कर्मों का त्याग ही है सच्ची भक्ति
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के भावों से भीगे हुए शब्द सभी की भावनाओं को भिगोते चले गए। हिमालय का आर्द्र वातावरण और भी आर्द्र हो उठा। हालांकि यह आर्द्रता जलीय नहीं रसमयता की थी। भक्तिरस की फुहारों ने इसे रससिक्त किया था, आर्द्र बनाया था। सुनने वाले भावविभोर विश्वामित्र को देखकर चकित थे, आश्चर्यजड़ित थे। उन्होंने अब तक कर्मकठोर विश्वामित्र को देखा था। उन्होंने कभी भी न थकने वाले, कभी भी किसी से हार न मानने वाले, विलक्षण साहसी, सतत संघर्षरत योद्धा ऋषि विश्वामित्र को देखा था, जिन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन में दुर्धर्ष एवं प्रचण्ड चुनौतियों को सामना किया था और उन पर विजय पायी थी। सम्पूर्ण ऋषिमण्डल एवं देवमण्डल ने महाचुनौतियों के शिखरों पर उनके साहसिक तप की प्रज्ज्वलित पताकाएँ फहराती हुई देखी थीं। बड़ी से बड़ी चुनौतियाँ भी उनके पदाघात से चकनाचूर होती रही थीं। विरोधियों के प्रबलतम पराक्रम उनके सम्मुख आते ही स्वयं पराजित हो जाते थे।
ऐसे महाबज्र विश्वामित्र के अन्तस भावों की रसधार को देखकर सबके सब चकित भाव से उन्हें देखते रहे। उन सबमें सुगना भील के बारे में और भी अधिक जानने की लालसा बढ़ गयी। ऐसा क्या था सुगना में, जिसने कुलिश कठोर, महर्षि विश्वामित्र की तेजस्विता, प्रखरता को रसमय बना दिया। सब के मन के इन मानसिक स्पन्दनों को शब्द दिए ऋषि क्रतु ने। उन्होंने कहा- ‘‘हे परमतेजस्वी महर्षि! हम सभी को सुगना भील की भक्तिकथा का श्रवण कराएँ।’’ ऋषि क्रतु के इस कथन ने कथा की बिखरी कड़ियाँ जोड़ दीं। तप तेजस के सघन स्वरूप ऋषि विश्वामित्र को सुगना का स्मरण हो आया। वह कृष्णवर्ण भील, सुडौल-सुगठित कद-काठी का स्वामी था, जिसकी काली किन्तु चमकदार स्वच्छ आँखों में सदा भक्ति छलकती रहती थी।
उसे याद करते हुए विश्वामित्र कहने लगे- ‘‘उस दिन मैं ऋषि रुद्रांश के साथ उसकी झोपड़ी में गया। सघन अरण्य में वृक्षों के झुरमुट की ओट में बनी वह फूस की झोपड़ी भक्ति के दिव्य प्रकाश से पूर्ण थी। झोपड़ी के अन्दर व बाहर थोड़ी दूर तक की भूमि गाय के गोबर से लिपी हुई थी। बाहर सुगन्धित पुष्प वाले पौधे लगे हुए थे। अन्दर पूजा की चौकी थी, जिस पर भगवान् नारायण का चित्र रखा था। यह चित्र सम्भवतः उसी ने अपने हाथों से बनाया था। चित्र के पास कुछ पुष्प बिखरे थे। उससे थोड़ी दूर हटकर पुआल का एक बिछौना था। सामान के नाम पर वहाँ प्रायः कुछ भी नहीं था। बस थोड़ी सी पत्तियाँ, कुछ फल, कुछ काष्ठ सामग्री- यही सब कुछ था। यह सब देखकर ऋषि रुद्रांश ने मुझसे कहा- महर्षि! यह झोपड़ी किसी सिद्धस्थल से भी बढ़कर है। इस पर मैंने अनुभव किया कि ऋषि रुद्रांश सम्पूर्ण सत्य कह रहे हैं।
मैंने कुछ क्षणों के बाद सुगना से पूछा- वत्स! तुम्हारी दिनचर्या क्या है? तुम काम क्या करते हो? उत्तर में उसने कहा- भगवन्! भगवान नारायण का स्मरण! उन्हीं में समर्पण, यही मेरी दिवसचर्या है, यही मेरी रात्रिचर्या है। रही काम की बात तो नर में नारायण का रूप देखकर उनकी सेवा का यत्न करता हूँ। पर सच तो यह है महर्षि! न तो मुझे कर्मफल की आकांक्षा है और न ही कर्मों में अभिरुचि। बस मैं अपने नारायण का यंत्र हूँ। मुझे ऐसा अनुभव होता है कि मैं कुछ नहीं करता, मेरे माध्यम से जो कुछ भी होता है, वह सब कुछ मेरे आराध्य भगवान नारायण ही करते हैं।’’ महर्षि विश्वामित्र की ये बातें सुनकर देवर्षि नारद उत्साहित हो गए और कहने लगे यही तो है भक्त की भक्ति का सही परिचय। यही मेरा अगला सूत्र भी है, जो मैं आप सबके सामने कह रहा हूँ-
‘यः कर्मफलं त्यजति, कर्माणि संन्यस्यति, ततो निर्द्वन्द्वो भवति’॥ ४८॥
जो कर्मफल का त्याग करता है, कर्मों का भी त्याग करता है और तब सब कुछ त्याग कर जो निर्द्वन्द्व हो जाता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १९१