़िया ढंग से करके दिखाना निश्चय ही हमारी जिम्मेदारी है। अपने आपको व्यवस्थित करके हम दुनियाँ के संचालन और सुधार में सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण योग दे सकते है। 
 
अधूरे और भद्दे काम करना अपने आप को कलंकित करना है। परमात्मा ने हमारी रचना अपूर्ण नहीं सर्वांग और उच्चकोटि की सामग्री से की है। उसने हमें सजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिर हमीं अपने गौरव को मलीन क्यों न होने दें। हमें जैसा अच्छा बनाया गया है उसी के अनुरूप हमारे काम भी गौरवपूर्ण होने चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आत्म विश्वास का शास्त्र

जीवन संग्राम का सबसे बड़ा शस्त्र आत्मविश्वास है। जिसे अपने ऊपर-अपने संकल्प बल और पुरुषार्थ के ऊपर भरोसा है वही सफलता के लिये अन्य साधनों को जुटा सकता है। आत्म संयम भी उसी के लिये सम्भव है जिसे अपने ऊपर भरोसा है। जिसने अपने गौरव को भुला दिया, जिसे अपने में कोई शक्ति दिखाई नहीं पड़ती जिसे अपने में केवल दीनता, अयोग्यता, एवं दुर्बलता ही दिखाई पड़ती है। ह किस बलबूते पर आगे बढ़ सकेगा? और कैसे इस संघर्ष भरी दुनियाँ में अपना अस्तित्व यम रख सकेगा। बहती धार में जिसके पैर उखड़ गया, उसे पानी बहा ले जाता है पर जो अपना हर कदम मजबूती से रखता है वह धीरे-धीरे तेज धार को भी पार कर लेता है।

हमें परमात्मा ने उतनी ही शक्ति दी है जितना कि किसी अन्य मनुष्य को। जिस मंजिल को दूसरे पार कर चुके हैं उसे हम क्यों पार नहीं कर सकते? फौज के प्रत्येक सैनिक को एक सी बन्दूक दी जाती है। निशाना लगाना हर सिपाही की अपनी सूझबूझ और योग्यता का काम है। सभी व्यक्ति अनन्त सामर्थ्य लेकर इस भूतल पर अवतीर्ण हुए हैं। प्रश्न केवल पहचानने, भरोसा करने और उसके सदुपयोग का है। जिन्हें अपने ऊपर भरोसा है वे अपनी उपलब्ध सामर्थ्य का सदुपयोग करके कठिन से कठिन मंजिल को पार कर सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शनिवार, 24 सितंबर 2022

👉 बुद्धिमत्ता और मूर्खता की कसौटी

बुद्धिमत्ता की निशानी यह मानी जाती रही है कि उपार्जन बढ़ाया जाय—अपव्यय रोक जाय और संग्रहित बचत के वैभव से अपने वर्चस्व और आनन्द को बढ़ाया जाय। संसार के हर क्षेत्र में इसी कसौटी पर किसी को बुद्धिमान ठहराया जाता है।

मानव-जीवन की सफलता का लेखा-जोखा लेते हुए भी इसी कसौटी को अपनाया जाना चाहिए। जीवन-व्यवसाय में सद्भावनाओं की—सत्प्रवृत्तियों की पूँजी कितनी मात्रा में संचित की गई? सद्विचारों का, सद्गुणों का, सत्कर्मों का वैभव कितना कमाया गया? इस दृष्टि से अपनी उपलब्धियों को परखा, नापा जाना चाहिए। लगता हो कि व्यक्तित्व को समृद्ध बनाने वाली इन विभूतियों की संपन्नता बढ़ी है तो निश्चय ही बुद्धिमत्ता की एक परीक्षा में अपने को उत्तीर्ण हुआ समझा जाना चाहिए।

समय, श्रम, धन, वर्चस्व, चिन्तन मानव-जीवन की बहुमूल्य सम्पदाऐं हैं। इन्हें साहस और पुरुषार्थ पूर्वक सत्प्रयोजन में लगाने की तत्परता बुद्धिमत्ता की दूसरी कसौटी है। जिनने इन ईश्वर-प्रदत्त बहुमूल्य अनुदानों को पेट-प्रजनन में-विलास और अहंकार में खर्च कर डाला, समझना चाहिए वे बहुमूल्य रत्नों के बदले काँच-पत्थर खरीदने वाले उपहासास्पद मनःस्थिति के बाल-बुद्धि लोग हैं। वस्तु का सही मूल्यांकन न कर सकने वाले और उपलब्धियों के सदुपयोग में प्रमाद बरतने वाले मूर्ख ही कहे जायेंगे।

जीवन-क्षेत्र में हमारी सफलता-असफलता का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते समय यह देखना चाहिए कि कहीं दूरदर्शिता के अभाव से हम सौभाग्य को दुर्भाग्य में तो नहीं बदल रहे हैं? जीवन बहुमूल्य सम्पदा है। यह अनुपम और अद्भुत सौभाग्य है। इस सुअवसर का समुचित लाभ उठाने के सम्बन्ध में हम दूरदर्शिता का परिचय दे, इसी में हमारी सच्ची बुद्धिमत्ता मानी जा सकती हैं।

चिदानंद परिव्राजक
अखण्ड ज्योति- फरवरी 1974 पृष्ठ 3

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👉 सच्चे और ईमानदार रहिए

बेईमानी मत करो। ईमानदारी सहित अपनी शुद्धि करो। सच्चे हिन्दू बनो, सच्चे मुसलमान बनो जो बनो सच्चे बनो। आज हमारा सब से अधिक नुकसान झूँठ से हो रहा है। धार्मिक कहानियाँ भी ऐसी प्रचलित हैं जो बेईमानी सिखाती हैं। कैसे हमने इन कथाओं को सुना, सुनवाया और प्रचलित होने दिया? सब धर्मों दीनों में ऐसी बातें भरी पड़ी हैं कि अमुक देवता ने झूँठ से काम निकाला अथवा धोखा दिया। श्रीकृष्ण तक की ऐसी कहानियाँ हैं कि उन्होंने अपनी माँ से झूँठ बोला, चोरी की या चालाकी में अपने किसी चेले को सिखाया कि इस प्रकार शत्रु को मार डालो, चीर कर दो कर दो।

मनुष्य जो दिन प्रति दिन सुनता है उसका उस पर बहुत असर पड़ता है। हम वह ही बनते हैं जो हमको गढ़ कर बनाया जाता है। हमारी शिक्षा त्रुटिपूर्ण है। और इसी कारण जन साधारण में बेईमानी अधिक है। देश क्यों गिरा? क्योंकि बेईमानी थी। देश क्यों शीघ्र उन्नति नहीं करता? क्योंकि बेईमानी है! यदि हमारे देशवासी ईमानदारी को ही धर्म समझें तो धर्म और समाज की उन्नति हो।

समाज की फिर से सुरचना करनी है। समाज को इस प्रकार रचना होगा कि झूँठ अथवा बेईमानी की आवश्यकता न रहे। मनुष्य बहुधा झूँठ बोलता है, अनुचित लाभ उठाने के लिये। मनुष्य सदा ही लाभ उठाना चाहता है क्योंकि उसे कल पर भरोसा नहीं। प्रत्येक व्यक्ति को भय रहता है कल का, काल का! समय न जाने कल क्या दिखलावे? नौकरी रहती है या नहीं? व्यापार में हानि न हो जाए? कोई लड़ाई न छिड़ जाए? चोरी का भय? डाके का डर? मनुष्य पर विश्वास नहीं है। और इसलिये मनुष्य झूँठ बोल कर, छल कपट से रुपये कमाना चाहता है।

हमको ऐसा समाज बनाना चाहिए कि उसमें प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से मरण तक खाना पीना, पहनना, मकान और समस्त जीवन की आवश्यक वस्तुयें अवश्य ही मिल सकें, सन्देह न रहे, फिक्र न रहे। ऐसे समाज में मनुष्य, बिना बात, क्यों झूँठ बोलेगा।

सुसंगठित कुटुम्ब में, जहाँ माँ-बाप पुत्रादि से प्रेम करते हैं, जहाँ भाई बहन आपस में प्रेम रखते हैं, जहाँ छोटे बड़ों का आदर करते हैं और सेवा करते हैं, झूँठ नहीं बोला जाता। यदि ऐसे कुटुम्ब में कभी कोई झूँठ बोलता है तो हँसी के लिये। हम को ऐसे ही कुटुम्ब ग्राम-ग्राम और नगर-नगर में स्थापित करने हैं। मत कहिये कि यह असम्भव है। मेरा भाई यदि बीमार पड़ा है तो मैं तो उसका इलाज करूंगा ही, मैं यह नहीं सुनना चाहूँगा कि वह स्वस्थ नहीं होगा। समाज रोगी है। देश रोगी है। समाज को स्वस्थ बनाना है। आप सन्देह की बातें मत कहिये। सन्देह एक बड़ा शत्रु है।

मत कहिये कि ऐसा कभी नहीं हुआ। मत कहिये कि जो पहले कभी नहीं हुआ आज भी नहीं हो सकता। हम समस्त मनुष्य जाति का एक कुटुम्ब बनायेंगे। आज यह सम्भव है। आज हवाई जहाजों ने और रेडियो ने समस्त पृथ्वी को मानो एक छोटा सा देश बना दिया है। हमारी मनुष्य जाति अभी तो युवा अवस्था को पहुँची है। कम से कम यह सभ्यता जब से उत्पन्न हुई है आज ही इस दशा को प्राप्त कर सकी है जब कि मनुष्य आकाश में उड़ता है। आज यह भी सम्भव है कि हम मनुष्य जाति का एक कुटुम्ब बनावें। वह पागलपन ही तो था। हिन्दू, सिख और मुसलमान नामों पर हमारे देशवासी पागल हुए। बिना बात रक्तपात किया। बहु काल की उलटी शिक्षा का यह कुफल था। लोगों ने सिखाया था कि धर्म के हेतु बेईमानी करो और झूँठ बोलो , झूठ बोला और बेईमानी की। भाई का भाई से विश्वास उठ गया। फिर यह ही हुआ जो होना था!

इसलिए मैं कहता हूँ बेईमानी मत करो। मत करो किसी भी नाम पर, किसी भी विचार से। यह बुद्धिमानी नहीं कि आप धोखा देवें। कुछ मन हो, कुछ कहें, कुछ दूसरों को जतावें। यह बेईमानी है। मैं फिर कहता हूँ कि देखो, भला चाहते हो तो बेईमानी मत करो।

अखण्ड ज्योति- अगस्त 1950 पृष्ठ 9

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/August/v1.9

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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