अनुदार स्वभाव के स्त्री-पुरुष कट्टर, एवं संकीर्ण मनोवृत्ति के होने के कारण यह चाहते हैं कि हमारा साथी हमारी किसी भी बात में तनिक भी मतभेद न रखे। पति अपनी स्त्री को पतिव्रत पाठ पढ़ाता है और उपदेश करता है कि तुम्हें पूर्ण पवित्रता, इतनी उग्र पतिव्रता होना चाहिए कि पति की किसी भी भली-बुरी विचारधारा, आदत, कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप न हो। इसके विपरीत स्त्री अपने पति से आशा करती है कि पति के लिए भी यह उचित है कि स्त्री को अपना जीवनसंगी, आधा अंग समझ कर उसके सहयोग एवं अधिकार की उपेक्षा न करे। यह भावनाएं जब संकीर्णता और अनुदारता से संमिश्रित होती हैं तो एक पक्ष सोचता है कि मेरे अधिकार का दूसरा पक्ष पूर्ण नहीं करता। बस यहीं से झगड़े की जड़ आरम्भ हो जाती है।
इस झगड़े का एकमात्र हल यह है कि स्त्री पुरुष को, और पुरुष स्त्री को, अपने मन का अधिकाधिक उदार भावना से बरते। जैसे किसी व्यक्ति का एक हाथ या एक पैर कुछ कमजोर, रोगी, या दोषपूर्ण हो तो वह उसे न तो काट कर फेंक देता है न कूट डालता है और न उससे घृणा, असंतोष, विद्वेष आदि करता है अपितु उस विकृत अंग को अपेक्षाकृत अधिक सुविधा देने और उसके सुधारने के लिए, स्वस्थ भाग की भी थोड़ी उपेक्षा कर देता है। यह नीति अपने कमजोर साथी के बारे में बरती जाय तो झगड़े का एक भारी कारण दूर हो जाता है।
झगड़ा करने से पहले आपसी विचार विनिमय के सब प्रयोगों को अनेक बार कर लेना चाहिए। कोई वज्रमूर्ख और घोर दुष्ट प्रकृति के मनुष्य तो ऐसे हो सकते हैं जो दंड के अतिरिक्त और किसी वस्तु से नहीं समझते। पर अधिकाँश मनुष्य ऐसे होते हैं जो प्रेम भावना के साथ, एकान्त स्थान में सब ऊँच नीच समझने से बहुत कुछ समझ और सुधर जाते हैं। जो थोड़ा बहुत मतभेद रह जाय उसकी उपेक्षा करके उन बातों को ही विचार क्षेत्र में आगे देना चाहिए जिनमें मतैक्य है।
.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1950 पृष्ठ 27
इस झगड़े का एकमात्र हल यह है कि स्त्री पुरुष को, और पुरुष स्त्री को, अपने मन का अधिकाधिक उदार भावना से बरते। जैसे किसी व्यक्ति का एक हाथ या एक पैर कुछ कमजोर, रोगी, या दोषपूर्ण हो तो वह उसे न तो काट कर फेंक देता है न कूट डालता है और न उससे घृणा, असंतोष, विद्वेष आदि करता है अपितु उस विकृत अंग को अपेक्षाकृत अधिक सुविधा देने और उसके सुधारने के लिए, स्वस्थ भाग की भी थोड़ी उपेक्षा कर देता है। यह नीति अपने कमजोर साथी के बारे में बरती जाय तो झगड़े का एक भारी कारण दूर हो जाता है।
झगड़ा करने से पहले आपसी विचार विनिमय के सब प्रयोगों को अनेक बार कर लेना चाहिए। कोई वज्रमूर्ख और घोर दुष्ट प्रकृति के मनुष्य तो ऐसे हो सकते हैं जो दंड के अतिरिक्त और किसी वस्तु से नहीं समझते। पर अधिकाँश मनुष्य ऐसे होते हैं जो प्रेम भावना के साथ, एकान्त स्थान में सब ऊँच नीच समझने से बहुत कुछ समझ और सुधर जाते हैं। जो थोड़ा बहुत मतभेद रह जाय उसकी उपेक्षा करके उन बातों को ही विचार क्षेत्र में आगे देना चाहिए जिनमें मतैक्य है।
.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1950 पृष्ठ 27
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