आत्मा अनन्त शक्तियों का भण्डार होती है। संसार की ऐसी कोई भी शक्ति और सामर्थ्य नहीं, जो इस भंडार में न होती हो। हो भी क्यों न? आत्मा परमात्मा का अंश जो होती है। सारी शक्तियाँ, सारी सामर्थ्य और सारे गुण उस एक परमात्मा में ही आते हैं। अस्तु अंश आत्मा में अपने अंशी की विशेषतायें होनी स्वाभाविक हैं। आत्मा में अपने अंशी की विशेषतायें होनी स्वाभाविक हैं। आत्मा में विश्वास करना, परमात्मा में विश्वास करना है। जिसने आत्मा के माध्यम से परमात्मा में विश्वास कर लिया, उसका सहारा ले लिया, उसे फिर किस बात की कमी रह सकती है। ऐसे आस्तिक के सम्मुख शक्तियाँ अनुचरों के समान उपस्थित रहकर अपने उपयोग की प्रतिक्षा किया करती हैं।
किन्तु आत्मा का शक्ति-कोश अपने आप स्वयं नहीं खुलता। उसे खोलना पड़ता है। इस उद्घाटन की कुँजी है शुभ संकेत। अर्थात् ऐसे विचार जिनका स्वर हो कि- “मैं अमुक कार्य कर सकता हूँ।” मुझमें उसे पूरा कर सकने का साहस है, उत्साह है और शक्ति भी है। मेरा पुरुषार्थ से अनुराग है, उत्साह है और उद्योग करना मेरा प्रियतम वासना है। विघ्न-बाधाओं से मुझे कोई भय नहीं, क्योंकि संघर्ष को मैं जीवन की एक अनिवार्य प्रतिक्रिया मानता हूँ। मैं मनुष्य हूं। मेरे जीवन का एक निश्चित उद्देश्य है। उसे पूरा करने में अपना तन, मन और जीवन लगा दूँगा। सफलता की प्राप्ति आसक्ति और असफलता के प्रति भय मेरी वृत्ति के अवयव नहीं हैं। मैं भगवान कृष्ण के अनासक्त कर्मयोग का अनुयायी हूँ। सफलता मुझे मदमत्त और असफलता मुझे निरस्त नहीं कर सकती। मुझे ज्ञान है कि लक्ष्य की प्राप्ति और उद्देश्य की पूर्ति सफलता, असफलता के सोपानों पर चलकर ही हो सकती है। मैं अखण्ड आत्म-विश्वासी हूँ। मैं यह कार्य अवश्य कर सकता हूँ और निश्चय ही करके रहूँगा।”
आत्मविश्वास का क्या अर्थ है? | Aatmvishwas Ka Kya Arth Hai? | https://youtu.be/Jt2fHj3r1Ug?si=2-cX4kMksMPdv_so
इस प्रकार के शुभ और सृजनात्मक संकेत देते रहने से आत्मा का कमल-कोश खुल जाता है और उसमें सन्निहित शक्तियाँ एकत्र होकर व्यक्ति की क्रिया में समाहित हो जाती हैं। वह अपने अक्षय, उत्साह साहस और आशा का अनुभव करने लगती हैं। और कदम-कदम पर लक्ष्य स्पष्ट से स्पष्टतर और दूर से सन्निकट होता दिखलाई देने लगता है। शुभ संकेतों से उद्बुद्ध आत्म-विश्वास केवल आत्मा तक ही सीमित नहीं रहता, वह क्रियाओं, प्रक्रियाओं और सिद्धि तक फैल जाता है।
इसके विपरीत आत्मनिषेधी व्यक्ति अपनी सारी शक्तियों को नकारात्मक बनाकर नष्ट कर लेता है। आत्मनिषेधी आसुरी वृत्ति है और आत्म विश्वास, देव वृत्ति आत्मा की शिव शक्ति आसुरी वृत्ति वाले का सहयोग कर भी किस प्रकार सकती है। जो नास्तिक बनकर परमात्मा को छोड़ देता है, परमात्मा उसे उससे पहले ही छोड़ देता है। जिसे परमात्मा ने छोड़ दिया, प्रभु जिससे विमुख हो गया, उसके लिए लोक-परलोक, आकाश-पाताल कहीं भी कल्याण की सम्भावना किस प्रकार हो सकती है। ऐसे नास्तिकवादी और आत्मनिषेधी की नाव भवसागर के बीच डूब जाना निश्चित है।
.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1970
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