अवतार का लीला-संदोह
बुद्ध के बुद्धवाद का स्वरूप 'विचार क्रान्ति' था। पूर्वार्द्ध में धर्म चक्र का प्रवर्तन हुआ था। धर्म धारणा का सम्मान करते हुए लाखों व्यक्तियों ने उसमें भाव भरा योगदान दिया था। आनन्द जैसे मनीषी, हर्षवर्धन जैसे श्रीमन्त, आम्ब्रपाली जैसी कलाकार, अंगुलिमाल जैसे प्रतिभाशाली बड़ी संख्या में उस अभियान के अंग बने थे। इससे पिछले अवतारों का कार्यक्षेत्र सीमित रहा था, क्योंकि समस्यायें छोटी और स्थानीय थीं। बुद्ध-काल तक समाज का विस्तार बडे क्षेत्र में हो गया था। इसलिए बुद्ध का अभियान भी भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा और उन दिनों जितना व्यापक प्रयास सम्भव था, उतना अपनाया गया। धर्मचक्र प्रवर्तन भारत से एशिया भर में फैला और उससे भी आगे बढ़कर उसने अन्य महाद्वीपों तक अपना आलोक बाँटा।
प्रज्ञावतार-बुद्धावतार का उत्तरार्ध है। बुद्धि प्रधान युग की समस्यायें भी चिन्तन प्रधान होती हैं। मान्यतायें, विचारणायें, इच्छायें ही प्रेरणा केन्द्र होती हैं और उन्हीं के प्रवाह में सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तदनुरूप ही हो सकता है। लोकमानस को अवांछनीयता, अनैतिकता एवं मूढ़मान्यता से विरत करने वाली ही अपने समय की समस्याओं का समाधान कर सकती है।
आज आस्था संकट के कारण मनुष्य सुख-समृद्धि से सम्पन्न होने के बावजूद जिस जंजाल में स्वयं फँसा हुआ है एवं अन्यों के लिए विपत्ति का कारण बना हुआ है, उसका निवारण आस्था, प्रज्ञारूपी अस्त्र द्वारा ही सम्भव है।
परस्पर सम्वाद में वर्तमान स्थिति का विश्लेषण कर भगवान् इसीलिए प्रज्ञावतार के प्रकटीकरण की परिस्थितियाँ देवर्षि को समझौते हैं और पिछले अव्रतारों का स्मरण दिलाते हुए इस बार भी विभाषिका निवारण हेतु अपनी शक्तियों को सन्तुलन स्थापना के लिए आवश्यक प्रतिपादित करते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 15
बुद्ध के बुद्धवाद का स्वरूप 'विचार क्रान्ति' था। पूर्वार्द्ध में धर्म चक्र का प्रवर्तन हुआ था। धर्म धारणा का सम्मान करते हुए लाखों व्यक्तियों ने उसमें भाव भरा योगदान दिया था। आनन्द जैसे मनीषी, हर्षवर्धन जैसे श्रीमन्त, आम्ब्रपाली जैसी कलाकार, अंगुलिमाल जैसे प्रतिभाशाली बड़ी संख्या में उस अभियान के अंग बने थे। इससे पिछले अवतारों का कार्यक्षेत्र सीमित रहा था, क्योंकि समस्यायें छोटी और स्थानीय थीं। बुद्ध-काल तक समाज का विस्तार बडे क्षेत्र में हो गया था। इसलिए बुद्ध का अभियान भी भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा और उन दिनों जितना व्यापक प्रयास सम्भव था, उतना अपनाया गया। धर्मचक्र प्रवर्तन भारत से एशिया भर में फैला और उससे भी आगे बढ़कर उसने अन्य महाद्वीपों तक अपना आलोक बाँटा।
प्रज्ञावतार-बुद्धावतार का उत्तरार्ध है। बुद्धि प्रधान युग की समस्यायें भी चिन्तन प्रधान होती हैं। मान्यतायें, विचारणायें, इच्छायें ही प्रेरणा केन्द्र होती हैं और उन्हीं के प्रवाह में सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तदनुरूप ही हो सकता है। लोकमानस को अवांछनीयता, अनैतिकता एवं मूढ़मान्यता से विरत करने वाली ही अपने समय की समस्याओं का समाधान कर सकती है।
आज आस्था संकट के कारण मनुष्य सुख-समृद्धि से सम्पन्न होने के बावजूद जिस जंजाल में स्वयं फँसा हुआ है एवं अन्यों के लिए विपत्ति का कारण बना हुआ है, उसका निवारण आस्था, प्रज्ञारूपी अस्त्र द्वारा ही सम्भव है।
परस्पर सम्वाद में वर्तमान स्थिति का विश्लेषण कर भगवान् इसीलिए प्रज्ञावतार के प्रकटीकरण की परिस्थितियाँ देवर्षि को समझौते हैं और पिछले अव्रतारों का स्मरण दिलाते हुए इस बार भी विभाषिका निवारण हेतु अपनी शक्तियों को सन्तुलन स्थापना के लिए आवश्यक प्रतिपादित करते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 15


















