रविवार, 17 दिसंबर 2023

👉 उपासना का महत्व

ईश्वर उपासना को दैनिक जीवन में से बिल्कुल हटा देना किसी भी प्रकार से उपयुक्त नहीं। मन न लगने पर किसी न किसी प्रकार आदत में इसे सम्मिलित करने के लिए साधना का कुछ न कुछ अभ्यास नित्य ही करते रहना चाहिए।

आत्म-शक्ति जब कभी जिस किसी को प्राप्त हुई है तब उसमें आस्तिकता और उपासना का कोई न कोई अंश जरूर रहा है। भले ही हम बिस्तर से उठते और सोते समय पन्द्रह-पन्द्रह मिनट तक ही सर्वव्यापक, निष्पक्ष, न्यायकारी, विचार और कार्यों के अनुरूप प्रसन्न एवं अप्रसन्न होने वाले परमात्मा का ध्यान और स्मरण किया करें, पर किसी न किसी रूप में दैनिक उपासना तो किया करें।

इसमें प्रश्न फुरसत का नहीं, अभिरुचि का है। थोड़ी अभिरुचि इधर बढ़ते ही इस मार्ग में आनन्द आने लगता है और फुरसत भी मिलने लगती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (५.९)


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 15 Dec 2023

एकाँगी उपासना का क्षेत्र विकसित कर अपना अहंकार बढ़ाने वाले व्यक्ति , ईश्वर के सच्चे भक्त नहीं कहे जा सकते। परमात्मा सर्व न्यायकारी है। वह, ऐसे भक्त को जो अपना सुख, अपना ही स्वार्थ सिद्ध करना चाहता हो, कभी प्यार नहीं कर सकता। संसार के और भी जितने प्राणी हैं वह सब भी उसी परमात्मा के प्यारे बच्चे हैं। किसी के पास शक्ति कम है, किसी के पास गुण कम हैं, तो इससे क्या? अपने सभी बच्चे पिता को समान रूप से प्यारे होते हैं। जो उसके सभी बच्चों को प्यार कर सकता हो परमात्मा का वास्तविक प्यार उसे ही मिल सकता है। केवल अपनी ही बात, अपने ही साधन सिद्ध करने वाले व्यक्ति लाख प्रयत्न करके भी उसे प्राप्त नहीं कर सकते। 

निर्ममता और अहंकार से मुक्ति मिल गई इसका प्रमाण एकात्मवादी होकर नहीं दिया जा सकता। मनुष्य सबके प्रति उदारतापूर्ण व्यवहार करेगा तभी उसकी ममता का भाव नष्ट होगा। अहंकार भी, जब तक अपने आप में औरों के लिये त्यागपूर्वक न घुलाया जायगा तब तक, इससे मुक्त होना सम्भव नहीं। ईश्वर कभी किसी के सामने प्रत्यक्ष प्रकट नहीं हुआ। इसलिये वह प्रत्यक्ष सेवायें भी कभी नहीं ले सकता। उपासना और प्रार्थना से प्रभावित होकर मनुष्य रूप धारण कर कदाचित वह ईश्वर अपनी अनुभूतियों सहित भक्त के समक्ष उपस्थित हो जाता और वह अपना सर्वस्व अर्पण कर देता तो संभव था उस स्थिति से आत्म-सन्तोष हो जाता। पर परमात्मा के संसार में ऐसी व्यवस्था नहीं है। वह यदि अपने आराधक की मनोवृत्ति को देखना चाहेगा तो अपने किसी बालक को ही परीक्षा के लिये भेजेगा। 

“परमात्मा केवल एकान्तवासी को मिलते हैं और निर्ममता का अर्थ घर-बार छोड़कर योगी हो जाना है”-यदि ऐसा अर्थ लगाया जाय तो फिर हमारे ऋषियों की सारी व्यवस्था एवं भारतीय दर्शन की सारी मान्यता ही गलत हो जायेगी। जप, ध्यान या साधना की एक निश्चित सीमा होती है उसके बाद की साधना समाज और विश्व के हित साधन तथा लोक-मंगल में जुटने की होती है। ऋषि गृहस्थ थे, गृहस्थ में रहकर उन्होंने साधनायें कीं पर उन्हें कोई स्वार्थवादी नहीं कह सकता। वे समाज के हित के लिये अन्त तक लगे रहे। निर्ममता का अर्थ भी दरअसल “मैं और मेरे” का त्याग है। यह जो कुछ है परमात्मा का अंश है। परमात्मा के प्रत्येक अंश को पूजकर ही उसकी पूर्ण कृपा प्राप्त की जा सकती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

गुरुवार, 14 दिसंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 14 Dec 2023

🔶 जीवन का लक्ष्य खाओ पीओ मौज करो के अतिरिक्त कुछ और ही रहा होगा यदि हमने अपना अवतरण ईश्वर के सहायक सहयोगी के रूप में उसकी सृष्टि को सुन्दर समुन्नत बनाने के लिए हुआ अनुभव किया होता पर किया क्या जाय बुद्धिमान समझे जाने वाले मनुष्य पर अदूरदर्शिता और मूर्खता भी उतनी ही सघन बनकर छाई हुई है।

🔷 असत्य का मार्ग पकड़ कर लोग थोड़े दिनों तक लाभ अर्जित कर सकते हैं, अपनी आमदनी और इज्जत बढ़ा सकते हैं, अपनी शान-शौकत जताकर लोगों को थोड़े दिन तक उल्लू बना सकते हैं, किन्तु रामलीला के नकली रावण को जैसे ही दियासलाई लगती है, विशालकाय रावण थोड़ी ही देर में जलकर भस्म हो जाता है। वैसे ही असत्य का अनावरण एक न एक दिन होता ही है। स्थिरता केवल सचाई में है। उसको समझने में देर भले ही लग सकती है। अन्ततः विजय सत्य की होती है। “सत्यमेव जयते नानृतमः”।

🔶 सत्य-पथ का पथिक न कभी अशान्त होता है, न शोक करता है, न सन्ताप करता है। यह सब असत्य-परायणों के लिए ही निश्चित हैं। सत्य-परायण के लिए लोक में शान्ति एवं सम्मान तथा परलोक में स्वर्ग सुरक्षित रखा है, जिसे वह अधिकारपूर्वक प्राप्त करता है। सत्य का अनुसरण करने वाला क्या भौतिक और क्या आध्यात्मिक किसी भी क्षेत्र में असफल नहीं होता। सत्य बोलने, सत्य के अनुरूप सोचने और सत्य से स्वीकृत कर्म करने से ही मनुष्य सत्य-स्वरूप परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo


👉 सज्जनता घाटे में नहीं रहती

उदार-प्रकृति के लोग कई बार चालाक लोगों द्वारा ठगे जाते हैं और उससे उन्हें घाटा ही रहता है, पर उनकी सज्जनता से प्रभावित होकर दूसरे लोग जितनी उनकी सहायता करते हैं उस लाभ के बदले में ठगे जाने का घाटा कम ही रहता है । सब मिलाकर वे लाभ में ही रहते हैं ।

इसी प्रकार स्वार्थी लोग किसी के काम नहीं आने से अपना कुछ हर्ज या हानि होने का अवसर नहीं आने देते, पर उनकी कोई सहायता नहीं करता तो वे उस लाभ से वंचित भी रहते हैं । ऐसी दशा में वह अनुदार चालाक व्यक्ति, उस उदार और भोले व्यक्ति की अपेक्षा घाटे में ही रहता है ।

दुहरे बाँट रखने वाले बेईमान दुकानदारों को कभी फलते-फूलते नहीं देखा गया । स्वयं खुदगर्जी और अशिष्टता बरतने वाले लोग जब दूसरों से सज्ज्नता और सहायता की आशा करते हैं तो ठीक दुहरे बाँट वाले बेईमान दुकानदार का अनुकरण करते हैं । ऐसा व्यवहार कभी किसी के लिए उन्नति और प्रसन्नता का कारण नहीं बन सकता ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (५.१७)


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

मंगलवार, 12 दिसंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 12 Dec 2023

जो अपनी पैतृक सम्पत्ति को जान लेता है, अपने वंश के गुण, ऐश्वर्य, शक्ति,सामर्थ्य आदि से पूर्ण परिचित हो जाता है, वह उसी उच्च परम्परा के अनुसार कार्य करता है, वैसा ही शुभ व्यवहार करता है, उसी उत्कृष्ट भूमि में निवास करता है। जब तक किसी को अपने शील गुण और वंश का ज्ञान नहीं होता, तभी तक वह दीन स्थिति में रहता है।

ईश्वर हमको पिता होने के कारण कभी नहीं भूलता, हम ही उनको मूढ़तावश भूल बैठते हैं, यही दुःख का कारण है। वह पानी जैसी चीजों में रस की तरह है, सूर्य और चन्द्र में प्रकाश है, वेदों में ॐ है, आकाश में विस्तार है, मनुष्य में उनकी हिम्मत है, जमीन में खुशबू की तरह है, आग में उसकी दमक है और तपस्वियों में उनका तप है।

गीता के शब्दों में, “जो मुझे (ईश्वर को) सब जगह और सब चीजों को मेरे अन्दर देखता है, वह न कभी मुझसे पृथक होता है और न मैं उससे पृथक होता हूँ” जो मनुष्य एक मन एकाग्र होकर जानदारों के अन्दर सब घर में रहने वाले ईश्वर की पूजा करता है, वह योगी चाहे कहीं भी हो ईश्वर के अन्दर है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

*शांतिकुंज हरिद्वार के ऑफिशल व्हाट्सएप चैनल *awgpofficial Channel* को Follow करे*  
https://whatsapp.com/channel/0029VaBQpZm6hENhqlhg453J

Shantikunj Official WhatsApp Number

8439014110 शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 समाज निर्माणः-

(१) हममें से हर व्यक्ति अपने को समाज का एक अविच्छिन्न अंग मानें। अपने को उसके साथ अविभाज्य घटक मानें। सामूहिक उत्थान और पतन पर विश्वास करें। एक नाव में बैठे लोग जिस तरह एक साथ डूबते या पार होते हैं, वैसी ही मान्यता अपनी रहे। स्वार्थ और परमार्थ को परस्पर गुँथ दें। परमार्थ को स्वार्थ समझें और स्वार्थ सिद्धि की बात कभी ध्यान में आये तो वह संकीर्ण नहीं उदात्त एवं व्यापक हो। मिल जुलकर काम करने और मिल बाँटकर खाने की आदत डाली जाय।

(२) मनुष्यों के बीच सज्जनता, सद्भावना एवं उदार सहयोग की परम्परा चले। दान विपत्ति एवं पिछड़ेपन से ग्रस्त लोगों को पैरों पर खड़े होने तक के लिए दिया जाय। इसके अतिरिक्कत उसका सतत प्रवाह सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए ही नियोजित हो। साधारणतया मुफ्त में खाना और खिलाना अनैतिक समझा जाय। इसमें पारिवारिक या सामाजिक प्रीति भोजों का जहाँ औचित्य हो, वहाँ अपवाद रूप से छूट रहे। भिक्षा व्यवसाय पनपने न दिया जाय। दहेज, मृतक भोज, सदावर्त धर्मशाला आदि ऐसे दान जो मात्र प्रसन्न करने भर के लिये दिये जाते हैं और उस उदारता के लाभ समर्थ लोग उठाते हैं, अनुपयुक्त माने और रोके जायें। साथ ही हर क्षेत्र का पिछड़ापन दूर करने के लिए उदार श्रमदान और धनदान को अधिकाधिक प्रोत्साहित किया जाय।

(३) किसी मान्यता या प्रचलन को शाश्वत या सत्य न माना जाय, उन्हें परिस्थितियों के कारण बना समझा जाय। उनमें जितना औचित्य, न्याय और विवेक जुड़ा हो उतना ग्राह्य और जो अनुपयुक्त होते हुए भी परम्परा के नाम पर गले बंधा हो, उसे उतार फेंका जाय। समय- समय पर इस क्षेत्र का पर्यवेक्षण होते रहना चाहिये और जो असामयिक, अनुपयोगी हो उसे बदल देना चाहिये। इस दृष्टि से लिंग भेद, जाति भेद के नाम पर चलने वाली विषमता सर्वथा अग्राह्य समझी जाय।

(४) सहकारिता का प्रचलन हर क्षेत्र में किया जाय। अलग- अलग पड़ने की अपेक्षा सम्मिलित प्रयत्नों और संस्थानों को महत्त्व दिया जाय। संयुक्त परिवार से लेकर संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त विश्व को लक्ष्य बनाकर चला जाय। विश्व परिवार का आदर्श कार्यान्वित करने का ठीक समय यही है। सभी प्रकार के विलगावों को निरस्त किया जाय। व्यक्ति की सुविधा की तुलना में समाज व्यवस्था को वरिष्ठता मिले। प्रशंसा ऐसे ही प्रयत्नों की हो जिन्हें सर्वोपयोगी कहा जाय। व्यक्तिगत समृद्धि, प्रगति एवं विशिष्टता को श्रेय न मिले। उसे कौतूहल मात्र समझा जाय।

(५) अवांछनीय मूढ़ मान्यताओं और कुरीतियों को छूत की बीमारी समझा जाय। वे जिस पर सवार होती है उसे तो मारती ही हैं, अन्यान्य लोगों को भी चपेट में लेती और वातावरण बिगाड़ती हैं। इसलिए उनका असहयोग, विरोध करने की मुद्रा रखी जाय और जहाँ सम्भव हो उनके साथ समर्थ संघर्ष भी किया जाय। समाज के किसी अंग पर हुआ अनीति का हमला समूचे समाज के साथ बरती गई दुष्टता माना जाय और उसे निरस्त करने के लिए जो मीठे- कड़ुवे उपाय हो सकते हों, उन्हें अपनाया जाय। अपने ऊपर बीतेगी तब देखेंगे, इसकी प्रतीक्षा करने की अपेक्षा कहीं भी हुए अनीति के आक्रमण को अपने ऊपर हमला माना जाय और प्रतिकार के लिए दूरदर्शितापूर्ण रणनीति अपनायी जाय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

सोमवार, 11 दिसंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 11 Dec 2023

ईश्वर उपासना मानव जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। आत्मिक स्तर को सुविकसित, सुरक्षित एवं व्यवस्थित रखने के लिए हमारी मनोभूमि में ईश्वर के लिए समुचित स्थान रहना चाहिए और यह तभी संभव है जब उसका अधिक चिन्तन, मनन, अधिक सामीप्य, सान्निध्य प्राप्त करते रहा जाय। भोजन के बिना शरीर का काम नहीं चल सकता, साँस लिए बिना रक्ताभिषरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की उपेक्षा करने के उपरान्त आन्तरिक स्तर भी नीरस, चिन्ताग्रस्त, अनिश्चित, अनैतिक, अव्यवस्थित एवं आशंकित बना रहता है।

भौतिक सुख- साधन, बाहुबल और बुद्धिबल के आधार पर कमाये जा सकते हैं पर गुण-कर्म-स्वभाव की उत्कृष्टता पर निर्धारित समस्त विभूतियाँ हमारे आन्तरिक स्तर पर ही निर्भर रहती हैं। इस स्तर के सुदृढ़ और समुन्नत बनाने में उपासना का भारी योग रहता है। इसलिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों की भाँति ही उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थ पालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है, वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए।

संसार की शांति और सुव्यवस्था इसी बात पर निर्भर है कि मनुष्य उच्चस्तरीय भावनाओं से ओत-प्रोत रहे। यह भावनाएँ भीतर से निकलती हैं, बाहर से नहीं थोपी जा सकती। अन्तःकरण पर प्रभाव डालने की शक्ति, श्रद्धा और विश्वास में ही सन्निहित रहती है। इसलिए जब तक इन तत्वों को न जगाया जायगा तब तक यह उत्कृष्टता की अन्तः प्रेरणा कहाँ जागृत होगी? और जब तक यह जागरण न होगा तब मनुष्य अधोगामी प्रवृत्तियों से ऊँचा न उठ सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 हम अपना भविष्य और चरित्र स्वयं बनाते हैं।

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता है। निज का उत्थान-पतन उसके वश की बात है। यह तथ्य जितना सच है, उतना ही यह भी सही है कि वातावरण का प्रभाव अपने ऊपर भी पड़ता है और  अपने व्यक्तित्व से परिवार एवं समाज का वातावरण भी प्रभावित होता है। बुरे वातावरण में रहकर कदाचित् ही कोई अपनी विशिष्टता बना सका हो। साथ ही, यह भी सच है कि वातावरण का प्रभाव भी पड़े बिना नहीं रहता।
  
अधिकतर समर्थ लोगों के क्रियाकलाप ही वातावरण बनाते हैं। बहुसंख्यक होने पर और एक प्रकार की गतिविधियाँ अपना लेने पर दुर्बल स्थिति के लोग भी अपना एक विशेष प्रकार का माहौल बना लेते हैं। व्यसनी, अनाचारियों का समुदाय भी ऐसा प्रभाव उत्पन्न करता है, जिससे सामान्य स्तर के लोग प्रभावित होने लगें। इसलिए अच्छे वातावरण में रहना और बुरे वातावरण से बचना भी उसी प्रकार आवश्यक है, जैसे स्वच्छ हवा में रहने और दुर्गन्ध से बचने का प्रयत्न किया जाता है। वह कहानी प्रसिद्ध है, जिसमें एक ही घोंसले से पकड़े गये दो तोते के बच्चे दो भिन्न प्रकार के व्यवसायियों ने पाले। वहाँ की स्थिति के अनुसार ही वे बोलना सीख गये। संत के यहाँ पला तोता ‘सीताराम-राधेश्याम’ कहता था और चोर के यहाँ पला ‘लूटो-खसोटो-मारो-काटो’ की रट लगाता था; क्योंकि उन्हें यही सब दिनभर सुनने को मिलता था। मनुष्य के संबंध में भी यही बात है। वह जैसे लोगों के साथ रहता है, जैसी परिस्थितियों में रहता है, जो कुछ समीपवर्ती लोगों को करते देखता है, उसी के अनुसार अपना स्वभाव भी ढाल लेता है। वह बंदर की तरह अनुकरणप्रिय जो है।
  
मनस्वी लोग अपनी आदर्शवादिता पर सुदृढ़ रहकर अनेकों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। कितनों को ही अनुकरण की प्रेरणा देते हैं। अपने औचित्य के कारण उस मार्ग पर चलने के लिए अनेकों को आकर्षित करते हैं। आवश्यक नहीं कि वह मार्ग सरल या परंपरागत ही हो, नवीन विचार भी अपने औचित्य के कारण प्रतिभाशाली लोगों द्वारा अपनाये जाने पर एक मार्ग बन जाते हैं। सर्वसाधारण को तो परंपराएँ ही सब कुछ प्रतीत होती हैं; पर विचारवान् लोग औचित्यवान् को देखते-परखते हैं, उसे ही चुनते-अपनाते हैं; पर असली बहुमूल्य मोतियों का कोई पारखी खरीददार न हो, ऐसी बात भी नहीं है। बुद्ध और गाँधी का मार्ग सर्वथा नया था, पर उनके प्रामाणिक व्यक्तित्व और औचित्य भरे प्रतिपादन का परिणाम था कि असंख्यों व्यक्ति उनके अनुयायी बने और एक नवीन वातावरण बना देने में सफल हुए; पर ऐसा होता तभी है, जब प्रतिभावान् अग्रगामी बनकर किसी उपयुक्त मार्ग को अपनायें और अपनी बात को तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण समेत समझायें, स्वयं उस मार्ग पर सुदृढ़ रहकर अन्यान्यों में मनोबल उत्पन्न करें।
  
प्रथा-परंपराओं में से अधिकांश ऐसी हैं, जो आज की स्थिति के अनुरूप नहीं रहीं, भले ही वे किसी जमाने में अपने समय के अनुरूप भूमिका निभाती रही हों। समय गतिशील है, वह आगे बढ़ता है, पीछे नहीं लौटता। चरण सदा आगे बढ़ते हैं, यदि कोई पीछे की तरफ उलटी गति से चलना आरंभ करे, तो विचित्र लगेगा, धीमे चलेगा और काँटे चुभने जैसे संकट में भी फँसेगा। फिर वापस लौटने में हाथ भी क्या लगेगा? उसमें समय की बर्बादी ही पल्ले पड़ेगी। आदिमकाल से लोग जिस रहन-सहन को अपनाने के लिए विवश थे, वह उस समय की सही सूझ-बूझ हो सकती है, पर अब न हम गुफाओं में घर बनाकर रह सकते हैं और न पत्ते लपेटकर ऋतु प्रभाव से बच सकते हैं। निर्वाह के लिए चिर पूर्वज जिन साधनों पर निर्भर थे, उन्हें अब इस प्रगतिशीलता के समय में कोई भी अपनाने के लिए तैयार न होगा। फिर भी हम पुरातन की दुहाई देते हैं और उन्हीं प्रचलनों की सराहना करते हैं, जो कभी परिस्थितिवश अपनाये जाते रहे हैं।
  
किसी को भी यह नहीं कहना चाहिए कि हमें परिस्थितियों से, व्यक्तियों से विवश होकर यह करना पड़ा। वातावरण का प्रभाव अवश्य पड़ता है, पर वह इतना प्रबल नहीं कि साहसी को बाधित कर सके, आदर्शों को तोड़ने-मोड़ने में समर्थ हो सके। अंततः यह निष्कर्ष अपनी यथार्थता सिद्ध करता है कि मनुष्य अपने भाग्य और भविष्य का निर्माता स्वयं है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

रविवार, 10 दिसंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 10 Dec 2023

मनुष्य अपनी वरिष्ठता का कारण अपने वैभव- पुरुषार्थ, बुद्धिबल- धनबल को मानता है, जबकि यह मान्यता नितान्त मिथ्या है। व्यक्तित्व का निर्धारण तो अपना ही स्व- अन्त:करण करता है। निर्णय, निर्धारण यहाँ से होते हैं। मन और शरीर स्वामिभक्त सेवक की तरह अन्त:करण की आकांशा पूरी करने के लिए तत्परता और स्फूर्ति से लगे रस्ते हैं। उन्नति- अवनति का भाग्य- विधान यही लिखा जाता है।

श्रद्धा अर्थात् सद्भाव, प्रज्ञा अर्थात् सद्ज्ञान एवं निष्ठा अर्थात् सत्कर्म। तीनों का समन्वित स्वरूप ही व्यक्तित्व का निर्माण करता है। श्रद्धा अन्तःकरण से प्रस्फुटित होने वाले आदर्शो के प्रति प्रेम है। इस गंगोत्री से निःसृत होने वाली पवित्र धारा ही सद्ज्ञान और सत्कर्म से मिलकर पतितपावनी गंगा का स्वरुप ले लेती है। इन तीनों का विकास- उत्थान ही मानव की महामानव बनाता है तथा इस क्षेत्र का पतन ही उसे विकृष्ट स्तर का जीवनयापन करने को विवश करता है।

मनुष्य की वरिष्ठा श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा पर अवलम्बित है। इन्हीं की न्यूनाधिकता से उसका व्यक्तित्व उठता- गिरता है। (व्यक्तित्व) के उठने- गिरने के कारण उत्थानजन्म सुखों और पतनजन्य दुखों का वातावरण बनता है। इन दिनों मनुष्यों ने आन्तरिक वरिष्ठता गँवा दी है। फलत: अपने तथा सबके लिए संकट उत्पन्न कर रहे है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo


👉 चिन्ताओं से डर कैसा?

जीवन में खिलाड़ी की तरह पार्ट अदा करिए और पल्ला झाड़ कर अलग हो जाइए। इस वैराग्य, निष्काम कर्म अनासक्ति की योग शास्त्र में बार-बार शिक्षा दी गयी है, यह कोई अव्यावहारिक या काल्पनिक विषय नहीं है, वरन् कर्म शील मनुष्यों का जीवन मन्त्र है। जिन लोगों पर अत्यन्त कठोर उत्तरदायित्व रहते हैं, जिनके ऊपर असंख्य जनता के भाग्य निर्माण का भार है, उनके सामने पग-पग पर बड़े-बड़े कठिनतम पेचीदा, दुरूह और घबरा देने वाले प्रश्न आते रहते हैं। कितनी पेचीदा गुत्थियाँ सुलझानी पड़ती हैं, कितने नित नये संघर्षों का सामना करना पड़ता है, पर वे अपने काम को भली प्रकार करते हैं, न तो बीमार पड़ते हैं, न बेचैन होते हैं, न घबराते हैं। रात को पूरी नींद लेते हैं, आमोद-प्रमोद में भाग लेते हैं, हँसते खेलते हैं।
  
एक हम हैं, जो मामूली सी दो चार कठिनाइयाँ सामने आने पर घबरा जाते हैं, चिन्ता के मारे बेचैन बने रहते हैं। वस्तुतः यह मानसिक कमजोरी है, आत्मबल का अभाव है, नास्तिकता का चिह्न है, इससे बचना चाहिए, क्योंकि बेचैन मस्तिष्क ठीक बात सोच नहीं सकता, उसमें उचित मार्ग  ढूँढ़ने योग्य क्षमता नहीं रहती, आपत्ति से छुटकारा पाने के उपाय तलाश करने के लिए गंभीर, स्थिर और शांत चित्त रहने की आवश्यकता है पर उसे पहले ही खो दिया जाय, तो जल्दबाजी में सिर्फ ऐसे उथले और अनुचित उपाय सूझ पड़ते हैं, जो कठिनाई को और भी अधिक बढ़ाने वाले होते हैं।
  
कार्य की अधिकता, असुविधा या चिन्ता का कारण उपस्थित होने पर आप उसको सुलझाने का प्रयत्न कीजिए। इनमें सब से प्रथम प्रयत्न यह है कि मानसिक संतुलन को कायम रखिए, चित्त की स्थिरता और धैर्य को नष्ट न होने दीजिए। घबराहट तीन चौथाई शक्ति को बर्बाद कर देती है, फिर विपत्ति से लड़ने के लिए एक चौथाई भाग ही शेष बचता है, इतने स्वल्प साधन की सहायता से उस भारी बोझ को  उठाना सरल नहीं रहता। कहते हैं कि विपत्ति अकेली नहीं आती। उसके पीछे और भी बहुत से झंझट बँधे चले आते हैं। कारण यह है कि चिन्ता से घबराया हुआ आदमी अपनी मानसिक स्वस्थता खो देता है और जल्दबाजी में इस प्रकार का रवैया अख्तियार करता है, जिसके कारण दूसरे काम भी बिगड़ते चले जाते हैं तथा एक के बाद दूसरे अनिष्ट उत्पन्न होते जाते हैं। यदि मानसिक स्थिति पर काबू रखा जाय, चिन्ता और बेचैनी से घबराया न जाया जाय, तो वह मूल कठिनाई भी हल हो सकती है और नई शाखा प्रशाखाओं से भी सुरक्षित रहा जा सकता है।
  
ईश्वर की इच्छा, प्रकृति की प्रेरणा, संचित संस्कारों के कर्मफल के अनुसार प्रिय अप्रिय प्रसंग हर किसी के सामने आते हैं, उनका आना रोका नहीं जा सकता। भगवान् श्रीरामचन्द्र, योगेश्वर श्रीकृष्ण तक को विपत्तियों से छुटकारा न मिला। भवितव्यता कभी-कभी ऐसी प्रबल होती है कि प्रयत्न करते हुए भी उनसे बचाव नहीं हो सकता। विवेकवान् अपने मस्तिष्क पर काबू करते हैं और खिलाड़ी की भाँति बड़ी से बड़ी कठिनाई को छोटी करके देखते हैं। चिंता और शोक की घबराहट में सिवाय बर्बादी के लाभ कुछ नहीं है, इसलिए इस मानसिक दुर्बलता को परास्त करने का शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए।
  
आप संसार के कर्मनिष्ठ महापुरुषों से शिक्षा ग्रहण कीजिए, अपने को धैर्यवान् बनाइये, काम को खेल की तरह कीजिए, कठिनाइयों को मनोरंजन का एक साधन बना लीजिए। अपने मन के स्वामी आप रहिए, अपने घर पर किसी दूसरे को मालिकी मत गाँठने दीजिए, चिन्ता, शोक, आदि शत्रु आप के घर पर कब्जा जमाकर, मस्तिष्क पर अपना काबू करके, आपको दीन-दरिद्र की भाँति दुःखी करना चाहते हैं और शांति तथा स्वास्थ्य का हरण करके व्यथा-वेदनाओं की चक्की में पीसना चाहते हैं, इनसे सावधान रहिए। यदि शत्रुओं को आपके मस्तिष्क पर कब्जा कर लेने में सफलता मिल गयी, तो आप कहीं के न रहेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 8 Dec 2023

आत्म-निर्माण के कार्य में सत्संग निःसन्देह सहायक होता है किन्तु आज की परिस्थितियों में इस क्षेत्र में जो विडंबना फैली है, उससे लाभ के स्थान पर हानि अधिक है। सड़े-गले, औंधे-सीधे, रूढ़िवादी, भाग्यवादी, पलायनवादी विचार इन सत्संगों में मिलते हैं। फालतू लोग अपना समुदाय बढ़ाने के लिए सस्ते नुस्खे बताते रहते हैं या किसी देवी देवता के कौतूहल भरे चरित्र सुनाकर उनके सुनने मात्र से स्वर्ग, मुक्ति आदि मिलने की आशा बँधाते रहते हैं। ऐसा विडम्बनापूर्ण सत्संग किसी का क्या हित साधेगा?

आज सत्संग की आवश्यकता स्वाध्याय से ही पूरी करनी पड़ती है। जहाँ जीवन को प्रेरणाप्रद मार्गदर्शन कर सकने की दृष्टि से उपयुक्त सत्संग मिल सके, वहाँ जाने और लाभ उठाने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। पर जहाँ व्यर्थ की विडम्बनाओं में समय बर्बाद किया जाता हो, वहाँ जाने में कुछ लाभ नहीं। आज की स्थिति में सरल सत्संग स्वाध्याय ही हो सकता है। आत्मबल बढ़ाने वाला, चरित्र को उज्ज्वल करने वाला, गुणकर्म, स्वभाव में प्रौढ़ता उत्पन्न करने वाला साहित्य उपलब्ध करके नियमित रूप से उसे पढ़ते रहने से भी घर बैठे सत्पुरुषों के साथ सत्संग का लाभ लेने की सुविधा मिल सकती है।

प्रत्येक मनुष्य को हर घड़ी अपने स्वयं के चरित्र का निरीक्षण करते रहना चाहिए कि उसका चरित्र पशु तुल्य है या सत्पुरुषों जैसा। आत्म-निरीक्षण की प्रणाली का नाम ही स्वाध्याय है। पूर्ण मानव बनने के सद् उद्देश्य से जिनने भी स्वाध्याय का अनुसरण किया है उनकी आत्मा अवश्यमेव परिष्कृत हुई है, उनकी महानता जागृत हुये बिना नहीं रही।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 संसार में चार प्रकार के लोग देखे जाते हैं।

एक - जो कोरे नास्तिक हैं, वे स्पष्ट मना करते हैं, कि ईश्वर नहीं है। 

दूसरे - वे लोग जो आस्तिक तो हैं, ईश्वर को मानते तो हैं, परंतु ईश्वर का स्वरूप ठीक नहीं समझते। वे वृक्षों में और मूर्तियों में और फोटो में और पता नहीं कहां-कहां ईश्वर की पूजा करते रहते हैं। 

तीसरे -  वे लोग हैं जो ईश्वर को शब्दों से तो ठीक जानते मानते हैं, परंतु उसके अनुसार आचरण नहीं कर पाते। जैसे कि वे कहते हैं, ईश्वर न्यायकारी है, हमारे पापों का दंड माफ नहीं करेगा। फिर भी वो कहीं ना कहीं पाप कर लेते हैं। 

और चौथे - प्रकार के व्यक्ति वे हैं, जो ईश्वर को ठीक तरह से जानते भी हैं, मानते भी हैं, और आचरण भी वैसा ही करते हैं। अर्थात वे पाप नहीं करते।

सच्चे पूर्ण आस्तिक तो यही हैं, चौथे वाले।
यदि आप पहले वर्ग में हैं, अर्थात नास्तिक हैं, तो भी आप ईश्वर से लाभ नहीं उठा पाएंगे।
यदि आप दूसरे वर्ग में हैं, तो भी आप भटकते रहेंगे। आपके पाप नहीं छूटेंगे। और ईश्वर से लाभ नहीं ले पाएंगे। यदि आप तीसरे वर्ग में हैं, तो भी पाप बंद नहीं होंगे, क्योंकि आपका शाब्दिक ज्ञान ठीक होते हुए भी आचरण ठीक नहीं है, और आपको उसका दंड भोगना पड़ेगा।

इसलिए चौथे वर्ग में आना चाहिए। सच्चा आचरणशील आस्तिक बनना चाहिए। जिससे आपका वर्तमान जीवन भी अच्छा बने और आपका भविष्य भी स्वर्णिम हो, सुखदायक हो।

स्वामी विवेकानंद

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

गुरुवार, 7 दिसंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 7 Dec 2023

आत्म निरीक्षण और विचार पद्धति का कार्य उसी प्रकार चलाना चाहिए जिस प्रकार साहूकार अपनी आय और व्यय का ठीक-ठीक खाता रखते हैं। हमारी दुर्बलताओं और कुचेष्टाओं का खर्च-खाता भी हो और विवेक सत्याचरण तथा आत्म परिष्कार का जमा-खाता भी होना चाहिये। बचत का ठीक-ठीक अनुमान तभी लग सकता है। यदि अपनी जमा अधिक है तो आप सुसंस्कार बढ़ा रहे है। खर्च की अधिकता आप के संस्कारों का दीवालियापन प्रकट करती है। संस्कारों रुची धन एकत्रित करने के लिये सदाचरण की पूँजी बढ़ाना नितान्त आवश्यक है।

जिसमें पूरी शक्ति से काम करने की दृढ़ लगन है उसके मार्ग में चाहे कितना प्रबल विरोध का प्रवाह आये, वह उसकी गति को अवरुद्ध नहीं कर सकता, पीछे नहीं हटा सकता। आप आगे बढ़ने का प्रयत्न जितनी दृढ़ता के साथ करेंगे। सफलता उतनी ही आपके समीप आती जायगी। पुरुषार्थ सब अभावों की पूर्ति करता है। इसीलिए कहा है- “उद्योगे नास्ति दारिद्रयम्” पुरुषार्थ करने पर दरिद्रता नहीं रहती।

आप में योग्यता की कितनी ही कमी हो, यदि आप में वह शक्ति है जो किसी भी निर्दिष्ट लक्ष्य से हटना नहीं जानती, जो कार्य आपने शुरू किया है उसे छोड़ना नहीं जानती तो आप एक दिन सफलता की मंजिल तक पहुँच ही जाएँगे। इसके विपरीत काफी योग्यता रखते हुए भी शिथिल प्रयत्न, अधूरे मन से काम में लगने वाले, असफल हों तो इसमें किसी का क्या दोष।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 शक्ति-स्रोत की सच्ची शोध

अष्ट सिद्धियाँ तो उन छोटे-छोटे कीड़ों में भी वर्तमान है, जो चलते समय पैरों के नीचे दबकर मर जाते हैं। मनुष्य यदि सिद्धियाँ प्राप्त करने की बात सोचे तो असामान्य नहीं मानेंगे। वास्तव में सिद्धियाँ प्राप्त करने की नहीं, वह तो स्वभाविक गुण के रूप में आत्मा में सदैव ही विद्यमान हैं। परमात्मा ने हमें शरीर रूपी यंत्र दिया है, वह उसी की अनुभूति में प्रयुक्त होना चाहिए था पर आधार के अनुपयुक्त प्रयोग के कारण हम आत्मा के उन दिव्य गुणों के प्रकाश से वंचित रह जाते हैं। सिद्धियों की खोज में उचित साधन को भूल जाने के कारण न तो सिद्धियाँ मिल पाती हैं और न शाँति। मनुष्य बीच में ही लड़खड़ाता रहता है।

पातंजल योगसूत्र में एक जगह कहा है- ‘निमित्तमप्रयोजंक प्रकृतीनाँ वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्।’ अर्थात् जिस प्रकार खेत में पानी लाने के लिये केवल मात्र मेंड़ काट कर उसका जल-स्रोत से संबंध जोड़ देने से खेत में पानी प्रवाहित होने लगता है, उसी प्रकार जीवात्मा में पूर्णता, पवित्रता और सारी शक्तियाँ पहले से ही विद्यमान हैं। हमें शरीर और मन के भौतिक बंधनों की मेंड़ काटकर उसका संबंध भर आत्मा से जोड़ने की आवश्यकता है। एक बार यदि शरीर और मन के सुखों की ओर से ध्यान हटकर आत्मा में केन्द्रित हो जाये, तो आत्मा की संपूर्ण शक्तियाँ और विभूतियाँ जीव को एक स्वाभाविक धर्म की तरह उपलब्ध हो जाती हैं। ऐसा न करने तक उसके और सामान्य कीड़े-मकोड़ों के जीवन में किसी प्रकार का भी अन्तर नहीं।

 स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति, अक्टूबर १९७० पृष्ठ १


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

बुधवार, 6 दिसंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 6 Dec 2023

मानसिक स्थिति पर ही जीवन की सफलता -असफलता निर्भर करती है। जिस तरह कुशल ड्राइवर गाड़ी को सही सलामत मंजिल तक पहुँचा देता है, उसी तरह स्वस्थ मनः स्थिति मनुष्य के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता का कारण बन जाती है। लेकिन जिस तरह अनाड़ी ड्राइवर गाड़ी को कहीं भी दुर्घटनाग्रस्त कर सकता है उसी तरह असन्तुलित और अस्वस्थ मन जीवन नैया को मझधार में ही डुबो देता है, नष्ट कर देता है।

जीवन का एक निर्दिष्ट लक्ष्य, कार्यक्रम बनाया जाय। उसी के अनुरूप सद्विचारों और उदात्त भावनाओं के चिंतन में मन को एकाग्र कर दिया जाय। मन चाहे या न चाहे, वह कितना ही भागे, उसे उस लक्ष्य और कार्यक्रम पर ही पकड़कर बार-बार लगाइये। इसके सिवा जो भी विरोधी विचार, भावनायें मन में उठे, उनकी ओर ध्यान न दें, उनसे विरक्त रहें। थोड़े समय में मन की चंचल दूर होकर मन एकाग्र हो जायगा। आप ऐसे एकाग्र मन की शक्ति का जिस दिशा में भी उपयोग करेंगे, उधर ही यह आश्चर्य उत्पन्न कर दिखायेगा।

अपने दैनिक जीवन-क्रम में भी जहाँ तक बने स्थिरता, धैर्य और शान्ति के साथ काम करना चाहिए। चंचलता भागदौड़, अस्तव्यस्तता, आवेश और उद्वेग को तो जीवन में किसी भी शर्त पर स्थान नहीं होना चाहिये। इससे मन की शक्ति नष्ट होती है। हम जो भी कुछ करें, वह व्यवस्थित शान्त होकर करें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110
( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 8439014110 पर अपना नाम लिख कर WhatsApp करें )

Official Facebook Page
Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...