शुक्रवार, 19 मई 2023

👉 स्वाध्याय और मनन मानसिक परिष्कार के दो साधन

मन बैसाखी गधे की तरह है जिसे नहला धुला देने पर भी मलीनता प्रिय लगती है और दूसरे ही दिन धूलि में लौटकर फिर पहले जैसी गंदगी में लिपट जाता है। हाथी की आदत भी ऐसी ही होती है। नदी तालाब में बैठा स्वच्छ होता रहेगा पर जब बाहर निकलेगा तो सूँड़ में रेत भर कर सारे बदन पर डाल लेगा। न जाने गंदगी में इन्हें क्या मजा आता है?

मन की आदत भी ऐसी ही गंदी है। स्वाध्याय और सत्संग के सम्पर्क में आकर कुछ समय के लिए ऐसा सज्जन बन जाता है मानो सन्त हो। रामायण गीता सुनते समय आँखों में आँसू आते हैं। नरक की पीड़ायें जानकर पश्चाताप भी होता है और मृत्यु की जब याद दिलाई जाती है जब डर भी लगता है कि मौत के दिन समीप आ पहुँचे। जिंदगी बीत चली। अब बचे कूचे दिनों का तो सदुपयोग कर ले। पर यह ज्ञान देर तक नहीं ठहरता किसी मुर्दे की जलाने जाते हैं तब मरघट में श्मशान वैराग्य’ उठता है। काया नाशवान् होने की बात सूझती है और लगता है इस क्षणभंगुर जीवन के लिए क्या बुराइयाँ ओढ़नी क्या पाप करने। क्या अहंकार करना- किस बात पर इतराना। उस समय तो यही ज्ञान जंचता है पर घर आते आते वह वैराग्य न जाने कहाँ हवा में उड़ जाता है और उसी पुराने ढर्रे पर गाड़ी के पहिये लुढ़कने लगते हैं।

यही स्थिति सदा बनी रहे तो ज्ञान, परमार्थ की बात बेकार है। चिकने घड़े की तरह यदि श्रेष्ठता भीतर घुसे ही नहीं तो बाहर की लीपा-पोती से क्या काम चलेगा। ज्ञान की सार्थकता तो तब है जब उसका प्रभाव अन्तः करण पर पढ़े और जीवन की रीति- नीति बदले। ऐसा न हो सका तो पढ़ने सुनने के - पोथी के बेंगने भूख को कहाँ बुझाते हैं।

हमें यह ध्यान में रखकर चलना चाहिए कि मन की मलीनता बढ़ाने के लिए कुछ बड़े और लगातार प्रयत्न करने पड़ते हैं तब कही वह काबू में आता है। घोड़े को सही रास्ते पर चलाने के लिए उसके मुँह में लगाम लगानी पड़ती है और हाथ में चाबुक रखना पड़ता है ऐसा ही प्रबन्ध मन के लिए किया जा सके तो ही वह रास्ते पर चलेगा।

नित्य स्वाध्याय की नियमित व्यवस्था रखनी चाहिए। स्वाध्याय का विशय केवल एक होना चाहिए- आत्म निरीक्षण एवं आत्म परिशोधन का मार्गदर्शन जो पुस्तकें इस प्रयोजन को पूरा करती है, आन्तरिक समस्याओं के समाधान में योगदान करती है केवल उन्हें ही इस प्रयोजन के लिए चुनना चाहिए। कथा पुराणों का उपयोग इस प्रसंग में निरर्थक है। आज की गुत्थियों को- आज की परिस्थितियों में- आज के ढंग में किस तरह सुलझाया जा सकता है- सो उसका दूरदर्शिता पूर्ण हल प्रस्तुत करे वही उपयुक्त स्वाध्याय साहित्य है। ऐसी पुस्तकों को हमें छाँटना और चुनना पड़ेगा उन्हें नित्य नियमित रूप से गंभीरता और एकाग्रतापूर्वक पढ़ने के लिए समय नियत करना पड़ेगा अन्तः करण की भूख बुझने के लिए यह स्वाध्याय साधना नितान्त आवश्यक है।

स्वाध्याय के बाद आता है मनन- चिंतन। जो पड़ा है उस पर बार-बार कई दृष्टिकोणों से विचार करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उस प्रकाश को बढ़ाने का क्या उपाय है? आदर्शों को अपने व्यक्तित्व में घुलाने के प्रसंग पर ऊहापोह करना, मनन और चिंतन का मुख्य उद्देश्य है। कमरे में नित्य झाडू लगाते हैं, स्नान रोज करते हैं, दाँत रोज साफ किये जाते हैं, बर्तन रोज साफ करने पड़ते हैं। मन की मलीनता की आदत से विरत करने के लिए उसे स्वाध्याय और मनन-चिंतन के बन्धन में नित्य बाँधना चाहिए। रास्ते पर चलने के लिए वह तभी सहमत हो सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जनवरी 1973 पृष्ठ 44

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.44

गुरुवार, 18 मई 2023

👉 मन को बालक्रीड़ाओं में भटकने न दें (अन्तिम भाग)

वासनाओं की पूर्ति क्षण भर के लिए होती है दूसरे की क्षण दूने वेग से फिर उभर आती है। उसकी पूर्ति में प्रसन्नता अनुभव करना ऐसा ही है जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चबाते हुए अपना ही जबड़ा घायल कर लेता है और उससे टपकने वाले खून को सूखी हड्डी का रस मानता है। चटोरपन और कामुकता की ललक को पूरी करने का प्रयत्न ठीक इस मूर्ख कुत्ते के समान है जो अपना ही जबड़ा घायल करता जाता है और लाभ कमाने की बात सोचता है। दाद खुजाकर अपने को लहू-लुहान कर लेने की तरह ही विषयासक्ति है। उससे मनुष्य अपनी ही जीवनी शक्ति को निचोड़ता और खोखला होकर बेमौत मरता है।

लोभ, मोह और अहंकार, वासना, तृष्णा और बड़प्पन यही विडम्बनाएँ आदि से अन्त तक मनुष्य के सिर पर भूत-पलीत की तरह चढ़ी रहती हैं और गहरे नशे की तरह विचारशीलता को कुँठित किये रहती हैं।

मन को समझाया जाना चाहिए कि जीवन सृष्टा की सर्वोपरि कलाकृति है वह अमानत के रूप में किसी महान प्रयोजन के लिए मिला है। इसे इस उपहासास्पद ढंग से न गँवाया जाये, जिससे समय निकल जाने पर पश्चात्ताप ही शेष रहे। शरीर की वास्तविक आवश्यकताएँ थोड़े से श्रम व समय में पूरी की जा सकती है फिर उन्हीं को बढ़ाते रहने और न पूरी हो सकने वाली विडंबनाएं रचने से क्या लाभ? 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1986 पृष्ठ 4

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/February/v1.4

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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 18 May 2023

मनोजगत् के प्रति दुर्व्यवहार की एक विडम्बना द्वेष, दुर्भाव और दुश्चिन्ताओं के रूप में देखी जा सकती है। जो प्रगति कर रहा है, उन्नति के पथ पर आगे बढ़ रहा है, उससे डाह रखकर हम उसकी प्रगति तो नहीं रोक सकते, हाँ अपने ही विकास में रोड़े जरूर खड़े कर सकते हैं। यह शत्रुता फिर किसके साथ बरती कही जाएगी, प्रगति करने वाले के साथ या अपने आपके साथ? इसी प्रकार की निर्मूल चिन्ताएँ, अकरणीय आशंकाएँ और आंतरिक द्वन्द्वों के बीच अपनी योग्यता, प्रतिभा, शक्ति को पीसते रहकर आत्म हिंसा का मार्ग ही तय किया जा सकता है।

जीवन निर्माण के लिए आत्म-निष्ठा पर आधारित आत्म-विश्वास की अभिवृद्धि आवश्यक है। इसका सहज मार्ग अपने कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्वों को ईमानदारी के साथ पूर्ण करते चलने में है। कार्यों के छोटे-बड़े की चिन्ता नहीं होनी चाहिए। छोटे-छोटे कार्यों के सम्पादन करते चलने से मनोबल बढ़ता है और आगे का मार्ग प्रशस्त होता है। बड़े लोगों ने अपने जीवन काल के प्रारंभ में छोटे काम ही हाथ में लिए थे। कोई भी कार्य छोटा और बड़ा नहीं होता, यह तो कार्य सम्पादन करने वालों की मनोभूमि पर आधारित होते हैं।

जीवन के हर क्षेत्र में विश्वास की आवश्यकता है। विश्वास हमारा मार्गदर्शन करता है तथा सद्पथ पर चलने की प्रेरणा देता है। जीवन रहस्य को समझने के लिए आत्म-विश्वास का सहारा लेना ही पड़ेगा। जीवन निर्माण में आत्म-विश्वास का प्रधान हाथ रहता है। जो व्यक्ति अपनी इस शक्ति का विकास नहीं कर पाये उन्हें अभाव और दरिद्रता में पलते हुए जीवन को समाप्त करना पड़ा। अविश्वासी व्यक्ति न तो किसी के सहायक हो पाते हैं और न दूसरों की आत्मीयता पूर्ण सहानुभूति ही प्राप्त कर पाते हैं।

अहंकार पर आधारित विश्वास पतन का द्वार खोलता है। भौतिकता के वशीभूत व्यक्ति संकीर्णता, स्वार्थपरता एवं अनुदारता के दलदल में फँस जाते हैं। अहंकार का आधार ही मनोविकार एवं भौतिक पदार्थ है। भोग-लिप्सा के सिवाय उसे कुछ दिखलाइ्र्र ही नहीं पड़ता। इसके अभिशाप से व्यक्ति दीन, दुःखी, असहाय तथा निष्प्राण होकर धरती पर भार स्वरूप बना रहता है। सभी अनर्थों की जड़ अहंकार जनित विश्वास ही है। अशान्ति, युद्ध, कलह और राग-द्वेष यहीं से उत्पन्न होते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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बुधवार, 17 मई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 17 May 2023

यह निर्विवाद है कि दूसरों के सहयोग की उपेक्षा करके कोई व्यक्ति प्रगतिशील, सुखी एवं समृद्ध होना तो दूर, ठीक तरह जिंदगी के दिन भी नहीं गुजार सकता, इसलिए प्रत्येक बुद्धिमान् व्यक्ति को इस बात की आवश्यकता अनुभव होती है कि वह अपने परिवार का, मित्रों का, साथी-सहयोगियों का तथा सर्वसाधारण का अधिकाधिक सहयोग प्राप्त करे और यह तभी संभव है जब हम दूसरों के साथ अधिक सहृदयता एवं सद्भावना पूर्ण व्यवहार करने का अभ्यास करें।

हर व्यक्ति में दक्षता के बीज समुचित मात्रा में विद्यमान रहते हैं। प्रश्न इतना भर है कि उनके विकास का प्रयत्न किया गया या नहीं?  यदि मनुष्य उनके विकास की आवश्यकता सच्चे मन से, गहरी संवेदना के साथ अनुभव करे तो भीतर से इतना उत्साह उठेगा कि प्रसुप्त क्षमताओं के सजग-सक्रिय होने में देर न लगेगी।

आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति को गरीबी या मुसीबत के थपेड़े ही सक्रिय बनावें। प्रश्न दिलचस्पी का है। यदि कार्य की दक्षता को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया जाय और उस आधार पर अपनी प्रतिभा, गरिमा को विकसित करने का लक्ष्य रखा जाय तो यह विश्वास जमेगा कि हाथ में लिया हुआ हर काम अपने वर्चस्व का प्रमाण बनकर बाहर आये। अधूरे और बेतुके काम को यदि अपनी निन्दा, निकृष्टता का उद्घोष समझा जा सके तो फिर मन यही कहेगा कि जो कुछ किया जा रहा है, वह शानदार होना चाहिए। ऐसी ही मनःस्थिति में मनुष्य की दक्षता का विकास होता है।

हर असफलता के बाद हम दूनी क्रियाशीलता के साथ आगे बढ़ें, यह पुरुषार्थ की चुनौती है। जो एक ही ठोकर में निराश हो बैठा, जिसका आशा दीप एक ही फूँक में बुझ गया। उस दुर्बल मन व्यक्ति ने न जीवन का स्वरूप समझा और न संसार का। यहाँ पग-पग पर संघर्ष करना होता है। कदम-कदम पर साहस, धैर्य और पुरुषार्थ की परीक्षा देनी होती है। जो उस मूल्य को चुकाने के लिए तैयार न हों, उन्हें सफलता जैसे वरदान की आशा भी नहीं करनी चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 मन को बालक्रीड़ाओं में भटकने न दें (भाग 3)

किसी विचारवान की दृष्टि से देखा जाये तो इस प्रकार जिया जाना कृमि-कीटकों से, पशु-पक्षियों से ऊँचे स्तर का तनिक भी नहीं है। सभी जीवधारी ऐसा ही करते एवं इसी मार्ग पर चलते रहते हैं। भवन बनाने में दीमक, और दाने जमा करने में, श्रम करने में चींटी की मेहनत को सराहा ही जा सकता है। जमाखोरी के लिए खटने वालों में मधुमक्खी का जीवन इसी गोरख-धन्धे में बीतता है। दिन भर वह श्रम करती है और उस संचय का लाभ कोई दूसरे उठाते हैं। मनुष्य भी अपनी क्षमताओं का उपयोग इन्हीं प्रयोजनों के लिए करते रहते हैं। सब ओर जो होता दिखता है उसी की नकल वे स्वयं भी करने लगते हैं। मस्तिष्क में समझ तो बहुत होती है। शिक्षा और चतुरता तो बहुत अर्जित कर ली जाती है। पर उनका उपयोग भी इन्हीं तुच्छ प्रयोजनों के लिए होता रहता है। इसी कोल्हू में चलते पिलते वह दिन आ खड़ा होता है जिसके उपरान्त और कुछ करने को शेष नहीं रह जाता।

मन को समझाया जाना चाहिए कि जिस प्रकार एकाकी स्वार्थ चिन्तन में अपनी बुद्धि लगाई जाती है, उसी प्रकार यह भी देखा जाना चाहिए कि जीवन सम्पदा का उपयोग मानवोचित रीति से हुआ या नहीं? मनुष्य को अतिरिक्त बुद्धिमत्ता, अतिरिक्त क्षमता और प्रतिभाओं से भरा-पूरा जीवन दिया गया है। वह शरीर यात्रा भर के लिए खर्च नहीं हो जाना चाहिए जिस प्रकार कीड़े-मकोड़ों का होता है।

अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए मोर नाचता है, जुगनूँ चमकता है, भौंरा गूँजता है, पर इस विडंबना से क्या तो उन्हें मिलता है और क्या कोई और कुछ पता या सीखता है। वैभव बढ़ाकर ठाठ-बाट रोपने में हमें भी मिथ्या अभिमान के अतिरिक्त और क्या मिल पाता है। उपभोग की एक सीमा है। उसके बाद जो बचता है, उसे दूसरे मुफ्तखोर ही हड़प जाते और हराम की कमाई को फुलझड़ी की तरह जलाते हैं। हो सकता है यह मुफ्तखोर तथाकथित कुटुम्बी सम्बन्धी ही क्यों न हों?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1986 पृष्ठ 3


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मंगलवार, 16 मई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 16 May 2023

हमें अपने गुण, कर्म एवं स्वभाव का परिष्कार करना चाहिए। अपनी विचार पद्धति एवं गतिविधि को सुधारना चाहिए। जिन कारणों से निम्नस्तरीय जीवन बिताने को विवश होना पड़ रहा है उन्हें ढूँढना चाहिए और साहस एवं मनोबलपूर्वक उन सभी कारणों के कूड़े-कचरे को मन-मंदिर में से झाड़-बुहार कर बाहर फेंक देना  चाहिए। हम अपने उद्धार के लिए-उत्थान के लिए कटिबद्ध होंगे तो सारा संसार हमारी सहायता करेगा।

अध्यात्मवाद का ढाँचा इस उद्देश्य को लेकर खड़ा किया गया है कि व्यक्ति अपने आप में पवित्र, विवेकी, उदार और संयमी बने। दूसरों से ऐसा मधुर व्यवहार करे जिसकी प्रतिक्रिया लौटकर उसके लिए सुविधा और प्रसन्नता उपस्थित करे। ऐसी विचारणा और गतिविधि व्यक्ति अपना सके तो समझना चाहिए उसने अध्यात्मवाद के तत्त्वज्ञान को समझ लिया और लोक कल्याण के लक्ष्य तक पहुँचने का सुनिश्चित मार्ग पकड़ लिया।

यह संसार कुएँ की आवाज की तरह है, जिसमें हमारे ही उच्चारण की प्रतिध्वनि गूँजती है। यह संसार दर्पण की तरह है, जिसमें विभिन्न व्यक्तियों के माध्यम से अपना ही स्वरूप दिखाई पड़ता है। इस संसार के बाजार में कोई सुख-सुविधा अपने सद्गुणों के मूल्य पर ही खरीदी जाती है। जब हम अपने आपको सुधारने के लिए अग्रसर होते हैं, तो निश्चित रूप से यह दुनिया हमारे लिए अपेक्षाकृत अधिक सुधरी हुई, सुंदर और मधुर बन जाती है।

साहस ही जीवन की विशेषताओं को व्यक्त करने का अवसर देता है।मनुष्य में सभी गुण हों, वह विद्वान् हो, पंडित हो, शक्तिशाली हो, धनवान् हो, सद्गुण संपन्न हो, लेकिन उसमें साहस न हो तो वह अपनी विशेषताओं का, योग्यताओं का कोई उपयोग नहीं कर सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 14 May 2023

बुरे आदमी बुराई के सक्रिय, सजीव प्रचारक होते हैं। वे अपने आचरणों द्वारा बुराइयों की शिक्षा लोगों को देते हैं। उनकी कथनी और करनी एक होती है। जहाँ भी ऐसा सामंजस्य होगा उसका प्रभाव अवश्य पड़ेगा। हममें से कुछ लोग धर्म प्रचार का कार्य करते हैं पर वह सब कहने भर की बातें होती हैं। इन प्रचारकों की कथनी-करनी में अंतर रहता है। यह अंतर जहाँ भी रहेगा वहाँ प्रभाव क्षणिक ही रहेगा।   

अपने को अपने तक ही सीमित रखने की नीति से मनुष्य एक बहुत बड़े लाभ से वंचित हो जाता है, वह है दूसरों की सहानुभूति खो बैठना।

अखण्ड विश्वास के साथ जब कोई आस्तिक भूत, भविष्य और वर्तमान के साथ अपना संपूर्ण जीवन परमात्मा अथवा उसके उद्देश्यों को सौंप देता है, तब उसे अपने जीवन के प्रति किसी प्रकार की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं रहती। तब भी यदि वह चिन्ता करता है तो समझना चाहिए कि उसने अपना दायित्व पूरी तरह से सर्वशक्तिमान् को सौंपा नहीं है अथवा उसकी ईमानदारी में विश्वास नहीं करता।

दोष दिखाने वाले को अपना शुभ चिंतक मानकर उसका आभार मानने की अपेक्षा मनुष्य जब उलटे उस पर कु्रद्ध होता है, शत्रुता मानता और अपना अपमान अनुभव करता है, तो यह कहना चाहिए कि उसने सच्ची प्रगति की ओर चलने का अभी एक पैर उठाना भी नहीं सीखा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 मन को बालक्रीड़ाओं में भटकने न दें (भाग 2)

देखना यह है कि जीवन सम्पदा को किस निमित्त लगाया जाये? इसके लिए प्रचलन देखने की आवश्यकता है। मछलियों में बड़ी छोटी को निगल जाती है और उस बड़ी को मछुए के जाल में अपना प्राण गँवाना पड़ता है। प्रचलन ऐसा ही है। बहुमत ऐसे ही निरर्थक काम करता रहता है। समस्त पृथ्वी पर जितने मनुष्य रहते हैं, उतने दृश्य और अदृश्य कृमि कीटक एक मील की परिधि में रहा करते हैं। पर उनकी उपयोगिता क्या? पेट प्रजनन के कुचक्र में इधर से उधर भटकते रहते हैं। इसी स्तर का जीवन अधिकाँश मनुष्य जीते हैं। उनकी नकल क्या करनी? वनमानुषों, नर पशुओं का अनुकरण भी कोई करने लायक बात है।

बहुसंख्यक लोगों का क्रिया-कलाप ही प्रचलन कहाता है। बहुसंख्यक तो अपनी आत्मा सत्ता के अस्तित्व तक को भुला बैठे हैं। उन्हें अपना आपा काया मात्र के रूप में परिलक्षित होता है। अपनापन उन्हें शरीर तक सीमित प्रतीत होता है इसलिए उसी की सुख-सुविधा साधने में जीवन को रुचिपूर्वक खपाते रहते हैं। पेट की भूख, जननेन्द्रिय की तरंग, धन की ललक, बड़प्पन की बड़ाई की सनक। बस इसी सीमा में उनके क्रिया-कलाप बनते हैं। बच्चे जनने और उन्हें पालने में तो चुहिया भी प्रवीण होती है।

वह तीन सप्ताह में प्रौढ़ हो जाती है और एक बार में आठ दस बच्चे जनती है। यह प्रजनन वर्ष में प्रायः चार बार होता है। इस प्रकार तीस-चालीस बच्चों की जननी वह एक वर्ष में ही बन जाती है। हर बार पति बदलने पड़ते हैं इस प्रकार ढेरों की वह पर्यंक शाथिनी बन लेती है। इसमें कौन-सा व कैसा बड़प्पन? क्या गौरव, क्या महत्व? मनुष्य भी किशोरावस्था में ही प्रजनन कर्म में लगता है और बच्चे पैदा करने के अतिरिक्त उन्हें पालता भी है। यही जाल-जंजाल इतना बड़ा है जिसका कि ताना-बाना बुनते बुढ़ापा आ धमकता है और मौत अपने थैले में चना चबैना की तरह समेट ले जाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1986 पृष्ठ 3

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/February/v1.3


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रविवार, 14 मई 2023

👉 मन को बालक्रीड़ाओं में भटकने न दें (भाग 1)

बादलों का पानी जमीन पर गिरता है। जमीन से ढलान पर बहने वाली नदियों में जाता है और नदियाँ समुद्र के गहरे गर्त में जा गिरती हैं। पतन का यही स्वाभाविक क्रम है। मन को यदि रोका न जाये तो वह भी इसी दिशा में स्वभावतः चल पड़ेगा। इसलिए वर्षा के पानी को समुद्र के गर्त में से बचाकर किसी उपयोगी कार्य में लगाना या दिशा विशेष में बहाना हो तो उस पर भी रोकथाम लगानी होगी। पशुओं को खूँटे से बाँध कर ही निर्धारित कामों में लगाया जा सकता है अन्यथा वे छुट्टल छोड़ देने पर जिस-तिस का खेत उजाड़ेंगे। निरर्थक घूमेंगे और आपस में लड़ेंगे। इसलिए उन्हें अनुशासन में रखने के लिए मर्यादाओं का घेरा डालना और बंधन बाँधना पड़ेगा। मजबूत और ऊँचा बाँध बनाकर ही नदियों से सिंचाई के काम की नहरें निकाली जाती हैं।

मन को चिन्तन पक्ष में प्रशिक्षित करने के लिए उसे संयम के अनुबन्ध अपनाने के लिए प्रशिक्षित करना पड़ेगा। इन अनुबंधों को संयम कहते हैं। संयम के चारों पक्षों को गत अंक में अवगत कराया जा चुका है। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, और विचार संयम सीख लें तो समझना चाहिए कि अबोध मन वयस्क हो गया और उसने नहाने, कपड़ा धोने, दाँत माँजने, बिस्तर उठाने, बुहारी लगाने जैसे उपक्रम अपनाकर साफ-सुथरा रहना सीख लिया। उन्हें न अपनाने पर कल्पनाएँ और इच्छाएँ ऐसा नटखटपन करती रहेंगी जैसा अबोध बालक करते हैं। वे चन्दा मामा से लेकर तारा गणों की गेंदें बनाने के लिए मचल सकते हैं। इन अभिलाषाओं को- माँगों को- कोई पूरा नहीं कर सकता। तृष्णा की खाई इतनी गहरी है कि उसके लिए अनेकों जन्मों का परिश्रम खपाया जाये तो भी उसको पाटा नहीं जा सकता। अन्ततः अब या फिर कभी उन विडम्बनाओं में से कल्पनाओं को उबारना पड़ेगा तो उसके लिए चिन्तन पर अंकुश लगाने, इच्छाओं पर अंकुश लगाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग मिलेगा नहीं।

चिन्तन के उपरान्त मनुष्य की बड़ी शक्ति है- प्रयास श्रम एवं समय का सुनियोजन। जीवन का तात्पर्य वर्षों की लम्बाई नहीं, वरन् यह है कि उसके समय घटकों का किस प्रकार, किस निमित्त उपयोग किया गया। अनेकों थोड़े दिन जीते हैं, किन्तु अभिमन्यु और भगतसिंह की तरह, विवेकानन्द और रामतीर्थ की तरह अल्प आयु में ही अपने को, अपने समाज को कृत्य-कृत्य कर जाते हैं। कितने ही ऐसे होते हैं जो परम अवधि सौ वर्ष तक जी लेते हैं, पर रहते दूसरों पर भार बनकर ही हैं। ऐसे दीर्घ जीवन से क्या अपना और क्या दूसरों का लाभ?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1986 पृष्ठ 3


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शनिवार, 13 मई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 13 May 2023

पर-दोष दर्शन की दुर्बलता त्यागकर आत्म-दोष दर्शन का साहस विकसित कीजिए। जब दृष्टि देखने में समर्थ है तो वह गुण भी देखेगी और दोष भी। गुण औरों के और दोष अपने देखिए। जीवन में गुणों का विकास करने का यही तरीका है। जब आप स्वयं ही अपने दोष देखने लग जायेंगे तो दूसरों द्वारा इंगित करने पर आपमें कोई अप्रिय या प्रतिकूल प्रतिक्रिया न होगी। ऐसा होने से आप ईर्ष्या-द्वेष, वाद-विवाद, कुंठा एवं कुढ़न के विकारों से बच जायेंगे।

एक ओर जहाँ मनुष्य अपने को दयालु, क्षमाशील, करुण एवं पर-दुःखकातर होने का दावा कर रहा है, अपने को धर्मज्ञाता, अहिंसक तथा सहानुभूति संपन्न बतला रहा है, वहीं दूसरी ओर पशुओं को मारकर खा रहा है, खाल खींच रहा है, देवताओं के नाम पर उनके प्राण ले रहा है-क्या मनुष्य का यह कुत्सित कर्म उसे इस दावे से नीचे नहीं गिरा देता कि वह सृष्टि का सबसे श्रेष्ठ और धर्मशील प्राणी है?

स्वार्थी व्यक्ति यों किसी का कुछ प्रत्यक्ष बिगाड़ नहीं करता, किन्तु अपने लिए सम्बद्ध व्यक्तियों की सद्भावना खो बैठना एक ऐसा घाटा है, जिसके कारण उन सभी लाभों से वंचित होना पड़ता है जो सामाजिक जीवन में पारस्परिक स्नेह-सहयोग पर टिके हुए हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 अपनी वासनाएं काबू में रखिए (अन्तिम भाग)

देखो, जब तक तुम्हारे सामने कोई 500 रुपयों की थैली चुपचाप लाकर न रख दे तब तक तुम लोभी हो अथवा निर्लोभी, इसकी परीक्षा कैसे हो सकती है? यदि पाप न होते तो संसार में महात्मा और दुष्टों की पहचान कैसे होती। अतएव छल, अभिमान, माया, मोह इत्यादि कुवासनाओं से घेरे जाने पर अपने लिए असमर्थ मान कर उन्हें दोष का स्थान मानना मानो उन्नति के मार्ग से हटना है।

प्रत्येक व्यक्ति का अनुभव है कि वासनाओं की तपस्या कितनी कठिन है। पाप क्रोध के बुरे परिणामों के विषय में चाहे ग्रंथ के ग्रंथ लिख देने योग्य ज्ञान रखते हों, घंटों उस विषय पर व्याख्यान देकर लोगों को उनके आवेश के शमन करने की शिक्षा दे सकते हों, परन्तु जब सच्चे क्रोध का अवसर आ- उपस्थित होता है उस समय उसे संभाल लेना टेढ़ा काम है। इसीलिये किसी महात्मा का कथन है कि केवल ज्ञान के द्वारा आत्मोन्नति असंभव है। जानना और काम को कर दिखाना ये दो बातें हैं। काम-वासना को ही लीजिए पुराणों की तिलोत्तमा द्वारा ब्रह्माजी के तपो-भ्रष्ट होने की बात सभी को विदित है। पाँच हजार वर्ष तक दिव्य तप करने वाला योगी भी जिस काम-वासना को विजय न कर सका उसकी जलन का क्या ठिकाना है।

वासनाओं के अवगुणों और बुरे फलों की आलोचना करने के लिए यदि प्रतिदिन मनुष्य कोई विशेष समय नियत कर लेता उसकी नैतिक उन्नति बहुत शीघ्र हो सकती है। प्रत्येक धर्म में अपने दिन भर के कार्यों पर विचार करने के लिए सोने के पेश्तर समय निश्चित करने का उपदेश दिया गया है। उसका अभिप्राय यही है कि मनुष्य अपने नैतिक चरित्र की संभाल उसी भाँति कर लिया करे जैसे कि वह अपने दैनिक आय-व्यय किया करता है।

.... समाप्त
✍🏻 महात्मा जेम्स ऐलन
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1950 पृष्ठ 10


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शुक्रवार, 12 मई 2023

👉 अपनी वासनाएं काबू में रखिए (भाग 2)

अपने किये हुए अपराधों को दूसरों के सिर मढ़ते फिरने की कुटेव के कारण मनुष्य अपने ऐबों को नहीं देख सकता। जो कार्य उसने किया है उसका बुरा फल होने पर वह तुरन्त किसी दूसरे व्यक्ति को पकड़ने की कोशिश करने लगता है। अपने आलस्य द्वारा समय पर किये गये कार्यों की आलोचना होने पर वह अपने सिर का दोष दूसरों पर मढ़ देता है। यदि ऐसा करने के बदले वह अपने अपराध को मुक्त कंठ से स्वीकार कर ले तो संदेह नहीं कि वह दुबारा वैसा कार्य न करे।

अपने अपराध को स्वीकार करना यह उन्नति पथ के ऊपर मानों कई कदम आगे बढ़ना है। साधनों को दोष देते फिरना मूर्खता है। वास्तव में कैद का दंड देने वाला मजिस्ट्रेट नहीं है, तुम्हारे कुकार्य ही हैं। इसमें संदेह नहीं कि संसार में पाप-समृद्ध रूपी राक्षस नाना प्रकार के मनोहर रूप धारण कर मनुष्यों के चित्त को विकृत करने का प्रयत्न करते हैं, परन्तु उन्हें अपने हृदय में स्थान देना या न देना तुम्हारे काबू में है। जिस प्रकार भूतों का भय दृढ़चित्त मनुष्यों के हृदय में फटकने भी नहीं पाता उसी प्रकार सच्चरित्र मनुष्यों के पास आने में पाप-वासनाओं को भी बड़ा डर लगता है। लालच उसी के लिए है जो लालची है। निर्लोभी व्यक्ति को वह अपने फंदे में कभी नहीं फँसा सकता ।

अतएव इन कुवासनाओं को धिक्कारना और दोष देना निरर्थक है। मनुष्य की दृष्टि को भी हित करने वाले पाप-समूह की संसार में क्या आवश्यकता थी। भोले-भाले शुद्ध-हृदय मनुष्य को ठगना और उसे चक्कर में फंसाना निदान उसकी निन्दा करना और उसे दंड-पात्र ठहराना यह तो दुष्टों का माया-पूर्ण षड्यंत्र जंचता है। वास्तव में विचार करने से मालूम होता है कि पदार्थों की परीक्षा करने के लिए बहुधा भय-पूर्ण स्थलों का उपयोग किया जाता है। सोने की परीक्षा करने के लिए काली कसौटी चाहनी पड़ती है। इसी भाँति मनुष्य के हृदय की परीक्षा करने के हेतु ही पाप-वासनायें संसार में विद्यमान है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महात्मा जेम्स ऐलन
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1950 पृष्ठ 9



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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 12 May 2023

मौन मानसिक बहिष्कार खुले बहिष्कार से कहीं अधिक भयानक होता है। खुले बहिष्कार में मनुष्य को अपनी स्थिति तथा उनसे होने वाली हानियों का ज्ञान रहता है, जिससे उसको अपने सुधार की प्रेरणा मिलती रहती है और आगे-पीछे वह अपना सुधार कर भी सकता है, किन्तु जो मौन मानसिक बहिष्कार का शिकार होता है, उसे अपनी स्थिति की जानकारी नहीं रहती, जिससे वह आत्म-सुधार की प्रेरणा से भी वंचित रह जाता है।

आध्यात्मिक जीवन अपनाने का अर्थ है- असत् से सत् की ओर जाना। प्रेम और न्याय का आदर करना। निकृष्ट जीवन से उत्कृष्ट जीवन की ओर बढ़ना। इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन अपनाये बिना मनुष्य वास्तविक सुख-शान्ति नहीं पा सकता।

आत्मा की प्यास बुझाने के लिए,अंतःकरण को पवित्र करने के लिए, आत्म-बल बढ़ाने के लिए प्रेम साधना की अनिवार्य आवश्यकता है। रूखा, नीरस, एकाकी, स्वार्थी मनुष्य कितना ही वैभव संपन्न क्यों न हो, अध्यात्म की दृष्टि से उसे नर-पशु ही कहा जाएगा। जो किसी का नहीं, जिसका कोई नहीं, ऐसा मनुष्य कुछ भी अनर्थ कर सकता है। उसे अपने आपसे डर लगेगा और अपनी जलन में जीवित मृतक की तरह झुलसेगा। प्रेम रहित नीरस जीवन घृणित है, वह मनुष्य जैसे विकासवान् प्राणी के लिए हर दृष्टि से हेय है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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गुरुवार, 11 मई 2023

👉 अपनी वासनाएं काबू में रखिए (भाग 1)

किसी समय एक चोर ने न्यायाधीश के समक्ष अपनी चोरी की सफाई देते हुए इस भाँति कहा हुजूर मैंने चोरी तो अवश्य की है, परन्तु सच्चा अपराधी मैं नहीं हूँ। मेरे पड़ोसी ने अपना सोने का चमकदार कंठा दिखाकर मेरे मन को मोहित कर लिया और मुझे उसको चुरा लेने के लिए लाचार किया। अतएव सच्चा अपराधी वही है और सजा उसी को होनी चाहिए। अपराधी की ये बाते सुनकर जज साहब को उसकी युक्ति पर हँसी आ गई उन्होंने अपराधी को एकान्त वास की सजा देकर कहा कि अब तुम्हारा मन लुभाने के लिए तुम्हारे सामने कोई मनुष्य न आवेगा।

यदि सच पूछा जाये तो नैतिक संसार में मनुष्य प्रतिदिन इसी प्रकार की युक्तियों का उपयोग करता रहता है। अमुक मनुष्य मेरे कार्य में बाधा डालता है, अमुख ने मुझसे ऐसी बात कहीं जिससे मुझे क्रोध आ गया, चार आदमियों में बैठते हैं तो लाचार होकर ऐसा काम करना ही पड़ता है-, इत्यादि बातें अपने दोषों को दूसरों के सिर मढ़ने के प्रयत्न नहीं तो क्या हैं?

कितना अच्छा हो यदि मनुष्य कोई अपराध करने के साथ ही उसे स्वीकार करने में आना-कानी न करे। नैतिक उन्नति की सबसे पहली सीढ़ी यही है कि मनुष्य अपने अपराधों को समझने लगें। हजारों मनुष्य तो बुरे कार्यों को करते रहते और उन बेचारों को रंच मात्र भी खबर नहीं कि ये कार्य वास्तव में बुरे हैं। जिस समय चोर चोरी को सचमुच बुरा समझने लगे उसी समय से जान लो कि अब वह रास्ते पर आ रहा है। परन्तु केवल दिखाऊ मन की इच्छा से अथवा किसी की हाँ में हाँ मिलाने के अभिप्राय से बुरे कार्य बुरा कह देने से कोई नहीं ।

इससे तो उलटी हानि है। कुकार्य से घृणा होने की बात तो दूर रही, ऐसा करने से तो उसने अपने आपको ही ठगा कहना चाहिए। प्रवंचना अथवा मायाजाल इसी का नाम है परन्तु देखा जाता है कि लोक में मनुष्यों ने इसे ही सभ्यता और शिष्टाचार मान रखा है। ऐसे लौकिक व्यवहार की अवहेलना करने से समाज भले ही असंतुष्ट हो जाए, परन्तु उन्नति की इच्छा रखने वाले मनुष्य को इसमें आगा-पीछा न करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महात्मा जेम्स ऐलन
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1950 पृष्ठ 9

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/April/v1.9


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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 11 May 2023

हर मनुष्य में हर स्तर की क्षमता बीज रूप में विद्यमान है। प्रयत्नपूर्वक उन्हें जगाया और बढ़ाया जा सकता है। अधिक समय लगे और अधिक श्रम करना पड़े, यह बात दूसरी है, पर मंद गति कहे जाने वाले भी अध्यवसाय का सहारा लेकर उतने ही ऊँचे उठ सकते हैं, उतने ही सफल हो सकते हैं, जितने कि जन्मजात प्रतिभा वाले देखे जाते हैं।

जाति-पाँति के आधार पर किसी को हेय, हीन या छोटा समझना अध्यात्मवाद के सर्वथा विपरीत है। दुष्टता और सज्जनता के आधार पर किसी को नीच-ऊँच माना जाय, किसी कुकर्मी का तिरस्कार और श्रेष्ठ सत्पुरुष का सम्मान किया जाय यह बात दूसरी है, उसमें औचित्य है, पर केवल इसलिए किसी को नीच मानना कि वह अमुक जाति में पैदा हुआ है, सर्वथा अनुचित है।

जिस प्रकार बिजली से जीरो पावर का मद्धिम प्रकाश उत्पन्न होता है, उससे सौ किलोवाट का तेज चौंधिया देने वाली रोशनी का बल्ब भी जल सकता है। उसी प्रकार जिन शक्तियों और साधनों से हम अपना रोज का काम चलाते हैं, उन्हीं साधनों और शक्तियों से अपनी निर्धनता को भी दूर भगा सकते हैं, पर हमारी स्थिति ऐसी है जैसे इस उधेड़बुन में उलझे हुए व्यक्ति की जिसे जीरो पावर बल्ब को जलाने वाली बिजली की बड़ी सामर्थ्य पर ही शंका होती है। जिन क्षमताओं और शक्तियों का सहारा लेकर निर्धन से निर्धन और धनवान् से धनवान व्यक्ति अपना निर्वाह करते और काम चलाते हैं, वे हैं-बुद्धि, शक्ति, स्वास्थ्य और समय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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