गुरुवार, 7 नवंबर 2019

👉 मेरा कुछ नहीं

मेरे पास एक मकान है, जिसे मैंने खरीदा है और इधर-उधर से सुधारकर खूबसूरत शिष्ट व्यक्तियों के रहने योग्य बना लिया है। मैं इस पर खूब व्यय करता हूँ। प्रति वर्ष पुताई और रोगन सफाई चित्रों में व्यय करता हूँ।

पर क्या यह वास्तव में मेरा है? नहीं, कदापि नहीं। मेरे इसमें आने से पूर्व न जाने वह जमीन जिस पर यह खड़ा है, कितने व्यक्तियों के अधिकार में आकर निकली होगी? इस घर में कितने ही व्यक्ति आते जाते रहे होंगे? कोई मर कर, कोई गरीबी के कारण, कोई प्रकृति के किसी आक्रमण द्वारा बिखर गये होंगे, और तब मेरे पास आया होगा, यह मकान। मेरे जन्म से पूर्व यह मकान किसी और का था, मेरी मृत्यु के पश्चात न जाने इसका वासी कौन कहे, कौन होगा? पर यह निश्चय है, यह मेरा नहीं है। मैं जब तक जिन्दा हूँ इसमें आश्रय भर लेता हूँ, बस। केवल मेरा इससे इतना ही सरोकार है।

कृषक का खेत उसका सर्वत्व है। वह उसे रखने के लिए असंख्य आफतें मोल लेता है। सम्पूर्ण आयु पर्यन्त उसे अच्छा बनाने, उपज की वृद्धि में प्रयत्नशील रहता है, पर मूर्ख यह नहीं सोचता कि उसका वास्तव में कुछ नहीं! न जाने वह खेत कितने व्यक्तियों के पास से गुजर चुका है। भविष्य में न जाने कितने उसके मालिक बनेंगे।

मेरे हाथ में एक रुपया आ जाता है। मैं इसे अपना कहता हूँ। प्यार करता हूँ। प्यार से बटुए में छिपा कर रखता हूँ। थोड़ी देर के लिए मैं भूल जाता हूँ कि यह रुपया आवारा है। एक जगह नहीं टिकता इसकी गति बड़ी तीव्र है। एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे, तीसरे से चौथे, पाँचवें, पचासों, हजारों हाथों में यह चलता फिरता रहता है। किसी एक का नहीं बनता। किसी एक का होकर नहीं रहता। फिर, मैं भी कैसा मूर्ख हूँ जो इसे अपना अपना कहकर घमण्ड में फूल उठता हूँ। मैं क्यों यह ध्रुव सत्य विस्मृत कर बैठता हूँ कि इससे मेरा क्षणिक सम्बन्ध है। न जाने कल यह किसके पास होगा। इसका भावी कार्यक्रम गतिविधि क्या है?

मेरे पास असंख्य पुस्तकें हैं, घर की सैकड़ों छोटी बड़ी वस्तुएं हैं, आराम की वस्तुएँ हैं, गाय और भैंसें हैं, साइकिल मोटर है, अच्छे वस्त्र हैं, क्या इनसे मेरा सच्चा रिश्ता है, क्या ये सदा मेरी होकर रहने वाली हैं।

मैं फिर भूलता हूँ। क्षुद्र साँसारिक वस्तुओं के लोभ में इन्हें ‘अपना’ कहने की मूर्खता करता हूँ। मैं प्रमाद एवं अज्ञानवश यह समझने लगता हूँ कि ये मेरे व्यक्तित्व, मेरी आत्मा के अंग हैं। यही मेरी बड़ी गलती है। ये नाना वस्तुएँ भला क्योंकर मेरी हो सकती हैं। न जाने किस किस का इन पर कब कब अधिकार रहा होगा। थोड़ी देर के लिये ये मेरे पास एकत्रित हो गई हैं। फिर न जाने कौन कहाँ बिखर जायेगी।

मैं बाल बच्चों का पिता हूँ। मेरी पत्नी बच्चों से अपने को पृथक नहीं कर पाती। ‘हमारे बच्चे बड़े होंगे, हमें न जाने किस किस प्रकार से सहायता प्रदान करेंगे, हमारे दुःख दूर करेंगे।’ मैं भी कभी कभी यही समझने की मूर्खता कर बैठता हूँ। पर क्या वास्तव में ये बच्चे हमारे हैं? क्या हम ही इनके सब कुछ हैं? क्या इनका कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व, आशा अभिलाषा, इच्छाएँ नहीं हैं? नहीं, ये हमारे नहीं हैं? हमारा इनसे क्षणिक सम्बन्ध है जिस प्रकार पक्षियों के बच्चे समर्थ हो जाने पर उड़ जाते हैं, लौटकर फिर माँ-बाप के पास आकर नहीं रहते, उसी प्रकार ये मानव परिन्दे न जाने कब, कहाँ, किस ओर, किस अभिलाषा से उड़ जाने वाले हैं। फिर मैं इन्हें क्योंकर अपना कह सकता हूँ?

मैं अपने शरीर को ‘अपना’ ‘अपना’ कहता हूँ। साज शृंगार में यथेष्ट समय व्यय करता हूँ। शीशे में शक्ल देख कर फूला नहीं समाता। अपने नेत्र, कपोल नासिका, मुखमुद्रा को सर्वश्रेष्ठ समझता हूँ। अपने शरीर के प्रत्येक अवयव पर मुझे गर्व है। पर क्या वास्तव में यह शरीर मेरा है?

शरीर मेरा नहीं। वह तो हाड़, माँस, रक्त, मज्जा, तन्तु, वीर्य इत्यादि का पुतला मात्र है। क्या मैं उदर, मुख, पाँव, सिर इत्यादि हूँ? क्या मैं रक्त हूँ, माँस हूँ? अस्थियों का पिंजर हूँ? क्या मैं श्वांस हूँ, वाणी हूँ? क्या हूँ?

वास्तव में उपरोक्त वस्तुओं में से मेरा कुछ भी नहीं है। इन सब साँसारिक पदार्थों से मेरा सम्बन्ध क्षणिक, अस्थायी और झूठा है। अज्ञान तिमिर में मुझे इन वस्तुओं से अपना साहचर्य प्रतीत होता है। मैं तो आत्मा हूँ। इस शरीर रूपी पिंजरे में अल्पकाल के लिये आ बँधा हूँ। मैं ईश्वर का दिव्य अंश हूँ। संसार से निर्लिप्त हूँ। साँसारिक वस्तुओं से मेरा संबंध क्षणिक है। यदि मैं अल्प लोभ के वश स्वार्थ और तृष्णा में लिप्त होता हूँ, तो यह मेरा अज्ञान है, मूढ़ता है।

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1953/May/v1.14

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 7 Nov 2019




👉 Gayatri Sadhna truth and distortions Q.1

Q.1. Why is an idol or picture used for worship of God, who is formless? Are there more then one Gayatri?
Ans. It is an oft-repeated question. It should be understood that basic purpose of worship is meditation and contemplation; and name and form are essential for meditation. Everywhere people coordinate feelings and symbols in order to refine their sentiments. Every nation has its own national flag. Its citizens pay reverence to the national flag and get infuriated  when it is insulted. Even communists, who consider themselves atheists offer salutation to the red flag and when they go to Russia they pay a visit to Leningrad to have a glimpse of the place where Lenin’s embalmed body has been kept. Muslims who do not believe in idol worship offer their prayers  facing Kaba. They kiss the symbolic stone ‘Sang Asavad’ of Syah Moosa in Mecca.

Arya Samajists express divine faith in the letter ‘Om’ and in performing Agnihotra. The obvious reason is that it is convenient to concentrate the mind with the help of symbols. The work of teaching the alphabet to children becomes easy when it is done through pictorial symbols as Ka- Kabutar, Kha-Khargosh, Ga- Gamla, Gha- Ghadi, and so on in Hindi. The same principle applies to installation of idols of gods and goddesses. The Gayatri mahamantra does not have any other form or variant. Its authentic classical form comprises a syntax of just twenty-four letters encompassing three verses of eight letters each, three Vyahritis and one Onkar (o-o-o-m).

It is this ancient Mantra which is used during the traditional Sandhyavandan and for Gurudeekcha during Yagyopaveet ceremony. It is also known as the Guru Mantra. It appears that the other variants of Gayatri had been fabricated during the dark Middle Ages by founders of various sects to propagate their own pre-eminence.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions

👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग ३)

सन्तुलित मस्तिष्क की पहचान यह नहीं है कि वह शिथिलता, निष्क्रियता अपनाये और संसार को माया मिथ्या बताकर बे सिर-पैर उड़ाने उड़ने लगें। विवेकवान उद्विग्नता छोड़ने पर पलायन नहीं करते। वे कर्तव्य क्षेत्र में अंगद की तरह अपना पैर इतनी मजबूती से जमाते हैं कि असुर समुदाय पूरी शक्ति लगाकर भी उखाड़ने में सफल न हो सके। प्रलोभनों और दबावों से जो उबर सकता है, उसी के लिये यह सम्भव है कि उत्कृष्टता को वरण करे और आँधी तूफानों के बीच भी अपने निश्चय पर चट्टान की तरह अडिग रहे। इसके लिए उदाहरण, प्रमाण ढ़ूँढ़ने हों, साथी, सहचर, समर्थक ढ़ूँढ़ने हों तो इर्द-गिर्द नजर न डालकर महामानवों के इतिहास तलाशने पड़ेंगे। अपने समय में या क्षेत्र में यदि वे दीख न पड़ते हो तो भी निराश होने की आवश्यकता नहीं। इतिहास में उनके अस्तित्व और वर्चस्व को देखकर अभीष्ट प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है और विश्वास किया जा सकता है कि महानता का मार्ग ऐसा नहीं है, जिस पर चलने से यदि लालची सहमत न हो तो छोड़ देने की बात सोची जाने लगे।

वैभववानों की एक अपनी दुनिया हैं। किन्तु सोचना यह नहीं चाहिए कि संसार इतना ही छोटा है। इसमें एक क्षेत्र ऐसा भी है जिसे स्वर्ग कहते हैं। उसमें सत्प्रवृत्तियों का वर्चस्व है और अपनाने वाले जो भी उसमें बसते है, देवोपम स्तर का वरण करते हैं। दैत्यों के संसार में सोने की लंका बनाने और दस सिर जितनी चतुरता और बीस भुजाओं जैसी बलिष्ठता हो सकती है, किन्तु उतना ही सब कुछ नहीं हैं। भागीरथों, हरिश्चन्द्रों, प्रह्लादों और दधीचियों जैसी भी एक बिरादरी है। बुद्ध, चैतन्य, नानक, कबीर, रैदास, गाँधी, विनोबा जैसे अनेकों ने उसमें प्रवेश पाया है। दयानन्दों और विवेकानन्दों का भी अस्तित्व रहा है। संख्या की दृष्टि से कमी पड़ते देखकर किसी को भी मन छोटा नहीं करना चाहिए। समूचे आकाश में सूर्य और चन्द्र जैसी प्रतिभाएँ अपने पराक्रम से संव्याप्त अन्धकार से निरन्तर लड़ती रहती हैं। हार मानने का नाम नहीं लेती। समुद्र में मणि मुक्तक तो जहाँ तहाँ ही होते हैं, सीपों और घोंघों से ही उसके तट पटे पड़े रहते हैं। बहुसंख्यकों को बुद्धिमान अथवा अनुकरणीय मानना हो तो फिर उद्भिजों की बिरादरी को वरिष्ठता देनी पड़ेगी। यह बहुमत वाला सिद्धान्त मनुष्य समाज पर लागू नहीं हो सकता। श्रेष्ठता ही सदैव जीतती रही है, श्रेय पाती रही है। हमें अपनी दृष्टि नाव के मस्तूल पर, प्रकाश स्तम्भ पर रखनी चाहिए। इस संसार में निकृष्टता है तो श्रेष्ठता भी अनुपलब्ध नहीं है। मात्र दृष्टिकोण ही है, जो हमें उसके दर्शन नहीं करा पाता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 साधना का रहस्य

मनुष्य का अन्तःकरण दर्पण की भाँति है। सुबह से साँझ तक इस पर धूल जमती रहती है। लगातार इस धूल के जमते रहने से अन्तःकरण का दर्पण अपने स्वाभाविक गुणों को गँवा देता है। और यह सच्चाई सर्वविदित है कि अन्तःकरण की अवस्था के अनुरूप ही मनुष्य को ज्ञान होता है। अन्तःकरण का दर्पण जिस मात्रा में स्वच्छ है, उस मात्रा में ही सत्य उसमें प्रतिबिम्बित होता है।

सूफी सन्त जलालुद्दीन रूमी से किसी व्यक्ति ने अपनी मानसिक चंचलता का दुखड़ा रोया। उसकी परेशानी थी कि साधना में उसका मन एकाग्र नहीं होता। किसी भी तरह से उसका ध्यान नहीं जमता। रूमी ने मुस्कराते हुए उसे अपने एक मित्र साधु के पास यह कहकर भेजा- जाओ और उनकी समग्र दिनचर्या को बड़े ध्यान से देखो। वहीं तुम्हें साधना का रहस्य ज्ञात होगा।

निर्देश के अनुसार वह व्यक्ति उस साधु के पास गया। वहाँ जाकर उसे भारी निराशा हुई, क्योंकि वह साधु एक साधारण सी सराय का रखवाला था। साथ ही वह स्वयं भी बहुत साधारण था। उसमें कोई ज्ञान के लक्षण भी दिखाई नहीं देते थे। हाँ, वह बहुत सरल और शिशुओं की भाँति निर्दोष मालूम पड़ता था। उसकी दिनचर्या भी सामान्य सी थी। उस साधु की दिनचर्या की छान-बीन करने पर बस इतना भर पता चला कि वह रात्रि को सोने से पहले और सुबह जगने के बाद अपनी सराय के बर्तनों को अच्छी तरह से धोता-माँजता है।

इस साधु के पास से काफी निराश होकर वह व्यक्ति जलालुद्दीन रूमी के पास लौटा। उसने साधु की दिनचर्या उन्हें बतायी। सूफी सन्त रूमी हँसते हुए बोले, जो जानने योग्य था, वह तुम देख आये हो, लेकिन उसे ठीक से समझ नहीं सके। रात्रि में तुम भी अपने मन को माँजो और सुबह उसे पुनः धो डालो। धीरे-धीरे मन-अन्तःकरण निर्मल हो जाएगा। अन्तःकरण के निर्मल दर्पण में परमात्मा अपने आप ही प्रतिबिम्बित होता है। अन्तःकरण की नित्य सफाई ही साधना का रहस्य है। क्योंकि इस स्वच्छता पर ही साधना की सभी विधियों की सफलता निर्भर है। जो इसे विस्मरण कर देते हैं, वे साधना पथ से भटक जाते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ ११४

बुधवार, 6 नवंबर 2019

👉 प्रतिस्पर्धा :-

राजा ने मंत्री से कहा- मेरा मन प्रजाजनों में से जो वरिष्ठ हैं उन्हें कुछ बड़ा उपहार देने का हैं। बताओ ऐसे अधिकारी व्यक्ति कहाँ से और किस प्रकार ढूंढ़ें जाय?

मंत्री ने कहा - सत्पात्रों की तो कोई कमी नहीं, पर उनमें एक ही कमी है कि परस्पर सहयोग करने की अपेक्षा वे एक दूसरे की टाँग पकड़कर खींचते हैं। न खुद कुछ पाते हैं और न दूसरों को कुछ हाथ लगने देते हैं। ऐसी दशा में आपकी उदारता को फलित होने का अवसर ही न मिलेगा।

राजा के गले वह उत्तर उतरा नहीं। बोले! तुम्हारी मान्यता सच है यह कैसे माना जाय? यदि कुछ प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हो तो करो।

मंत्री ने बात स्वीकार करली और प्रत्यक्ष कर दिखाने की एक योजना बना ली। उसे कार्यान्वित करने की स्वीकृति भी मिल गई।

एक छः फुट गहरा गड्ढा बनाया गया। उसमें बीस व्यक्तियों के खड़े होने की जगह थी। घोषणा की गई कि जो इस गड्ढे से ऊपर चढ़ आवेगा उसे आधा राज्य पुरस्कार में मिलेगा।

बीसों प्रथम चढ़ने का प्रयत्न करने लगे। जो थोड़ा सफल होता दीखता उसकी टाँगें पकड़कर शेष उन्नीस नीचे घसीट लेते। वह औंधे मुँह गिर पड़ता। इसी प्रकार सबेरे आरम्भ की गई प्रतियोगिता शाम को समाप्त हो गयी। बीसों को असफल ही किया गया और रात्रि होते-होते उन्हें सीढ़ी लगाकर ऊपर खींच लिया गया। पुरस्कार किसी को भी नहीं मिला।

मंत्री ने अपने मत को प्रकट करते हुए कहा - यदि यह एकता कर लेते तो सहारा देकर किसी एक को ऊपर चढ़ा सकते थे। पर वे ईर्ष्यावश वैसा नहीं कर सकें। एक दूसरे की टाँग खींचते रहे और सभी खाली हाथ रहे।

संसार में प्रतिभावानों के बीच भी ऐसी ही प्रतिस्पर्धा चलती हैं और वे खींचतान में ही सारी शक्ति गँवा देते है। अस्तु उन्हें निराश हाथ मलते ही रहना पड़ता है।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 6 Nov 2019


👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग २)

यह मान्यता अनगढ़ों की है कि वैभव के आधार पर ही समुन्नत बना जा सकता है, इसलिए उसे हर काम छोड़कर हर कीमत पर अर्जित करने में अहर्निश संलग्न रहना चाहिए। सम्पन्नता से मात्र सुविधाएँ खरीदी जा सकती है और वे मात्र मनुष्य के विलास, अहंकार का ही राई रत्ती समाधान कर पाती है। राई रत्ती का तात्पर्य है, क्षणिक तुष्टि। उतना जितना कि आग पर ईंधन डालते समय प्रतीत होता है कि वह बुझ चली। किन्तु वह स्थिति कुछ ही समय में बदल जाती है और पहले से भी अधिक ऊँची ज्वालाएँ लहराने लगती हैं। दूसरों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करने में वैभव काम आ सकता है। दर्प दिखाने, विक्षोभ उभारने के अतिरिक्त उससे और कोई बड़ा प्रयोजन सधता नहीं है। अनावश्यक संचय के ईर्ष्या द्वेष से लेकर दुर्व्यसनों तक के अनेकानेक ऐसे विग्रह खड़े होते है, जिन्हें देखते हुए कई बार तो निर्धनों की तुलना में सम्पन्नों को अपनी हीनता अनुभव करते देखा गया है।

उत्कृष्टता के आलोक की आभा यदि अन्तराल तक पहुँचे तो व्यक्ति को नए सिरे से सोचना पड़ता है और अपनी दिशाधारा का निर्धारण स्वतन्त्र चिन्तन एवं एकाकी विवेक के आधार पर करना पड़ता है। प्रस्तुत जन समुदाय द्वारा अपनायी गयी मान्यताओं और गतिविधियों से इस प्रयोजन के लिए तनिक भी सहायता नहीं मिलती। वासना, तृष्णा के लिए मरने खपने वाले नर पामरों की तुलना में अपना स्तर ऊँचा होने की अनुभूति होते ही परमार्थ के लिए मात्र दो ही मनीषियों का आश्रय लेना पड़ता है, इनमें से एक को आत्मा दूसरे को परमात्मा कहते हैं। इन्हीं को ईमान और भावना भी कहा जा सकता है। उच्चस्तरीय निर्धारणों में इन्हीं का परामर्श प्राप्त होता है। व्यामोह ग्रस्त तो ‘कोढ़ी और संघाती चाहे’ वाली बात ही कर सकते हैं। नरक में रहने वालों को भी साथी चाहिए। अस्तु वे संकीर्ण स्वार्थपरता की सड़ी कीचड़ में उन्हीं की तरह बुलबुलाते रहने में ही सरलता, स्वाभाविकता देखते हैं। तदनुसार परामर्श भी वैसा ही देते हैं, आग्रह भी वैसा ही करते हैं।

इस रस्साकशी में विवेक का कर्तव्य है कि औचित्य का समर्थन करें। अनुचित के लिए मचलने वालों की बालबुद्धि को हँसकर टाल दें। गुड़ दे सकना सम्भव न हो तो, गुड़ जैसी बात कहकर भी सामयिक संकट को टाला जा सकता है। लेकिन बहुधा ऐसा होता नहीं। निकृष्टता का अभाव सहज ही मानव को अपनी ओर खींचता है। इसका निर्धारण स्वयं औचित्य, विवेक के आधार पर करना होता है। निषेधात्मक परामर्शों को इस कान सुनकर दूसरे कान से निकाल देना अथवा ऐसा परामर्श देने वाले व्यक्ति के चिन्तन का परिष्कार करना भी एक ऐसा प्रबल पुरुषार्थ है, जो बिरलों से ही बन पड़ता है। लेकिन यह संभव है क्योंकि मानवी गरिमा उसे सदा ऊँचा उठने, ऊँचा ही सोचने का संकेत करती है। कौन, कितना इस पुकार को सुन पाता है, यह उस पर, उसकी मन की संरचना, अन्तश्चेतना पर निर्भर है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (अंतिम भाग)

👉 पंचशीलों को अपनाएँ, आध्यात्मिक चिकित्सा की ओर कदम बढ़ाएँ

५. उदार बनने से चूके नहीं- आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति उदारता से कभी नहीं चूकता। कृपणता व विलासिता दोनों ही आध्यात्मिक रोगी होने के चिह्न हैं। उदारता तो स्वयं के अस्तित्व का विस्तार है। अपने परम प्रिय प्रभु से साझेदारी है। उनके इस विश्व उद्यान को सजाने- संवारने का भावभरा साहस है। जो भक्त हैं, वे उदार हुए बिना रह नहीं सकते। इसी तरह जो शिष्ट हैं, वे अपना समय- श्रम सद्गुरू को सौंपे बिना नहीं रह सकते। हमारे भण्डार भरे रहे और गुरुदेव की योजनाएँ श्रम और अर्थ के अभाव में अधूरी ही रहे, यह भला किन्हीं सुयोग्य शिष्यों के रहते किस तरह सम्भव है। यह न केवल सेवा की दृष्टि से बल्कि स्वयं की आध्यात्मिक चिकित्सा के लिए भी उपयोगी है। उदार भावनाएँ, उदार कर्म स्वयं ही हमारी मनोग्रन्थियों को खोल देते हैं। मनोग्रन्थियों से छुटकारे के लिए भावभरी उदारता एक समर्थ चिकित्सा विधि का काम करती है।

आध्यात्मिक चिकित्सा के इन पंचशीलों को अपनी जीवन साधना में आज और अभी से समाविष्ट कर लेना चाहिए। यदि इन्हें अपने जीवन में सतत उतारने के लिए सतत कोशिश की जाती रहे तो आध्यात्मिक दृष्टि से असामान्य व असाधारण बना जा सकता है। हम सबके आराध्य परम पूज्य गुरुदेव सदा ही इसी पथ पर चलते हुए आध्यात्मिक चिकित्सा के विशेषज्ञ बने थे। उनके द्वारा निर्देशित यही पथ अब हमारे लिए है। ऐसा करके हम अपने आध्यात्मिक स्वास्थ्य को सदा के लिए प्राप्त कर सकते हैं। और भविष्य में एक समर्थ आध्यात्मिक चिकित्सक की भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं। विश्वास है अपने भावनाशील परिजन इससे चूकेंगे नहीं। वे स्वयं तो इस पथ पर आगे बढ़ेंगे ही, दूसरों में भी आन्तरिक उत्साह जगाने में सहयोगी- सहायक बनेंगे। ऐसा होने पर अपने भारत देश की आध्यात्मिक चिकित्सा की परम्परा को नवजीवन मिल सकता है।

.... समाप्त
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १२४

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Nov 2019

★ "मेरे मन! दुर्गानाम जपो। जो दुर्गानाम जपता हुआ रास्ते में  चला जाता है, शूलपाणि शूल लेकर उसकी रक्षा करते है। तुम दिवा हो, तुम सन्ध्या हो, तुम्ही रात्रि हो; कभी तो तुम पुरुष का रूप धारण करती हो, कभी कामिनी बन जाती हो। तुम तो कहती हो कि मुझे छोड़ दो, परन्तु  मैं कदापि न छोडूँगा, - मैं तुम्हारे चरणों में नूपुर होकर बजता रहूँगा, - जय दुर्गा, श्रीदुर्गा कहता हुआ! माँ, जब शंकरी होकर तुम आकाश में उड़ती रहोगी तब मैं मीन बनकर पानी में रहूँगा तुम अपने नखों पर मुझे उठा लेना। हे ब्रह्ममयीं, नखों के आघात से यदि मेरे प्राण निकल जायें, तो कृपा करके अपने अरुण चरणों का स्पर्श मुझे कर देना।"

◆ भोग की शान्ति हुए बिना वैराग्य नहीं होता। छोटे बच्चे  को खाना और खिलौना देकर अच्छी तरह से भुलाया जा सकता है, परन्तु जब खाना हो गया और खिलौने के साथ खेल भी समाप्त हो गया तब वह कहता है, 'माँ के पास जाऊँगा।' माँ के पास न ले जाने पर खिलौना पटक देता है और चिल्लाकर रोता है। "मनुष्य उनकी माया में पड़कर अपने स्वरूप को भूल जाता है। इस बात को भूल जाता है कि वह अपने पिता के अनन्त ऐश्वर्य का अधिकारी है। उनकी माया त्रिगुणमयी है। ये तीनों ही गुण डाकू हैं। सब कुछ हर लेते हैं, हमारे स्वरूप को भुला देते हैं। सत्त्व, रज, तम तीन गुण हैं। इनमें से केवल सत्त्वगुण ही ईश्वर का रास्ता बताता है; परन्तु ईश्वर के पास सत्त्वगुण भी नहीं ले जा सकता।

रामकृष्ण परमहंस

मंगलवार, 5 नवंबर 2019

गुरु मंत्र गायत्री | Guru Mantra Gayatri



Title

दानवीर राजा रंतिदेव | Daanveer Raja Rantidev | Dr Chinmay Pandya



Title

👉 लोभ और भय

मैंने सुना है, राजा भोज के दरबार में बड़े पंडित थे, बड़े ज्ञानी थे और कभी कभी वह उनकी परीक्षा भी लिया करता था। एक दिन वह अपना तोता राजमहल से ले आया दरबार में। तोता एक ही रट लगाता था, एक ही बात दोहराता था बार बार : 'बस एक ही भूल है, बस एक ही भूल है, बस एक ही भूल है।'

राजा ने अपने दरबारियों से पूछा, "यह कौन सी भूल की बात कर रहा है तोता?" पंडित बड़ी मुश्किल में पड़ गए। और राजा ने कहा, "अगर ठीक जवाब न दिया तो फांसी, ठीक जबाब दिया तो लाखों के पुरस्कार और सम्मान।"

अब अटकलबाजी नहीं चल सकती थी, खतरनाक मामला था। ठीक जवाब क्या हो? तोते से तो पूछा भी नहीं जा सकता। तोता कुछ और जानता भी नहीं। तोता इतना ही कहता है, तुम लाख पूछो, वह इतना ही कहता है : 'बस एक ही भूल है।'

सोच विचार में पड़ गए पंडित। उन्होंने मोहलत मांगी, खोजबीन में निकल गए। जो राजा का सब से बड़ा पंडित था दरबार में, वह भी घूमने लगा कि कहीं कोई ज्ञानी मिल जाए। अब तो ज्ञानी से पूछे बिना न चलेगा। शास्त्रों में देखने से अब कुछ अर्थ नहीं है। अनुमान से भी अब काम नहीं होगा। जहां जीवन खतरे में हो, वहां अनुमान से काम नहीं चलता। तर्क इत्यादि भी काम नहीं देते। तोते से कुछ राज़ निकलवाया नहीं जा सकता। वह अनेकों के पास गया लेकिन कहीं कोई जवाब न दे सका कि तोते के प्रश्न का उत्तर क्या होगा।

बड़ा उदास लौटता था राजमहल की तरफ कि एक चरवाहा मिल गया। उसने पूछा, "पंडित जी, बहुत उदास हैं? जैसे पहाड़ टूट पड़ा हो आप के ऊपर, कि मौत आनेवाली हो, इतने उदास! बात क्या है?" तो उसने अपनी अड़चन कही, दुविधा कही। उस चरवाहे ने कहा, "फिक्र न करें, मैं हल कर दूंगा। मुझे पता है। लेकिन एक ही उलझन है। मैं चल तो सकता हूँ लेकिन मैं बहुत दुर्बल हूँ और मेरा यह जो कुत्ता है इसको मैं अपने कंधे पर रखकर नहीं ले जा सकता। इसको पीछे भी नहीं छोड़ सकता। इससे मेरा बड़ा लगाव है।" पंडित ने कहा, "तुम फिक्र छोड़ो। मैं इसे कंधे पर रख लेता हूँ।"

उन ब्राह्मण महाराज ने कुत्ते को कंधे पर रख लिया। दोनों राजमहल में पहुंचे। तोते ने वही रट लगा रखी थी कि एक ही भूल है, बस एक ही भूल है। चरवाहा हंसा उसने कहा, "महाराज, देखें भूल यह खड़ी है।" वह पंडित कुत्ते को कंधे पर लिए खड़ा था। राजा ने कहा, "मैं समझा नहीं।" उसने कहा कि "शास्त्रों में लिखा है कि कुत्ते को पंडित न छुए और अगर छुए तो स्नान करे और आपका महापंडित कुत्ते को कंधे पर लिए खड़ा है। लोभ जो न करवाए सो थोड़ा है। बस, एक ही भूल है : लोभ और भय लोभ का ही दूसरा हिस्सा है, नकारात्मक हिस्सा। यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक तरफ भय, एक तरफ लोभ।

ये दोनों बहुत अलग अलग नहीं हैं। जो भय से धार्मिक है वह डरा है दंड से, नर्क से, वह धार्मिक नहीं है। और जो लोभ से धार्मिक है, जो लोलुप हो रहा है वह वासनाग्रस्त है स्वर्ग से, वह धार्मिक नहीं है।

फिर धार्मिक कौन है? धार्मिक वही है जिसे न लोभ है, न भय। जिसे कोई चीज लुभाती नहीं और कोई चीज डराती भी नहीं। जो भय और प्रलोभन के पार उठा है वही सत्य को देखने में समर्थ हो पाता है।

सत्य को देखने के लिए लोभ और भय से मुक्ति चाहिए। सत्य की पहली शर्त है अभय क्योंकि जब तक भय तुम्हें डांवाडोल कर रहा है तब तक तुम्हारा चित्त ठहरेगा ही नहीं। भय कंपाता है, भय के कारण कंपन होता है। तुम्हारी भीतर की ज्योति कंपती रहती है। तुम्हारे भीतर हजार तरंगें उठती हैं लोभ की, भय की।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 5 Nov 2019




👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग १)

समुद्र में जब तक बड़े ज्वार-भाटे उठते रहते हैं तब तक उस पर जलयानों का ठीक तरह चल सकना सम्भव नहीं होता। रास्ता चलने में खाइयाँ भी बाधक होती हैं और टीले भी। समतल भूमि पर ही यात्रा ठीक प्रकार चल पाती है। शरीर न आलसी, अवसाद ग्रस्त होना चाहिए और न उस पर चंचलता, उत्तेजना चढ़ी रहनी चाहिए। मनःक्षेत्र के सम्बन्ध में भी यही बात है, न उसे निराशा में डूबा रहना चाहिए और न उन्मत्त, विक्षिप्तों की तरह उद्वेग से ग्रसित होना चाहिये। सौम्य सन्तुलन ही श्रेयस्कर है। दूरदर्शी विवेकशीलता के पैर उसी स्थिति में टिकते हैं। उच्चस्तरीय निर्धारण इसी स्तर की मनोभूमि में उगते-बढ़ते और फलते फूलते है। पटरी औंधी तिरछी हो तो रेलगाड़ी गिर पड़ेगी। वह गति तभी पकड़ती है, जब पटरी की चौड़ाई-ऊँचाई का नाप सही रहे।

जीवन-क्रम में सन्तुलन भी आवश्यक है। उसकी महत्ता पुरुषार्थ, अनुभव, कौशल आदि से किसी भी प्रकार कम नहीं है। आतुर, अस्त-व्यस्त, चंचल, उद्धत प्रकृति के लोग सामर्थ्य गँवाते रहते हैं। वे उस लाभ से लाभान्वित नहीं हो पाते जो स्थिर चित्त, संकल्पवान्, परिश्रमी, दूरदर्शी और सही दिशाधारा अपना कर उपलब्ध करते हैं। स्थिरता एक बड़ी विभूति है। दृढ़ निश्चयी धीर-वीर कहलाते हैं। वे हर अनुकूल प्रतिकूल परिस्थिति में अपना संतुलन बनाये रहते है। महत्त्वपूर्ण निर्धारणों के कार्यान्वित करने और सफलता के स्तर तक पहुँचने के लिए मनःक्षेत्र को ऐसा ही सुसन्तुलित होना चाहिए।

निराशा स्तर के अवसाद और क्रोध जैसे उन्माद आवेशों से यदि बचा जा सके तो उस बुद्धिमानी का उदय हो सकता है, जिसे अध्यात्म की भाषा में प्रज्ञा कहते और जिसे भाग्योदय का सुनिश्चित आधार माना जाता है। ऐसे लोगों का प्रिय विषय होता है उत्कृष्ट आदर्शवादिता। उन्हें ऐसे कामों में रस आता है, जिनमें मानवी गरिमा को चरितार्थ एवं गौरवान्वित होने का अवसर मिलता हो। भविष्य उज्ज्वल होता हो और महामानवों की पंक्ति में बैठने का सुयोग बनता हो। इस स्तर के विभूतिवान बनने का एक ही उपाय है कि चिन्तन को उत्कृष्ट और चरित्र, कर्तृत्व से आदर्श बनाया जाय। इसके लिए दो प्रयास करने होते है, एक संचित कुसंस्कारिता का परिशोधन उन्मूलन। दूसरा अनुकरणीय अभिनन्दनीय दिशाधारा का वरण, चयन। व्यक्तित्वों में उन सत्प्रवृत्तियों का समावेश करना होता हैं जिनके आधार पर ऊँचा उठने और आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। कहना न होगा कि गुण, कर्म, स्वभाव की विशिष्टता ही किसी को सामान्य परिस्थितियों के बीच रहने पर भी असामान्य स्तर का वरिष्ठ अभिनन्दनीय बनाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८९)

👉 पंचशीलों को अपनाएँ, आध्यात्मिक चिकित्सा की ओर कदम बढ़ाएँ

४. बर्बादी से बचें- गलत कामों में अपनी सामर्थ्य को बरबाद करने के दुष्परिणाम सभी जानते हैं। ऐसे लोगों को कुकर्मी, दुष्ट, दुराचारी कहा जाता है। इन्हें बदनामी मिलती है, घृणित, तिरस्कृत बनते हैं, आत्म प्रताड़ना सहते हुए सहयोग से वंचित होते हैं और पतन के गर्त में जा गिरते हैं। यह सब केवल अपनी सामर्थ्य के गलत नियोजन से होता है। इस महापाप से थोड़े कम दर्जे का पाप है- व्यर्थ में अपनी शक्तियों को गंवाते रहने की मूर्खता। यूं देखने में यह कोई बड़ी बुराई नहीं लगती पर इसके परिणाम लगभग उसी स्तर के होते हैं। आमतौर पर बर्बादी के चार तरीके देखने को मिलते हैं- १. शारीरिक श्रम शक्ति को व्यर्थ में गंवाना- आलस्य, २. मन को अभीष्ट प्रयोजनों में न लगाकर उसे इधर- उधर भटकने देना- प्रमाद, ३. समय का, धन का, वस्तुओं का, क्षमता का बेसिलसिले उपयोग करना, उन्हें बर्बाद करना- अपव्यय, ४. तत्परता, जागरूकता, साहसिकता, उत्साह का अभाव, अन्यमनस्क मन से बेगार भुगतने की तरह कुछ उलटा- सुलटा करते रहना- अवसाद।

इन चार दुर्गुणों की चतुरंगिणी से हम हर समय सजग सैन्य प्रहरी की तरह मुकाबला करें। कभी किन्हीं क्षणों में इन्हें स्वयं पर हावी न होने दें। आलस्य, प्रमाद, अपव्यय व अवसाद के असुरों से हमें पूरी क्षमता से निबटना चाहिए। श्रम निष्ठा, कर्म परायणता, उत्साह, स्फूर्ति, सजगता, विनम्रता, व्यवस्था, स्वच्छता, अपने स्वभाव के अंग होने चाहिए। भीरूता, आत्महीनता, दीनता, निराशा, चिन्ता जैसे किसी दुष्प्रवृत्ति को अपनी सामर्थ्य को बरबाद करने की इजाजत हमें नहीं देनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १२३

👉 पाप का सौदा

एक बार घूमते-घूमते कालिदास बाजार गये। वहाँ एक महिला बैठी मिली। उसके पास एक मटका था और कुछ प्यालियाँ पड़ी थी। कालिदास ने उस महिला से पूछा: ” क्या बेच रही हो?

“महिला ने जवाब दिया: ” महाराज! मैं पाप बेचती हूँ। “ कालिदास ने आश्चर्यचकित होकर पूछा: ” पाप और मटके में? “महिला बोली: ” हाँ , महाराज! मटके में पाप है।
“ कालिदास : ” कौन-सा पाप है?

“ महिला : ” आठ पाप इस मटके में है। मैं चिल्लाकर कहती हूँ की मैं पाप बेचती हूँ पाप… और लोग पैसे देकर पाप ले जाते है।” अब महाकवि कालिदास को और आश्चर्य हुआ: ” पैसे देकर लोग पाप ले जाते है? “ महिला : ”हाँ, महाराज! पैसे से खरीदकर लोग पाप ले जाते है। “ कालिदास: ” इस मटके में आठ पाप कौन-कौन से है?

“महिला: ” क्रोध, बुद्धिनाश, यश का नाश, स्त्री एवं बच्चों के साथ अत्याचार और अन्याय, चोरी, असत्य आदि दुराचार, पुण्य का नाश, और स्वास्थ्य का नाश … ऐसे आठ प्रकार के पाप इस घड़े में है।

“कालिदास को कौतुहल हुआ की यह तो बड़ी विचित्र बात है। किसी भी शास्त्र में नहीं आया है की मटके में आठ प्रकार के पाप होते है।

वे बोले: ”आखिरकार इसमें क्या है?”

महिला : ”महाराज! इसमें शराब है शराब! “कालिदास महिला की कुशलता पर प्रसन्न होकर बोले:” तुझे धन्यवाद है! शराब में आठ प्रकार के पाप है यह तू जानती है और ‘मैं पाप बेचती हूँ ‘ ऐसा कहकर बेचती है फिर भी लोग ले जाते है। धिक्कार है ऐसे लोगों के जीवन पर।

सोमवार, 4 नवंबर 2019

Only Determination Leads Your Rise | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

👉 अहंकार मरता है...शरीर जलता है

ऐसा कहते हैं कि नानक देव जी जब आठ वर्ष के थे तब पहली बार अपने घर से अकेले निकल पड़े, सब घर वाले और पूरा गाँव चिंतित हो गया तब शाम को किसी ने नानक के पिता श्री कालू मेहता को खबर दी कि नानक तो श्मशान घाट में शांत बैठा है। सब दौड़े  और वाकई एक चिता के कुछ दूर नानक बैठे हैं और एक अद्भुत शांत मुस्कान के साथ चिता को देख रहे थे, माॅ ने तुरंत रोते हुए गले लगा लिया और पिता ने नाराजगी जताई और पूछा यहां क्यों आऐ। नानक ने कहा पिता जी कल खेत से आते हुए जब मार्ग बदल कर हम यहां से जा रहे थे और मैंने देखा कि एक आदमी चार आदमीयो के कंधे पर लेटा है और वो चारो रो रहे हैं तो मेरे आपसे पूछने पर कि ये कौन सी जगह हैं, तो पिताजी आपने कहा था कि ये वो जगह है बेटा जहां एक न एक दिन सबको आना ही पड़ेगा और बाकी के लोग रोएगें ही।

बस तभी से मैनें सोचा कि जब एक दिन आना ही हैं तो आज ही चले और वैसे भी अच्छा नही हैं लगता अपने काम के लिए अपने चार लोगो को रूलाना भी और कष्ट भी दो उनके कंधो को, तो बस यही सोच कर आ गया।

तब कालू मेहता रोते हुए बोले नानक पर यहां तो मरने के बाद आते हैं इस पर जो आठ वर्षीय नानक बोले वो कदापि कोई आठ जन्मो के बाद भी बोल दे तो भी समझो जल्दी बोला

"नानक ने कहा पिता जी ये ही बात तो मैं सुबह से अब तक मे जान पाया हूं कि लोग मरने के बाद यहां लाए जा रहे हैं, अगर कोई पूरे चैतन्य से यहां अपने आप आ जाऐ तो वो फिर  कभी मरेगा ही नही सिर्फ शरीर बदलेगा क्योंकि मरता तो अंहकार है और जो यहां आकर अपने अंहकार कि चिता जलाता है वो फिर कभी मरता ही नही मात्र मोक्ष प्राप्त कर लेता है।।

इसीलिए उन्होंने अमर वचन कहे जप जी सहाब अर्थात  "एक ओंकार सतनाम "

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 4 Nov 2019





👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...