गुरुवार, 14 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 14 Sep 2023

निराशाग्रस्त मनुष्य दिन-रात अपनी इच्छाओं कामनाओं और वाँछाओं की आपूर्ति पर आँसू बहाता हुआ उनका काल्पनिक चिन्तन करता हुआ तड़पा करता है। एक कुढ़न, एक त्रस्तता एक वेदना हर समय उसके मनों-मन्दिर को जलाया करती है। बार-बार असफलता पाने से मनुष्य का अपने प्रति एक क्षुद्र भाव बन जाता है । उसे यह विश्वास हो जाता है कि वह किसी काम के योग्य नहीं है। उसमें कोई ऐसी क्षमता नहीं है, जिसके बल पर वह अपने स्वप्नों को पूरा कर सके, सुख और शान्ति पा सके।

जीवन का स्वरूप और अर्थ— जीवन का अर्थ है आशा, उत्साह और गति। आशा, उत्साह और गति का समन्वय ही जीवन है। जिसमें जीवन का अभाव है उसमें इन तीनों गुणों का होना निश्चित है। साथ ही जिसमें यह गुण परिलक्षित न हों समझ लेना चाहिये कि उसमें जीवन का तत्व नष्ट हो चुका है। केवल श्वास-प्रश्वास का आवागमन अथवा शरीर में कुछ हरकत होते रहना ही जीवन नहीं कहा जा सकता। जीवन की अभिव्यक्ति ऐसे सत्कर्मों में होती है, जिनसे अपने तथा दूसरों के सुख में वृद्धि हो?

मनुष्य में एक बहुत बड़ी कमजोरी यह है कि उसे प्राप्त का अभिमान हो जाता है। यह घर मैंने बनाया है। यह खेत मेरे हैं। इतना धन मैंने कमाया है। मैं इस सम्पत्ति का स्वामी हूँ, जो चाहे करूं, जैसा चाहूँ बरतूँ। इसे अहंकार कहते हैं। कहते हैं अहंकार करने वाले का विवेक नहीं रहता और वह बुद्धि-भ्रष्ट होकर नष्ट हो जाती है। अभिमानी व्यक्ति की भावनायें बड़ी संकीर्ण होती हैं। दूर तक सोचने की उसमें क्षमता न होने से वह अज्ञानियों के काम करता और दुःख भोगता है। इसलिये उसके लिये यह मंगलमय विश्व भी दुःखरूप हो जाता है। वह क्लेश में जीता और क्लेश में मर जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपने आपकी समालोचना करो

जो कुछ हो, होने दो। तुम्हारे बारे में जो कहा जाए उसे कहने दो। तुम्हें ये सब बातें मृगतृष्णा के जल के समान असार लगनी चाहिए। यदि तुमने संसार का सच्चा त्याग किया है तो इन बातों से तुम्हें कैसे कष्ट पहुँच सकता है। अपने आपकी समालोचना में कुछ भी कसर मत रखना तभी वास्तविक उन्नति होगी।

प्रत्येक क्षण और अवसर का लाभ उठाओ। मार्ग लंबा है। समय वेग से निकला जा रहा है। अपने संपूर्ण आत्मबल के साथ कार्य में लग जाओ, लक्ष्य तक पहुँचोगे।

किसी बात के लिए भी अपने को क्षुब्ध न करो। मनुष्य में नहीं, ईश्वर में विश्वास करो। वह तुम्हें रास्ता दिखाएगा और सन्मार्ग सुझाएगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 13 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 13 Sep 2023

सचाई मनुष्य-जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है। इसके अभाव में जीवन हर ओर से कंटकाकीर्ण हो जाता है। क्या वैयक्तिक, क्या सामाजिक और क्या राष्ट्रीय। हर क्षेत्र में सचाई का बहुत अधिक महत्व है। व्यक्तिगत जीवन में मिथ्याचारी किसी प्रकार की आत्मिक उन्नति प्राप्त नहीं कर सकता, सामाजिक जीवन में अविश्वास एवं असम्मान का भागी बनता है और राष्ट्रीय जीवन में तो वह एक आपत्ति ही माना जाता है।

संसार का एक अंग होने से मनुष्य का जीवन भी परिवर्तनशील है। बचपन, जवानी, बुढ़ापा आदि का परिवर्तन। तृषा तृप्ति, काम, आराम, निद्रा, जागरण तथा जीवन-मरण के अनेक परिवर्तन मानव जीवन से जुड़े हुए हैं। इसी प्रकार सफलता-असफलता तथा सुख-दुःख भी इसी परिवर्तनशील मानव जीवन के एक अभिन्न अंग हैं। परिवर्तन जीवन का चिन्ह है। अपरिवर्तन जड़ता का लक्षण है। जो जीवित है, उसमें परिवर्तन आयेगा ही। इस परिवर्तन में ही रुचि का भाव रहता है। एकरसता हर क्षेत्र में ऊब और अरुचि उत्पन्न कर देती है।

बिना कठिनाइयों के मनुष्य का पुरुषार्थ नहीं खिलता, उसके आत्म-बल का विकास नहीं होता उसके साहस और परिश्रम के पंख नहीं लगते उसकी कार्य क्षमता का विकास नहीं होता। यदि कठिनाइयां न आवें तो मनुष्य साधारण रूप से रेलगाड़ी के पहिये की तरह निरुत्साह के साथ ढुलकता चला जाये। उसकी अलौकिक शक्तियों, उसकी दिव्य क्षमताओं, उसकी अद्भुत बुद्धि और शक्तिशाली विवेक के चमत्कारों को देखने का अवसर ही न मिले। उसकी सारी विलक्षणताएं अद्भुत कलायें और विस्मयकारक योग्यताएँ धरती के गर्भ में पड़े रत्नों की तरह की पड़ी-पड़ी निरुपयोगी हो जातीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 खिन्न मत हूजिए

आपको गरीबी ने घेर रखा है पैसे का अभाव रहता है, आवश्यक खर्चों की जरूरतें पूरी नहीं होतीं, आप दुखी रहते हैं, पर हम पूछते हैं कि क्या दुखी रहने से आपकी दरिद्रता दूर हो जाएगी? क्या इससे अधिक आमदनी होने लगेगी? अगर आप समझते हैं कि ‘हाँ हो जायगी’ तो आप भूल करते हैं।

आप कम पढ़े हैं विद्या पास नहीं हैं, बीमारी ने घेर रखा है, शरीर क्षीण होता जाता है, काम बिगड़ जाते हैं, सफलता नहीं मिलती, विघ्न उपस्थित हैं, वियोग सहना पड़ रहा है, कलह रहता है, ठगी और विश्वासघात का सामना करना पड़ता है। अत्याचार और उत्पीड़न के शिकार हैं या ऐसे ही किसी कारण वश आप खिन्न हो रहे हैं, चित्त उदास रहता है, चिन्ता सताती है, संसार त्यागने की इच्छा होती है, आँखों से आँसुओं की धारा बहती है। हम पूछते हैं कि क्या यही मार्ग इन दुःखद परिस्थितियों से बचने का है? क्या आप शोक संताप में डूबे रहकर इन कष्टों को हटाना चाहते हैं? क्या खिन्न रहने से दुखों का अन्त हो जाएगा?

बीते कल की अप्रिय घटनाओं पर आँसू बहाना, आने वाले कल को ठीक वैसा ही बनाना है। भूत कालीन कठिनाइयों के त्रास से इस समय भी संतप्त रहना, इसका अर्थ तो यह है कि भविष्य में भी उन्हीं बातों की पुनरावृत्ति आप चाहते हैं, इसलिए उठिये खिन्नता और उदासीनता को दूर भगा दीजिए। बीते पर रोना इससे क्या लाभ? चलिये! आने वाले कल का नये ढंग से निर्माण कीजिये। शोक, सन्ताप, चिन्ता, निराशा और उदासीनता को परित्याग करके प्रसन्नता को ग्रहण कीजिए।

उठिये, खड़े हूजिए और एक कदम आगे बढ़ाइए। प्रभु ने आपको रोने के लिए नहीं प्रसन्न रहने के उद्देश्य से यहाँ भेजा है। रूखी रोटी खाकर हँसिये और कल चुपड़ी खाने का प्रयत्न कीजिए। आज की परिस्थिति पर संतुष्ट रहिये और कल के लिये नया आयोजन कीजिए। खिन्न मत मत हूजिए, क्योंकि हम आपको एक दुख हरण गुप्त मन्त्र की दीक्षा दे रहे हैं। सुनिये! विचारिये और गाँठ बाँध लीजिए कि ‘हँसता हुआ भविष्य, हँसते हुए चेहरे का पुत्र है। जो प्रसन्न रहेगा उसे प्रसन्न रखने वाली परिस्थितियाँ भी मिलेंगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1943 पृष्ठ 14

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/February/v1.14

सोमवार, 11 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 11 Sep 2023

आत्मा परमात्मा का अंश है। जिन भोगों से शरीर को आनन्द मिलता है। उन्हीं से आत्मा को भी मिले आवश्यक नहीं। जिस क्षण से हम इस दुनिया में आते हैं उससे लेकर मृत्यु तक आत्मा हमारे शरीर में उपस्थित है। शरीर के भिन्न भिन्न अवयवों की क्षमता विशेषता एवं क्रिया कलाप के बारे में बहुत सी बातें जानते हैं और अधिक जानने का प्रयास करते हैं। लेकिन अपने ही अन्दर छिपी आत्म को जानने पहचानने समझने एवं विकसित करने की बात हम नहीं जानते।

जीवन के समग्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह आवश्यक है कि हम शरीर एवं आत्मा दोनों के समन्वित विकास परिष्कार एवं तुष्टि पुष्टि का दृष्टिकोण बनावे। एक को ही सिर्फ विकसित करे और एक को अपेक्षित करें ऐसा दृष्टिकोण अपनाने से सच्चा आनन्द नहीं मिल सकता। सिर्फ आत्मा का ही परिष्कार एवं विकास करें और शरीर को उपेक्षित करें इससे भी अपना कल्याण नहीं हो सकता। उसी प्रकार जब आत्म को कष्ट पहुँचता है तो मन दुःखी होकर शरीर को प्रभावित करता है।

जिन्होंने अपनी आत्म को दीन हीन स्थिति में रखा है और उसकी प्रचण्ड शक्ति से परिचित नहीं है वे मुर्दों जैसा जीवन जीने के लिए मजबूर होते हैं। वे शारीरिक सामर्थ्य रहते हुए भी बड़ी गयी गुजरी स्थिति में रहते हैं और निराशा चिन्ता एवं निरर्थक जीवन बिताते रहते हैं। जबकि अपाहिज अपंग क्षीणकाय रुग्ण एवं दुर्बल व्यक्तियों ने भी अपने आत्मबल के द्वारा ऐसे कार्य सम्पादित किये है जिनसे वे इतिहास में अमर हो गये है। सैकड़ों लोगों के लिए वे प्रेरणा के स्रोत बने है। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 वाणी की शक्ति

गुरुकुल के विद्यार्थियों में इस बात पर बहस छिड़ गई कि संसार में सबसे शक्तिशाली वस्तु क्या है? कोई कुछ कहता, कोई कुछ! जब पारस्परिक वाद−विवाद का कोई निर्णय न निकला तो फिर सभी विद्यार्थी गुरु जी के पास पहुँचे।

गुरु जी ने शिष्य की बात सुनकर कहा— “तुम सबकी बुद्धि खराब हो गई है।” और शाँत हो गये। शिष्य गुरुदेव की इस छोटी बात को भी सहन न कर पाये और थोड़ी ही देर में उनके चेहरे तमतमा गये। अपने लाल−लाल नेत्रों से गुरु जी को घूरने लगे।

थोड़ी देर बाद गुरु जी शिष्यों से बोले—“तुम सब पर आश्रम को गर्व है, तुम लोग अपना एक भी क्षण व्यर्थ नहीं खोते, अवकाश में समय में भी ज्ञान की चर्चा करते हो।” अब तो शिष्यों के मन में स्वाभिमान जागृत हुआ और उनके चेहरे खिल उठे।

गुरु जी ने कहा—“मेरे प्यारे शिष्यों! इस संसार में वाणी से बढ़कर कोई शक्तिशाली वस्तु नहीं है। वाणी से मित्र को शत्रु तथा शत्रु को मित्र बनाया जा सकता है। ऐसी शक्तिशाली वस्तु का उपयोग प्रत्येक व्यक्ति को सोच−समझकर करना चाहिये। वाणी का माधुर्य लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। और न बनने वाला कार्य भी बन जाता है।”
शिष्यगण सन्तुष्ट होकर लौट गये और उस दिन से मीठा बोलने का अभ्यास दृढ़तापूर्वक करने लगे।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 10

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 10 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 10 Sep 2023

जीवन क्या है? श्रुति कहती है कि जीवन के स्वरूप को समझा जाना चाहिए और उससे जुड़े तथ्यों को स्वीकार किया जाना चाहिए, चाहे वे कितने ही अप्रिय क्यों न प्रतीत होते हों? जीवन एक चुनौती है, एक संग्राम है, एक जोखिम है एवं उसे इसी रूप में अंगीकार करने के अतिरिक्त और चारा नहीं। जीवन ऐ रहस्य है, तिलिस्म है, भूल-भुलैया है, एक प्रकार का गोरखधंधा है। गंभीर पर्यवेक्षण के आधार पर ही उसकी तह तक पहुँचा जा सकता है। इसी आधार पर भ्रान्तियों के कारण उत्पन्न होने वाले खतरों से बचा जा सकता है। कर्त्तव्य के रूप में जीवन अत्यन्त भारी किन्तु अभिनेता की तरह हँसने-हँसाने वाला हल्का-फुलका रंगमंच भी है।

प्रभु आनन्द धन है। यदि आनन्द की प्राप्ति करना है तो प्रेम ही उसकी प्राप्ति का मुख्य साधन है। जिस परिवार या जिस समाज में परस्पर प्रेम है एक दूसरे से आत्मीयता है वह एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के दुख को अपना ही दुख मानता है। उसके निवारण हेतु वैसा ही प्रयत्न करता है जैसा कि अपने दुख के निवारण हेतु करता है। उसे आत्मवत् ही समझता है । उस परिवार और समाज में कैसे कटुता रहेगी? कैसे विषमता रहेगी? कैसे एक दूसरे की हानि करेंगे? वह तो यह समझेंगे कि उसकी हानि की हमारी हानि हैं वह परिवार और समाज सुखी रहेगा और उस प्रेम के द्वारा आनन्दघन प्रभु के निकट पहुँचेगा।

अपना स्वरूप अपना लक्ष्य अपना कर्तव्य यदि मनुष्य समझ सका होता तो उसका चिन्तन और कर्तव्य अत्यन्त उच्च कोटि का होता ऐसे नर को नारायण कहा जाता और उसके चरण जहाँ भी पड़ते वहाँ धरती धन्य हो जाती। पर अज्ञान के आवरण को क्या कहा जाय जिसने हमें नर पशु के स्तर पर देखने ओर उसी प्रकार की रीति नीति अपनाने के लिए निष्कृष्टता के गर्त में धकेल दिया है। माया का वही आवरण हमें नारकीय यातनाएँ सहन करते हुए रोता कलपता जीवन व्यतीत करने के लिए विवश करता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अन्तपारा दुष्पूरा तृष्णा दोष- शता

सम्पत्ति मात्र एक सीमित मात्रा में अपने पास रखी जा सकती है। उससे अधिक रखने के लिए गोदाम अपने पास है ही नहीं। फिर तृष्णाजन्य उपार्जन से संकट यह खड़ा हो जाता है कि जो चाहा गया है, यदि उतना मिल भी जाय, तो वह संचित न रखा जा सकेगा। चीज चाही हुई हो, प्रिय भी हो और मूल्यवान भी, पर उसे रखने का प्रबन्ध किये बिना, उसे जहाँ- तहाँ कैसे फेंक दिया जाय? स्थान बनाये बिना संग्रह कर लेना मुसीबत मोल लेने के समान है। पेट में चार रोटी का स्थान है।

मिष्ठान्न सामने अधिक मात्रा में उपस्थित हों और उन्हें छोड़ देने का मन न हो, रखने की जगह नहीं, ऐसी दशा में खाये जाने पर पेट में दर्द उठेगा ही। बाहर कहीं रखेंगे, तो चोरी होने या सड़ जाने का संकट खड़ा होगा। यह है सांसारिक मुसीबतों की जड़। साधनों की कमी नहीं, पचाने की क्षमता नहीं। ऐसी दशा में तृष्णा अपनी ही होते हुए भी अपने लिए ही संकट उत्पन्न करती है।

संसार में असीम वैभव भरा पड़ा है, पर वह पात्रता के अनुरूप ही उपलब्ध है। भगवान सुख इतना देता है, जितना हजम हो सके। बिना पचे भी दर्द होता है। यही है तृष्णाजन्य दुःख अन्यथा इस वैभव से भरे संसार में हमें अकारण दुःख क्यों उठाना पड़े?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 9 सितंबर 2023

👉 प्रतिकूलतायें जीवन को प्रखर बनाती हैं

आग के बिना न भोजन पकता है, न सर्दी दूर होती है और न ही धातुओं का गलाना- ढलाना सम्भव हो पाता है। आदर्शों की परिपक्वता के लिए यह आवश्यक है कि उनके प्रति निष्ठा की गहराई कठिनाइयों की कसौटी पर कमी और खरे- खोटे की यथार्थता समझी जा सके। बिना तपे सोने को प्रमाणिक कहाँ माना जाता है? उसका उपयुक्त मूल्य कहाँ मिलता है? यह तो प्रारंभिक कसौटी है।

कठिनाइयों के कारण उत्पन्न हुई असुविधाओं को सभी जानते हैं। इसलिए उनसे बचने का प्रयत्न भी करते हैं। इसी प्रयत्न के लिए मनुष्य को दूरदर्शिता अपनानी पड़ती है और उन उपायों को ढूँढना पड़ता है, जिनके सहारे विपत्ति से बचना सम्भव हो सके। यही है वह बुद्धिमानी जो मनुष्यों को यथार्थवादी और साहसी बनाती है। जिननेकठिनाईयों में प्रतिकूलता को बदलने के लिए पराक्रम नहीं किया, समझना चाहिए कि उन्हे सुदृढ़ व्यक्तित्व के निर्माण का अवसर नहीं मिला। कच्ची मिट्टी के बने बर्तन पानी की बूँद पड़ते ही गल जाते हैं। किन्तु जो देर तक आँवे की आग सहते हैं, उनकी स्थिरता, शोभा कहीं अधिक बढ़ जाती है।

तलवार पर धार रखने के लिए उसे घिसा जाता है। जमीन से सभी धातुऐँ कच्ची ही निकलती हैं। उनका परिशोधन भट्ठी के अतिरिक्त और किसी उपाय से सम्भव नहीं। मनुष्य कितना विवेकवान, सिद्धन्तवादी और चरित्रनिष्ठ है, इसकी परीक्षा विपत्तियों में से गुजरकर इस तप- तितीक्षा में पक कर ही हो पाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 8 सितंबर 2023

👉 क्षणिक अस्तित्व पर इतना अभिमान

अमावस की रात में दीप ने देखा-न चाँद और न कोई ग्रह नक्षत्र न कोई तारा-केवल वह एक अकेला संसार को प्रकाश दे रहा है। अपने इस महत्व को देख कर उसे अभिमान हो गया।

संसार को सम्बोधित करता हुआ अहंकारपूर्वक बोला-मेरी महिमा देखो, मेरी ज्योति-किरणों की पूजा करो, मेरी दया-दयालुता का गुणगान करो मैं तुम सबको राह दिखाता हूँ, प्रकाश देता हूँ इस प्रगाढ़ अन्धकार में तुम सब मेरी कृपा से ही देख पर रहे हो। मुझे मस्तक नवाओ, प्रणाम करो।

दीप के इस अहंकारोक्ति का उत्तर और किसी ने तो दिया नहीं, पर जुगनू से न रहा गया बोला-ऐ दीप! क्षणिक अधिकार पाकर इतना अभिमान, एक रात के अस्तित्व पर यह अहंकार केवल इस रात ठहरे रहो। प्रभात में तुमसे मिलूँगा तब तुम अपनी वास्तविकता से अवगत हो चुके होगे!

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 22

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.22

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पात्रता की परीक्षा

एक महात्मा के पास तीन मित्र गुरु-दीक्षा लेने गये। तीनों ने बड़े नम्र भाव से प्रणाम करके अपनी जिज्ञासा प्रकट की। महात्मा ने उनको शिष्य बनाने से पूर्व पात्रता की परीक्षा कर लेने के मन्तव्य से पूछा-”बताओ कान और आँख में कितना अन्तर है?”

एक ने उत्तर दिया- केवल पाँच अंगुल का, भगवन् महात्मा ने उसे एक ओर खड़ा करके दूसरे से उत्तर के लिये कहा। दूसरे ने उत्तर दिया-महाराज आँख देखती है और कान सुनते हैं, इसलिये किसी बात की प्रामाणिकता के विषय में आँख का महत्व अधिक है। महात्मा ने उसको भी एक ओर खड़ा करके तीसरे से उत्तर देने के लिये कहा। तीसरे ने निवेदन किया -भगवन् कान का महत्व आँख से अधिक है।

आँख केवल लौकिक एवं दृश्यमान जगत् को ही देख पाती है किन्तु कान को पारलौकिक एवं पारमार्थिक विषय का पान करने का सौभाग्य प्राप्त है। महात्मा ने तीसरे को अपने पास रोक लिया। पहले दोनों को कर्म एवं उपासना का उपदेश देकर अपनी विचारणा शक्ति बढ़ाने के लिये विदा कर दिया। क्योंकि उनके सोचने की सीमा बाह्यतत्व की परिधि में अभी प्रवेश कर सकने योग्य, सूक्ष्म बनी न थी।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 10


✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


गुरुवार, 7 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 7 Sep 2023

🔷 दयालु परमपिता प्यार के नाते विकास के अवसर सभी को देता है। विकास के अवसरों का लोभ उठाकर जो व्यक्ति योग्यता बढ़ा लेते हैं, उन्हें वह महत्वपूर्ण कार्य योग्यताओं के आधार पर सौंपता है। विकास के अवसर और सौंपे गए कार्य, इन दोनों में अंतर न कर पाने से मनुष्य समझता है कि भगवान किसी को अधिक अवसर देता है किसी को कम।

🔶 मार्गों के लक्ष्य निश्चित हैं; पर मनुष्य चुनते समय मार्ग के लक्ष्य की अपेक्षा मार्गों की सुविधाओं को रुचि अनुसार चुन लेता है। जो मार्ग पकड़ लिया, उसी के गंतव्य पर पहुँचना पड़ता है; फिर यह चाह महत्व नहीं रखती कि कहाँ पहुँचना चाहते थे।

🔷 जो स्वार्थ तक ही सीमित हैं, वे नर- पशु हैं। पशु अपने शरीर निर्वाह, अपनी रक्षा और अपने वंश विस्तार से अधिक सोच नहीं पाते। मनुष्य सोचने की क्षमता रखता तो है; पर स्वार्थवश पशुओं की सीमा से आगे बढ़ता नहीं, इसलिए नर पशु कहलाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्म साधना मानव संस्कृति का उच्चतम शिखर

वन्य पशुओं और जंगली झाड़ियों की तरह मनुष्य की सत्ता भी अनगढ़ होती है। उसे प्रयत्नपूर्वक सुगठित एवं परिष्कृत करने के लिए तत्त्वदर्शियों न जिस प्रक्रिया को अपनाया, उसे संस्कृति कहा जाता है। क्रमशः सभ्यता की लम्बी मंजिल पर चलते हुए ही मनुष्य उस स्तर पर पहुँचता है, जिससे मानवता गौरवान्वित होती है। यह सुन्दर संसार, व्यवस्थित समाज और व्यक्तित्वों के सुविकसित साधन सम्पन्न होने जैसे सभी वरदान इस संस्कृति साधना की देन हैं।

मनुष्य का व्यक्तित्व भी अपने आप में एक छोटा विश्व है। उसकी भीतरी और बाहरी सत्ता में इतना कुछ विद्यमान है जिसके सहारे आज का दयनीय दुर्दशाग्रस्त जीव कल सर्व समर्थ ब्रह्म बन सके। पर वह दिव्य वैभव प्रसुप्त पड़ा है। उसे कैसे जगाया और कैसे प्रयोग किया जाय, यह ऐसा विज्ञान है जिसे जानने पर विश्व की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियाँ करतलगत होती हैं।

आत्म-साधना, संस्कृति के उच्च सोपान पर पहुँचने का उच्च शिखर है, उस पर खड़ा होने वाला जो देखता, अनुभव करता और देता है, उसे निस्संकोच अनुपम और अद्भुत कहा जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.2

बुधवार, 6 सितंबर 2023

👉 जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ (अन्तिम भाग)

यह तथ्य हजार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि जीवन का परम श्रेयस्कर और शान्तिदायक उत्कर्ष आस्थाओं के परिष्कार- चिन्तन के निखार एवं गतिविधियों के सुधार पर निर्भर है। जीवन इन्हीं तीन धाराओं में प्रवाहित होता है। शक्ति के स्रोत इन्हीं में भरे पड़े हैं और अद्भुत उपलब्धियाँ उन्हीं में से उद्भूत होती हैं। इन्हें किस आधार पर सुधारा, सँभाला जाय इसकी एक विशिष्ट पद्धति है जिसे साधना कहते हैं। साधना का अर्थ है अपने अन्तरंग और बहिरंग को उच्चस्तर तक उठा ले चलना। इसे जीवन का अभिनव निर्माण एवं व्यक्तित्व का काया-कल्प भी कह सकते हैं। बोलचाल की भाषा में इसे योगाभ्यास तपश्चर्या कहते हैं।

चेतना का उच्चस्तरीय प्रशिक्षण देने को योग समझा जाय। क्रिया-कलाप में सुव्यवस्था का आरोपण तप माना जाय। इसके लिए कई तरह के प्रयोगात्मक अभ्यास करने पड़ते हैं। पहलवान बनने के लिए अखाड़े में जाकर छोटी-छोटी कसरतों का सिलसिला शुरू करना पड़ता है। कसरतों की खिलवाड़ और दंगल में कुश्ती पछाड़ कर यशस्वी होना दो अलग स्थितियाँ हैं, पर दोनों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। बीज का बोने का शुभारम्भ कालान्तर में विशाल वृक्ष बनकर सामने आता है।

पूजा-उपासना और स्वाध्याय मनन जैसे उपचार बीजारोपण की तरह हैं जो खाद पानी, निराई, गुड़ाई, रखवाली आदि की चिरकाल तक अपेक्षा करते हैं और समयानुसार कल्प-वृक्ष बनकर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाते हैं। आन्तरिक दृष्टि से आनन्द विभोर और बहिरंग दृष्टि से श्रद्धा का पात्र बना हुआ भूदेव यह अनुभव करता है कि आत्म-विज्ञान ही जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 5


मंगलवार, 5 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 5 Sep 2023

🔷 प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को सार्थक एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने की आधारशिला-आस्तिकता को जीवन में प्रमुख स्थान देने का प्रयत्न करे। ईश्वर को अपना साथी, सहचर मानकर हर घड़ी निर्भय रहे और सन्मार्ग से ईश्वर की कृपा एवं कुमार्ग से ईश्वर की सजा प्राप्त होने के अविचल सिद्धान्त को हृदयंगम करता हुआ अपने विचारों और आचरणों को सज्जनोचित बनाने का प्रयत्न करता रहे। इसी प्रकार जिसे अपने परिवार में, स्त्री बच्चों से सच्चा प्रेम हो, उसे भी यही प्रयत्न करना चाहिए कि घर के प्रत्येक सदस्य के जीवन में किसी न किसी प्रकार आस्तिकता का प्रवेश हो। परिवार का बच्चा-बच्चा ईश्वर विश्वासी बने। 

🔶 यदि किसी को अधिक भौतिक अधिकार प्राप्त हुए हैं तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं होता कि दूसरों का उत्पीड़न किया जाए। आपका स्वास्थ्य उत्तम है तो दुर्बलों को सताइये नहीं। अपनी योग्यताओं का लाभ प्राप्त करिये पर दूसरों के अधिकार तो न छीनिए। संसार में सभी प्राणी स्वतन्त्र और स्वाभाविक जीवन व्यतीत करने के लिए आये हैं, अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के कष्ट पहुँचाना अन्याय है। सभी आपकी तरह सुख और सुविधायें प्राप्त करने के अधिकारी हैं। आपकी तरह वे भी अपने प्रयत्नों में लगे हैं, यदि किसी तरह उनकी सहायता नहीं कर सकते तो इतना कीजिये कि आपकी तरफ से उनके प्रयत्नों में किसी तरह की रुकावट न पैदा की जाय।

🔷 महानता की प्राप्ति के लिए हमें महान् आदर्शों एवं महान् सम्बलों का सहारा लेना पड़ता है। सद्गुणों के रूप में महानता का आह्वान करके उसे यदि अपने अन्तःकरण में धारण करें और उन्हीं प्रेरणाओं के अनुरूप अपना जीवन क्रम चलावें तो विकट परिस्थितियों में रहते हुए भी महानता प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ (भाग 5)

आत्मोत्कर्ष की आकांक्षा बहुत लोग करते हैं, पर उसके लिए न तो सही मार्ग जानते हैं और न उस पर चलने के लिए अभीष्ट सामर्थ्य एवं साधन जुटा पाते हैं। दिग्भ्रान्त प्रयासों का प्रतिफल क्या हो सकता है? भटकाव में भ्रमित लोग लक्ष्य तक किस प्रकार पहुँच सकते हैं? आज की यही सबसे बड़ी कठिनाई है कि आत्म-विज्ञान का न तो सही स्वरूप स्पष्ट रह गया है और न उसका क्रिया पक्ष- साधन विधान ही निर्भ्रान्त है। इस उलझन में एक सत्यान्वेषी जिज्ञासु को निराशा ही हाथ लगती हैं।

हमें यहाँ अध्यात्म के मौलिक सिद्धान्तों को समझना होगा। व्यक्ति के व्यक्तित्व में से अनगढ़ तत्वों को निकाल बाहर करना और उसके स्थान पर उस प्रकाश को प्रतिष्ठापित करना है जिसके आलोक में जीवन को सच्चे अर्थों में विकसित एवं परिष्कृत बनाया जा सके। इसके लिए मान्यता और क्रिया क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन प्रस्तुत करने पड़ते हैं। वे क्या हों, किस प्रकार हों, इसका शिक्षण थ्योरी और प्रेक्टिस के दोनों ही अवलम्बन साथ-साथ लेकर चलना होता है।

थ्योरी का तात्पर्य है वह सद्ज्ञान, वह आस्था विश्वास जो जीवन को उच्चस्तरीय लक्ष्य की ओर बढ़ चलने के लिए सहमत कर सके। इसे आत्मज्ञान, ब्रह्म-ज्ञान, तत्वज्ञान और सद्ज्ञान के नामों से जाना समझा जाता है- योग इसी को कहते हैं। ब्रह्म विद्या का तत्त्वदर्शन यही है। प्रेक्टिस- का तात्पर्य है वे साधन विधान जो हमारी क्रियाशीलता को दिशा देते हैं और बताते हैं कि जीवनयापन की रीति-नीति क्या होनी चाहिए और गतिविधियाँ किस क्रम से निर्धारित की जानी चाहिए? साधनात्मक क्रिया कृत्यों का यह उद्देश्य समझ लिया जाय तो फिर किसी को भी न तो अनावश्यक आशा बाँधनी पड़ेगी और न अवांछनीय रूप से निराश होना पड़ेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 5

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.5

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...