मंगलवार, 18 जुलाई 2023

👉 दाम्पत्य जीवन की सफलता का मार्ग (भाग 2)

अनुदार स्वभाव के स्त्री-पुरुष कट्टर, एवं संकीर्ण मनोवृत्ति के होने के कारण यह चाहते हैं कि हमारा साथी हमारी किसी भी बात में तनिक भी मतभेद न रखे। पति अपनी स्त्री को पतिव्रत पाठ पढ़ाता है और उपदेश करता है कि तुम्हें पूर्ण पवित्रता, इतनी उग्र पतिव्रता होना चाहिए कि पति की किसी भी भली-बुरी विचारधारा, आदत, कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप न हो। इसके विपरीत स्त्री अपने पति से आशा करती है कि पति के लिए भी यह उचित है कि स्त्री को अपना जीवनसंगी, आधा अंग समझ कर उसके सहयोग एवं अधिकार की उपेक्षा न करे। यह भावनाएं जब संकीर्णता और अनुदारता से संमिश्रित होती हैं तो एक पक्ष सोचता है कि मेरे अधिकार का दूसरा पक्ष पूर्ण नहीं करता। बस यहीं से झगड़े की जड़ आरम्भ हो जाती है।
 
इस झगड़े का एकमात्र हल यह है कि स्त्री पुरुष को, और पुरुष स्त्री को, अपने मन का अधिकाधिक उदार भावना से बरते। जैसे किसी व्यक्ति का एक हाथ या एक पैर कुछ कमजोर, रोगी, या दोषपूर्ण हो तो वह उसे न तो काट कर फेंक देता है न कूट डालता है और न उससे घृणा, असंतोष, विद्वेष आदि करता है अपितु उस विकृत अंग को अपेक्षाकृत अधिक सुविधा देने और उसके सुधारने के लिए, स्वस्थ भाग की भी थोड़ी उपेक्षा कर देता है। यह नीति अपने कमजोर साथी के बारे में बरती जाय तो झगड़े का एक भारी कारण दूर हो जाता है।

झगड़ा करने से पहले आपसी विचार विनिमय के सब प्रयोगों को अनेक बार कर लेना चाहिए। कोई वज्रमूर्ख और घोर दुष्ट प्रकृति के मनुष्य तो ऐसे हो सकते हैं जो दंड के अतिरिक्त और किसी वस्तु से नहीं समझते। पर अधिकाँश मनुष्य ऐसे होते हैं जो प्रेम भावना के साथ, एकान्त स्थान में सब ऊँच नीच समझने से बहुत कुछ समझ और सुधर जाते हैं। जो थोड़ा बहुत मतभेद रह जाय उसकी उपेक्षा करके उन बातों को ही विचार क्षेत्र में आगे देना चाहिए जिनमें मतैक्य है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1950 पृष्ठ 27


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सोमवार, 17 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 17 July 2023

जन-नेतृत्व के लिए अभिलाषी प्रतिभाओं को हमारी अत्यन्त नेक, व्यावहारिक और दूरदर्शिता पूर्ण सलाह यह है कि वे इधर-उधर न भटकें, भीड़ में धक्के न खाएँ, वरन् युग निर्माण योजना के कार्यक्षेत्र में सीधे प्रवेश करें और देखें कि वे आत्म-गौरव को तृप्त करने वाले ही नहीं, राष्ट्र की सर्वतोमुखी प्रगति में योगदान दे सकने वाला कितना महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न कर रहे हैं।

हमें राष्ट्र की ठोस और सर्वतोमुखी प्रगति यदि सचमुच अपेक्षित हो और सच्चे मन से इसके लिए काम करना हो तो उसके लिए कटिबद्ध होना चाहिए और बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति का समग्र अनुष्ठान करना चाहिए। इस प्रक्रिया का नाम ‘युग निर्माण योजना’ है। हर प्रतिभा को उस आधार पर काम करने की हर क्षेत्र में सुविधा अनुभव हो सकती है।

आज दशमुख के रावणों से नहीं, सौ कुटुम्बियों के कौरवों से नहीं, हजार भुजा वाले सहस्रबाहु से नहीं, बल्कि अरबों की जनसंख्या वाले मानव समाज पर अगणित दुष्प्रवृत्तियों और दुर्भावनाओं के साथ छाये हुए सर्वग्राही महाअसुर से जूझना है। इस महाभारत में किसी को भी दर्शक बनकर नहीं बैठे रहना चाहिए। जिसके पास जो है, उसी को लेकर आगे आना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दाम्पत्य जीवन की सफलता का मार्ग (भाग 1)

अनेक परिवारों में स्त्री-पुरुषों के मध्य वैसे मधुर संबंध नहीं देखें जाते जैसे कि होने चाहिएं। अनेकों घरों में आये दिन संघर्ष, मनोमालिन्य और अविश्वास के चिन्ह परिलक्षित होते रहते हैं। कारण यह है कि पति-पत्नी में से एक या दोनों ही केवल अपनी-अपनी इच्छा, आवश्यकता और रुचि को प्रधानता देते हैं। दूसरे पक्ष की भावना और परिस्थितियों को न समझना ही प्रायः कलह का कारण होता है।

जब एक पक्ष दूसरे पक्ष की इच्छानुसार आचरण नहीं करता तो उसे यह बात अपना अपमान, उपेक्षा या तिरस्कार प्रतीत होती है, जिससे चिढ़कर दूसरे पक्ष पर कटु वाक्यों का प्रहार या दुर्भावनाओं का आरोपण करता है। उत्तर-प्रत्युत्तर, आक्रमण-प्रत्याक्रमण, आक्षेप-प्रत्याक्षेप का सिलसिला चल पड़ता है तो उससे कलह बढ़ता ही जाता है। दोनों में से कोई अपनी गलती नहीं मानता, वरन् दूसरे को अधिक दोषी, प्रधान दोषी, प्रथम दोषी सिद्ध करने के लिए अपनी जिद को बढ़ाते रहते हैं। इस रीति से कभी भी झगड़े का अन्त नहीं हो सकता। अग्नि में ईंधन डालते जाने से तो और भी अधिक प्रज्वलित होती है।

जो पति-पत्नि अपने संबंधों को मधु रखना चाहते हैं उन्हें चाहिए कि दूसरे पक्ष की, योग्यता, मनोभूमि, भावना, इच्छा, संस्कार, परिस्थिति एवं आवश्यकता को समझने का प्रयत्न करें और उस स्थिति में मनुष्य के लिए जो उपयुक्त हो सके ऐसा उदार व्यवहार करने की चेष्टा करें तो झगड़े के अनेकों अवसर उत्पन्न होने से पहले ही दूर हो जावेंगे। हमें भली प्रकार समझ रखना चाहिए कि सब मनुष्य एक समान नहीं हैं, सबकी रुचि एक समान नहीं है, सबकी बुद्धि, भावना और इच्छा एक जैसी नहीं होती। भिन्न वातावरण भिन्न परिस्थिति और भिन्न कारणों से लोगों की मनोभूमि में भिन्नता हो जाती है। यह भिन्नता पूर्णतया मिट कर दूसरे पक्ष के बिलकुल समान हो जावें यह हो नहीं सकता। कोई स्त्री-पुरुष आपस में कितने ही सच्चे क्यों न हों, उनके विचार और कार्यों में कुछ न कुछ भिन्नता रह ही जायेगी।

📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1950 पृष्ठ 27

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रविवार, 16 जुलाई 2023

दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (अन्तिम भाग)

पति की आर्थिक कमी अथवा कम कमाई की आलोचना तो कभी करनी ही नहीं चाहिये। जहाँ तक संभव हो ऐसी-व्यवस्था रखिये कि उसका आभास कम से कम ही हो। पति की आर्थिक आलोचना करने का अर्थ है उसका मन अपनी ओर से विमुख कर देना। बाजार अथवा बाहर जाते समय अपनी फरमाइश की सूची पेश करने और आने पर उनके लिए तलाशी लेने लगने का स्वभाव पति को रुष्ट कर देने वाला होता है।

पति के प्रिय मित्रों की अनुचित आलोचना करना अथवा उनका सम्बन्ध विच्छेद कराने का प्रयत्न करना पति के एक सुन्दर सुख को छीन लेने के बराबर है। पति के मित्रों को स्वजन और शत्रु को शत्रु मानना पत्नी का प्रमुख कर्तव्य है जो पत्नियाँ अपना स्वतन्त्र अस्तित्व मान कर केवल अपने मित्र को मित्र और अपने विरोधी को विरोधी मानती हैं, वे अपने दोनों के बीच खाई खोदने की भूल करती हैं।

इसके अतिरिक्त संकट के समय में भी पति के पास मुस्काती हुई ही रहो। पति के सम्मुख गन्दी दशा में रहने वाली स्त्रियाँ अपने प्रति घृणा को जन्म देती हैं। अनेक स्त्रियों का स्वभाव होता है कि पति के पीछे तो वह खूब सजी-धजी रहती है, बाहर सज-धज कर निकलती हैं लेकिन घर में खासतौर से पति के सम्मुख गंदा व पुराना कपड़ा पहन कर आती हैं। उनका ख्याल रहता है कि पति उनके पास कपड़ों की कमी समझ कर और नयी साड़ियाँ लाकर देगा।

किन्तु यह प्रयत्न उल्टा है। इससे पति उसे स्वभाव से गन्दा समझ कर कपड़े लाकर देना बेकार समझते हैं। सदा मधुर और मृदुल बोलिये। नारियों की मीठी वाणी और अनुकूल मुस्कान का जादू पुरुष पर अधिकार जमा लेता है। यदि इस प्रकार पति-पत्नी एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखते हुए अपने यह कतिपय बाह्य और मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों का पालन करते रहें तो उनके बीच कभी कलह-क्लेश होने की सम्भावना ही न रहे और दाम्पत्य-जीवन का अधिक से अधिक आनन्द पा सकते हैं।

समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 28

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शनिवार, 15 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 15 July 2023

भारत का नारी समाज संकोच, भय छोड़कर महिला उत्कर्ष के अभियान में सम्मिलित हो यही युग की पुकार है। त्याग, बलिदान की तो उसमें कमी नहीं। लोभ, मोह छोड़ने की बात कहने को-कष्ट सहने के लिए तैयार होने का उद्बोधन करने की तो आवश्यकता प्रतीत नहीं होती, यह गुण तो उसमें प्रकृति प्रदत्त और जन्मजात है। उद्बोधन केवल संकोच और झिझक छोड़ने का करना है।

सफलता प्राप्त कर लेना ही काफी नहीं, उससे आत्म संतोष और जनकल्याण एवं स्वस्थ परम्परा का अभिवर्धन होना चाहिए। सही तरीके से प्राप्त की हुई सफलता ही वास्तविक सफलता है। यदि किसी ने कोई उन्नति या उपलब्धि अनुपयुक्त रीति से प्राप्त की है तो उससे अनेकों को वैसा ही करने की इच्छा उत्पन्न होगी और समाज में एक ऐसी प्रथा चल पड़ेगी जो हर किसी के लिए अहितकर परिणाम ही उत्पन्न करती रहे।

ऐसी नारियों की कमी नहीं हैं, जो सुयोग्य हैं अथवा सुयोग्य बनने के लायक जिनके पास समय, सुविधाएँ हैं। यदि पुरुष सहयोग करें तो निश्चय ही वे और भी अधिक योग्य बन सकती हैं। जो आज अशिक्षित, अयोग्य हैं उन्हें भी कल प्रशिक्षित एवं सुयोग्य बनाया जा सकता है। विवेकवान् व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वे अपने घर-परिवार की कई महिलाओं में से जिनके पास मनेाबल और अवकाश हो उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (भाग 5)

किन्तु नियम है कि ताली एक हाथ से कभी नहीं बजती। आदान के अभाव में प्रदान सम्भव नहीं होता। पति के साथ पत्नी को भी ऐसे कारण उपस्थित नहीं करना चाहिये, जिससे पति का उसकी ओर से मन फिरने की सम्भावना हो जाय।

सबसे पहले तो उसे पति की उचित सेवा में न तो प्रमाद करना चाहिये और न अरुचि ही। पति को जो कुछ पसन्द है खाने की वस्तुओं में उनका समावेश करते रहना चाहिये। दिन भर के परिश्रम के बाद रुचि कर भोजन और पत्नी की आवभगत उसको पूरी तरह ताजा कर देने के लिए पर्याप्त है। पति के आने पर जो पत्नियाँ उसकी सेवा स्वागत भूल कर अपनी गाथा लेकर बैठ जाती हैं या तत्काल बाजार का काम बतलाने लगती हैं, वे उसकी अनुकूलता कभी प्राप्त नहीं कर सकतीं।

खरीद फरोख्त के समय पति की आवश्यकताओं को प्राथमिकता दीजिये और सदैव यह ध्यान रखना चाहिये कि उसके कपड़े ज्यादा पुराने, फटे अथवा कम नहीं होने चाहिये। खाने-पीने की वस्तुओं में प्रयत्न करिए कि पति को अधिक न सही पुरुषोचित भाग तो मिलना ही चाहिये। पौष्टिक पदार्थों के उपयोग में पति की बराबरी करने का प्रयत्न न कीजिये और न अपने ऊपर इस स्पर्धा से अधिक खर्च करिये कि जब वह इतना व्यय करते हैं तो मैं क्यों न करूं। अपने वस्त्रों का स्तर यथा-सम्भव उतना ही रखिये जितना कि पति का हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 27

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शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 14 July 2023

युग निर्माण परिवार के तथाकथित अछूतों को यह कहा गया है कि अपने वर्ग में जितनी अच्छी तरह, जितनी अधिक मात्रा में काम कर सकते हैं, उतना दूसरे लोग नहीं कर सकते। उनमें से जिनमें जीवन हो, प्रकाश हो, उत्पीड़न के प्रति दर्द, विद्रोह तो वे भी निरी सुख-सुविधाओं की योजनान बनाएँ, वरन् पिछड़े वर्ग में प्रगतिशीलता उत्पन्न करने के लिए अपनी समस्त योग्यताओं को, साधनों को समर्पित कर दें।

पुरुष का विशेष उत्तरदायित्व है कि वे नारी उत्कर्ष में अतिरिक्त योगदान देकर पिछले दिनों किये गये अन्याय का प्रायश्चित करें, इसी प्रकार सवर्ण लोगों का कर्त्तव्य है कि तथाकथित अछूतों को पिछले दिनों लांछित किया गया है उतनी ही अधिक सुविधाएँ उन्हें ऊँचा उठाने तथा आगे बढ़ाने के लिए प्रदान करें। नीचे वाले ऊपर उठने के लिए अपनी सारी शक्ति लगा दें और ऊपर वाले पूरा सहारा देकर उन्हें ऊपर उठायें तथी वर्तमान विषमता का अंत हो सकेगा।

नारी समाज के उत्कर्ष में नारी को ही आगे आना पड़ेगा। भारतीय समाज की दशा विचित्र है। उसमें नर और नारी का सम्मिश्रण विचित्र शंका-कुशंकाओं, अविश्वासों और कुकल्पनाओं से घिरा रहता है। इसलिए नारी वर्ग के उत्कर्ष की अगणित योजनाओं को कार्यान्वित कर सकना नर को उतना सुगम नहीं, जितना नारी के लिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (भाग 4)

अपने से अच्छे कपड़े पत्नी को पहनाने वाले पति अपनी पत्नी पर बिना मंत्र के वशीकरण कर देते हैं और प्यार में बदली उसकी कृतज्ञता का आनन्द प्राप्त करते हैं। यदि अपने से अच्छे न भी पहनाये जायें तो कम से कम उस स्तर और उस मात्रा का तो प्रबन्ध किया ही जाना चाहिये, जो स्वयं अपने लिये करते हैं। इसी प्रकार साबुन, तेल आदि का भी प्रबन्ध पत्नी के लिये अपने से अच्छा ही करना चाहिये।

इन कतिपय पदार्थिक कर्तव्यों के साथ-साथ पति को कुछ मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों का भी निर्वाह करना चाहिये। इनमें से सबसे पहला कर्तव्य है प्रशंसा। उसके भोजन, और श्रृंगार की प्रशंसा कीजिये और प्रशंसा की आँखों से ही उसे देखिये। इससे उसको बड़ी पुलक और सुख की सिरहन प्राप्त होती है। उसे यह विश्वास रहता है कि पति को मैं और मेरे काम पसन्द हैं। यह पसन्दगी की भावना हर नारी की एक साथ होती है। इस पर वह अपना आराम और सुख-सुविधा तक निछावर करने को तैयार रहती है।

पत्नी के सेवा करते समय कभी भी उदास, उदासीन व तटस्थ मत रहिये। उससे हँसते-मुस्काते और एकाग्र होकर बात करने का प्रयत्न करिये। इससे उसको यह बड़ा संतोष रहता है कि पति उसको देखकर खिल उठता है, मेरी साधारण-सी बात में भी उसे रस आता है और शीघ्र ही मुझमें खो जाता है। वह इसे नारीत्व की विजय समझती है और नारी होने का अभिमान करने लगती है, जिसको प्रेम रूप में वह आभार स्वरूप समर्पित कर देती है।

बाजार से जब भी आइये कुछ न कुछ उसकी पसन्द की वस्तु अवश्य लेकर आइये। स्त्रियों का स्वभाव भी कुछ बच्चों जैसा होता है, अपनी पसन्द की छोटी-सी वस्तु भी पाकर बहुत अधिक प्रसन्न हो जाती हैं। यह और इस प्रकार के अन्य बाह्य और मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों का पालन करने वाले पतियों की पत्नियाँ सदा प्रसन्न रहती हैं और किसी भी स्थिति में गृह-कलह उपस्थित नहीं कर पाती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 27

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गुरुवार, 13 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 13 July 2023

इन दिनों आपत्तिकालीन स्थिति है, सामान्य समय नहीं। इन संकट के क्षणों में मानव जाति को अंधकारमय भविष्य के गर्त में गिराने से बचाने के लिए यदि सारा समय लगा दिया जाय और यह मान लिया जाय कि भौतिक जीवन जितना जी लिया उतना ही पर्याप्त है, तो यह अधिक दूरदर्शिता की, अधिक सराहनीय साहसिकता की बात होगी, पर न्यूनतम दो घण्टे तो लगाते ही रहना चाहिए।

इस युग के हर भावनाशील और जीवित व्यक्ति को गौतम बुद्ध, शंकराचार्य, समर्थ गुरऊ रामदास, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, रामतीर्थ, गाँधी, दयानंद आदि की तरह भरी जवानी में ही कर्मक्षेत्र में ही कूद पड़ना चाहिए, बुढ़ापे का इंतजार नहीं देखना चाहिए, पर इतना साहस न हो तो कम से कम इतना तो करना ही चाहिए कि पके फल की तरह पेड़ में चिपके रहने की धृष्टता न करें। जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे हो चुके हैं वे घर-गृहस्थी की छोटी सीमा में ही आबद्ध न रहकर विशाल कर्मक्षेत्र में उतरें और जनजागृति का शंख बजाएँ, युग परिवर्तन की कमान सँभालें।

युग निर्माण परिवार के स्त्री सदस्यों को यह विशेष कर्त्तव्य सौंपा गया है कि अपने पददलित वर्ग को ऊँचा उठाने में अपना ध्यान केन्द्रित करें और अपने वर्ग में सघन संपर्क बनाकर उसे ऊँचा उठाने के लिए आगे, आगे बढ़ाने  के लिए अधिकाधिक योगदान करें। सुख-सुविधाओं को लात मारकर वे नारी जाति के उत्कर्ष के लिए बढ़-चढ़ कर बलिदान प्रस्तुत करें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (भाग 3)

बहुत से स्वार्थी लोग बड़प्पन और अधिकार के अहंकार में हर वस्तु में अपना लाइन्स-शेयर (सिंह भाग) रखते हैं। वे नाश्ते और भोजन की सबसे अच्छी चीजें सबसे अधिक मात्रा में स्वयं उपभोग करते हैं। जो कुछ उल्टा-सीधा, थोड़ा बहुत बचता है, वह प्रसाद रूप में पत्नी बेचारी को मिलता है। यही हाल बाजार से लाये फल, मेवा, मिठाई आदि में भी होता है। यह बहुत ही हेय, तुच्छ  और क्रूर स्वार्थ है। इस व्यवहार की अधिक पुनरावृत्ति होने और यह समझ लेने पर कि पति का इसमें केवल स्वार्थ ही नहीं अहंकार भावना और कमाई का अधिकार भी शामिल है, यदि पत्नी का मन उससे फिर जाता है तो उसे ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता। ऐसे स्वार्थी पशुओं से पत्नी ही नहीं पूरे संसार को घृणा करनी चाहिये। वे इसी योग्य होते हैं।

अच्छे और भले पति हर अच्छी वस्तु को प्रेमपूर्वक अपनी प्रियतमा को ही अधिक से अधिक खिलाने-पिलाने में संतोष और सुख अनुभव करते हैं। चूँकि वे कमाई करते हैं इसलिये उन्हें अपना यह कर्तव्य अच्छी तरह याद रहता है कि कही संकोच-वंश पत्नी किन्हीं वस्तुओं को जी भर कर न खाने का अभ्यास न कर ले अथवा खाने में संकोच करे। वे अपने आप अपने सामने अथवा अपने साथ बिठा कर खिलाने का ही यथा सम्भव प्रयत्न करते हैं। ऐसे पतियों की पत्नी कितनी प्रसन्न और सुखदायक रहती हैं इसका अनुमान सहज नहीं।

पहनने, पहनाने में भी यह विषमता अच्छी नहीं। अनेक पति अपने लिए तो जब तब अच्छे से अच्छे और नये कपड़े बनवाते रहते हैं, तब भी कमी महसूस करते रहते हैं। किन्तु पत्नी की वर्षों पहले खरीदी दो-चार साड़ियाँ उन्हें शीघ्र ही खरीदीं जैसी मालूम होती है। जैसे सुन्दर कपड़े अपने लिये बनवाते हैं, वैसे पत्नी के लिए नहीं। ऐसे ‘फैलसूफ’ पति अपनी पत्नी का पूरा प्यार कभी नहीं पा सकते। उचित यह है कि पुरुष होने के नाते पति मोटे, सस्ते और सादे कपड़े पहने और पत्नी को अच्छे से अच्छे कपड़े पहनाये। वह सुन्दर है सुकुमार है, वस्त्र उसकी शोभा है।

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बुधवार, 12 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 12 July 2023

युग परिवर्तन के प्राचीन इतिहास के साथ एक महायुद्ध जुड़ा हुआ है। इस बार भी उसकी पुनरावृत्ति होगी, पर यह पूर्वकालिक शस्त्र युद्धों से भिन्न होगा। यह क्षेत्रीय नहीं, व्यापक होगा। इसमें विचारों के अस्त्र प्रयुक्त होंगे और घर-घर में इसका मोर्चा खुला रहेगा। भाई-भाई से, मित्र-मित्र से और स्वजन-स्वजन से लड़ेगा। अपनी दुर्बलताओं से हर किसी को स्वयं लड़ना पड़ेगा।

जहाँ कहीं अखण्ड ज्योति, युग निर्माण पत्रिकाएँ पहुँचती हैं, वहाँ यह कर्त्तव्य भी साथ ही जा पहुँचता है कि इन्हें अखबार, पुस्तक न समझा जाय, वरन् प्रकाश पुञ्ज मानकर इससे दूसरों को भी लाभान्वित होने दिया जाय। सज्जन लोग अपने कुएँ से दूसरों की प्यास बुझाते, अपने द्वार की बत्ती से दूसरों को रास्ता पाते देखते हैं तो प्रसन्नता अनुभव करते हैं। यह प्रसन्नता हममें से हर एक को अनुभव करनी चाहिए।

विज्ञान और धन की वृद्धि ने संसार को जितना सुख पहुँचाया है, उससे अधिक विपत्ति उत्पन्न की है। आर्थिक प्रगति यदि रावण के बराबर भी हर आदमी कर ले तो भी इस संसार में रत्ती भर भी खुशहाली नहीं बढ़ेगी। उस बढ़ी हुई सम्पदा के साथ जुड़ी दुर्बुद्धि ६० लाख यादवों की परस्पर लड़ कटकर मर जाने का ही पथ प्रशस्त करेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (भाग 2)

किसी प्रकार यदि बेचारी को थोड़ा-सा आराम का अवसर मिल भी जाता है तो फिर उनकी ऐसी गप्प और हा-हा-ही-ही चलती हैं कि उसके आराम का सारा समय पलक उठने, गिरने, जम्हाने और अलसाने में ही निकल जाता है और वह फिर थकी-थकी उठ कर दूसरे समय के काम में लग जाती है। यदि सौभाग्य ही कहिये, उनकी पत्नी कलाकार अर्थात् संगीत या वाद्य की जानकार हुई तब तो गारंटी के साथ उसके दिन का ही नहीं रात का भी आराम का समय बहुत-सा बेकार चला जाता है। खा-पीकर आराम से पड़कर पति देवता को संगीत लहरी की इच्छा होती है और वह पत्नी को महफिल लगाने के लिये मजबूर कर देते हैं।

जब संगीतज्ञ पत्नी से विवाह किया है तो फिर उसका लाभ क्यों न उठाया जाये? काम के बाद ही तो वह समय मिलता है, जिसमें उनकी कला का रस लिया जा सकता है। अनेक महानुभाव तो आप आराम से पड़ कर यदि उससे पैर नहीं दबवाते तो आधी-आधी रात तक उपन्यास सुना करते हैं। उनका तो कार्य दस बजे दिन से आरम्भ होता है, पत्नी का यदि चार पाँच बजे से आरम्भ होता है तो इससे क्या। वह तो अपनी जानते हैं पत्नी अपना मरे भुगते।

कपड़े जब घर में ही धुल जाते हैं तो क्या आवश्यक कपड़े इस परवाह से ना पहने जायें कि कम से कम चार पाँच दिन तक साफ रह सकें? हर दूसरे, तीसरे दिन कपड़ों का एक ढेर उसके लिये तैयार रहता है। बच्चों के कपड़ों के साथ वह दोपहर को पति देवता के कपड़े धोती, सुखाती और लोहा करती है। इस प्रकार बहुधा पत्नियों से इतना काम लिया जाता है कि जरा आराम करने का अवसर नहीं मिलता, जिसका फल यह होता है कि उसका स्वास्थ्य खराब हो जाता है, उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है और वह बात-बात पर झल्लाने, रोने लगती है। गृह-कलह आरम्भ हो जाता है।

वे बुद्धिमान गृहस्थ जिन्हें पारस्परिक प्रेम सद्भावना और सुख-शाँति वाँछित है, पत्नी से उतना ही काम लें जितना उचित और आवश्यक है। जो उनके अपने काम हों वे सब स्वयं ही करें। पारिवारिक जीवन में आलस्यपूर्ण नवाबी चलाना ठीक नहीं। पत्नी के पास घर गृहस्थी और बच्चों का पहले से ही इतना काम होता है कि उसे समय नहीं रहता। इस पर अपना काम सौंप कर काम की इतनी अति न कर दीजिये कि उसका शरीर टूट जाये। पत्नी जितनी अधिक स्वस्थ और प्रसन्न रहेगी उतनी ही मधुर और सरस होती चली जायेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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मंगलवार, 11 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 11 July 2023

शास्त्र, समाज, धर्म और व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह समानता की समान सुविधाएँ उत्पन्न करें। हर व्यक्ति अपनी योग्यता और सामर्थ्य का पूरा-पूरा लाभ देने के लिए बाध्य रहे। यह कर्त्तव्य निष्ठा भले ही भावनात्मक स्तर पर अध्यात्म द्वारा उत्पन्न की जाय, भले ही शासन उसके लिए कठोर प्रतिबंध लगाये। तरीका जो भी हो, हर मानव प्राणी को पूरा श्रम करने और उपलब्ध साधनों के उपभोग करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

अपने नैतिक और सामाजिक कर्त्तव्यों की गहरी अनुभूति तभी हो सकती है, जब आत्म-निर्माण और लोक-निर्माण की दिशा में कुछ व्यावहारिक कदम उठाये जाएँ, कुछ कष्ट सहा जाय, कुछ त्याग किया जाय और कुछ ऐसा शौर्य, साहस प्रदर्शित किया जाय जिससे विकृत मान्यताओं को उखाड़ने और परिष्कृत आस्थाओं की जड़ जमाने का अवसर मिले। इसी प्रयोजन के लिए रचनात्मक कार्य पद्धति युग निर्माण योजना बना हुआ है।

वस्तुतः पारिश्रमिक लेकर तो किसी से कुछ भी कराया जा सकता है, लेकिन सेवा वृत्ति का विकास तब होता है, जब उसी प्रकार के कार्य निःस्वार्थ भावना से किये जायें। रचनात्मक कार्य पद्धति इसी का नाम है। जिसके अनुसार विभिन्न स्तर के व्यक्तियों को सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए समय, श्रम, बुद्धि, प्रतिभा या साधनों का अनुदान देने के लिए बाध्य होना पड़ता हो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (भाग 1)

पति-पत्नी में कभी झगड़ा नहीं होना चाहिये। यह शोभनीय भी नहीं है और कल्याणकारी भी नहीं है। पति-पत्नी के झगड़े का मतलब है पूरे परिवार का नाश और उनके प्रगाढ़ प्रेम का अर्थ है, सुन्दर परिवार, सुखदायी गृहस्थ। पति-पत्नी के पारिवारिक लड़ाई-झगड़े के कुछ बाह्य और कुछ मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं। उनमें से अकर्तव्यशीलता भी एक विशेष कारण है। यदि पति-पत्नी परस्पर अपने बाह्य और मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों को सावधानीपूर्वक पूरा करते रहें तो उन दोनों में कभी कोई लड़ाई-झगड़ा न हो।

बाह्य कर्तव्यों में पति का सबसे पहला कर्तव्य है कि वह पत्नी के स्वास्थ्य का अपनी ओर से पूरा ध्यान रखे। बहुत स्वार्थी पति अपनी सेवा लेने के साथ-साथ पत्नी को हर समय किसी न किसी काम में लगाये रखते हैं। उनका विचार रहता है कि पत्नी से जितना ज्यादा से ज्यादा काम लिया जा सके, लिया जाना चाहिये। वह तो काम करने और सेवा करने के लिये आई ही है। जगह पर पानी, जगह पर खाना, यहां तक कि कपड़े-लत्ते और किताब, कागज, स्याही, दवात, तक जगह पर ही लेते हैं।

किसी वस्तु अथवा किसी काम के लिए जगह से उठना जानते ही नहीं। यहाँ तक कि कलम पेंसिल तक उसी से बनवाते और फाउंटेनपेन में रोशनाई तक उससे हीं भरवाया करते हैं। इतना ही नहीं इन तुच्छ कामों के लिए भी उन्हें आराम करती हुई अथवा कोई और आवश्यक काम करती हुई पत्नी को उठा देने में जरा भी दया या संकोच नहीं करते। बहुत से बाबू साहबों को तो पत्नी ही कोट-पतलून और टाई-जूते पहनाती है और हर रोज जूते पर पालिश किया करती है।

रसोई और नाश्ते के सम्बन्ध में तो उसे जितना हैरान किया जा सकता है किया जाता है। और यह मुसीबत छुट्टी के दिन तो और भी बढ़ जाती है। जरा यह बनाना, थोड़ा वह भी बना लेना, आज सुबह इसकी चाय है, शाम को उसका भोजन है, बहुत दिन से यह नहीं बना, वह चीज खाये तो कई दिन हो गये- की ऐसी रेल लग जाती है कि बेचारी पत्नी को दिन भर दम मारने और चूल्हें, अंगीठी के पास से उठने की फुरसत नहीं मिलती। आप तो कोच, कुरसी या चारपाई पर पड़ गये और मिनट-मिनट पर तरह-तरह की फरमाइशें चलाने लगे। अपनी इस नवाबी में उन्हें इस बात का जरा भी ध्यान नहीं रहता है कि उनकी इस फैल-सूफी से बेचारी पत्नी की हड्डी-हड्डी टूट जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 26

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सोमवार, 10 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 10 July 2023

सज्जनोचित परम्परा यही रही है कि यदि किसी के पास अतिरिक्त आय के स्रोत हैं तो उसमें से उपयोग, उपभोग उतना ही करे जितना कि उस समाज के औसत आदमी को उपलब्ध है। शेष को दान के रूप में समाज को वापिस लौटा देना चाहिए। यह प्रथा जब से बंद हुई, लोग लालचवश अधिक संग्रह करने और उसका विलासिता में अधिक उपयोग करने लगे तो समाज अनेक प्रकार के विप्लव, उपद्रव खड़े हो गये।

चाहे साम्यवादी पद्धति से मनुष्य को बलात् विवश किया जाय कि वह आवश्यकतानुसार लेने और सामर्थ्यानुसार काम करने की सर्वोपयोगी विधि व्यवस्था का पालन करे, चाहे आध्यात्मवादी अपरिग्रही आदर्श स्वेच्छा पूर्वक अपनाने की सादगी का देश के सामान्य नागरिक स्तर का निर्वाह करते हुए जो बचे उसे बिना किसी अहंकार या विज्ञापन के विशुद्ध कर्त्तव्य बुद्धि से समाज को दान रूप में लौटा दे-पद्धति कोई भी क्यों न हो दोनों का निष्कर्ष एक है।

ब्राह्मण-ब्राह्मण के बीच ऊँच-नीच है और अछूट-अछूत के के बीच छूआछात है। आदमी-आदमी के बीच छोटाई-बड़ाई हो सकती है, पर उसका आधार गुण, कर्म, स्वभाव, सेवा, सदाचार, परमार्थ जैसी उत्कृष्टताएँ होनी चाहिए। किसी को नीच तो माना जा सकता है, पर उसका कारण उसकी दुष्टता, दुबुर्दि ही होनी चाहिए। जन्म, जाति, वंश के रूप में सभी ब्रह्माजी के पुत्र, मनु की संतान हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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