अन्तःकरण की दूसरी विशेषता है ‘चित्’। उच्चस्तरीय आस्थाओं, मान्यताओं एवं आदर्शों से युक्त व्यक्ति ‘चित्’ परायण कहलाता है। चित् अर्थात् स्वयं के विषय में उत्कृष्टतापूर्ण मान्यता, अपने लक्ष्य के प्रति चेतनता, सजगता। ये वे निष्ठाएँ हैं जो मनुष्य की जीवनयात्रा की रूपरेखा बनाती हैं। देवत्व में आस्था, आदर्शवादी उत्कृष्टता में अटूट विश्वास, सर्वोच्च सत्ता के प्रति समर्पण भाव ‘चित्’ के परिष्कृत स्वरूप हैं।
ऐसे व्यक्ति लोकसेवी का- समर्पित व्यक्ति का-जीवन जीते हैं। आदर्शों की बलिवेदी पर वे अपने समस्त स्वार्थों को होम देते हैं। उनकी सारी मान्यताएँ चिन्तन का खाका, व्यक्तित्व का ढाँचा इस तरह विनिर्मित होता है कि संपर्क में आया व्यक्ति भी उच्चस्तरीय जीवन की ओर अभिमुख हो जाता है। शहीद, समाज सुधारक, लोकसेवी, सन्त, सामान्य, परजीवट के धनी व्यक्ति इसी श्रेणी में आते हैं। वे जो जीवन जीते हैं, आदर्शों रूपी ईश्वर को समर्पित होता है। अपनी निष्ठाओं के आधार पर वे स्वयं तो उच्च प्रगतिशीलता की भूमिका को प्राप्त होते ही हैं, सहज श्रद्धा व जन-सम्मान के भी पात्र बनते हैं। अध्यात्म उनके भीतर से प्रस्फुटित होता रहता है। क्रियाओं में, विचारणा में, भाव संवेदनाओं में प्रभु स्वयं आदर्शों के रूप में प्रतिभासित होते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति अहंकार से कोसों दूर होते हैं। लोकेषणा से दूर वे जनसेवा को ही, उदारता-करुणा विस्तार को ही अपना परम लक्ष्य मानते हैं, इसी को उपासना कहते हैं।
‘चित्’ एक ऐसा गुण है जो परिष्कृत स्वरूप में व्यक्ति को महामानव बना देता है। पर जब यही विकृति की ओर अग्रसर हो जाता है, तो अनेकानेक समस्याओं, मानसिक असन्तुलनों एवं शारीरिक सन्तापों को जन्म देता है। आदर्शवादिता से निष्ठा हटते ही पतन तेजी से होता है। दृष्टि बहिर्मुखी होने के कारण स्वयं के विषय में मान्यताएँ गरिमायुक्त नहीं रहतीं। श्रेष्ठ चिन्तन का अभाव एवं उत्कृष्टता के प्रति अनास्था अन्ततः उद्दंडता को जन्म देती है। विकृत चिन्तन से सद्विचारों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सिद्धान्तों के प्रति-अपनी दिव्यताओं के प्रति अनास्था मनुष्य को एकाँगी, स्वार्थी एवं अहंकारी बना देती है।
सच्चिदानंद का तीसरा व अन्तिम पक्ष है ‘आनन्द’। इसके बिना आत्मा की परिपूर्ण व्याख्या सम्भव नहीं। जीवात्मा का लक्ष्य ही आनन्द है। इसे परिष्कृत भाषा में कहा गया हैं “रसो वै सः” -वह परमात्मा रस से आनन्द से परिपूर्ण है। इस रस को प्राप्त करने के लिए विभिन्न मार्गों से साधक पुरुषार्थ करता है एवं सन्तोष का आनन्द लेता है। इस रस का अन्तरंग पक्ष है- भाव संवेदनाओं से लबालब अन्तःकरण। करुणा, दया, सेवा, भावना, भक्तिभाव रस के परिष्कृत स्वरूप हैं। जब इनका विकास महज स्वाभाविक रूप से होता है, तो ये व्यक्ति को भावनात्मक दृष्टि से ऊँचा उठाते हैं। ऐसे महामानव विश्व मानवता की सेवार्थ अपने जीवन की आहुति दे देते हैं। इन्द्रियों से प्राप्त होने वाला आनन्द क्षणिक है, ऐसी मान्यता रखने वाले ये महापुरुष अपनी क्षमताओं को पूरा उपयोग उच्च उद्देश्यों की ओर नियोजित करने में करते हैं। जमा करने में नहीं, वितरण में विश्वास रखते हैं। परस्पर सौहार्द्र की वृद्धि ही उनका लक्ष्य होता है। उन्हें सद्विचारों, सद्भावनाओं एवं सत्कर्मों में रस आता है। यह अक्षुण्ण आनन्द उन्हें जिस ऊँचाई तक ले जाता है, उसे पाकर भौतिक आकर्षण उन्हें प्रलोभित कर नहीं पाता।
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1981
शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।
Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP
📢 Official WhatsApp Channel
📱 Official WhatsApp Number
8439014110
📸 Official Instagram
𝕏 Official X (Twitter)
✈️ Official Telegram
Shivir Permission:
Online Donation Link:
धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।
Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe