बुधवार, 1 नवंबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 10)

🔶 आप अकेले चलें। हमारे गुरु अकेले चले हैं। हम अकेले चले हैं। आप भी अकेले चलिये। संगठन के फेर में मत पड़िये। आपको बोलना नहीं आता है। आप कहते हैं कि व्याख्यान सिखा दीजिये। आप हैं कौन? हमें बतलाइये। भाषण से क्या होगा? आप हमारी बात मानिये। आपको बोलना नहीं आता है तो हम क्या करें? आप पोस्टमैन का काम करिये। हम बोलना सिखा देंगे। लड़कियों को सिखा दिया था। महाराज जी हमें भी बोलना सिखा दीजिए। आप त्याग करके तो हमें बतलाइये। जवाहरलाल नेहरू एवं शास्त्री जी को गाँधी जी ने खादी बेचने को कहा था। वे घर-घर जाकर खादी बेचते थे। घर-घर धकेल गाड़ी लेकर जाते थे तथा लोगों से कहते थे कि आप खादी पहनिये तो क्या वे खादी बेचते थे? हाँ बेटे, खादी बेचते थे।
        
🔷 आप अपने आप को निचोड़िये। ये हमारा बेटा, यह हमारी पत्नी। देखना यही तुझे ऐसा मारेंगे कि तुझे याद रहेगा। हमारा बेटा, हमारी पत्नी-यही रटता रहेगा कि कुछ समाज के लिए, भगवान् के लिए भी करेगा। नहीं गुरुजी हम तो हनुमान चालीस पढ़ते हैं, गायत्री चालीसा पढ़ते हैं। अरे स्वार्थी कहीं का, तेरी तो अक्ल खराब हो गयी है। अहंकार बढ़ गया है। हमने आपमें से हर किसी को कहा है कि आप ब्राह्मण बनिये। नहीं गुरुजी, हमने तो चन्दा इकट्ठा कर लिया, तो हम क्या करेंगे इसका? आप आदमी तो बनें पहले। आप आदमी बनना सीखें। आप घटियापन छोड़िये, सुबह से शाम तक काम कीजिये। पात्रता बढ़ाइये।

🔶 ऋषियों ने अपने रक्त को एक घड़े में भरा था, जिससे सीताजी उत्पन्न हुई थीं। आपको भी संस्कृति की सीता की खोज करनी है। समाज के लिए, संस्कृति के लिए आप भी अपना समय, अपना पैसा निकालिये, अपना रक्त निकालिये। आप अपने आप को निचोड़िये तो सही। निचोड़ने के नाम पर अँगूठा दिखाते हैं, त्याग के नाम पर जीभ निकालते हैं। बकवास के नाम पर, घूमने के नाम पर बिना मतलब के आडम्बर बना रखे हैं। अपने आपको निचोड़िये। आप अपने को यदि निचोड़ेंगे तो फिर देख लेना आप क्या बन जाते हैं? हमने अपने आपको निचोड़ा तो देखिये क्या बन गये?

🌹 क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Association Begets Blessings

🔶 As soon as the human consciousness gets connected with the God's treasure of greatness, blessings start flowing in spontaneously. Sudama was leading a life of scarcity although he had been Lord Krishna's classmate. However, Sudama really got associated with the greatness of Lord Krishna, when he surrendered his ego and visited him at Dwarika. And then Lord Krishna showered his material and spiritual blessings upon Sudama. Similarly, when Saint Kabir surrendered himself completely in the hands of God, he got back immense wisdom and spiritual enlightenment which made him famous.

🔷 When Vibhishana, who was Ravana's younger brother associated himself with Lord Ram, his fortune changed profoundly. Lord Ram immediately addressed him as the 'King of Lanka', and in due course he actually became the king of golden Lanka. All these instances point to a simple fact - a close association with greatness is a prerequisite for God's blessings.

📖 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 1 Nov 2017

🔶 जो क्रियाशील है वह यदि आज बुरे कर्म करता है तो कल अच्छे कर्म भी कर सकता है किन्तु जिसके मन और शरीर को आलस्य ने घेर लिया है वह साँस लेता हुआ मुर्दा है। पृथ्वी का भार बढ़ाने के अतिरिक्त उसका और कोई प्रयोजन नहीं। उसके मन में अच्छे विचार उठ नहीं सकते। आलस्य का मुख पतन की ओर है जो उसे नीच योनियों में ले जाता है। जिसने आलस्य को अपनाया उसने अपने सबसे बड़े और अत्यन्त भयंकर शत्रु को घर में बसाया है। ऐसे व्यक्ति को सफलता कोसों दूर से नमस्कार करती है। आप अपने जीवन को नष्ट नहीं होने देना चाहते हैं तो उसे क्रियाशील रखें। स्फूर्ति, उत्साह, लगन और काम में लगे रहने की धुन हर समय अपने अन्दर होनी चाहिये।

🔷 अल्प में असन्तोष - यह अवगुण क्षुद्र हृदय का द्योतक है। हर स्थिति में संतुष्ट रहना यह मन का दैवी गुण है, मानसिक शान्ति के लिये इसकी आवश्यकता है। किन्तु यदि ये बात काम करने के बार में उतर आवे तो समझना चाहिये कि इसका कारण या तो आलस्य है या क्षुद्र हृदयता। एक पुस्तक पढ़कर, एक मिनट भजन करके, जरा सा परिश्रम करके, तुच्छ सी जन सेवा करके, कुछ ही पैसे कमाकर, जो संतुष्ट हो जाता है वह संतोषी नहीं अकर्मण्य है। मनुष्य के करने के लिए अपार काम पड़ा हुआ है। जितना अधिक हो सके, काम करना चाहिए और अपने उद्देश्य के अनुसार ऊँची से ऊँची सीढ़ी पर पहुँचने का प्रयत्न जारी रखना चाहिएं।

🔶 वासना - तरह-तरह के इन्द्रिय सुखों पर मन ललचाना और उनके सम्बन्ध में खयाली पुलाव पकाते रहना, मनुष्य जीवन की सार्थकता के बारे में एक बहुत बड़ा विघ्न है। इन्द्रियों के सुख अतृप्त हैं ज्यों-ज्यों उन्हें पूरा करते हैं त्यों-त्यों वह आग भड़कती है और साथ ही वह शरीर एवं मन को जलाती जाती है। सुस्वाद भोजन, शिश्नेन्द्रिय की परायणता तमाशे देखने की रुचि इनके प्रलोभन मन को अपना दास बना लेते हैं और दूसरे किसी महान कार्य की ओर जाने नहीं देते। यदि जाता है तो बार -बार उचट देते हैं जिसका मन बार-बार उचटता हो तो समझे कि इन्द्रियों के सुख उसे बार बार बहका रहे हैं। आपको किसी उपेक्षा की पूर्ति करनी है तो इन्द्रिय सुखों को फटकार दीजिये। क्योंकि वे जैसे-जैसे तृप्त किये जाते हैं वैसे ही वैसे उग्र रूप धारण करके आपको उल्टा खाते हैं और अन्त में अपने वश में करके नष्ट कर डालते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 1 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Nov 2017

👉 यह समय चूकने का नहीं है ।

🔶 यह समय युग परिवर्तन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य का है। इसे आदर्शवादी कठोर सैनिकों के लिये परीक्षा की घड़ी कहा जाये, तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति नहीं समझी जानी चाहिये। पुराना कचरा हटता है और उसके स्थान पर नवीनता के उत्साह भरे सरंजाम जुटते हैं। यह महान् परिवर्तन की-महाक्रान्ति की वेला है।...यहाँ तो प्रसंग हथियारों से सुसज्जित सेना का चल रहा है। वे ही यदि समय की महत्ता, आवश्यकता को, न समझते हुए, जहाँ-तहाँ मटरगस्ती करते फिरें और समय पर हथियार न पाने के कारण समूची सेना को परास्त होना पड़े तो ऐसे व्यक्तियों पर तो हर किसी का रोष ही बरसेगा, जिनने-आपात स्थिति में भी प्रमाद बरता और अपना तथा अपने देश के गौरव को मटियामेट करके रख दिया।

🔷 जीवन्तों, जाग्रतों और प्राणवान् में से प्रत्येक को अनुभव करना चाहिये कि यह ऐसा विशेष समय है जैसा कि हजारों-लाखों वर्षों बाद कभी एक बार आता है। गाँधी के सत्याग्रही और बुद्ध के परिव्राजक बनने का श्रेय, समय निकल जाने पर अब कोई किसी भी मूल्य पर नहीं पा सकता। हनुमान और अर्जुन की भूमिका हेतु फिर से लालायित होने वाला कोई व्यक्ति कितने ही प्रयत्न करे, अब दुबारा वैसा अवसर हस्तगत नहीं कर सकता। समय की प्रतीक्षा तो की जा सकती है, पर समय किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता। भगीरथ, दधीचि और हरिश्चन्द्र जैसा सौभाग्य अब उनसे भी अधिक त्याग करने पर भी पाया नहीं जा सकता ।

🔶 समय बदल रहा है। प्रभातकाल का ब्रह्ममुहूर्त अभी है। अरुणोदय के दर्शन अभी हो सकते हैं। कुछ घण्टे ऐसे हैं उन्हें यदि प्रमाद में गँवा दिये जायें, तो अब वह गया समय लौटकर फिर किस प्रकार आ सकेगा? युग-परिवर्तन की वेला ऐतिहासिक, असाधारण अवधि है। इसमें जिनका जितना पुरुषार्थ होगा, वह उतना ही उच्च कोटि का शौर्य पदक पा सकेगा। समय निकल जाने पर, साँप निकल जाने पर लकीर को लाठियों से पीटना भर ही शेष रह जाता है।

🔷 इन दिनों मनुष्य का भाग्य और भविष्य नये सिरे से लिखा और गढ़ा जा रहा है। ऐसा विलक्षण समय कभी हजारों-लाखों वर्षों बाद आता है। इसे चूक जाने वाले सदा पछताते ही रहते हैं और जो उसका सदुपयोग कर लेते हैं, वे अपने आपको सदा-सर्वदा के लिये अजर-अमर बना लेते हैं। गोवर्धन एक बार ही उठाया गया था। समुद्र पर सेतु भी एक ही बार बना था। कोई यह सोचता रहे कि ऐसे समय तो बार-बार आते ही रहेंगे और हमारा जब भी मन करेगा, तभी उसका लाभ उठा लेंगे, तो ऐसा समझने वाले भूल ही कर रहे होंगे। इस भूल का परिमार्जन फिर कभी कदाचित् ही हो सके।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा अवतार की विस्तार प्रक्रिया

http://literature.awgp.org/book/Pragyavtar_Ki_Vistar_Prakriya/v1

http://literature.awgp.org

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

👉 अन्न का प्रभाव

🔷 शरशय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह मृत्यु से पूर्व आवश्यक उपदेश पाण्डवों को दे रहे थे। उन्हें इस प्रकार धर्मोपदेश देते देखकर द्रौपदी के मन में आया कि जब दुर्योधन मेरी इज्जत उतार रहा था तब इनने उसे कुछ उपदेश नहीं किया और आज धर्म की इतनी लम्बी-चौड़ी बातें कर रहे है। द्रौपदी इन मनोभावों के साथ हंस पड़ी।

🔶 द्रौपदी के मनोभाव भीष्म ने जान लिये। उनने कहा-बेटी उस समय मेरे शरीर में कौरवों का अन्न भरा हुआ था जिसके कारण मेरी बुद्धि वैसी ही अधर्मयुक्त हो रही थी। अब युद्ध में वह रक्त निकल गया, कई दिन से मैंने भोजन भी नहीं किये इससे मेरे पेट में कोई अन्न न होने से मेरे विचार शुद्ध है और अब मैं धर्मोपदेश देने की स्थिति में होने के कारण उत्तम शिक्षाऐं आप लोगों को दे रहा हूँ।

🔷 दुष्टों का अन्न खाने से सत्पुरुषों की भी बुद्धि दूषित हो जाती है अन्न का मन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 150)

🌹  ‘‘विनाश नहीं सृजन’’ हमारा भविष्य कथन

🔷 अगला समय संकटों से भरा-पूरा है, इस बात को विभिन्न मूर्धन्यों ने अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार विभिन्न प्रकार के जोरदार शब्दों में कहा। ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल में जिस ‘‘सेविन टाइम्स’’ में प्रलय काल जैसी विपत्ति आने का उल्लेख किया है, उसका ठीक समय यही है। इस्लाम धर्म में चौदहवीं सदी के महान संकट का उल्लेख है। भविष्य पुराण में इन्हीं दिनों महती विपत्ति टूट पड़ने का संकेत है। सिखों के गुरु ग्रंथसाहिब में भी ऐसी ही अनेक भविष्यवाणियाँ हैं। कवि सूरदास ने इन्हीं दिनों विपत्ति आने का इशारा किया था। मिस्र के पिरामिडों में भी ऐसे ही शिलालेख पाए गए हैं। अनेक भारतीय भविष्यवक्ताओं ने इन दिनों भयंकर उथल-पुथल के कारण अध्यात्म आधार पर और दृश्य गणित ज्योतिष के सहारे ऐसी ही सम्भावनाएँ व्यक्त की हैं।

🔶 पाश्चात्य देशों में जिन भविष्य वक्ताओं की धाक है और जिनकी भविष्यवाणियाँ ९९ प्रतिशत सही निकलती रही हैं, उनमें जीन डिक्शन, प्रो०हरार, एंडरशन, जॉनबावेरी, कीरो, आर्थर क्लार्क, नोस्ट्राडेमस, मदर शिम्टन, आनंदाचार्य आदि ने इस समय के सम्बन्ध में जो सम्भावनाएँ व्यक्त की हैं, वे भयावह हैं। कोरिया में पिछले दिनों समस्त संसार के दैवज्ञों का एक सम्मेलन हुआ था, उसमें भी डरावनी सम्भावनाओं की ही आगाही व्यक्त की गई थी। टोरंटो-कनाडा में, संसार भर के भविष्य विज्ञान विशेषज्ञों (फ्यूचराण्टालाजिस्टा) का एक सम्मेलन हुआ था, जिसमें वर्तमान परिस्थितियों का पर्यवेक्षण करते हुए कहा था कि बुरे दिन अति समीप आ गए हैं। ग्रह-नक्षत्रों के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने वालों ने इन दिनों सूर्य पर बढ़ते धब्बों और लगातार पड़ने वाले सूर्यग्रहणों को धरती निवासियों के लिए हानिकारक बताया है। इन दिनों सन् ८५ के प्रारम्भ में उदय हुआ ‘‘हैली धूमकेतु’’ की विषैली गैसों का परिणाम पृथ्वीवासियों के लिए हानिकारक बताया गया है।

🔷 सामान्य बुद्धि के लोग भी जानते हैं कि अंधा-धुंध बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए अगले दिनों अन्न-जल तो क्या सड़कों पर चलने का रास्ता तक न मिलेगा। औद्योगीकरण-मशीनीकरण की भरमार से हवा और पानी भी कम पड़ रहा है और विषाक्त हो चला है। खनिज तेल और धातुएँ, कोयला, पचास वर्ष तक के लिए नहीं है। अणु परीक्षणों से उत्पन्न विकिरण से अगली पीढ़ी और वर्तमान जन समुदाय को कैंसर जैसे भयानक रोगों की भरमार होने का भय है। कहीं अणु युद्ध हो गया तो इससे न केवल मनुष्य, वरन् अन्य प्राणियों और वनस्पतियों का भी सफाया हो जाएगा। असंतुलित हुए तापमान से ध्रुवों की बर्फ पिघल पड़ने, समुद्र में तूफान आने और हिमयुग के लौट पड़ने की सम्भावना बताई जा रही है और अनेक प्रकार के संकटों के अनेकानेक कारण विद्यमान हैं। इस संदर्भ में साहित्य इकट्ठा करना हो, तो उनसे ऐसी सम्भावनाएँ सुनिश्चित दिखाई पड़ती हैं, जिनके कारण इन वर्षों में भयानक उथल-पुथल हो। सन् २००० में युग परिवर्तन की घोषणा है, ऐसे समय में भी विकास से पूर्व विनाश की, ढलाई से पूर्व गलाई की सम्भावना का अनुमान लगाया जा सकता है। किसी भी पहलू से विचार किया जाए, प्रत्यक्षदर्शी और भावनाशील मनीषी-भविष्यवक्ता इन दिनों  विश्व संकट को अधिकाधिक गहरा होता देखते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.170

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.21

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 9)

🔶 हर रोज चिट्ठियाँ आती हैं, हर शाखाओं में मारकाट-मारकाट मुझे मैनेजर बनाइये, इस मैनेजर को निकालिये। हमने शाखा तथा शक्तिपीठें इसलिए नहीं बनाई थीं, देवता को इसलिए नहीं बैठाया था कि लोगों का अहंकार बढ़े। हमने ट्रस्टी इसलिए नहीं बनाया था कि इसे बरबाद करो। हमने स्वयं गलती की इन लोगों को मालिक, ट्रस्टी बनाकर, इनके अहंकार एवं स्वार्थपरता को आगे बढ़ाकर। अब पंचायत समितियों में जिस प्रकार झगड़ा होते हैं, हमारे शक्तिपीठों में भी हर जगह चाण्डालपन है, हमें क्या दिखता नहीं? क्या हमने शक्तिपीठें इसीलिए बनाई थीं, पूजा इसीलिए प्रारम्भ की थी, इसीलिए संगठन बनाया था कि आप लोग अहंकारी बन जाइये और आपस में ही एक-दूसरे की टाँग-खिचाई कीजिये, आप ऐसी पूजा को बंद कीजिए, पूजा मत कीजिये, पर यह घटियापन बन्द कीजिये। आप नास्तिक हो जाइये, भले ही पर आप इसी तरह के संगठन बनाना बन्द कर दीजिए। आप शक्तिपीठों को बनाना बन्द कर दीजिये।
        
🔷 यहाँ हम एक बात अवश्य कहेंगे कि आप आध्यात्मिकता के मौलिक सिद्धान्तों को समझिये। पूजा को पीछे हटाइए, आध्यात्मिकता के मौलिक सिद्धान्तों को समझिये। आप यह मत सोचिये कि गुरुजी ने चौबीस-चौबीस लाख का जप किया था। नहीं, हम और चौबीस लाख के जप करने वालों का नाम बता सकते हैं जो आज बिलकुल खाली एवं छूँछ हैं। जप करने वाले कुछ नहीं कर सकते हैं, हम ब्राह्मण की शक्ति, सन्त की शक्ति जगाना चाहते हैं। आप राम का नाम लें या न लें। अब तो मैं यहाँ तक कहता हूँ कि अब माला जप करें या न करें, एक माला जप करें या ८१ माला जप करें, परन्तु मुख्य बात यह है कि आप अपने ब्राह्मणत्व को जगाइए। प्याऊ को कौन चलाएगा। हनुमान चालीसा पाठ करने वालों ने कितनों का भला किया है? ब्राह्मणों ने भला किया है, सन्तों ने भला किया है? ब्राह्मणों की वाणी में, सन्तों की तपस्या में बल होता है। आपको इसी प्रकार कोई मिल जाएगा तो आप नास्तिक हो जाएँगे। आप पूजा का महत्त्व बढ़ाइये। अध्यात्म इन लोगों के द्वारा ही टिका हुआ है।

🔶 आपके पास बैंक में धन जमा नहीं है, तो चैक कैसे काट सकते हैं। आपकी बैंक में पूँजी होनी चाहिए। पहले जमा तो कीजिए कुछ। केवल पूजा से ही काम चलने वाला नहीं है। हमारी सबसे बड़ी पूजा समाज की सेवा है। हमने लाखों आदमियों की ही नहीं, वरन् सारे विश्व की सेवा की है। हमने अपनी अक्ल, धन, अनुष्ठान, वर्चस् सभी इसी में लगाया है। हमने खेती करने वालों, मकान बनाने वालों को देखा है कि सेवा के नाम पर नगण्य हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 31 Oct 2017

🔶 सत्य का सज्जनता से अनन्य सम्बन्ध है। सत्यनिष्ठा उसी की निभेगी जो सज्जन होगा। इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि सत्यनिष्ठा से सज्जनता के सभी आवश्यक गुण उत्पन्न हो जायेंगे। एक के बिना दूसरी बात निभ ही नहीं सकेगी। तामसी राजसी इच्छाओं और आवश्यकताओं वाला व्यक्ति सत्यनिष्ठ रह सके यह कठिन है। सत्य केवल सच बोलने तक ही सीमित नहीं है। वरन् वह एक सर्वांगीण सर्वतोमुखी जीवन साधना है। वैसी ही साधना जैसी अन्यान्य कष्ट साध्य योग साधनाएँ परमात्मा को प्राप्त करने के लिए की जाती हैं। सत्य पालन की साधना से भी जीवात्मा परमात्मा तक इसी प्रकार पहुँच सकती है जैसे अन्यान्य योगों के साधक तपस्वी लोग ब्रह्म सायुज्य की स्थिति तक पहुँचते हैं। जिस प्रकार सभी साधनाओं में कुछ कष्ट उठाने और कुछ त्याग करने के लिए तैयार होना पड़ता है उसी प्रकार सत्य साधना का भी मूल्य चुकाना पड़ता है।

🔷 सफलता क्षेत्र में सत्य का भी वही स्थान है जो ईश्वर का। जिस प्रकार शिव, विष्णु आदि की उपासना की जाती है उसी प्रकार ही सत्य की भी आराधना है। सिद्ध हुआ सत्य भी साधक को वैसे ही वरदान दे सकता है जैसे कोई अन्य देवता या साक्षात् परमात्मा प्रसन्न होने पर अपने आराधक को प्रदान करते हैं।
पातञ्जलि योगदर्शन साधन पाद के सूत्र 36 में कहा गया है—
सत्य प्रतिष्ठायाँ क्रिया फलाश्रित्वम्।
अर्थात्—सत्य में स्थिति दृढ़ हो जाने पर क्रिया फल का आश्रय बन जाती है।

🔶 सत्यनिष्ठ की वाणी के द्वारा जो क्रिया होती है अर्थात् जो कुछ वह कहता है सो फलीभूत सफल होता है। उसकी वाणी कभी असत्य नहीं होती। अनेकों पुण्य कार्य करने से जो फल अन्य लोगों को मिलते हैं वह फल सत्यनिष्ठ को अपनी वाणी साधना से ही मिल जाते हैं। यदि वह किसी को शाप या वरदान दे तो पूर्ण सफल होता है। किसी ने जो शुभ नहीं किया है उसका सत्परिणाम उपस्थित कर देने की शक्ति उसमें उत्पन्न हो जाती है। यह तो एक प्रत्यक्ष एवं प्रकट सिद्धि है। इसके अतिरिक्त भी सत्यनिष्ठ अनेक आध्यात्मिक सफलताओं से सम्पन्न हो जाता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 31 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 Oct 2017


सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 8)

🔶 क्या हम जिन्दगी भर, अपने बीबी-बच्चों को ही खिलाते रहेंगे? जिस पर मनुष्य का भविष्य टिका है, क्या उसके लिए कुछ नहीं कर सकेंगे? अपने लिये अधिक, समाज के लिए इतना कम। यह कैसे होगा? मेरे गुरु ने दुखियारों की सेवा, समाज की सेवा कम की है, परन्तु उसने सारे विश्व को हिला दिया है। दूसरों के दुःखों को देखकर यह सोचते हैं कि इसके लिए हम क्या करें? उस समय मैं रो पड़ता हूँ तथा उसे सहायता किये बिना मेरा मन नहीं मानता है। यह क्रम चलेगा ही। परन्तु एक काम और है, इनसान को ऊँचा उठाने का। हम सोचते हैं कि और यदि यह काम भी किया होता तो मजा आ जाता। आप जितने लोग बैठे हैं, अगर आपको हम फुटबॉल की तरह ऊँचे उछाल दिये होते तो मजा आ जाता।
       
🔷 आप लोगों को उछाल दें तो आप में से हर एक आदमी हनुमान, ऋषि विवेकानन्द दिखाई पड़ेगा। आप लोगों में से एक भी आदमी ऐसा नहीं है, जो रैदास की तुलना में गरीब हो। परन्तु आप इतने भारी हैं कि आपके सेल्स काम नहीं कर रहे हैं, आपके हाथ उठ नहीं पा रहे हैं। मानसिक दृष्टि से एक-एक बेड़ियाँ इतनी भारी हैं जैसे हजार मन की हों। ऐसे में आपको कैसे उठाऊँ? आपकी बेड़ियों को मैं काटूँगा क्योंकि हमारे बाद इन बच्चों को खिलाने वाला, नर्सिंगहोम चलाने वाला कहाँ से लायेंगे? यह अस्पताल बन्द हो जाने पर आपके अनुभव के बिना इनका ऑपरेशन कौन करेगा? इनसान को उठाया नहीं जा सका तो बात कैसे बनेगी?

🔶 इसी काम के लिए हम समय लगाना चाहते हैं। सवाल हमारे समय का है, आप तो केवल पूजा के पीछे पड़े हैं। देवी-देवता के पीछे लगे हैं कि मनोकामना पूरी हो जाए। किसी दिन मेरे दिमाग में गुस्सा आ गया तो पूजा को ही बन्द कर दूँगा और कहूँगा कि इसी के पीछे पड़ा है। पूजा के चक्कर में पड़ा है। पूजा से आज्ञाचक्र जगेगा। सुन लेना एक दिन मैं पूजा को गालियाँ दूँगा, यदि यही रटता रहा कि सब कुछ पूजा से मिल जाएगा और यही समझता रहा कि माला घुमाने को पूजा कहते हैं। देवी-देवता को पकड़ने का नाम पूजा है। अज्ञानी लोग, भ्रमित लोग मनुष्य को दबाने तथा चक्कर में डालने के नाम को पूजा कहते हैं।

🔷 देवी-देवताओं को पकड़ने के लिए, मनोकामना पूर्ण करने के लिए जो आपने पूजा का स्वरूप बना रखा है, वह बहुत ही घटिया रूप है। पूजा ऐसी नहीं हो सकती, ध्यान ऐसा नहीं हो सकता, जैसा कि आप लोगों ने समझ रखा है कि अगरबत्तियाँ चढ़ाएँगे, चावल चढ़ाएँगे, शक्कर की गोली चढ़ाएँगे और मनोकामना पूर्ण हो जाएगी। इतना घटिया अध्यात्म नहीं हो सकता है जैसा कि आप लोगों ने सोच रखा है। आपकी पूजा घटिया, आपके देवता घटिया सब घटिया हैं। इसको समझना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Elephant and the Five Blind Men

🔶 Someone said to five blind men, "There is an elephant in front of you, can you guess how it looks like?" The first blind men caught the elephant's tail, the second its ears, the third its legs, the fourth its tusks, and the fifth one touched its back. Based on their experience they all came up with radically different answers. The first blind man who had caught the elephant's tail concluded, "The elephant is definitely like a rope."

🔷 The second one, who had caught its ears strongly disagreed and said, "No! It's like a saucepan." The third blind man who had caught its leg concluded that an elephant is like fat pole. The fourth one, who had caught the tusk, thought it was like a stick, and the fifth one, who touched the back was absolutely sure it was like a rock. They all started quarreling over the matter and never reached a conclusion.

🔶 Telling this story to his disciples, a holy man said, "Just like the five blind men, most people have only partially experienced God, and useless quarrels take place in religious discourses."

👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 Oct 2017

🔶 आत्मा के विकास को सीधा उठते चलते, उर्ध्वगामी होने में सबसे बड़ी बाधा असत्य की ही है। छल, कपट, दुराव, छिपाव के कारण अंतर्मन में अनेक प्रकार के असमंजस पैदा होते हैं, आगा पीछा सोचना पड़ता है। झूठ खुलने का भय उत्पन्न होता है, असत्यभाषी कपटी ठहराये जाने पर जो निन्दा घृणा और अप्रतिष्ठा प्राप्त होती है उसके भय से अन्तःकरण निरन्तर संत्रस्त रहता है। इन विकृतियों के रहते हुए आध्यात्मिक विकास में बाधा पड़ती है। जिस पौधे का जन्म किसी भारी पत्थर के नीचे हुआ हो उसे ऊपर उठने में बहुत असुविधा होती है, टेढ़ा तिरछा होकर वह मुश्किल से ही उस पत्थर के नीचे से बाहर निकल पाता है। निकल कर भी धीरे धीरे बढ़ता है और फिर भी टेढ़ा कुबड़ा कुरूप ही रहता है। जीव के विकास मार्ग में भी प्रधान बाधा यही है।

🔷 सरलता ही साधुता का चिन्ह है। जो जितना सीधा भोला भाला है जिसमें जितनी है निश्छलता, और सद्भावना है वह उतना ही बड़ा सन्त कहा जा सकता है। धर्म कर्तव्यों में सत्य की गणना सर्व प्रथम सर्वोपरि तत्वों में की गई है। इसलिए श्रेयार्थी को ईश्वर की ही भाँति सत्य का भी उपासक बनना पड़ता है। कोई व्यक्ति उपासना को प्रेम पूर्वक करता है किन्तु उसका मन असत्याचरण में अभिप्रेत है तो उसकी साधना अपूर्ण एवं अधूरी ही मानी जाएगी। उसे बहुत श्रम करने पर भी वह लाभ न मिल सकेगा जो सत्य निष्ठ-शुद्ध आचरण और सद्विचारों वाला व्यक्ति थोड़ी सी ही साधना से प्राप्त कर सकता है।

🔶 विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए सच्चे सत्य प्रेमी को उन कष्टों को सहने के लिए तैयार रहना चाहिए जो इस मार्ग के पथिक की परीक्षा करने के लिए आती हैं। यदि साधक डरे नहीं, असुविधाओं और विरोधों से घबराये नहीं, अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं को सीमित रखे, कष्ट सहिष्णुता का विपत्ति में हँसते रहने का और विरोधी के प्रति सद्भाव रखने का स्वभाव बना ले तो उसकी सत्यनिष्ठा आसानी से निभ सकती है। जो लोग सत्य पालन के महान लाभों से लाभान्वित होना चाहते हैं उन्हें उसके लिए अपने स्वभाव में इन आवश्यक गुणों को भी उत्पन्न करना ही पड़ेगा। सत्य सेवी का श्रेय तो प्राप्त हो जाए पर विरोध, हानि, अपमान, असुविधा एवं आपत्ति का सामना न करना पड़े ऐसा नहीं हो सकता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 30 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Oct 2017


👉 बेटे के जन्मदिन पर .....

🔷 रात के 1:30 बजे फोन आता है, बेटा फोन उठाता है तो माँ बोलती है....
"जन्म दिन मुबारक लल्ला"

🔶 बेटा गुस्सा हो जाता है और माँ से कहता है - सुबह फोन करती। इतनी रात को नींद खराब क्यों की? कह कर फोन रख देता है।

🔷 थोडी देर बाद पिता का फोन आता है। बेटा पिता पर गुस्सा नहीं करता, बल्कि कहता है ..." सुबह फोन करते "

🔶 फिर पिता ने कहा - मैनें तुम्हे इसलिए फोन किया है कि तुम्हारी माँ पागल है, जो तुम्हे इतनी रात को फोन किया।

🔷 वो तो आज से 25 साल पहले ही पागल हो गई थी। जब उसे डॉक्टर ने ऑपरेशन करने को कहा और उसने मना किया था। वो मरने के लिए तैयार हो गई, पर ऑपरेशन नहीं करवाया।

🔶 रात के 1:30 को तुम्हारा जन्म हुआ। शाम 6 बजे से रात 1:30 तक वो प्रसव पीड़ा से परेशान थी ।

🔷 लेकिन तुम्हारा जन्म होते ही वो सारी पीड़ा भूल गय ।उसके ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा । तुम्हारे जन्म से पहले डॉक्टर ने दस्तखत करवाये थे, कि अगर कुछ हो जाये, तो हम जिम्मेदार नहीं होंगे।

🔶 तुम्हे साल में एक दिन फोन किया, तो तुम्हारी नींद खराब हो गई......मुझे तो रोज रात को 25 साल से, रात के 1:30 बजे उठाती है और कहती है, देखो हमारे लल्ला का जन्म इसी वक्त हुआ था।

🔷 बस यही कहने के लिए तुम्हे फोन किया था। इतना कहके पिता फोन रख देते हैं।

🔶 बेटा सुन्न हो जाता है। सुबह माँ के घर जा कर माँ के पैर पकड़कर माफी मांगता है....तब माँ कहती है, देखो जी मेरा लाल आ गया।

🔷 फिर पिता से माफी मांगता है, तब पिता कहते हैं .....आज तक ये कहती थी, कि हमे कोई चिन्ता नहीं; हमारी चिन्ता करने वाला हमारा लाल है।

🔶 पर अब तुम चले जाओ, मैं तुम्हारी माँ से कहूंगा कि चिन्ता मत करो।

🔷 मैं तुम्हारा हमेशा की तरह आगे भी ध्यान रखुंगा।

🔶 तब माँ कहती है -माफ कर दो, बेटा है।

🔷 सब जानते हैं दुनियाँ में एक माँ ही है, जिसे जैसा चाहे कहो, फिर भी वो गाल पर प्यार से हाथ फेरेगी।

🔶 पिता अगर तमाचा न मारे, तो बेटा सर पर बैठ जाये। इसलिए पिता का सख्त होना भी जरुरी है।

🔷 माता पिता को आपकी दौलत नही, बल्कि आपका प्यार और वक्त चाहिए। उन्हें प्यार दीजिए। माँ की ममता तो अनमोल है।

रविवार, 29 अक्टूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 7 )

🔶 हमारे मरने के बाद आप देखेंगे कि गुरुजी के मरने के बाद उनका समय, धन, श्रम किस काम में खर्च हुआ है। हमारी शक्ति एवं सामर्थ्य बच्चों को खिलाने में, अस्पताल खोलकर मरीजों की सेवा में खर्च हुई हैं। हमने अभी तक समाज को चालीस प्रतिशत दिया है और लोगों को, दुखियारे को पाँच प्रतिशत दिया है। अब हमारा मन है कि इसका हिस्सा बढ़ाया जा सके। जब हम मौन धारण कर लेंगे तो हमारा ब्राह्मण और जाग जाएगा, उस समय हम व्यक्तियों की भी ज्यादा सेवा कर सकेंगे। ठोस सेवा कर सकेंगे। अभी तक हमारी सहानुभूति का अंश ज्यादा रहा है, सेवा का हिस्सा कम रहा है। हमने सहानुभूति दी है तथा पायी है।
      
🔷 अगर हमने किसी की एक किलोग्राम सेवा की है तो उसमें पाँच सौ ग्राम सहानुभूति भी है। उस समय हम साधन सम्पन्न एवं समर्थ थे। पर अगले दिनों जब जीवात्मा को हम और ऊपर उठा लेंगे तब हम अधिक सेवा कर सकेंगे। आपके लिए हमने कुछ किया है या नहीं? इसका सबूत देखना हो तो दृष्टि पसारकर देखिये कि कुछ हुआ है, तो आप पायेंगे कि इसी कारण से यह पचास लाख आदमी हमसे जुड़े हैं, अन्यथा इतने आदमी कहाँ से आते? यह हम कहाँ कहते हैं कि कुछ नहीं हुआ। ५० लाख आदमी हमारे एक इशारे पर खड़े हो सकते हैं। इतने शक्तिपीठ कहाँ से बन गये? ५० लाख मुट्ठियाँ ५० लाख लोगों का एक घण्टे का समयदान कुछ मायने रखता है।

🔶 हम अपने ब्राह्मण को फिर जिन्दा करेंगे। सन्त दानी होता है। आदमी को दानी बनने के लिए सन्त बनना होगा। हम ब्राह्मण और सन्त को पुनः जिन्दा करेंगे। ब्राह्मण जमा करता है, सन्त उसे खर्च कर देता है। हमने निश्चय किया है, विचार किया है कि जिन्दगी के इन आखिरी क्षणों में अपने ब्राह्मण एवं सन्त को साधकर सबके लिए एक मिसाल स्थापित कर दूँ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आज का सद्चिंतन 28 Oct 2017


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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