रविवार, 12 अप्रैल 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 12 April 2026



Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 April 2026

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 कर्मयोग का रहस्य (अंतिम भाग)

यदि आप किसी मनुष्य या पशु का खून बहता हुआ देखो तो कपड़े के लिये इधर−उधर मत भागे फिरो, बल्कि अपनी धोती या कमीज में से, कुछ परवा नहीं कितना भी कीमती हो एक टुकड़ा फाड़ कर उसके पट्टी बाँध दो, यदि वह कीमती रेशमी कपड़ा भी है तो भी उसको फाड़ने में शंका मत करो, यह सच्चा कर्मयोग है। यह आपके हृदय को जाँचने के लिये काँटा है, आपमें से कितनों ने इस प्रकार की सेवा की है, यदि अभी तक आपने ऐसा नहीं किया है तो आज से शुरू कर दो।

जब आपका पड़ौसी या कोई निर्धन आदमी रोगग्रस्त हो तो उसके लिये अस्पताल से दवाई ला दो। सावधानी से उसकी सेवा करो, उसके कपड़े खाने के बर्तन और टट्टी−पेशाब के बर्तन साफ करो, यह अनुभव करो कि उस रोगी मनुष्य के रूप में आप ईश्वर की सेवा कर रहे हो। इस प्रकार आपका मन बहुत ऊँचा उठ जावेगा और दैवी प्रेरणा प्राप्त होगी, उससे हर्ष−दायक शब्द कहो, उसके पंगग के पास बैठो। उसके स्वस्थ होने के लिए प्रभु से प्रार्थना करो। इस प्रकार के कर्मों से आप में दया और प्रेम की वृद्धि होने में सहायता मिलेगी, इसमें घृणा, द्वेष और शत्रुता का नाश होगा और आप दैवत्व में बदल जाओगे।

जैसा आप चाहते हो कि दूसरे आपके साथ बर्ताव करें वैसा आप भी उनके साथ करो, इस नीतिवाक्य को याद रखो। नित्य के जीवन−व्यवहार में यह आपका आचार−नियम होना चाहिए, समस्त धर्मों का साराँश यही है, आप कोई अनुचित कर्म नहीं करोगे, आपको अमित आनन्द मिलेगा।

जब तुम बाजार में जाओ तो हमेशा अपनी जेब में कुछ पैसे डाले रखो और उन्हें गरीबों को बाँट दो। रेलवे प्लेटफार्म पर गरीब कुलियों से झगड़ा मत करो, उदार बनो उन्हें चार आने या आठ आने दो। अनुभव करो कि सारी देहों में आप ही रम रहे हो, आपका हृदय विशाल हो जावेगा, आप एकत्व का अनुभव करने लगोगे, आप और भी उदार बन जाओगे।

"जप प्रक्रिया का वैज्ञानिक रहस्य: कैसे काम करती है मंत्र शक्ति?" | https://youtu.be/BO_pDMHTlBI?si=MzQSfXQfSm4xCGst

आप दवाइयों की एक पेटी अपने साथ रख सकते हो और गरीब रोगियों की चिकित्सा कर सकते हो, होम्योपैथिक दवाइयों का इलाज कोई हानि नहीं करता है। पुस्तक देख देखकर अप दवाई दे सकते हो। किसी बायोकैमिस्ट से मिलकर अपना सन्देह दूर कर सकते हो। ऐसी सेवा से आपको बहुत आनन्द मिलेगा, इससे चित्त−शुद्धि बहुत होती है।

महात्मा गाँधी की आत्मकथा पढ़िए। वह सम्मानित कार्य और तुच्छ नीच सेवा में भेद नहीं समझते थे। उनके लिये झाडू लगाना और टट्टी साफ करना बहुत बड़ा योग है। उन्होंने स्वयं टट्टियाँ साफ की हैं। अनेक प्रकार की सेवाएँ कर करके, उन्होंने इस मोहकारक ‘मैं’ को बिल्कुल ही नष्ट कर रखा है। बहुत से उच्च शिक्षा प्राप्त सज्जन इनके आश्रम में योग सीखने के लिये आये। वे सोचते थे कि महात्मा गाँधी जी उनको एकान्त कमरे में या परदे के पीछे विचित्र रीति से प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, कुण्डलिनी, योगादि की शिक्षा देंगे, परन्तु जब उनसे कहा गया कि सबसे पहले टट्टियाँ साफ करो तो उनको बड़ी निराशा हुई और वे एकदम आश्रम छोड़कर चले गये।

प्रति दिन जितने अधिक सत्कार्य हो सकें करिये, सोते समय अपने दिन भर के कार्यों की परीक्षा कीजिए और नित्य अपनी आध्यात्मिक डायरी नोट कीजिए। सत्कार्य करना ही आध्यात्मिक जीवन का उदय है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 2)

कर्मयोग, भक्ति योग, अथवा ज्ञानयोग के साथ मिला होता है। जिस कर्मयोगी ने भक्ति योग से कर्मयोग को मिलाया है उसका निमित्त भाव होता है, वह अनुभव करता है कि ईश्वर सब कुछ कार्य कर सकता है और वह ईश्वर के हाथों में निमित्त मात्र है, इस प्रकार वह धीरे−धीरे कर्मों के बन्धन से छूट जाता है, कर्म के द्वारा उसे मोक्ष मिल जाती है। जिस कर्मयोगी ने ज्ञानयोग और कर्मयोग को मिलाया है वह अपने कर्मों से साक्षी भाव रखता है। वह अनुभव करता है कि प्रकृति सब काम करती है और वह मन और इन्द्रियों की क्रियाओं और जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी भाव रख कर कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त करता है।

कर्मयोगी निरन्तर निःस्वार्थ सेवा से अपना चित्त शुद्ध कर लेता है। वह कर्म फल की आशा न रखता हुआ कार्य करता है, वह अहंकारहीन अथवा कर्तापन के विचार रहित होकर कार्य करता है, वह हर एक रूप में ईश्वर को देखता है, वह अनुभव करता है कि सारा संसार परमात्मा के व्यक्ति त्व का विकास है और यह जगत वृन्दावन है। वह कठोर ब्रह्मचर्य−व्रत पालन करता है, वह करता हुआ मन से ‘ब्रह्मार्पणम्’ करता रहता है, अपने सारे कार्य ईश्वर के अर्पण करता है और सोने के समय कहता है—’हे प्रभु! आज मैंने जो कुछ किया है आपके लिए है, आप प्रसन्न होकर इसे स्वीकार कीजिए। वह इस प्रकार कर्मों के फल को भस्म कर देता है और कर्मों के बन्धन में नहीं फँसता, वह कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है, निष्काम कर्मयोग से उसका चित्तशुद्धि होता है और चित्तशुद्धि होने पर आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है। देश सेवा, समाज सेवा, दरिद्र सेवा, रोगी सेवा, पितृ सेवा गुरु सेवा यह सब कर्मयोग है। सच्चा कर्मयोगी दास कर्म और सम्मान पूर्ण कर्म से भेद नहीं करता, ऐसा भेद अन्य जन ही किया करते हैं, कुछ साधक अपने साधन के प्रारम्भ में बड़े विनीत और नम्र होते हैं, परन्तु जब उन्हें कुछ यश और नाम मिल जाता है तब वे अभिमान के शिकार बन जाते हैं।

विश्वास की परीक्षा संकट में होती है | Vishwas Ki Pariksha Sankat Me Hoti Hai | https://youtu.be/8jct8C3Nw0I?si=8V3sBHPLdjdh6V3f

पश्चिम में तथा अमरीका में बहुत से धनी लोग बेशुमार दान करते हैं, वे बड़े बड़े अस्पताल और बड़ी बड़ी संस्थाएँ बनाते हैं। वे यह सब कुछ केवल सहानुभूति और मनुष्य जाति पर दया करने के नाते ही करते हैं, उनके लिए यह सब समाज सेवा है और ईश्वर समाज का आधार है और मनुष्य ईश्वर का व्यक्तित्व प्रकट करता है। वे अभिमान रहित होकर कर्त्तापन की बुद्धि को छोड़ कर और फल की आशा को छोड़कर सेवा नहीं करते, उनके लिए यह सेवायोग (कर्मयोग) नहीं है। उनके वास्ते यह सेवा केवल दान विषयक कर्म है, उनके लिए सेवा केवल मनुष्यता का धर्म है, उनमें किसी दर्जे तक मनुष्य−जाति के लिये सहानुभूति इस सेवा के द्वारा बढ़ जाती है, उनको कर्मयोग के अभ्यास से चित्त शुद्धि करके आत्मज्ञान प्राप्त करने का विचार नहीं आता, उनको जीवन के लक्ष्य (उद्देश्य) का कुछ ज्ञान नहीं होता, उनको ईश्वर की सत्ता में भी दृढ़ विश्वास नहीं होता। जो कर्मयोग के सिद्धान्त को समझकर ईश्वर की सत्ता में दृढ़ विश्वास रखते हुए कर्म करते हैं वे अपने लक्ष्य को जल्दी पहुँच जावेंगे।

कर्मयोग के अभ्यास के लिए बहुत धन होना आवश्यक नहीं है, आप अपने धन और मन से सेवा कर सकते हैं। यदि किसी निर्धन रोगी को सड़क के किनारे पड़ा हुआ देखो तो उसको थोड़ा जल या दूध पीने को दो, मीठे आश्वासन से उसको प्रसन्न करो, उसको ताँगे में बैठाओ और पास के अस्पताल में ले जाओ, यदि तुम्हारे पास ताँगे का किराया देने के लिये पैसा नहीं है तो रोगी को अपनी पीठ पर उठाकर ले जाओ और उसको अस्पताल में दाखिल कराने का इन्तजाम कर दो। यदि तुम इस प्रकार सेवा करोगे तो तुम्हारा चित्त जल्दी शुद्ध हो जावेगा। निर्धन, निःसहाय मनुष्यों की इस प्रकार की सेवा से परमात्मा ज्यादा खुश होता है, न कि धनी लोगों की शान−शौकत से की हुई सेवा से।

यदि किसी के शरीर के किसी अंग में घोर पीड़ा हो तो उसके उस अंग को धीरे−धीरे दबाओ और अपने हृदय से प्रार्थना भी करो कि हे भगवान इस मनुष्य का दुःख दूर कर इसको शान्ति में रहने दे और इसका स्वभाव अच्छा हो जावे।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 1)

मनुष्य−समाज की स्वार्थहीन सेवा कर्मयोग है। यह हृदय को शुद्ध करके अन्तःकरण को आत्मज्ञान रूपी दिव्य ज्योति प्राप्त करने योग्य बना देता है। विशेष बात तो यह है कि बिना किसी आसक्ति अथवा अहंभाव के आपको मानव−जाति की सेवा करनी होगी। कर्मयोग में कर्मयोगी सारे कर्मों और उनके फल को भगवान के अर्पण कर देता है। ईश्वर में एकता रखते हुए, आसक्ति को दूर करके सफलता व निष्फलता में समान रूप से रह कर कर्म करते रहना कर्म−योग है।

जैमिनी ऋषि के मतानुसार अग्निहोत्रादि वैदिक कर्म ही कर्म है। भगवद्गीता के अनुसार निष्काम भाव से किया हुआ कोई भी कार्य कर्म है। भगवान् कृष्ण ने कहा है निरन्तर कर्म करते रहो, आपका धर्म फल की चाहना न रखते हुए कर्म करते रहना ही है। गीता का प्रधान उपदेश कर्म में अनासक्ति है। श्वास लेना, खाना, देखना, सुनना, सोचना सब कर्म हैं।

अपने गुरु या किसी महात्मा की सेवा कर्मयोग का सर्वोच्च रूप है। इससे आपका चित्त जल्दी शुद्ध हो जावेगा। उनकी सेवा करने से उनके दिव्य तेज का आप के ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। आपको उनसे दैवी प्रेरणा प्राप्त होगी। शनैः शनैः आप उनके सद्गुणों को ग्रहण कर लोगे।

अमृतवाणी:- ज्ञान योग और कर्म योग | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी, https://youtu.be/NoIeQYYdBzk?si=e0hTBNNEXflBL-K5

कर्म योगी का विशाल हृदय होना चाहिये। उसमें कुटिलता, नीचता कृपणता और स्वार्थ बिल्कुल नहीं होना चाहिए, उसे लोभ, काम, क्रोध और अभिमान रहित होना चाहिए। यदि इन दोषों के चिन्ह भी दिखाई देवें तो उन्हें एक एक करके दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए, वह जो कुछ भी खाय उसमें से पहले नौकरों को देना चाहिये, यदि कोई निर्धन रोगी दूध की चाहना रखकर उसी के घर आये और घर में उसी के लिए दूध नहीं बचा हो तो उसे चाहिये कि अपने हिस्से का दूध फौरन ही उसे देदे और उससे कहे कि ‘हे नारायण! यह दूध आपके वास्ते है, कृपा कर इसे पीलो, आपकी जरूरत मुझसे ज्यादा है।’ तब ही वह सच्ची उपयोगी सेवा कर सकता है।

कर्मयोगी का स्वभाव प्रेमयुक्त, मिलनसार, समाज−सेवी होना चाहिए। उसे जाति, धर्म या वर्ण के विचार बिना हर एक व्यक्ति के साथ मिलना चाहिए, उसमें सहनशीलता, सहानुभूति, विश्व−प्रेम, दया और सबमें मिल जाने की सामर्थ्य होनी चाहिये। उसे दूसरों के स्वभाव और रीति से संयोग रखने की क्षमा होनी चाहिये, उसे उपस्थित बुद्धि होनी चाहिये, उसका मन शान्त और सम होना चाहिये। उसे दूसरों की उन्नति में प्रसन्न होना चाहिये, उसको सारी इन्द्रियों पर पूरा संयम होना चाहिये, और हर एक वस्तु केवल अपने ही लिए चाहता है तो वह अपनी सम्पत्ति दूसरों को कैसे बाँट सकता है, उसे अपने स्वार्थ को जला डालना चाहिए।

ऐसा ही मनुष्य अच्छा कर्मयोगी बन सकता है और अपने लक्ष्य को जल्दी प्राप्त कर लेता है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

🙏 गुरुदेव के विचारों को सुनने के लिए चैनल को Subscribe करें और वीडियो को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe 

👉 Official Youtube Channel Shantikunj Rishi Chintan को आज ही Subscribe करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 पाप से सावधान! (भाग 1)

पाप एक ऐसी दुष्प्रवृत्ति है, जो नाना रूप आकृति और अवस्थाओं में मनुष्य पर आकर्षण किया करती हैं। कहते हैं, मनुष्य के मन के किसी अज्ञात कोने में शैतान का भी निवास है। जहाँ पुष्पों से सुरभित कानन का सुन्दर स्थल है, वहाँ कांटों से भरे बीहड़ भी हैं। जहाँ ज्ञान का प्रकाश है, वहीं कहीं कहीं घनघोर अन्धकार भी है। यही अन्धकार पाप की ओर प्रवृत्त कर मनुष्य के अधः पतन का कारण बनता है।

पाप की ओर प्रवृत्त करने वाला मनुष्य का अज्ञान है। अज्ञान के अन्धकार में उसे उचित अनुचित का विवेक नहीं रहता, वह वासना के वशीभूत हो उठता है और किसी न किसी रूप में पतन के ढाल मार्ग पर आरुढ़ हो जाता है।

पाप पशुत्व है, मनुष्य के शरीर मन और आत्मा का नारकीय बन्धन है, दुखदायी नर्क में ले जाने वाला दैत्य है। वास्तव में इनका निर्माण इसलिए किया गया है कि मनुष्य की परीक्षा प्रतिपल प्रतिक्षण होती चले।

ध्यान:- प्रतिकूलताओं का ध्यान | Prtikultaon Ka Dhyan |  https://youtu.be/X2-8zjy15d0?si=Efh_OY2CcF02qc30

काम, क्रोध, लोभ, मोह, असन्तोष, निर्दयता, असूया, अभिमान, शोक, स्पृहा, ईर्ष्या और निन्दा— मनुष्य में रहने वाले ये बारह दोष तनिक सा अनुकूल अवसर पाते ही उत्तरोत्तर बढ़ने लगते हैं।

मुनि सनत्सुजात के अनुसार, “जैसे व्याध मृगों को मारने का अवसर देखता हुआ उनकी टोह में लगा रहता है, उसी प्रकार इनमें से एक एक दोष मनुष्यों का छिद्र देखकर उस पर आकर्षण करता है।”

अपनी बहुत बड़ाई करने वाला, लोलुप, अहंकारी, क्रोधी, चञ्चल और आश्रितों की रक्षा न करने वाले—ये छः प्रकार के मनुष्य पापी हैं। महान् संकट में पड़ने पर भी ये निडर होकर इन पाप कर्मों का आचरण करते हैं। सम्भोग में ही मन रखने वाला, विषमता रखने वाला, अत्यन्त भारी दान देकर पश्चाताप करने वाला, कृपण, काम की प्रशंसा करने वाला तथा स्त्रियों के द्वेषी—ये सात और पहले के तेरह प्रकार के मनुष्य नृशंस वर्ग के कहे गए हैं। सावधान रहें!

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 11 April 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 April 2026

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 10 April 2026



Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 April 2026



Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 7 April 2026



Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 April 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 6 April 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe


👉 बातें नहीं काम कीजिये

अनेक व्यक्तियों के मस्तिष्क उत्तम 2 विचारों से परिपूर्ण है और उनकी प्राप्ति के लिए अनेक सुविधायें भी उन्हें उपलब्ध हैं। सफलता की अनेक युक्तियाँ भी उनके पास हैं। किंतु फिर भी क्या कारण हैं कि वे लोग आगे नहीं बढ़ पाते हैं?

इनके व्यक्तित्व की त्रुटि यह है कि ये कागजी योजनायें तो यथेष्ट बनाते हैं, परन्तु स्वयं के विचारों को कार्यरूप में परिणत नहीं करते। विचार यदि निष्क्रिय हैं तो वे कल्पना के रंगीन महत्व के ही समान है, जिनमें न तो दृढ़ता ही है और न स्थायित्व। बात को सोचना एक चीज है, उसको कार्यरूप में परिणत करके स्वयं वैसा ही बन जाना दूसरी चीज है।

सफल व्यक्ति कार्य को क्रियात्मक रूप से कर देने में विश्वास करते थे। उनके आन्तरिक जीवन तथा बाह्य क्रियात्मक जीवन में पूर्ण साम्य था। कार्य संसार को संचालन करने वाली शक्ति है। जो कार्य को कर डालता है, उसके अंग, मस्तिष्क, स्मृति, अनुभव की वृद्धि होती है। जो केवल सोचता है, वह जहाँ का तहाँ रु का रहता है।

नेपोलियन पढ़ा लिखा नहीं था। अधिक सोचता नहीं था। वह कार्य करने का प्रेमी था। “मुझे बड़ी-बड़ी योजनाएं मत बताओ, जो मैं कर सकूँ, वही मुझे चाहिये।” यही उसका उद्देश्य था।

शिवाजी की शिक्षा कितनी थी? अकबर ने कौन सी डिग्री डिप्लोमा प्राप्त किये थे? महाराज रणजीत को एक नेत्र से कम दीखता था, पर अपनी अद्भुत कार्य करने की शक्ति द्वारा उन्होंने प्रसिद्धि प्राप्त की थी।

अँग्रेजी में एक कहावत है कि “नर्क की सड़क उत्तम योजनाओं से परिपूर्ण है।” अभिप्राय यह है कि जो गरजते हैं, सो बरसते नहीं। रावण के पास अमृत के घड़े रखे रहे किंतु उसको उन्हें पान करने का अवसर ही प्राप्त न हुआ। वह अपने बल में विश्वास रखे, निष्क्रिय जीवन व्यतीत करता रहा।

हैमलेट नामक राजकुमार की कठिनाई का हाल प्रत्येक व्यक्ति ने सुना है। “करूं या न करूं”? इसी दुविधा में वह सदैव फँसा रहा, एक पग भी आगे न बढ़ सका। उसका अधिक सोचना, योजनायें बनाना व्यर्थ रहा।

यही उसकी असफलता का कारण बना। जो हैमलेट की समस्या थी, वही आज के अनेक व्यक्तियों की है।

Ep:- 1/21 भावी विभीषिकाएं और उनका प्रयोजन | महाकाल और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया | https://youtu.be/baOpgE_Lgck?si=8B95APnzAPzmYgpS

क्या लाभ है उस विचार से जिस पर काम न किया जाय? यह वैसा ही है, जैसा एक बीज, जो बञ्जर भूमि पर पड़ गया हो और अँकुरित न हो सका हो। यह वह पुण्य है, जो फड़कर फल का उत्पादन नहीं करता। व्यर्थ ही खिलकर अपनी पंखुरियाँ इधर-उधर छितरा देता है।

कार्य न करने वाला व्यक्ति एक प्रकार का शेखचिल्ली है। वह बड़ी योजनाएं बनाता है, बढ़-2 बातें करता है, शब्दों के माया जाल की उसके पास न्यूनता नहीं होती है। वह बात करने में आगे, पर काम में पीछे रहता है, कहेगा मन भर कार्य न करेगा, रत्ती भर। ऐसे व्यक्ति निष्क्रिय, बेकार, कोरे बातूनी जमा खर्च करने वाले होते हैं उनसे महान् कार्य की आशा नहीं की जा सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि आप जो सोचे-विचारे या योजनाएं विनिर्मित करें, वे इस प्रकार की हो, जिन्हें कि आप कार्यरूप में परिणत कर सके। योजनाएं निर्माण करने के पूर्व सोचिये कि क्या आप उन्हें कर सकेंगे, क्या उनमें और आपकी शक्ति यों में अनुपात बराबर हैं, कहीं आप अपने सामर्थ्य से बाहर की बात तो नहीं सोच रहे हैं। जो योजना आपने बनाई हैं उसके लिये आपके पास क्या-2 साधन हैं। कितना धन है? कितने मित्र, बन्धु, बान्धव हैं। आर्थिक, शारीरिक, धार्मिक, सामाजिक स्थिति कैसी है। इन पर विचार करके ही किसी कार्य में हाथ डालें। कार्य की सफलता के लिये आपकी मानसिक, शारीरिक या क्रियात्मक शक्ति यों का एकीकरण आवश्यक है और इस एकीकरण को कार्य के उद्देश्य की ओर केन्द्रित करिये। मानसिक दृष्टि से सचेष्ट और जागृत रहिये। संकल्प शक्ति का विकास एवं संचालन जरूरी है। इन बातों पर भली भाँति विचार करने के पश्चात् कार्य करने से सफलता अवश्य मिलती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1956

👉 ध्यान-साधना की सिद्धि की सात कसौटियाँ (भाग 2)

महासिद्ध सरहपा कहते हैं कि साधक यदि अपने ध्यान को जाँचना चाहता है तो उसे निम्न मानदण्डों पर अपने को परखना चाहिए। 
1. आहार संयम, 
2. वाणी का संयम, 
3. जागरुकता, 
4. दौर्मनस्य का न होना, 
5. दुःख का अभाव, 
6. श्वास की संख्या में कमी हो जाना और 
7. संवेदनशीलता। 

ये सात ऐसे मानदण्ड हैं- जिनके आधार पर कोई भी साधक कभी भी अपने को जाँच सकता है कि उसकी ध्यान साधना कितनी परिपक्व और प्रगाढ़ हो रही है।
 
पहली कसौटी आहार संयम की है। ध्यान साधक में यदि आहार संयम सध रहा है तो समझना चाहिए उसका ध्यान भी सध रहा है। यह आहार संयम है क्या? तो इसके उत्तर में महान् योगी आचार्य शंकर कहते हैं- साधक को आहार कुछ इस तरह से लेना चाहिए जैसे कि औषधि ली जाती है। यानि की आहार वही हो और उतना ही हो जितना कि देह के पोषण के लिए पर्याप्त है। भगवद्गीता सात्त्विक आहार को परिभाषित करते हुए ध्यान साधक को ‘लघ्वाशी’ यानि कि कम खाने का निर्देश देती है। संक्षेप में ज्यों-ज्यों ध्यान प्रगाढ़ होता है साधक की स्वाद में रुचि समाप्त होती जाती है। ध्यान द्वारा मिलने वाली ऊर्जा बढ़ने के कारण उसका आहार भी बहुत न्यून हो जाता है।

ध्यान:- अंतदर्शन का ध्यान, Antdarshan Ka Dhyan | Shraddhey Dr. Pranav Pandya, 

दूसरी कसौटी है- वाणी संयम। वाणी संयम का अर्थ प्रायः लोग मौन होना समझ लेते हैं। लेकिन ऐसा उसी तरह से नहीं है जिस तरह से आहार संयम का अर्थ उपवास करना नहीं है। इसका अर्थ इतना भर है कि ध्यान साधना ज्यों-ज्यों प्रगाढ़ होती है, त्यों-त्यों अध्यात्म लोक के द्वार खुलते जाते हैं। ज्ञान और प्रकाश का एक नया लोक उसे मिल जाता है। फिर उसकी रुचि बेवजह की बातों में अपने आप ही समाप्त हो जाती है। इस क्रम में एक बड़ी रहस्यपूर्ण स्थिति भी आती है, जिसे केवल ध्यान साधक ही समझ सकते हैं कि ध्यान की प्रगाढ़ता में वाणी की अपेक्षा अन्तश्चेतना कहीं अधिक सक्रिय एवं प्रभावी होती है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 2003 पृष्ठ 3

🙏 गुरुदेव के विचारों को सुनने के लिए चैनल को Subscribe करें और वीडियो को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 April 2026

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

रविवार, 5 अप्रैल 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 5 April 2026



Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 April 2026



Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 क्रोध को शत्रु से कम मत समझिए (अंतिम भाग)

साधारण रूप में क्रोध को दो विचारों से दबाया जाता है। एक दबाया जाता है, इस भावना से कि धर्मात्मा-महात्मा कहलाकर यदि हम क्रोध करेंगे तो लोग हमें क्रोधी समझेंगे, कलंक लगेगा। इस भाव से दबाया हुआ क्रोध अन्ततः चमक ही उठता है। उसे छिपा के नहीं रखा जा सकता। दूसरा दबाना होता है इस भाव से कि इसके कारण हमारा आत्मिक पतन होगा। ऐसी भावना वाले क्रोध को छिपाते नहीं। वे कह देते हैं कि हम में क्रोध उत्पन्न हो गया है, हम उसे हटाने का प्रयत्न करते हैं। इस भाव से संयम करने वाला अन्त में इसे हटाने में सफल हो जाता है।

किसी व्यक्ति में जो भाव सब से अधिक स्थिर है, वही भाव अन्त में प्रगट होता है और वह मनुष्य वैसा ही बन जाता है।

जब समाज के अत्यधिक लोगों में क्रोधादि दुष्ट भावों की अतिशयता होती है तो यह सम्पूर्ण आकाश को भी ऐसे दुष्ट परमाणुओं से भरपूर कर देते हैं और यही कारण है, कि साँप, बिच्छू, मच्छड़, रोगाणु आदि विषैले कीट-पशुओं की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। ऐसे परमाणु को घटाये बिना इसकी बाढ़ रोकी नहीं जा सकती। पवित्र और उच्च भाव की साधना ही इसके निवारण के उपाय हैं। इसलिये हमें थोड़ी देर के लिये भी अपने में दुष्ट भावना को नहीं आने देना चाहिये।

साधकों के जीवन में पश्चात्ताप की विशेष आवश्यकता है और यों तो सभी मनुष्यों को ही इसकी आवश्यकता है। पश्चात्ताप से दुष्ट परमाणुओं के रंग फीके होकर गुलाबी रंग में परिणत हो जाता है। इससे भावी कल्याण की सम्भावना उत्पन्न होती है।

भगवान सब कर्मफलों के प्रदाता है और उन्हीं के पास सारे सुखैश्वर्य्य,कल्याण और आनन्द हैं। हमारा जब तक उनसे सीधा सम्बन्ध नहीं हो जाता, तभी तक उन वस्तुओं से हम वञ्चित से होते हैं। सीधा सम्बन्ध होने पर तो फिर इन वस्तुओं की कमी, कभी होती ही नहीं। उनसे सीधा सम्बन्ध जोड़ने के लिये हमें अपने में सब से प्रथम श्रद्धा लानी चाहिये। श्रद्धा को पनपाने के लिये नम्रता चाहिये। नम्रता, श्रद्धा का मूल है। मूल को शहों तक पहुँचाने वाली सूक्ष्म डोरियाँ हुआ करती हैं, जो शहौं से जल खींचकर मूल में पहुँचाती हैं और फिर मूल उसी रस का शाखा, प्रशाखा, पल्लवों और फलों तक पहुँचा देता है, जिससे सम्पूर्ण वृक्ष हरे-भरे वैभवपूर्ण हो जाते हैं। तो आध्यात्मिक नम्रता के वे दोनों रसवाही सूक्ष्म रज्जु पवित्रता तथा उदारता है। पवित्रता तथा उदारता का मूल केन्द्र परमात्मा है। अतः जब मानव के हृदय में श्रद्धा उपजती है, तब उसकी एक तन्तु नीचे जाती है, जो नम्रता कहलाती है और एक ऊपर में सुदृढ़ तना बन कर कर्म नाम धारण करती है। श्रद्धा की नींव की ओर बढ़ने वाले तन्तु नम्रता में दो सूक्ष्मतर तन्तु दांये-बांये फूट पड़ते हैं, जो पवित्रता और उदारता का रूप धारण कर, प्रभु के केन्द्रीय उत्स से प्रेम रस पान करती हुई उसे प्रवाहित करती चलती है और मूल को रस से भर कर पुनः उसके द्वारा वृक्ष के कण-कण में पहुँचा कर उसे सुशोभित कर देती है। यदि क्रोध रूपी कुठार द्वारा ये दोनों तन्तु काट दिये जायं, तो उस वृक्ष का शुष्क होकर नष्ट हो जाना, निश्चित सा है। इसीलिये भक्तगण पवित्रता और उदारता रूपी तन्तुओं को सावधानता पूर्वक अखण्डित रखने का प्रयत्न करें। क्रोध से दूर रहें।


✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1956

👉 क्रोध को शत्रु से कम मत समझिए (भाग 1)

हम सुना करते थे कि माता को, बच्चे को दूध पिलाते समय सदैव सांत्वना रहनी चाहिए और ऐसा भी सुना कि किसी माता ने क्रोध की हालत में अपने बच्चे को दूध पिलाया और बच्चा मर गया। इसी भाँति काम भाव विह्वल होकर यदि माता दूध पिलाती है, तो उसके बच्चे की आँखें दुखने लगती हैं और वह बड़ा होकर बड़ा कामुक हो जाता है-लोभ दशा में पिलाया तो वह शिशु निश्चय ही लोभी और असन्तोषी निकलेगा।

क्रोध आदि के परमाणु एक विशेष रंग लिये होते हैं और उसका विशिष्ट प्रभाव पड़ता है—यह अगले दिन हमने पढ़ा। प्रोफेसर गेट्स ने विभिन्न मानसिक अवस्थाओं में निकलने वाले श्वासों को लेकर, परीक्षण किया। श्वासों द्वारा निकली वायु को लेकर उसे हिम द्वारा शीतल की हुई नलियों में एकत्र किया तो देखा कि जब मनुष्य स्वाभाविक शान्त दशा में होता है तो उसके श्वासों का द्रव पदार्थ कोई रंग धारण नहीं करता। क्रोध दशा में इस द्रव का रंग भूरा होता है, दुःख में खाकी, और पश्चात्ताप काल में गुलाबी रंग का होता है। यह पदार्थ इतना विषैला होता है कि सुअर के बच्चे को इसकी टीका देने से वह बच्चा मर गया। घृणा और क्रोध की अवस्था में एक घण्टे में मनुष्य श्वासों से इतना विषैला द्रव्य निकलता है कि उससे बीस व्यक्ति मर सकते हैं।

इसके विपरीत आनन्द, उत्साह, प्रेम, उल्लास की अवस्था में श्वासों द्वारा जो द्रव निकलता है, वह बड़ी भारी शक्ति और आह्लाद का देने वाला होता है।

काम-क्रोध आदि के परमाणुओं से हमारा अनादिकाल का संग है। दैवी परमाणु भी सदा से हमारे साथ हैं। यह हमारे उपयोग के लिये हैं। काम न होता तो सन्तान कैसे पैदा होते, वंश-परम्परा कैसे चलती? लोभ-मोह न होते तो सन्तानों का पालन-पोषण कैसे होता? क्रोध न होता तो दुष्टों से रक्षा कैसे होती, बुराई का विध्वंस कैसे होता, इत्यादि-इत्यादि। हमने अपनी अज्ञानता के कारण उनका दुरुपयोग कर संसार में दुःखों की मात्रा बढ़ा दी। दुरुपयोग करने से तो दुःख होगा ही।

अमृतवाणी:- उपासना से हम निहाल हो गए | Upasana Se Hum Nihal Ho Gaye | https://youtu.be/BSnzxyEpN0I?si=vVi-ClaVmiqal5vt

जब हम में किसी भावों की अति हो जाती हैं तो हमारे श्वासों का रंग तदनुकूल बदलकर आकाश में जाते हैं और वहाँ से वैसे परमाणु खिंच- खिंच कर हम में भरने लगते हैं। यदि हम दैवी स्वभाव वाले हैं, तो दैवी गुण वाले परमाणु ही हमारे पास आयेंगे।

*हम में क्रोध की अवस्थिति होने के कारण आकाश से क्रोध के परमाणु आ-आकर हम में भरते रहते हैं, ऐसी दशा में क्रोध को बाहर से दबा देना भी सम्भव नहीं होता, यदि दबा भी देते हैं तो अन्ततः वे उग ही आते हैं। बड़े-बड़े साधक भी इसी कारण से इसे हटाने में असफल हो जाते हैं।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1956

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 ध्यान-साधना की सिद्धि की सात कसौटियाँ (भाग १)

ध्यान अध्यात्म पथ का प्रदीप है। ध्यान की ज्योति जिसमें जितनी प्रखर है, अध्यात्म पथ उसमें उतना ही प्रकाशित हो जाता है। परमहंस श्री रामकृष्ण देव अपने शिष्यों से कहा करते थे कि ध्यान की प्रगाढ़ता अध्यात्म ज्ञान की परिपक्वता का पर्याय है। वह कहते थे- ‘जिसे ध्यान सिद्ध है, समझना चाहिए उसे अध्यात्म सिद्ध है।’ ध्यान की इस महिमा से कम-ज्यादा अंशों में प्रायः सभी आध्यात्म साधक परिचित हैं। साधक समुदाय में हर किसी की यही कोशिश रहती है कि उसका ध्यान प्रगाढ़ हो। परन्तु किसी न किसी कारण से ऐसा नहीं हो पाता। यदि कभी हुआ भी तो उसकी सही परख नहीं हो पाती।
 
कैसे परखें अपने ध्यान को? क्या है ध्यान साधना के सिद्ध होने की कसौटियाँ? ये सवाल इन पंक्तियों को पढ़ रहे प्रत्येक साधक के मन में कभी न कभी पनपते रहते हैं। शायद इन क्षणों में भी कहीं मानस उर्मियों में तरंगित हो रहे हैं। इन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की चर्चा तो बहुत होती है। पर प्रायः सही समाधान नहीं जुट पाता। ध्यान के विषय में जब भी बात उठती है तो उसकी विधि प्रक्रियाएँ ही समझायी जाती हैं। इसकी सिद्धि के मानदण्ड क्या हैं? यह सवाल हमेशा अधूरा रह जाता है।

ध्यान प्रक्रिया की सूक्ष्मताओं पर और इसकी सिद्धि के मानदण्डों पर तन्त्र शास्त्रों एवं बौद्ध ग्रन्थों में काफी विस्तार से विचार किया गया है। बौद्ध सिद्ध सरहपा के अनुसार प्रायः साधक प्रकाश दिखना, विभिन्न रंग दिखना, अंतर्चक्षुओं के सामने अलौकिक दृश्यों का उभरना, आनन्द की अनुभूति होना आदि बातों को ध्यान सिद्धि का लक्षण मान लेते हैं। पर यथार्थता यह नहीं है। ऊपर गिनाए गए ये सभी लक्षण तो इतना भर सूचित करते हैं कि साधक ध्यान प्रक्रिया में गतिशील है। पर ये उसकी ध्यान सिद्धि की सूचना नहीं देते। ध्यान सिद्धि के मानदण्ड तो कुछ और ही हैं। शास्त्रकारों एवं सिद्धों ने इनकी संख्या काफी गिनायी है। लेकिन मुख्य तौर पर इन्हें सात तरीके से परखा-जाना जा सकता है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 2003 पृष्ठ 3


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe


शनिवार, 4 अप्रैल 2026

‼ क्रान्ति की त्रिवेणी ‼ ‼ शांतिकुंज ऋषि चिंतन ‼

विनाश की शक्तियाँ प्रबल होती हैं या सृजन अधिक शक्तिशाली होती हैं? यह प्रश्न वाणी से नहीं व्यवहार से- उत्तर से नहीं, उदाहरण से- अपना समाधान माँगता है। यह देवत्व की प्रतिष्ठा का सवाल है। हमें सृजन की समर्थता सिद्ध करनी होगी, ताकि संव्याप्त निराशा में आशा का आलेग उग सके। कोई आगे नहीं चलेगा तो पीछे वालों का साहस कैसे जगेगा? व्यवसायी की बुद्धि लेकर नहीं, शूरवीरों की साहसिकता को अपनाकर ही हमें वह करने का अवसर मिलेगा, जो अभीष्ट आवश्यक, उपयुक्त ही नहीं विशिष्ट आत्माओं के प्रस्तुत अवतरण का लक्ष्य भी हैं।

युग सृजन के पुण्य प्रयोजन की योजना बनाते रहने का समय बीत गया, अब तो करना ही करना शेष है। विचारणा को तत्परता में बदलने की घड़ी आ पहुँची। भावनाओं का परिपाक सक्रियता में होने की प्रतीक्षा की जा रही है। असमंजस में बहुत समय व्यतीत नहीं किया जाना चाहिए।

लक्ष्य विशाल और विस्तृत है। जन-मानस के परिष्कार के लिए प्रज्वलित ज्ञान-यज्ञ के, विचार क्रान्ति के, लाल मशाल के टिमटिमाते रहने से काम नहीं चलेगा। उसके प्रकाश को प्रखर बनाने के लिए जिस तेल की आवश्यकता है वह जागृत आत्माओं के भाव भरे त्याग बलिदान से ही निचोड़ा जा सकेगा। मनुष्य में देवत्व का उदय, संसार के समस्त उत्पादनों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण उपार्जन है। इस कृषि कर्म में हमें शीत, वर्षा की परवा न करते हुए निष्ठावान कृषक की तरह लगना चाहिए। धरती पर स्वर्ग का अवतरण नया नन्दन वन खड़ा करने के समान है। निष्ठावान माली की तरह हमारी कुशलता ऐसी होनी चाहिए जिससे सृष्टा के इस मुरझाये विश्व उद्यान में बसन्ती बहार ला सकने का श्रेय मिल सके। ऐसी सफलता लाने में खाद, पानी जुटाने से ही काम नहीं चलता उसमें माली को अपनी प्रतिभा भी गलानी, खपानी पड़ती है। भूमि और पौधों के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने वाले किसान और माली की तरह ही हमें देवत्व के उद्भव और स्वर्ग के अवतरण में जागृत आत्माओं को अपनी श्रद्धा और क्षमता का समर्पण प्रस्तुत करना होगा।

राज क्रान्ति का काम साहस और शस्त्र बल से चल जाता है। आर्थिक क्रान्ति साधन और सूझ-बूझ के सहारे हो सकते हैं। यह भौतिक परिवर्तन है जिनके लिए भौतिक साधनों से काम चल जाता है। हमें बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्रान्ति की त्रिवेणी का उद्गम खोजना और संगम बनाना है। इसके लिए चरित्र, श्रद्धा और प्रतिभा के धनी दधीचि के वंशजों को ही आगे आना और मोर्चा सम्भालना है। भवन, पुल, कारखाने आदि को वस्तु शिल्पी अपनी शिक्षा के सहारे बनाने में सहज ही सफल होते रहते हैं। हमें नये व्यक्ति, नये समाज और नये युग का सृजन करना है। जागृत आत्माओं का भाव भरा अनुदान ही यह प्रयोजन पूरा कर सकता है। इसकी याचना करने किसके पास जाया जाय? जिनके पास भावना है ही नहीं, जो कृपणता के दलदल में एड़ी से चोटी तक फंसे पड़े हैं उन दयनीय लोगों से क्या याचना की जाय? कर्ण जैसे उदार व्यक्ति ही मरणासन्न स्थिति में अपने दाँत उखाड़ कर देते रहे हैं, हरिश्चन्द्रों ने ही अपने स्त्री, बच्चे बेचे हैं। लोभग्रसितों को तो कामनाओं की पूर्ति कराने से ही फुरसत नहीं, देने का प्रसंग आने पर तो उनका कलेजा ही बैठने लगेगा।

व्यक्ति, परिवार और समाज की अभिनव रचना के लिए न तो साधनों की आवश्यकता है और न परिस्थिति के अनुकूल होने की। उसके लिए ऐसी प्रखर प्रतिभाएँ चाहिए जिनकी नसों में भाव भरा ऋषि रक्त प्रवाहित होता हो। चतुरता की दृष्टि से कौआ सबसे सयाना माना जाता है। शृंगाल की धूर्तता प्रख्यात है। मुर्दे खोद खाने में बिज्जू की कुशलता देखते ही बनती है। खजाने की रखवाली करने वाला सर्प लक्षाधीश होता है। भावनात्मक सृजन में तो दूसरी ही धातु से ढले औजारों की आवश्यकता है। आदर्शों के प्रति अटूट आस्था की भट्टी में ही ऐसी अष्टधातु तैयार होती है। आवश्यकता ऐसे ही व्यक्तित्वों की पड़ रही है जो अष्ट धातु के ढले हैं। लोक सेवा का क्षेत्र बड़ा है उसके कोंतरों में ऐसे कितने ही छद्म वेषधारी वंचक लूट-खसोट की घात लगाये बैठे रहते हैं, पर उनसे कुछ काम तो नहीं चलता। प्रकाश तो जलते दीपक से ही होता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1978

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 4 April 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe



👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 April 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

👉 समर्पण का सुख

दीपक जल रहा था। घृत चुकने को आया। लौ क्षीण हो चली। वायु के झोंकों ने देखा अब दीपक पर विजय पाना आसान है तो वे वृन्द−वृन्द मिलकर तेज आक्रमण करने लगे। अंधकार नीचे दबा पड़ा था-अट्टहास कर हँसा और बोला- दीपक अब तो तुम्हारा अन्त आ गया अब कुछ ही देर में यहाँ हमारा साम्राज्य होगा।

दीपक मुस्कराया और बोला- बन्धु यह देखना काम विधाता का है, मेरा ध्येय है प्रकाश के लिये निरन्तर जलना सो अब अन्त समय उससे विमुख क्यों होऊँ, यह कहकर वह एक बार इतने वेग से जला कि वहाँ का सम्पूर्ण अन्धकार सिमट कर रह गया, भले ही दूसरे क्षण दीपक का अस्तित्व स्वयं भी शेष न रहा हो।

अन्तरीप द्वीप से आया जीवन के संघर्ष और आँधियों से दुःखी एक नाविक जहाज से उतर कर बाहर आया। समुद्र के मध्य अडिग और अविचलित चट्टान की स्वच्छता को देखकर उसको कुछ शान्ति मिली। वह थोड़ा आगे बढ़ा और एक टेकरी पर खड़ा होकर चारों ओर दृष्टिपात करने लगा। उसने देखा समुद्र की उत्ताल तरंगें चारों ओर से उस चट्टान पर निरन्तर आघात कर रही हैं तो भी चट्टान के मन में न रोष है और न विद्वेष। संघर्ष पूर्ण जीवन पाकर भी उसे कोई ऊब और उत्तेजना नहीं है। मरने की भी उसने कभी इच्छा नहीं की।

अमृतवाणी:- श्रद्धा और विश्वास : भाग 1 | Pujay Gurudev Pt Shriram Sharma Acharya, https://youtu.be/SYNay1wQy-U?si=UTx0FFbqlXX-UAHI

यह देखकर नाविक का हृदय श्रद्धा से भर गया उसने चट्टान से पूछा- तुम पर चारों ओर से आघात लग रहे हैं फिर भी तुम निराश नहीं हो चट्टान। और तब चट्टान की आत्मा धीरे से बोली- तात, निराशा और मृत्यु दोनों एक ही वस्तु के उभय पृष्ठ हैं, हम निराश हो गये होते तो एक क्षण ही सही दूर से आये अतिथियों को विश्राम देने, उनका स्वागत करने से वंचित रह जाते। नाविक का मन एक चमकती हुई प्रेरणा से भर गया, जीवन में कितने संघर्ष आयें अब मैं चट्टान की तरह जिऊँगा ताकि हमारी न सही, भावी पीढ़ी और मानवता के आदर्शों की रक्षा तो हो सके।

एक था फूल एक था काटा दोनों हरे-भरे उद्यान में आजू-बाजू पल रहे थे। मानो प्रकृति ने उनको यह सन्देश देने को नियुक्त किया हो कि इस संसार की बनावट उभयनिष्ठ है, यहाँ सब कुछ सुखद और सौंदर्ययुक्त ही नहीं, दुःखद और कुरूपता भी उसका आवश्यक अंग है।

सुपात्र लोग स्वयं ही जुड़ते जायेंगे | Supatra Log Swayam Hi Judte Jayenge | https://youtu.be/10wWsEgmsW4?si=Idj9R-5HyQQXb_SX

काँटे ने कहा- प्यारे दोस्त? तुम्हें भी भगवान ने व्यर्थ ही बनाया, कितने कोमल हो तुम कि शीत और ताप के हलके झोंके भी सहन नहीं कर सकते? एक दो दिन खिलकर मुरझा जाने की तुम्हारी इस क्षण-भंगुरता पर तरस आता है, इधर देखो कितने दिनों से जी रहा हूँ, तुम्हारे कितने ही पूर्वजों को इसी डाली पर खिलते और मुरझा जाते मैंने देखा पर मेरा अब तक भी कुछ नहीं बिगड़ा, जानते हों क्यों? इसलिये कि मैं अपना जो कुछ है तुम्हारी तरह लुटाते नहीं, जो भी मेरे पास आता है, काट खाता हूँ लोग मुझसे भय खाते हैं, हाथ भी नहीं लगाते एक तुम हो चाहे जो, चाहे जब तोड़ ले और मरोड़ कर फेंक दे।

फूल ने कहा- बन्धुवर! तुम्हारा कहना यथार्थ है, किन्तु मैं क्या करूं मुझे मरने जीने का तो कभी ध्यान ही नहीं आता- उत्सर्ग मेरे जीवन का ध्येय बन गया है। मैं चाहता हूँ कि मेरा जीवन एक पल के लिये ही क्यों न हो पर ऐसा हो कि जो भी देखे प्यार और प्रसन्नता से गदगद हो जाये। किसी को यह कहने का अवसर न मिले कि भगवान् ने मेरे संसार को सुखद और सुन्दर न बनाकर दुःखदायी और कुरूप ही बनाया है।

काँटे का घमण्ड चकनाचूर हो गया, उस दिन से उसने ऐंठ छोड़कर फूलों की रक्षा को ही अपना कर्तव्यमान लिया।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1985

🙏 गुरुदेव के विचारों को सुनने के लिए चैनल को Subscribe करें और वीडियो को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 April 2026

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 3 April 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe



गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 2 April 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 1 April 2026



Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 2 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...