ईश्वर उपासना को दैनिक जीवन में से बिल्कुल हटा देना किसी भी प्रकार से उपयुक्त नहीं। मन न लगने पर किसी न किसी प्रकार आदत में इसे सम्मिलित करने के लिए साधना का कुछ न कुछ अभ्यास नित्य ही करते रहना चाहिए।
आत्म-शक्ति जब कभी जिस किसी को प्राप्त हुई है तब उसमें आस्तिकता और उपासना का कोई न कोई अंश जरूर रहा है। भले ही हम बिस्तर से उठते और सोते समय पन्द्रह-पन्द्रह मिनट तक ही सर्वव्यापक, निष्पक्ष, न्यायकारी, विचार और कार्यों के अनुरूप प्रसन्न एवं अप्रसन्न होने वाले परमात्मा का ध्यान और स्मरण किया करें, पर किसी न किसी रूप में दैनिक उपासना तो किया करें।
इसमें प्रश्न फुरसत का नहीं, अभिरुचि का है। थोड़ी अभिरुचि इधर बढ़ते ही इस मार्ग में आनन्द आने लगता है और फुरसत भी मिलने लगती है।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (५.९)
आत्म-शक्ति जब कभी जिस किसी को प्राप्त हुई है तब उसमें आस्तिकता और उपासना का कोई न कोई अंश जरूर रहा है। भले ही हम बिस्तर से उठते और सोते समय पन्द्रह-पन्द्रह मिनट तक ही सर्वव्यापक, निष्पक्ष, न्यायकारी, विचार और कार्यों के अनुरूप प्रसन्न एवं अप्रसन्न होने वाले परमात्मा का ध्यान और स्मरण किया करें, पर किसी न किसी रूप में दैनिक उपासना तो किया करें।
इसमें प्रश्न फुरसत का नहीं, अभिरुचि का है। थोड़ी अभिरुचि इधर बढ़ते ही इस मार्ग में आनन्द आने लगता है और फुरसत भी मिलने लगती है।
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