बुधवार, 6 मार्च 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1)

अवतार का लीला-संदोह

बुद्ध के बुद्धवाद का स्वरूप 'विचार क्रान्ति' था। पूर्वार्द्ध में धर्म चक्र का प्रवर्तन हुआ था। धर्म धारणा का सम्मान करते हुए लाखों व्यक्तियों ने उसमें भाव भरा योगदान दिया था। आनन्द जैसे मनीषी, हर्षवर्धन जैसे श्रीमन्त, आम्ब्रपाली जैसी कलाकार, अंगुलिमाल जैसे प्रतिभाशाली बड़ी संख्या में उस अभियान के अंग बने थे। इससे पिछले अवतारों का कार्यक्षेत्र सीमित रहा था, क्योंकि समस्यायें छोटी और स्थानीय थीं। बुद्ध-काल तक समाज का विस्तार बडे क्षेत्र में हो गया था। इसलिए बुद्ध का अभियान भी भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा और उन दिनों जितना व्यापक प्रयास सम्भव था, उतना अपनाया गया। धर्मचक्र प्रवर्तन भारत से एशिया भर में फैला और उससे भी आगे बढ़कर उसने अन्य महाद्वीपों तक अपना आलोक बाँटा।

प्रज्ञावतार-बुद्धावतार का उत्तरार्ध है। बुद्धि प्रधान युग की समस्यायें भी चिन्तन प्रधान होती हैं। मान्यतायें, विचारणायें, इच्छायें ही प्रेरणा केन्द्र होती हैं और उन्हीं के प्रवाह में सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तदनुरूप ही हो सकता है। लोकमानस को अवांछनीयता, अनैतिकता एवं मूढ़मान्यता से विरत करने वाली ही अपने समय की समस्याओं का समाधान कर सकती है।

आज आस्था संकट के कारण मनुष्य सुख-समृद्धि से सम्पन्न होने के बावजूद जिस जंजाल में स्वयं फँसा हुआ है एवं अन्यों के लिए विपत्ति का कारण बना हुआ है, उसका निवारण आस्था, प्रज्ञारूपी अस्त्र द्वारा ही सम्भव है।

परस्पर सम्वाद में वर्तमान स्थिति का विश्लेषण कर भगवान् इसीलिए प्रज्ञावतार के प्रकटीकरण की परिस्थितियाँ देवर्षि को समझौते हैं और पिछले अव्रतारों का स्मरण दिलाते हुए इस बार भी विभाषिका निवारण हेतु अपनी शक्तियों को सन्तुलन स्थापना के लिए आवश्यक प्रतिपादित करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 15

मंगलवार, 5 मार्च 2019

👉 एक खूबसूरत सोच

मात्र कुढ़ते रहने से, चिन्ता की चादर ओढ़कर निष्क्रिय हो जाने से और मन ही मन कुड़ बुड़ाते रहने से किसी को रत्ती भर लाभ न तो कभी हुआ है न कभी आगे होने वाला है।

इसलिए ऐ परमेश्वर के प्यारे पुत्रों! जिन्दा ही मर जाने की बजाय तुम मरकर भी जीवित बने रहने की विद्या का अभ्यास करो। निष्क्रियता की घुटन का घेरा तोड़कर उत्फुल्ल क्रियाशीलता की खुली हवा में साँस लेना सीखो।

रेशम का कीड़ा अपना कोया खुद बुनता है और फिर उसी में घुटकर मर जाता है। घुटन की छटपटाहट से उबरने के लिए वह भी शायद हमारी ही तरह कभी विधाता, कभी व्यवस्था और कभी पड़ौसी को कोसता होगा। हमारे मन रूपी कीड़े को भी अपने ही बनाये कोयों की कैद में बंधना-घुटन पड़ता है।
‘कोयाबन्दी’ की निष्क्रियता के अँधेरे बंद तहखानों से निकलकर ऊपर आओ, ‘मानसिक कालकोठरी’ के वातायनों को सूर्य की ऊष्मा और स्वच्छ सुरभित पवन का स्वागत करने दो। तुम्हारे कुस्वास्थ्य का यही एक मात्र निदान है।

जाओ और यही संदेश अपने संपर्क में आने वाले जन-जन तक पहुंचाओ ताकि जहाँ-जहाँ भी किसी प्रकार की बुराई हो उसे दूर करने में अपनी-अपनी सीमा और शक्ति भर वे सक्रिय सहयोग दे सकें। उनकी समस्त सामर्थ्य केवल हवा के साथ लड़ने में ही व्यर्थ न चली जाये।

सेन्ट पाल

👉 आज का सद्चिंतन 5 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 March 2019


👉 चिंतन

एक बकरी के पीछे शिकारी कुत्ते दौड़े। बकरी जान बचाकर अंगूरों की झाड़ी में घुस गयी। कुत्ते आगे निकल गए।
              
बकरी ने निश्चिंतापूर्वक अँगूर की बेले खानी शुरु कर दी, और जमीन से लेकर अपनी गर्दन पहुचे उतनी दूरी तक के सारे पत्ते खा लिए। पत्ते झाड़ी में नहीं रहे। छिपने का सहारा समाप्त् हो जाने पर कुत्तो ने उसे देख लिया और मार डाला !!             
      
सहारा देने वाले को जो नष्ट करता है, उसकी ऐसी ही दुर्गति होती है।
       
मनुष्य भी आज सहारा देने वालीं जीवन दायिनी नदियां, पेड़ पौधो, जानवर, गाय, पर्वतो आदि को नुकसान पंहुचा रहा है और इन सभी का परिणाम भी अनेक आपदाओ के रूप में भोग रहा है।

प्राकृतिक सम्पदा बचाओ
अपना कल सुरक्षित करो

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 27 से 30

अवतार का लीला-संदोह

अवतार प्रक्रिया आदिकाल से चली आ रही है और आदिकाल से अब तक मनुष्य जाति ने अनेक प्रकार के उतार-चढाव देखे है। स्वाभाविक ही भिन्न-भिन्न कालों में समस्यायें और असन्तुलन भिन्न-भिन्न प्रकार के रहे है।

जिस प्रकार की समस्यायें उत्पन्न हुई हैं, तब उसी का समाधान करने के लिए एक दिव्य चेतना, जिसे अवतार कहा गया है प्रादुर्भूत हुई है और उसी क्रम से अवतार, युग प्रवाह को उलटने के लिए अपनी लीलाएँ रचते रहे है। सृष्टि के आरम्भ में जल ही जल था। प्राणी जगत में जलचरों की ही प्रधानता थी, तब उस असंतुलन को मत्स्यावतार ने साधा। जब जल और थल पर प्राणियों की हलचलें बढी तो उनके अनुरूप क्षमता सम्पन्न कच्छप काया ने सन्तुलन बनाया। उन्हीं के नेतृत्व में समुद्र-मन्थन के रूप में प्रकृति दोहन का पुरुषार्थ सम्पन्न हुआ। हिरण्याक्ष  समुद्र में छिपी सम्पदा को ढूँढ़कर उसे अपने ही एकाधिकार में कर लिया तो भगवान् का वाराह रूप ही उसका दमन करने में समर्थ-सक्षम हो सका। जब मनुष्य अपनी आवश्यकता से अधिक कमाने में समर्थ हो गया तो संकीर्ण स्वार्थपरता से प्रेरित संचय की-प्रवृत्ति भी बढी। संचय और उपभोग की पशु प्रवृत्ति को उदारता में परिणत करने के लिए भगवान् वामन के छोटे बौने और पिछडे़ लोग उठ खड़े हुए और बलि जैसे सम्पन्न व्यक्तियों को स्वेच्छापूर्वक उदारता अपनाने के लिए सहमत कर लिया गया।

उच्छृंखलता जब उद्धत और उद्दण्ड हो जाती है तब शालीनता से उसका शमन नहीं हो सकता। प्रत्याक्रमण द्वारा ही उसका दमन करना पड़ता है। ऐसे अवसरों पर नरसिंहों की आवश्यकता पड़ती है और उन्हीं का पराक्रम अग्रणी रहता है। उन आदिम परिस्थितियों में भगवान् ने नर और व्याघ्र का समन्वय आवश्यक समझा तथा नृसिंह अवतार के रूप में दुष्टता के दमन एवं सज्जनता के संरक्षण का आश्वासन पूरा किया'।

इसके बाद परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध के अवतार आते हैं। इन सभी का अवतरण बढ़ते हुए अनाचरण के प्रतिरोध और सदाचरण के समर्थन-पोषण के उद्देश्य के लिए हुआ। परशुराम ने शस्त्र बल से सामन्तवादी निरंकुश आधिपत्य को समाप्त किया। राम ने मर्यादाओं के पालन पर जोर दिया तो कृष्ण ने अपने समय की धूर्तता और छल-छद्म से घिरी हुई परिस्थितियों का दमन 'विषस्य विषमौषधम्' की नीति अपना कर किया। कृष्ण चरित्र में कूटनीतिक दूरदर्शिता की इसलिए प्रधानता है कि इस समय की परिस्थितियों में सीधी उँगली से घी नहीं निकल पा रहा था। इसलिए काटे से काँटा निकालने का उपाय अपनाकर अवतार प्रयोजन को पूरा करना पड़ा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 14

सोमवार, 4 मार्च 2019

👉 आध्यात्मिक आदर्श के मूर्तिमान देवता भगवान शिव (अन्तिम भाग)

भगवान् शिव का वाहन वृषभ है। वृषभ सौम्यता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है। तात्पर्य यह कि शिव का साहचर्य उन्हें मिलता है। जो स्वभाव से सरल और सौम्य होते हैं, जिनमें छल-छिद्र आदि विकार नहीं होते। साथ ही जिनमें आलस्य न होकर निरन्तर काम करने की दृढ़ता होती है। श्मशान में उनका निवास है अर्थात् वे मृत्यु को कभी भूलते नहीं। भगवान की शक्ति और नियमों को मृत्यु की तरह अकाट्य मानकर चलने में मनुष्य की आध्यात्मिक वृत्तियां जागृत रहती हैं जिससे वह लौकिक कर्त्तव्यों का पालन करते हुए भी अपने जीवन-लक्ष्य की ओर निष्काम भाव से चलता रह सकता है। मृत्यु को लोग भूले रहते हैं, इसलिए कर्म करते हैं। इस महातत्त्व की उपासना का अर्थ अपने आपको बुरे कर्मों से बचाये रखने के लिये प्रकाश बनाए रखना होता है। इस तरह की जीवन-व्यवस्था व्यक्ति को असाधारण बनाती है। वह शक्ति शिव में पाई जाती है, शिव के उपासकों में भी वह वृत्तियां धुली हुई होनी चाहिए।

यह प्रसंग भगवान् शिव की आध्यात्मिक शक्तियों पर प्रकाश डालते हैं। इनके साथ कथानक और घटनायें भी जुड़ी हुई हैं जो जीवन के आदर्शों की व्याख्या करती हैं इनमें से गंगावतरण की कथा मुख्य है। गंगाजी विष्णुलोक से आती हैं। यह अवतरण महान् आध्यात्मिक शक्ति के रूप में होता है। उसे संभालने का प्रश्न बड़ा विकट था। शिवजी को इसके उपयुक्त समझा गया और भगवती गंगा को उनकी जटाओं में आश्रय मिला। गंगाजी यहां ज्ञान की प्रचण्ड आध्यात्मिक शक्ति के रूप में अवतरित होती हैं। लोक-कल्याण के लिए उसे धरती पर प्रवाहित करने की बात है ताकि अज्ञान से मरे हुए लोगों को जीवन दान मिल सके पर उस ज्ञान को धारण करना भी तो कठिन बात थी जिसे शिव जैसा संकल्प-शक्ति वाला महापुरुष ही धारण कर सकता है। अर्थात् महान बौद्धिक क्रान्तियों का सृजन भी कोई ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है जिसके जीवन में भगवान शिव के आदर्श समाये हुए हों वही ब्रह्म-ज्ञान को धारण कर उसे लोक हितार्थ प्रवाहित कर सकता है।

गृहस्थ होकर भी पूर्ण योगी होना शिवजी के जीवन की महत्वपूर्ण घटना है। सांसारिक व्यवस्था को चलाकर भी वे योगी रहते हैं। पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। वे अपनी धर्मपत्नी को भी मातृशक्ति के रूप में देखते हैं। यह उनकी महानता का दूसरा आदर्श है। यहां उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि गृहस्थ रहकर भी आत्म-कल्याण की साधना असम्भव नहीं। जीवन में पवित्रता रखकर उसे हंसते खेलते पूरा किया जा सकता है।

यह सभी आदर्श इस बात की शिक्षा देते हैं कि मनुष्य शिव की तरह के पदार्थों और समाज में प्रचलित परम्पराओं का आध्यात्मिक मूल्यांकन करना सीख ले तो निस्सन्देह उसका शारीरिक और सामाजिक जीवन अधिकाधिक निरापद होता चला जायेगा। संक्षेप में कहा जा सकता है कि शिव मानव-जीवन की उन सभी आध्यात्मिक विशेषताओं के प्रतीक हैं जिनके बिना मनुष्य-जीवन पाने का अर्थ हल नहीं होता। मनुष्य का धर्म उसकी विवेक-बुद्धि है जिसके सहारे वह ज्ञान-विज्ञान की ओर अग्रसर होता है और मनुष्य से देव बनने में समर्थ होता है। इस की सामर्थ्य प्राप्त करके ही आत्म कल्याण और लोक-हित की परम्परा जीवित रखी जा सकती है। यह सन्देश हमें आदिकाल से भगवान् शिव देते चले आ रहे हैं। इन आध्यात्मिक रहस्यों की ओर से हमें उपेक्षा नहीं रखनी चाहिये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाय पृष्ठ 143-145


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 March 2019


👉 आज का सद्चिंतन 4 March 2019

शनिवार, 2 मार्च 2019

👉 आध्यात्मिक आदर्श के मूर्तिमान देवता भगवान शिव (भाग 2)

शिव के स्वरूप, अलंकार और जीवन सम्बन्धी घटनाओं का और भी विशद् वर्णन मिलता है। ऐसे प्रत्येक प्रसंग में या तो किसी दार्शनिक तत्व का विवेचन सन्निहित है अथवा व्यावहारिक आचरण की शिक्षा दी गई है। आइये, इन पर एक-एक करके विचार किया जाये—

(1) शिव का स्वरूप— भगवान् शंकर के स्वरूप में जो विचित्रतायें हैं वह किसी मनुष्य की देह में सम्भव नहीं इसलिए उसकी सत्यता संदिग्ध मानी जाती है। पर हमें यह जानना चाहिये कि यह चित्रण सामान्य नहीं, अलंकार है जो मनुष्यों में योग-साधनाओं के आधार पर जागृत होते हैं।

(2) माथे पर चन्द्रमा— चन्द्रमा मन की मुदितावस्था का प्रतीक है अर्थात् योगी का मन सदैव चन्द्रमा की भांति उत्फुल्ल, चन्द्रमा की भांति खिला निःशंक होता है। चन्द्रमा पूर्ण ज्ञान का प्रतीक भी है अर्थात् उसे जीवन की अनेक गहन परिस्थितियों में रहते हुए भी किसी प्रकार का विभ्रम अथवा ऊहापोह नहीं होता। वह प्रत्येक अवस्था में प्रमुदित रहता है, विषमताओं का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

(3) नीलकंठ— पुराणों में ऐसी कथा आती है कि देवों और दानवों का रक्तपात बचाने के लिए भगवान शंकर ने विष पी लिया था और तब से इनका कंठ नीला है अर्थात् इन्होंने विष को कंठ में धारण किया हुआ है। इस कथानक का भी सीधा साधा सम्बन्ध योग की सिद्धि से ही है। योगी पुरुष अपने सूक्ष्म शरीर पर अधिकार पा लेता है, जिससे उसके स्थूल शरीर पर बड़े तीक्ष्ण विषों का भी प्रभाव नहीं होता। उन्हें भी वह सामान्य मानकर ही पचा लेता है। यह बात इस तरह भी है कि संसार के मान अपमान, कटुता-क्लेश आदि दुख-कष्टों का उस पर कोई प्रभाव नहीं होता। उन्हें भी वह साधारण घटनायें मानकर आत्मसात् कर लेता है और संसार का कल्याण करने की अपनी आत्मिक वृत्ति में निश्चल भाव से लगा रहता है। दूसरे व्यक्तियों की तरह लोकोपकार करते समय उसे स्वार्थ आदि का कोई ध्यान नहीं होता। वह निर्विकार भावना की भलाई में जुटा रहता है। खुद विष पीता है पर औरों के लिए अमृत लुटाता रहता है।
(4) विभूति रमाना— शिव ने सारे शरीर पर भस्म रमा रखी है। योग की पूर्णता पर संयम सिद्धि होती है। योगी अपने वीर्य को शरीर में रमा लेते हैं जिससे उसका सौन्दर्य फूट पड़ता है। इस सौन्दर्य को भस्म के द्वारा अपने आप में रमा लेता है। उसे बाह्य अलंकारों द्वारा सौन्दर्य बढ़ाने की आवश्यकता नहीं रहती। अक्षुण्ण संयम ही उसका अलंकार बन गया है, जिससे उसका स्वास्थ्य और शरीर सब कांतियुक्त हो गये हैं।
(5) तृतीय नेत्र— योग की भाषा में इसे नेत्रोन्मीलन या आज्ञा-चक्र का जागरण भी कहते हैं। उसका सम्बन्ध गहन आध्यात्मिक जीवन से है। घटना प्रसंग जुड़ा हुआ है कि शिवजी ने एक बार तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भी जला दिया था योगी का यह तीसरा नेत्र यथार्थ ही बड़ा महत्व रखता है। सामान्य परिस्थितियों में वह विवेक के रूप में जागृत रहता है, पर वह अपने आप में इतना सशक्त और पूर्ण होता है कि कामवासना जैसे गहन प्रकोप भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं कर पाते। उन्हें भी जला डालने की क्षमता उसके विवेक में बनी रहती है। इसे वैज्ञानिक बुद्धि का प्रतिनिधि भी कहा जा सकता है। पर सबका तात्पर्य यही है कि तृतीय नेत्र होना साधारण क्षमता से उठाकर विशिष्ट श्रेणी में पहुंचा देना है। भारतीय संस्कृति का यह वैज्ञानिक पहलू कहीं अधिक मूल्यवान् भी है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाय पृष्ठ 141-142

👉 आज का सद्चिंतन 2 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 March 2019


👉 कालिदास की कथा

कालिदास एक गया बीता व्यक्ति था, बुद्धि की दृष्टि से शून्य एवं काला कुरूप। जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था। जंगल में उसे इस प्रकार बैठे देख राज्य सभा से विद्योत्तमा अपमानित पण्डितों ने उस विदुषी को शास्त्रार्थ में हराने व उसी से विवाह कराने का षड्यन्त्र रचने के लिए कालिदास को श्रेष्ठ पात्र माना। शास्त्रार्थ में अपनी कुटिलता से उसे मौन विद्वान् बताकर उन्होंने प्रत्येक प्रश्न का समाधान इस तरह किया कि विद्योत्तमा ने उस महामूर्ख से हार मान उसे अपना पति स्वीकार कर लिया।

पहले ही दिन जब उसे वास्तविकता का पता चला जो उसने उसे घर से निकाल दिया। धक्का देते समय जो वाक्य उसने उसकी भर्त्सना करते हुए कहे- वे उसे चुभ गये। दृढ़ संकल्प- अर्जित कर वह अपनी ज्ञान वृद्धि में लग गया। अन्त में वही महामूर्ख अपने अध्ययन से कालान्तर में महाकवि कालिदास के रूप में प्रकट हुआ और अपनी विद्वता की साधना पूरी कर विद्योत्तमा से उसका पुनर्मिलन हुआ।

लेकिन जो अवसर की महत्ता नहीं पहचानते, उन्हें तो अन्तत : पछताना ही पड़ता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 27 से 30


यदा मनुष्यो! नात्मानमात्मनोद्धर्तुमर्हति ।
कृतावतारोऽलं तस्य स्थितो: सशोधयाम्यहम्॥२७॥
क्रमेऽस्मिन्सुविधायुक्ता: साधनै: सहिता:नरा:।
विभीषिकायां नाशस्याऽनास्थासंकटपाशिता:॥२८॥
तन्निवारणहेतोश्च कालेऽस्मिंश्चलदलोपमें ।
प्रज्ञावताररुपेऽवतराम्यत्र तु पूर्ववत्॥२९॥
त्रयोविंशतिवारं यद्भ्रष्टं सन्तुलनं भुवि ।
संस्थापितं मयैवैतद् भ्रष्टं सन्तुलयाम्यहम्॥३०॥

टीका:- जब मनुष्य अपने बल-बूते दल-दल से उबर नहीं पाते तो मुझे अवतार लेकर परिस्थितियाँ सुधारनी पड़ती हैं? इस बार सुविधा-साधन रहते हुए भी मनुष्यों को जिस विनाश विभीषका में फँसना पड़ रहा हैं उसका मूल कारण आस्था-संकट ही हैं। उसके निवारण हेतु मुझे इस अस्थिर, समय में इस बार प्रज्ञावतार के रूप में अवतरित होना है। पिछले तेईस बार की तरह इस बार भी बिगड़े सन्तुलन को फिर संभालना है ॥२७-३०॥

व्याख्या:- मानवी पुरुषार्थ की भी अपनी महिमा-महत्ता है। लेकिन जब मनुष्य दुर्बुद्धि जन्य विभीषिकाओं के सामने स्वयं को विवश-असहाय अनुभव करता है, तब परिस्थितियाँ अवतार प्रकटीकरण की बनती हैं। भगवान ने हर बार मानवता के परित्राण हेतु असंतुलन कि स्थिति में अवतार लिया है और सृष्टि की डूबती नैया को पार लगाया है।

सृष्टा अपनी अद्भुत कलाकृति विश्व-वसुधा को, मानवी सत्ता को, सुरभ्य वाटिका को विनाश के गर्त में गिरने से पूर्व ही बचाता और अपनी सक्रियता का परिचय देता है तथा परिस्थितियों को उलझने का चमत्कार उत्पन्न करता है। यही अवतार है। संकट के सामान्य स्तर से तो मनुष्य ही निपट लेते है, पर जब आसामान्य स्तर की विपन्नता उत्पन्न हो जाती है तो सृष्टा को स्वयं ही अपने आयुध सम्भालने पड़ते है। उत्थान के साधन जुटाना भी कठिन है पर पतन के गर्त में द्रुतगति से गिरने वाले लोक मानस को उलट देना अति कठिन है। इस कठिन कार्य को सृष्टा ने समय-समय पर स्वयं ही सम्पन्न किया है। आज की विषम वेला भी अवतरण की परम्परा का निर्वाह करते हुए अपनी लीला संदोह प्रस्तुत करते कोई भी प्रज्ञावान प्रत्यक्ष देख सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 14

शुक्रवार, 1 मार्च 2019

👉 आध्यात्मिक आदर्श के मूर्तिमान देवता भगवान शिव

भारतीय संस्कृति में देवताओं की विचित्र कल्पनायें की गई हैं। उनकी मुखाकृति, वेष-विन्यास रहन-सहन, वाहन आदि के ऐसे विचित्र कथानक जोड़कर तैयार किये गये हैं कि उन्हें पढ़कर यह अनुमान करना भी कठिन हो जाता है कि वस्तुतः कोई ऐसे देवी देवता हैं भी अथवा नहीं? चार मुख के ब्रह्माजी, पंचमुख महादेव, षट्मुख कार्तिकेय, हाथी की सूंड़ वाले श्री गणेशजी, पूंछ वाले हनुमानजी—यह सब विचित्र-सी कल्पनायें हैं, जिन पर मनुष्य की सीधी पहुंच नहीं हो पाती उसे या तो श्रद्धावश देवताओं को सिर झुकाकर चुप रह जाना पड़ता है या फिर तर्कबुद्धि से ऐसी विचित्रताओं का खण्डन कर यही मान लेना पड़ता है कि ऐसे देवताओं का वस्तुतः कहीं कोई अस्तित्व नहीं है।

पौराणिक देवी-देवताओं के वर्णन मिलते हैं उन पर गम्भीरतापूर्वक विचार करें तो पता चलता है कि इन विचित्रताओं के पीछे बड़ा समुन्नत आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है। मानव-जीवन के किन्हीं उच्च आदर्शों और स्थितियों का इस तरह बड़ा ही कलापूर्ण दिग्दर्शन किया है, जिसका अवगाहन करने मात्र से मनुष्य दुस्तर साधनाओं का फल प्राप्त कर मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकता है।

इस प्रकार के आदर्श आदिकाल से मनुष्य को आकर्षित करते रहे हैं। मनुष्य उनकी उपासना करता रहा है और जाने अनजाने भी इन आध्यात्मिक लाभों से लाभान्वित होता रहा है। इन्हें एक प्रकार से व्यावहारिक जीवन की मूर्तिमान् उपलब्धियां कहना चाहिए। उसे जीवन क्रम में इतना सरल और सुबोधगम्य बना देने में भारतीय आचार्यों की सूक्ष्म बुद्धि का उपकार ही माना चाहिए, जिन्होंने बहुत थोड़े में सत्य और जीवन-लक्ष्य की उन्मुक्त अवस्थाओं का ज्ञान उपलब्ध करा दिया है।

शैव और वैष्णव यह दो आदर्श भी उन्हीं में से है। शिव और विष्णु दोनों आध्यात्मिक जीवन के किन्हीं उच्च आदर्शों के प्रतीक हैं। इन दोनों में मौलिक अन्तर इतना ही है कि शिव आध्यात्मिक जीवन को प्रमुख मानते हैं। उनकी दृष्टि में लौकिक सम्पत्ति का मूल्य नहीं है, वैराग्य ही सब कुछ है जब कि विष्णु जीवन के लौकिक आनन्द का भी परित्याग नहीं करते।

यहां हमारा उद्देश्य इन दोनों स्थितियों में तुलना या श्रेष्ठता के आधार ढूंढ़ना नहीं है। शिव के आध्यात्मिक रहस्यों का ज्ञान करना अभीष्ट है ताकि लोग इस महत्व का भली भांति अवगाहन कर अपना जीवन लक्ष्य सरलतापूर्वक साध सकें।

शिव का आकार लिंग माना जाता है। उसका अर्थ यह है कि यह सृष्टि साकार होते हुए भी उसका आधार आत्मा है। ज्ञान की दृष्टि से उसके भौतिक सौन्दर्य का कोई बड़ा महत्व नहीं है। मनुष्य को आत्मा की उपासना करानी चाहिए, उसी का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। सांसारिक रूप सौन्दर्य और विविधता में घसीटकर उस मौलिक सौन्दर्य को तिरोहित नहीं करना चाहिये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाय पृष्ठ 139- 140

👉 आज का सद्चिंतन 1 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 March 2019


गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

👉 युद्ध बलिदान मांगता है,,,

पाकिस्तानियों से ज्यादा गुस्सा फेसबुकियों पर आता है कई बार,,
एयर फोर्स के 12 जवानों के चित्र जारी कर रहे हैं, ध्यान रखो,,

दुश्मन सिर्फ बाहर नहीं है,, बड़ी मात्रा में अंदर भी है,, दुश्मन ठंडे रक्त बैठा है,, एक साल बाद बदला लेगा जब सब इस बात को भूल चुके होंगे,, क्यों उनकी जान को जोखिम में डाल रहे हो,,

अभी गुम हुए पायलेट का चित्र डालना शुरू कर दिया ,,, तुम भी वही कर रहे हो जो पाकिस्तान कर रहा है,, वह डर फैलाना चाहता है,, तुमको रुलाना चाहता है,, तुम पहले ही दहाड़ मार मारकर रोने को तैयार बैठे हो,,

अपने जवानों पर भरोसा रखो,, कच्ची मिट्टी के नहीं हैं वे लोग,, विश्व की सबसे बहादुर सेना है,,, टुकड़े टुकड़े कट मरेंगें पर उफ नहीं करेंगे,,

सूरा सो पहचानिए,, जो लड़े दीन के हेत,,
पुर्जा पुर्जा कट मरे,, कबहुँ न छड्डे खेत,,

तुमने कल उनके 300 से अधिक मारे,, तो भी वे कह रहे हैं कि हमारा तो कुछ नुकसान नहीं हुआ,, तुम्हारा एक पकड़ा गया तो रोना शुरू कर दिया,, लगे छाती पीटने,,

अपने देश और अपनी सेना के साथ बहादुरी से खड़े रहिए,, आहुतियां तो देनी पड़ती हैं जब राष्ट्र यज्ञ हो रहा हो,, लेकिन यकीन मानिए छाती वो पिटेंगे जिन्होंने ये शुरू किया है,,

युद्ध में फूलों के गुलदस्ते नहीं दिए जाते,, युद्ध बलिदान मांगता है,,, अपने पराक्रम और शौर्य का परिचय दो,,

तुम उनके वंशज हो जिनकी गर्दन कट जाने पर हाथ में गर्दन लेकर 1 किलोमीटर तक लड़ते रहे थे,,
तुम उनका खून हो जो सुमेलगिरी में 80 हजार से 60 टकरा गए थे,,
तो बंद करो ऐसी तस्वीरों को डालना जिससे चाहे अनचाहे हमारे अपनो का मनोबल टूटे,,,

रणचंडी के उपासक इतने कमजोर तो नहीं,,
उन्होंने युद्ध शुरू किया है,,निपटाएंगे हम,,

हर हर महादेव,,
जय भवानी,,
जय हिन्द की सेना।

👉 जय हिन्द की सेना

इस से पहले कि देश में IC 814 वाला माहौल बने और हम रोना बिलखना शुरू करें कुछ चीजों पर कॉमन कंसेंसस लाना होगा.

1. हम युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं.

2. ये युद्ध हम पर थोपा गया है. हमारे 40 जवान जवानों आतंकवादी संगठन जैश ऐ मुहम्मद के आतंकवादी द्वारा बम्ब विस्फोट में गंवाने पड़े.

3. हमने जैश ऐ मुहमम्द के ट्रेनिंग कैंप पर हमला कर आतंकवादियों की कमर तोड़ी.

4. पाकिस्तान ने हमारे आर्मी इस्टैब्लिशमेंट पर हमला करने की कोशिश की जिसमें उनकी कोशिश को नाकाम कर दिया गया उनके F 16 को मार गिराया गया और उसी कोशिश में हमारा एक मिग 21 और विंग कमांडर अभिनन्दन पाकिस्तानियों के कब्जे में पहुँच गए. जेनेवा इंटरनेशनल कन्वेंशन के अनुसार विंग कमांडर अभिनन्दन को वापस लौटाना पाकिस्तान की मजबूरी है.

5 . युद्ध अब शुरू ही है. और हर युद्ध की एक कीमत होती है. जब हम युद्ध में जाने का फैसला करते हैं तो उस कीमत का आंकलन हमको होना चाहिए. देश का हौसला देश का विश्वास और देश पर देश वासियों का विश्वास बनाये रखने की जिम्मेदारी सिर्फ सेना, सरकार की ही नहीं हम जैसे आम नागरिकों की भी है.

6. किसी भी खबर पर पैनिक मत होइए...खासकर पाकिस्तानी प्रोपगंडा के बहकावे में मत आइये. हमारी सेना पाकिस्तान का मुंह तोड़ने में सक्षम है कृपया उनका मनोबल जाने अनजाने न गिराइये.

7. कोई भी आपत्तिजनक वीडियो फोटो अगर आपके पास आ भी गया है तो जिम्मेदारी के साथ उसको डेलीट या रिपोर्ट कर दीजिये. उसको आगे बढ़ा के आप जाने अनजाने देश के दुश्मनों की ही मदद कर रहे हैं क्यूंकि वो भी चाहते हैं कि आपके समाज में विघटन बढे और लोग डरें.

8. डट कर अपने देश की सरकार के साथ खड़े रहिये, जय हिन्द और जय हिन्द की सेना के साथ.

👉 एक जरुरी सुचना....कृपया पूरी पढ़े।

भारत की वायुसेना ने जो अदम्य साहस दिखाया है पाक को घर में घुस कर मारा है उसके लिए सेना को ढेर सारी बधाई। आज इस मुश्किल घडी में हम सब देश के साथ है देश की सेना के साथ है हर उस फैसले के साथ है जो राष्ट्र हित में होगा।

पर आज अब कुछ जिम्मेदारी हम आम नागरिको की भी बनती है पाक अभी बौखलाया हुआ है तनाव में है और ये भी तय है कि वो अब हमारी इस AirStrike का जवाब भी ढूंढ रहा होगा।

अब हमे बहुत सचेत और सावधान रहना होगा। अपने आसपास बस स्टेण्ड..रेलवे स्टेशन..मंदिर..होटल..मॉल..भीड़भाड़ वाले बाजार..सिनेमा हॉल..अन्य ऐसी जगह जहाँ बहुत ज्यादा भीड़ रहती है वँहा हमे सतर्क रहना होगा।

कुछ भी जो आपको संदिग्ध लगे..अप्रत्याशित सा लगे तो तुरन्त पुलिस को खबर करे।

हमे आज पाक से खतरा कम है और देश के अंदर बेठे गद्दारो और पाक परस्त लोगो से ज्यादा है। उन्हें कोई LOC या बोर्डर पार नही करना पड़ेगा और वो हमारी थोड़ी सी लापरवाही से हमे और हमारे देश को बड़ा नुकसान पहुँचा सकते है।

इसीलिए आप सभी से निवेदन है कि आने वाले कुछ दिनों तक अत्यंत सावधानी रखे और सदैव हरपल सतर्क रहे ,सावधान रहें और आसपास के लोगो को भी ऐसा करने को कहे।

पाकिस्तान से तो देश की सेना आराम से निपट लेगी पर आस्तीनों के सांपो से तो हमे ही निपटना होगा।

भारत देश अभी हाई अलर्ट पर है, भारत की सभी सीमाओ पर सेना तैनात है।

खुफिया एजेंसियां एवम गुप्त विभाग भी हाई अलर्ट है।

आम नागरिक भी हाई अलर्ट पर रहे।

कृपया इस सन्देश को ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुचाये।

भारत माता की जय
जय हिन्द
वंदेमातरम

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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