🌹युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री कार्यक्रम
🔵 यदि अपना दृष्टिकोण बदल दिया जाय, संयम और नियमितता की नीति अपना ली जाय तो फिर न बीमारी रहे और न कमजोरी। अपनी आदतें ही संयमशीलता और आहार-विहार में व्यवस्था रखने की बनानी होंगी। इस निर्माण में जिसे जितनी सफलता मिलेगी वह उतना आरोग्य लाभ का आनन्द भोग सकेगा। इस संदर्भ में पालन करने योग्य 10 नियम नीचे दिए जा रहे हैं।
🔴 1. दो बार का भोजन —भोजन, दोपहर और शाम को दो बार ही किया जाय। प्रातः दूध आदि हल्का पेय पदार्थ लेना पर्याप्त है। बार-बार खाते रहने की आदत बिलकुल छोड़ देनी चाहिए।
🔵 2. भोजन को ठीक तरह चबाया जाय —भोजन उतना चबाना कि वह सहज ही गले से नीचे उतर जाय। इसकी आदत ऐसे डाली जा सकती है कि रोटी अकेली, बिना साग के खावे और साग को अलग से खावें। साग के साथ गीली होने पर रोटी कम चबाने पर भी गले के नीचे उतर जाती है। पर यदि उसे बिना शाक के खाया जा रहा है तो उसे बहुत देर चबाने पर ही गले से नीचे उतारा जा सकेगा। यह बात अभ्यास के लिये है। जब आदत ठीक हो जाय तो शाक मिलाकर भी खा सकते हैं।
🔴 3. भोजन अधिक मात्रा में न हो —आधा पेट भोजन, एक चौथाई जल, एक चौथाई सांस आने-जाने के लिये खाली रखना चाहिए। अर्थात् भोजन आधे पेट किया जाय।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌿🌞 🌿🌞 🌿🌞
🔵 यदि अपना दृष्टिकोण बदल दिया जाय, संयम और नियमितता की नीति अपना ली जाय तो फिर न बीमारी रहे और न कमजोरी। अपनी आदतें ही संयमशीलता और आहार-विहार में व्यवस्था रखने की बनानी होंगी। इस निर्माण में जिसे जितनी सफलता मिलेगी वह उतना आरोग्य लाभ का आनन्द भोग सकेगा। इस संदर्भ में पालन करने योग्य 10 नियम नीचे दिए जा रहे हैं।
🔴 1. दो बार का भोजन —भोजन, दोपहर और शाम को दो बार ही किया जाय। प्रातः दूध आदि हल्का पेय पदार्थ लेना पर्याप्त है। बार-बार खाते रहने की आदत बिलकुल छोड़ देनी चाहिए।
🔵 2. भोजन को ठीक तरह चबाया जाय —भोजन उतना चबाना कि वह सहज ही गले से नीचे उतर जाय। इसकी आदत ऐसे डाली जा सकती है कि रोटी अकेली, बिना साग के खावे और साग को अलग से खावें। साग के साथ गीली होने पर रोटी कम चबाने पर भी गले के नीचे उतर जाती है। पर यदि उसे बिना शाक के खाया जा रहा है तो उसे बहुत देर चबाने पर ही गले से नीचे उतारा जा सकेगा। यह बात अभ्यास के लिये है। जब आदत ठीक हो जाय तो शाक मिलाकर भी खा सकते हैं।
🔴 3. भोजन अधिक मात्रा में न हो —आधा पेट भोजन, एक चौथाई जल, एक चौथाई सांस आने-जाने के लिये खाली रखना चाहिए। अर्थात् भोजन आधे पेट किया जाय।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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