रविवार, 2 अप्रैल 2023

👉 शत्रु बनाने का परीक्षित मार्ग (भाग 1)

दूसरों के दोष देखना कठिन बात नहीं है। सहज ही, छोटी मोटी भूलों को पकड़ कर किसी की भी आलोचना की जा सकती है। तिल का ताड़ बनाया जा सकता है। शब्दों की भी आवश्यकता नहीं। केवल भू−भ्रंगियों द्वारा नाक सिकोड़ कर अथवा मुँह बिचकाकर आप किसी भी व्यक्ति की आलोचना कर सकते हैं, तथा उसकी भूलों को प्रकाश में ला सकते हैं। किन्तु आलोचना करने से अथवा गलती पकड़ने से क्या वह व्यक्ति आपसे सहमत हो सकता है? “तुम बहुत फूहड़ हो। कितनी गन्दी पड़ी है अलमारी और फाइलों का यह हाल है?

वास्तव में तुम क्लर्की के योग्य नहीं हो।” यह हैं कुछ नपे तुले शब्द, जो एक अधिकारी अपने क्लर्क अथवा सेक्रेट्री से कहता है। यह वाक्य किसी भाँति एक छुरी से कम नहीं है। सीधे सीधे श्रोता के आत्माभिमान पर चोट करता है। उसके अहंभाव, निर्णय−बुद्धि तथा चतुरता पर प्रहार करता है। क्या इससे वह अपना मस्तिष्क बदल देगा। कदापि नहीं प्लेटो और कान्ट के महान तर्कशास्त्र का आश्रय लेकर भी उससे बहस की जाय, तो भी व्यर्थ होगा। क्योंकि आलोचना के इस वाक्य ने उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचाई है।

दूसरों के दोष देखना और आलोचना करना एक दो धार वाली तलवार है, जो आलोचक एवं आलोच्य दोनों पर चोट करती है। शत्रुओं की संख्या में वृद्धि करने का इससे सरल मार्ग और कौन सा हो सकता है? एक विद्वान का अनुभव है कि “मैं जब तक अपनी पत्नी के दोष ही देखता रहा, तब तक मेरा गृहस्थ जीवन कदापि शान्तिमय नहीं रहा”। इस प्रकार की प्रवृत्ति उत्पन्न होने पर सामने वाले व्यक्ति के दोष ही नजर पड़ते हैं, गुण नहीं। गुण—यदि उसमें हों भी−तो इस भाँति छिप जाते हैं जैसे तिनके की ओट पहाड़ छिप जाते हैं। पाश्चात्य सुप्रसिद्ध विचारक बेकन के अनुसार—पर छिद्रान्वेषण करना महा मानस रोग है। इससे मुक्त हो जाना ही चाहिये। मैथ्यू आर्नल्ड ने कहा था कि ‘दूसरों के दोष देखना−भगवान के प्रति कृतघ्न होना है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 24


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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 2 April 2023

भौतिक असंतोष एक प्रकार से मद्यपान की तरह है। उसकी उग्रता मनुष्य को इतना अधीर बना देती है कि उचित-अनुचित का भेद किये बिना वह कुछ भी करने पर उतारू हो जाता है। इस आवेग में जिन्हें लक्ष्य की पूर्णतया विस्मृति हो जाती है, ऐषणाओं की ललक मनुष्य को एक प्रकार से मदान्ध बना देती है। होती तो उससे भी  प्रगति है, पर वह परिणामतः अवगति से भी मँहगी पड़ती है। अस्तु, भौतिक असंतोष को हेय और आत्मिक असंतोष को सराहनीय माना गया है। सुख पाने के लालच में संतोष को गँवा बैठना अदूरदर्शितापूर्ण है।

आशावादी दृष्टिकोण एक दैवी वरदान है। आशा पर पाँव रखकर ही मनुष्य अपने जीवन का सारा ताना-बाना बुनता है। आशा ही सुखी रखती है, आशा ही संतुष्ट बनाती है, आशा ही जीवन है। उसे त्यागकर निराशा की मृत्यु का वरण हम क्यों करें? जितने दिन जीना है उतने दिन उत्साहपूर्वक जियें, मन और आत्मा को उन्मुक्त रखकर जियें। हमें सदैव इस बात पर भरोसा होना चाहिए कि हम आज की अपेक्षा कल निश्चित रूप से आगे बढ़े हुए होंगे-ऊँचे चढ़े होंगे।

संतोष आंतरिक और आत्मिक होता है। यह आदर्शवादी कर्तव्य-निष्ठा के अतिरिक्त और किसी माध्यम से उपलब्ध नहीं हो सकता। उत्कृष्ट चिंतन और आचरण के पीछे कर्त्तव्यपालन की आस्था काम करती है। इस आस्था को व्यवहार में परिणत होने का जितना ही अवसर मिलता है, उतना ही संतोष होता है। मानवतावादी, सज्जनोचित, अनुकरणीय चरित्र निष्ठा जिस अनुपात से फलवती होती है, उसी अनुपात से संतोष मिलता है।


✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शनिवार, 1 अप्रैल 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 1 April 2023

किसी भी कार्य की सफलता विश्वास पर टिकी रहती है। करो या मरो की भावना से ओतप्रोत होकर हम किसी कार्य को प्रारंभ करेंगे तो विजयश्री दौड़ी चली आएगी। विश्वास के अभाव में ही दुनिया की बहुत सी श्रेष्ठतम उपलब्धियों से हम वंचित रह जाते हैं। असफलताओं का कारण यह है कि लोग अपनी महत्ता को नहीं पहचान पाते और अपने को अयोग्य समझते हैं। जब हम पहले ही अपने को अयोग्य, असमर्थ और अभागा समझेंगे तो फिर योग्य, समर्थ और सौभाग्यशाली कैसे बन सकते हैं?

यह भ्रम जितनी जल्दी हटाया जा सके उतना ही अच्छा है कि कोई देव, दानव, मंत्र-तंत्र, गुरु, सिद्ध पुरुष, मित्र, स्वजन, धनी, विद्वान् हमारी कठिनाइयाँ हल कर देंगे या हमें संपन्न बना देंगे। इस परावलम्बन से अपनी आत्मा कमजोर होती है और अंतःकरण में छिपी प्रचण्ड आत्म-शक्ति को विकसित होने में भारी अड़चन पड़ती है। अस्तु, परावलम्बी मनोवृत्ति को जितनी जल्दी छोड़ा जा सके और आत्म-निर्भरता को जितनी दृढ़ता से अपनाया जा सके उतना ही कल्याणकर है।

उन्नति के लिए उत्साहपूर्वक प्रयास करना एक बात है और अपने आपको दीन-दरिद्र अनुभव करना दूसरी। खिलाड़ी खेल में जीत के लिए, पहलवान कुश्ती पछाड़ने के लिए, छात्र ऊँचा वजीफा पाने के लिए प्रतियोगिता में उतरते हैं, प्रयत्न करते और विजय उपहार पाते हैं, पर इनके न मिलने तक अपने आपको दीन-दुःखी नहीं मानते रहते। फिर भी अधिक प्रसन्नता पाने, अधिक ऊँचे उठने के लिए प्रयत्न जारी रखते हैं। हमारे प्रयास भी प्रगति की दिशा में निरन्तर चलें, पर इसके लिए वर्तमान स्थिति को असंतोषजनक मानना और खिन्न रहना आवश्यक नहीं है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आत्म निर्माण की ओर (अन्तिम भाग)

जब तुम किसी व्यक्ति के व्यवहार में संकीर्णता पाओ, किसी से किसी की चुगली सुनो तो उसके अनुसार कोई काम मत कर डालो और न वह बात लोगों में जाहिर करो। इससे तो वह दुर्गुण फैलता है-दुर्गंध की भाँति और सब सुनने देखने वालों के मन को दूषित करता है। इसके बदले उस दुर्गुण को कम करो। दुर्गुण की चर्चा करने से दिन दूना रात चौगुना बढ़ता है। रोग तो औषधि से शान्त होता है, गरम लोहे को ठण्डा लोहा काटता है। आग पानी से बुझती है। क्रोध नम्रता से शान्त होता है। अतः दुर्गुण से दुर्गुण उसी प्रकार बढ़ता है जैसे क्रोधी व्यक्ति से क्रोधपूर्ण बर्ताव करने से और आग में आग डालने के समान होता है। अतएव दुर्गुण की औषधि है सद्गुण।

यदि तुम्हारे बच्चे से, तुम्हारी स्त्री से, तुम्हारे नौकर से अमुक काम नहीं बनता, वरन् इन्होंने कोई काम बिगाड़ दिया और नुकसान हो गया हो तो क्रोध करने, तिरस्कार और निकृष्ट आलोचना करने से सबके मन में हीनता और पश्चाताप के भाव पैदा होगा। काम बिगड़ जाने से उन्हें पश्चाताप तो है ही, परन्तु तुम्हारे शब्दों से उन्हें बहुत ही चोट पहुँचेगी, इससे वे भयभीत और संकुचित होंगे, आगे वैसा कोई काम करने की उन्हें हिम्मत न होगी-कह देंगे- हमसे न होगा - बिगड़ जायगा, टूट जायगा- इत्यादि।

उनका छिद्रान्वेषण करने, उनका तिरस्कार करने, हीन, निर्बुद्धि और निकृष्ट बनाने में तुम्हारे मन में भी संताप से कितना विष उत्पन्न होकर रक्त को विषाक्त करेगा - इसकी कल्पना तुम्हें नहीं है। अस्तु, दूसरों का तिरस्कार करने की अपेक्षा उक्त घटना को यह समझ कर क्षमा कर देना चाहिए कि क्रोध और तिरस्कार से कुछ तो बनेगा नहीं, भविष्य में सुधार के लिए उन्हें शिक्षा दे देनी चाहिए। हंसकर उन्हें अमुक काम ठीक प्रकार से करना सिखला दो तो वे तुम्हें महान समझेंगे, तुमसे प्रेम करेंगे और सावधानी तथा प्रेमपूर्वक हरेक काम करेंगे।

दूसरे लोग जैसा सोचते हैं जो बोलते या करते हैं-उसकी जिम्मेदारी उन पर है, तुम्हें क्या चिन्ता? परन्तु तुम जैसा सोचते हो, जो बोलते या करते हो उसकी जिम्मेदारी तुम पर है-उसकी चिन्ता तुम्हें होनी चाहिए।

किसी घटना से उतनी हानि नहीं होती, वरन् उस घटना से हम स्वयं अपने विचारों द्वारा अपनी हानि अधिक कर लेते हैं। कोई विपत्ति आने और घटना होने पर कोई रोता बिलखता है, दूसरा व्यक्ति उसे छोड़कर निर्माण में लग जाता है। हुआ सो हुआ, अब आगे सुधारो। इन दोनों व्यक्तियों में कितना अन्तर है?

तुम किसी योजना में लगे हो, तो धैर्यपूर्वक प्रयत्नशील रहो, यह मत सोचो, और मत कहो अरे इतने दिन तो हो गये, न जाने कब यह पूरा होगा। वरन् ऐसा विचार करो-प्रतिदिन यह धीरे-धीरे अब पूरा हो रहा है।

किसी के विषय में शीघ्र ही अपना मत स्थिर करके निर्णय मत कर दो। कोई व्यक्ति शराब पीता है तो मत कहो कि वह बुरा कर्म करता है, संभव है उसे औषधि रूप में शराब की आवश्यकता हो, परन्तु उसकी दुर्दशा देखकर इतना अवश्य समझ सकते हो कि शराब पीना बुरा नहीं, वरन् अधिक पीना बुरा है।

तुम दूसरों को कैसा समझते हो दूसरे लोग तुम्हें क्या समझते हैं- यह अपनी-2 मनोवृत्ति विकास और दृष्टिकोण का प्रतिबिम्ब है। परन्तु तुम वास्तव में क्या हो, इसका विचार करो अपना सुधार और निर्माण करते रहो, संसार के लोग कुछ भी कहें।

.....समाप्त
.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 25

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शुक्रवार, 31 मार्च 2023

👉 आत्म निर्माण की ओर (भाग २)

किसी रोज सन्ध्या समय विश्लेषण करने में जब मालूम हो जाय कि आज दिन भर हमने किसी की निन्दा नहीं की, कोई हीन बात नहीं बोले, किसी का तिरस्कार नहीं किया, चुगली नहीं की, तो समझ लो कि उस दिन तुम्हारा आध्यात्मिक विकास का बीजारोपण हो गया। शब्दों पर अधिकार रखकर अब तुम आगे उन्नति कर सकोगे।

यदि तुम किसी व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्ति की आलोचना, चुगली या तिरस्कार सुनो तो उस पर ध्यान मत दो, उसे मत मानो। वह निन्दक अपनी ही आत्महीनता का परिचय दे रहा है- उसमें स्वयं कितनी बुराइयाँ हैं उसे वह नहीं देखता और नहीं दूर करता। वह दूसरों के छिद्र देखता है- उसकी बात सुनकर उससे कहो, “मुझे आलोचना या चुगली मत सुनाओ। इससे तुम्हें या मुझे क्या लाभ ? मुझे यह बताओ कि उस व्यक्ति में अच्छे गुण क्या हैं, और वे अच्छे गुण तुम में हैं या नहीं ? तथा उसकी अपेक्षा तुम कितना अच्छा काम कर सकते हो यह सिद्ध करो।” तुम्हारी ऐसी बातें सुनकर उसकी दुबारा चुगली करने की हिम्मत नहीं होगी।

तुम भी यदि चुगली या वार्ता सुनो, दूसरों की चर्चा सुनो तो उसे दूसरों को मत सुनाओ-इससे व्यर्थ बकवाद बढ़ता है, व्यर्थ के विचार फैलते हैं, जूठा खाकर उसे उगलना कोई अच्छी बात नहीं है- यह तो कुत्तों से भी बुरा काम है। उस बात को छोड़ दो विचार करो कि क्या वह व्यक्ति सत्य कह रहा है? क्या ऐसा कह देना आवश्यक है? यदि मैं यह बात अमुक व्यक्ति को कह दूँ तो इसका क्या नतीजा होगा? इससे किसको लाभ होगा और न कह देने से किसको हानि? इन बातों में प्रेम कितना है? घृणा कितनी है? इत्यादि बातों पर विचार कर लो तब कोई सुनी हुई बात अपनी ओठों पर से दूसरे के कान में डालो फिर इसका क्या परिणाम होता है- तुम्हें पश्चाताप न होगा और दोष नहीं लगेगा, गवाही नहीं देनी होगी।

यदि तुम्हें किसी व्यक्ति का व्यवहार संकीर्ण मालूम पड़े और तुम उसका तिरस्कार करना चाहो तो पहले विचार कर लो-तुममें उसका तिरस्कार करने की प्रेरणा क्यों हो रही है ? उसमें जो संकीर्णता और बुराई है, क्या वह हममें नहीं है? यदि हममें भी वही बात है तो पहले स्वयं आत्मशुद्धि की आवश्यकता है तभी दूसरे पर दोष लगाने का अधिकार होगा। जब तक तुममें वही बुराई है तब तक तुम दोनों बराबरी की श्रेणी में हो। यदि तुममें वह संकीर्णता और बुराई नहीं है तो तुम शुद्ध हो परन्तु उसका तिरस्कार करने से तुममें हीनता आ जायगी। उसको शुद्ध करो। फूल मिट्टी में पड़ कर उसे भी सुगंधित कर देता है। उसे मत कहो, “तुम निकृष्ट और नीच हो, दुष्ट बेईमान हो।” वरन् उसे इन शब्दों की कल्पना ही न होने दो। उससे महानता और ईमानदारी की बात करो।

“अमुक व्यक्ति ने ऐसा नहीं किया”, “अमुक बात अब तक नहीं हुई”, “अमुक कार्य हो जाय तब हम दूसरा काम करें”, “ऐसा हो जाता हो हम भी ऐसा करते”, इत्यादि बातें आलसी व्यक्ति किया करते हैं। जो कुछ तुम्हें करना है उसके लिए दूसरी भूमिकाओं पर ठहरने की क्या आवश्यकता? भूतकाल की अपूर्णताओं पर कुढ़ते रहने की अपेक्षा वर्तमान को पूर्ण कर भविष्य का निर्माण किया जा सकता है। भूतकाल की घटना तो मुर्दा हो गयी, उसकी कब्र खोदकर हड्डियाँ निकालने से क्या लाभ ? चेतन तत्व का आविष्कार करो जिससे तुम्हारा और संसार का निर्माण हो।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 24

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बुधवार, 29 मार्च 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 29 March 2023

◆ असफलताओं का दोष भाग्य, भगवान्, ग्रह दशा अथवा संबंधित लोगों को देकर मात्र मन को बहलाने की आत्म-प्रवंचना की जा सकती है, उसमें तथ्य तनिक भी नहीं है। संसार के प्रायः सभी सफल मनुष्य अपने पुरुषार्थ से आगे बढ़े हैं। उन्होंने कठोर श्रम और तन्मय-मनोयोग का महत्त्व समझा है। यही दो विशेषताएँ जादू की छड़ी जैसा काम करती हैं और घोर अभाव की-घोर विपन्नताओं की परिस्थितियों के बीच भी प्रगति का रास्ता बनाती हैं।

◆ विपत्ति को टालने अथवा हलका करने का सबसे सस्ता और सबसे हलका नुसखा यह है कि कठिनाई को हलकी माना जाय और उसके हल हो जाने पर विश्वास रखा जाय। सही एवं भरपूर प्रयत्न करना ऐसी ही मनःस्थिति में संभव हो सकता है। जबकि लड़खड़ाता हुआ चिंतन तो और भी अधिक गहरे दलदल में फँसा देता है। उज्ज्वल भविष्य की आशा छोड़ दी जाय तो फिर चारों ओर अंधकार  ही अंधकार दिखाई देगा और हलकी सी कठिनाई को पार करना भी पहाड़ उठाने जैसा भारी मालूम पड़ेगा।

◆ साहस सदा बाजी मारता है। अंदर का शौर्य बाह्य जीवन में पराक्रम और पुरुषार्थ बनकर प्रकट होता है। कठिनाइयों के साथ दो-दो हाथ करने की खिलाड़ी जैसी उमंग मनुष्य को खतरा उठाने और अपनी विशिष्टता प्रकट करने के लिए प्रेरित करती है। साहसी लोग बड़े-बड़े काम कर गुजरते हैं। बड़े कदम उठाने में पहल तो उन्हें ही करनी पड़ती है, पर पीछे कहीं न कहीं से सहयोग भी मिलता है और साधन भी जुटते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्म निर्माण की ओर (भाग 1)

छोटी छोटी साधारण बातें बड़ी महत्वपूर्ण होती हैं-उनमें तत्वज्ञान और बड़े बड़े सत्य सिद्धान्त मिलते हैं। तुममें जितना ज्ञान है उसका उपयोग करते रहो जिससे वह नित्य नवीन बना चमकता रहेगा। केवल पुस्तकें पढ़ कर संसार की व्यावहारिक प्रथाओं में डूब जाने से ज्ञान होने से क्या लाभ जबकि अज्ञानियों के समान ही आचरण किया जाय। ज्ञानियों ने प्रथाओं की व्यवस्था मूर्खों के निर्देश के लिए ही हैं, ज्ञानी तो स्वतंत्र है और ज्ञान द्वारा विवेकबुद्धि से आचरण करने में समर्थ है यद्यपि मूर्ख लोग प्रथाबद्ध होकर ज्ञानी को धिक्कारते हैं कि उल्टा आचरण करते हो ? ज्ञानी जानता है कि तत्व सत्य क्या है अतः वह मुक्त है। अज्ञानी अभाव के कारण प्रथाओं और परम्परा को ही सत्य मान उसमें लिप्त बद्ध है। उसमें बुद्धि नहीं कि स्वतंत्र रूप से प्रथा और परम्परा से बाहर निकल कर कुछ सोच सके और कर सके। यदि तुम ज्ञानी होकर भी मूर्खों के बीच तथा और परम्परा के अनुसार आचरण करो तो तुममें और मूर्खों में क्या अन्तर रहा ?

अपने ज्ञान को स्वाध्याय और छोटे छोटे व्यवहार द्वारा नित्य परिमार्जित करते रहो। यदि कहीं ज्ञान चर्चा होती हो और उसके कुछ शब्द सुनकर तुम्हें मालूम पड़े तो यह कहकर वहाँ से मत खिसक जाओ कि यह सब तो मैंने पढ़ लिया है मैं जानता हूँ। संभव है उसके अन्दर कोई नवीन बात निकल आवे जो तुम्हारे लिए उपयोगी हो, तुम्हारे जीवन में महान् परिवर्तन उपस्थित कर दे।

अपनी बात चीत में सदैव सतर्क रहो। किसी के विषय में आलोचना या निन्दा मत करो और अपने विषय में किसी प्रकार की हीनता मत प्रकट करो। संसार में सभी प्राणी-परमात्मा की कला द्वारा रचित उसकी प्रतिमूर्ति हैं दिव्य हैं, तुम भी उसकी प्रतिमूर्ति और दिव्य हो। आवश्यकता है केवल आत्म विकास की, जिससे तुम दूसरों का और अपना सत्य स्वरूप समझ सको।

रात को सोते समय अन्वेषण करो कि दिन भर की बातचीत में तुमने किसी से कैसी कैसी बातें की। निश्चय करो कि अगले दिन बातचीत में कोई असत्य, हीन बात न निकले। तुम्हारे शब्द ठोस, रचनात्मक, दिव्य, प्रसन्न और चेतन हों जिससे दूसरों पर ऐसा प्रभाव पड़े जैसे एक चुम्बक दूसरे लोहे को खींचता है, और बिजली द्वारा मुर्दा ‘बैटरी चार्ज’ हो जाती है। ऐसा ही तुम्हारे शब्दों का प्रभाव हो कि सुनने वाला निराश निरुत्साही व्यक्ति चेतन हो जाय और असत्य भाषी का दिल हिल जाय और दुबारा असत्य बोलने का साहस न रह जाय।

यदि तुम्हें इस प्रकार प्रयत्न करने में प्रथम दिन सफलता न मिले तो हताश होकर छोड़ मत दो, प्रयत्न करते रहो। बहाना मत करो कि इतनी बारीकी से व्यवहार हमसे नहीं होता, कहाँ तक किस किसके साथ हरेक शब्द का खयाल रखें। एक एक व्यक्ति के सुधार से दुनिया धीरे धीरे सुधर जायगी, जल्दी नहीं होता। संसार का विकास क्रम सूक्ष्म गति से हो रहा है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 23

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/August.23

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सोमवार, 27 मार्च 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 27 March 2023

◆ आज आस्तिकता भी विकृत हो गयी है। लोग मान बैठे  हैं कि थोड़ी सी चापलूसी करने या भेंट पूजा की छोटी-मोटी रिश्वत देकर ईश्वर को अपना पक्षपाती बनाया जा सकता है और फिर उससे अयोग्य होते हुए भी बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं तथा पापों के दण्ड से बचने की छूट पाई जा सकती है। यदि यह कल्पना सही हो तो फिर ईश्वर का मूल स्वरूप ही विकृत हो जाएगा। फिर उसे पक्षपाती, रिश्वतखोर, खुशामदपसंद और अन्धेरगर्दी फैलाने वाला कहा जाएगा।

◆ अनीतिपूर्वक बेईमानी अपनाकर यदि कोई धनी बनता है या उन्नतिशील कहलाता है तो वह सारी प्रगति धिक्कारे जाने योग्य है। कर्त्तव्य और औचित्य का पालन करते हुए भले ही कष्टसाध्य जीवन जीना पड़े, पर उस पथ से विचलित न होना ही मनुष्यता की रक्षा कहा जाएगा। उसी का नाम चारित्रिक शुचिता है।

◆ युग परिवर्तन का अर्थ है-व्यक्ति परिवर्तन और यह महान् प्रक्रिया अपने से आरंभ होकर दूसरों पर प्रतिध्वनित होती है। यह तथ्य हमें हजार बार मान लेना चाहिए और उसे कूट-कूट कर नस-नस में भर लेना चाहिए कि दुनिया को जिस उपकरण के माध्यम से पलटा जा सकता है, वह अपना परिष्कृत व्यक्तित्व ही है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 निराश मत करिये

जो व्यक्ति आज तुम्हारी ही तरह होशियार और चतुर नहीं है उसे न तो निरुत्साहित करो और न उसका मजाक बनाओ। जो आदमी इस समय गधा, आलसी या मूर्ख प्रतीत होता है। यदि वह उचित अवसर पावे तो एक दिन बहुत ही बुद्धिमान सिद्ध हो सकता है। किसी की भूलों के लिये उसे तिरस्कृत मत करो वरन् उसे उत्साह देकर सन्मार्ग पर प्रवृत्त करने की चेष्टा करो।

गोल्ड स्मिथ, मास्टर लोगों की हंसी मजाक का साधन था। लड़के उसे ‘लकड़ी का चम्मच’ कहकर चिढ़ाते थे। वह डाक्टरी पढ़ता था, पर बार-बार असफल हो जाता। वास्तव में उसकी रुचि साहित्य की ओर थी। इन असफलता के दिनों में वह एक पुस्तक लिखने लगा। डॉक्टर जानसन ने कृपापूर्वक उसकी प्रथम कृति विकार आफ वेक फील्ड एक प्रकाशक को बिकवा कर उसको ऋण मुक्त कराया। इस रचना ने गोल्डस्मिथ की कीर्ति संसार भर में फैला दी। सर वाल्टर स्काट का नाम मास्टरों ने ‘मूढ़’ रख छोड़ा था। उसी मूढ़ ने ऐसी अद्भुत पुस्तकों की रचना की है जो सैंकड़ों शिक्षकों को शिक्षा दे सकती हैं। वेलिंगटन की माता उसकी मूर्खता से दुखी रहती थी। ईटन के स्कूल में वह बड़ा आलसी और बुद्धिहीन विद्यार्थी समझा जाता था। सेना में भर्ती हुआ तो प्रतीत होता था कि यह इस कार्य में भी अयोग्य साबित होगा, किन्तु उसने आश्चर्यजनक सैनिक योग्यता संपादित की और 46 वर्ष की आयु में दुनिया के सबसे बड़े सेनापति को हरा दिया।

आरंभ में कोई व्यक्ति अयोग्य दिखाई पड़े तो यह न समझना चाहिये कि इसमें योग्यता है ही नहीं या भविष्य में भी प्राप्त न कर सकेगा। यदि उचित प्रोत्साहन मिले और उपयुक्त साधन वह प्राप्त कर ले तो हो सकता है, कि आज नासमझ कहलाने वाला आदमी कल सयानों के कान काटने लगे।

किसी की बुद्धि पर मत हंसो वरन् उसकी त्रुटियों को सुधारने का प्रयत्न करो। तुम्हारे द्वारा लाँछित अपमानित या निरुत्साहित होने पर किसी का दिल टूट सकता है, किन्तु उसे किसी प्रकार से यहाँ तक कि वाणी से भी प्रोत्साहित करते रहो तो मनुष्य देहधारी प्राणी के असाधारण उन्नति कर जाने की बहुत कुछ आशा की जा सकती है।

✍🏻 स्वेट मार्डन
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 29

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शनिवार, 25 मार्च 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 25 March 2023

◆ हम अकेले चलें। सूर्य-चंद्र की तरह अकेले चलने में हमें तनिक भी संकोच न हो। अपनी आस्थाओं को दूसरों के कहे-सुने अनुसार नहीं, वरन् स्वतंत्र चिंतन के आधार पर विकसित करें। अंधी भेड़ों की तरह झुण्ड का अनुगमन करने की मनोवृत्ति छोड़ें। सिंह की तरह अपना मार्ग अपनी विवेक चेतना के आधार पर स्वयं निर्धारित करें।

◆ सफलता के बारे में हमारा विश्वास अधूरा नहीं होना चाहिए। उसमें कहीं दरार या छिद्र नहीं होने चाहिए। सफलता के बारे में तिल मात्र भी संदेह हो तो समझना चाहिए कि प्रयत्न में शिथिलता है। शिथिलता होने से सफलता दूर चली जाएगी। जब तक किसी कार्य में हम अपनी समस्त शक्तियाँ लगा नहीं पाते, मन एकाग्र नहीं करते, तब तक वह कार्य पूर्ण नहीं हो सकता। जितना कठिन कार्य है उसके लिए उतने ही दृढ़ विश्वास एवं निरन्तर प्रयत्न की आवश्यकता होती है।

◆ मनुष्य के पास बोलने की शक्ति है। यदि वह समय, परिस्थिति एवं श्रेष्ठता का ध्यान रखते हुए बोलता है तो वह वाणी के सहारे दुनिया में बहुत कुछ कर सकता है, किन्तु वाणी की शक्ति को ध्यान में रखे बिना अनर्गल, व्यर्थ की बकवास और बिना सोच-विचार कर बोलना उसका दुरुपयोग है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 अपने आपको पहचानिये।

दूसरों की बुराइयाँ सभी देखते हैं परन्तु अपनी ओर देखने का अभ्यास बहुत कम लोगों को होता है। सुप्रसिद्ध विचारक इमर्सन का कथन है- ‘बहुत कम लोग मृत्यु से पूर्व अपने आपको पहिचान पाते हैं’ बहुत कम व्यक्ति अपने जीवन में सभी शक्तियों को प्रकट करते हैं; बाकी तो उन्हें साथ लिए ही मर जाते हैं। हममें से अनेकों तो ईश्वर के सन्देश को संसार में दिये बिना ही यहाँ से चले जाते हैं’।

वस्तुतः तथ्य तो यह है कि हमारे अन्दर असंख्य गुप्त शक्तियाँ सोई पड़ी हैं परन्तु हमें उन योग्यताओं तथा क्षमताओं का पता ही नहीं और न ही उन्हें जानने का प्रयास करते हैं। यह ठीक है कि बाहर की अनेकों वस्तुएं जानकर हम ज्ञानवान् कहलाएँ, परन्तु यह भी कम आवश्यक नहीं कि हम अपने आपको पहचानना भी सीखें। जो अपनी और देखने का अभ्यास डालता है, वही महान् बनता है। ऐसा व्यक्ति कठिनाइयों तथा बाधाओं पर विजय पाकर सतत् उन्नति करता रहता है।

महापुरुषों का जीवन इस बात का साक्षी है कि वे सतत् आत्म-निरीक्षण करते रहें तथा अपनी भूलों से सदैव शिक्षाएँ ग्रहण करते रहें। यदि आप भी महान् बनना चाहते हैं तो दूसरों को तुच्छ समझने की, उनमें छिद्रान्वेषण करने की दृष्टि का परित्याग कर दीजिए। दूसरों को तुच्छ समझने वाला मनुष्यत्व खो देता है। अन्यों की गलतियाँ खोजने की अपेक्षा अपनी त्रुटियाँ खोजिए और उन्हें दूर कीजिए। अपनी शक्तियों को पहचानिए और उनका सदुपयोग कीजिए।

ईश्वर ने अनेकों दिव्य शक्तियाँ देकर आपको संसार में भेजा है, उनका सदुपयोग कीजिए। पेट और प्रजनन जैसे क्षुद्र कार्यों में उन्हें व्यर्थ न होने दीजिए। आप जो भी कार्य कर रहे हैं उनसे हजारों गुना अधिक कार्य करने की सामर्थ्य आपके अन्दर है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि अपना महत्व समझे, शक्तियों को पहिचाने तथा समय का सदुपयोग करें। जीवन का एक-एक क्षण बहुमूल्य है, उसे व्यर्थ न जाने दें।

जो कार्य करने की इच्छा रखते हैं, उसे आज से ही प्रारम्भ कर दीजिए। अपनी समस्त शक्तियाँ उसमें एकाकार। वह क्षण आपके जीवन का अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षण होगा जब आपको यह अनुभव होगा कि संसार को आपकी आवश्यकता है। आपके अन्दर एक और व्यक्तित्व समाहित है जो आपके बाहरी व्यक्तित्व से कहीं अधिक महान है। जिस क्षण व्यक्ति अपनी महानता की झलक पा लेता है; वह मानव से महामानवत्व की ओर अग्रसर हो जाता है।

हो सकता है कि किन्हीं कठिनाइयों या बाधाओं के कारण आपका व्यक्तित्व पूरी तरह से विकसित न हो सकता हो। परन्तु आपत्तियाँ आने पर घबराएं मत। जिस प्रकार से अग्नि में तप कर सोना निखर जाता है, और भी अधिक चमकने लगता है, उसी प्रकार बाधाएँ और कठिनाईयाँ मनुष्य को खरा कुन्दन बना देती है। कई पादप ऐसे होते हैं, जब तक उन्हें मसला न जाए सुगन्धि नहीं देते। उसी प्रकार कुछ व्यक्ति भी ऐसे होते हैं, जब तक वे विपत्तियों से आक्रान्त न किये जायें, उनकी योग्यताओं की सुगन्धि फैल ही नहीं पाती। अतएव आत्म-निरीक्षण के द्वारा अपनी योग्यताओं को पहचानिये। किसी भी प्रतिभा का अंकुर आपको अपने अन्दर दिखलाई पड़े उसको पुष्पित पल्लवित होने का अवसर दीजिये। कौन जाने एक दिन आप संसार के महान कलाकार बन जायें, विश्वप्रसिद्ध लेखक बन जायें, दार्शनिक या राजनीतिज्ञ बन जायें। चलिये और सतत् बढ़ते रहिए।

जो स्वयं को जान लेता है, वही साक्षात् परमेश्वर को जान सकता है। वही व्यक्ति ईश्वरीय प्रयोजनों को पूरा कर सकता है तथा उसके संदेशों को जनसाधारण तक पहुँचा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1972 पृष्ठ 32 

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👉 नवरात्रि अनुष्ठान का विधि- विधान

🔴 नवरात्रि साधना को दो भागें में बाँटा जा सकता है : एक उन दिनों की जाने वाली जप संख्या एवं विधान प्रक्रिया। दूसरे आहार- विहार सम्बन्धी प्रतिबन्धों की तपश्चर्या। दोनों को मिलाकर ही अनुष्ठान पुरश्चरणों की विशेष साधना सम्पन्न होती है। 

🔵 जप संख्या के बारे में विधान यह है कि ९ दिनों में २४ हजार गायत्री मन्त्रों का जप पूरा होना चाहिए। कारण २४ हजार जप का लघु गायत्री अनुष्ठान होता है। प्रतिदिन २७ माला जप करने से ९ दिन में २४० मालायें अथवा २४०० मंत्र जप पूरा हो जाता है। माला में यों १०८ दाने होते हैं पर ८ अशुद्ध उच्चारण अथवा भूल- चूक का हिसाब छोड़ कर गणना १०० की ही की जाती है। इसलिये प्रतिदिन २७ माला का क्रम रखा जाता है। मोटा अनुपात घण्टे में ११- ११ माला का रहता है। इस प्रकार प्रायः २(१/२) घण्टे इस जप में लग जाते हैं। चूंकि उसमें संख्या विधान मुख्य है इसलिए गणना के लिए माला का उपयोग आवश्यक है। सामान्य उपासना में घड़ी की सहायता से ४५ मिनट का पता चल सकता है, पर जप में गति की न्यूनाधिकता रहने से संख्या की जानकारी बिना माला के नहीं हो सकती। अस्तु नवरात्रि साधना में गणना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए माला का उपयोग आवश्यक माना गया है। 

🔴 आजकल हर बात में नकलीपन की भरमार है। मालाएँ भी बाजार में नकली लकड़ी की बिकती हैं। अच्छा यह है कि उसमें छल- कपट न हो जिस चीज की है उसी की जानी और बताई जाय। कुछ के बदले में कुछ मिलने का भ्रम न रहे। तुलसी, चन्दन और रूद्राक्ष की मालाएँ अधिक पवित्र मानी गई हैं। इनमें से प्रायः चन्दन की ही आसानी से मिल सकती हैं। गायत्री तप मे तुलसी की माला को प्रधान माना गया है, पर वह अपने यहाँ बोई हुई सूखी लकड़ी की हो और अपने सामने बने तो ही कुछ विश्वास की बात हो सकती है। बाजार में अरहर की लकड़ी ही तुलसी के नाम पर हर दिन टनों की तादाद में बनती और बिकती देखी जाती है। हमें चन्दन की माला ही आसानी से मिल सकेगी यों उसमें भी लकड़ी पर चन्दन का सेन्ट चुपड़ का धोखे बाजी खूब चलती है। सावधानी बरतने पर सह समस्या आसानी से हल हो सकती है और असली चन्दन की माला मिल सकती है। 

🔵 एक दिन आरम्भिक प्रयोग के रूप में एक घण्टा जप करके यह देख लेना चाहिए कि अपनी जप गति कितनी है। साधारणतया एक घण्टे में दस से लेकर बारह माला तक की जप संख्या ठीक मानी जाती है। किन्हीं की मन्द हो तो बढ़ानी चाहिए और तेज हो तो घटानी चाहिए। फिर भी अन्तर तो रहेगा ही। सब की चाल एक जैसी नहीं हो सकती। अनुष्ठान में २७ मालाएँ प्रति दिन जपनी पड़ती है। देखा जाय किएक दिन आरम्भिक प्रयोग के रूप में एक घण्टा जप करके यह देख लेना चाहिए कि अपनी जप गति कितनी है। साधारणतया एक घण्टे में दस से लेकर बारह माला तक की जप संख्या ठीक मानी जाती है। किन्हीं की मन्द हो तो बढ़ानी चाहिए और तेज हो तो घटानी चाहिए। फिर भी अन्तर तो रहेगा ही। सब की चाल एक जैसी नहीं हो सकती। 

🔴 अनुष्ठान में २७ मालाएँ प्रति दिन जपनी पड़ती है। देखा जाय कि अपनी गति से इतना जप करने में कितना समय लगेगा। यह हिसाब लग जाने पर यह सोचना होगा कि प्रातः इतना समय मिलता है या नहीं। उसी अवधि में यह विधान पूरा हो सके प्रयत्न ऐसा ही करना चाहिए। पर यदि अन्य अनिवार्य कार्य करने हैं तो समय का विभाजन प्रातः और सायं दो बार में किया जा सकता है। उन दिनों प्रायः ६ बजे सूर्योदय होता है। दो घण्टा पूर्व अर्थातृ ४ बजे से जप आरम्भ किया जा सकता है सूर्योदय से तीन घण्टे बाद तक अर्थात् ९ बजे तक यह समाप्त हो जाना चाहिए। इन पाँच घण्टों के भीतर ही अपने जप में जो २ (१/२) -३ घण्टे लगेंगे वे पूरे हो जाने चाहिए। यदि प्रातः पर्याप्त समय न हो तो सायंकाल सूर्यास्त से १ घण्टा पहले से लेकर २ घण्टे बाद तक अर्थात् ५ से ८ तक के तीन घण्टों में सवेरे का शेष जप पूरा कर लेना चाहिए। प्रातः ९ बजे बाद और रात्रि को ८ के बाद की नवरात्रि तपश्चर्या निषिद्ध है। यों सामान्य साधना तो कभी भी हो सकती है और मौन मानसिक जप में तो समय, स्थान, संख्या, स्नान आदि का भी बन्धन नहीं है। उसे किसी भी स्थिति में किया जा सकता है। यह अनुष्ठान के बारे में वैसा नहीं है। उसके लिए विशेष नियमों का कठोरता पूर्वक पालन करना पड़ता है।

👉 अपने चरित्र का निर्माण करो

जिसे तुम अच्छा मानते हो, यदि तुम उसे अपने आचरण में नहीं लाते तो यह तुम्हारी कायरता है। हो सकता है कि भय तुम्हें ऐसा नहीं करने देता हो, लेकिन इससे तुम्हारा न तो चरित्र ऊंचा उठेगा और न तुम्हें गौरव मिलेगा। मन में उठने वाले अच्छे विचारों को दबाकर तुम बार बार जो आत्म हत्या कर रहे हो आखिर उससे तुमने किस लाभ का अन्दाजा लगाया है?

शान्ति और तृप्ति, आचारवान व्यक्ति को ही प्राप्ति होती हैं। जो मन में है वही वाणी और कर्म में होने पर जैसी शान्ति मिलती है उसका एक अंश भी मन वाणी और कर्म में अन्तर रखने वाले व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता। बल्कि ऐसा व्यक्ति घुट-घुट कर मरता है और दिन रात अशान्ति के ही चक्कर में पड़ा रहता है।

घुट-घुट कर लाख वर्ष जीने की अपेक्षा उस एक दिन का जीना अधिक श्रेयस्कर है जिसमें शान्ति है, तृप्ति है। परन्तु भय का भूत मनुष्य को न जिन्दा ही रहने देता है और न मरने ही देता है। भय की उत्पत्ति का कारण आशक्ति है, मोह है। शरीर का मोह, धन का मोह आदमी को कहीं का नहीं रहने देता, शरीर का चाहे जितना मोह करो उसे किसी न किसी दिन मिट्टी में मिलना ही है, अमर हो ही नहीं सकता तब फिर उसे आत्मोन्नति के साधन के लिए उपयोग में न लाकर जो लोग उसका भार ढोकर चलते रहना पसन्द करते हैं, पसन्द करते ही नहीं बल्कि चलते रहते हैं वे आत्मा को अन्धेरे की ओर ही गिराते हैं। धन और शरीर ये जीवन के लक्ष्य नहीं हैं, जीवन का लक्ष्य तो है आत्मा की उन्नति, आत्मा की प्राप्ति। इसलिए शरीर और धन का जो लोग इसके लिए उपयोग नहीं करते वे प्राप्त साधनों का दुरुपयोग न करके अपने भावी जीवन में किसी महान संकट के लिए निमन्त्रण देते हैं।

जीवन और अच्छे जीवन के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए अपने आपकी खोज खबर रखता रहे। आत्म निरीक्षण करता रहे और फिर चतुर जर्राह की तरह जहाँ जहाँ आत्मोन्नति की बाधक शक्तियाँ और वृत्तियाँ काम कर रही हों। उनकी चीरफाड़ करता और उन्हें हटाता रहे। आत्म निरीक्षण और आत्म शुद्धि की वृत्ति को स्वभाव में बिना लाये कभी भी किसी व्यक्ति का चरित्र महान नहीं हुआ है। बल्कि चरित्र निर्माण के ये दोनों ही महान साधन हैं।

मानव स्वभावतः कमजोर नहीं है पर आस-पास का वातावरण उसे कमजोर बना देता है। सामाजिक परिस्थितियाँ-कायदे कानून मनुष्य को आगे बढ़ने से रोकते हैं और सामाजिक प्राणि होने के कारण मनुष्य समाज द्वारा परित्यक्त किये जाने के भय से आतंकित रहता है, इसलिए अन्दर गन्दगी बढ़ती रहती है। लेकिन जिसे अपने लक्ष्य का ज्ञान रहता है और अटूट श्रद्धा के साथ लक्ष्य पर पहुँचने की दृढ़ता को कायम रखता है उसे समाज के दुर्विधानों की बेड़ियां जकड़े नहीं रहती। वह इन्हें तोड़ता फोड़ता आगे बढ़ता है और स्वयं अपना ही उद्धार नहीं करता बल्कि समाज का भी पुनस्संस्कार कर डालता है। ऐसा व्यक्ति महान होता है।

ज्ञान को आचरण में बदल कर मनुष्य महान बनता है। इस महानता का सबसे बड़ा गुण है अभयदान । इसलिए जो चरित्रवान होते हैं वे निर्भीक होते हैं। वे आत्मा को अजर अमर मानते हैं और दुःख सुख को मानसिक विकार। जिन्हें आत्मा की प्राप्ति नहीं होती वे ही इन विकारों में फँसे रहते हैं इसलिए सम्पन्न होने पर भी सुखी नहीं रहते। लेकिन जिन्होंने विकारों के तत्व को समझ लिया है और जिन्हें आत्मा की पूर्णता का परिचय मिल गया है। ऐसे आत्माराम पुरुष सिर्फ अपने को ही नहीं तारते बल्कि वे संसार के तरण तारण हो जाते हैं।

चरित्र, मानव-आत्मा को पूर्ण विकसित करता है इसलिए आरंभ में भले ही किन्हीं कठिनाइयों का सामना करना पड़े परन्तु अन्त में वे कठिनाइयाँ ही जीवन को उज्ज्वल करने वाली दिखने लगती हैं। इन कठिनाइयों को पार कर मानव तपःपूत हो जाता है। आत्मा निखर उठती है। तब अभाव नाम के किसी भी तत्व का उसके लिए कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। इसलिए चरित्र की ही उपासना करनी चाहिए और चरित्रवान बनने का ही संकल्प । इस अकेले को लिया तो सब कुछ पा लिया समझो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1948 सितम्बर पृष्ठ 3 

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/September.3

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गुरुवार, 23 मार्च 2023

👉 हम तुच्छ नहीं, गौरवास्पद जीवन जियें

हाड़-माँस का पुतला दुर्बलकाय मानव प्राणी शारीरिक दृष्टि से तुच्छ और नगण्य है। मामूली जीव-जन्तु, पशु-पक्षी जिस तरह का निसर्ग जीवन जीते हैं उसी तरह जिन्दगी की लाश नर-पशु भी ढोते रहते हैं। इस तरह की जिन्दगी जीने से किसी का जीवनोद्देश्य पूरा नहीं होता।

‘विचार’ ही वह शक्ति है जिसने मनुष्य को अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक सुख-सुविधाएं उपार्जित करने में समर्थ बनाया। विचार का यह प्रथम चमत्कार है। इससे अगला चमत्कार तब प्रारम्भ होता है जब वह विचारणा की महान् शक्ति, जीवन का उद्देश्य, स्वरूप और उपयोग करने की सही जानकारी प्राप्त करने में प्रवृत्त होता है। इसी मार्ग एवं प्रयास का नाम तत्व-ज्ञान, दर्शन एवं अध्यात्म है। विचार-शक्ति का मूल्य और महत्व जिसे विदित हो गया वह अपनी इस ईश्वर प्रदत्त दिव्य विभूति को परम लक्ष्य की प्राप्ति में प्रयुक्त करता है। फलस्वरूप उसका सारा जीवन क्रम ही बदल जाता है, उसका प्रत्येक क्रिया-कलाप उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से ओत-प्रोत बनता चला जाता है।

यही मानव जीवन का गौरव तथा आनन्द है। विचारशीलता का अवलम्बन लेकर जीने में ही मनुष्य जन्म की सार्थकता है। रोटी के लिये मरते-खपते रहना मनुष्य का नहीं तुच्छ जीवन-जन्तुओं का कार्य है। अच्छा हो हम अपनी-अपनी विचार शक्ति और जिन्दगी का मूल्य समझें और वह गतिविधियाँ अपनायें जो अपने स्तर और गौरव के उपयुक्त हैं।

✍🏻 ~ सन्त वास्वानी
📖 अखण्ड ज्योति 1968 फरवरी पृष्ठ 1

✍🏻 ~ सन्त वास्वानी
📖 अखण्ड ज्योति 1968 फरवरी पृष्ठ 1

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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