सोमवार, 8 मई 2023

👉 जीवन संग्राम की तैयारी कीजिए (भाग 2)

एक जन्मजात गायक कभी भी शेयर बाजार में सफल नहीं हो सकता। जिसमें अदम्य साहस है, जो प्रत्येक स्थिति पर काबू पा लेता है और जो बिखरी शक्तियों को एक में समन्वित कर लेता है, वह दैनिक जीवन में चमक सकता है। इस बात में सभी विद्वान सहमत हैं कि यदि सूर्य के रथ को खींचने वाले द्रुतगामी घोड़ों को बैलगाड़ी में जोत दिया जाय, तो इससे बढ़कर मूर्खता की दूसरी बात हो ही नहीं सकती। इसलिए युवक को चाहिए की वह अपनी आत्मा को पहचाने और संरक्षकों तथा माता-पिता का सबसे बड़ा काम यही है कि उसे केवल इतनी सहायता दे जिसमें उसे अपनी शक्तियों का बोध अच्छी तरह हो जाय। अभिभावकों की अदूरदर्शिता और अति प्रेम के कारण कितनी ही प्रतिभाओं का विकास न हो सका।

अपनी शक्ति को पहचानने में भी बहुत बड़े धोखे हो जाते हैं। ‘पसंद’ और ‘प्रतिभा’ दो अलग अलग चीजें है और ‘पसंद’ को ‘प्रतिभा’ समझ लेना बड़ी भारी भूल है। यदि किसी को कविता सुनने में आनन्द आता है तो उसे वह न समझ लेना चाहिए कि वह कालिदास और भवभूति बन सकता है। पसंद और प्रतिभा में विवेक कर लेना कठिन भी है पर उसे इस प्रकार समझा जा सकता है। ‘प्रतिभा’ मनुष्य के हृदय के भीतर निरंतर जलने वाली ज्वाला है, वह उसकी महत्वाकाँक्षा को प्रतिफल भोजन देकर जीवित रखती है।

दिन-रात, सोते-जागते और उठते-बैठते, स्पष्ट या अस्पष्ट रूप से मनुष्य एक बड़ी भारी कमी अपने में महसूस करता है। उसे पूरा करने के लिए उसका हृदय तड़पता रहता है और उसी के चिंतन में उसे शान्ति मिलती है, बस प्रतिभा यही है। प्रतिभा केवल एक होती है, पसन्द अनेक होती हैं। गायिका के जमघट में बैठकर और संगीत का आनन्द लाभ करके जब यह इच्छा होती है कि कितना अच्छा हो यदि मुझे भी गाना आ जाये और उस समय यह भी सोच ले कि हम भी गीत का अभ्यास करेंगे मगर उस गोष्ठी से दूर हट कर वही इच्छा लुप्त हो जाती है और यदि महीनों उस संगति में न जाये तो उस ओर ध्यान भी नहीं जाता, वही स्थिति पसन्द का बोध कराती है। पसंद क्षणिक है, वह मन को केवल अस्थायी शान्ति देती है। मनुष्य परिवर्तन चाहता है ‘पसंद’ केवल इसमें सहायता देती है। यदि पसंद पूरी न हो तो मनुष्य को कोई दुख विशेष नहीं होता। एक औंस ‘प्रतिभा’ हजारों मन ‘पसंद’ से ज्यादा कीमती है। इसलिए राख के अन्दर छिपी हुई चिंगारी की तरह अपनी प्रतिभा को खोज निकालो।

📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1949 पृष्ठ 13


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रविवार, 7 मई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 7 May 2023

🔵अहंकार  एक विषैले सर्प की तरह  अंतःकरण में ही छिपा बैठा रहता है और अवसर पाते ही आघात कर देता हे। इसके दंश से मनुष्य की सद्बुद्धि मूर्छित हो जाती है और तब वह न करने योग्य काम करता हुआ अपने आपको आपत्तियों में डाल लेता है। अहंकार एक नहीं, हजारों आपत्तियों की मूल है।

🔴धर्म की स्थापना में राजनीति का सहयोग आवश्यक है और राजनीति के मदोन्मत्त हाथी पर धर्म का अंकुश रहना चाहिए। दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं, वरन् पूरक हैं। दोनों में उपेक्षा या असहयोग की प्रवृत्ति नहीं, वरन् घनिष्ठता एवं परिपोषण का तारतम्य जुड़ा रहना चाहिए।

🔵 मनुष्य अपना शिल्पी आप है। वह स्वयं ही आपना निर्माण करता है। आत्म तत्त्व की रक्षा ही सर्वोत्कृष्ट निर्माण माना गया है। इस निर्माण के लिए मनुष्य को सत्य तथा वास्तविक नीति का अवलम्बन करना चाहिए। सत्य मानव जीवन की सफलता के लिए सर्वोत्तम नीति है। इसको अपनाकर चलने वाले किसी भी दिशा और किसी भी क्षेत्र में अपना स्थान बनाकर अंत में परम पद के अधिकारी बनते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 जीवन संग्राम की तैयारी कीजिए (भाग 1)

मनुष्य का बचपन सावन की हरियाली है। उसमें चिंता नहीं, विकार नहीं और कर्त्तव्य का बंधन भी नहीं। बचपन का अंत मानो फूलों की सेज पर शयन करने के आनन्द की समाप्ति है। युवावस्था आते ही- मैं क्या बनूँगा?- यह एक प्रश्न दिन-रात प्रत्येक युवक की आँखों के सामने घूमा करता है। उसके माता-पिता और अभिभावकों के आगे यह समस्या आ जाती है कि- हम उसको क्या बनाये? युवावस्था को ‘मस्ती’ जैसे शब्दों की व्याख्या करना एक भयानक भूल है- संसार के निष्ठुर सत्य का सामना इसी समय करना पड़ता है। युवावस्था एक संग्राम है और युवक की एक भूल असफलता का कारण बन सकती है। युवावस्था शतरंज के खेल की भाँति ‘खेल’ कही जा सकती है पर यह याद रखना चाहिए कि एक गलत चाल से ही ‘जान’ का खतरा भी पैदा हो जाता है।

सम्भव है इस बात की गम्भीरता का अनुभव लक्ष्मी के कुछ वरद पुत्र न कर सकें। उनका ऐसा करना कुछ अनुचित भी नहीं मगर साधारण करोड़ों युवकों के लिए इसके महत्व को हृदयंगम कर लेना अति आवश्यक है। संग्राम में उतरने के पूर्व युद्ध कौशल के तत्वों की जानकारी आने वाली पराजय को विजय बना सकती है।

एक नवयुवक साहसी व्यक्ति को अपनी सफलता के लिए अपने शरीर और मन के स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए वह जान लेना जरूरी है कि वह जितना बड़ा बोझ अपने कंधों पर उठाने जा रहा है, उसके ढोने की शक्ति उसकी है या नहीं। बोझा ढोने में मनुष्य की लगन बड़ी सहायक होती है। चींटी अपने से बीसियों गुना भार उठा ले जाती है, क्योंकि उसमें सच्ची लगन है और अध्यवसाय है। वकील बनने की क्षमता रखने वाला, यदि रसायन शास्त्री बनने का प्रयत्न करे, तो इसे अपनी प्रतिभा का नष्ट करना ही कह सकते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1949 पृष्ठ 13


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शनिवार, 6 मई 2023

👉 तितिक्षा ही हमें सुदृढ़ बनाती है। (अन्तिम भाग)

🔷 कैक्टस जानते हैं कि अपनी सुरक्षा का प्रबन्ध ताप किये बिना गुजारा नहीं। इस दुनिया में उनकी कमी नहीं जो दूसरों का उन्मूलन करके ही अपना काम चलाते हैं। इनके सामने नम्र सरल बनकर रहा जाय तो वे उस सज्जनता को मूर्खता ही कहेंगे और अनुचित लाभ उठायेंगे। भोले कहे जाने वालों का शोषण इसी प्रकार होता रहा है। वे इस तथ्य से अवगत प्रतीत होते हैं। तभी तो अपनी सुरक्षा के लिए-आक्रमणकारियों के दाँत खट्टे करने के लिए उनने उचित व्यवस्था की हुई है। दूसरों पर आक्रमण भले ही न किया जाय पर अपनी सुरक्षा का इन्तजाम रखने और आक्रमणकारियों को बैरंग वापिस लौटाने की व्यवस्था तो करनी ही चाहिए। कैक्टस यह प्रबन्ध कर सकने के कारण ही इस दुरंगी दुनिया के बीच जीवित है।

🔶 कैक्टस के तनों पर नुकीले काँटे होते हैं। वनस्पति चर जाने के लालची पशु उनकी हरियाली देखकर दौड़े आते हैं पर जब काँटों की किलेबन्दी देखते हैं तो चुपचाप वापिस लौट जाते हैं।

🔷 इन पौधों की रंग-बिरंगी विभिन्न आकृति-प्रकृति की अनेक जातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से फिना मैरी गोल्ड, मिल्क वीड, ओपाईन, पर्सलेन, र्स्पज, जिकेनियम, डंजी मुख्य हैं। इनमें से कितने ही ऐसे होते हैं जिनकी आकृति सुन्दर प्रस्तर खण्डों जैसी लगती है।

🔶 यह पौधे अब सब जगह शोभा सज्जा के काम आते हैं। राजकीय उद्यानों में, श्रीमन्तों के राजमहलों में, कला प्रेमियों में इनका बहुत मान है। इन्हें लगाये बिना कोई साधारण वनस्पति उद्यान अधूरा ही माना जाता है। सर्वसाधारण में भी इनकी लोकप्रियता बढ़ी है और हर जगह उन्हें मँगाया सजाया जा रहा है।

🔷 सम्भवतः यह इनका दृढ़ता, कठोरता, स्वावलम्बिता और तितीक्षा जैसी विशेषताओं का ही सम्मान है।

🔶 मनुष्य जितना नाजुक बनता जायगा उतना ही दुर्बल बनेगा और परिस्थितियाँ उस पर हावी होंगी। किन्तु यदि दृढ़ता, तितीक्षा, कष्ट सहिष्णुता और साहसिकता अपनाये रहे तो न केवल शरीर वरन् मन भी इतना सुदृढ़ होगा जिसके सहारे हर विपन्नता का सामना किया जा सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 56

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/March/v1.56

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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 6 May 2023

प्यार आध्यात्मिक गुण है। उसकी सार्थकता तभी है, जब उसके साथ उत्कृष्टतावादी आदर्शों में समन्वय रह सके। ऐसा प्यार ही प्रयोक्ता और उपभोक्ता के लिए समान रूप से श्रेयस्कर होता है। सच्चे प्यार में एक आँख दुलार की और एक आँख सुधार की रहती है। इसके बिना अनीति पोषक मैत्री तो अमैत्री से भी अधिक अहितकर सिद्ध होती है।

अहिंसा एक आदर्श एवं दृष्टिकोण है, जिसमें दूसरों के सम्मान तथा अधिकार को अक्षुण्ण रहने देने की दृढ़ता, आत्मीयता, सहनशीलता, करुणा एवं उदारता का समावेश है। अपने कष्ट की ही तरह यदि दूसरों के कष्ट को भी माना जाय, अपनी क्षति की तरह ही यदि दूसरों की क्षति भी आँकी जाय तो सहज ही उस तरह की नीति अपनानी पड़ेगी जैसी कि हम दूसरों द्वारा अपने प्रति अपनाये जाने की अपेक्षा करते हैं।

पैसे से भी अधिक महत्त्वपूर्ण संपत्ति है-समय। खोया हुआ पैसा फिर पाया जा सकता है, पर खोया हुआ समय फिर कभी लौटकर नहीं आता। जो क्षण एक बार गये वे सदा के लिए गए। धन मनुष्कृत और समय ईश्वर प्रदत्त सम्पत्ति है। समय को यदि बर्बाद न किया जाय, उसे योजनाबद्ध दिनचर्या के साथ पूरी तत्परता और सजगता के साथ खर्च किया जाय तो सामान्य मनुष्यों की अपेक्षा कई गुना अधिक और कई गुना ऊँचे स्तर का काम किया जा सकता है।

मनुष्य कुसंस्कारों का गुलाम हो जाय, अपने स्वभाव में परिवर्तन न कर सके, यह बात ठीक नहीं जचती। यह मनुष्य के संकल्प बल और विचारों के दृष्टिकोण को समझकर कार्य करने पर निर्भर है। महर्षि वाल्मीकि, संत तुलसीदास, भिक्षु अंगुलिमाल, गणिका एवं अजामिल के प्रारंभिक जीवन को देखकर और आखिरी जीवन से तुलना करने पर यह स्पष्ट ही प्रतीत हो जाता है कि दुर्गुणी और पतित लोगों ने जब अपना दृष्टिकोण समझा और बदला तो वे क्या से क्या हो गये? चाहिए संकल्प बल की प्रबलता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शुक्रवार, 5 मई 2023

👉 तितिक्षा ही हमें सुदृढ़ बनाती है। (भाग 3)

पथरीली और रेतीली भूमि में-असह्य सूर्य ताप के बीच, पानी का घोर अभाव सहते हुए भी यह पौधे जीवित रहते और हरे-भरे बने रहते हैं। इन्हें रेगिस्तान का राजा कहा जाता है। पथरीली भूमि में दूसरे पौधे जीवित नहीं रह पाते क्योंकि वहाँ मिट्टी तो होती नहीं। पौधों के लिए आवश्यक पानी कैसे ठहरे? पानी के बिना पौधे कैसे जियें?

कैक्टस पौधों की सचेतना ऐसी है कि वे पानी के लिए जमीन पर निर्भर नहीं रहते। जब वर्षा होती है तब सीधे इन्द्र भगवान से अपनी आवश्यकता भर का पानी माँग लेते हैं और अपनी कोशिकाओं में भर लेते हैं।

प्रधानतया तो यह जल भण्डार तने में ही रहता है पर यदि उस जाति में पत्ते निकले तो उसमें भी उसी तरह की जल संग्राहक कोशिकाएं रहेंगी। यह तने पत्तियों की आवश्यकता भी स्वयं ही पूरी कर लेते हैं। सूर्य नारायण से आवश्यक प्रकाश प्राप्त करते रहने की क्षमता भी अपने में बनाये रहते हैं। तने में भरा हुआ जल भण्डार इतना प्रचुर होता है कि यदि लगातार छह वर्षों तक पानी न बरसे, इन्द्र देव रूठे रहें तो भी उनका एक तिहाई पानी ही मुश्किल से चुक पाता है।

सूर्य का ताप उनकी तरलता को भाप बना कर उड़ा न ले जाय इसके लिए उनका सुरक्षा आवरण बहुत मजबूत होता है। तनों का बाह्यावरण मोटा ही नहीं मजबूत भी होता है और उसमें ऐसे एक मार्गी छेद होते हैं जो सूर्य से प्रकाश तो ग्रहण करते हैं पर अपनी तरलता बाहर नहीं निकलने देते।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 55


✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 5 May 2023

कोई नियम, निर्देश, प्रतिबन्ध या कानून मनुष्य को सदाचारी बनने के लिए विवश नहीं कर सकते। वह अपनी चतुरता से हर प्रतिबन्ध का उल्लंघन करने की तरकीब निकाल सकता है, पर यदि आत्मिक अंकुश लगा रहेगा तो बाह्य जीवन में अनेक कठिनाइयाँ होते हुए भी वह सत्य और धर्म पर स्थिर रह सकता है। उसे कोई प्रलोभन, भय या आपत्ति सत्पथ से डिगा नहीं सकती। यह आध्यात्मिक अंकुश ही हमारे उन सारे सपनों का आधार है जिनके अनुसार समाज को सभ्य बनाने और युग परिवर्तन होने की आशा की जाती है।

स्मरण रहे, सहज मौन ही हमारे ज्ञान की कसौटी है। ‘जानने वाला बोलता नहीं और बोलने वाला जानता नहीं’-इस कहावत के अनुसार जब हम सूक्ष्म रहस्यों को जान लेते हैं तो हमारी वाणी बंद हो जाती है। ज्ञान की सर्वोच्च भूमिका में सहज मौन स्वयमेव पैदा हो जाता है।  मौन मनुष्य के ज्ञान की गंभीरता का चिह्न है।

सत्य ही सब तरह से हमारे लिए उपासनीय है। सत्य के मार्ग पर प्रारंभ में कुछ कठिनाइयाँ आ सकती हैं, किन्तु यह जीवन को उत्कृष्ट और महान् बनाने का राजमार्ग है। जिस तरह आग में तपाकर, कसौटी पर घिसकर सोने की परख होती है, उसी तरह सत्य की कसौटी पर खरा उतरने के लिए आने वाली कठिनाइयों का सामना करना ही उचित भी है और आवश्यक भी।

जो यह चाहते हैं कि कोई हमारी सहायता करे, हमें जीवन पथ पर चलने की दिशा दिखावे,  वे अंधकार में ही निवास करते हैं। ऐसी स्थिति से समाज में दासवृत्ति को जीवन और पोषण मिलता है, क्योंकि तब हम दूसरों का मुँह ताकते हैं। दूसरों से आशा करते हैं, ऐसे परावलम्बी व्यक्ति कभी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते, न अपनी स्वतंत्रता की रक्षा ही कर सकते हैं। हमें अपने ही पैरों पर आगे बढ़ना होगा। अपने आप ही अपनी मंजिल का रास्ता खोजना होगा, अपने पुरुषार्थ से ही अपने अधिकारों की रक्षा करनी होगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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बुधवार, 3 मई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 19 Oct 2016

■ पुरुषार्थ एक नियम है और भाग्य उसका अपवाद। अपवादों का अस्तित्व तो मानना पड़ता है, पर उनके आधार पर कोई नीति नहीं अपनाई जा सकती। जैसे कभी-कभी ग्रीष्म ऋुत में ओले बरस जाते हैं, यह अपवाद है। इन्हें कौतुक या कौतूहल की दृष्टि से देखा जा सकता है, पर इनको नियम नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार भाग्य की गणना अपवादों में तो हो सकती है, पर यह नहीं माना जा सकता कि मानव जीवन की सारी गतिविधियाँ ही पूर्ण निश्चित भाग्य विधान के अनुसार चलती हैं। यदि ऐसा होता तो पुरुषार्थ और प्रयत्न की कोई आवश्यकता ही न रह जाती।

◆ मनुष्य और भय परस्पर विरोधी शब्द हैं। मनुष्य में जिस शक्ति की कल्पना की जाती है उसके रहते उसे भय कदापि न होना चाहिए, पर आत्मबल की कमी और अपनी शक्तियों पर विश्वास न रखने से ही वह स्थिति बनती है। भय मनुष्य को केवल पाप से होना चाहिए। चोरी, छल, कपट, बेईमानी, मिलावट, जुआ, नशा, मांसाहार-इनसे सामाजिक जीवन में कलुष उत्पन्न होता है, इनसे भयभीत होना व्यक्ति और समाज के हित में है, किन्तु मृत्यु और विपरीत परिस्थितियों से घबड़ाता मनुष्योचित धर्म नहीं है।

■ भगवान् घट-घट वासी हैं। वे भावनाओं को परखते हैं और हमारी प्रवृत्तियों को भली प्रकार जानते हैं। उन्हें किसी बाह्य उपचार से बहकाया नहीं जा सकता। वे किसी पर तभी कृपा करते हैं जब भावना की उत्कृष्टता को परख लेते हैं। उन्हें भजन से अधिक भाव प्यारा है। भावनाशील व्यक्ति बिना भजन के भी ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, पर भावनाहीन व्यक्ति के लिए केवल भजन के बल पर लक्ष्य प्राप्ति संभव नहीं हो सकती।

◆ दूसरे व्यक्ति हमारे अनुकूल ही अपना स्वभाव बदल लें और जैसे हम चाहते हैं वैसे ही चलें यह सोचने की अपेक्षा यह सोचना अधिक युक्तिसंगत है कि इस बहुरंगी दुनिया से मिल-जुल कर चलने और जैसा कुछ यहाँ है उसी से काम चलाने के लायक लचक अपने अंदर उत्पन्न करें। समझौते की नीति पर यहाँ सारा काम चल रहा है। रात और दिन परस्पर विरोधी होते हुए भी जब संध्या समय एक जगह एकत्रित हो सकते हैं तो क्या यह उचित नहीं कि विरोधी तत्त्वों का भी समन्वय खोजें और मिल-जुलकर चलने का सह-अस्तित्व भी अपनाया जाय?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 तितिक्षा ही हमें सुदृढ़ बनाती है। (भाग 2)

जीव जगत में यह प्रक्रिया जहाँ भी अपनाई गई है वहाँ दृढ़ता बढ़ी है। पौधों में भी ऐसे साहसी मौजूद हैं जिन्होंने घोर विपरीतता से जूझ कर न केवल अपना अस्तित्व कायम रखा है वरन् शोभा, सौंदर्य की सम्पदा का स्थान भी पाया है।

घोर विपरीत परिस्थितियों में स्वावलम्बी जीवन जीने वाले पौधे वहाँ पैदा होते हैं जहाँ पानी का अभाव रहता है। उनकी आत्म निर्भरता यह सिद्ध करती है कि जीवन यदि अपनी पर उतर आये-तन तक खड़ा हो जाये तो विपरीत परिस्थितियों के आगे भी उसे पराजित नहीं होना पड़ता।

अमेरिका के मरुस्थल में और दक्षिणी अफ्रीका में पाये जाने वाले कैक्टस इसी प्रकार के हैं। वे जल के अभाव में जीवित रहते हैं। रेतीली जमीन में हरे-भरे रहते हैं और सब को सुखा-जला डालने वाली गर्मी के साथ अठखेलियाँ करते हुए अपनी हरियाली बनाये रहते हैं।

विकट परिस्थितियों के बीच रहने के कारण कुरूप भी नहीं होते वरन् बाग उद्यानों में रहने वाले शोभा गुल्मों की अपेक्षा कुछ अधिक ही सुन्दर लगते हैं। रेशम जैसे मुलायम, ऊन के गोले जैसे दर्शनीय, गेंद, मुद्गर, सर्प, स्तम्भ, ऊँट, कछुआ, साही, तीतर, खरगोश, अखरोट, कुकुरमुत्ते से मिलती-जुलती उनको कितनी ही जातियाँ ऐसी हैं जिन्हें वनस्पति प्रेमी अपने यहाँ आरोपित करने में गर्व अनुभव करते हैं। पत्तियाँ इनमें नहीं के बराबर होती हैं, प्रायः तने ही बढ़ते हैं पर उनकी ऊपरी नोंक पर ऐसे सुन्दर फूल आते हैं कि प्रकृति के इस अनुदान पर आश्चर्य होता है जो उसने इस उपेक्षित वनस्पति को प्रदान किया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 55


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👉 तितिक्षा ही हमें सुदृढ़ बनाती है। (भाग 1)

कठिनाइयों से डर कर यदि हिम्मत हार बैठा जाय बात दूसरी है अन्यथा प्राणधारी की अदम्य जीवनेच्छा इतनी प्रबल है कि वह बुरी से बुरी परिस्थितियों में जीवित ही नहीं-फलता-फूलता भी रह सकता है।

उत्तरी ध्रुव पर ‘एस्किमो’ नामक मनुष्य जाति चिरकाल से रहती है। वहाँ घोर शीत रहता है। सदा बर्फ जमी रहती है। कृषि तथा वनस्पतियों की कोई सम्भावना नहीं। सामान्य मनुष्यों को उपलब्ध होने वाले साधनों में से कोई नहीं फिर भी वे जीवित हैं। जीवित ही नहीं परिपुष्ट भी हैं। परिपुष्ट ही नहीं सुखी भी हैं। हम अपने को जितना सुखी मानते हैं वे उससे कम नहीं कुछ अधिक ही सुखी मानते हैं और सन्तोषपूर्वक जीवन यापन करते हैं। जरा सी ठण्ड हमें परेशान कर देती है पर एस्किमो घोर शीत में आजीवन रहकर भी शीत से प्रभावित नहीं होते।

जीवनेच्छा जब तितीक्षा के रूप में विकसित होती है और कष्ट साध्य समझी जाने वाली परिस्थितियों से भी जूझने के लिए खड़ी हो जाती है तो मानसिक ढाँचे के साथ-साथ शारीरिक क्षमता भी बदल जाती है और प्रकृति में ऐसा हेर-फेर हो जाता है कि कठिन समझी जाने वाली परिस्थितियाँ सरल प्रतीत होने लगें। वन्य प्रदेशों के निवासी-सभ्य शहरी लोगों की तुलना में जितने अभाव ग्रस्त हैं उतने ही सुदृढ़ भी रहते हैं। परिस्थिति को अनुकूल बनाने का प्रयत्न तो करना चाहिए पर परिस्थिति के अनुकूल अपने को ढालने की मनस्विता एवं तितीक्षा के लिए भी तत्पर रहना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 55

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/March/v1.55


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मंगलवार, 2 मई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 2 May 2023

🔶 दूसरे को बदनीयत मान बैठना, उसके हर कार्य में द्वेष-दुर्भाव की गंध सूँघना अपनी तुच्छता का प्रतीक है। सद्भावना से भी कोई व्यक्ति अपने से असहमत हो सकता है और अपनी आशाओं के प्रतिकूल उत्तर दे सकता है। इतने मात्र से हमें कु्रद्ध क्यों होना चाहिए। एक दूसरे के प्रति जो गलतफहमी की गाँठें मन में बन जाती हैं, उनके निवारण का उपाय एक ही है कि उससे एकान्त में जी खोलकर बात की जाय और वास्तविकता तथा गलतफहमी का सही रूप से निरूपण कर लिया जाय। इससे द्वेष का सबसे जबरदस्त किला सहज ही ढह सकता है।

🔷 सारे संसार को अपनी इच्छानुकूल बना लेना कठिन है, क्योंकि यह परमात्मा का बनाया हुआ है और अपनी इस कृति को वही बदल सकता है, पर अपनी निज की दुनिया को अपने अनुकूल बदल सकना हममें से हर एक के लिए संभव है। जिस प्रकार ईश्वर का बनाया हुआ एक संसार है, उसी प्रकार हर मनुष्य की बनायी हुई भी उसकी अपनी एक निजी दुनिया होती है, जिसे वह अपने दृष्टिकोण के अनुसार बनाता है। उसी में संतुष्ट-असंतुष्ट, खिन्न-प्रसन्न बना रहता है। यदि कोई चाहे तो अपनी दुनिया को बदल भी सकता है।

🔶 दुनिया किसी को तब बड़ा मानती है, जब वह औसत दर्जे के आदमी से अधिक ऊँचा सिद्ध होता है। जिसका सोचने का तरीका उच्च आदर्शों पर अवलम्बित है, जो किसी मार्ग पर पैर बढ़ाने से पहले सौ बार यह सोचता है कि एक श्रेष्ठ व्यक्ति के लिए यह उचित है या नहीं, वस्तुतः वही बड़प्पन का अधिकारी है।

🔷 यदि आप जीवन में आई विरोधी परिस्थितियों से हार बैठे हैं, अपनी भावनाओं के प्रतिकूल घटनाओं से ठोकर खा चुके हैं और फिर जीवन की उज्ज्वल संभावनाओं से निराश हो बैठे हैं तो उद्धार का एक ही मार्ग है- उठिए और जीवनपथ की कठोरताओं को स्वीकार कर आगे बढ़िए। तब कहीं आप उच्च मंजिल तक पहुँच सकते हैं। जीना है तो यथार्थ को अपनाना ही पड़ेगा और कोई दूसरा मार्ग नहीं है जो बिना इसके मंजिल तक पहुँचा दे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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सोमवार, 1 मई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 1 May 2023

हम जो सफलता चाहते हैं, जिसके लिए प्रयत्नशील हैं, वह कामना कब तक पूरी हो जावेगी, इसका उत्तर सोचने से पूर्व अन्य परिस्थितियों को भुलाया नहीं जा सकता। अपना स्वभाव, सूझबूझ, श्रमशीलता, योग्यता, दूसरों का सहयोग, सामयिक परिस्थितियाँ, साधनों का अच्छा-बुरा होना, सिर पर लदे हुए तात्कालिक उत्तरदायित्व, प्रगति की गुंजाइश, स्वास्थ्य आदि अनेक बातों से सफलता संबंधित रहती है और सब बातें सदा अपने अनुकूल ही नहीं रहतीं, इसलिए केवल इसी आधार पर सफलता की आशा नहीं की जा सकती कि हमने प्रयत्न पूरा किया तो सफलता भी निश्चित रूप से नियत समय पर मिल ही जानी चाहिए।

मनुष्य दूसरों को मात्र नैतिक उपदेश ही देता रहे तो उससे किसी का काम नहीं बनता। समय पर सहायता मिलना, मुश्किलें और कठिनाइयाँ दूर करना, उपदेश देने की अपेक्षा अधिक उपयोगी है। इसी से किसी को कुछ ठोस लाभ प्राप्त हो सकता है और यही ईश्वर की सच्ची पूजा है।

प्रसन्न रह सकना इस संसार का बहुत बड़ा सुख है। हर कोई प्रसन्नता चाहता है, आनंद की खोज में है और विनोद तथा उल्लासमयी परिस्थितियों को ढूँढता है। यह आकाँक्षा निश्चय ही पूर्ण हो सकती है यदि हम बुराइयों की उपेक्षा करना और अच्छाइयों से लिपटे रहना पसंद करें। इस संसार में सभी कुछ है। अच्छाई भी कम नहीं है। बुरे आदमियों में  भी अच्छाई ढूँढें, आपत्तियों से जो शिक्षा मिलती है उसे कठोर अध्यापक द्वारा कान ऐंठकर दी हुई सिखावन की तरह सीखें। उपकारों को स्मरण रखें। जहाँ जो कुछ श्रेष्ठ हो रहा है उसे सुनें और समझें। अच्छा देखो और प्रसन्न रहो का मंत्र हमें भली प्रकार जपना और हृदयंगम करना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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रविवार, 30 अप्रैल 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 30 April 2023

इस संसार में भावना ही प्रधान है। कर्म का भला-बुरा रूप उसी के आधार पर बंधनकारक और मुक्तिदायक बनता है। सद्भावना से प्रेरित कर्म सदा शुभ और श्रेष्ठ ही होते हैं, पर कदाचित् वे अनुपयुक्त भी बन पड़ें तो भी लोक दृष्टि से हेय ठहरते हुए वे आत्मिक दृष्टि से उत्कृष्ट ही सिद्ध होंगे। आंतरिक उत्कृष्टता, सदाशयता, उच्च भावना और कर्त्तव्य बुद्धि रखकर हम साधारण जीवन व्यतीत करते हुए भी महान् बनते हैं और इसी से हमारी लक्ष्य पूर्ति सरल बनती है।

यदि हम सज्जनता ढूँढने निकलें तो सर्वत्र न्यूनाधिक मात्रा में सज्जनता दिखाई देगी। मानवता के श्रेष्ठ गुणों से रहित कोई भी व्यक्ति इस संसार में नहीं है। सद्गुण और अच्छाइयाँ ढूँढने निकलें तो बुरे समझे जाने वाले मनुष्यों में भी अगणित ऐसी अच्छाइयाँ दिखाई देंगी जिनसे अपना चित्त प्रसन्न हो सके। इसके विपरीत यदि बुराई ढूँढना ही अपना उद्देश्य हो तो श्रेष्ठ, सज्जन और सम्भ्रान्त माने जाने वाले लोगों में भी अनेकों दोष सूझ पड़ सकते हैं और उनकी निन्दा करने का अवसर मिल सकता है।

जीवन में हर घड़ी आनंद और संतोष की मंगलमय अनुभूतियाँ उपलब्ध करते रहना अथवा द्वेष, विक्षेप और असंतोष की नारकीय अग्नि में जलते रहना बिलकुल अपने निज के हाथ की बात है। इसमें न कोई दूसरा बाधक है और न सहायक। अपना दृष्टिकोण यदि दोषदर्शी हो तो उसका प्रतिफल हमें घोर अशान्ति के रूप में मिलेगा ही और यदि हमारा सोचने का तरीका गुणग्राही है तो संसार की विविधता और विचित्रता हमारे मार्ग में विशेष बाधक नहीं हो सकती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आवेशग्रस्त न रहें, सौम्य जीवन जियें (अन्तिम भाग)

भय में अपनी दुर्बलता की अनुभूति प्रथम कारण है और दूसरा  है- हर स्थिति को अपने विपरीत मान बैठना। आशंकाग्रस्त व्यक्ति भोजन में विष मिला होने की कल्पना करके स्त्री द्वारा बनाये, परोसे जाने पर भी शंकाशील रहते हैं। ग्रह नक्षत्रों तक के प्रतिकूल होने दूरस्थ होने पर भी विपत्ति खड़ी करने की कल्पना करते रहते हैं। जैसा का तैसा मिल भी जाता है। डरपोकों को और अधिक डराने वाली उक्तियाँ बताने और घटनाएँ सुनाने वाले भी कहीं न कहीं से आ टपकते हैं।

अपने ऊपर भूत के आक्रमण की आशंका हो तो वैसी चर्चा करते ही ऐसे लोग तत्काल मिल जायेंगे जो उस भय का समर्थन करने वाले संस्मरण सुनाने लगे। भले ही वे सर्वथा कपोल कल्पित ही क्यों न हों। हाँ में हाँ मिलाने की आदत आम लोगों की होती है। भ्रान्तियों का खण्डन करके सही मार्गदर्शन कर सकने योग्य बुद्धिमानों और सत्याग्रहियों की बेतरह कमी हो गई है। गिरे को गिराने वाले ‘शाह मदारों’ की ही भरमार पाई जाती है। फलतः भ्रमग्रस्तों को और अधिक उलझन में फँसा देने वाले ही राह चलते मिल जाते हैं। भ्रान्तियों के बढ़ने का सिलसिला इसी प्रकार चलता रहता है।

ताओ धर्म के प्रवर्तक लाओत्स ने एक दृष्टान्त लिखा है- यमराज ने प्लेग को दस हजार व्यक्ति मार लाने के लिए हुक्म दिया। वह काम पूरा करके लौटे तो साथ में एक लाख मृतकों का समुदाय था। यमराज ने क्रुद्ध होकर इतनी अति करने का कारण पूछा। मौत ने दृढ़ता पूर्वक कहा- “उसने दस हजार से एक भी अधिक नहीं मारा। शेष लोग तो डर के मारे खुद ही मर गये हैं।”

मस्तिष्क को शान्त रखने में इच्छित परिस्थितियों की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। उसके लिए अपने सोचने का तरीका बदल देने और तालमेल बिठाते हुए सौम्य और शान्त स्तर का जीवनयापन करने की कला सीखने और अभ्यास में उतारने भर से काम चल सकता है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1984 पृष्ठ 40


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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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