शुक्रवार, 2 नवंबर 2018
👉 साधना- अपने आपे को साधना (भाग 2)
🔶 साधना आत्मिक क्षेत्र में भी होती है और भौतिक क्षेत्र में भी। कदम जिस भी दिशा में बढ़ते हैं प्रगति उसी ओर होती है। अपनी सतर्कता पूर्ण सुव्यवस्था जिस भी मार्ग पर गतिशील कर दी जाय उसी में एक के बाद एक सफलता के मील पत्थर मिलते चले जायेंगे।
🔷 साधना का महत्व किसान जानता है। पूरे वर्ष अपने खेत की मिट्टी के साथ अनवरत गति से लिपटा रहता है और फसल को स्वेद कणों से नित्य ही सींचता रहता है। सर्दी−गर्मी की परवाह नहीं—जुकाम−खाँसी की चिन्ता नहीं। शरीर की तरह ही खेत उसका कर्म क्षेत्र होता है। एक−एक पौधे पर नजर रहती है। खाद−पानी, निराई, गुड़ाई से लेकर रखवाली तक के अनेकों कार्य करने से पूर्व वह उनकी आवश्यकता समझता है और किसी के निर्देश से नहीं अपनी गति से ही निर्णय करता है कि कब, क्या और कैसे किया जाना चाहिए। किसी के दबाव से नहीं—अपनी इच्छा और प्रेरणा से ही उसे खेत की, उसे संभालने वाले बैलों की, हल, कुदाल आदि संबंधी उपकरणों की व्यवस्था जुटाये रहने की सूझ−बूझ सहज ही उठती और स्वसंचालित रूप से गतिशील होती रहती है। यह सब होता है बिना थके, बिना ऊबे, बिना अधीर हुए।
🔶 आज का श्रम कल ही फलप्रद होना चाहिए इसका आग्रह उसे तनिक भी नहीं होता। फसल अपने समय पर पकेगी—तब तक उसे धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा ही करनी होगी यह जानने के कारण अनाज की ढेरी कोठे में भरने की आतुरता भी उसे नहीं होती। इतने मन अनाज निश्चित रूप से होना ही चाहिए, इसके लंबे−चौड़े मनसूबे बाँधना भी उसे अनावश्यक प्रतीत होता है। मनोयोग पूर्वक सतत् श्रम की साधना चलती ही रहती है, विघ्न अवरोध न आते हों सो बात भी नहीं—उनसे भी जैसे बनता है निपटता रहता है, पर उपेक्षा कभी भी खेत की नहीं होती। उसकी आवश्यकता पूरी किये बिना चैन ही नहीं पड़ता। समयानुसार फसल पकती भी है। अनाज भी पैदा होता है। उसे ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ घर ले जाता है। कितने मन अनाज पैदा होना है यह कभी सोचा ही नहीं तो फिर असन्तोष का कोई कारण भी नहीं। जो मिला उसे ईश्वरीय उपहार समझा गया। यही है किसान की साधना जिसे वह होश संभालने के दिन से लेकर मरणपर्यन्त सतत् निष्ठा के साथ चलाता ही रहता है। न विश्राम, न थकान, न ऊब, न अन्यमनस्कता। साधना कैसे की जाती है और साधक को कैसा होना चाहिए यह किसान से सीखा जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.12
🔷 साधना का महत्व किसान जानता है। पूरे वर्ष अपने खेत की मिट्टी के साथ अनवरत गति से लिपटा रहता है और फसल को स्वेद कणों से नित्य ही सींचता रहता है। सर्दी−गर्मी की परवाह नहीं—जुकाम−खाँसी की चिन्ता नहीं। शरीर की तरह ही खेत उसका कर्म क्षेत्र होता है। एक−एक पौधे पर नजर रहती है। खाद−पानी, निराई, गुड़ाई से लेकर रखवाली तक के अनेकों कार्य करने से पूर्व वह उनकी आवश्यकता समझता है और किसी के निर्देश से नहीं अपनी गति से ही निर्णय करता है कि कब, क्या और कैसे किया जाना चाहिए। किसी के दबाव से नहीं—अपनी इच्छा और प्रेरणा से ही उसे खेत की, उसे संभालने वाले बैलों की, हल, कुदाल आदि संबंधी उपकरणों की व्यवस्था जुटाये रहने की सूझ−बूझ सहज ही उठती और स्वसंचालित रूप से गतिशील होती रहती है। यह सब होता है बिना थके, बिना ऊबे, बिना अधीर हुए।
🔶 आज का श्रम कल ही फलप्रद होना चाहिए इसका आग्रह उसे तनिक भी नहीं होता। फसल अपने समय पर पकेगी—तब तक उसे धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा ही करनी होगी यह जानने के कारण अनाज की ढेरी कोठे में भरने की आतुरता भी उसे नहीं होती। इतने मन अनाज निश्चित रूप से होना ही चाहिए, इसके लंबे−चौड़े मनसूबे बाँधना भी उसे अनावश्यक प्रतीत होता है। मनोयोग पूर्वक सतत् श्रम की साधना चलती ही रहती है, विघ्न अवरोध न आते हों सो बात भी नहीं—उनसे भी जैसे बनता है निपटता रहता है, पर उपेक्षा कभी भी खेत की नहीं होती। उसकी आवश्यकता पूरी किये बिना चैन ही नहीं पड़ता। समयानुसार फसल पकती भी है। अनाज भी पैदा होता है। उसे ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ घर ले जाता है। कितने मन अनाज पैदा होना है यह कभी सोचा ही नहीं तो फिर असन्तोष का कोई कारण भी नहीं। जो मिला उसे ईश्वरीय उपहार समझा गया। यही है किसान की साधना जिसे वह होश संभालने के दिन से लेकर मरणपर्यन्त सतत् निष्ठा के साथ चलाता ही रहता है। न विश्राम, न थकान, न ऊब, न अन्यमनस्कता। साधना कैसे की जाती है और साधक को कैसा होना चाहिए यह किसान से सीखा जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.12
गुरुवार, 1 नवंबर 2018
👉 दुःखी होने की क्या आवश्यकता
🔶 एक नहीं, अनेक सामाजिक कुरीतियाँ अपने देश में नागफनी की तरह फैल रही हैं। इनके काँटों से रोज अनेक मासूम जिंदगियाँ तार-तार हो जाती है। उनके मस्तिष्क की यह हलचल एक निश्चय में बदल गई-वह सामाजिक कुरीतियों की नागफनी को साफ करेंगे, ताकि फिर किसी मासूम चंपा की खिलखिलाहट न छिने।
🔷 एक सेठ था। उसके पास बहुत धन था, पर स्वभाव से वह था कंजूस। न स्वयं खा-पी सके और न किसी को दे सके। घर में अपने धन को इसलिए नहीं रखता था कि कोई चोर-डाकू न चुरा ले, अतः गाँव के बाहर एक जंगल में गड्ढा करके अपना सारा धन गाड़ आया। दूसरे-तीसरे दिन जाता और उस स्थान को चुपचाप देख आता। उसे अपने पर बड़ा गर्व था।
🔶 एक बार एक चोर को शक हुआ, वह कंजूस के पीछे-पीछे चुपचाप गया और छिपकर देख आया। उसे समझते देर न लगी कि इस स्थान पर अवश्य कोई मूल्यवान वस्तु दबी है। जब कंजूस चक्कर लगाकर घर चला गया, तो उस चोर ने खुदाई करके सारा धन प्राप्त कर लिया और वहाँ से रफूचक्कर हो गया।
🔷 दूसरे दिन जब वह कंजूस फिर अपने छिपे धन को देखने गया, तो उसे जमीन खुदी हुई दिखाई दी। आसपास मिट्टी का ढेर लग रहा था और बीच में एक खाली गड्ढा था। उसका सारा धन जा चुका था। इतनी बड़ी हानि वह सहन नहीं कर सका। माथा पकड़कर जोर से रोने-चिल्लाने लगा-”हाय! मैं तो लुट गया, मेरे सारे जीवन की कमाई चोर ले गए।”
🔶 रोना चिल्लाना सुनकर जंगल में रहने वाले आस-पास के कई आदमी आ गए। उन्होंने पूछकर स्थिति जानी। एक आदमी ने समझाते हुए कहा- “सेठ जी ! धन तो आपके काम पहले भी न आया था और न आपके जीवन में आ सकता था। हाँ उस पर आपका अधिकार अवश्य था और उसे यहाँ छिपाकर रख छोड़ा वह बेकार ही था। ऐसी स्थिति में दुःखी होने की क्या आवश्यकता है?
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/2000/April/v2.20
🔷 एक सेठ था। उसके पास बहुत धन था, पर स्वभाव से वह था कंजूस। न स्वयं खा-पी सके और न किसी को दे सके। घर में अपने धन को इसलिए नहीं रखता था कि कोई चोर-डाकू न चुरा ले, अतः गाँव के बाहर एक जंगल में गड्ढा करके अपना सारा धन गाड़ आया। दूसरे-तीसरे दिन जाता और उस स्थान को चुपचाप देख आता। उसे अपने पर बड़ा गर्व था।
🔶 एक बार एक चोर को शक हुआ, वह कंजूस के पीछे-पीछे चुपचाप गया और छिपकर देख आया। उसे समझते देर न लगी कि इस स्थान पर अवश्य कोई मूल्यवान वस्तु दबी है। जब कंजूस चक्कर लगाकर घर चला गया, तो उस चोर ने खुदाई करके सारा धन प्राप्त कर लिया और वहाँ से रफूचक्कर हो गया।
🔷 दूसरे दिन जब वह कंजूस फिर अपने छिपे धन को देखने गया, तो उसे जमीन खुदी हुई दिखाई दी। आसपास मिट्टी का ढेर लग रहा था और बीच में एक खाली गड्ढा था। उसका सारा धन जा चुका था। इतनी बड़ी हानि वह सहन नहीं कर सका। माथा पकड़कर जोर से रोने-चिल्लाने लगा-”हाय! मैं तो लुट गया, मेरे सारे जीवन की कमाई चोर ले गए।”
🔶 रोना चिल्लाना सुनकर जंगल में रहने वाले आस-पास के कई आदमी आ गए। उन्होंने पूछकर स्थिति जानी। एक आदमी ने समझाते हुए कहा- “सेठ जी ! धन तो आपके काम पहले भी न आया था और न आपके जीवन में आ सकता था। हाँ उस पर आपका अधिकार अवश्य था और उसे यहाँ छिपाकर रख छोड़ा वह बेकार ही था। ऐसी स्थिति में दुःखी होने की क्या आवश्यकता है?
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/2000/April/v2.20
👉 साधना- अपने आपे को साधना (भाग 1)
🔷 विश्रृंखलित-अव्यवस्थित, अस्त-व्यस्त स्थिति में भी कुछ न कुछ उत्पादन-विकास तो होता है, पर वह किस गति से- कि क्रम से और किस दिशा में चलेगा यह नहीं कहा जा सकता। कँटीले झाड़-झंखाड़ जंगलों में उगते हैं और बेढंगी रीति से छितराते हुए उस क्षेत्र की भूमि को कंटकाकीर्ण बना देते हैं। इसके विपरीत माली की देख-रेख में सुनियोजित ढंग से लगाये गये पौधे सुरम्य उद्यान बनकर फलते-फूलते हैं। पौधों को क्रमबद्ध रूप से लगाने और उनको निरन्तर सँभालने वाली माली की सजग कर्त्तव्य-निष्ठा उस की साधना है जिसका प्रतिफल उसे सम्मान तथा अर्थ लोभ के रूप में- पौधों का हरे-भरे, फले-फूले सौन्दर्य के रूप में तथा सर्व साधारण को छाया, सुगन्ध, फल, सुषमा आदि के रूप में उपलब्ध होता है। माली की उद्यान साधना सर्वतोमुखी सत्परिणाम ही प्रस्तुत करती है।
🔶 मानवी व्यक्तित्व एक प्रकार का उद्यान है। उसके साथ अनेकों आत्मिक और भौतिक विशेषताएँ जुड़ी हुई हैं। उनमें से यदि कुछ को क्रमबद्ध, व्यवस्थित और विकसित बनाया जा सके तो उनके स्वादिष्ट फल खाते-खाते गहरी तृप्ति का आनन्द मिलता है। पर यदि चित्तगत वृत्तियों और शरीरगत प्रवृत्तियों को ऐसे ही अनियन्त्रित छोड़ दिया जाय तो वे भोंड़े, गँवारू एवं उद्धत स्तर पर बढ़ती हैं और दिशा विहीन उच्छृंखलता के कारण जंगली झाड़ियों की तरह उस समूचे क्षेत्र को अगम्य एवं कंटकाकीर्ण बना देती हैं।
🔷 जीवन कल्प-वृक्ष की तरह असंख्य सत्परिणामों से भरा-पूरा है। पर उसका लाभ मिलता तभी है जब उसे ठीक तरह साधा, सँभाला जाय। इस क्षेत्र की सुव्यवस्था के लिए की गई चेष्टा को साधना कहते हैं। कितने ही देवी-देवताओं की साधना की जाती है और उससे कतिपय वरदान पाने की बात पर विश्वास किया जाता है। इस मान्यता के पीछे सत्य और तथ्य इतना ही है कि इस मार्ग पर चलते हुए अन्तःक्षेत्र की श्रद्धा को विकसित किया जाता है। आदतों को नियन्त्रित किया जाता है। चिन्तन प्रवाह को दिशा विशेष में नियोजित रखा जाता है और सात्विक जीवन के नियमोपनियमों का तत्परता पूर्वक पालन किया जात है। इन सबका मिला-जुला परिणाम व्यक्तित्व पर चढ़ी हुई दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण करने तथा सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बनाने में सहायक सिद्ध होता है। सुसंस्कारों का अभिवर्धन प्रत्यक्षतः दैवी वरदान है। उसके मूल्य पर हर व्यक्ति अभीष्ट प्रयोजन की दिशा में अग्रसर को सकता है और उत्साहवर्धक सत्परिणाम प्राप्त कर सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.11
🔶 मानवी व्यक्तित्व एक प्रकार का उद्यान है। उसके साथ अनेकों आत्मिक और भौतिक विशेषताएँ जुड़ी हुई हैं। उनमें से यदि कुछ को क्रमबद्ध, व्यवस्थित और विकसित बनाया जा सके तो उनके स्वादिष्ट फल खाते-खाते गहरी तृप्ति का आनन्द मिलता है। पर यदि चित्तगत वृत्तियों और शरीरगत प्रवृत्तियों को ऐसे ही अनियन्त्रित छोड़ दिया जाय तो वे भोंड़े, गँवारू एवं उद्धत स्तर पर बढ़ती हैं और दिशा विहीन उच्छृंखलता के कारण जंगली झाड़ियों की तरह उस समूचे क्षेत्र को अगम्य एवं कंटकाकीर्ण बना देती हैं।
🔷 जीवन कल्प-वृक्ष की तरह असंख्य सत्परिणामों से भरा-पूरा है। पर उसका लाभ मिलता तभी है जब उसे ठीक तरह साधा, सँभाला जाय। इस क्षेत्र की सुव्यवस्था के लिए की गई चेष्टा को साधना कहते हैं। कितने ही देवी-देवताओं की साधना की जाती है और उससे कतिपय वरदान पाने की बात पर विश्वास किया जाता है। इस मान्यता के पीछे सत्य और तथ्य इतना ही है कि इस मार्ग पर चलते हुए अन्तःक्षेत्र की श्रद्धा को विकसित किया जाता है। आदतों को नियन्त्रित किया जाता है। चिन्तन प्रवाह को दिशा विशेष में नियोजित रखा जाता है और सात्विक जीवन के नियमोपनियमों का तत्परता पूर्वक पालन किया जात है। इन सबका मिला-जुला परिणाम व्यक्तित्व पर चढ़ी हुई दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण करने तथा सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बनाने में सहायक सिद्ध होता है। सुसंस्कारों का अभिवर्धन प्रत्यक्षतः दैवी वरदान है। उसके मूल्य पर हर व्यक्ति अभीष्ट प्रयोजन की दिशा में अग्रसर को सकता है और उत्साहवर्धक सत्परिणाम प्राप्त कर सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.11
बुधवार, 31 अक्टूबर 2018
👉 कर्त्तव्य परायणता
🔶 कठिन परिस्थितयों में भी अपनी कर्त्तव्य परायणता ही मानव को महा -मानव बनाती है। ऐसी ही एक मिसाल सरदार पटेल के जीवन से जुड़ी है, जो इस प्रेरक प्रसंग में आपको पढने को मिलेगी। उनके कथनों में भी आपको उनके व्यक्तित्व की झलक मिलेगी जिन्हें आप नीचे दिए गए लिंक पर पढ़ सकते हैं :
🔷 एक वकील की वकालत खूब चलती थी। एक बार वह हत्या का एक मुकदमा लड़ रहे थे। उन्हें खबर मिली कि गांव में उनकी पत्नी बहुत बीमार हो गई हैं। बीमारी गंभीर थी। इस कारण वकील साहब गांव आ गए। वह अपनी पत्नी की देखभाल में लगे थे। इसी बीच हत्या के उस मुकदमे की सुनवाई की तारीख पड़ी। वकील साहब असमंजस में थे। इधर पत्नी मृत्युशैया पर थी, उधर पेशी पर शहर जाना भी जरूरी था। न जाने पर मुकदमा खारिज हो जाने और मुलजिम को फांसी होने की आशंका थी।
🔶 पति को असमंजस में देख पत्नी बोलीं- आप मेरी चिंता न करें, पेशी पर जरूर जाएं। भगवान सब अच्छा करेंगे। पत्नी की बात मानकर वकील साहब शहर लौट तो आए, मगर उनका मन बड़ा दुखी होता रहा। अदालत में मुकदमा पेश हुआ। सरकारी वकील ने साबित करने की कोशिश की कि मुलजिम कसूरवार है और उसे फांसी ही होनी चाहिए। वकील साहब बचाव पक्ष की ओर से जवाब देने के लिए खड़े हुए। वह बहस कर ही रहे थे कि उनके सहायक ने एक तार लाकर उनको दिया। वकील साहब थोड़ी देर रुके।
🔷 तार पढ़कर अपने कोट की जेब में रखा और फिर बहस में लग गए। उन्होंने साबित कर दिया कि उनका मुवक्किल बेकसूर है। बहस के बाद मजिस्ट्रेट ने फैसला सुनाया कि अपराधी निरपराध है। मुवक्किल और दूसरे वकील मित्र अदालत के बाद बधाई देने वकील साहब के कमरे में आए। वकील साहब ने मित्रों को वह तार दिखाया जो उन्हें अदालत में बहस के दौरान मिला था। तार में लिखा था कि उनकी पत्नी का देहांत हो गया। मित्रों ने कहा, 'बीमार पत्नी को छोड़कर नहीं आना चाहिए था।' वकील साहब ने कहा, 'दोस्तो, अपनत्व से बड़ा कर्तव्य होता है।' यह वकील थे भारत की एकता के निर्माता लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल।
🔷 एक वकील की वकालत खूब चलती थी। एक बार वह हत्या का एक मुकदमा लड़ रहे थे। उन्हें खबर मिली कि गांव में उनकी पत्नी बहुत बीमार हो गई हैं। बीमारी गंभीर थी। इस कारण वकील साहब गांव आ गए। वह अपनी पत्नी की देखभाल में लगे थे। इसी बीच हत्या के उस मुकदमे की सुनवाई की तारीख पड़ी। वकील साहब असमंजस में थे। इधर पत्नी मृत्युशैया पर थी, उधर पेशी पर शहर जाना भी जरूरी था। न जाने पर मुकदमा खारिज हो जाने और मुलजिम को फांसी होने की आशंका थी।
🔶 पति को असमंजस में देख पत्नी बोलीं- आप मेरी चिंता न करें, पेशी पर जरूर जाएं। भगवान सब अच्छा करेंगे। पत्नी की बात मानकर वकील साहब शहर लौट तो आए, मगर उनका मन बड़ा दुखी होता रहा। अदालत में मुकदमा पेश हुआ। सरकारी वकील ने साबित करने की कोशिश की कि मुलजिम कसूरवार है और उसे फांसी ही होनी चाहिए। वकील साहब बचाव पक्ष की ओर से जवाब देने के लिए खड़े हुए। वह बहस कर ही रहे थे कि उनके सहायक ने एक तार लाकर उनको दिया। वकील साहब थोड़ी देर रुके।
🔷 तार पढ़कर अपने कोट की जेब में रखा और फिर बहस में लग गए। उन्होंने साबित कर दिया कि उनका मुवक्किल बेकसूर है। बहस के बाद मजिस्ट्रेट ने फैसला सुनाया कि अपराधी निरपराध है। मुवक्किल और दूसरे वकील मित्र अदालत के बाद बधाई देने वकील साहब के कमरे में आए। वकील साहब ने मित्रों को वह तार दिखाया जो उन्हें अदालत में बहस के दौरान मिला था। तार में लिखा था कि उनकी पत्नी का देहांत हो गया। मित्रों ने कहा, 'बीमार पत्नी को छोड़कर नहीं आना चाहिए था।' वकील साहब ने कहा, 'दोस्तो, अपनत्व से बड़ा कर्तव्य होता है।' यह वकील थे भारत की एकता के निर्माता लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल।
👉 कठोर समय में सही निर्णय
🔶 "हैदराबाद के निजाम ने खुद को भारत से अलग होने का ऐलान कर दिया था। सरदार पटेल ने उसे संधि के लिए दिल्ली बुलाया, निजाम ने अपने दीवान को उनसे मिलने भेजा, जब निजाम पटेल जी से मिलने आया तो पटेल जी ने उनका पूरा आदर सत्कार किया, भोजन किया और उसके बाद मंत्रणा करने बैठे।
🔷 पटेल जी ने पूछा की जब हैदराबाद के 80% हिन्दू भारत में मिलना चाहते है तो आपके निजाम क्यों पाकिस्तान के बहकावे में आ रहे है। निजाम के दीवान ने कहा की आप हमारे बीच में न पड़े, हम अपनी मर्जी के मालिक है, और रही हिन्दुओ की बात तो इन 1 करोड़ हिन्दुओ की हम लाशें बिछा देंगे, एक भी हिन्दू आपको जिन्दा नहीं मिलेगा, तब किसकी राय पूछेंगे ??
🔶 यह सुनकर पटेल जी ने दीवान कहा - आप जाइए वापिस हैदराबाद, दीवान चला जाता है, अगली सुबह दीवान के हैदराबाद पहुँचने से पहले ही भारतीय सेना हैदराबाद पर धावा बोल देती है।
🔷 ऐसे कठोर समय में भी बिना समय गँवाए सही निर्णय लेकर खंड खंड देश को हिमाचल से कन्याकुमारी तक एक करने वाले सरदार पटेल को कोटि कोटि नमन।"
🔷 पटेल जी ने पूछा की जब हैदराबाद के 80% हिन्दू भारत में मिलना चाहते है तो आपके निजाम क्यों पाकिस्तान के बहकावे में आ रहे है। निजाम के दीवान ने कहा की आप हमारे बीच में न पड़े, हम अपनी मर्जी के मालिक है, और रही हिन्दुओ की बात तो इन 1 करोड़ हिन्दुओ की हम लाशें बिछा देंगे, एक भी हिन्दू आपको जिन्दा नहीं मिलेगा, तब किसकी राय पूछेंगे ??
🔶 यह सुनकर पटेल जी ने दीवान कहा - आप जाइए वापिस हैदराबाद, दीवान चला जाता है, अगली सुबह दीवान के हैदराबाद पहुँचने से पहले ही भारतीय सेना हैदराबाद पर धावा बोल देती है।
🔷 ऐसे कठोर समय में भी बिना समय गँवाए सही निर्णय लेकर खंड खंड देश को हिमाचल से कन्याकुमारी तक एक करने वाले सरदार पटेल को कोटि कोटि नमन।"
👉 सरदार पटेल - भारत माता के निर्भय सेनानी
🔶 सन् १९४८ का वर्ष भारत की राजनैतिक परिस्थिति की दृष्टि से बडा हलचल पूर्ण था। अगस्त १९४७ में जैसे ही देश को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, चारों तरफ अशांति का वातावरण दिखाई पड़ने लगा। सबसे पहले तो पचास- साठ लाख शरणार्थियों को सुरक्षापूर्वक लाने और बसाने की समस्या सामने आई। उसी के साथ- साथ अनेक स्थानों पर सांप्रदायिक उपद्रव और मारकाट को भी नियंत्रण में लाना पडा। एक बहुत बडी समस्या देशी राज्यों की भी थी, जिनको अंग्रेजी सरकार ने 'स्वतंत्र' बनाकर राष्ट्रीय सरकार के साथ इच्छानुसार व्यवहार करने की छूट दे दी थी। इस प्रकार भारत के ऊपर उस समय चारों तरफ से काली घटाएँ घिरी हुईं थीं और इन सबको संभालने का भार भारत सरकार के गृह मंत्रालय पर था, जिसके संचालक थे- सरदार पटेल।
🔷 देशी राज्यों की समस्या वास्तव में बडी विकट थी। अधिकांश राजागण अपने को प्राचीनकाल के बडे- बडे प्रसिद्ध राजा- महाराजाओं तथा 'चक्रवर्ती नरेशों' के वंशज समझकर देश का वास्तविक स्वामी स्वयं को ही मानते थे। ऐसे राजाओं का भी अभाव न था, जो मन ही मन अंग्रेजों के हट जाने पर 'तलवार के बल' से देश पर अपनी हुकूमत कायम करने का स्वप्न देखते रहते थे। भारत के देशी और विदेशी 'शत्रु' भी समझते थे कि यह समस्या भारत की आंतरिक अवस्था को इतना अधिक डाँवाडोल कर देगी कि वह सचमुच लुंज- पुंज हो जायेगा और तब हमको उस पर दाँत गडा़ने का अच्छा मौका मिलेगा। और तो क्या सामान्य लोगों की आमतौर से यह धारणा थी कि इस समय परिस्थितिवश अंग्रेज भारत को स्वराज्य देकर चले तो जा रहे हैं, पर वे जानते हैं कि पाकिस्तान और देशी राज्यों के कारण कांग्रेसी सरकार शासन को चला सकने में समर्थ न होगी और झक मारकर अंत में उन्हीं को बुलाकर सुरक्षा करानी पडेगी।
🔶 पर लोगों के ये सब मंसूबे, अटकलें और भ्रम उस समय हवा में उड़ गये, जब सरदार पटेल ने चार- पाँच महीने के भीतर ही अधिकांश राजाओं को अपनी रियासतें भारतीय राष्ट्र में सम्मिलित करने को राजी कर लिया। उन्होंने शुरूआत अपने प्रांत गुजरात से ही की और वहाँ की कई सौ छोटी- छोटी रियासतों को एक संघ में संगठित करके नवानगर के जाम साहब को उसका राज प्रमुख बना दिया। इसके पश्चात् क्रमशः मध्य भारत, पंजाब और राजस्थान की रियासतों के संघ बनाकर उनको "भारतीय- संघ" में सम्मिलित कर लिया गया। जूनागढ़, भोपाल बडौ़दा आदि तीन- चार रियासतों के शासकों ने कुछ विरोध का भाव प्रदर्शित किया, पर सरदार ने साम- दाम दंड- भेद की राजनीति द्वारा बिना किसी प्रकार के बल का प्रत्यक्ष प्रयोग किये, उनकी समस्या को हल कर दिया।
हैदराबाद का विजय अभियान-
🔷 पर सबसे बढ़कर कठिनाई उपस्थित हुई हैदराबाद के मामले में। वह भारत की सबसे बडी रियासत थी और मुसलमान उसे अपना गढ़ समझते थे। भारत विभाजन के पश्चात् वहाँ कितने ही कट्टरपंथी मुस्लिम लोग जा पहुँचे और कोशिश करने लगे कि हैदराबाद को पाकिस्तान में शामिल किया जाय। उत्तर प्रदेश के कासिम रिजवी नामक व्यक्ति ने वहाँ जाकर 'रजाकार' नाम से एक स्वयंसेवक- दल कायम कर दिया, जिसमें दो लाख हथियार बंद व्यक्ति सम्मिलित थे। हैदराबाद की ४२ हजार सरकारी सेना इसके अतिरिक्त थी। ये सब रियासत के हिंदुओं पर ही अत्याचार नहीं करने लगे, वरन् आसपास के प्रदेशों की भूमि पर आकर भी लूटमार करने लगे। एक- दो बार उन्होंने रेलगाडी को रोककर लूट लिया और कई आदमियों को भी मार डाला। सरदार तुरंत ही हैदराबाद के विरुद्ध कार्यवाही करने को तैयार हो गये, पर नेहरू जी तथा अन्य कई मंत्रियों के राजी न होने से रुके रहे। पर जब हालत बहुत बिगड़ गई और कनाडा के राजदूत ने नेहरू जी से ईसाई स्त्रियों पर रजाकारों द्वारा आक्रमण करने की शिकायत की, तब कहीं जाकर उसके विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने का निश्चय किया गया। सरदार ने फौज को आदेश दे दिया। और मेजर जनरल जे० एन० चौधरी थोडी- सी सेना लेकर शोलापुर के रास्ते से आगे बढे ।
🔶 उस अवसर पर यद्यपि कासिम रिजवी ने यहाँ तक धमकी दी थी कि अगर भारतीय सेना ने हैदराबाद में प्रवेश किया तो उसको यहाँ डेढ़ करोड़ हिंदुओं की हड्डियों के अतिरिक्त और कुछ न मिलेगा। पर सरदार ऐसी बातों की कब परवाह करते थे? उन्होंने निजाम के प्रतिनिधि लायक अली से स्पष्ट कह दिया कि "हैदराबाद की समस्या भी उसी तरह सुलझेगी, जिस प्रकार अन्य रियासतों की सुलझी है। इसका दूसरा कोई मार्ग संभव नहीं है। हम किसी ऐसे स्थान को अपने देश में पृथक् नहीं रहने दे सकते, जो हमारे उसी संघ को नष्ट कर देगा, जिसे हमने रक्त और परिश्रम से बनाया है। हम समस्या का मित्रतापूर्ण हल ही चाहते हैं, और उसके लिए प्रयत्न कर रहे हैं, किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि हैदराबाद को पूर्ण स्वतंत्र रह जाने देंगे। यदि वह स्वतंत्र रहने की अपनी माँग पर अडा रहा तो उसे निश्चय ही असफल होना पडे़गा।"
🔷 यद्यपि हैदराबाद के रजाकार और अन्य धर्मांध मुसलमान बडा जोर- शोर दिखा रहे थे और समझते थे कि भारतीय सेना का हमला होने पर संसार के मुसलमान देश उनका साथ देंगे, पर भारतीय सेना को देखते ही वे सब बगलें झाँकने लगे। कुछ रजाकारों ने दो- तीन दिन तक जगह- जगह पर कुछ लडाई की, पर भारत की सुशिक्षित सेना के सामने वे भेड़- बकरियों की भीड़ से अधिक प्रभावशाली सिद्ध न हो पाये। तीन दिन के संघर्ष में लगभग एक हजार रजाकार मारे गये, जबकि भारतीय सेना की मृत्यु संख्या नाम मात्र को ही थी। १७ सितंबर १९४८ को हैदराबाद के प्रधान सेनापति एल० एदरूस ने जनरल चौधरी के सामने बाकायदा आत्म समर्पण कर दिया और १८ सितंबर को जनरल चौधरी हैदराबाद के सैनिक गवर्नर नियुक्त कर दिये गये। फरवरी १९४९ में सरदार दक्षिण भारत की यात्रा करते हुए हैदराबाद पहुँचे तो निजाम ने स्वयं हवाई अड्डे पर आकर उनका स्वागत किया और भारतीय- प्रथा के अनुसार हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया, जो उनके जीवन में एक सर्वथा नई और सर्वप्रथम घटना थी।
🔶 हैदराबाद की समस्या को इस प्रकार ३ दिन में हल करके सरदार ने भारतीय सैनिक शक्ति और राजनीति की धाक समस्त देश में जमा दी। इससे वे सब 'तत्त्व' ठडे पड़ गये, जो शासन बदलने के कारण जगह- जगह सर उठा रहे थे और समझते थे की हम इन अनुभवहीन शासकों को दबा- धमकाकर अपना उल्लू सीधा करते रहेंगे। हैदराबाद की इस शानदार विजय से भारतीय जनता में उत्साह की लहर दौड़ गई। और शेष बची रियासतें बहुत शीघ्र भारतीय संघ के अंतर्गत आने को तैयार हो गईं।
🔷 छह- सात सौ रियासतों का भारतीय संघ में पूर्णतः विलय होकर एक अखण्ड राष्ट्र का निर्माण कुछ समय पहले तक एक असंभव कार्य समझा जाता था। पर सरदार पटेल ने उसे ऐसी खूबी से पूरा करके दिखा दिया कि देश- विदेशों के समस्त राजनीतिज्ञ चकित रह गये। यह कहने में कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं कि जो कार्य जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क ने कर दिखाया और जापान को एक सुदृढ़ राष्ट्र बनाने में मिकाडो ने जो महान् सफलता प्राप्त की, सरदार पटेल के कर्तृत्व का महत्त्व भी उससे कम नहीं है। जर्मनी और जापान तो उस समय चार- पाँच करोड़ की जनसंख्या के छोटे देश ही थे, पर सरदार ने तो उस भारत को एक कर दिखाया, जिसको विविधता और विस्तार की दृष्टि से अनेक लोग एक 'महाद्वीप' की संज्ञा देते हैं।
http://literature.awgp.org/book/prerna_prad_prasang/v1.5
🔷 देशी राज्यों की समस्या वास्तव में बडी विकट थी। अधिकांश राजागण अपने को प्राचीनकाल के बडे- बडे प्रसिद्ध राजा- महाराजाओं तथा 'चक्रवर्ती नरेशों' के वंशज समझकर देश का वास्तविक स्वामी स्वयं को ही मानते थे। ऐसे राजाओं का भी अभाव न था, जो मन ही मन अंग्रेजों के हट जाने पर 'तलवार के बल' से देश पर अपनी हुकूमत कायम करने का स्वप्न देखते रहते थे। भारत के देशी और विदेशी 'शत्रु' भी समझते थे कि यह समस्या भारत की आंतरिक अवस्था को इतना अधिक डाँवाडोल कर देगी कि वह सचमुच लुंज- पुंज हो जायेगा और तब हमको उस पर दाँत गडा़ने का अच्छा मौका मिलेगा। और तो क्या सामान्य लोगों की आमतौर से यह धारणा थी कि इस समय परिस्थितिवश अंग्रेज भारत को स्वराज्य देकर चले तो जा रहे हैं, पर वे जानते हैं कि पाकिस्तान और देशी राज्यों के कारण कांग्रेसी सरकार शासन को चला सकने में समर्थ न होगी और झक मारकर अंत में उन्हीं को बुलाकर सुरक्षा करानी पडेगी।
🔶 पर लोगों के ये सब मंसूबे, अटकलें और भ्रम उस समय हवा में उड़ गये, जब सरदार पटेल ने चार- पाँच महीने के भीतर ही अधिकांश राजाओं को अपनी रियासतें भारतीय राष्ट्र में सम्मिलित करने को राजी कर लिया। उन्होंने शुरूआत अपने प्रांत गुजरात से ही की और वहाँ की कई सौ छोटी- छोटी रियासतों को एक संघ में संगठित करके नवानगर के जाम साहब को उसका राज प्रमुख बना दिया। इसके पश्चात् क्रमशः मध्य भारत, पंजाब और राजस्थान की रियासतों के संघ बनाकर उनको "भारतीय- संघ" में सम्मिलित कर लिया गया। जूनागढ़, भोपाल बडौ़दा आदि तीन- चार रियासतों के शासकों ने कुछ विरोध का भाव प्रदर्शित किया, पर सरदार ने साम- दाम दंड- भेद की राजनीति द्वारा बिना किसी प्रकार के बल का प्रत्यक्ष प्रयोग किये, उनकी समस्या को हल कर दिया।
हैदराबाद का विजय अभियान-
🔷 पर सबसे बढ़कर कठिनाई उपस्थित हुई हैदराबाद के मामले में। वह भारत की सबसे बडी रियासत थी और मुसलमान उसे अपना गढ़ समझते थे। भारत विभाजन के पश्चात् वहाँ कितने ही कट्टरपंथी मुस्लिम लोग जा पहुँचे और कोशिश करने लगे कि हैदराबाद को पाकिस्तान में शामिल किया जाय। उत्तर प्रदेश के कासिम रिजवी नामक व्यक्ति ने वहाँ जाकर 'रजाकार' नाम से एक स्वयंसेवक- दल कायम कर दिया, जिसमें दो लाख हथियार बंद व्यक्ति सम्मिलित थे। हैदराबाद की ४२ हजार सरकारी सेना इसके अतिरिक्त थी। ये सब रियासत के हिंदुओं पर ही अत्याचार नहीं करने लगे, वरन् आसपास के प्रदेशों की भूमि पर आकर भी लूटमार करने लगे। एक- दो बार उन्होंने रेलगाडी को रोककर लूट लिया और कई आदमियों को भी मार डाला। सरदार तुरंत ही हैदराबाद के विरुद्ध कार्यवाही करने को तैयार हो गये, पर नेहरू जी तथा अन्य कई मंत्रियों के राजी न होने से रुके रहे। पर जब हालत बहुत बिगड़ गई और कनाडा के राजदूत ने नेहरू जी से ईसाई स्त्रियों पर रजाकारों द्वारा आक्रमण करने की शिकायत की, तब कहीं जाकर उसके विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने का निश्चय किया गया। सरदार ने फौज को आदेश दे दिया। और मेजर जनरल जे० एन० चौधरी थोडी- सी सेना लेकर शोलापुर के रास्ते से आगे बढे ।
🔶 उस अवसर पर यद्यपि कासिम रिजवी ने यहाँ तक धमकी दी थी कि अगर भारतीय सेना ने हैदराबाद में प्रवेश किया तो उसको यहाँ डेढ़ करोड़ हिंदुओं की हड्डियों के अतिरिक्त और कुछ न मिलेगा। पर सरदार ऐसी बातों की कब परवाह करते थे? उन्होंने निजाम के प्रतिनिधि लायक अली से स्पष्ट कह दिया कि "हैदराबाद की समस्या भी उसी तरह सुलझेगी, जिस प्रकार अन्य रियासतों की सुलझी है। इसका दूसरा कोई मार्ग संभव नहीं है। हम किसी ऐसे स्थान को अपने देश में पृथक् नहीं रहने दे सकते, जो हमारे उसी संघ को नष्ट कर देगा, जिसे हमने रक्त और परिश्रम से बनाया है। हम समस्या का मित्रतापूर्ण हल ही चाहते हैं, और उसके लिए प्रयत्न कर रहे हैं, किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि हैदराबाद को पूर्ण स्वतंत्र रह जाने देंगे। यदि वह स्वतंत्र रहने की अपनी माँग पर अडा रहा तो उसे निश्चय ही असफल होना पडे़गा।"
🔷 यद्यपि हैदराबाद के रजाकार और अन्य धर्मांध मुसलमान बडा जोर- शोर दिखा रहे थे और समझते थे कि भारतीय सेना का हमला होने पर संसार के मुसलमान देश उनका साथ देंगे, पर भारतीय सेना को देखते ही वे सब बगलें झाँकने लगे। कुछ रजाकारों ने दो- तीन दिन तक जगह- जगह पर कुछ लडाई की, पर भारत की सुशिक्षित सेना के सामने वे भेड़- बकरियों की भीड़ से अधिक प्रभावशाली सिद्ध न हो पाये। तीन दिन के संघर्ष में लगभग एक हजार रजाकार मारे गये, जबकि भारतीय सेना की मृत्यु संख्या नाम मात्र को ही थी। १७ सितंबर १९४८ को हैदराबाद के प्रधान सेनापति एल० एदरूस ने जनरल चौधरी के सामने बाकायदा आत्म समर्पण कर दिया और १८ सितंबर को जनरल चौधरी हैदराबाद के सैनिक गवर्नर नियुक्त कर दिये गये। फरवरी १९४९ में सरदार दक्षिण भारत की यात्रा करते हुए हैदराबाद पहुँचे तो निजाम ने स्वयं हवाई अड्डे पर आकर उनका स्वागत किया और भारतीय- प्रथा के अनुसार हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया, जो उनके जीवन में एक सर्वथा नई और सर्वप्रथम घटना थी।
🔶 हैदराबाद की समस्या को इस प्रकार ३ दिन में हल करके सरदार ने भारतीय सैनिक शक्ति और राजनीति की धाक समस्त देश में जमा दी। इससे वे सब 'तत्त्व' ठडे पड़ गये, जो शासन बदलने के कारण जगह- जगह सर उठा रहे थे और समझते थे की हम इन अनुभवहीन शासकों को दबा- धमकाकर अपना उल्लू सीधा करते रहेंगे। हैदराबाद की इस शानदार विजय से भारतीय जनता में उत्साह की लहर दौड़ गई। और शेष बची रियासतें बहुत शीघ्र भारतीय संघ के अंतर्गत आने को तैयार हो गईं।
🔷 छह- सात सौ रियासतों का भारतीय संघ में पूर्णतः विलय होकर एक अखण्ड राष्ट्र का निर्माण कुछ समय पहले तक एक असंभव कार्य समझा जाता था। पर सरदार पटेल ने उसे ऐसी खूबी से पूरा करके दिखा दिया कि देश- विदेशों के समस्त राजनीतिज्ञ चकित रह गये। यह कहने में कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं कि जो कार्य जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क ने कर दिखाया और जापान को एक सुदृढ़ राष्ट्र बनाने में मिकाडो ने जो महान् सफलता प्राप्त की, सरदार पटेल के कर्तृत्व का महत्त्व भी उससे कम नहीं है। जर्मनी और जापान तो उस समय चार- पाँच करोड़ की जनसंख्या के छोटे देश ही थे, पर सरदार ने तो उस भारत को एक कर दिखाया, जिसको विविधता और विस्तार की दृष्टि से अनेक लोग एक 'महाद्वीप' की संज्ञा देते हैं।
http://literature.awgp.org/book/prerna_prad_prasang/v1.5
मंगलवार, 30 अक्टूबर 2018
👉 परिवर्तन के महान् क्षण (अन्तिम भाग)
👉 हमारी भविष्य वाणी
🔷 विज्ञान जीवित रहेगा; पर उसका नाम भौतिक विज्ञान न होकर अध्यात्म विज्ञान ही हो जाएगा। उस आधार को अपनाते ही वे सभी समस्याएँ सुलझ जाएँगी, जो इन दिनों अत्यन्त भयावह दीख पड़ती हैं। उन आवश्यकताओं को प्रकृति ही पूरा करने लगेगी, जिनके अभाव में मनुष्य अतिशय उद्विग्न, आशंकित, आतंकित दीख पड़ता है। न अगली शताब्दी में युद्ध होंगे, न महामारियाँ फैलेंगी और न जनसंख्या की अभिवृद्धि से वस्तुओं में कमी पड़ने के कारण चिन्तित होने की आवश्यकता पड़ेगी।
🔶 जागृत नारी अनावश्यक सन्तानोत्पादन से स्वयं इंकार कर देगी और अपनी बर्बाद होने वाली शक्ति को उन प्रयोजनों के लिए नियोजित करेगी, जो समृद्धि और सद्भावना के अभिवर्द्धन के लिए नितान्त आवश्यक है। नारी प्रधान इक्कीसवीं शताब्दी का वातावरण ऐसा होगा, जिसे सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा की संयुक्त शक्ति द्वारा अपनाया गया क्रिया-कलाप कहा जा सके। शिक्षा मात्र उदरपूर्णा न रहेगी, वरन् उसका अभिनव स्वरूप व्यक्तियों को प्रामाणिक, प्रखर एवं प्रतिभा सम्पन्न बनाने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करेगा।
🔷 यह सब कैसे होगा, इसकी प्रत्यक्षदर्शी योजनाओं का स्वरूप पूछने या जानने की जरूरत नहीं है। अदृश्य जगत में संव्याप्त दैवी चेतना का अनुपात वर्तमान परिस्थितियों की प्राणचेतना के आधार पर असाधारण रूप में उभरेगा और ऐसे परिवर्तन अनायास ही करता चला जाएगा, जिसे वसन्त का अभिनव अभियान कहा जा सके या उज्ज्वल भविष्य को साथ लेकर आने वाले ‘‘सतयुग की वापसी’’ कहा जा सके। इक्कीसवीं सदी का उज्ज्वल भविष्य इन्हीं आधारों को साथ लेकर अवतरित होगा। इसी की पृष्ठभूमि इन दिनों बन रही है।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 32
🔷 विज्ञान जीवित रहेगा; पर उसका नाम भौतिक विज्ञान न होकर अध्यात्म विज्ञान ही हो जाएगा। उस आधार को अपनाते ही वे सभी समस्याएँ सुलझ जाएँगी, जो इन दिनों अत्यन्त भयावह दीख पड़ती हैं। उन आवश्यकताओं को प्रकृति ही पूरा करने लगेगी, जिनके अभाव में मनुष्य अतिशय उद्विग्न, आशंकित, आतंकित दीख पड़ता है। न अगली शताब्दी में युद्ध होंगे, न महामारियाँ फैलेंगी और न जनसंख्या की अभिवृद्धि से वस्तुओं में कमी पड़ने के कारण चिन्तित होने की आवश्यकता पड़ेगी।
🔶 जागृत नारी अनावश्यक सन्तानोत्पादन से स्वयं इंकार कर देगी और अपनी बर्बाद होने वाली शक्ति को उन प्रयोजनों के लिए नियोजित करेगी, जो समृद्धि और सद्भावना के अभिवर्द्धन के लिए नितान्त आवश्यक है। नारी प्रधान इक्कीसवीं शताब्दी का वातावरण ऐसा होगा, जिसे सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा की संयुक्त शक्ति द्वारा अपनाया गया क्रिया-कलाप कहा जा सके। शिक्षा मात्र उदरपूर्णा न रहेगी, वरन् उसका अभिनव स्वरूप व्यक्तियों को प्रामाणिक, प्रखर एवं प्रतिभा सम्पन्न बनाने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करेगा।
🔷 यह सब कैसे होगा, इसकी प्रत्यक्षदर्शी योजनाओं का स्वरूप पूछने या जानने की जरूरत नहीं है। अदृश्य जगत में संव्याप्त दैवी चेतना का अनुपात वर्तमान परिस्थितियों की प्राणचेतना के आधार पर असाधारण रूप में उभरेगा और ऐसे परिवर्तन अनायास ही करता चला जाएगा, जिसे वसन्त का अभिनव अभियान कहा जा सके या उज्ज्वल भविष्य को साथ लेकर आने वाले ‘‘सतयुग की वापसी’’ कहा जा सके। इक्कीसवीं सदी का उज्ज्वल भविष्य इन्हीं आधारों को साथ लेकर अवतरित होगा। इसी की पृष्ठभूमि इन दिनों बन रही है।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 32
सोमवार, 29 अक्टूबर 2018
👉 हनुमान चालीसा में छिपे मैनेजमेंट के सूत्र
🔶 कई लोगों की दिनचर्या हनुमान चालीसा पढ़ने से शुरू होती है। पर क्या आप जानते हैं कि श्री *हनुमान चालीसा* में 40 चौपाइयां हैं, ये उस क्रम में लिखी गई हैं जो एक आम आदमी की जिंदगी का क्रम होता है।
🔷 माना जाता है तुलसीदास ने चालीसा की रचना मानस से पूर्व किया था हनुमान को गुरु बनाकर उन्होंने राम को पाने की शुरुआत की।
🔶 अगर आप सिर्फ हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं तो यह आपको भीतरी शक्ति तो दे रही है लेकिन अगर आप इसके अर्थ में छिपे जिंदगी के सूत्र समझ लें तो आपको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकते हैं।
🔷 हनुमान चालीसा सनातन परंपरा में लिखी गई पहली चालीसा है शेष सभी चालीसाएं इसके बाद ही लिखी गई। हनुमान चालीसा की शुरुआत से अंत तक सफलता के कई सूत्र हैं। आइए जानते हैं हनुमान चालीसा से आप अपने जीवन में क्या-क्या बदलाव ला सकते हैं….
🔶 शुरुआत गुरु से…
हनुमान चालीसा की शुरुआत गुरु से हुई है…
श्रीगुरु चरन सरोज रज,
निज मनु मुकुरु सुधारि।
🔷 अर्थ - अपने गुरु के चरणों की धूल से अपने मन के दर्पण को साफ करता हूं।
गुरु का महत्व चालीसा की पहले दोहे की पहली लाइन में लिखा गया है। जीवन में गुरु नहीं है तो आपको कोई आगे नहीं बढ़ा सकता। गुरु ही आपको सही रास्ता दिखा सकते हैं।
इसलिए तुलसीदास ने लिखा है कि गुरु के चरणों की धूल से मन के दर्पण को साफ करता हूं। आज के दौर में गुरु हमारा मेंटोर भी हो सकता है, बॉस भी। माता-पिता को पहला गुरु ही कहा गया है। समझने वाली बात ये है कि गुरु यानी अपने से बड़ों का सम्मान करना जरूरी है। अगर तरक्की की राह पर आगे बढ़ना है तो विनम्रता के साथ बड़ों का सम्मान करें।
🔶 ड्रेसअप का रखें ख्याल…
चालीसा की चौपाई है
कंचन बरन बिराज सुबेसा,
कानन कुंडल कुंचित केसा।
🔷 अर्थ - आपके शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है, सुवेष यानी अच्छे वस्त्र पहने हैं, कानों में कुंडल हैं और बाल संवरे हुए हैं।
आज के दौर में आपकी तरक्की इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप रहते और दिखते कैसे हैं। फर्स्ट इंप्रेशन अच्छा होना चाहिए। अगर आप बहुत गुणवान भी हैं लेकिन अच्छे से नहीं रहते हैं तो ये बात आपके करियर को प्रभावित कर सकती है। इसलिए, रहन-सहन और ड्रेसअप हमेशा अच्छा रखें।
🔶 सिर्फ डिग्री काम नहीं आती
बिद्यावान गुनी अति चातुर,
राम काज करिबे को आतुर।
🔷 अर्थ - आप विद्यावान हैं, गुणों की खान हैं, चतुर भी हैं। राम के काम करने के लिए सदैव आतुर रहते हैं।
आज के दौर में एक अच्छी डिग्री होना बहुत जरूरी है। लेकिन चालीसा कहती है सिर्फ डिग्री होने से आप सफल नहीं होंगे। विद्या हासिल करने के साथ आपको अपने गुणों को भी बढ़ाना पड़ेगा, बुद्धि में चतुराई भी लानी होगी। हनुमान में तीनों गुण हैं, वे सूर्य के शिष्य हैं, गुणी भी हैं और चतुर भी।
🔶 अच्छा लिसनर बनें
प्रभु चरित सुनिबे को रसिया,
राम लखन सीता मन बसिया।
🔷 अर्थ -आप राम चरित यानी राम की कथा सुनने में रसिक है, राम, लक्ष्मण और सीता तीनों ही आपके मन में वास करते हैं।
जो आपकी प्रायोरिटी है, जो आपका काम है, उसे लेकर सिर्फ बोलने में नहीं, सुनने में भी आपको रस आना चाहिए। अच्छा श्रोता होना बहुत जरूरी है। अगर आपके पास सुनने की कला नहीं है तो आप कभी अच्छे लीडर नहीं बन सकते।
🔶 कहां, कैसे व्यवहार करना है ये ज्ञान जरूरी है
सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा,
बिकट रुप धरि लंक जरावा।
🔷 अर्थ - आपने अशोक वाटिका में सीता को अपने छोटे रुप में दर्शन दिए। और लंका जलाते समय आपने बड़ा स्वरुप धारण किया।
कब, कहां, किस परिस्थिति में खुद का व्यवहार कैसा रखना है, ये कला हनुमानजी से सीखी जा सकती है। सीता से जब अशोक वाटिका में मिले तो उनके सामने छोटे वानर के आकार में मिले, वहीं जब लंका जलाई तो पर्वताकार रुप धर लिया। अक्सर लोग ये ही तय नहीं कर पाते हैं कि उन्हें कब किसके सामने कैसा दिखना है।
🔶 अच्छे सलाहकार बनें
तुम्हरो मंत्र बिभीसन माना,
लंकेस्वर भए सब जग जाना।
🔷 अर्थ - विभीषण ने आपकी सलाह मानी, वे लंका के राजा बने ये सारी दुनिया जानती है।
हनुमान सीता की खोज में लंका गए तो वहां विभीषण से मिले। विभीषण को राम भक्त के रुप में देख कर उन्हें राम से मिलने की सलाह दे दी।
विभीषण ने भी उस सलाह को माना और रावण के मरने के बाद वे राम द्वारा लंका के राजा बनाए गए। किसको, कहां, क्या सलाह देनी चाहिए, इसकी समझ बहुत आवश्यक है। सही समय पर सही इंसान को दी गई सलाह सिर्फ उसका ही फायदा नहीं करती, आपको भी कहीं ना कहीं फायदा पहुंचाती है।
🔶 आत्मविश्वास की कमी ना हो
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही,
जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।
🔷 अर्थ - राम नाम की अंगुठी अपने मुख में रखकर आपने समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई अचरज नहीं है।
अगर आपमें खुद पर और अपने परमात्मा पर पूरा भरोसा है तो आप कोई भी मुश्किल से मुश्किल टॉस्क को आसानी से पूरा कर सकते हैं। आज के युवाओं में एक कमी ये भी है कि उनका भरोसा बहुत टूट जाता है। आत्मविश्वास की कमी भी बहुत है। प्रतिस्पर्धा के दौर में आत्मविश्वास की कमी होना खतरनाक है। अपनेआप पर पूरा भरोसा रखे।
🔷 माना जाता है तुलसीदास ने चालीसा की रचना मानस से पूर्व किया था हनुमान को गुरु बनाकर उन्होंने राम को पाने की शुरुआत की।
🔶 अगर आप सिर्फ हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं तो यह आपको भीतरी शक्ति तो दे रही है लेकिन अगर आप इसके अर्थ में छिपे जिंदगी के सूत्र समझ लें तो आपको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकते हैं।
🔷 हनुमान चालीसा सनातन परंपरा में लिखी गई पहली चालीसा है शेष सभी चालीसाएं इसके बाद ही लिखी गई। हनुमान चालीसा की शुरुआत से अंत तक सफलता के कई सूत्र हैं। आइए जानते हैं हनुमान चालीसा से आप अपने जीवन में क्या-क्या बदलाव ला सकते हैं….
🔶 शुरुआत गुरु से…
हनुमान चालीसा की शुरुआत गुरु से हुई है…
श्रीगुरु चरन सरोज रज,
निज मनु मुकुरु सुधारि।
🔷 अर्थ - अपने गुरु के चरणों की धूल से अपने मन के दर्पण को साफ करता हूं।
गुरु का महत्व चालीसा की पहले दोहे की पहली लाइन में लिखा गया है। जीवन में गुरु नहीं है तो आपको कोई आगे नहीं बढ़ा सकता। गुरु ही आपको सही रास्ता दिखा सकते हैं।
इसलिए तुलसीदास ने लिखा है कि गुरु के चरणों की धूल से मन के दर्पण को साफ करता हूं। आज के दौर में गुरु हमारा मेंटोर भी हो सकता है, बॉस भी। माता-पिता को पहला गुरु ही कहा गया है। समझने वाली बात ये है कि गुरु यानी अपने से बड़ों का सम्मान करना जरूरी है। अगर तरक्की की राह पर आगे बढ़ना है तो विनम्रता के साथ बड़ों का सम्मान करें।
🔶 ड्रेसअप का रखें ख्याल…
चालीसा की चौपाई है
कंचन बरन बिराज सुबेसा,
कानन कुंडल कुंचित केसा।
🔷 अर्थ - आपके शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है, सुवेष यानी अच्छे वस्त्र पहने हैं, कानों में कुंडल हैं और बाल संवरे हुए हैं।
आज के दौर में आपकी तरक्की इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप रहते और दिखते कैसे हैं। फर्स्ट इंप्रेशन अच्छा होना चाहिए। अगर आप बहुत गुणवान भी हैं लेकिन अच्छे से नहीं रहते हैं तो ये बात आपके करियर को प्रभावित कर सकती है। इसलिए, रहन-सहन और ड्रेसअप हमेशा अच्छा रखें।
🔶 सिर्फ डिग्री काम नहीं आती
बिद्यावान गुनी अति चातुर,
राम काज करिबे को आतुर।
🔷 अर्थ - आप विद्यावान हैं, गुणों की खान हैं, चतुर भी हैं। राम के काम करने के लिए सदैव आतुर रहते हैं।
आज के दौर में एक अच्छी डिग्री होना बहुत जरूरी है। लेकिन चालीसा कहती है सिर्फ डिग्री होने से आप सफल नहीं होंगे। विद्या हासिल करने के साथ आपको अपने गुणों को भी बढ़ाना पड़ेगा, बुद्धि में चतुराई भी लानी होगी। हनुमान में तीनों गुण हैं, वे सूर्य के शिष्य हैं, गुणी भी हैं और चतुर भी।
🔶 अच्छा लिसनर बनें
प्रभु चरित सुनिबे को रसिया,
राम लखन सीता मन बसिया।
🔷 अर्थ -आप राम चरित यानी राम की कथा सुनने में रसिक है, राम, लक्ष्मण और सीता तीनों ही आपके मन में वास करते हैं।
जो आपकी प्रायोरिटी है, जो आपका काम है, उसे लेकर सिर्फ बोलने में नहीं, सुनने में भी आपको रस आना चाहिए। अच्छा श्रोता होना बहुत जरूरी है। अगर आपके पास सुनने की कला नहीं है तो आप कभी अच्छे लीडर नहीं बन सकते।
🔶 कहां, कैसे व्यवहार करना है ये ज्ञान जरूरी है
सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा,
बिकट रुप धरि लंक जरावा।
🔷 अर्थ - आपने अशोक वाटिका में सीता को अपने छोटे रुप में दर्शन दिए। और लंका जलाते समय आपने बड़ा स्वरुप धारण किया।
कब, कहां, किस परिस्थिति में खुद का व्यवहार कैसा रखना है, ये कला हनुमानजी से सीखी जा सकती है। सीता से जब अशोक वाटिका में मिले तो उनके सामने छोटे वानर के आकार में मिले, वहीं जब लंका जलाई तो पर्वताकार रुप धर लिया। अक्सर लोग ये ही तय नहीं कर पाते हैं कि उन्हें कब किसके सामने कैसा दिखना है।
🔶 अच्छे सलाहकार बनें
तुम्हरो मंत्र बिभीसन माना,
लंकेस्वर भए सब जग जाना।
🔷 अर्थ - विभीषण ने आपकी सलाह मानी, वे लंका के राजा बने ये सारी दुनिया जानती है।
हनुमान सीता की खोज में लंका गए तो वहां विभीषण से मिले। विभीषण को राम भक्त के रुप में देख कर उन्हें राम से मिलने की सलाह दे दी।
विभीषण ने भी उस सलाह को माना और रावण के मरने के बाद वे राम द्वारा लंका के राजा बनाए गए। किसको, कहां, क्या सलाह देनी चाहिए, इसकी समझ बहुत आवश्यक है। सही समय पर सही इंसान को दी गई सलाह सिर्फ उसका ही फायदा नहीं करती, आपको भी कहीं ना कहीं फायदा पहुंचाती है।
🔶 आत्मविश्वास की कमी ना हो
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही,
जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।
🔷 अर्थ - राम नाम की अंगुठी अपने मुख में रखकर आपने समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई अचरज नहीं है।
अगर आपमें खुद पर और अपने परमात्मा पर पूरा भरोसा है तो आप कोई भी मुश्किल से मुश्किल टॉस्क को आसानी से पूरा कर सकते हैं। आज के युवाओं में एक कमी ये भी है कि उनका भरोसा बहुत टूट जाता है। आत्मविश्वास की कमी भी बहुत है। प्रतिस्पर्धा के दौर में आत्मविश्वास की कमी होना खतरनाक है। अपनेआप पर पूरा भरोसा रखे।
👉 दृष्टिकोण
🔶 एक महिला रोज मंदिर जाती थी ! एक दिन उस महिला ने पुजारी से कहा अब मैं मंदिर नही आया करूँगी! इस पर पुजारी ने पूछा -- क्यों ?
🔷 तब महिला बोली -- मैं देखती हूँ लोग मंदिर परिसर में अपने फोन से अपने व्यापार की बात करते हैं ! कुछ ने तो मंदिर को ही गपशप करने का स्थान चुन रखा है ! कुछ पूजा कम पाखंड,दिखावा ज्यादा करते हैं!
🔶 इस पर पुजारी कुछ देर तक चुप रहे फिर कहा -- सही है ! परंतु अपना अंतिम निर्णय लेने से पहले क्या आप मेरे कहने से कुछ कर सकती हैं! महिला बोली -आप बताइए क्या करना है?
🔷 पुजारी ने कहा -- एक गिलास पानी भर लीजिए और 2 बार मंदिर परिसर के अंदर परिक्रमा लगाइए । शर्त ये है कि गिलास का पानी गिरना नहीं चाहिये! महिला बोली -- मैं ऐसा कर सकती हूँ!
🔶 फिर थोड़ी ही देर में उस महिला ने ऐसा ही कर दिखाया! उसके बाद मंदिर के पुजारी ने महिला से 3 सवाल पूछे -
🔷 1.क्या आपने किसी को फोन पर बात करते देखा?
🔶 2.क्या आपने किसी को मंदिर में गपशप करते देखा?
🔷 3.क्या किसी को पाखंड करते देखा?
🔶 महिला बोली -- नहीं मैंने कुछ भी नहीं देखा!
🔷 फिर पुजारी बोले --- जब आप परिक्रमा लगा रही थीं तो आपका पूरा ध्यान गिलास पर था कि इसमें से पानी न गिर जाए इसलिए आपको कुछ दिखाई नहीं दिया।
🔶 अब जब भी आप मंदिर आयें तो अपना ध्यान सिर्फ़ परम पिता परमात्मा में ही लगाना फिर आपको कुछ दिखाई नहीं देगा| सिर्फ भगवान ही सर्वत्र दिखाई देगें।
'' जाकी रही भावना जैसी..
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी
🔷 तब महिला बोली -- मैं देखती हूँ लोग मंदिर परिसर में अपने फोन से अपने व्यापार की बात करते हैं ! कुछ ने तो मंदिर को ही गपशप करने का स्थान चुन रखा है ! कुछ पूजा कम पाखंड,दिखावा ज्यादा करते हैं!
🔶 इस पर पुजारी कुछ देर तक चुप रहे फिर कहा -- सही है ! परंतु अपना अंतिम निर्णय लेने से पहले क्या आप मेरे कहने से कुछ कर सकती हैं! महिला बोली -आप बताइए क्या करना है?
🔷 पुजारी ने कहा -- एक गिलास पानी भर लीजिए और 2 बार मंदिर परिसर के अंदर परिक्रमा लगाइए । शर्त ये है कि गिलास का पानी गिरना नहीं चाहिये! महिला बोली -- मैं ऐसा कर सकती हूँ!
🔶 फिर थोड़ी ही देर में उस महिला ने ऐसा ही कर दिखाया! उसके बाद मंदिर के पुजारी ने महिला से 3 सवाल पूछे -
🔷 1.क्या आपने किसी को फोन पर बात करते देखा?
🔶 2.क्या आपने किसी को मंदिर में गपशप करते देखा?
🔷 3.क्या किसी को पाखंड करते देखा?
🔶 महिला बोली -- नहीं मैंने कुछ भी नहीं देखा!
🔷 फिर पुजारी बोले --- जब आप परिक्रमा लगा रही थीं तो आपका पूरा ध्यान गिलास पर था कि इसमें से पानी न गिर जाए इसलिए आपको कुछ दिखाई नहीं दिया।
🔶 अब जब भी आप मंदिर आयें तो अपना ध्यान सिर्फ़ परम पिता परमात्मा में ही लगाना फिर आपको कुछ दिखाई नहीं देगा| सिर्फ भगवान ही सर्वत्र दिखाई देगें।
'' जाकी रही भावना जैसी..
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी
👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 29)
👉 हमारी भविष्य वाणी
🔶 अब बात भविष्य की आती है, जिसमें प्रचलित दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन, अभावों का निराकरण, सदाशयता का अभिवर्धन प्रमुख है। यह कार्य विज्ञान तो कदाचित् कितने ही प्रयत्न कर लेने पर भी समय की माँग को पूरा न कर सकेगा। पर यह विश्वास किया जा सकता है कि चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का असाधारण मात्रा में अभिवर्धन होगा, तो वे सभी समस्याएँ अनायास ही सुलझती चलेंगी, जिन्हें इन दिनों सर्वनाशी और खण्ड प्रलय जैसी विभीषिकाएँ माना जा रहा है।
🔷 चेतना में ऐसी शक्ति उभरने पर मनुष्य की भावना और क्रिया-प्रक्रिया में ऐसा आश्चर्यजनक परिवर्तन होगा कि दुरुपयोग में लगी हुई क्षमताएँ सदुपयोग की ओर मुड़ चलेंगी और ऐसे सत्परिणाम उत्पन्न करेंगी, जिन्हें सतयुग की वापसी का नाम दिया जा सके।
🔶 विज्ञान आगे भी अनर्थ पैदा करता रह सकेगा; ऐसी आशंकाएँ किसी को भी नहीं करनी चाहिए; क्योंकि खनिज तेल, विद्युत उत्पादन जैसे स्रोत ही सूख जाएँगे, तब विज्ञान जीवित कैसे रह सकेगा? लोगों को लौटकर फिर प्राकृतिक जीवन अपनाना पड़ेगा, जिसमें विकृतियों के अभिवर्धन की कोई गुंजायश ही नहीं है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 32
🔶 अब बात भविष्य की आती है, जिसमें प्रचलित दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन, अभावों का निराकरण, सदाशयता का अभिवर्धन प्रमुख है। यह कार्य विज्ञान तो कदाचित् कितने ही प्रयत्न कर लेने पर भी समय की माँग को पूरा न कर सकेगा। पर यह विश्वास किया जा सकता है कि चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का असाधारण मात्रा में अभिवर्धन होगा, तो वे सभी समस्याएँ अनायास ही सुलझती चलेंगी, जिन्हें इन दिनों सर्वनाशी और खण्ड प्रलय जैसी विभीषिकाएँ माना जा रहा है।
🔷 चेतना में ऐसी शक्ति उभरने पर मनुष्य की भावना और क्रिया-प्रक्रिया में ऐसा आश्चर्यजनक परिवर्तन होगा कि दुरुपयोग में लगी हुई क्षमताएँ सदुपयोग की ओर मुड़ चलेंगी और ऐसे सत्परिणाम उत्पन्न करेंगी, जिन्हें सतयुग की वापसी का नाम दिया जा सके।
🔶 विज्ञान आगे भी अनर्थ पैदा करता रह सकेगा; ऐसी आशंकाएँ किसी को भी नहीं करनी चाहिए; क्योंकि खनिज तेल, विद्युत उत्पादन जैसे स्रोत ही सूख जाएँगे, तब विज्ञान जीवित कैसे रह सकेगा? लोगों को लौटकर फिर प्राकृतिक जीवन अपनाना पड़ेगा, जिसमें विकृतियों के अभिवर्धन की कोई गुंजायश ही नहीं है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 32
👉 Significance of Symbolism & Customs of Indian Culture (Part 3)
🔶 Objects like dipaka (lamp of ghee) and kalasa (round copper pot filled with the water of a sacred river) symbolize respectively, the incessant light of divinity, and presence of divine powers in all directions and forms around the cosmos.
🔷 All these symbols and objects, and other facets of Indian Culture are linked with the multiple manifestations and divine powers of Gayatri (Gayatri) — the Supreme Mother of all divine virtues and powers; the primordial, eternal power (of the Omnipotent), the perennial evolutionary force for expression of Brahm in the existence and creation of Nature; the eternal origin of divine wisdom.
🔶 Supreme knowledge of the Vedas is also said to have originated from the Gayatri Mantra According to revered mystics, spiritual masters. and scholars, spiritual endeavors of sadhana reach ultimate state of beatifying enlightenment soul-realization, and divine bliss with the support of this supreme mantra. The journey of spiritual purification and illumination of the inner-self also begins with the meditative chants of this mantra. Indeed, Gayatri (supreme source of noble thoughts and virtues) and yagya (selfless service, noble deeds) provide the motivating light and foundational support for the noble Indian Culture.
To be continued...
🔷 All these symbols and objects, and other facets of Indian Culture are linked with the multiple manifestations and divine powers of Gayatri (Gayatri) — the Supreme Mother of all divine virtues and powers; the primordial, eternal power (of the Omnipotent), the perennial evolutionary force for expression of Brahm in the existence and creation of Nature; the eternal origin of divine wisdom.
🔶 Supreme knowledge of the Vedas is also said to have originated from the Gayatri Mantra According to revered mystics, spiritual masters. and scholars, spiritual endeavors of sadhana reach ultimate state of beatifying enlightenment soul-realization, and divine bliss with the support of this supreme mantra. The journey of spiritual purification and illumination of the inner-self also begins with the meditative chants of this mantra. Indeed, Gayatri (supreme source of noble thoughts and virtues) and yagya (selfless service, noble deeds) provide the motivating light and foundational support for the noble Indian Culture.
To be continued...
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