रविवार, 10 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 10 Sep 2023

जीवन क्या है? श्रुति कहती है कि जीवन के स्वरूप को समझा जाना चाहिए और उससे जुड़े तथ्यों को स्वीकार किया जाना चाहिए, चाहे वे कितने ही अप्रिय क्यों न प्रतीत होते हों? जीवन एक चुनौती है, एक संग्राम है, एक जोखिम है एवं उसे इसी रूप में अंगीकार करने के अतिरिक्त और चारा नहीं। जीवन ऐ रहस्य है, तिलिस्म है, भूल-भुलैया है, एक प्रकार का गोरखधंधा है। गंभीर पर्यवेक्षण के आधार पर ही उसकी तह तक पहुँचा जा सकता है। इसी आधार पर भ्रान्तियों के कारण उत्पन्न होने वाले खतरों से बचा जा सकता है। कर्त्तव्य के रूप में जीवन अत्यन्त भारी किन्तु अभिनेता की तरह हँसने-हँसाने वाला हल्का-फुलका रंगमंच भी है।

प्रभु आनन्द धन है। यदि आनन्द की प्राप्ति करना है तो प्रेम ही उसकी प्राप्ति का मुख्य साधन है। जिस परिवार या जिस समाज में परस्पर प्रेम है एक दूसरे से आत्मीयता है वह एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के दुख को अपना ही दुख मानता है। उसके निवारण हेतु वैसा ही प्रयत्न करता है जैसा कि अपने दुख के निवारण हेतु करता है। उसे आत्मवत् ही समझता है । उस परिवार और समाज में कैसे कटुता रहेगी? कैसे विषमता रहेगी? कैसे एक दूसरे की हानि करेंगे? वह तो यह समझेंगे कि उसकी हानि की हमारी हानि हैं वह परिवार और समाज सुखी रहेगा और उस प्रेम के द्वारा आनन्दघन प्रभु के निकट पहुँचेगा।

अपना स्वरूप अपना लक्ष्य अपना कर्तव्य यदि मनुष्य समझ सका होता तो उसका चिन्तन और कर्तव्य अत्यन्त उच्च कोटि का होता ऐसे नर को नारायण कहा जाता और उसके चरण जहाँ भी पड़ते वहाँ धरती धन्य हो जाती। पर अज्ञान के आवरण को क्या कहा जाय जिसने हमें नर पशु के स्तर पर देखने ओर उसी प्रकार की रीति नीति अपनाने के लिए निष्कृष्टता के गर्त में धकेल दिया है। माया का वही आवरण हमें नारकीय यातनाएँ सहन करते हुए रोता कलपता जीवन व्यतीत करने के लिए विवश करता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अन्तपारा दुष्पूरा तृष्णा दोष- शता

सम्पत्ति मात्र एक सीमित मात्रा में अपने पास रखी जा सकती है। उससे अधिक रखने के लिए गोदाम अपने पास है ही नहीं। फिर तृष्णाजन्य उपार्जन से संकट यह खड़ा हो जाता है कि जो चाहा गया है, यदि उतना मिल भी जाय, तो वह संचित न रखा जा सकेगा। चीज चाही हुई हो, प्रिय भी हो और मूल्यवान भी, पर उसे रखने का प्रबन्ध किये बिना, उसे जहाँ- तहाँ कैसे फेंक दिया जाय? स्थान बनाये बिना संग्रह कर लेना मुसीबत मोल लेने के समान है। पेट में चार रोटी का स्थान है।

मिष्ठान्न सामने अधिक मात्रा में उपस्थित हों और उन्हें छोड़ देने का मन न हो, रखने की जगह नहीं, ऐसी दशा में खाये जाने पर पेट में दर्द उठेगा ही। बाहर कहीं रखेंगे, तो चोरी होने या सड़ जाने का संकट खड़ा होगा। यह है सांसारिक मुसीबतों की जड़। साधनों की कमी नहीं, पचाने की क्षमता नहीं। ऐसी दशा में तृष्णा अपनी ही होते हुए भी अपने लिए ही संकट उत्पन्न करती है।

संसार में असीम वैभव भरा पड़ा है, पर वह पात्रता के अनुरूप ही उपलब्ध है। भगवान सुख इतना देता है, जितना हजम हो सके। बिना पचे भी दर्द होता है। यही है तृष्णाजन्य दुःख अन्यथा इस वैभव से भरे संसार में हमें अकारण दुःख क्यों उठाना पड़े?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 9 सितंबर 2023

👉 प्रतिकूलतायें जीवन को प्रखर बनाती हैं

आग के बिना न भोजन पकता है, न सर्दी दूर होती है और न ही धातुओं का गलाना- ढलाना सम्भव हो पाता है। आदर्शों की परिपक्वता के लिए यह आवश्यक है कि उनके प्रति निष्ठा की गहराई कठिनाइयों की कसौटी पर कमी और खरे- खोटे की यथार्थता समझी जा सके। बिना तपे सोने को प्रमाणिक कहाँ माना जाता है? उसका उपयुक्त मूल्य कहाँ मिलता है? यह तो प्रारंभिक कसौटी है।

कठिनाइयों के कारण उत्पन्न हुई असुविधाओं को सभी जानते हैं। इसलिए उनसे बचने का प्रयत्न भी करते हैं। इसी प्रयत्न के लिए मनुष्य को दूरदर्शिता अपनानी पड़ती है और उन उपायों को ढूँढना पड़ता है, जिनके सहारे विपत्ति से बचना सम्भव हो सके। यही है वह बुद्धिमानी जो मनुष्यों को यथार्थवादी और साहसी बनाती है। जिननेकठिनाईयों में प्रतिकूलता को बदलने के लिए पराक्रम नहीं किया, समझना चाहिए कि उन्हे सुदृढ़ व्यक्तित्व के निर्माण का अवसर नहीं मिला। कच्ची मिट्टी के बने बर्तन पानी की बूँद पड़ते ही गल जाते हैं। किन्तु जो देर तक आँवे की आग सहते हैं, उनकी स्थिरता, शोभा कहीं अधिक बढ़ जाती है।

तलवार पर धार रखने के लिए उसे घिसा जाता है। जमीन से सभी धातुऐँ कच्ची ही निकलती हैं। उनका परिशोधन भट्ठी के अतिरिक्त और किसी उपाय से सम्भव नहीं। मनुष्य कितना विवेकवान, सिद्धन्तवादी और चरित्रनिष्ठ है, इसकी परीक्षा विपत्तियों में से गुजरकर इस तप- तितीक्षा में पक कर ही हो पाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 8 सितंबर 2023

👉 क्षणिक अस्तित्व पर इतना अभिमान

अमावस की रात में दीप ने देखा-न चाँद और न कोई ग्रह नक्षत्र न कोई तारा-केवल वह एक अकेला संसार को प्रकाश दे रहा है। अपने इस महत्व को देख कर उसे अभिमान हो गया।

संसार को सम्बोधित करता हुआ अहंकारपूर्वक बोला-मेरी महिमा देखो, मेरी ज्योति-किरणों की पूजा करो, मेरी दया-दयालुता का गुणगान करो मैं तुम सबको राह दिखाता हूँ, प्रकाश देता हूँ इस प्रगाढ़ अन्धकार में तुम सब मेरी कृपा से ही देख पर रहे हो। मुझे मस्तक नवाओ, प्रणाम करो।

दीप के इस अहंकारोक्ति का उत्तर और किसी ने तो दिया नहीं, पर जुगनू से न रहा गया बोला-ऐ दीप! क्षणिक अधिकार पाकर इतना अभिमान, एक रात के अस्तित्व पर यह अहंकार केवल इस रात ठहरे रहो। प्रभात में तुमसे मिलूँगा तब तुम अपनी वास्तविकता से अवगत हो चुके होगे!

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 22

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.22

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पात्रता की परीक्षा

एक महात्मा के पास तीन मित्र गुरु-दीक्षा लेने गये। तीनों ने बड़े नम्र भाव से प्रणाम करके अपनी जिज्ञासा प्रकट की। महात्मा ने उनको शिष्य बनाने से पूर्व पात्रता की परीक्षा कर लेने के मन्तव्य से पूछा-”बताओ कान और आँख में कितना अन्तर है?”

एक ने उत्तर दिया- केवल पाँच अंगुल का, भगवन् महात्मा ने उसे एक ओर खड़ा करके दूसरे से उत्तर के लिये कहा। दूसरे ने उत्तर दिया-महाराज आँख देखती है और कान सुनते हैं, इसलिये किसी बात की प्रामाणिकता के विषय में आँख का महत्व अधिक है। महात्मा ने उसको भी एक ओर खड़ा करके तीसरे से उत्तर देने के लिये कहा। तीसरे ने निवेदन किया -भगवन् कान का महत्व आँख से अधिक है।

आँख केवल लौकिक एवं दृश्यमान जगत् को ही देख पाती है किन्तु कान को पारलौकिक एवं पारमार्थिक विषय का पान करने का सौभाग्य प्राप्त है। महात्मा ने तीसरे को अपने पास रोक लिया। पहले दोनों को कर्म एवं उपासना का उपदेश देकर अपनी विचारणा शक्ति बढ़ाने के लिये विदा कर दिया। क्योंकि उनके सोचने की सीमा बाह्यतत्व की परिधि में अभी प्रवेश कर सकने योग्य, सूक्ष्म बनी न थी।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 10


✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


गुरुवार, 7 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 7 Sep 2023

🔷 दयालु परमपिता प्यार के नाते विकास के अवसर सभी को देता है। विकास के अवसरों का लोभ उठाकर जो व्यक्ति योग्यता बढ़ा लेते हैं, उन्हें वह महत्वपूर्ण कार्य योग्यताओं के आधार पर सौंपता है। विकास के अवसर और सौंपे गए कार्य, इन दोनों में अंतर न कर पाने से मनुष्य समझता है कि भगवान किसी को अधिक अवसर देता है किसी को कम।

🔶 मार्गों के लक्ष्य निश्चित हैं; पर मनुष्य चुनते समय मार्ग के लक्ष्य की अपेक्षा मार्गों की सुविधाओं को रुचि अनुसार चुन लेता है। जो मार्ग पकड़ लिया, उसी के गंतव्य पर पहुँचना पड़ता है; फिर यह चाह महत्व नहीं रखती कि कहाँ पहुँचना चाहते थे।

🔷 जो स्वार्थ तक ही सीमित हैं, वे नर- पशु हैं। पशु अपने शरीर निर्वाह, अपनी रक्षा और अपने वंश विस्तार से अधिक सोच नहीं पाते। मनुष्य सोचने की क्षमता रखता तो है; पर स्वार्थवश पशुओं की सीमा से आगे बढ़ता नहीं, इसलिए नर पशु कहलाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्म साधना मानव संस्कृति का उच्चतम शिखर

वन्य पशुओं और जंगली झाड़ियों की तरह मनुष्य की सत्ता भी अनगढ़ होती है। उसे प्रयत्नपूर्वक सुगठित एवं परिष्कृत करने के लिए तत्त्वदर्शियों न जिस प्रक्रिया को अपनाया, उसे संस्कृति कहा जाता है। क्रमशः सभ्यता की लम्बी मंजिल पर चलते हुए ही मनुष्य उस स्तर पर पहुँचता है, जिससे मानवता गौरवान्वित होती है। यह सुन्दर संसार, व्यवस्थित समाज और व्यक्तित्वों के सुविकसित साधन सम्पन्न होने जैसे सभी वरदान इस संस्कृति साधना की देन हैं।

मनुष्य का व्यक्तित्व भी अपने आप में एक छोटा विश्व है। उसकी भीतरी और बाहरी सत्ता में इतना कुछ विद्यमान है जिसके सहारे आज का दयनीय दुर्दशाग्रस्त जीव कल सर्व समर्थ ब्रह्म बन सके। पर वह दिव्य वैभव प्रसुप्त पड़ा है। उसे कैसे जगाया और कैसे प्रयोग किया जाय, यह ऐसा विज्ञान है जिसे जानने पर विश्व की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियाँ करतलगत होती हैं।

आत्म-साधना, संस्कृति के उच्च सोपान पर पहुँचने का उच्च शिखर है, उस पर खड़ा होने वाला जो देखता, अनुभव करता और देता है, उसे निस्संकोच अनुपम और अद्भुत कहा जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.2

बुधवार, 6 सितंबर 2023

👉 जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ (अन्तिम भाग)

यह तथ्य हजार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि जीवन का परम श्रेयस्कर और शान्तिदायक उत्कर्ष आस्थाओं के परिष्कार- चिन्तन के निखार एवं गतिविधियों के सुधार पर निर्भर है। जीवन इन्हीं तीन धाराओं में प्रवाहित होता है। शक्ति के स्रोत इन्हीं में भरे पड़े हैं और अद्भुत उपलब्धियाँ उन्हीं में से उद्भूत होती हैं। इन्हें किस आधार पर सुधारा, सँभाला जाय इसकी एक विशिष्ट पद्धति है जिसे साधना कहते हैं। साधना का अर्थ है अपने अन्तरंग और बहिरंग को उच्चस्तर तक उठा ले चलना। इसे जीवन का अभिनव निर्माण एवं व्यक्तित्व का काया-कल्प भी कह सकते हैं। बोलचाल की भाषा में इसे योगाभ्यास तपश्चर्या कहते हैं।

चेतना का उच्चस्तरीय प्रशिक्षण देने को योग समझा जाय। क्रिया-कलाप में सुव्यवस्था का आरोपण तप माना जाय। इसके लिए कई तरह के प्रयोगात्मक अभ्यास करने पड़ते हैं। पहलवान बनने के लिए अखाड़े में जाकर छोटी-छोटी कसरतों का सिलसिला शुरू करना पड़ता है। कसरतों की खिलवाड़ और दंगल में कुश्ती पछाड़ कर यशस्वी होना दो अलग स्थितियाँ हैं, पर दोनों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। बीज का बोने का शुभारम्भ कालान्तर में विशाल वृक्ष बनकर सामने आता है।

पूजा-उपासना और स्वाध्याय मनन जैसे उपचार बीजारोपण की तरह हैं जो खाद पानी, निराई, गुड़ाई, रखवाली आदि की चिरकाल तक अपेक्षा करते हैं और समयानुसार कल्प-वृक्ष बनकर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाते हैं। आन्तरिक दृष्टि से आनन्द विभोर और बहिरंग दृष्टि से श्रद्धा का पात्र बना हुआ भूदेव यह अनुभव करता है कि आत्म-विज्ञान ही जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 5


मंगलवार, 5 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 5 Sep 2023

🔷 प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को सार्थक एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने की आधारशिला-आस्तिकता को जीवन में प्रमुख स्थान देने का प्रयत्न करे। ईश्वर को अपना साथी, सहचर मानकर हर घड़ी निर्भय रहे और सन्मार्ग से ईश्वर की कृपा एवं कुमार्ग से ईश्वर की सजा प्राप्त होने के अविचल सिद्धान्त को हृदयंगम करता हुआ अपने विचारों और आचरणों को सज्जनोचित बनाने का प्रयत्न करता रहे। इसी प्रकार जिसे अपने परिवार में, स्त्री बच्चों से सच्चा प्रेम हो, उसे भी यही प्रयत्न करना चाहिए कि घर के प्रत्येक सदस्य के जीवन में किसी न किसी प्रकार आस्तिकता का प्रवेश हो। परिवार का बच्चा-बच्चा ईश्वर विश्वासी बने। 

🔶 यदि किसी को अधिक भौतिक अधिकार प्राप्त हुए हैं तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं होता कि दूसरों का उत्पीड़न किया जाए। आपका स्वास्थ्य उत्तम है तो दुर्बलों को सताइये नहीं। अपनी योग्यताओं का लाभ प्राप्त करिये पर दूसरों के अधिकार तो न छीनिए। संसार में सभी प्राणी स्वतन्त्र और स्वाभाविक जीवन व्यतीत करने के लिए आये हैं, अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के कष्ट पहुँचाना अन्याय है। सभी आपकी तरह सुख और सुविधायें प्राप्त करने के अधिकारी हैं। आपकी तरह वे भी अपने प्रयत्नों में लगे हैं, यदि किसी तरह उनकी सहायता नहीं कर सकते तो इतना कीजिये कि आपकी तरफ से उनके प्रयत्नों में किसी तरह की रुकावट न पैदा की जाय।

🔷 महानता की प्राप्ति के लिए हमें महान् आदर्शों एवं महान् सम्बलों का सहारा लेना पड़ता है। सद्गुणों के रूप में महानता का आह्वान करके उसे यदि अपने अन्तःकरण में धारण करें और उन्हीं प्रेरणाओं के अनुरूप अपना जीवन क्रम चलावें तो विकट परिस्थितियों में रहते हुए भी महानता प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ (भाग 5)

आत्मोत्कर्ष की आकांक्षा बहुत लोग करते हैं, पर उसके लिए न तो सही मार्ग जानते हैं और न उस पर चलने के लिए अभीष्ट सामर्थ्य एवं साधन जुटा पाते हैं। दिग्भ्रान्त प्रयासों का प्रतिफल क्या हो सकता है? भटकाव में भ्रमित लोग लक्ष्य तक किस प्रकार पहुँच सकते हैं? आज की यही सबसे बड़ी कठिनाई है कि आत्म-विज्ञान का न तो सही स्वरूप स्पष्ट रह गया है और न उसका क्रिया पक्ष- साधन विधान ही निर्भ्रान्त है। इस उलझन में एक सत्यान्वेषी जिज्ञासु को निराशा ही हाथ लगती हैं।

हमें यहाँ अध्यात्म के मौलिक सिद्धान्तों को समझना होगा। व्यक्ति के व्यक्तित्व में से अनगढ़ तत्वों को निकाल बाहर करना और उसके स्थान पर उस प्रकाश को प्रतिष्ठापित करना है जिसके आलोक में जीवन को सच्चे अर्थों में विकसित एवं परिष्कृत बनाया जा सके। इसके लिए मान्यता और क्रिया क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन प्रस्तुत करने पड़ते हैं। वे क्या हों, किस प्रकार हों, इसका शिक्षण थ्योरी और प्रेक्टिस के दोनों ही अवलम्बन साथ-साथ लेकर चलना होता है।

थ्योरी का तात्पर्य है वह सद्ज्ञान, वह आस्था विश्वास जो जीवन को उच्चस्तरीय लक्ष्य की ओर बढ़ चलने के लिए सहमत कर सके। इसे आत्मज्ञान, ब्रह्म-ज्ञान, तत्वज्ञान और सद्ज्ञान के नामों से जाना समझा जाता है- योग इसी को कहते हैं। ब्रह्म विद्या का तत्त्वदर्शन यही है। प्रेक्टिस- का तात्पर्य है वे साधन विधान जो हमारी क्रियाशीलता को दिशा देते हैं और बताते हैं कि जीवनयापन की रीति-नीति क्या होनी चाहिए और गतिविधियाँ किस क्रम से निर्धारित की जानी चाहिए? साधनात्मक क्रिया कृत्यों का यह उद्देश्य समझ लिया जाय तो फिर किसी को भी न तो अनावश्यक आशा बाँधनी पड़ेगी और न अवांछनीय रूप से निराश होना पड़ेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 5

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.5

सोमवार, 4 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 4 Sep 2023

🔶जिनकी महत्वाकांक्षायें अतिशय बड़ी- चढ़ी हैं, जो बड़प्पन और वैभव बटोरने के लिए आतुर हैं, जिन्हें कुबेर सा धनी, इन्द्र सा समर्थ बनने की ललक है, वे औसत नागरिक का सामान्य जीवन जीने और संतोषपूर्वक रहने के लिए तैयार नहीं होते । दर्प और अहंकार प्रदर्शन किए बिना जिन्हें तृप्ति नहीं होती-ऐसे लोग जल्दी ही सम्पदा बटोरने और अपना तथा परिवार का वर्चस्व बढ़ाने के लिए आतुर हो उठते हैं ।

🔷 मनुष्य की महानता का सम्बन्ध बाह्य जीवन की सफलताओं से नहीं है। आन्तरिक दृष्टि से निर्मल, पवित्र और उदारमना व्यक्ति चाहे वह साधारण परिस्थितियों में ही क्यों न हो, महान आत्मा ही माना जायेगा। यह महानता साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के साधन चतुष्टय से परिपूर्ण होती है। हम आदर्शों की उपासना करें, विचारों में निर्मलता और जीवन में आत्मसंयम का अभ्यास करें, दूसरों की सेवा को ही परमात्मा की सच्ची सेवा मानें तो ही महानता का गौरव प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते है। अतः हमें साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में कभी भी आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये।

🔶ईश्वर ने हमें अपनी सर्वोत्कृष्ट कृति के रूप से विनिर्मित किया है। वह अविश्वस्त एवं अप्रमाणिक नहीं हो सकता, इसलिए हमें अपने ऊपर विश्वास करना चाहिये। ईश्वर हमारे भीतर निवास करता है। जहाँ ईश्वर निवास करे, वहाँ दुर्बलता की बात क्यों सोची जानी चाहिए? जब छोटा-सा शस्त्र या पुलिस कर्मचारी साथ होता है, तो विश्वासपूर्वक निश्चिन्त रह सकना सम्भव हो जाता है, फिर जब कि असंख्य वज्रों से बढ़ कर शस्त्र और असंख्य सेनापतियों से भी अधिक सामर्थ्यवान् ईश्वर हमारे साथ है, तब किसी से डरने या आतंकित होने की आवश्यकता ही क्यों होनी चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ (भाग 4)

बाहरी, दैवी और संसारी सहायताएँ मिलती तो हैं, पर उन्हें पाने के लिए पात्रता की अग्नि-परिक्षा में गुजरते हुए अपनी प्रामाणिकता का परिचय देना पड़ता है। उतना झंझट सिर पर उठाने का मन न हो- सहज ही कुछ इधर-उधर की ‘हथफेरी’ करके भौतिक सम्पदाएँ, आत्मिक विभूतियाँ पाने के लिए जी ललचाता भर हो तो कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व को महामानवों के स्तर पर गठित करना और उसके फलस्वरूप उच्चस्तरीय सिद्धियाँ प्राप्त कर सकना एक प्रकार से असम्भव ही है। उत्तर नकारात्मक समझा जा सकता है।

‘हाँ’ उस स्थिति में कहा जा सकता है जबकि साधक में यह विश्वास उभरा हो कि वह अपना स्वामी आप है- अपने भाग्य का निर्माण कर सकना उसके अपने हाथ की बात है। दूसरों पर न सही अपने शरीर और मन पर तो अपना अधिकार है ही और उसका अधिकार का उपयोग करने में किसी प्रकार का कोई व्यवधान या हस्तक्षेप कहीं से भी नहीं हो सकता। मन की दुर्बलता ही है जो ललचाती, भ्रमाती और गिराती है। तनकर खड़ा हो जाने पर भीतरी और बाहरी सभी दबाव समाप्त हो जाते हैं और अभीष्ट दिशा में निर्भयता एवं निश्चिन्तता के साथ बढ़ा जा सकता है। समुद्र की गहराई में उतर कर मोती ढूँढ़ने में विशिष्ट प्रकार के साधन एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।

जीवन समुद्र की गहराई में उतर कर एक से एक बहुमूल्य रत्न ढूँढ़ लाना सरल है। इसमें किसी बाहरी साधन या उपकरण की जरूरत नहीं- मात्र प्रचंड संकल्प शक्ति चाहिए। प्रचंड का तात्पर्य है धैर्य और साहस का उतनी मात्रा में समन्वय जिससे संकल्प के डगमगाते रहने की बाल बुद्धि उभर आने की आशंका न हो। स्थिर बुद्धि से सतत् प्रयत्न करते रहने और फल प्राप्ति में देर होते देखकर अधीर न होने की- वरन् दूने उत्साह से प्रयत्न करने की सजीवता जहाँ भी होगी वहाँ सफलता पैर चूमने के लिए सामने हाथ जोड़े- वहाँ सिर झुकाये खड़ी होगी। ऐसे मनस्वी व्यक्ति अपने को, अपने वातावरण को यहाँ तक कि; अपने प्रभाव क्षेत्र को काया-कल्प की तरह बदल सकने में सफल हो सकते हैं। जीवन परिष्कार की भविष्यवाणी करते हुए ऐसे ही लोगों की सफल सम्भावना को ‘हाँ’ कहकर आश्वस्त किया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 4

रविवार, 3 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 3 Sep 2023

आभूषणों से स्त्रियाँ नहीं सजतीं। यदि ऐसा रहा होता और इससे कुछ लाभ रहे होते तो हमारे पूर्व पुरुषों में भी इस प्रथा का प्रचलन रहा होता। साधारण मंगल आभूषणों के अतिरिक्त भारी सोने-चाँदी के जेवरों का प्रचलन हमारी अपनी संस्कृति से नहीं हुआ, वरन् यवनों ने यह विकृति भारतीय जीवन में पैदा की है। वैदिक साहित्य में सइस तरह के गहने का कहीं दर्शन नहीं है। स्त्रियाँ सरल और स्वाभाविक शृंगार फूल और पत्तों से कर लेती थीं उनमें वासना को बढ़ाने वाला कोई दोष नहीं होता था और न उनसे सामाजिक तथाराष्ट्रीय व्यवस्थ्ज्ञा में किसी तरह की गड़बड़ी पैदा होती थी।

संस्कारवान् बालकों की शिक्षा के लि नालन्दा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय की आवश्यकता होगी। जहाँ का प्रत्येक पाठ, प्रत्येक आचरण, प्रत्येक शिक्षण महामानव बनाने वाला हो। ऐसे विश्वविद्यालय बनाने और चलाने के लिए संभवतः हम इस शरीर से जिन्दा न रहेंगे, पर उसकी योजना तो स्वजनों के मस्तिष्क में छोड़ी ही जानी होगी।

विवाहों का मँहगा बनाना अपनी बच्चियों के जीवन विकास पर कुठाराघात करना है। जिन्हें अपनी या दूसरों की बच्चियों के प्रति मोह, ममता न हो, जिन्हें इस दो दिन की धूमधाम की तुलना में नारी जाति की बर्बादी उपेक्षणीय लगती हो वे ही विवाहोन्माद का समर्थन कर सकते हैं। जब तक विवाह को भी नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत की तरह एक बहुत ही सरल, स्वाभाविक, सादा और कम खर्च का न बनाया जायगा तब तक नारी जाति की उन्नति और सुख-शान्ति की आशा दुराशा मात्र ही रहेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ (भाग 3)

व्यक्तित्व क्या है- आस्था। मनुष्य क्या है- श्रद्धा। चेष्टाएँ क्या हैं- आकांक्षा की प्रतिध्वनि। गुण, कर्म स्वभाव अपने आप ने बनते हैं न बिगड़ते हैं। आस्थाएँ ही आदतें बनकर परिपक्व हो जाती हैं तो उन्हें स्वभाव कहते हैं। अभ्यासों को ही गुण कहते हैं। कर्म आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए शरीर और मन को संयुक्त रूप से जो श्रम करना पड़ता है, उसी को कर्म कहते हैं। इन तथ्यों को समझ लेने के उपरान्त यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्तित्व के स्तर और उसकी प्रतिक्रिया के रूप में आने वाले सुख-दुःखों की अनुभूति होती रहती है।

प्रसन्नता और उद्विग्नता को यों परिस्थितियों के उतार-चढ़ावों से जोड़ा जाता है, पर वस्तुतः वे मनःस्थिति के सुसंस्कृत और अनगढ़ होने के कारण सामान्य जीवन में नित्य ही आती रहने वाली घटनाओं से ही उत्पन्न अनुभूतियाँ भर होती हैं। कोई घटना न अपने आप में महत्वपूर्ण है और न महत्व हीन। यहाँ सब कुछ अपने ढर्रे पर लुढ़क रहा है। सर्दी-गर्मी की तरह भाव और अभाव का, जन्म-मरण और हानि-लाभ का क्रम चलता रहता है। हमारे चिन्तन का स्तर ही उनमें कभी प्रसन्नता अनुभव करता और कभी उद्विग्न हो उठता है। अनुभूतियों में परिस्थितियाँ नहीं, मनःस्थिति की भूमिका ही काम करती है।

जीवन के सफेद और काले पक्ष को समझ लेने के उपरान्त, सहज ही यह प्रश्न उठता है कि- क्या ऐसा सम्भव नहीं है कि परिस्थितियों के ढाँचे में ढले- लोक-प्रवाह में बहते हुए, संग्रहीत कुसंस्कारों से प्रेरित, वर्तमान अनगढ़ जीवन को; अपनी इच्छानुसार- अपने स्तर का फिर से गढ़ा जाय और प्रस्तुत निकृष्टता को उत्कृष्टता में बदल दिया? उत्तर ‘ना’ और ‘हाँ’ दोनों में दिया जा सकता है। ‘ना’ उस परिस्थिति में जब आन्तरिक परिवर्तन की उत्कट आकांक्षा का अभाव हो और उसके लिए आवश्यक साहस जुटाने की उमंगें उठती न हों। दूसरों की कृपा सहायता के बलबूते उज्ज्वल भविष्य के सपने तो देखे जा सकते हैं, पर वे पूरे कदाचित ही कभी किसी के होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


शनिवार, 2 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 2 Sep 2023

🔷 जब तक नारी वस्त्रों में, बनाव, शृंगार में, फैशन में, जेवर-आभूषणों में अपना व्यक्तित्व देखती रहेगी, पुरुषों के लिए कामिनी बनकर उनकी वासनाओं की तृप्ति के लिए ही अपना जीवन समझती रहेगी या खा-पीकर घर की चहारदीवारी में पड़े रहना ही अपना आदर्श समझेंगी, तब तक कोई भी शक्ति, नियम, कानून उसका उद्धार नहीं कर सकेंगे।

🔶 स्त्रियों में सभ्यता के नाम पर बढ़ता हुआ फैशन, बनाव, शृंगार, चमकीले, भड़कीले वस्त्र आदि गृहस्थ जीवन की स्थिति और मर्यादाओं पर बहुत बुरा प्रभाव डाल रहे हैं और इसके प्रभाव से समाज में अनेकों बुराइयाँ फैलती जा रही हंै। हालांकि सौन्दर्य, स्वास्थ्य, स्वच्छता, व्यवस्थित रहन-सहन के आवश्यक अंग हैं, किन्तु कृत्रिमता, बाह्य साधनों के प्रयोग से नित-नूतन मेकअप बनाना अस्वाभाविक और गलत रास्ता है। समाज में बढ़ते अनाचार, दुराचार के प्रोत्साहन में नारी के ये बनाव-शृंगार भी कम जिम्मेदार नहीं है।

🔷 परिवार बसा लेना आसान है, लोग आये दिन बसाते ही रहते हैं, उसका पालन भी कोई विशेष कठिन नहीं। सभी उसका पालन करते हैं, किन्तु परिवार को समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए उसका निर्माण करना एक श्रम साध्य कर्त्तव्य है। अधिकतर लोग परिजनों के लिए अधिकाधिक सुख-सुविधाएँ देने, उनके लिए अच्छा भोजन, वस्त्र तथा आराम की चीजें जुटाना ही पारिवारिक जीवन का उद्देश्य मान बैठे हैं। वे यह कभी नहीं सोच पाते कि भोजन, वस्त्र तथा शिक्षा, स्वास्थ्य के साथ परिवार की एक सर्वोपरि आवश्यकता भी है और वह है उसे सद्गुणी बनाना।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ (भाग 2)

वस्तुतः जीवन इतना तुच्छ, जटिल और घिनौना है नहीं। उसकी यथार्थता का मूल्यांकन करने के लिए थोड़ा गहराई में प्रवेश करना पड़ेगा। समुद्र की ऊपरी सतह पर तो कूड़ा-करकट, झागफेन, काई शैवाल लहरों की उठक-पटक के अतिरिक्त और कुछ नहीं पाया जा सकता। रत्न राशि तो समुद्र तल में पड़ी होती है। उसे पाने के लिए गहराई में उतरने वाले गोताखोरों जैसा कौशल और साहस सँजोना पड़ता है।

चेतना का स्थूल क्षेत्र पदार्थ- परिस्थिति और आतुरता भरी हलचलों में देखा जा सकता है। यह पशु जीवन है और प्रत्येक प्राणी को समान रूप से उपलब्ध है। जिसे जिस स्तर की काया मिली है वह उतने में ही अपने ढंग से रोता-गाता, गुजर कर लेता है। मनुष्य भी इसका अपवाद नहीं है। क्रिया में दौड़-धूप की उत्तेजना भर है, नशे में भी उत्तेजना होती है और कई लोग उसे भी आनन्द और सन्तोष का माध्यम बना लेते हैं। समझना एक बात है और यथार्थता दूसरी। कुछ को कुछ भी समझा जा सकता है, पर उस भ्रान्ति से बनता तो कुछ नहीं। स्थिति तो स्थिति ही रहती है। आनन्द सूक्ष्म में है। क्रिया से नहीं विचारणा से हमारा समाधान होता है और भावना की गहराई में उतरने से आनन्द का निर्झर फूट पड़ता है। यदि समाधान- तृप्ति एवं सन्तोष अभीष्ट हो तो क्रियाशील रहते हुए भी हमें ज्ञानवान बनना पड़ेगा। ज्ञान का आश्रय लिए बिना, दिग्भ्रान्त स्थिति में आशंका और उद्विग्नता ही छाई रहेगी। शान्ति तो समाधान में है; वह समाधान सद्ज्ञान का आश्रय लिए बिना अन्य किसी आधार पर हो नहीं सकता।

🔷 क्रिया स्थूल है और ज्ञान सूक्ष्म। क्रिया तक सीमित न रहकर, तत्व चिन्तन की गहराई में उतरने के प्रयत्न में, हमें चैन और सन्तोष मिलता है। एक परत इससे भी गहरी है- जिसे अन्तरात्मा कहते हैं। यहाँ आस्थाएँ रहती हैं। अपने सम्बन्ध में, प्रिय और अप्रिय के, उचित और अनुचित के, आदतों और प्रचलनों के, पक्ष और सिद्धान्तों के सम्बन्ध में अनेकानेक मान्यताएँ; इसी केन्द्र में गहराई तक जड़ें जमाये बैठी रहती हैं। व्यक्तित्व का समूचा ढाँचा, यहीं विनिर्मित होता है। मस्तिष्क और शरीर को तो व्यर्थ ही दोष या श्रेय दिया जाता है। वे दोनों ही वफादार सेवक की तरह हर आत्मा की ड्यूटी ठीक तरह बजाते रहते हैं। उनमें अवज्ञा करने की कोई शक्ति नहीं। आस्थाएँ ही प्रेरणा देती हैं और उसी पैट्रोल से धकेले जाने पर जीवन स्कूटर के दोनों पहिये- चिन्तन और कर्तृत्व सरपट दौड़ने लगते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 3

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.3

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